कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
गुरुभक्तिकी महिमा
कवीरकृष्णगीता ।
९३
दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।
अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥
कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥
जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥
तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥
संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥
जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥
रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥
परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥
दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥
सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥
कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥
तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥
तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥
तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥
सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥
बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥
चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥
दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।
हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥
गरुडकी चेतना - गरुड और कबीर सम्वाद
९४
कवीरकृष्णगीता ।
सकल देवता सुन थर हरेऊँ । धाय कवीरके चरणन परेऊ ॥ चरणोदक लै मुखमहँ लीन्ह। चरण परसि प्रदक्षिण कीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो सुनि व्यासा । गुरुके भक्त कटे यम फाँसा ॥ गुरु विन राम न भावे हांथा । गुरु विन डोलहिँ जीव अनाथा ॥ गुरुकी भक्त साधुकी सेवा । हरषि गोपाल मिले यह भेवा ॥ हमहू गुरुको करता जाना । काउ जीत गुरु नाम बसाना ॥ गुरु सोई जो अंतहु थीठा । जन्म बरण गुरुलागे सीठा ॥
दोहा—योग यज्ञ तप तीर्थ, प्रतिमा भूत मसान ।
कहँ कवीर सदुरु विना, जीव जात यम थान ॥ उठके गरुड टाढ बये आगे । हरिसों विनती करने लागे ॥ आज्ञा देहु मोहि त्रिसुवननाथा । हमहु जीव निज करहु सनाथा ॥ हम कवीर कहँ सदुरु करहीं । सेवा तुम्हार ध्यान उर धरहीं ॥ कृष्ण विहँस कहवे अस लीन्ह। सुनहु विहँग सबन चित दीन्ह ॥ यहिते श्रेष्ठ अमर कछु नाहीं । धन्य सो जो गुरु शरण समाहीं ॥ हमहू गुरुके शरण समाने । सदुरु कर कवीर कहँ जाने ॥ कबीरके आस सबनको भाई । कहहि कृष्ण पुन गरुड बुझाई ॥
दोहा—खगपति गये कवीर पहुँ, शरण देहु सतनाम ॥
यमसे त्रास निवारहु, देहु भक्त सतधामा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो खगराई । बडे भाग गुरु शरण समाई ॥ गुरुकी आज्ञा शिष्य जो माने । शिष्य सोईजो गुरु सुरति समाने ॥
कबीरकृष्णगीता ।
९५
चरण टेक विनवें नभगामी । आज्ञाकरहु सो मागो स्वामी ॥ कहो तो सीस कल्प सुँइ धरऊँ । कहो निजहु तासन परऊँ ॥ हमहू गुरुकी महिमा जाना । गुरुते श्रेष्ठ और नहीं आना ॥ हम त्रिभुवन पातिके सुखपाला । हमरे पीठ जो सदा गोपाला ॥ जब हम देस गोपाल तेहि सेवा । परेउं चरण तर लीन्ह तुव भेवा ॥ दोहा—कहे तक्षक आरि जोर कर, विनय सीस पग राख । काटहु यम कर फाँस प्रभु, गुरुड दीनता भाष ॥
कबीर वचन ।
कहे कबीर सुनो खगराया । मिले ना समर्थ सद्गुरु दाया ॥ आपन जीव सम सब कह लेखे । एके राम सकल घट पेखे ॥ सुर असुरारी चाल निहारे । नीर क्षीर बिलगाइ सुधारे ॥ ज्ञान औ मनकी दशा विचारे । सतपद गहि गुरु सुरत निहारे ॥ जेते आमिष मीन मद मांसू । परधन परनिंदा उपहासू ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन गुरुड सुजाना । अंकुर सुगंध पवित्र फुल पाना ॥ दोहा—गुरु कहैं करता जाने, साधन गुरु कह लेख । कहैं कबीर सुन खगपाति, राम सकल घट देख ॥
गुरुडवचन ।
गुरुड कहे तब सीस नवाई । सत्यकबीर तुम समर्थ साई ॥ तुम्हरे सिखापन हृदय मानो । शरण देहु कहे श्रीमगवानो ॥
कबीरवचन ।
श्रीकृष्ण तुम त्रिभुवन राऊ । गुरुडहि बोधे कहहु सुभाऊ ॥
१६
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-शब्द हमारे शीतल, अमृत मोद सो भाव ।
भक्तपंथ समिता ज्ञान दृढ, अभे सुक्त पद लेव ॥ भले गुरुड जाय आनहु साजा । गह २ वैकुंठ वाजन बाजा ॥ कहे गुरुड भाषहु प्रभु साउज । सत्यपुरुष कह चढे सब सांउज ॥ कहे कबीर नारिअर भरपूरा । सेत गरी मिष्टान खजुरा ॥
दोहा-पान फूल चंदन सुाचि मेवा, गऊ घृत जोत प्रकाश। सो अमर प्रत नाम गुरु, चरण सतिहर दास ॥
सेत सिंहासन क्षत्र चंदेवा । ध्वजा पताका सेत सजेवा ॥ गुर मिष्टान छान जल झारी । थार जोतिधर पंच मुख वारी ॥ आज्ञा मांग गुरुड उठ धाये । तैतिस कोट देव हकराये ॥
सवा लाख नीरअर ले आना । सवा सो मन मिष्टान प्रवाना ॥ कृष्णहि नेवत दीन्ह कर जोरी । तुव प्रताप गुरु मम बंदछोरी ॥ शिव सनकादि ब्रह्मादि विष्णुवादी । देवकृष्ण सुन सुखसे सादी ॥
सब मिल आय कीन्ह धुन ध्याना । भजन अखंड शब्द प्रवाना ॥
दोहा-सकल देव मुनि चक्रित, गुरुड शरण सतनाम ।
सत्यकबीर जो सुमरे, तेहि गाढे आवे काम ॥ दीन्ह पान यम त्रिण तोराई । चरणासुत तिलक दठाई ॥ पाय प्रवाना गुरुड अनंदा । जस चकोर पाये निस चंदा ॥ महायसाद सकल मिल लीन्हा । विनवहिं गुरुड असीस तब दीन्हा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण स्वगति बढ भागी । तुम सदुरुके दास सुभागी ॥ धन्य भाग तेहि प्राणी केश । शरण कबीर गये दुख फेरा ॥
कबीरकृष्णगीता
( ९७ )
सरगुण भक्त जो आवा गौना । तन थर दुख सुख पावे पवना ॥ निर्गुण भक्त शरण सतनामा । नाम कबीर भजन सुखधामा ॥
दोहा—कहैं कबीर सुन खगपाति, नाम कबीर कंडहरा।
निरगुण भक्त सब ऊपर, आवागवन निवार ॥
सकल देव मिल स्तुति लावा । बडे भाग हम दर्शन पावा ॥
व्यासदेव सुखदेव सुनियारद । विनती करें सुरपाति गण शारद ॥
श्रीकृष्णसे पूछे व्यासा । कबीरकी माहिमा करहु प्रकाशा ॥
तुमते भेछ कबीर कस भयऊ । यह चरित्र हम जान न पायऊ ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख जाना। कबीर आद करता निरवाना ॥
निरंजन हमरे पिता दृग काला । जार मार जिव करहि बेहाला ॥
सतकबीर काल शिर भंजन । कबीर नाम ते त्रसित निरंजन ॥
दोहा—तीन लोकते न्यारा, अमरलोक विस्तार ।
जो कबीरको सुमरे, सोइ उतरे भौपार ॥
कहैं कृष्ण मैं कहों परमारथ । निर्गुण भक्त जन्म जुग स्वारथ
जब कलकाल निरंजन कोपिहै । भिटिहै दया धर्म विश रोपिहै ॥
गंगा सती सिद्ध औ साधक । सबके सत घटि है कलबाधक ॥
गिराकार सब जीव गरासे । भक्तहीन तेहि काल तरासे ॥
निर्गुण भक्तिहीन जो प्राणी । पापी पुनी जार सब सानी ॥
सबकर सत् काल बिचलाई । कबीरसे संत अडे रहाई ॥
गाहैं ताहि कबीर ले राखी । आगे तेहि निजु कबीर हरि भाबी ॥
९८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-अजर मुक्त सो पावे जो, सुभरे सत्यकबीर ।
नरकी दैही त्यागके, हिरंमर धरे शरीर ॥
७३ पंडव नारद सुख व्याप्ता । एक दिन सुन कस भयउ तमाप्ता । जीव एक सतलोक चलि जाई । दूत ताहि नहिं पायउ प्राई ॥ गये दूत धर्मरायके पास । धर्मराय आप यम वासा ॥ हम त्रिय बंधु यम सहित सिधायो । हेरत जीव कितहु नहिं पाये ॥ सब थाके हम देश देखा जाई । सुन्यके पार मानसर जाई ॥ महासुगंध देश उजियारा । कामिन शोभा अकह अपारा ॥ कोटिन चंद सूर्य छवि एका । हंस असंख हंसनि तेहि रेखा ॥
दोहा-जहैं सतपुरुष कबीर निज, सो नहिं देखेउं ठौर ।
पुरुषलोकको आभा, मानसरोवर मोर ॥
अपनी कंचन उदित अटारी । हंसनीको लगी गंध हमारी ॥ द्वारपाल एक पठडन वेगी । देश निकार धायो बहु वेगी ॥ मोहिं घर बांहनीकारीस बाहर । मैं सुभरेउं कबीर तेहि ठाहर ॥ तहैं कबीर मोहि लीन्ह बचाई । बार अनेक दया उर लाई ॥ जहांसे गयऊं निरंजन खोदा । कबीरके आद न जाने वेदा ॥ कबीर सबनके आद बखाना । कबीरके आद कोई नहिं जाना ॥ कबीर नाम कायाको वीरा । कदली तन पौनगरसीरा ॥
दोहा-काया कदल दल, गुप्त प्रगट कबीर ।
सबके भीतर बाहर, स्वास निहस्वास शरीर ॥
सचलोककी ऐसी शोभा । कहि न सिराय मोर मनलोभा ॥ एक हंस तरवन जोती । छिन्न एक महैं देखऊं ससीकोती ॥
कृष्ण गरुड सम्वाद
कबीरकृष्णगीता ।
९९
एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥ निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥ जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥ तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥ तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥
दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।
ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥ जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥ सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥ सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥ विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥
कबीरवचन ।
हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥ हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥ जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥
दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।
दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥
गरुडवचन ।
गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥ कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥ कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥
१००
कबीरकृष्णगीता ।
श्रीकृष्णवचन ।
सुन खगेशे कहे त्रिभुवनराई । सबकी गति मैं कहों बुझाई ॥ सतकबीरकी भक्ति जो करि हैं। सो सत सत्यलोकपगु धरि हैं ॥ अमरवीर हिरभर काया । सवी सुवास अभी फल पाया ॥
दोहा—सत्यकबीरके सेवक, बहुर योनि नहीं आव । अमरलोक सुख विलसे, निरभे कैल कराव ॥
निरगुण अजर कबीरा जिवतारा । सरगुण भक्त जो दस औतारा ॥ नकली निरगुण निरंजनराई । जिनके हम योहदार कहाई ॥ सकल मूल निरगुणकबीरा । सरगुण राम कृष्ण मम लीला ॥ हमरी भक्ति जो करे सचेता । सब तज गुरु साधुनसो हेता ॥ ब्रह्म बोलता पूजे सोई । माटी पाथर साधु न जोई ॥ कपिलगऊ भाव धर रहई । भला बुरा ये सबके सहई ॥ जीव मृतक होय मोहिं भावे । सब वैकुंठ साधु तन पावे ॥
दोहा—जवलग मैं वैकुंठ रहों, तवलग मेरे पास ।
प्रभु आज्ञा मैं औतारों, मम अश्रित गर्भवास ॥ रहित मुक्त नहीं हमरे हांथा । रहित मुक्त कबीर गुरु दाता ॥ करे मम भक्त देह मैं तारों । सत्यकबीर देह निस्तारों ॥ सद्वरु समर्थ रूप हमारा । योह समान को आन विचारा ॥ एक भैन औ कबीरसे भाई । कलुक निरंजन अस्थान जब जाई और सब हैं हमरे आसा । शिव अज सनकादिक मम दासा ॥ देह मुक्तको हम हैं दाता । जीवके मुक्त कबीरके हांथा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०१
देह सुक करे सो पावे । पाप पुण्यमहैं आवे जावे ॥ गाढके हीन सो दानहि पावे । तेहि औसर साकट पछतावे ॥
दोहा—देह सुक थह जानहु, देह धरे फल पाव ।
सत्यकबीर जो सुमरे तो, बहुर योनि नहिं आव। रज तम लक्षण भूत पिशाचा । सतगुण साधु संत प्रकाशा ॥ रज तम चाल परे चौरासी । सतगुण देह सुक विश्वासी ॥ कर्म भ्रमकी छूटे आसा । आवागैन निरंजन फांसा ॥ निरंजन सेवक कबीरको अंसा । कबीर जेमुख तेहि विषंसा ॥
दोहा—खरा खोटा सब पाखे, पारसी निरंजन राय ।
पुरुष प्रवाना देखि सिर नावे, विना छाय धरखाय ॥ कहे कृष्ण पंनग अरि सुनहू । कहूं ज्ञान अपने मन गुनहू ॥ सतगुरु भक्त पपील चलानी । निरगुण भक्त विहँग बखानी ॥ पंछी विहँग उड जाय अकाशा । नहिं पपील चढ सके बेआसा ॥ जहां इच्छा तहैं जाय विहँगा । चढ़ि सरगुण मता अुअंगा ॥ कोट माहि सरगुण गति पावे । निरगुण भक्त सबे तर जावे ॥
दोहा—निरगुण महिमा अगम है, सरगुण सके न कोय ।
सरगुण उपजन विनसन, निरगुण विन गति नहिं होय ॥ सतयुत नेता द्वापर काली । चहुँगुण निरगुण अजर अमाली निरगुण सरगुण सबके मूला । सोई सत्यकबीर हरि बोला ॥
दोहा—हमरी तुम्हरी को कहे, कबीर सबनके मूल ।
कहे कृष्ण सुने खगपती, को कबीर सम तूल ॥
शुकदेव कबीर सम्वाद
१०२
कबीरकृष्णगीता ।
बोले गरुड विहसिके वाणी । मम जीवन शुभ सट्टरु जानी ॥ चरणोदक ले निर्मल भयऊ । सट्टरु चरण हियभहँ धरऊं ॥ व्यासदेव सुखदेव सिर नाये । बडे भाग्य हम दर्शन पाये ॥ व्यासदेव सुनि नारद पूछा । हमहुको है भक्तिकी इच्छा ॥ पान प्रवाना हमको दीजे । सुत्कदान हमहूको कीजे ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । जीव दया विन मुक्त न होई ॥ जीवदया धर सट्टरु सेवे । सबसे गीत नाम चित देवे ॥ सबमें सोर मिता अब राधा । स्थिर सत्यनाम निज नामा ॥ विना भक्ति भगवंत न भेटे । सट्टरु विना ना संशय भेटे ॥ सट्टरु कहैं कबीर हम आहीं । सट्टरु अंश विष्णुके माहीं ॥ सट्टरु अंश जीव सत सबमें । राम कृष्ण मम अस कहो अवमें ॥ हमरे अंश निरंजन राधा । तीन लोक अधिकार तिन पाया ॥ तिन पुन आपन अंस उत्पाना । छल छुटम मान अभिमाना ॥ छल औ क्षुद्र विष्णु बहुरंगा । ब्रह्मा कुभत हंग रुद्रंगा ॥ रजगुण ब्रह्मा विष्णु सतोगुण । काल प्रले जन रुद्र तमोगुण ॥ अष्टंगी वटपारकी बुदिया । वटपार निरंजन सब जिव लटिया ॥ एक सै वै विष्णु सत भाषा । विष्णु नाम तब सट्टरु भाषा ॥ रजगुण तमगुण लोहु धातू । पुरुष अंस जीव सट्टरु सातू ॥
दोहा-निरंजन जीव झरकावे, सवा लक्ष नित खाय । कहैं कबीर जो मोही भजे, तेहि यम निकट न जाय ॥
कवीरकृष्णगीता ।
१०३
व्याससुखदेववचन ।
व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥ विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥ अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥ दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥ चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥ साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥ बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥ कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥ हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥ हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥ सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥ जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥ विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥ क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥ जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥ हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥ सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥
कृष्ण कबीर सम्वाद
१०४
कबीरकृष्णगीता ।
निरंजनके वंश यज्ञारा । एक विष्णु तेहि पुरमें सारा ॥ सांच विना बांचे नहिं कोई । भक्त बेपुस तेहि काल बिगोई ॥ तुम कहैं विष्णु चिंता कछुनाहौं । तुम्हरे पास हम सदा रहार्हौं ॥ नरक परे नहिं देहो तोहौं । जो तुम ध्यान शासिहो मोहौं ॥ कि होय सेवक या होय स्वामी । संत गाढ पहुंचे सुरत गामी ॥ जो जेहि नाम न ध्यावे प्राणी । तासु लोक पहुंचे निज गामी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण कबीर बल मोश । करताके करता बंदी छोरा ॥ दोहा-मैं कबीर कहैं चीन्हा, कबीर रूप करतार । करता निरंजन कितम, कहैं कृष्ण निरवार ॥ कबीरवचन ।
यह सुन कबीर कृष्णकंठलावा । सीस हांथ दे निकट बैठावा ॥ कहैं कबीर तुम हमरे अंशा । हम चीन्हे विन काल विधंसा ॥ निराकार कहैं जब उपजाया । स्वास तेज कंभी तन आया ॥ आगम तास होय यह काला । जीवन कहैं यम करे बेहाला ॥ तब पुन पुरुष दीन्ह तेहि आषा । योगजीत तेरो सिर खाषा ॥ योगजीत तब उत्पन्न दीन्ह। ताके आस निरंजन छीना ॥ चौंसठ युग सेवा लव लावा । सेवा वस्य राज तिन पावा ॥ अमरलोक ते गये निकास। जब अछूंगा कीन्हे आसा ॥ योगजीत डर काल डराई । नाम कबीर सुनत छिप जाई ॥ वस्तु जीव सब साज हमरा । निरंजन कहैं सौपाल भारा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०५
पुरुष आज्ञा तज मन मत ठाना । निरंजन तोपे काल दिवाना ॥ जीवन कहैं तिन करे अहारा । जीव विवश हो परे बिचारा ॥ तव मोहिँ दाद जीवनकी आई । दासा तन धर भाके दहाई ॥ जो जिव भाके हमारी करि हैं । ताको काल खूंट नहिँ धरि हैं ॥ चारों युग जिवलोक पठावा । युग प्रवान नाम जिव गावा ॥
दोहा--सतयुग सत सुकृत अंचित, त्रेता नाम मुनीन्द्र ।
द्वारपर करुणामय भये, कलयुग नाम कबीर ॥ कहैं कृष्ण तोहि तबहीं चीन्हा । जब पताल राख मोहि लीन्हा ॥ औ सबके गाढे उपकरहू । प्रेमवश्य तुम ओट न धरहू ॥ अहो साहेब मैं तुम्हरे दासा । अजर मुक्त है तुम्हरे पास ॥ पिताके उर छल शुद्ध कछु करहूँ । पिता निरंजन डर हम डरहूँ ॥ बहुर भरोस तुम्हारो सोई । पुण्य धर्मके बात चलाई ॥ निरंजन जाना हमरी वाता । कबीर कृष्ण दोह एके मतराता ॥ जीव दया गुरु भक्त बखानहु । सतसंगति महिमा कथि आनहु ॥ रामनाम गुरु साधुसे नेहा । कहैं कबीर राम गुरु देहा ॥ ठाकुर कहैं मानुष जनि जानहु । राम कृष्ण करता पाहिचानहु ॥ रामकृष्णके हम लघु जेठा । जैसे फेर जन्मपितु बेटा ॥
दोहा--राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके दास ।
स्वामी सेवक होयके, करहिं भक्त प्रकाश ॥
तुम हो व्यास विष्णु औतारा । चौविस महीं तुम भक्त सियारा ॥ हम हरि वंश विष्णु मम अंसा । भक्त रूप हम विष्णु प्रशंसा ॥
१०६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णु दया जब कीन्ह पुकारा । तब जानो हमरे संचारा ॥ जवहिं निरंजन विष्णु समाई । तब कर विष्णु कपट चतुराई ॥ सबपर श्रेष्ठ जानो सतनामा । कहैं कबीर गुरुपद विश्रामा ॥ गुरुसोई जो यमसो उबारे । जन्म मरण दुख दारुण तारे ॥ कहैं कबीरसो सद्गुरु जानो । राम कृष्णको स्वयं बखानो ॥
कृष्ण वचन ।
कहैं कृष्ण हम निहचे जाना । हम सब पर कबीर प्रवाना ॥ निरंजन आद सो अजर कबीरा । स्वासरूप रमै सकल शरीरा ॥ हममहैं तुममहैं सोहंग जीऊ । स्वास रूप तन जीवके पीऊ ॥ जीव सब अंश कबीरके भाई । देह निरंजन राय बनाई ॥ जो जिव लैहो कबीरके पाना । ताके डर निराकार डेराना ॥ कोटिन केर काल मोहि खावा । निराकार अज शिवहिं नचावा और जीव केहि लेखा माहीं । रहटके घरिया आवहिं जाहीं ॥
दोहा-रहटके घारिया सरगुण, रीते भर उत्तराय ।
भरी उरध भर खाली, निडर कूपके जाय ॥
जब नहिं धरती अकाश पताला । जब नहिं देह जगत कित काला नाहिं निरंजन आद भवानी । वहिं तब त्रिगुण पवन औ पानी तब नहिं दश अवतार मम भयऊ गंगा जती सती नहिं रहऊ ॥ तबकी कहैं कबीर सहिदानी । जबकी काहु मर्म न जानी ॥ कबीर बढाई हम कह दीन्हा । आप मै दास करता मोहि कीन्हा कहैं कृष्ण सुन आद कहानी । जाके आद वेद नहिं जानी ॥ निर्गुण आद पुरुष अविनाशी । कबीर कहाये प्रगट भये कासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१०७
दोहा-निर्गुण मूल सकलके, निर्गुण मता अगाध ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मुनी, कबीर भजे सो साध ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम सब देवन मैं प्रधाना ॥
श्रीमुखसे तुम मोहि वखाना । तुम त्रियलोक धनी हम जाना ॥
सेवक कहैं स्वामी पत देई । स्वामी सेवे सेवक सोई ॥
दोहा-कबीर नाम हरि गावहीं, गुरुके ध्यान अधार ।
गुरु गोविंदके लेखहीं, साधराम रूप अधार ॥
कृष्णवचन ।
कृष्ण कपिल कबीर पगु गहा । सुन स्वामी तुम कैसे कहा ॥
तुम्हरे समान न देखौं काहू । हम सब कर तुम हाथ निवाहू
और सबे सरिता चौमासा । जेठ झुराय सिंधको आसा ॥
सिंधुको जल संसार बिडाई । मेघमाला छपनकोट बरसाई ॥
सरिता सिंधुको सेवक आहीं । स्वामी सरवर कबहुँ नहीं चाहीं
निरगुण वास फूल भये सरगुण । सरगुण देह बोलता निरगुण ॥
कहैं कृष्ण मोहि देहू पाना । तब डर काल मोहि नहीं जाना
जो २ जीव शिष्य सब तोरा । तुव बल जाहि लोक बल जोरा
हमहू कहैं इच्छा यह आई । तुव प्रताप लोक हम जाई ॥
कबीर वचन ।
कहैं कबीर तुम हमरे आहू । राज करहु तुव रक्षक साहू ॥
जो तुम होहु प्रगट मम चेल। निराकारको मिटि है सेला ॥
गुप्त हृदय मैं हमकहैं राखहु । प्रगट निरंजन महिमा भाषहु ॥
१०८
कबीरकृष्णगीता ।
जासो गीत हृदय बस जीवा । अंतकाल प्राप्त सोह पीवा ॥ सबसो गीत खसस सो सेजू । सत पग हिय विषै कित तेजू ॥ मुखसो गीत सबहिं प्रभु जानी । गुप्त प्रगट पिथा व्रत चित ठानी भली छांड नहिं करिय सदाई । भली भला सुरत संतन गाई ॥ कोई मदवारे सो मदफल पावे । विजधर भे मद माद समावे ॥ दोहा-कहैं कबीर श्रीकृष्णसों, जानि छांडहु सत व्योहार ।
सत्ताहिं ते गत पाईये, झूठहिं नरकमें डार ॥ कोटिन काल निरंजन आवै । जो माहि जपै ताहि नहिं पावे ॥ युग २ नाम हमारो गावे । यम विण तोड प्रवाना पावे ॥ हर स्वांस सतनाम समावे । गगन गगन सतनाम सुहावे ॥ अघर सघर दृग दश प्रकाशा । भीतर बाहर राम निवासा ॥ यंत्र मंत्र औषध तप योगा । तीर्थ व्रत देव चंदन भोगा ॥ सबे आस तज भज गुरु साधू । कहैं कबीर सब भेर उपाधू ॥ डरे न यमसो बल कै मोरा । सुमरे नाम कबीर बंदीछोरा ॥ पूजे बोलता सब जिव राधा । मन वच कर्म सतनाम विश्रामा ॥ राधे ध्यान तो जियत तेहि भेटै । विश्वासी जियहिं अंत दुख भेटै ॥ सुन आतुर हरि साज मंगावा । नरिअर पान मिष्टान्न सुहावा ॥ सबे साज आनेउ बहुताई । घृत पकवान सुवास बसाई ॥ सकल देवतन भोजन कीन्हा । तेहि पाछे हरि वीरा लीन्हा ॥ यम विण तोर काल मुख थूँका । दीन्हो पान भेट सब चूका ॥ सतगुण देवता कोट इकादस । सनन पान लीन्हा हरि पारस ॥ रजगुण तमगुण पेल पराने । विष्णु व्यासको निंदा ठाने ॥
कबीरका अपने पन्थकी बात कृष्णसे कहना
कवीरकृष्णगीता ।
१०९
कृष्णवचन ।
यहा आनंद कृष्ण मन भयऊ । मन हम राज निकंटक पायऊ ॥ जेहि रक्षक भये सत्यकबीरा । बार न बंके तासु शरीरा ॥ कृष्णके दुरवासा ऋषि गुरु हैं । सत्य कबीर सबके सटुर हैं ॥ सत् मिले सतकबीरके हाटा । सत् विना जिव वारा बाटा ॥ तीन लोक महीं डंका परिया । सबते श्रेष्ठ कबीर ठहरिया ॥ जीव उबारन ताके सब दासा । विष्णु व्यास सतनाम प्रकाशा ॥ कहैं कृष्ण सेवक जत वाणी । हम तुम सेवक सेवक जानी ॥ जगमहैं कौतुक पंथ चलाई । निज पंथ इस ताहि बलताई ॥ दूत हमार तासु रह दासा । जो कोई होय कबीर गुरु आसा ॥ सबीर नाम प्रति स्वास जप प्राणी । कबीर नाम भज लहे सुखधामी
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन कृष्ण सुजाना । तुम हमरे महीं सकल समाना ॥ जब तुम चाहो दरस मम किया । नाम सरूप प्रेम चित दिया ॥ जाके नाम सरूप चितलावे । गुप्त प्रगट ते दर्शन पावे ॥ अब तुम इच्छा हमरे हांथा । हमरे दास कहैं देहौ साथा ॥ धर्मदास मम अंस औतारा । थापेउं ताहि जम्बूद्वीप कडिहारा ॥ दोहा—धर्मदासके अगुवा, जाग्रित च्छ्रामनदास । हम जग होय जगाइब, करव पंथ प्रकाश ॥ जा गुरु नांद पुत्र धर्मदासा । व्यालिस वंश धर्म दास प्रकाशा ॥ पुन एक सुरत गोपाललेव नाऊ । तुम्हरो प्रीत गोपाल सुन भाऊ ॥ तुम्हरी सुरत रहे मम अंगा । हम तुम व्यापक सकलो संगा ॥
११०
कबीरकृष्णगीता ।
राम कबीर कबीर सोइ रामा । अविनाशी सेज संत विश्रामा॥ सब पर दाय़ा करहु गोविन्द । एक भजुरी भक्त अनंद ॥ निरंजनके सुख टेके रहे । सत्यनामके रहनी गहे ॥ सती पतिव्रता सतपंथ सुरा । आपा भेटि मिल सर्व हजुरा ॥ राजयोग छवि गृह विश्रामा । तनसे उद्यम मनसे नामा ॥ जो जिव जपे कबीर धर्मदासा । औ जो सुरतवंश व्यालिस आसा हमरे पंथके टीका इत जागू । धर्मदासके मिल मोहे लागू ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जंबूद्वीप धर्मदासा । जागूदास वंश सुरत पास ॥ औरो कौनो दीप तुम सेवा । सो कंडहारा नाम कह देवा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर कृष्ण सहिदानी । करनाटक वंकेज बखानी ॥ दरभंगा दक्षिण चत्रभुज राऊ । सीलदेश सहने जी सुभाऊ ॥ हम सब ठौर भक्त तुव गाऊं । तुम हमरी महिमा परचारऊं ॥ अपनी महिमा आपहि लाजा । कोइ कहे हम मिथ्या काजा ॥ आपहि आप बडा किये होय पापा । गुरुकी महिमा कहि मिल आपा
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण अब पायऊं जानी । एको जीव तुव गहिं अवखानी ॥ सांचे भाजिहैं सत्यकबीरा । भज कबीर ठेरे भौ पीरा ॥ दोहा-कहे कृष्ण सुन व्यास सुख, औ गऊरस सबकोय । सत्यकबीर मुक्तके दाता, सब जीवहिं गत देय ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१११
काल निरंजन बड सुख देई । जार झरकाय पापा खोय लेई ॥ धन्य विष्णु जो कछु सुखदाता । तुम सब कृष्ण कबीर विधाता ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सबहिं जिव तारों । कालहिं बांध रसातल डारों ॥ अषपत सो राजा कंहैं भावे । जो परजाहिं सुख देय न सतावे ॥ कहा करें। निज शब्द हितार्की । नातो छिनयहैं भेट देवे पापी ॥ अब याहि भला बुरा नहिं लेखा । कपुत सपूत भात पितु एका ॥ सब सुत पर पितु करे जो छोहा । निकट अबुध भक्ष देय तोहा ॥ ऐसे निरंजन हमरे वंसा । महाकाल जग घालक संसा ॥ ताते विष्णु तुम मम सिख लीन्हो । प्रगट निरंजन मम चित दीन्हो ॥ हम डर यम थरहर अब कांपे । जो मोहि मजे ताहि लख आपे ॥ कबीरके भक्त विहून जो प्राणी । ताहि काल झरकावे आनी ॥ विष्णुकी भाक्ति संपूर्ण करई । एक रोम तब यमके डरई ॥ और देवनको भक्षे काला । एकहि सत्तकबीर रसवाला ॥ सब मिल भक्ति कबीरके मानी । सत्यनाम महिमा विध आनी ॥ कहैं कृष्णसे सत्यकबीरा । मम वचन सुनहु यदुवीरा ॥ अब हम पंथ जगत विस्तारा । धर्मदास कहैं थापव कंडहारा ॥ जीवलोक कंहैं जाय हमारा । ताहि न पकड़े काल लबारा ॥ भजव जीव सकल कल लोका । सब जीवन कर मेव सोका ॥ ठीका पुन्य सती औ गंगा । सबके सत्त करे निरंजन भंगा ॥ यसि है सकल जीव धर काला । तब हम प्रगटे रूप दयाला ॥
११२
कबीरकृष्णगीता ।
गुरु सद्गुरु साधु दुखभंजन । कबीरनाम ठर डरे निरंजन ॥ कालहिं येट सकल जग तारों । आवागवन दुख सुख निवारों ॥
कृष्णव्याससुखदेवगुरुडवचन ।
कृष्ण व्यास सुखदेव खगराया । चरणटेक सब विनती लाया ॥ हम सेवकपर दाय़ा करिये । पल २ छोह हमारो धरिये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हम निकट प्रेमत । नाम भजे भौ तरे क्षमाते ॥ प्रेम बैन कहि गावे वीरा । संग सबनके स्वास शरीरा ॥ बहुर ध्यान विनति प्रकाशा । वरणहु कृष्ण चाल हरिदासा ॥ संसारी जिव कैसे तरि हैं । सत्यनाम विन भौजल परि हैं ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण जिवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥ पूर्ण पुण्य जब जीवहि होय पूरा । तबसों नाम कबीर भज सूरा ॥ कबीर नाम प्रताप बड भागी । मुक्त होय सो संत सोहागी ॥ कबीर शरण तब प्राप्त होई । परम पुनीत कबीर भज सोई ॥ कोट जन्म पुण्य प्रकासा । पूरण पुण्य होय सद्गुरु दासा ॥ सत्यकबीरको सद्गुरु जाना । सद्गुरु अंश मोहिं पहिंचाना ॥ हमहू सत्यनामकी आसा । वांचहि काल निरंजन फांसा ॥ जिम जगकी इसलता नहि सेवा । खातिर चटै न पाइक देवा ॥ तैसे शरण कबीर प्रतापा । होय निश्चित छूटे तिहु तापा ॥ जो लागि बनि जीवको निरतारा । विन कबीरको जीवहि तारा ॥