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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

सत्यनाम ।

प्रस्तावना.

—○—

अंगठ दोहा ।

श्रीगुरु दीनदयाल प्रभु, करुणामय शुभ नाम ।

जेहि सुमिरि नर पावई, अजर अमर सुखदाय ॥ १ ॥

ताकर चरणसरोजगुण, बारबार शिर नाय ।

लिखिहौं शुभ प्रस्ताव यह, सतगुरु होहि सहाय ॥ २ ॥

मानवजन्मका सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य “सर्व दुःखोंकी निवृत्तिपूर्वक पर-मानन्दकी प्राप्ति है।” इसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये “धर्म” की आवश्यकता है। धर्म स्वरूपसे एक होनेपरभी, भिन्न अधिकारियोंके भेदसे अलग अलग रूपमें देख पड़ता है। इसी कारणसे महात्मा आस पुरुषोंने ऐसे उपदेशमय वचनोंको प्रगट किया है कि, जिससे सर्व श्रेणीके अधिकारियोंकी निज २ योग्यता और भावनाके अनुसार लाभ प्राप्त हो सके। इसी कारणसे एक ही वचन भिन्न २ टीकाकारों द्वारा भिन्न भिन्न विचारोंका बोधक जान पड़ता है यद्यपि इस भेदमें न तो मूल वक्ताओंकाही दोष है, न टीकाकारोंकाही; किन्तु विचारके यथार्थ स्वरूपको न जाननेवाले अरुणन् विचारहीन पुरुषोंको उसमें यथार्थकी झलक नहीं देख पड़ता। इसीसे वे उसके यथार्थ लाभसे वंचित रहकर अपना अमूल्य जीवन मिथ्या निन्दा और कुतर्कमें नाश कर देते हैं।

इस बातके जाननेवाले प्रत्येक धर्म और पंथोंके विचारवानोंको इसका पूर्ण निश्चय था। इसीलिये उन्होंने निज निज इष्ट गुरुओंके बताये मार्गकी बुद्धि तथा जीवोंके कल्याणके लिये ऐसी ऐसी पुस्तकें और वाणी वचनकी रचना की थी कि, जिससे बुद्धिमान् तो सम्यक् सिद्धान्तको जान ले और बालबुद्धिवाले अधिकारी, मयम निज इष्ट गुरुमें श्रद्धाको प्राप्त कर, क्रमशः तत्त्वकी ओर अग्रसर हों।

वैदिक धर्मके, महत् ज्ञान और सर्व प्रकारके अधिकारियोंके योग्य उपदेशोंसे भरे, पुराण, बौद्ध, जैन, पारसी इत्यादि सर्व धर्मोंकी कथा,

प्रस्तावना.

गाथा इत्यादियोंका उपरोक्त उद्देश्यकी सिद्धिके लिये आविर्भाव हुआ है।

उसी प्रकारसे कवीरपन्थी महात्माओंने उपरोक्त आशयकी सिद्धिके लियेही अनेक ग्रन्थोंकी रचना की है। उन्हींमेंसे यह कवीर-कृष्णगीता भी एक है।

यद्यपि क्षुद्र विचारवाले, पक्षपातपूर्ण कुतर्कियोंको इस ग्रन्थमें सारका दर्शन मिलना कठिनही-नहीं असम्भवभी-है, तथापि जो सत्यके खोजी हैं, निज आत्माके कल्याणकी जिनको तीव्र इच्छा है, जो सारग्राही और पक्षपातशून्य हैं, उन्हें इस ग्रन्थके प्रत्येक शब्दों, वाक्यों चौपाइयोंमें यथायतस्वका दर्शन हुए बिना कदापि नहीं रहेगा।

इस ग्रन्थकी एकही प्रति मेरे पास रहनेसे मुझे स्वतंत्रतासे इसकी शुद्धि अशुद्धिपर विचार करनेका अवकाश न मिलनेसे, निज नियमा-नुसार इस आवृत्तिमें हस्तलिखित प्रतिको ज्योंका त्यों छपवा दिया है। यदि इसकी और प्रतियाँ मिल जायँगी अथवा जो कोई इस ग्रन्थकी हस्त लिखित प्रति मेरे पास भेज देंगे, दूसरी आवृत्तिमें उन सब ग्रन्थोंद्वारा इसको शुद्ध करके छपवानेका प्रबन्ध किया जायगा-साथही उन ग्रन्थ भेजनेवालोंका नाम प्रस्तावनामें दे दिया जायगा और ग्रन्थ छप जानेपर छपी हुई एक प्रतिभी उन्हें दी जायगी। यह ग्रन्थ जिस प्रतिसे छपा गया है, वह प्रति छत्तीसगढ़के एक पनिका महंत दरबनदासकी दी हुई प्रतिके ऊपरसे लिखी गयी थी।

कितने लोगोंको, जिन्हें यह ज्ञान है कि-शुभस्थान कबीरधर्मनगरमेंभी छापाखाना खुल चुका है और वहाँभी ग्रन्थ छपते हैं, तब निजके प्रेसको छोड़कर बम्बईमें यह ग्रन्थ क्यों छपवाया गया है, ऐसे लोगोंको जानना चाहिये कि-शुभस्थान “कबीरधर्मनगर” दिहातमें होनेके कारण वहाँ एक तो प्रेसके लिये उपयुक्त कम्पोजिटर, कागज, स्याही इत्यादि कुल वस्तुओंपर अत्यन्त खर्च पड़ता है। दूसरे हैण्ड प्रेस होनेके कारण उस प्रेससे कामभी बहुत कम निकलता है, इस हेतु ग्रन्थोंका शीघ्र शीघ्र यहाँके प्रेस (कबीरधर्मप्रकाश) से छपना दुरतर-समझकर, और लोगोंकी, ग्रन्थोंके लिये मांग अधिक बढ़ जानेके कारण सिद्धि श्री १०८ पं० श्री उग्रनामसाहब प्रधान

प्रस्तावना.

आचार्य, कबीरपन्थकी आज्ञासे, पुनः सुखे ग्रन्थोंके छपवानेका प्रबन्ध बम्बईमेंही कराना पडा है।

“अनुरागसागर” जो ४० ग्रन्थोंके द्वारा मुद्र किया है वही बम्बईमें छपगया है, इसका आकारभी इस ग्रन्थसे कुछही बड़ा है और ऐसे मोटे टाइप तथा ऐसी पूर्णताके साथ छपा है कि—आजतककी छपी हुई कोई प्रतिभी इसकी समता नहीं कर सकती। विशेष वृत्तान्त अनुरागसागरकी प्रस्तावनासे जानना चाहिये।

अन्तमें पाठकोंसे एक बात कहकर मैं इस प्रस्तावनाको समाप्त करता हूँ। मेरा नियम है कि—किसीभी ग्रन्थकी हस्तलिखित प्रति जब सुखे प्राप्त होती है और उसकी दूसरी प्रति मेरे पास नहीं होती है तथा ग्रन्थके छपवानेकी अत्यन्त आवश्यकता जान पड़ती है, तो प्राप्त प्रतिके अनुसार ज्योंकी त्यों उस ग्रन्थको छपवा देता हूँ। इसलिये हस्तलिखित प्रतियोंके समान यदि मेरे छपाये हुए प्रथम आवृत्तिके ग्रन्थमें अशुद्धियाँ जान पड़े अथवा किसीकी प्रतिके साथ उसका मिलान न हो तो क्रोध न कर उस अशुद्धिोंकी सूचना और हस्तलिखित प्रति भेज दें, जिससे आगेकी आवृत्तियोंमें गद्द करनेमें सहायता मिले।

इस “कबीरकृष्णगीता” की यद्यपि एकही प्रति मेरे पास थी जिससे यह छपवायी गयी है, तथापि यह प्रति छत्तीसगढ़की अनेक प्रतियोंसे मिली हुई है और छत्तीसगढ़में इसका इतना मान और इसकी इतनी चाहना है कि—लोगोंके बारम्बार अनुरोध करनेसे सुखे इसके शीघ्रही छपवानेकी आवश्यकता हुई है। इसकी छपाई, बंधाईकी सुन्दरता तथा सफाईके विषयमें कुछ कहना हाथ कंकनको आरसी दिखानेके समान है; इसलिये मेरे परिश्रमके ऊपर ध्यान देकर, यदि धर्मज्ञगण इसे शीघ्र अपना लेंगे तो अन्य ग्रन्थभी शीघ्रही शीघ्र छपवाकर उनकी सेवामें उपस्थित करता रहूंगा।

स्थान कबीरधर्मनगर

ता० १९-१-१४.

भवदीय

महंत युगलानन्द विहारी.

अथ कबीरकृष्णगीताकी

विषयानुक्रमणिका ।

विषय.पृष्ठ.विषय.पृष्ठ.
धर्मराजकी सभा.... १सुपथ कुपथका वर्णन.... ३१
सत्यनामकी महिमा.... ३त्रिगुणी जीवका वर्णन.... ”
राजा छत्रजीतकी कथा.... ४पाण्डव और कृष्ण संवाद.... ३२
नारद-कृष्णसंवाद-कबीरके
भक्तकी महिमा वर्णन.... ७कपिल मुनि वचन ( निज
वृत्तान्त ).... ३४
यमदूतका कृष्णसे कबीरके
भक्तके विषयमें वार्ता-
लाप.... ९कबीर शरण विना मुक्ति नहीं३८
कबीरकी महिमा कृष्णमुख
( सत्यलोक, जीव, निरंजन
आदिका वर्णन )१०सब देवताओंका कबीरकी
स्तुति करना और कबी-
रका प्रकट होकर सबको
उपदेश देना.... ४०
काललीला वर्णन.... १२व्यासका कबीरसे सत्यलोक
दिखानेकी प्रार्थना करना४२
कालसे वचनेका मार्ग.... १४कबीरका उपदेश.... ४४
निरंजन और विष्णुका संवाद.... १५कालियुगका वृत्तान्त.... ४५
चौरासीका वर्णन-विष्णु मुखकालियुगमें तरनेका मार्ग.... ४६
शुकदेव मुनिका अपने अनेक
जन्मोंका वृत्तान्त कहना१८समुण-निर्गुण भक्तिका
वर्णन.... ४६
राजा निर्माहकी कथासद्गुरु और गुरुके लक्षण
और चिह्न.... ४८
गुरुकी महिमा.... २१सकलदेववचन.... ४९
सबे गुरुकी पहिचान.... २७कुबेरका गुरु उपदेश लेना
नारदके गुरु करने और चौरासी
भोगसे छूटनेकी कथा.... २९कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये
प्रार्थना करना.... ५१
कबीरकी महिमा.... २९

अनुक्रमणिका.

विषय.पृष्ठ.
मनका वर्णन-मनकी ४०
प्रकृति. ....५३
गुरु और गुरुओंका वर्णन ५४
चौरासीका वर्णन ....५९
भीन भक्षककी गतिका
वर्णन ....५६
जीव बधनेका पाप ....५७
कबीरसाहबसे दर्शन देनेके
लिये सब देवताओंका
प्रार्थना करना. ....५८
कापिलमुनिका पान परवाना
लेना ....५९
रावणका वृत्तान्त ....६०
कलि युगके धर्मका वर्णन६१
पतिव्रता और व्यभिचारि-
णीके लक्षण और कर्तव्य ”
राजा दण्डपालके पुत्रोंकी
कथा ( पतिव्रता और
व्यभिचारीके दृष्टान्त )६३
कथाका सार दृष्टान्तका
अध्यात्मिक अर्थ ....७०
निर्गुण भक्तिकी महिमा ”
अर्जुन और कबीर संवाद ७१
युधिष्ठिरका आरती चौका
करना. ....७३
कबीर साहबका देवता तथा
विषय.पृष्ठ.
युधिष्ठिरको परवाना देकर
लोकको जाना. ....७४
निरंजन और त्रिदेवका
सम्वाद शिवादिदेवका
कोप करना ....७५
कृष्णको निरंजन शिवके
कोपसे बचानेके लिये
कबीरका प्रकट होना
और शिवका भस्म करना ७९
सनकादिका शिवका जिला-
नेके लिये प्रार्थना करना ८१
सनकादि और विष्णुका
सम्वाद वेदादिकी उत्पत्ति ८२
औतारोंकी कथा ....८९
गुरुभक्तिकी महिमा ....९३
गरुडकी चेतना गरुड और
कबीर सम्वाद ....९४
कृष्ण गरुड सम्वाद ....९९
शुकदेवकबीरसम्वाद ....१०२
कृष्ण कबीर सम्वाद ....१०४
कबीरका अपने पन्थकी
बात कृष्णसे कहना ....१०९
अवतारोंमें सर्वश्रेष्ठ औता-
रका नाम ....११४
तीनों गुण तथा त्रिगुणा
त्मक भक्तिका वर्णन ”

अनुक्रमणिका.

विषय.पृष्ठ.विषय.पृष्ठ.
व्यास और कृष्ण सम्वाद११७ब्रह्मा और कबीर सम्वाद,
साधुके लक्षण रमता औरलोक द्वीपका वर्णन ....१३८
वैठाका भाव ....११८महादेव और कबीर सम्वाद,
ज्ञान दशा और मनकीयोगका वर्णन ....१४०
दशाका वर्णन अर्थात्योगियोंके तत्त्वोंका वर्णन१४६
गुरुमुखी और वनमु-मुक्तिका मार्ग, त्रिदेव और
खीका वर्णन ....१२४कबीर सम्वाद ....
कलियुगमें कबीर साहबत्रिगुणका प्रभाववर्णन ....१४८
क्यों प्रकट हुए ? ....१२७सत्य भक्ति तथा योग
सब देवतोंका कबीरसाहबकाभोगका वर्णन ....१४९
शिष्य होना ....१२९विशदूका स्वरूप कथन ....१५०
लक्ष्मी आदि देवियोंके गुरु-चौदह यमका वर्णन ....१५१
मुख होनेका वृत्तान्त....१३०ग्रंथसमाप्ति ....१५२
सत्यलोकके हंसोंके रूपका
वर्णन ....१३६

इत्यनुक्रमणिका समाप्त ।

सत्यनाम ।

सत्यनाम.

सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कवीर, सुरतियोगसंतायन, धनीधर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शननाम, कुलपतिनाम, प्रमोधगुरुवालापीर, कवलनाम, अमालनाम, सुरतिसनेहीनाम, हक्कनाम, पाकनाम, प्रगटनाम, धीरजननाम, उग्रनामसाहवकी दया वंश बयालीसकी दया ।

सत्यनाम.

गुरुस्तुति ।

श्लोकाः ।

हे लोकेश दयानिधे ! त्रिभुवने देवोऽस्ति करत्त्वत्परः । ब्रह्माविष्णुमहेश्वरैः सुरगणैः संसेव्यमानः सदा ॥

संसारारुध्यद्वानलेन विकलः संतप्यमानोऽस्म्यहम् ।

त्वत्पादौ शरणं गतोऽद्यदिवसे भोः सद्गुरो ! पाहि माम् १

अर्थ—हे विश्वपति दयासागर ! त्रिलोकमें आपसे कौन देवता श्रेष्ठ है ? अर्थात् कोई नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव इत्यादि देवताओंके समूहकरके आप सदाकाल सेवन करने योग्य हो. संसाररूपी दावांभ्रसे व्याकुल हुआ तपायमान मैं आज आपकी शरणागतिको प्राप्त होता हूँ सो हे सद्गुरु ! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १ ॥

ध्येयं सदा निखिलवेदविदो वदन्ति ।

ज्ञेयं च शुद्धमतयो यतयो विरक्ताः ॥

स त्वं प्रभो ! विगतशोकभवाब्धिसेतो ! ।

प्रत्यक्षतोऽसि भवतः शरणागतोऽस्मि ॥ २ ॥

आपको समस्त वेदके विद्वान् ध्यान करने योग्य कहते हैं, तथा विरागवान् निर्मल बुद्धिवाले यतिलोग आपको जानने योग्य कहते हैं सो आप हे प्रभो ! शोकरहित संसारके सेवु हो. मैं आज आपके साक्षात् शरणागत होता हूँ ॥ २ ॥

१२

गुरुस्तुति.

नमोऽस्तु ते नाथ ! तवांश्रिपंकजम् ।

प्रत्यग्रकल्पदुमपर्णसन्निभम् ॥

श्रेयस्कंरं स्वात्मपदप्रदायकम् ।

ध्येयं सुनीन्द्रैरपि योगिनां वरैः ॥ ३ ॥

हे नाथ ! आपके चरणारविंदोंको नमस्कार है. कैसे हैं आपके चरणारविन्द कि, कल्पवृक्षके नूतन पत्रोंके समान, कल्याणके करनेवाले तथा स्वात्मपदको प्राप्त करानेवाले फिर कैसे हैं ? सुनीन्द्र और योगीन्द्रोंके भी ध्यान करने योग्य ॥ ३ ॥

माता त्वमेव भव नाथ ! पिता त्वमेव ।

सौहार्ददः स्वजनवन्धुसखा त्वमेव ॥

सर्वं त्वमेव न च कोऽपि त्वया विनाऽन्यः ।

तस्मात्त्वदीयचरणौ शरणागतोऽस्मि ॥ ४ ॥

हे मेरे नाथ ! आपही माता हैं, आपही पिता हैं, आपही मित्र हैं, आपही कुटुम्बी हैं, आपही भाई हैं, आपही सखा हैं, आपही सब कुछ हैं, आपके विना मेरा और कोई नहीं है. तिसी कारणसे मैं आपके चरणोंकी शरणागति हुआ हूँ ॥ ४ ॥

अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽस्मि दयानिधे ! ।

नरः संसारदुःखोघात्त्वप्रसादाद्विमुच्यते ॥ ५ ॥

हे दयानिधे ! मुझे प्रतीत होता है कि, आज मेरा जन्म सफल हुआ है. क्योंकि, मनुष्य दुःखके समूहसे आपहीकी कृपासे मुक्त होते हैं ॥ ५ ॥

श्लोकपंचकमाहात्म्य ।

यः श्लोकपञ्चकमिदं पठते सुभवत्या ।

शिष्यो जहाति कुर्गाति परितः सदा तम् ॥

संपद्यते विविधमंगलहर्षलाभम् ।

सर्वार्थसिद्धिरपि मोक्षगुरोः प्रसादात् ॥ ६ ॥

धर्मराजकी सभा

अथ

कबीरकृष्णगीताप्रारम्भः ॥

उक्ति विष्णुव्यासवाणी—चौपाई ।

सुमिरो सचनाम गुरु नामा । साधुस्वरूप गुरु विसराया ॥ वक्ता विष्णु व्यास श्रुति वाणी । गुरुप्रताप सकलो गम जानी ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश देवादी । तैत्तिस कोट देव संवादी ॥ सुनि नारद इंद्रादि अहीशा । सरस्वती गणपति जगदीशा ॥ बैठे सबै विष्णु मुख हेरा । पापपुण्यका करहिं निवेरा ॥ चित्रगुप्त तहां कागज लिखहीं । जेहिपर जेते बाकी अहहीं ॥ कितहुं निरति भजन गुरुनामा । कितहुं तो माया मनकामा ॥ पाप पुण्य बंधन जमफांसी । नाम विना भरमें चौरासी ॥ पकडे जीव चोरकी नाई । मारत सुगदर रोर कराई ॥ सासत खाय जीव अपराधी । यम लावे साकट कहैं बांधी ॥ करे पुकार सुने नहीं कोई । गुरुविन साकट परले होई ॥ जीवधात आमिष भस् जेते । अग्निकुंडमें झरकें तेते ॥ अग्नि जारके नरक बुडावे । नरकभर सिर निकसन आवे ॥ जब जिव सीस काठ दम लेहीं । तवहीं जम सिर सुगदर देहीं ॥

कबीरकृष्णगीता ।

लोहा सरा सा सिसखेधके गाडे । पिबहिं नरक जिव परवश पाडे ॥ त्रिगुण भक्त जिव तजे न काला । त्रिगुणभक्त काल भगजाला ॥ परनारी परद्व्य तलासी । तेहिंते ढारि दैय गरव फांसी ॥ ओझा डाइन चोर वटपारा । परे नरक जो खेले शिकारा ॥ साधु देख जिन बदन छिपावा । जम सिर सुगदर ताहि ढहावा ॥ मिथ्या वाद चुगल हंकारी । मित्र द्रोह ले नरकहिं डारी ॥ कृणबंधन निज आतमघाती । बंधुघात जम तोरैं छाती ॥ विश्वासघात दै लेय बहोरी । अघोर नरकमें तेहिं ले बोरी ॥ बैरागी ब्राह्मण संन्यासी । शस्त्र वांध भ्रमैं चौरासी ॥ गुरु पितु मातुकी करे नहिं सेवा । भ्रमैं तीरथ पूजत बहु देवा ॥ ब्रह्म तजि जो पूजहिं भूता । अघोर नरक देहीं जमदूता ॥ आतम तज जा पूज पषाणा । शिलाखूप देहीं भगवाना ॥ बृद्ध मनुज जो करहिं विवाही । सूकर जन्म नरक भार वाही ॥ वेश्यागमन विश्वाकर बेटा । तेहि पीछे होय ब्राह्मको घेटा ॥ त्रिया पाते तज जार जो राती । लोहमेश जम तोरहिं छाती ॥ तेहिपर आनि अग्नि धधकावैं । छेद बेध जम अनल जरवैं ॥ मात पिता तज त्रिय प्रतिपालैं । ताहि काल आवामैं डालैं ॥ बापको कुल तज जो सासुर वसैं । ताके सिर भसान चढ हसैं ॥ बहिनी गांव वसे जो प्राणी । पितृपछ त्याग संग्रह अवखानी ॥ अजिया सुत जिन बंधोर भाई । अजिया फिर तेहि खाय चवाई ॥ दिन दस भक्त करें अज्ञानी । बहुर मलेश दशा लपटानी ॥

सत्यनामकी महिमा

कवीरकृष्णगीता ।

ताहि दिखे भिक्षाके कुंडा । उठ बुडके अब काटै सुंडा ॥ निकसत सिर जम मार गजारा । लोहदंत क्रम करहिं अहारा ॥ देह पशया भषे जो मासू । भषहीं क्रम दंतन घट तासू ॥ बरबस व्याह छोर धन लेहीं । ताहि सेज कांटाको देहीं ॥ जिन भिक्षारिको भीख न दीन्हा । ताकहैं भीख मंगाय लीन्हा ॥ गांगत भीख देय जो गारी । कहहिं ते भीख न देय अनारी ॥ अभ्यागतको नेवति जेवावे । तोहेते पाय चला अघ जावे ॥ पारहि वाट टाट दै मारी । मार शिकार कोरटिया अघ डारी ॥ करे मजूर मजुरी भूखा । पेट भरे लघु जेठके सूखा ॥ जो हरे मजूरनकर मजुरी । ताकहैं काल देत हैं सूरी ॥ गऊ बधन जो द्विज बध कीन्हा । विष्णुबोह खान अब दीन्हा ॥ दुरबल सबल सबल नर चांपै । जम बेधे तब थरथर कांपै ॥ जौलो पोखर पार बनावे । जड आगे हत जीव चढावे ॥ देव नाम ले जीव हतावे । भोथे शस्त्रसे गला रितावे ॥ ब्राह्मण करे शूद्रसो भोग । परे नरक व्यापे बहु सोगा ॥ कन्या वेंच वेंच करे व्याजा । औ जो महँग मनावे अनाजा ॥ इन सबको दीन्हा अघखानी । औ जो प्यासे देय न पानी ॥ राजा होय अन्याई होई । परजहि दुखदे अघ भुगते सोई ॥

दोहा—जन्म जन्मका लेखा, वासिल बाकी होय ।

पापी दुख सिर बूडही, पुत्रिहि पहुँचे सोय ॥

जाहि जीव जत पुत्रके दासा । सो वैकुंठ पुत्र भर बासा ॥ पुत्र घटा फिर पर चौरासी । सत्तनाम मिन कटे न फांसी ॥

राजा छत्रजीतकी कथा

कबीरकृष्णगीता ।

मन वचके जो साधू सेवा । ताकहैं छोड़ि सके न जमदेवा ॥ साधु देह घर भजहिं जो रामा । सदुरु भाकि प्रताप सुखधामा ॥ सुखके धाम आह सतलोक । सतनाम भज जीव निसोका ॥

राजा छत्रजीतकी कथा ।

राजा छत्रजीत छत्रधारी । करे भाकि कुल लाज बिसारी ॥ इच्छाभोजन सब कहैं देई । जो इच्छा माँगे सो लेई ॥ राजा रहे कबीरके शीषा । सर्व जीवपर दाया दीषा ॥ आतुर होय कहे इंद्र भुवारा । अब तो राज न रहे हमारा ॥ राजा छत्रजीत चलि आवा । इच्छा भोजन सबहिं खवावा ॥ बोले कृष्ण इंद्रसन आई । कबीर भजेते प्राण बसाई ॥ इन्द्र उवाच ।

कहैं इंद्र अब केहिपर जाऊँ । हम आये राखहु मम भाऊ ॥

कृष्ण उवाच ।

जो अब तुव आवनमें राखो । निर्गुण भक्त दोह किष भाषो ॥ जो हम निर्गुण भक्त दुखावैं । निराकार मोहि नरक डुबावैं ॥ और सबनपर मैं सरदारा । कबीरके संतसे जम सब हारा ॥ कबीरको मनुषजानो मत कोई । कारण करण कबीर है सोई ॥ निराकार निरंजन देवा । तिन कह सत्त कबीरको भेवा ॥ पिता निरंजन हम सो कहेऊ । जब कबीर तब कोई नहीं रहेऊ ॥ कहैं निरंजन राज जो मोरा । सो दीन्ह कबीर बंदीछोरा ॥ कबीरके दिये करें हम राजू । कबीर भेवक मम सिरताजू ॥

कबीरकृष्णगीत ।

और सबे हैं जमके चेरा । भजें कबीर तेहि सतपुर डेरा ॥ कहैं कृष्ण जानहु सो करहु । कबीर बालकके पाछन परहु ॥ कृष्णबचन लख सबहिं उदासा । कहैं अजहूँ चल देखहु दासा ॥ ब्रह्मा रुद्र नारद सब देवा । रज तम संग जीव सबे चलेवा ॥ इंद्र आद नारद सो भाषी । चलो जाय देखहुँ मैं आंखी ॥ सबे अधर धर प्रगटे गोपा । नारद धार नृप गये कोपा ॥ सात दिवस निशिके हम भूखे । इच्छाभोजन विन हम खूखे ॥ जाय सेवटिया नृप सो कहई । क्षुधावंत द्वारे नृप अहई ॥ राजा कहा पूछहु तुम जाई । इच्छा भोजन कौन गोसाई ॥ जाय सेवटिया ऋषिसों पूछा । भोजन कौन आय तुव इच्छा ॥ तव नारद कहै तोहि कह कहहीं । कहौ ताहि राजा जो अहई ॥ जाय सेवटिया नृपसो भाषी । द्विज नृपसो कहवे चित राखी ॥ राजा आय कीन्ह परणामा । कछु ऋषि कहु इच्छा भच्छकामा नारद कहैं इच्छा चित मोरा । सर्व मांस खाऊं भर थोरा ॥ सर्व मांस सुन राजा डरेऊ । सर्व जीव हतको डर भरेऊ ॥ नृप ऋषिकहैं बैठक दीन्हा । आप गमन भवन निज कीन्हा ॥ मंदिर जाय ध्यान गुरु कीन्हा । तुरत कबीर दरश नृप दीन्हा ॥ राजा चरण पखार सो पान कराये । नारद सुनिके कथा सुनाये ॥ सर्व मांस चाहे अन्याई । सट्टरु आप दया डर लाई ॥

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सोच कछु नाहीं । देहु मीन ले तिनके पाहीं ॥ सर्व मांस है मीनशरीरा । गउ सूकर नर सकल सधीरा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

भिक्षा पटार और खरचारा । भवै मीन सो सूतक झारा ॥ मीन कीरा सो तुरत मगाये । शूद्र हाथ दे राय पठाये ॥ नारद देख कोप होय ऊठे । लेहिं न मीन जाय तब रुठे ॥ जाय दास नृप सो अथाई । ब्राह्मण रुठा जाय गोसाई ॥ उठे कबीर राय तेहि बारा । आय ठाढ़ भै सिंह दुवारा ॥ आपन रूप छिपाय कबीरा । साधुरूप होय मुनिसो भीरा ॥ कहै साधु सुन जपके अंसा । सर्व मांस तैं भष निहंससा ॥ नारद कहै जीवन जिव मारी । सबकर मांस मैं भषत अहारी ॥ कहै कबीर राजासों वाणी । कलिके विष जाय अघखानी ॥ अब नृप मालुष बहुत बोलावहु । तिनते सब तर रुधिर मंगावहु ॥ जीवन मरे रुधिर सब चाही । सप सरोय अब सबके लाही ॥ एक कहत धाये शत कोटी । लाये हेर रुधिर भर लोटी ॥ सो ले धरा ऋषीके आगे । सर्व मांस अब लेहु अभागे ॥ लोहूते होय मांस तुच हाडा । सर्व मांस भषतैं अब गाढा ॥ नारद देख अचंभा भयऊ । हो नृप यह बुध को तोहि दियऊ ॥ कहा नृप सतनाम कबीरा । सो हमरे रक्षक गुरुपरा ॥ सो समर्थ मम सङ्कट निवारन । औ सब जीवके विथा विडारन ॥ तब कबीर निज रूप दिखावा । नारद प्रतीत भये पतिआवा ॥ नारद सुनहु श्रवण दे वैना । कहै कबीर अलख लख नेना ॥ कस तुम फंद रच्यो इहँ आई । भेटो अजहूँ सबै नसई ॥ डोप तोहे नरक लै नारद । राख सके को गनपत शारद ॥ नारद बेग नृपके पग धारे । राजा बकसहु चूक हमारे ॥

नारद-कृष्ण संवाद व कबीरके भक्तकी महिमा

कवीरकृष्णगीता ।

तब राजा कबीर मुख जोवा । कहैं कबीर वकसहु द्विज रोवा ॥ राजा कहे वकसाहम तोहौं । तुमहु दया कर वकसहु मोहीं ॥ तब नारद बहु स्तुति कीन्हा । सबै रुधिर सरवरमह दीन्हा ॥ जेहि २ तनके ओनित गहेऊ । भयउ सोझकतनमीनहोय रहेऊ ॥ स्तुति करत नारद चलि गयऊ । अति लज्जित होय हरिपद गहेऊ ॥ हीरसन्मुख नारद सिर नाये । पूछा हरि कृषि कहैंते आये ॥ नारद उवाच ।

कहे कृषि नारद सुन जदुराई । विन तुव आज्ञा गयउ गोसाईं ॥ इंद्रकाज ब्रह्मा शिव भेजा । भयऊँ पतित अब यह तन तेजा ॥ छत्रजीतके गुरु कबीरा । रोसेउ तिन पुनि नृपत गैभीरा ॥ भसभ होत चाहूं वहां आजू । होत भला तब इंद्रके काजू ॥ सत कबीर मोहि कोप सुनावा । भम सेवक किमि आन दुखावा ॥ अभित कला कजु वराणि न जाई । कहीं न सके अज हरि देव नसाई ॥

कृष्ण उवाच ।

कहे कृष्ण तुम हमरी नहिं भाना । मानसके तुम सहुर जाना ॥ सतकबीर करता आविनाशी । निराकारके मूलकबीर मुखराशी ॥ राजा रहे कबीरके दासा । तिनसे हम आज्ञा प्रगासा ॥ कबीरके संतसे काल डेराना । जरे गात तब पेल पराना ॥ कबीरके संत रहे सतलोक । इंद्रहि कौन भार भौ सोका ॥ जब इंद्र तब इंद्र कह पूजहु । इंद्र परहि अब दूसर भूजहु ॥ इंद्रासन वैकुंठ विलासा । यह सब क्रीतम ठोर विनासा ॥ सत्तलोक अम्बरपुर देश । तहां रहे सतकबीर मुखभेषा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

सबहिं जीव सतकबीरके आहीं । विन परचे कोइ चीन्हत नाही ॥ मैं चीन्हा मोहि पिता चिन्हावा । निराकार मोहि भेद बतावा ॥ तुम सब कहैं हम भाष सुनाई । पेल वचन तुम गये गोसाई ॥ कबीरके त्रास निरंजन कंपे । हम तेहि दास गने निज आपे ॥ धर्मराय चौदह तेहि हारे । जो सतनाम कबीर पुकारे ॥ सुन नारद सीस तर कीन्हा । कबीरके स्तुति करवे लीन्हा ॥ पुनि एक जम दौरा तहैं आवा । विष्णुहिं सीस नाग गोहरावा ॥ जीव एक बरबस चलि जाई । सत् कबीर कहैं इतराई ॥ तेहि देखत मम बल भोथोरा । जैसे साहु देखत हो चोरा ॥ तुम हरि सब ईश गोसाई । ताते आप कहों गोहराई ॥ कहा विष्णु तुम घर चलि जाहू । जो कबीर बै मुख तेहि खाहू ॥ हम सब हैं कबीरके दासा । निराकारको जाकी आसा ॥ सत्पुरुष सतनाम कबीरा । दास कबीरके सो मतधीरा ॥ कहैं कृष्ण सुन जम जिवजाळा । तजहु जाहि तेहि तुलसीमाला ॥ तुलसीमाला तिलक लिलारा । कहैं कबीर जिन राम पुकारा ॥ तासु निकट जिन जायहु भाई । साकट बांध नरक देवनाई ॥ भये शिष्य गुरु शब्द न माने । गुरुसाधनकी भाकि न ठाने ॥ साकटके तेहि लागे चांपी । साकट तो भये कालसभीपी ॥ विन गुरु शरणको साकटकहिंये । विन गुरु शरण वस अव लहिंये ॥

दोहा-सत् कबीरके सेवक, तेहि मत बोलहु बात ॥ राम गहे तेहि छांडहु, राम कबीर एक साथ ॥

यमदूतका कृष्णसे कबीरके भक्तके विषयमें वार्तालाप

कवीरकृष्णगीता ।

राम भजे जो तजे दुचितार्ह । एक आस गुरु सब विसराई ॥ आतम पूजा भम विसारे । जीवदया गुरु साध सुवारे ॥ सतकी चाल राम जप लाई । आगे ताहि कवीरपंथ मिलाई ॥ राम वैकुंठ कवीर सतलोक । कवीर शरण मिटे जिवधोका ॥ सुनके दूत फिर सुन्य सयाये । जोतसरूपी कहैं गौहराये ॥ कहे दूत आतुर कह तोरा । जिव सब जाय कबीरकी जोरा ॥ ना जानो कहैं जाय समाई । जम बलहीन साधके ठाई ॥ तब हम कहा विष्णु सो जाई । विष्णु कहा घर जाहु रेभाई ॥ जब हर जीवके किये न खोजा । तब हम आये तुम्हरे सोजा ॥ को कबीर कहवाते आये । जीवहिं लेकर कहां सिधाये ॥ उठे अवाज सुनाते सोई । कबीरके दास छुवहु जानि कोई ॥ जिनके दिये राज हम करहीं । सो कबीर जिवलोक संचरहीं ॥ धर्मरायसे हम कहि राखा । औ पुन विष्णुसे महिमा भाषा ॥ विष्णु तो तोहि कहा समुझाई । धर्मराय तोहि नाहिं लखाई ॥ अब सुन राखहुं सब जमदूता । कबीरके दास छूवे अजगूता ॥ छुवहु कबहुं तोर बलहानी । हम हारे तोहि कौन बखानि ॥ सुनके दूत विष्णु हिग आये । विष्णुहिं कहा जमन सिर नाये ॥ अहो विष्णु देवनके ईशा । तुमहि कहा सो नैन न दीसा ॥ हम जो गये निरंजन दरवारा । शून्य अधियार भय कीन्हपुकारा ॥ उठी अवाज सुन्यते जबहिं । कबीरके दास छुयउ मत कबहीं ॥

दोहा—कहा निरंजन राय अस, संत द्रोह जम नास ।

राम कबीरहिं छोडके, औरहिं घालो फांस ॥

कबीरकी महिमा कृष्णमुख (सत्यलोक, जीव, निरंजन आदिका वर्णन)

१०

कबीरकृष्णगीता ।

रामके भक्तन हरगण लावहिं । कबीरके दास नाम बल धावहिं ॥ रामके दास पूछे कहु केह बाता । जन कबीर सहुर रंगराता ॥ चहे विमान चले सब जाहीं । जागृत सतकबीर कहाहीं ॥ त्रिगुण जीव औ भूत पिशाची । पाप पुण्य आश्रित जमफांसी ॥ सतकबीरके जो हैं दासा । जेहि नहिं पाप पुण्यके आसा ॥ एकहि नाम कबीरहिं गावहिं । गुरुसाधुके सेवा लावहिं ॥ एकहि दूत गये जम धामा । साधु संत हरित लख रामा ॥ सबे देव औ सुखदेव व्यासा । को कबीर जेहि डर जमत्रासा ॥ केहे कृष्ण कबीरके लीला । सतनाम कबीर गहीला ॥ कबीर हैं अमरलोकके वासी । सो नहिं देह धरे चौरासी ॥ अमरलोक तिहु लोकते न्यारा । जहैंत यहां आये निरंकारा ॥ सो घर आदु सबनके मूला । सत्तलोक अमर अस्थूला ॥ जीव अमर सत्तलोकते आये । पूंजी सो अलस निरंजन पाये ॥

दोहा-आदु पिता सो सब, सो हैं सत्तकबीर ।

क्रीतम पिता सो बहुत, भये निरंजन नीर शरीर ॥ सत्तकबीरके अंस सोहंगा । आय रहै सो सबके संग ॥ सोहंग नाम ब्रह्मके दल । पांच पचीस त्रिगुण अहंकल ॥ तत ओंकार सोहंगम जीऊ । सत्तकबीर सब जिवके पीऊ ॥ जीव न चीन्है सत्तकबीरा । पांच तीनके धरे शरीरा ॥ अमर लोक हिरंभर काया । तहं सब हंसा केल कराया ॥ हम सब कहा सेवक बडभागी । जो कबीरके शरण न लागी ॥