ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
( ४ )
लिये और अपने आध्यात्मिक विचारोंकी उन्नतिके लिये मैंने अपनी समझके अनुसार यह व्याख्या लिखकर ‘उपनिषदङ्क’ में प्रकाशित करवायी थी। अब कुछ मित्रोंका आग्रह होनेसे यथास्थान आवश्यक संशोधन करके इसे पुस्तकाकारमें प्रकाशित किया जाता है। उदार महानुभाव पण्डित और संतजन मेरी इस बाल-चपलताके लिये क्षमा करेंगे।
इस व्याख्याका अधिकांश संशोधन ‘उपनिषदङ्क’ की छपाईके समय पूज्यपाद भाईजी, श्रीजयदयालजी और स्वामीजी श्रीरामसुखदासजीकी सम्मतिसे किया गया था। व्याकरणसम्मत अर्थ और हिंदी-भाषाके संशोधनमें पण्डित श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्रीने भी पर्याप्त सहयोग दिया था। इसके लिये मैं आपलोगोंका आभारी हूँ।
उक्त टीकामें पहले अन्वयपूर्वक शब्दार्थ लिखा गया है और उसके बाद व्याख्यामें प्रत्येक मन्त्रका भाव सरल भाषामें समझाकर लिखनेकी चेष्टा की गयी है। इससे जो मूल-ग्रन्थके साथ शब्दार्थ मिलाकर अर्थ समझना पसंद करते हैं और दूसरे जो संस्कृत-भाषाका ज्ञान नहीं रखते, ऐसे दोनों प्रकारके ही पाठकोंको उपनिषदोंका भाव समझनेमें सुविधा होगी, ऐसी आशा की जाती है।
इसके साथ प्रत्येक उपनिषद्की अलग-अलग विषय-सूची भी सम्मिलित की गयी है, इससे प्रत्येक विषयको खोज निकालनेमें पाठकोंको सुविधा मिलेगी।
गीताभवन, ऋषिकेश
गङ्गादशहरा संवत् २०१०
विनीत—
हरिकृष्णदास गोयन्दका
विषय-सूची
( १ ) ईशावास्योपनिषद्
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ | ..... २७ | |
| १-२ | सर्वव्यापक परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करते हुए | |
| निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेका विधान | ..... २८ | |
| ३ | उपर्युक्त मार्गके विपरीत चलनेवालोंकी दुर्गंतिका कथन | ..... २९ |
| ४-५ | उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका प्रतिपादन | ..... ३० |
| ६-८ | परब्रह्म पुरुषोत्तमको जाननेवाले महापुरुषकी स्थिति तथा | |
| तत्त्वज्ञानके फलका निरूपण | ..... ३२ | |
| ९-११ | विद्या और अविद्याकी उपासनाके तत्त्वका निरूपण | ..... ३४ |
| १२-१४ | सम्भूति और असम्भूतिकी उपासनाके तत्त्वका निरूपण | ..... ३८ |
| १५-१६ | भक्तके लिये अन्तकालमें परमेश्वरकी प्रार्थना | ..... ४१ |
| १७ | शरीरत्यागके समय प्रार्थना | ..... ४३ |
| १८ | परमधाम जाते समय अचिमार्गके अग्नि-अभिमानी | |
| देवतासे प्रार्थना | ..... ४४ | |
| शान्तिपाठ | ..... ४६ |
( २ ) केनोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ | ..... ४७ |
|---|
प्रथम खण्ड
| १ | इन्द्रियादिकोंका प्रेरक कौन है—इस विषयमें शिष्यका प्रश्न | ..... ४८ |
|---|---|---|
| २-८ | उत्तरमें गुरुद्वारा इन्द्रियादिकोंको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाले | |
| सर्वप्रेरक परब्रह्म परमात्माका निरूपण एवं संकेतसे | ||
| उसकी अनिर्वचनीयताका प्रतिपादन | ..... ४९ |
द्वितीय खण्ड
१ | ‘जीवात्मा परमात्माका अंश है और सम्पूर्ण इन्द्रियादिमें जो शक्ति है, वह भी ब्रह्मकी ही है—’ इतना जान लेना ही पूर्णज्ञान नहीं है—यह कहकर गुरुका ब्रह्मज्ञानकी विलक्षणताविषयक संकेत करना | ..... ५४ ---|---|---
( ६ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २ | शिष्यद्वारा विलक्षणतापूर्वक अपनी अनुभूतिका वर्णन | ..... ५५ |
| ३-४ | गुरु-शिष्य-संवादका निष्कर्ष | ..... ५६ |
| ५ | ब्रह्म-तत्त्वको इसी जन्ममें जान लेनेकी अत्यावश्यकताका प्रतिपादन | ..... ५७ |
तृतीय खण्ड
| १-२ | परब्रह्म परमात्माकी महिमान जाननेके कारण देवताओंका अभिमान और उसके नाशके लिये यक्षका प्रादुर्भाव | ..... ५९ |
|---|---|---|
| ३-६ | यक्षको जाननेके लिये अग्निदेवका प्रयत्न और यक्षके द्वारा अग्निदेवके अभिमानका नाश | ..... ६० |
| ७-१० | यक्षको जाननेके लिये वायुदेवका प्रयत्न और यक्षके द्वारा वायुदेवके अभिमानका नाश | ..... ६३ |
| ११-१२ | यक्षको जाननेके लिये इन्द्रदेवका प्रयत्न, यक्षका अन्तर्धान होना तथा उमादेवीका प्राकट्य और उनसे इन्द्रका प्रश्न | ..... ६५ |
चतुर्थ खण्ड
| १-३ | उमादेवीद्वारा यक्षरूपमें प्रकट परब्रह्मके तत्त्वका उपदेश, उपदेश पाकर इन्द्रको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति तथा अग्नि, वायु और इन्द्रकी श्रेष्ठता एवं उनमें भी इन्द्रकी सर्वश्रेष्ठताका निरूपण | ..... ६७ |
|---|---|---|
| ४ | आधिदैविक दृष्टान्तसे ब्रह्मज्ञानकी पूर्वावस्थाके विषयमें सांकेतिक आदेश और उसका महत्त्व | ..... ६९ |
| ५ | उसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टान्तसे ब्रह्मज्ञानकी पूर्वावस्थाके विषयमें सांकेतिक आदेश और निरन्तर प्रेमपूर्वक उसका स्मरण होनेका कथन | ..... ७० |
| ६ | परब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और फल | ..... ७१ |
| ७ | उपसंहार | ..... ७२ |
| ८-९ | ब्रह्मविद्याके साधनोंका वर्णन तथा ब्रह्मविद्याका रहस्य जाननेकी महिमा | ..... ७२ |
| शान्तिपाठ | ..... ७४ |
( ३ ) कठोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ | ..... ७५ |
|---|
( ७ )
प्रथम अध्याय
( प्रथम वल्ली )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १—४ | महर्षि उद्दालकके द्वारा यज्ञ करनेके अनन्तर दक्षिणाके रूपमें गोधन | |
| देते समय नचिकेतामें आस्तिकताका आवेश और पिता-पुत्र-संवाद ... | ७६ | |
| ५-६ | नचिकेताका धैर्यपूर्ण विचारपूर्वक पिताको आश्वासन देना ..... | ७९ |
| ७-८ | नचिकेताका यमलोक जाना और यमराजपत्नीद्वारा यमराजसे | |
| आतिथ्य-सत्कारके लिये प्रार्थना ..... | ८० | |
| ९ | यमराजद्वारा नचिकेताका सत्कार और तीन वर माँगनेके लिये कहना ... | ८२ |
| १०-११ | नचिकेताद्वारा प्रथम वरमें पितृ-परितोषकी याचना और यमराजद्वारा | |
| उक्त वर-प्रदान ..... | ८३ | |
| १२-१३ | नचिकेताद्वारा द्वितीय वरमें स्वर्गकी साधनभूत अग्निविद्याकी याचना ... | ८४ |
| १४-१९ | यमराजद्वारा फलसहित 'नाचिकेत' अग्निविद्याका वर्णन ..... | ८५ |
| २०-२२ | नचिकेताद्वारा तृतीय वरमें आत्मज्ञानके लिये याचना और यमराज- | |
| द्वारा आत्माके तत्त्वज्ञानकी कठिनताका प्रतिपादन तथा नचिकेताकी | ||
| दृढ़ताका वर्णन ..... | ८९ | |
| २३-२५ | यमराजका नचिकेताको आत्मतत्त्वविषयक प्रश्नके बदलेमें भाँति- | |
| भाँतिके प्रलोभन देना ..... | ९२ | |
| २६-२९ | नचिकेताकी परम वैराग्यपूर्ण उक्ति तथा आत्मतत्त्व जाननेका | |
| अटल निश्चय ..... | ९५ |
( द्वितीय वल्ली )
| १-२ | यमराजद्वारा ब्रह्मविद्याके उपदेशका आरम्भ और श्रेय-प्रेयका विवेचन ... | ९८ |
|---|---|---|
| ३-६ | आत्मविद्याभिलाषी नचिकेताके वैराग्यकी प्रशंसा तथा अविद्यामें | |
| रचे-पचे मनुष्योंकी दुर्दशाका कथन ..... | १०० | |
| ७-९ | आत्मतत्त्वको जाननेवालोंकी महिमा तथा तत्त्वज्ञानीकी दुर्लभताका | |
| वर्णन और नचिकेताकी प्रशंसा ..... | १०४ | |
| १०-११ | यमराजद्वारा अपने उदाहरणसे निष्कामभावकी महिमाका वर्णन | |
| एवं नचिकेताकी निष्कामताका वर्णन ..... | १०७ | |
| १२-१३ | परब्रह्म परमात्माकी महिमा ..... | १०९ |
( ८ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १४ | नचिकेताका सर्वातीत तत्त्वविषयक प्रश्न | ..... १११ |
| १५—१७ | यमराजद्वारा ॐकारोपदेश, नाम-नामीका अभेद-निरूपण और नामकी महिमा | ..... १११ |
| १८—१९ | आत्माके स्वरूपका वर्णन | ..... ११३ |
| २०—२१ | परमात्माके स्वरूपका वर्णन | ..... ११५ |
| २२ | परमेश्वरकी महिमा समझनेवाले पुरुषकी पहिचान | ..... ११७ |
| २३ | कृपानिर्धर साधकको परमेश्वरकी प्राप्तिका निरूपण | ..... ११७ |
| २४—२५ | परमात्मा किसको और क्यों नहीं मिलते? इसका कथन | ..... ११८ |
( तृतीय वल्ली )
| १ | जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और प्राणियोंकी हृदय-गुफामें दोनोंके निवास-स्थानका निरूपण | ..... १२० |
|---|---|---|
| २ | प्रार्थनाको परमात्माकी प्राप्तिका सर्वोत्तम साधन बतलाना | ..... १२२ |
| ३—४ | रथ और रथीके रूपकसे परमात्मप्राप्तिके उपायका कथन | ..... १२३ |
| ५—९ | विवेकहीनकी विवशता तथा दुर्गति और विवेकशीलकी स्वाधीनता तथा परमगतिका प्रतिपादन | ..... १२४ |
| १०—११ | इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्की ओर लगानेके प्रकारका तात्विक विवेचन | ..... १२८ |
| १२—१३ | परमात्माकी प्राप्तिके महत्त्व और साधनका निरूपण | ..... १३१ |
| १४—१५ | परमात्माकी प्राप्तिके लिये मनुष्योंको चेतावनी, परमात्माके स्वरूपका और उसके जाननेके फलका वर्णन | ..... १३२ |
| १६—१७ | उपर्युक्त उपदेशमय आख्यानके श्रवण और वर्णनका फलसहित माहात्म्य | ..... १३३ |
द्वितीय अध्याय
( प्रथम वल्ली )
| १ | परमेश्वरके दर्शनमें इन्द्रियोंको बहिर्मुखता ही विघ्न है | ..... १३५ |
|---|---|---|
| २ | अविवेकी और विवेकियोंका अन्तर | ..... १३६ |
| ३—५ | जिनकी कृपाशक्तिसे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण अपना-अपना कार्य करते हैं, उन सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके ज्ञानसे शोक-निन्दा आदि सब दोषोंकी निवृत्तिका कथन | ..... १३७ |
( १ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६—९ | जगत्के कारणरूप परब्रह्मका अदितिदेवी, अग्नि और सूर्यके रूपमें वर्णन ..... १३९ | १३९ |
| १०—११ | परमात्माकी सर्वव्यापकता और सर्वरूपताको न जाननेके कारण जो इसे नाना रूपोंमें देखते हैं, उनको बारंबार जन्म-मरणकी प्राप्ति होनेका कथन ..... १४२ | १४२ |
| १२—१५ | हृदय-गुफामें स्थित परमेश्वरको अङ्गुष्ठपरिमाणवाला बताना और उस परमेश्वरके न जानने और जाननेके फलका वर्णन ..... १४३ | १४३ |
( द्वितीय बल्ली )
| १ | परमेश्वरके ध्यानसे शोक-निवृत्ति तथा जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्तिका निरूपण ..... १४६ | १४६ |
|---|---|---|
| २—४ | परमेश्वरकी सर्वरूपता और सर्वत्र परिपूर्णताका प्रतिपादन ..... १४७ | १४७ |
| ५—६ | यमराजद्वारा परमात्माका स्वरूप और जीवात्माकी गति बतानेकी प्रतिज्ञा ..... १४९ | १४९ |
| ७ | जीवात्माकी गतिका प्रकरण ..... १५० | १५० |
| ८—११ | परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन तथा अग्नि, वायु और सूर्यके दृष्टान्तसे परमेश्वरकी व्यापकता और निलैपताका कथन ..... १५१ | १५१ |
| १२—१३ | समस्त प्राणियोंके अन्तर््यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका अपने हृदयमें दर्शन करनेवालेको परमानन्द और परम शान्तिकी प्राप्तिका निरूपण ..... १५४ | १५४ |
| १४ | उक्त परमानन्दकी प्राप्ति किस प्रकार होती है—यह जाननेके लिये नचिकेताकी उत्कण्ठा ..... १५६ | १५६ |
| १५ | यमराजद्वारा परब्रह्मकी सर्वप्रकाशकताका प्रतिपादन ..... १५६ | १५६ |
( तृतीय बल्ली )
| १ | संसाररूप अश्वत्थ-वृक्षका वर्णन ..... १५७ | १५७ |
|---|---|---|
| २ | सबका शासन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका उल्लेख ..... १५८ | १५८ |
| ३ | प्रभुकी सर्वशासकताका प्रतिपादन ..... १५९ | १५९ |
| ४ | मनुष्यशरीरके रहते-रहते परमेश्वरको न जान लेनेसे बारंबार पुनर्जन्म-प्राप्तिका कथन ..... १६० | १६० |
| ५ | स्थान-भेदसे भगवान्के प्राकट्यमें तारतम्य ..... १६० | १६० |
( १० )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | इन्द्रियोंसे आत्माकी भिन्नता जाननेका फल | ..... १६१ |
| ७—९ | तत्त्व-विचारके वर्णनमें आत्माको बुद्धिसे पर बतलाना | |
| और सर्वश्रेष्ठ, सबके आश्रय परमेश्वरको जान लेनेपर | ||
| अमृतत्वकी प्राप्तिका कथन | ..... १६२ | |
| १०—११ | योगके स्वरूप और साधनका प्रकरण | ..... १६४ |
| १२—१३ | भगवद्विश्वाससे भगवत्प्राप्तिका कथन | ..... १६५ |
| १४—१५ | निष्कामभावकी एवं संशयरहित निश्चयकी महिमा | ..... १६६ |
| १६ | मरनेके बाद जीवकी गतिका विषय | ..... १६७ |
| १७ | शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाले परमेश्वरकी उन दोनोंसे | |
| विलक्षणता और उसके ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्तिका निरूपण | ..... १६८ | |
| १८ | उपर्युक्त ब्रह्मविद्या और योगविधिके द्वारा नचिकेताको | |
| ब्रह्मकी प्राप्ति होनेका कथन | ..... १६९ | |
| शान्तिपाठ | ..... १७० |
( ४ ) प्रश्नोपनिषद्
उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ ..... १७१
( प्रथम प्रश्न )
१—३ | सुकेशादि ऋषियोंका महर्षि पिप्पलाद गुरुके पास जाना, गुरुकी आज्ञाके अनुसार तप करना और प्रजोत्पत्तिके विषयमें कबन्धीका प्रश्न | ..... १७२ ---|---|--- ४—८ | परमेश्वरके संकल्पद्वारा प्राण और रयिके संयोगसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन एवं आदित्य और चन्द्रमामें प्राण और रयि-दृष्टिका कथन | ..... १७५ ९—११ | प्राण और रयिके सम्बन्धसे परमेश्वरकी उपासनाके प्रकार और उसके फलके निरूपणमें संवत्सरादिमें प्रजापति-दृष्टिका वर्णन तथा सूर्यमें उसके आत्मस्वरूप परमेश्वरको उपास्यदेव बतलाना ... | १७९ १२ | मासादिमें प्रजापति-दृष्टि करके उपासना करनेका प्रकार | ..... १८२ १३ | दिन-रातमें प्रजापति परमेश्वरकी दृष्टि करके उपासना करनेका प्रकार तथा दिनोंमें मैथुनका निषेध | ..... १८३ १४ | अन्नको प्रजापतिस्वरूप बताकर उसे प्रजाका कारण बताना | ..... १८४
( ११ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १५-१६ | प्रजापति-व्रतका फल—प्रजाकी उत्पत्ति तथा ब्रह्मचर्य, तप और सत्य-पालनका एवं सब प्रकारके दोषोंसे रहित होनेका फल—ब्रह्मलोककी प्राप्ति | ..... १८४ |
( द्वितीय प्रश्न )
| १ | प्रजाके आधारके विषयमें भाग्यवके तीन प्रश्न | ..... १८६ |
|---|---|---|
| २-४ | पिप्पलादद्वारा उत्तरमें शरीरके धारक और प्रकाशक देवीका तथा उनमें प्राणदेवकी श्रेष्ठताका निरूपण | ..... १८६ |
| ५-६ | प्राणरूपसे परमेश्वरकी उपासना करनेके लिये सर्वात्मरूपसे उसके महत्त्वका वर्णन | ..... १८९ |
| ७-१३ | प्राणकी स्तुति | ..... १९० |
( तृतीय प्रश्न )
| १ | प्राणकी उत्पत्ति आदिके विषयमें आश्वलायनके छः प्रश्न | ..... १९४ |
|---|---|---|
| २-३ | पिप्पलादमुनिद्वारा दो प्रश्नोंके उत्तरमें—परमात्मासे प्राणकी उत्पत्तिका और संकल्पसे प्राणके शरीरमें प्रवेश करनेका कथन | ..... १९५ |
| ४-६ | तीसरे प्रश्नके उत्तरमें मुख्य प्राण, अपान, समानके वासस्थान और कार्यका तथा व्यानकी गतिका वर्णन | ..... १९६ |
| ७ | चौथे प्रश्नके उत्तरमें उदानके स्थान और कार्यका एवं मृत्युके बाद परलोकमें ले जानेका कथन | ..... १९८ |
| ८-९ | पाँचवें और छठे प्रश्नके उत्तरमें जीवात्माके प्राण और इन्द्रियोंसहित दूसरे शरीरमें जानेका उल्लेख | ..... १९९ |
| १० | चौथे प्रश्नके उत्तरका पुनः स्पष्टीकरण | ..... २०१ |
| ११-१२ | प्राणविषयक ज्ञानका लौकिक और पारलौकिक फल | ..... २०१ |
( चतुर्थ प्रश्न )
| १ | गार्ग्यमुनिद्वारा जीवात्मा और परमात्माके विषयमें पाँच प्रश्न | ..... २०३ |
|---|---|---|
| २ | पिप्पलादमुनिद्वारा पहले प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिके समय इन्द्रियोंके शयन (विलीन होने)-का स्थान मनको बतलाना | ..... २०३ |
| ३-४ | दूसरे प्रश्नके उत्तरमें सुषुप्तिकालमें पाँच प्राणरूप अग्रियोंके जागते रहनेका कथन तथा मनकी स्थितिका वर्णन | ..... २०५ |
| ५ | तीसरे प्रश्नके उत्तरमें स्वप्नावस्थामें जीवात्माके ही द्वारा घटनाओंके अनुभव करनेका उल्लेख | ..... २०७ |
( १२ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | चौथे प्रश्नके उत्तरमें जीवात्माद्वारा निद्राजनित सुखके अनुभव करनेका उल्लेख ..... | २०८ |
| ७—११ | पाँचवें प्रश्नके उत्तरमें इन्द्रियादि सम्पूर्ण देवोंके तथा जीवात्माके भी परम आश्रय परमेश्वरका निरूपण और उनकी प्राप्तिसे परम शान्तिका कथन ..... | २०९ |
( पञ्चम प्रश्न )
| १ | अँकारोपासनाके विषयमें सत्यकामका प्रश्न ..... | २१३ |
|---|---|---|
| २ | पिप्पलादका उत्तरमें अँकारको ही पर और अपर ब्रह्मस्वरूप बताना तथा अँकारोपासनासे साधकके इच्छानुसार दोनोंमेंसे एककी प्राप्तिरूप फल बतलाना ..... | २१४ |
| ३ | एकमात्रासंयुक्त अँकारोपासनासे पृथ्वीलोकमें महिमा पानेका उल्लेख ..... | २१५ |
| ४ | द्विमात्रासंयुक्त अँकारोपासनासे चन्द्रलोकमें ऐश्वर्यप्राप्तिका उल्लेख .... | २१६ |
| ५-६ | त्रिमात्रासंयुक्त अँकारोपासनासे परम पुरुषके साक्षात्कार होनेका तथा तीनों मात्राओंसहित अँकारकी उपासनाका रहस्य ..... | २१६ |
| ७ | अँकारोपासनाका उपसंहार ..... | २१९ |
( षष्ठ प्रश्न )
| १ | सोलह कलावाले पुरुषके विषयमें सुकेशाका प्रश्न ..... | २२० |
|---|---|---|
| २ | पिप्पलादद्वारा उत्तरमें सोलह कलाके समुदायरूप जगत्के उत्पादक परमेश्वरका निरूपण ..... | २२१ |
| ३—५ | पुरुषोत्तमका तत्त्व समझानेके लिये सृष्टि-क्रम और प्रलयका वर्णन ..... | २२२ |
| ६ | सर्वाधार परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मृत्युके अभावका उल्लेख ..... | २२५ |
| ७ | उपदेशका उपसंहार ..... | २२५ |
| ८ | शिष्योद्धार कृतज्ञताप्रकाश और ऋषि-वन्दना शान्तिपाठ ..... | २२६ |
| शान्तिपाठ ..... | २२७ |
( ५ ) मुण्डकोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ ..... | २२८ |
|---|
( १३ )
मन्त्र
विषय
पृष्ठ
प्रथम मुण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | ब्रह्मविद्याके उपदेशकी परम्परा | ..... २२९ |
|---|---|---|
| ३ | शौनकका महर्षि अङ्गिराके पास जाना और 'किसके जान लेनेपर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है'—यह पृष्ठना | ..... २३१ |
| ४ | उत्तरमें अङ्गिराद्वारा परा और अपरा इन दो विद्याओंको जानने-योग्य बताया | ..... २३१ |
| ५ | संक्षेपमें परा और अपरा विद्याका स्वरूप | ..... २३२ |
| ६ | परा विद्याद्वारा जाननेयोग्य अविनाशी ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन | ..... २३३ |
| ७ | परमेश्वरसे सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिमें तीन दृष्टान्त | ..... २३४ |
| ८ | संक्षेपमें जगत्की उत्पत्तिका क्रम | ..... २३५ |
| ९ | सर्वज्ञ परमेश्वरके संकल्पमात्रसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन | ..... २३६ |
( द्वितीय खण्ड )
| १ | अपरा विद्याका स्वरूप और फल | ..... २३७ |
|---|---|---|
| २-३ | अग्निहोत्रका वर्णन तथा उसके साथ करनेयोग्य कर्म और विधिका उल्लेख | ..... २३८ |
| ४-६ | अग्निकी लपटोंके प्रकारभेद तथा प्रदीप्त अग्निमें नित्य हवनका विधान एवं उसका स्वर्गप्राप्तिरूप फल | ..... २४० |
| ७-१० | उपर्युक्त स्वर्गके साधनभूत यज्ञादि सकाम कर्मोंको सर्वोपरि माननेवाले पण्डिताभिमानी लोगोंकी निन्दा और उन कर्मोंका फल बारंबार जन्म-मृत्यु होनेका कथन | ..... २४२ |
| ११ | सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्योंके आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन | ..... २४५ |
| १२ | परमेश्वरको जाननेके लिये श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुके पास जानेका आदेश... | २४६ |
| १३ | गुरुको अधिकारी शिष्यके प्रति तत्त्वविवेचनपूर्वक उपदेश देनेकी प्रेरणा | ..... २४७ |
द्वितीय मुण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १ | अग्निसे चिन्तागारियोंकी भाँति ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति और उसीमें उसके लय होनेका वर्णन | ..... २४८ |
|---|
( १४ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २-३ | निराकार परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन तथा उससे साकार जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार ..... २४९ | २४९ |
| ४-५ | भगवान्के विराट्रूपका तथा प्रकारान्तरसे जगत्के उत्पत्ति-क्रमका वर्णन ..... २५० | २५० |
| ६-९ | परमेश्वरसे ही फलसहित यज्ञादि साधना, देवादि प्राणी और सदाचार आदि आध्यात्मिक वस्तुओंकी एवं पर्वत, नदी आदि बाह्य जगत्की उत्पत्तिका निरूपण ..... २५२ | २५२ |
| १० | परमेश्वरसे उत्पन्न समस्त भावोंको उन्हींका स्वरूप बताकर हृदयरूप गुहामें छिपे हुए उन अन्तर्गामी परमेश्वरको जाननेके फलका वर्णन ..... २५६ | २५६ |
( द्वितीय खण्ड )
| १ | ‘गुहाचर’ नामसे प्रसिद्ध परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन और उसे जाननेका आदेश ..... २५६ | २५६ |
|---|---|---|
| २-४ | परब्रह्मके स्वरूपका निर्देश तथा धनुष और बाणके रूपकद्वारा परब्रह्मरूपी लक्ष्यको वेधनेका प्रकार ..... २५७ | २५७ |
| ५-८ | सबके आत्मरूप सर्वज्ञ परमेश्वरको जाननेके लिये अन्य सब बातोंको छोड़कर ध्यान करनेका आदेश तथा परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन एवं उसको जाननेके फलका निरूपण ..... २५९ | २५९ |
| ९-११ | परब्रह्मके स्थान और स्वरूपका वर्णन, उन्हें जाननेका महत्त्व तथा उन स्वप्रकाश परमेश्वरकी सर्वप्रकाशकता और सर्वव्यापकताका कथन ..... २६२ | २६२ |
तृतीय मण्डक
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | एक वृक्षपर रहनेवाले दो पक्षीके रूपकद्वारा जीव और ईश्वरकी भिन्नताका निरूपण तथा ईश्वरकी महिमा जाननेसे जीवके मोहजनित शोककी निवृत्तिका कथन ..... २६५ | २६५ |
|---|---|---|
| ३-४ | परमेश्वरकी महिमाके दर्शनसे सर्वोत्तम समताकी प्राप्ति तथा उस ज्ञानी भक्तकी निरभिमानता और सर्वश्रेष्ठ स्थितिका वर्णन ..... २६६ | २६६ |
| ५-६ | सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्यके साधनसे परमात्माकी प्राप्तिका कथन तथा सत्यकी महिमा ..... २६८ | २६८ |
( १५ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ७-८ | परमात्माके अचिन्त्य दिव्य स्वरूपका वर्णन तथा चित्तशुद्धि और ध्यानको उनके दर्शनका उपाय बताया | ..... २७० |
| ९ | आत्माके स्वरूपका वर्णन और अन्तःकरणकी शुद्धिसे उसमें विशेष शक्तिके प्रकट होनेका कथन | ..... २७२ |
| १० | शुद्ध अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानीकी इष्ट भोगों और लोकोंकी प्राप्तिका कथन तथा उस विवेकीका सत्कार करनेके लिये प्रेरणा | ..... २७२ |
( द्वितीय खण्ड )
| १-२ | निष्कामभावकी प्रशंसा और सकामभावकी निन्दा एवं दोनोंका पृथक्-पृथक् फल | ..... २७३ |
|---|---|---|
| ३-४ | तर्क, प्रमाद, निर्बलता और गुणहीनता आदिसे भगवत्प्राप्तिकी असम्भवता एवं भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषावाले निष्काम प्रेमी साधकको भगवत्कृपासे उनके दर्शन होनेका कथन | ..... २७५ |
| ५ | उपर्युक्त प्रकारसे परमात्माको प्राप्त महात्माओंका महत्त्व | ..... २७७ |
| ६ | शरीर त्यागकर ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषोंकी मुक्तिका कथन | ..... २७७ |
| ७-८ | जीवनमुक्त महात्माकी अन्तकालीन स्थिति तथा नदी और समुद्रके दृष्टान्तसे उसकी ब्रह्मलीनताका निरूपण | ..... २७८ |
| ९ | 'ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है और उसके कुलमें कोई ब्रह्मको न जानेनेवाला नहीं होता' यह कहकर उसकी मोक्षप्राप्तिका कथन | ..... २७९ |
| १०-११ | ब्रह्मविद्याके दानकी विधि और उसके अधिकारीका निर्देश तथा उपदेशका उपसंहार एवं ऋषि-वन्दना | ..... २८० |
| शान्तिपाठ | ..... २८१ |
( ६ ) माण्डूक्योपनिषद्
| शान्तिपाठ | ..... २८२ ---|---|--- १ | भूत, भविष्य, वर्तमान एवं तीनों कालोंसे अतीत, सब भावोंको अकारस्वरूप बताया | ..... २८३ २ | अकार और परब्रह्म परमात्माकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये उसके चार चरणोंका निरूपण | ..... २८४ ३ | परब्रह्मके पहले चरण स्थूल जगत्-रूप 'वैश्वानर' का वर्णन | ..... २८५
( १६ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४ | परब्रह्मके दूसरे चरण प्रकाशमय हिरण्यगर्भरूप 'तैजस'का वर्णन ..... | २८६ |
| ५ | परब्रह्मके तीसरे चरण विज्ञान आनन्दमय 'प्राज्ञ' का वर्णन ..... | २८८ |
| ६ | उक्त तीन पादोंद्वारा जिसके स्वरूपका लक्ष्य कराया गया है, उसे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और सबका कारण बतलाना ..... | २९० |
| ७ | परब्रह्मके चतुर्थ चरण निर्गुण-निराकार निर्विशेष स्वरूपका वर्णन ..... | २९० |
| ८ | नामी—परब्रह्म परमात्माकी उनके नाम—प्रणवकी तीन मात्राओंके साथ तीनों पदोंकी एकताका निरूपण ..... | २९२ |
| ९ | वैश्वानर नामक पहले चरणके साथ पहली मात्रा 'अ'कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण भोगोंकी प्राप्तिरूप फल ..... | २९२ |
| १० | तैजस नामक दूसरे चरणके साथ दूसरी मात्रा 'उ'कारकी एकता और उसके ज्ञानसे ज्ञानपरम्पराके उत्कर्ष और स्वभावकी प्राप्तिरूप फल ..... | २९३ |
| ११ | प्राज्ञ नामक तीसरे चरणके साथ तीसरी मात्रा 'म'कारकी एकता और उसके ज्ञानसे सम्पूर्ण जगत्का ज्ञान तथा सर्वत्र परब्रह्मदृष्टिरूप फल ..... | २९५ |
| १२ | मात्रारहित अकारकी परमेश्वरके चौथे चरण—निर्विशेष रूपके साथ एकता और उसके ज्ञानमें परब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल ..... | २९६ |
| शान्तिपाठ ..... | २९७ |
( ७ ) ऐतरेयोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ ..... | २९८ |
|---|
प्रथम अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १ परमात्माके सृष्टिचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन ..... | ३०० |
|---|---|
| २—४ परमात्माके द्वारा समस्त लोकोंकी और ब्रह्मा तथा अन्य लोकपालोंकी एवं वागादि इन्द्रियों और उनके अधिष्ठातृ-देवताओंकी उत्पत्तिका निरूपण ..... | ३०० |
( द्वितीय खण्ड )
| १ इन्द्रियों और उनके अधिष्ठाता देवताओंद्वारा वासस्थान और अन्नकी याचना ..... | ३०४ |
|---|---|
| २ परमात्माद्वारा गौ तथा अश्व-शरीरकी रचना और देवताओंका उनको पसंद न करना ..... | ३०५ |
( १७ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३-४ | परमात्माद्वारा मनुष्य-शरीरकी रचना, उसे देखकर देवताओंका प्रसन्न होना और उसके भीतर अपने-अपने स्थानोंमें प्रवेश करना ..... | ३०५ |
| ५ | देवताओंके अन्तमें शुधा और पिपासाको भी भाग-प्रदान ..... | ३०७ |
( तृतीय खण्ड )
| १-२ | परमात्माद्वारा अन्तरचनाका विचार और अन्तकी सृष्टि ..... | ३०९ |
|---|---|---|
| ३-९ | अन्तका भाग जाना तथा पुरुषका उसे वाणी, प्राण, नेत्र, कान, त्वचा, मन और उपस्थके द्वारा पकड़नेका उद्योग एवं पकड़नेमें असफल होना ..... | ३०९ |
| १० | अन्तमें अपानके द्वारा अन्तको पकड़ लेनेके कारण अपानकी महत्ताका उल्लेख ..... | ३१३ |
| ११ | परमात्माका मनुष्य-शरीरमें प्रवेश करनेका विचार ..... | ३१४ |
| १२ | परमात्माका 'विदूति' नामक मूर्द्धद्वारसे शरीरमें प्रवेश करना तथा उनके तीन स्थानों और तीन स्वप्नोंका निरूपण ..... | ३१५ |
| १३ | मनुष्यका सृष्टि-रचना देखकर आश्चर्ययुक्त होना और उसके बाद परमेश्वरके साक्षात्कारसे इसी शरीरमें उसके कृतकृत्य हो जानेका कथन ..... | ३१६ |
| १४ | परमेश्वरके 'इन्द्र' नामकी व्युत्पत्ति ..... | ३१७ |
द्वितीय अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | पुरुषद्वारा माताके शरीरमें गर्भप्रवेशरूप उसका प्रथम जन्म तथा माताके द्वारा गर्भके पालन-पोषणका वर्णन ..... | ३१८ |
|---|---|---|
| ३ | माताके गर्भसे बाहर बालकरूपमें प्रकट होनारूप उसका दूसरा जन्म तथा पिता-पुत्रके सम्बन्ध और कर्तव्यका संकेत ..... | ३१९ |
| ४ | पिताद्वारा पुत्रपर वैदिक और लौकिक शुभ कर्मोंका भार देकर उद्वाण होनेका और मरनेके बाद अन्य योनिमें उत्पन्न होनारूप उसके तृतीय जन्मका कथन तथा इस प्रकरणका भावार्थ—जन्म-मृत्युसे छूटनेके लिये प्रेरणा ..... | ३२१ |
| ५-६ | वामदेव ऋषिको गर्भमें ही ज्ञान होनेका उल्लेख तथा देहत्यागके पश्चात् उनको परमधाम प्राप्त होनेका निरूपण ..... | ३२२ |
( १८ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|
तृतीय अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १ | पूर्वोक्त परमात्मा और जीवात्मा इन दोनोंमेंसे उपास्यदेव कौन है? और किसके सहयोगसे मनुष्य रूप आदि विषयोंका अनुभव करता है? इसके निर्णयार्थ ऋषियोंका विचार | ..... ३२५ |
|---|---|---|
| २ | 'मनकी देखना, सुनना, मनन करना आदि शक्तियाँ ज्ञानरूप परमात्माके ही नाम हैं'—इस तथ्यके अनुशीलनसे परमात्माकी सत्ताके ज्ञान होनेका कथन | ..... ३२६ |
| ३ | समस्त जगत्के रचयिता, संचालक, रक्षक और आधारभूत प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं—इस प्रकार ऋषियोंका निश्चय करना | ..... ३२७ |
| ४ | उस प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरके ज्ञानसे शरीर-त्यागके अनन्तर परम धाममें जाकर अमर हो जानेका निरूपण | ..... ३२८ |
| शान्तिपाठ | ..... ३२९ |
( ८ ) तैत्तिरीयोपनिषद्
| उपनिषद्के सम्बन्धमें प्राक्कथन तथा शान्तिपाठ | ..... ३३० |
|---|
( शीक्षा-वल्ली )
अनुवाक
| १ | आचार्यद्वारा विभिन्न शक्तियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके नामसे परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करके उनकी वायुनामसे स्तुति और वन्दना | ३३० |
|---|---|---|
| २ | वेदमन्त्रोंके उच्चारणके नियमोंको कहनेकी प्रतिज्ञा करके उनका संक्षेपमें वर्णन | ..... ३३३ |
| ३ | लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और शरीरविषयक पाँच प्रकारकी संहितोपासनाके प्रकरणमें अभीष्ट लोकप्राप्तिके उपायका, ज्योतियोंके संयोगसे भौतिक पदार्थोंकी उत्पत्तिके रहस्यका, विद्याप्राप्तिके रहस्यका, संतानप्राप्तिके उपायका एवं वाणीद्वारा प्रार्थनासे शरीरकी उत्पत्ति और नामजपसे भगवत्प्राप्तिके उपायका तथा इन पाँचोंके ज्ञानसे पृथक्-पृथक् फल पानेका कथन | ..... ३३५ |
( १९ )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४ | साधनमें सहायक बौद्धिक और शारीरिक बलके लिये परमेश्वरसे अकारद्वारा प्रार्थना करनेका प्रकार तथा ऐश्वर्य-प्राप्ति आदिके लिये किये जानेवाले हवनके मन्त्रोंका उल्लेख ..... | ३४१ |
| ५ | लोकों, ज्योतियों, वेदों और प्राणोंके विषयमें भूः भुवः स्वः महः—इन चार महाव्याहृतियोंके प्रयोगद्वारा उपासना करनेकी विधि और उनका पृथक्-पृथक् फल ..... | ३४६ |
| ६ | परमेश्वरके हृदयाकाशमें रहनेका वर्णन तथा उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले महापुरुषका क्रमशः भूः भुवः स्वः महः रूप लोकोंमें जाने और वहाँ स्वराट् बनकर प्रकृतिपर अधिकार प्राप्त कर लेनेका निरूपण एवं उन परब्रह्मका स्वरूप बतलाकर उनकी उपासनाके लिये आदेश ... | ३५१ |
| ७ | लौकिक और पारलौकिक उन्नतिके लिये पाङ्करूपसे वर्णित भौतिक और आध्यात्मिक पदार्थोंके सम्बन्ध और उपयोगका निरूपण ..... | ३५४ |
| ८ | अकारकी महिमाका वर्णन ..... | ३५७ |
| ९ | अध्ययनाध्यापन करनेवालोंके लिये ब्रह्म आदि शास्त्रोंक सदाचार-के पालनकी अवश्यकर्तव्यताका विधान ..... | ३५९ |
| १० | त्रिशङ्कु त्रषिषके स्वानुभवके उद्गार बतलाकर भावनाशक्तिकी महिमाका दिग्दर्शन कराना ..... | ३६१ |
| ११ | आचार्यद्वारा स्नातकको गृहस्थधर्मपालनकी महत्वपूर्ण शिक्षा ..... | ३६२ |
| १२ | उपदेशकी समाप्तिमें पुनः विभिन्न शक्तियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके नामसे परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करके उनकी वायुनामसे स्तुति और वन्दना ..... | ३६८ |
ब्रह्मानन्दवल्ली
| शान्तिपाठ ..... | ३७१ ---|---|--- १ | हृदयगुहामें छिपे हुए परमेश्वरको जाननेका फल, मनुष्यशरीरकी उत्पत्तिका प्रकार और पक्षीके रूपमें उसके अङ्गोंकी कल्पना ..... | ३७१ २ | अन्नकी महिमा तथा प्राणमय शरीर और उसके अन्तरात्माका वर्णन ... | ३७४ ३ | प्राणकी महिमा तथा मनोमय शरीर और उसके अन्तरात्माका वर्णन ... | ३७७ ४ | मनोमय शरीरकी महिमा तथा विज्ञानमय जीवात्माके स्वरूपका वर्णन ... | ३८१
( २० )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५ | विज्ञानात्माकी महिमा और उससे भिन्न उसके अन्तरात्मा | |
| आनन्दमय परमपुरुषका वर्णन | ..... ३८३ | |
| ६ | परब्रह्मकी सत्ता मानने और न माननेका परिणाम, ब्रह्मकी सत्ताके | |
| विषयमें अनुप्रश्न और उसके उत्तरमें ब्रह्मके स्वरूप और शक्तिका | ||
| वर्णन करते हुए सृष्टिकी उत्पत्तिका क्रम-निरूपण | ..... ३८६ | |
| ७ | स्वयं जगत्- रूपमें बननेवाले परमात्माकी मुक्तता तथा सबके जीवन | |
| और चेष्टाके आधारभूत उन परमात्माकी रसमयता एवं परमात्मप्राप्त | ||
| पुरुषको निर्भयपद-प्राप्ति और उन परमात्मासे विमुख पुरुषको जन्म- | ||
| मरणरूप भयकी प्राप्ति का उल्लेख | ..... ३९० | |
| ८ | परमात्माकी शासनशक्तिकी महिमामें एवं आनन्दकी मीमांसामें | |
| मानवजीवनकी अपेक्षा क्रमशः देवादिलोकोंके आनन्दकी उत्तरोत्तर | ||
| अधिकता तथा निष्काम विरक्तके लिये उस आनन्दकी स्वभाव- | ||
| सिद्धता और परमात्माके आनन्दकी निरतिशयता एवं उन आनन्द- | ||
| केन्द्र सर्वान्तर्मीया परमेश्वरके ज्ञानसे उनकी प्राप्ति का निरूपण | ..... ३९४ | |
| ९ | आनन्दमय परमात्माके ज्ञाताको निर्भयताकी प्राप्ति तथा पुण्य और | |
| पाप दोनों कर्मोंके प्रति रागद्वेषरहित उस महापुरुषकी शोकरहित | ||
| स्थितिका परिचय | ..... ४०३ |
भृगुवल्ली
१ | भृगुका अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मोपदेशके लिये प्रार्थना तथा वरुणद्वारा अन्न, प्राण, मन आदिको ब्रह्मप्राप्तिका द्वार बतलाकर 'सब कुछ ब्रह्म ही है' इस तत्त्वका उपदेश एवं भृगुका तप करना ... | ..... ४०५ ---|---|--- २ | 'अन्न ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४०६ ३ | 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४०८ ४ | 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४१० ५ | 'विज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चयकर भृगुका पुनः पिताके पास जाना और उनके उपदेशसे पुनः तप करना | ..... ४११
( २१ )
| अनुवाक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | भृगुका 'आनन्दमय परमात्मा ही ब्रह्म है' ऐसा निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल | ......... ४१३ |
| ७ | अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रतका निरूपण तथा प्राणको अन्न और शरीरको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ......... ४१५ |
| ८ | अन्नका दुरुपयोग न करनारूप व्रतका निरूपण तथा जलको अन्न और ज्योतिको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ... ४१७ |
| ९ | अन्नकी वृद्धि करनारूप ब्रह्मका निरूपण तथा पृथ्वीको अन्न और आकाशको अन्नका भोक्ता कहकर उसके विज्ञानका फल बताना | ......... ४१९ |
| १० | अतिथि-सेवाका महत्त्व और उसका श्रेष्ठ फल, वाणी आदि मानुषी और वर्षा आदि दैवी विभूतियोंके रूपमें परमात्माके सर्वत्र चिन्तनका प्रकार तथा विविध कामनाओंके भावसे की जानेवाली उपासनाका फलसहित निरूपण एवं परमात्माको सर्वत्र परिपूर्ण समझकर प्राप्त करनेका फल और भगवत्प्राप्त पुरुषकी स्थिति तथा उस महापुरुषके आनन्दमग्न मनसे निकले हुए समता और सर्वरूपताविषयक उद्गारों (सामगान)-का वर्णन | ......... ४२१ |
| शान्तिपाठ | ......... ४३० |
( ९ ) श्वेताश्वतरोपनिषद्
| शान्तिपाठ | ......... ४३१ |
|---|
( प्रथम अध्याय )
| मन्त्र | ||
|---|---|---|
| १ | जगत्के कारणकी, जीवनहेतुकी, स्थितिके कारणकी और सबके आधारकी खोज करनेवाले कुछ जिज्ञासुओंका परस्पर विचार-विमर्श | ... ४३१ |
| २ | काल, स्वभाव, प्रारब्ध आदिकी जगत्कारणताका खण्डन | ......... ४३२ |
| ३ | ऋषियोंद्वारा ध्यानयोगसे जगत्के वास्तविक कारण परमेश्वरकी अचिन्त्य आत्मशक्तिके साक्षात्कारका कथन | ......... ४३४ |
| ४-५ | विश्वका चक्र और नदीके रूपमें वर्णन | ......... ४३५ |
| ६-७ | परमात्माद्वारा जीवात्माके कर्मानुसार संसार-चक्रमें घुमाये जानेका तथा अपनेको और सर्वप्रेरक परमात्माको पृथक्-पृथक् समझने और उनकी कृपाका अनुभव करनेसे अमृतत्व पाकर ब्रह्ममें लीन होनेका निरूपण | ......... ४३८ |
( २२ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ८ | परमात्माका स्वरूप न जाननेसे जीवात्माके बन्धन होने और जाननेसे मोक्ष होनेका वर्णन | ......... ४४० |
| ९-११ | जीवात्मा, प्रकृति और इन दोनोंके शासक परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन तथा तीनोंके तत्त्वको जानकर परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे कैवल्यपदकी प्राप्तिका उल्लेख | ......... ४४१ |
| १२ | जाननेयोग्य प्रेरक परमात्मा, भोक्ता जीव और भोग्य जडवर्गको जान लेनेसे सब कुछ जान लेनेका कथन | ......... ४४४ |
| १३-१४ | ॐकारकी उपासनाद्वारा जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपकी उपलब्धिका निरूपण एवं अरणि-मन्थनके दृष्टान्तद्वारा वाणीसे नाम-जप और मनसे स्वरूप-चिन्तन करके परब्रह्मका साक्षात्कार करनेका आदेश | ......... ४४४ |
| १५-१६ | तिलोंमें तेल, दहीमें घी आदिकी भाँति हृदय-गुहामें छिपे हुए और सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माको सत्य और तपके द्वारा प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा | ......... ४४६ |
( द्वितीय अध्याय )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-५ | प्रथमाध्यायमें वर्णित ध्यानकी सिद्धिके लिये परमेश्वरसे स्तुति-प्रार्थना करनेका निरूपण | ......... ४४७ |
| ६-७ | ध्यान-साधनसे मनके विशुद्ध होनेका कथन एवं साधकको परमात्माकी शरण लेनेकी प्रेरणा | ......... ४५० |
| ८ | ध्यानयोगकी विधि और बैठनेके प्रकार-वर्णन | ......... ४५१ |
| ९ | प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता | ......... ४५२ |
| १० | ध्यानके लिये उपयुक्त स्थान और भूमिका वर्णन | ......... ४५३ |
| ११ | योगसाधनकी उन्नतिके द्योतक लक्षणोंका दिग्दर्शन | ......... ४५४ |
| १२-१३ | योगसाधनसे भूतसम्बन्धी पाँच सिद्धियोंके तथा लघुता, नीरोगता प्रभृति अन्य सिद्धियोंके भी प्राकट्यका निरूपण | ......... ४५५ |
| १४-१५ | योगसाधन करके आत्मतत्त्वसे ब्रह्मतत्त्वको जाननेका फल, कृत-कृत्यता और समस्त बन्धनोंसे मुक्तिकी प्राप्ति | ......... ४५६ |
| १६-१७ | सर्वस्वरूप और सर्वत्र परिपूर्ण परमदेव परमात्माकी जीवोंके भीतर अन्तर्यामीरूपसे स्थिति बताकर उन्हें नमस्कार करना | ......... ४५८ |
( २३ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| तृतीय अध्याय | ||
| १-२ | समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति, संचालन और विलयन करनेवाले परमेश्वरके ज्ञानसे अमृतत्व-प्राप्तिका कथन | ४५९ |
| ३ | परमेश्वरके नेत्र, मुख, हाथ और पैरोंकी सर्वत्र विद्यमानता और भक्तके द्वारा उनकी अनुभूतिका प्रकार-निरूपण एवं परमेश्वरद्वारा ही सबको शक्ति दिये जानेका उल्लेख | ४६१ |
| ४—६ | रुद्ररूप सर्वकारण सर्वज्ञ परमेश्वरसे शुभ बुद्धि और कल्याण-दानके लिये प्रार्थना | ४६२ |
| ७-८ | सर्वश्रेष्ठ सर्वव्यापी महान् परमेश्वरके ज्ञानसे जन्म-मरणनाश तथा उस ज्ञानी महापुरुषके अनुभव और परमात्मज्ञानके फलकी दृढ़ताका प्रतिपादन | ४६४ |
| ९-१० | परमेश्वरकी सर्वश्रेष्ठता, महत्ता और सर्वत्र परिपूर्णताका तथा उन परमात्माके ज्ञानद्वारा दुःखोंसे छूटनेका कथन | ४६५ |
| ११—१७ | सर्वव्यापी, सर्वप्रेरक, सर्वरूप, सर्वत्र हाथ, पैर आदि समस्त इन्द्रियोंसे युक्त, सब इन्द्रियोंसे रहित, सबके स्वामी और एकमात्र शरण्य भगवान्के सविशेष और निर्विशेष स्वरूपके तात्त्विक वर्णनमें उन परमात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिणामवाला बताकर उनके ज्ञानसे अमृतस्वरूप हो जानेका निरूपण करना | ४६६ |
| १८ | नौ द्वारवाले पुरमें अन्तर्यामीरूपसे परमेश्वरकी स्थितिका वर्णन | ४७० |
| १९ | ‘वे सर्वज्ञ परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंका कार्य करनेमें समर्थ हैं’ इसका स्पष्टीकरण और उनकी महिमाका वर्णन | ४७१ |
| २० | परमेश्वरको अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् बताना और उनकी कृपासे ही उनकी महिमाके ज्ञान होनेका निरूपण करना | ४७१ |
| २१ | परमात्माको प्राप्त महात्माके स्वानुभव-वर्णन | ४७२ |
| चतुर्थ अध्याय | ||
| १ | शुभ बुद्धिके लिये परमेश्वरसे अभ्यर्थना | ४७३ |
| २—४ | परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुतिका प्रकार तथा अव्यक्त और जीवरूप दोनों प्रकृतियोंपर परमेश्वरके स्वामित्व-का निरूपण | ४७४ |