भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥ स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥ पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥ अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥ एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥ एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥ काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥ जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥ संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥ ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥ ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥ साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥ जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥ यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥ सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥ धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥

बोधसागर

(७९)

पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥ करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥ कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥ सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥ सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥ ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥ आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥ ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥ लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥ रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥ काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥ धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥ व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥ ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥ सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥ धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥ चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥ जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥ ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥ जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥ रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥ यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥ साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥ रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥

(८०)

अमरसिंह बोध

चोपाई

सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥ लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥ यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥ बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥ आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥ ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥ ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥ जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥ कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥ इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥ रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥ जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥ जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥ जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥ बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥ परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥ ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥ चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥ गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥ तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥ साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥ झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥ तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥ जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥

बोधसागर

(८१)

दान देत लखि भांजी मारै । योग्यअयोग्य जो नाहि उचारे ॥ पर तप मँह कर विघ्न अनेका । नहिं हिय मँह जो करत विवेका ॥ आप छूँछ औरन ब्रत टारै । वेद शास्त्र जिन नाहि उचारे ॥ हरि यश सुनत दहैं मन माहीं । दूसर सुनै तो चित विचलाहीं ॥ तिनकर देह सो कूकर भखहीं । पुनि असिपत्रमांझ दुख भरहीं ॥ एकहु अक्षर गुरुसों सीखै । ताहि न मानै मन कर तीखै ॥ ते परहीं नर रौरव माहीं । बहुविध दुख भुगतहिं सो ताहीं ॥ जे नर हरत दीनके प्रानन । मित्रहि मारत दाहत कानन ॥ तिनहि अँगारन मांझ सुतावैं । यमगण दारुन त्रास दिखावैं ॥ जे गुरुधन हारक संसारा । किम कूप मँह परत निहारा ॥ जौन गुरु व्यभिचारी होई । प्रजहिं दुःख देई नर जोई ॥ शिष्य शंक जो नाहिं मिटावत । प्रजहिं न्याय जो नाहिं चुकावत ॥ युक्त अयुक्त न जानत जोई । करत सपक्ष न्याय शठ कोई ॥ ते नर अंध तामिस्त्र मँझारे । गिरत लखे पावत दुख भारे ॥ विन देखे पर दोष गिनावैं । यम गण तिनके नैन टँकावैं ॥ अप्रिय वचन औरहीं कहहीं । कारण छेददुख ते शठ लहहीं ॥ देव साधु ब्राह्मण धन हरई । तृष्णावश लोभहिं मन धरई ॥ सूचीमुख नरकहिं कर नाऊँ । ते तहैं जाइ वसावैं गाऊँ ॥ जे परतिय अभिलाषत प्रानी । निन्दत सुर गुरु भूसुर जानीं ॥ धर्मशास्त्र तीरथ हरिजन कर । निन्दा करत सुनहु दुख तिनकर ॥ पहिले शूलन पर बैठावैं । मुद्गर शूलनसे करि घावैं ॥ पाछे काक श्वान तेहि खाहीं । छेदहिं दुख सुख हेरत नाहीं ॥ भोगी बहुत काल प्रिय नारी । त्यागत ताहि अधम अविचारी ॥ विनु वैराग ताहिको त्यागे । ताहि त्यागि औरिन मँह पागे ॥ सो शठ नरकमाँहिं दुख पावै । कहँ लग कहौं कहत नहिं आवै ॥ कर पद बाँधि यम सासत देहीं । जो जस किये सो तस फल लेहीं ॥

(८२)

अमरसिंह बोध

सूरज सुत जस आज्ञा देई । दूत उठाय सबै शिर लेई ॥ चित्रगुप्त सो लिखनी लेखै । धर्मराय न्याय तहैं पेखै ॥

सारखी-कै कमाई जो कछू, कभी न निष्फल जाय ॥

सात समुन्दर आडा परै, मिलै अगाऊ धाय ॥

भूमि ताभ्रमय तहां बनाई । तापर अग्नि प्रचण्ड बिछाई ॥ दहकत ज्वाला सो महि कैसी । अति दुस्सह प्रलयगिनि जैसी ॥ तहैं नर जाइ जरत दुख पावैं । यमगण हानि तेहि मांझ जरावैं ॥ तीव्र नख रद शूचीकच केते । पापिन कहैं दुख देहि सब तेते ॥ अति तनु कृश तनु बहु पापी । तहैं दुख पावत जन परितापी ॥ सांकरि बांधि बांधि गज लावैं । अति दृढ सुदूर हानि तेहि ढावैं ॥ दुख लहि जब इतउत नर धावैं । यमगण धरि तिहि माहिं गिरावैं ॥ पुनि निज कृतकर याद करावैं । परिघन हनि बहु त्रास दिखावैं ॥ तस थम्भ बहु ठाड रहावैं । पर तिय गामी ताहि सटावैं ॥ निज पति छोड परपुरुष लुभावैं । सोइ तिया तहैं लाइ मिलावैं ॥ यमगण ताहि मारि भिटावत । कर वचन पुनि ताहि सुनावत ॥ यमके दूत अस कहैं पुकारी । तबतौ तन मन सकल विसारी ॥ प्राण समान चही परनारी । अबकिन भेटेहु रुचि किमि मारी ॥ उन्नत कुच भुजभरि जिमि भेटे । मुख चुम्बन रति करि दुख मेटे ॥ रही जो तव जीवन जग नारी । यह सोइ अपर न करहु विचारी ॥ कलनहिछनजेहि विनतोहि पापी । मिलहु न तिय सँग करत अलापी ॥ यहि विधि यमगण वचन सुनावैं । हनि हनि अधमन खम्भ लगावैं ॥ मद पीवत सँग जे करि प्रीती । मांसहिं खाइ करत अनरीती ॥ तस तैल तेहि मारि पियाई । कहत मदहि पीवहु शठ आई ॥ हाहाकार करै जब सोई । करै विनती सो बहु रोई ॥ ता ऊपर तैलहिं सो डारैं । भीतर बाहर दोऊ विधि जारैं ॥ इतना करैं बहुरि सो आगे । करन शासना सो फिर लागे ॥

बोधसागर

(८३)

असिपत्र बिंपिन महाँ चलहूँ । खायो माँस सोई फल लहहूँ ॥ तहाँ अहँतरु दल अतिही तीखैँ । ऊपर परत कटत तनु दीखैँ ॥ रहत न बने तहाँ पुनि भाजत । करिविलापबहुविधिदुखपावत ॥ करि परघात पाल निज देही । कूटकरमबहु विधिकिय जेही ॥ ते असिपत्र नरक महाँ जावैं । पुनि रकटाइशिर दुख पावैं ॥ एक शिर काटि फेरि होइ आवै । बहुरि कटैं बहुरि है जावै ॥ जे परहिंसक अधम नरेशा । तेलयंत्र तनु पिसत इमेशा ॥ तेल चुराय जो जगमहाँ लेते । यमगण तेहि बहुत दुख देते ॥ तेल चोर कहीं तेल कराही । घृत चोरहिँ घृत माँझ गिराहीं ॥ जेपर दूध मधू दधि हरहीं । ते गण रक्त कुण्ड महाँ परहीं ॥ पाश बाँधि गल तेहि महाँ डारैं । यम गण दारुण त्रास विडारैं ॥ तीरथ चलत जानि फन हरहीं । ते नर रक्त पीब दह परहीं ॥ देव सदन महिसुर गुरुधामा । जे तोडत मन करहिँ अरामा ॥ बन वाटिका पुहम बहु छेदैं । मठ मखं भवन सुरभिधर भेदैं ॥ दीन भवन चटशाल गिरावैं । अस्थिचूर्ण महाँ ते दुख पावैं ॥ पर उपांनत वस्त्र शठ हरहीं । पर भोजन छिपाय जो धरहीं ॥ लोहयंत्र बिच ताहि पिरावैं । बहुविधि तेही दुःख दिखावैं ॥ जे नर घर पुर विपिन जरावत । अग्निकुण्ड तनु तासु गिरावत ॥ जे निज स्वामिहि दोष लगावैं । पर अपवाद प्रीति करि गावैं ॥ तिन कहीं नकं शाल्मली डारै । पाश बाँधि लटकात तरारै ॥ मुद्गर परिघन यमगण मारैं । निर्दय तनक न करूणा धारैं ॥ जो तिरिया परपति रत होई । नाथवती विधवा किन होई ॥ तस लोहमय खम्ब नराकृति । यम वशसे तेहि तिय भेटति ॥ लोह शूल खर तस विशाला । जीभ छेद मुख करत विहाला ॥ इमिदुख लहँहि अधम नरनारी । कहाँ लगिकहाँ सोलेहु विचारी ॥

१ यज्ञशाला । २ गोशाला । ३ जूता ।

चित्रगुप्तसे वार्तालाप

(८४)

अमरसिंह बोध

यहिविधिजोयम शासतिकरई । कहैं लगि कहौं पार नहिं परई ॥ सुनत हाल व्याकुल धर्मदासु । सुख प्रस्वेद नहिं आवै श्वासु ॥ देखि दशा सदगुरु बोले । केहि कारण धर्मनि तुम डोले ॥ धरि धीरज तब धर्मनि भाषा । नरककथासुनिभयमन भाखा ॥

धर्मदास वचन

हो साहेब यम बड विकरारा । केहि विधि हंसा पावे पारा ॥ यही भय मम मन महाँ आवै । चितवत चितव्याकुलहोयजावै

सतगुरु वचन

सुनत वचन प्रभु मन विहँसाये । कही शब्द धर्मनि समुझाये ॥ धर्मनि तुमही भय कलु नाही । सतगुरु शब्द है तुमरे पाही ॥ अपर कथा सुनहु चितधारी । संशय मिटै तो होहु सुखारी ॥ जब राजा विनती ममकीन्हा । तब हम ताहि दिलासा दीन्हा ॥ शब्द गहै सो नाहि डराई । तुम किमिडरहु सुनहु हो राई ॥ सत्य शब्द मम जे जिव पैहैं । काल फांस सो सबै नशैंहैं ॥ सुनत वचन राजा धरु धीरा । बोले वचन काल बलबीरा ॥

चित्रगुप्त वचन

है साहब तुम काह विचारो । नगर हमार उजारन धारो ॥ हो साहब जो तुम अस करहु । न्याय नीति सबही तुम हरहु ॥ सुनो साहेब एक बात हमारी । पंथ तुम्हारा चले संसारी ॥ ताते बिनती करैं बहोरी । सुनो गुसाइयाँ अरनो मोरी ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव अधिकारी । तीनकी आशजगतमहैं भारी ॥ उनको हम नहिं कबहु डरावैं । चूक चाल तो ताहि नचावैं ॥ और जीवकी कौन चलावे । हमते उबरन एको न पावे ॥ सीधि चाल चलुजीव सुजाना । सो जीव देहों लीक पयाना ॥ परंपंच करी साहेबको धावे । हम ते जीव जान नहिं पावे ॥ चाल चलत लागै बडिबारा । ताते नाहीं दोष हमारा ॥

बंकुच्छका वर्णन

बोधसागर

(८५)

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥ परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥ निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥ अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥

चित्रगुप्त वचन

चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥ तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥

साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥

मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥

चौपाई

अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥ नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥ देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥ उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥ कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥ सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥ राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥ डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥ भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥

अमरसिंह वचन

ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥ हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥ साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥ जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥ सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥

(८६)

अमरसिंह बोध

भगवान वचन

यहि विधि गौ एकशत भाई । दइ विप्रनको सुनो प्रभुराई ॥ यहि विधि सेवा कीन तुम्हारी । तहू कर्म तुम हम शिर डारी ॥ सुनु राजा तोहि कहिसमझाऊं । पाप करे कस धरो छिपाऊं ॥ राजालोक कर्म बहु धरहीं । जीव मारिके भक्षण करहीं ॥ तुरी चढ़े बन खेले शिकारा । नाहक मारै जीव बिचारा ॥ मारे जीव तुमहु सुनाई । इतनो पाप कहां धरो छिपाई ॥

साखी-चार खानमें भरमहु, कीनो कर्म अपार ॥

विष्णु कहै राजा सुनो, कैसे होइ उबार ॥

चौपाई

सतगुरु ऐसी जुगति बनाई । लीला करी एक तेहि ठाई ॥ नृप शिर हाथ धरचोतेहिवारी । निकसे कागमुखमांहिअपारी ॥ बहुत काग जरे उद्र मंझारा । बहुतक भये पिंडते न्यारा ॥ लखि भगवान रहे शरमाई । फेर बात ना बोले भाई ॥ ततखन हमहूँ चले रिगाई । पहुँचे मानसरोवर जाई ॥ कामिनि शोभा बहुत अपारा । राजापरचो तब चरण मँझारा ॥ दयावंत भल लोक दिखाई । जुत्थजुत्थकामिनिअधिकाई ॥ करे ध्यान पुरुषको जहयँ । चारभानुकी शोभा जहवाँ ॥ झलके अंगकामिनिके भाई । रैन दिवस तहांजानि न जाई ॥ सिंहासन एकधर्यो तेहि ठाई । चंद्रअंश तहां बैठक पाई ॥ भाव प्रीति साहेब सो कीना । भले ज्ञानी तुम दरशन दीना ॥ बैठे एक सिंहासन दोई । राजा संग इत पुनि सोई ॥ अहो अंश दया अब होई । राजाकूँ ले जाओ सोई ॥ चन्द्रअंश तब शीश नवाई । आतुर हम तब चले रिगाई ॥ ले राजा तब शरीर समाया । भूपति बेगि उठे अकुलाया ॥ तबही राजा शीश नवाई । हमको तारो बेग गुसाई ॥

बोधसागर

(८७)

सतगुरु बचन

राजा सुनो वचन अब मोरा । करो आरती तितुका तोरा ॥ धर्मदास सब तोहि सुनाई । अमरहिंको वैकुण्ठ दिखाई ॥

धर्मदास बचन

धर्मदास तब दोउ कर जोरा । दया करो तुम बंदीछोरा ॥ और कथा मोहि वरनि सुनाओ । दया करो जनि मोहि डुरावो ॥ धर्मदास मैं कहूं समुझाई । जो कह्यु भगति करी सो राई ॥ जेतक जीव मुक्ति पद पाई । सो अब तुमकूँ वरनि सुनाई ॥

अमरसिंह बचन

साखी-राजा शीश नमाइके, बिनति करै कर जोर ॥ हमको सतगुरु तारिये, हम सो अधम न ओर ॥

सतगुरु बचन -चौपाई

सुन हो राय तजो सुरखाई । युग कंकवत हम चल आई ॥ मानसिंह भूपति बड़ राजा । तासो कीना ज्ञान समाजा ॥ तीस लाख अरु सात हजार । इतने हंसलोक पग धारा ॥ युग परवान चौकरी गयऊ । इतने युग मोहि आवत भयऊ ॥ कहैं लेख पूछो राय सुजाना । अपने जीवको करो छुटाना ॥ छन्द-गुरुचरण पद्मपराग पावन मृदुल मंजुल सोहावनी ॥ तरु सम सील परकासते तिमिर मोह नशावनी ॥ करहिं आरती बिसरि जन उरमांहि जे नर लावहीं ॥ भक्ति ज्ञान वैराग्य प्रगटे मोक्षपद तब पावहीं ॥

अमरसिंह बचन

सोरठा-तव चरनन अनुराग, और न दूजी आस ॥ मैं किंकर पद लाग, करहु अनुग्रह दास पर ॥ छन्द-आदि ब्रह्म अर्चित अविगत आदि अदली गाइए ॥ अजर नाम अर्चित अमर अकह अविचल धाइए ॥

(८८)

अमरसिंह बोध

अक्षय नाम आनंदरूपी अखिल सम अस्थिर मही ॥

अधम उधारण अखिलपति अखंडसरूपी हौ सही ॥

सोरठा-हंस उवारण नाम, हंसराज हंसनपति ॥

हंस श्रवण सुखधाम, सारशब्द दातार गुरु ॥

चौपाई

मैं कृमि गुरुभुंगी होय आये । अमी पिलाइके रूप फिराये ॥

मैं हूं लोह कुधात कहाया । गुरु पारस मोहि हेमबनाया ॥

एक मुख महिमा कही न जाई । जो मुख कहूँ पदमसत पाई ॥

जिमि पंछीका जोडा होई । नर नारी जुग बंध है सोई ॥

जिमि मोहि शब्द दीन गुरुराई । तिमि रानीको करिय मुक्ताई ॥

तुम बैदिछोर सबै विधिलायक । हम हैं जीव अकाम अलायक ॥

तेहि ते अरज करौ प्रभु साई । करि दया जिव मुक्ताऊ भाई ॥

तानी बचन

सुनो अमर हम कहे तुम सो । करनी बने करो कछु तुम सो ॥

हम कहे सोइ सुन तुम राई । भक्ति करो अब सुरति लगाई ॥

तन मन धन साहेबको दीना । शिरके साटे भक्ती लीन्हा ॥

रंभा नाम पुरेथंकी नारी । गुरु सेवामें रहे हुशियारी ॥

राजा बचन

तब राजा गुरुसे विनती कीना । अपनाकर मोहि निजकर लीना ॥

अब साहेब परवाना दीजे । जो कछु कहो सोई हम कीजे ॥

कौन वस्तु आनू गुरुदेवा । सो साहेब भाषो मोहि भेवा ॥

जेहि विधि तरन होय भवसागर । शब्द सरूप कहो तुम नागर ॥

साखी-मुक्त लोक जाते मिले जहां पुरुष अस्थान ॥

जरा मरण व्यापे नहीं सदा पुरुषको ध्यान ॥

१ पुरेय शब्द राजा अमरसिंहका सम्बोधन है।

राजाका कबीर साहबकी आज्ञासे चौका आरती करना

बोधसागर

(८९)

ज्ञानी बचन-चौपाई

भलमत बुझे राय ते मोही । निज गत कहूं बचन हट तोही ॥ तब हम दीन सिखापन राजा । जाते होय जीवका काजा ॥

साखी-चौदा कदली खंभ ले, उत्तम ठौर गडाय ॥

मध्य चैंदवा बांधिये, सिंहासन कनक बनाय ॥

चौपाई

गजमुक्ताहल थाल भराई । चन्दन चूनको चौक पुराई ॥ कंचनके पनवारा करहू । कंचन झारी जल भर धरहू ॥ तीन हजार मँगाये पाना । कंद पसेरी सात प्रमाना ॥ सात पसेरी मिष्टान्न मँगाओ । छतिस नारियल संगहि लाओ ॥ डुइसै एकतिस आनु सुपारी । तितनी खारक कहूं संभारी ॥ एतिक लौंग इलायची धारी । मेवा अष्ट लाओ यहि वारी ॥ मिर्च जायफल आनो भाई । द्राख जावत्री बेगि मँगाई ॥ शकर बदाम कपूर बखाना । सात हाथ बस्तर परवाना ॥ कंचनथाल गजमोती भराओ । मध्य आ ती मानिक धराओ ॥ कंचन कलस धरो बहु भांती । तापर बारो पाँचो बाती ॥ फूल चमेली अगर मगाई । परिमल और सुगंध धराई ॥ नाना पुष्प बताये माला । सब कछु आनि धरे ततकाला ॥ तब हम बैठे सिंहासन जाई । सकल समाज शब्द धुनि गाई ॥ अर्चित नामका चौका कीन्हा । ततक्षण थार हाथमें लीन्हा ॥ ठाढे सकल लोग अनुरागा । शब्द विरह सबहिन मिलि पागा ॥ दिवस कोकिला जिमि आनंदा । सकल हंस तिमि आनैंदकंदा ॥ तब हम बैठे थार धराई । अति आधीन परे सब पाई ॥ जब हम नारियल लीन्हा हाथा । सकल जीव तब भये सनाथा ॥ नरियल मोरि अंसगहि लीना । तितुका तोर परवाना दीना ॥ भय छूटे जप निरभे नामा । सतगुरु नाम भए विशरामा ॥

राजारानीका सत्यलोक जाना

(१०)

अमरसिंह बोध

कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥ सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥ नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥

चौपाई

कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥ पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥ तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥ आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥ नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥ आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥ तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥ और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥

छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥ हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥ जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥ नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥

सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥ भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥

ज्ञानी बचन-चौपाई

ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥ एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥

राजा रानी बचन

राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥ कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥ इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥

बोधसागर

(११)

जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥ अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥ सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥ पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥ भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥ काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥ मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥ नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥ पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥ षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥ एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥ पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥ काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥ एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥

सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥

सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥

कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥

सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥

चौपाई

पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥

हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥

पुरुष वचन

अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥

(९२)

अमरसिंह बोध

राजा रानी वचन

माथ नवाय कह राजा रानी । बार बार विनती बहु ठानी ॥ करनी चाल हम नहि जाना । परे ते कूपमें अति अज्ञाना ॥ आय जगाये अंध अचेता । सतगुरु शब्दते बांधे हेता ॥ पुरुष हुकुमते ज्ञानी चलि आये । कहो जीव कस करहि कमाये ॥ ज्ञानी वचन कहैं परमाना । इन सम हंस और नहि आना ॥ इनकी डोरी जीव सब आवा । पुरुष सुनी यह आनंद पावा ॥ अंक मिलाई हंस तब लीना । अरध सिंहासन बैठक दीना ॥ सेत छत्र शिर दीन्ह तनाई । सूरज कोटि छबि राजा पाइ ॥ यहिविधि राजा लोक सिधाये । सुनत बोध धर्मनि मन भाये ॥ एक वचनको संशय आई । सो मोहि नाथ कहौं समुझाई ॥ षोडश रवि सब हंस सराई । कैसे रायको दइ अधिकार्ई ॥

कबीर वचन

धर्मदास तोहैं कहि समुझाऊँ । तुमरे मनको धोख मिटाऊँ ॥ राज गुमान उन दिये विसारा । और जीवकी मुक्ति सुधारी ॥ पुरुष रायको पूछ न कीना । निज करनी कर नाम न लीना ॥ अपने मन तजि मान बढाई । ताते पुरुष दया उर आई ॥ धर्मदास सुनो चित लाई । यहिते राजा बढती पाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कहे युग कर जोरी । दया करी तुम बंदीछोरी ॥ दीनदयाल दयाके सागर । अच्छी कथा सुनाये आगर ॥ साखी-धर्मदास आधीन होइ, विनती करै कर जोर ॥ कथा कही अमरसिंहकी, संशय मिटायो मोर ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे राजा अमरसिंहबोध कथा वर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ श्री अमरसिंहबोधः समाप्तः

श्री-बीरसिंहबोध

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्द ( विहारी ) द्वारा संशोधित

हेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

1947-1948

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

शिवलिंग

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Shiva, wearing a crown and holding a trident (trishula). The figure is surrounded by a decorative border.

शिवलिंग

अथ बोधसागर

तृतीयस्तरंगः

बीरसिंहबोध

धर्मदास वचन-चोपाई

धर्मदास पूछे चित लायी । साहब मोहि कहो समझायी ॥ बीरसिंहराय किमि कीनी सेवा । करिके दया कहो गुरुदेवा ॥ बीरसिंहदेव बडा अभिमानी । कैसे साहिब सेवा ठानी ॥ सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करि कहिये बहु नामी ॥

कबीर वचन

धर्मदास भल पूछहु बाता । तुमसे बरनि कहूँ विरुयाता ॥ तन मन धन अरु मोहन लावे । जो जिव हमरे संग सिधावे ॥ आदि अन्त सुरति हम कीना । तबही पग धरतीपर दीना ॥ और दिशा देख्यो हम जायी । पूरब पश्चिम दृष्टि फैलायी ॥ बीरसिंह देव काशीकर राऊ । हम पहुँचि तहाँ कीन गोहराऊ ॥ प्रथमहिं चले भक्तपर गयऊ । सकल संत जहाँ भक्ति करयऊ ॥ नामदेव भक्ति करन मन लावा । सेना धनाजाट तहाँ आवा ॥ राँका बाँक सदन कसाई । पद्मावती दीपक ले आई ॥ चौहटे तान चँदेवा दीना । ठाडे भक्त सब गायन लीना ॥ नामदेव लोटन करे भाई । हाथ ताल रेदास बजाई ॥

नं. ४ कबीरसागर - ४