कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
प्रवृत्ति वंश वर्णन
(९०)
विवेकसागर
दोहा-निर्विकल्प व्यापक सकल, साखी सर्व असंग ॥ सर्वरूप सबते परे, सबविधि जान अभंग ॥ आदि पुरुष सर्वज्ञ अज, पूरण रूप अनन्त ॥ यही भांति हरि नित्त हैं, नेति वेद गावन्त ॥ त्रिगुण नियन्ता ईश जो, सत चित सदा निवृत्त ॥ ताकी इच्छा मात्रही, बल पायो प्राकृत ॥ प्रकृति पुरुष संयोगते, प्रगट भयो मन भूप ॥ संकल्प विकल्प दोष उठे तेमन शक्ति अत्रूप ॥ मन माया विस्मृति कियो, नाम विचित्रा तासु ॥ आच्छादन कर पुरुषको, विलसे देह विलासु ॥ मन माया बहु छल कियो, कीन्हो बहु विस्तार ॥ सुगति गयी निजरूपकी, प्रगटचो तन हंकार ॥
इस प्रकारसे इस मनकी उत्पत्ति हुई ।
सद्गुरु कहते हैं हे धर्मदास ! शरी को इस भयानक राजा मनकी दो स्त्रियाँ हैं तिनमेंसे एक प्रवृत्ति है । जिसमें यह मन बहुत ही राग को प्राप्त हुआ है, अर्थात् उसके साथ अत्यन्त स्नेह करता है ।
प्रवृत्तिवंशवर्णन
महामोह तेहि सम्भव सुत अति लायका ॥ गर्व अति बलवान विजय रण शायका ॥ महाकोध अनुजै तेहि निकट अघोरता ॥ लोभ संगेतहि ठाढ आशा अधिक कठोरता ॥ तृष्णा वीर महाबलि अखिल संचारई ॥ को बांचे मेरी घात सो ऐसो विचारई ॥
विवेकसागर
(११)
जडता ताहि सखी संग मनकहँ राचई ॥ अहनिशि करत कोलाहल उमैं ना छाजई ॥
टीका-मनकी प्रवृत्ति स्त्री है उसके पुत्रोंको बतलाते हैं, हे धर्मदास ! उस प्रवृत्तिको सबसे बड़ा और योग्यपुत्र मोह उत्पन्न हुआ है । और दूसरा उनका गर्व महाबलवान और प्रवृत्ति की रक्षा करनेमें महा योद्धा रणबांकुरा है । महामोहका तीसरा भाई अर्थात् प्रवृत्तिका तीसरा पुत्र काम है और चौथा क्रोध है । ये दोनों बहुत ही मलीनता से पूर्ण हैं । मोहका पांचवाँ भाई और प्रवृत्तिका पांचवाँ पुत्र लोभ है जिसके साथ आशा और कठोरता दो बहिन रहती हैं । और तृष्णा वीरा भी उनके साथ है, वह महाबलवान है सर्वमें उसका संचार है, वह अपने मनमें ऐसा गर्व रखती है कि मुझसे कोई भी बच नहीं सकता । और जडता भी उसी तृष्णा के साथ रहती है जो मनको अत्यन्त प्यारी है । मनकी अत्यन्त प्रीति के कारण वह जडता सदा कोलाहल करती रहती है अर्थात् सदा द्रन्द्व उठाया करती है ।
यद्यपि इस ग्रन्थ में प्रवृत्ति की संतानके वर्णन करनेमें बहुत कुछ भूल हुई है क्योंकि तृष्णा जो स्त्रीलिंग शब्द है उसको पुँछिंग करके लिखा है और हंसमुक्तावलीके प्रसिद्ध टीकाकार श्रीभजनदासजीकी टीकामें भी ऐसा भूल पायी जाती है, तथापि यदि यह मानलिया जावे कि यह भूल ग्रन्थकर्ता और टीकाकारकी है सो ठीक नहीं है, क्योंकि वर्तमान कबीरपंथ के साहित्य भंडार में बहुत परिश्रम करनेपर भी जब एक भी ग्रन्थ लेखक भट्टाचार्य्योंकी कृपासे शुद्ध नहीं मिलता है तब ग्रन्थकार अथवा टीकाकारके ऊपर दोष कदापि नहीं आ सकता । इस कारण मूल प्रबोधच-
मोह परिवार
( ९२ )
विवेकसागर
न्द्रोदयनाटक जिसके आधारपर यह मोह और विवेकके युद्धकी कथा प्रचलित हुई है, उसके अनुसार प्रवृत्तिकी सन्तानका वर्णन नीचे लिखता हूँ। देखो श्रीअनाथदासजीकृत प्रबोधचन्द्रोदयनाटक—
दोहा-त्रिया युगल मनभूपके, तिन ढिग सब संपत्ति ॥ एक नाम प्रवृत्ति है, एक नाम निवृत्ति ॥ प्रथमै दल प्रवृत्तिको, वरणि कहौ विस्तार ॥ तेहि पाछे निवृत्तिको, वरणों सब परिवार ॥ प्रथमें पुत्र प्रवृत्तिके, भयो मोहैं भयभीत ॥ दूजो सूत उत्पत्ति भयो, कामैसकलरणजीत ॥ महाकूर भौ तीसरो, क्रोधै नाम अतितेज ॥ चौथो अतिदारुण भयो, लोभै पापको एज ॥ दमैं पुत्र भयो पश्चमो, छठो गर्वै परियार ॥ सातैं मदैं उत्पत्ति भयो, विकटवीर विकरार ॥ अष्टम पुत्र प्रवृत्तिके, नाम अर्धर्म कुरूप ॥ सुक्तिपंथते चरण गहि, डारत है भवकूप ॥ आठैं पुत्र प्रवृत्तिके, असत्य वासना धीर ॥ वर्णनकरोंकुटुम्ब अब, जो जाको सुत तीर ॥
मोहपरिवार
महामोहकी नारिप्रिय, मिथ्या दृष्टि प्रमान ॥ पुत्र तासु हंकार है, ममता वधू सुजान ॥
कामपरिवार
मदननारि रतिप्रकट है, लालच सुवन बखान ॥ लोलुपता ताकी वधू, रंच नहीं परमान ॥
१ प्रबोधचन्द्रोदय नाटक संस्कृतका वेदान्त विषयक एक प्रसिद्ध नाटक है।
लोभ परिवार
विवेकसागर
( १३ )
क्रोधपरिवार
क्रोध नारि हिंसा असत, ताको सुत अविचार ॥ भूल वधू ताकी कठिन, पोषै सब परिवार ॥
लोभपरिवार
तृष्णा स्त्री लोभ की, ताको सुत है पाप ॥ चिन्ता त्रिय जाके चितै, करै सदा सन्ताप ॥
दम्भपरिवार
दंभ नारि आशा मलिन, ताको सुत पाखण्ड ॥ वधू अविद्या तासु तिय, भरमावे नौ खण्ड ॥
गर्वपरिवार
निन्दा वनिता गर्वकी, जाको अपयश पूत ॥ अपकीरति ताकी वधू, प्रकट निरंकुश धूत ॥
मदपरिवार
नारी मदकी ईषणा, जाके सुवन विरोध ॥ सा परधां ताकी, वधू, मेटै उरको बोध ॥
अधमपरिवार
अश्रद्धा नारि अधर्मकी, सुत असत्य बलवान ॥ विषय वधू आसक्ति पुनि, मेटै सुक्ति निधान ॥ आठ पुत्र कुटुम्ब यह, कहो भित्र विस्तार ॥ सुता प्रिया प्रवृत्ति की, बणीं तेहि परिवार ॥ जो अदया भगवान की, ताते भयो अज्ञान ॥ दीनी ताहि विवाहि सो, मोह हर्ष बलवान ॥ मिलि अज्ञान वासना, तिनते बहु संतान ॥ जेते लिखनेमो परै, तेते करौं बखान ॥ प्रथमै सुत संशय भयो, लै विशेष बहु भाव ॥
१ स्पर्धा ।
( ९४ )
विवेकसागर
आलस नींद अनर्थ पुनि, रजतम कपट चवाव ॥ कर्म असंयम तापत्रय, नानारोग विशाल ॥ यंत्र मंत्र नाटक घने, अरु प्रपंच जंगजाल ॥ और अर्घत धृष्टता, व्याकुलता अति चाह ॥ भुक्ति कामना कृपणता, जनमन कर उरदाय ॥ अयश ईषणा विषमता, अकृपा कुटिलता नाम ॥ इत्यादिक औरै घने, कहे काम दुख धाम ॥ असत्य वासनाके भये, पुत्र प्रचण्ड अनेक ॥ सुता भयी पुनि जगमती, भूली कुलकी टेक ॥ पुत्र वासना को बली, असत्संग आलस्य ॥ लै विशेष मंत्री तिने, करि राख्यो नृप वस्य ॥ सेना बहुत मोहकी, वर्णन बने न सोय ॥ पलमें हैरै विवेक बल, रहै ममता रस भोय ॥ महा कुन्यायी अति छली, चंचल बली कुटेव ॥ जग पोषक दोषक सुमत, करै मोह पद सेव ॥
छन्द-छाजतसेनमदमोहमंसा, क्रोध दारुणभटमहा ॥
आशातृष्णा तेहि भंडारी, विभौकी काँछाकहा ॥
टीका-सद्गुरु कहते हैं हे धर्मदास ! इस प्रकारसे प्रवृत्ति की सेना मोह, मद महावीर क्रोध से सुशोभित होरही है । और आशा, तृष्णा, भंडारी है जो चाहे कितना भी उसके भण्डारमें आवे किन्तु कभी उसकी तृप्ति नहीं होती है । जब मन
१ वाजीगरी हाथ चालाकीका काम । २ बेशर्मी निलंज्जता बे अदनी इस अष्टता के स्थानमें एक पुस्तक में अष्टता लिखा पाया गया है, यदि अष्टता यहां माना जाय तो वह अष्टताका विशेषण हो जायगा जिसका अर्थ होगा आगे चलानेवाली अष्टता और अष्टता प्रधान है जहाँ किन्तु इसकी अपेक्षा अष्टता शब्द यहां अधिक उपयुक्त है इस कारणसे अष्टताही लिखा है ।
निवृत्ति वंशवर्णन
विवेकसागर
( ९५ )
राजाकी प्रवृत्तिका यह ठाटवाट तब है मनको अन्य विभौकी इच्छा कहाँसे होवे ।
अथ निवृत्तिवंश वर्णन
निवृत्ति दूजी अंगना जिहि तिहि मन राजा थोरो चहै ॥ प्रवृत्ति पूजा गति न दूजा ताहि चित निशिदिन रहै ॥
टीका-उस मन राजाकी दूसरी स्त्री निवृत्ति है जिससे मन प्रेम नहीं करता क्योंकि मन प्रवृत्ति नामक स्त्रीमें ऐसा लुब्ध रहता है कि दिन रात उसके बिना मनको क्षणमात्र भी कल नहीं पड़ता है।
तेहि सुत जनेउ विवेक परम दृढ़ आसना ॥
सात्त्विक अस्त्र ले हाथ खड़्ग सो शासना ॥
टीका-उस मन राजाकी निवृत्ति नामक स्त्रीमें विवेक नामका पुत्र उत्पन्न हुआ सो विवेक निश्चल और दृढ़ आसनवाला है और उसने अपने हाथमें सतोगुणका अस्त्र ग्रहण किया है ।
वस्तु विचार, क्षमा दया तेहि आता भयो ।
तेहिको अनुज संतोष अतिहि आनन्द ठयो ॥
विद्या ताहि सहेली नीति बिचारई ॥
शील सनेह, सिखावन, पाठ सुधारई ॥
टीका-विवेक के और भी भाई बहिन उत्पन्न हुए । वस्तु विचार, क्षमा, दया, संतोष, विद्या, नीति, शील, सनेह, शिक्षा-पन और अध्ययन इत्यादि निवृत्तिकी संतान इत्यादि प्रकट हुई । प्र० चं० ना० श्रीअ० दा० जी कृत ।
दोहा-अब रानी निवृत्तिको, वणों सब परिवार ॥
जाके श्रवण बिचारते, मिटै कुमति संसार ॥
सुत विवेक प्रथमे भयो, बड उदार गुण धाम ॥
दूजो वस्तु विचार पुनि, हरे कामना काम ॥
तीजे सुत धीरज भयो, अचल वीर सुखकन्द ॥
विवेक परिवार
( ९६ )
विवेकसागर
चौथो सुत संतोष पुनि, हरे सकल जग द्रन्द ॥ पञ्चम पुत्रसु है मुक्ति धाम सुख रूप ॥ छठौ पुत्र पुनि शील है, लक्षण सबै अनूप ॥ धर्म पुत्र भयो सातवों कुलमण्डन अतिधीर ॥ अष्टम सुत बैराग है, मेटै ताप शरीर ॥ विष्णुभक्ति कन्या भयी, लक्षण सब गम्भीर ॥ सुवन सबै निरवृत्तिके, करै मोह उर पीर ॥ ये रानी निवृत्ति के करै, आठ पुत्र अति शूर ॥ भक्ति सुता कुलपोषिनी, करै कुमतिको दूर ॥ अब इनके सुत त्रिय बधू, बरणि कहौं तिन नाम ॥ मुक्ति पंथ अनुकूल सब, पुनि सुख प्रति अभिराम ॥
विवेकपरिवार
रानी रायविवेक की, ब्रह्मसुविद्या नाम ॥ पुत्र ज्ञान आनन्द त्रिय, ता असंग सुखधाम ॥
विचारपरिवार
रानी राय विचार की, निश्चय पूरण काम ॥ पुत्र नेम दृढता बधू, भय मिटै सुखधाम ॥ धीरज की त्रिय है क्षमा, हरे क्रोध को ताप ॥ पुत्र आर्जव गर्व हर, मुदिता बधू अलाप ॥
संतोषपरिवार
तृप्ति नारि संतोष की, जाको सुत आनन्द ॥ करुणा बधू अनूप है, भय मेटै सुखकन्द ॥
सत्यपरिवार
सत्यनारि निज साधुता, सुत निष्कपट उदार ॥ जिज्ञासा ताकी बधू, प्यारी सब परिवार ॥
शील परिवार
विवेकसागर
( १७ )
शीलपरिवार
शील नारि लब्धा सुभग, प्रलय करै उरझूल ॥ सुयश सुवन कीरति बधू, शुभ मार्ग अनुकूल ॥
धर्मपरिवार
श्रद्धा नारि सो धर्म की, सुत प्रकाशता नाम ॥ सुता भयी सतवासना, बधू साधता जाम ॥
वैराग्यपरिवार
रानी निज वैराग्य की, उदासीनता नाम ॥ सुत अभ्यास निराशता, बधू सकल सुखधाम ॥ प्रवृत्ति सौत सिहात सो देखत परजरी ॥ सबहि सुनत हँकार पौरुष बातें करी ॥ धिग सुत तुव पुरुषार्थ मृतक लेखऊँ ॥ सौतिन सुनत विदार मरण निज पेशऊँ ॥
टीका—हे धर्मदास ! इस प्रकारसे मन राजाकी दोनों स्त्रियोंके परिवार हुए उनमेंसे प्रवृत्तिके वंशकी अत्यन्त वृद्धि होने पर भी वह निवृत्तिके वंशको देखकर सिहाती है । इससे अपने सब पुत्रोंको बुलाकर कहती है कि हे पुत्रो ! तुम्हारे पुरुषार्थको धिक्कार है । सौतनके वंशकी वृद्धि देखकर मेरा कलेजा जलता है । इससे यातो तुम निवृत्तिके पुत्रोंको मारकर मेरेको सन्तोष दो नहीं तो अपनी मृत्युकी राह देखो ।
महामोह सुनि गरजेउ मातुल सूनियो ॥ तुव आज्ञा होय निपातों चितकितगूनियो ॥ विवेकहिं आदि सँहारु नेक न बाँचई ॥ करूँ निकंटक राज प्रश्न मन राँचई ॥
( ९८ )
विवेकसागर
छन्द-प्रश्न राचे कोइ न वाचे कटक देखत रिपु डरे ॥ ब्रह्माण्ड कंपे अखिल झंपे इंद्र दशदिश खरभरे ॥ विविधआयुध युत्थयुत्थप सुभट जहँ तहँ तरजहीं ॥ पव पात सम अवघात मनो एकएकन गर्जहीं ॥
टीका—हे धर्मदास ! प्रवृत्तिके उपर्युक्त वचनको सुनकर मोहने कहा कि हे माता ! आप चित्तमें इतनी चिन्ता क्यों करती है ? आप आज्ञा देवें तो विवेक आदि निवृत्ति आदिके समस्त परिवारको नाश करहूँ । मेरे मनमें तो सदा ऐसी लगी रहती है कि, विवेक आदि सबको मारकर निष्कण्टक राज कहूँ । अब तो आपके मनमें भी जब ये बात आई है और आपने मुझसे पूछा है तब मैं अपनी प्रबल सेनाके साथ विवेकका सर्व नाश कर दूँगा । मेरी सेना ऐसी प्रबल है कि, जिसके तेजसे ब्रह्माण्ड भी कम्पायमान होता है । मेरे इस प्रबल सेनाको देख करके शत्रुकी सेना कभी धीरज नहीं धारण कर सकेगी । मेरी सेना अखिल ब्रह्माण्डको आच्छादन करनेवाली है । इन्द्र जो देवतों का राजा है वह भी मेरी सेनाको देखकर घबरा जाता है ॥
मेरी सेनाके योद्धा लोगों ने नाना प्रकारके अस्त्र शस्त्र धारण किये हैं और एक २ बारकी गर्जनाही ऐसी है जिसको सुनकर पवनके झपाटे लगनेसे समान सब गिर जाते हैं ।
हे धर्मदास ! इस प्रकारसे मोह अपनी शूरता और प्रतापका बखान करके, माताकी आज्ञा पाकर विवेकराजासे युद्ध करनेको रवाना हुआ ॥
जननी कहँ शिर नाय समर शीघ्रहि चले ॥ युत्थप दंभ समाज कहत रिपु दलमले ॥
विवेकसागर
( ९१ )
टीका-माताको नमस्कार करके दम्भके समाजको आगे करके मोह राजा विवेकके सन्मुख आया। तब विवेक उसकी चमक दमकको देखकर घबराने लगा। विवेकको घबराते देखकर निवृत्तिकी सहेली विद्याने निवृत्तिसे जाकर सब वृत्तांत कहा।
विद्या जाय निवृत्तिहि बात जनायउ ॥
तब सौतिन सुतन अनुज विरोधहिं आयउ ॥
टीका-विद्याने निवृत्तिसे कहा कि, तुम्हारी सौत प्रवृत्तिके पुत्र तुम्हारे पुत्रसे विरोध करके युद्ध करनेको आये हैं और।
चाहत बन्धु विमातहि तुरति घातऊँ ॥
छाड़ै नेक न काहू सबहि निपातऊँ ॥
टीका-और वह ऐसी इच्छा रखता है कि, तुम्हारे सब पुत्रोंका नाश करके एकको भी जीता न छोड़े ॥
निवृत्ति निज दूतहि धर्म बुलायउ ॥
ताते सुत कह बुलाई भाव बुझायउ ॥
टीका-विद्याकी बातको सुनकर निवृत्तिने अपने दूत द्वारा धर्म आदि सब पुत्रोंको बुलाकर उसने कहा कि,
बन्धु विमातिकधरि सो, रणयुत्थ आवहीं ॥
समर सोई सुन ठयो पराजय पावहीं ॥
सुमता करि सब सुन्दर मंत्र विचारहूँ ॥
दुविधा अरि अज्ञान सो जानि सँभारहूँ ॥
टीका-निवृत्ति अपने पुत्रोंसे कहती है हे पुत्रौ ! देखो तुम्हारे सोतेले भाई सब तुमपर चढ आये हैं और युद्ध करके तुम्हारा नाश
प्रवृत्तिकी ईर्षा और युद्धका मूल विवेक का संविन्यासे मन्त्र विचार
(१००)
विवेकसागर
करना चाहते हैं इस कारण तुम्हें अब उचित है कि, परस्परसुमति करके ऐसा उपाय विचारो जिसमें उसने अपनी रक्षा कर सको।
दृढता दण्ड विमलचित धीरज दीजिये ॥
दया पताका साजि समर सुत कीजिये ॥
टीका-निवृत्ति कहती है हे पुत्रो ! दृढता और राग द्वेष रहितता और धीरज द्वारा परस्पर एकमेक होकर दयारूपी पताका को फहराते हुए तुम भी युद्धके लिये परस्थान करो ।
छन्द--पार्ई शिक्षा भयी इच्छा भूमिरणसर सजि चले ॥
आनन्द तबल बजाय तब रिपु सेन चाहत दलमलै ॥
मद मोह आदि विराजता सब ध्वजा ईर्षासजावहीं ॥
निजमूर्खताको दण्ड गहि ममता निशान बजावहीं ॥
टीका-इस प्रकार जब निवृत्ति अपने पुत्रोंको आह्वा दे चुकी तब विवेक राजा अत्यन्त दृढ इच्छाके साथ आनन्दका धौसा बजाकर इस उत्साहके साथ सेना लेकर रणभूमिको चले मानो तत्कालही शत्रुके दलका नाश कर देंगे ।
विवेककी सेनाको ऐसे ठाटबाटसे आती देखकर मोह राजा अपने सब भाइयोंके साथ ईर्षाकी पताका स्वरूपकी अज्ञानताका दण्ड और ममताका निशान लेकर आगे बढ़ा ॥
तब विवेक निजमन्त्री तुरंत हँकारेऊँ ॥
कहु मन्त्री दृढ आगम समा विचारऊँ ॥
टीका-मोहराजाकी सेना रणमें प्रस्तुत देखकर विवेक राजाने अपने मंत्रियोंसे संमति पूछी कि, हे मित्रवरो ! समयानुसार विचार बतलाइये जिससे मोह राजाको प्राप्त कर सकें ।
लड़ाईकी तय्यारी
विवेकसागर
(१०१)
सुमती कहे सुनु पुंगव मतिके आगरा ॥ समर वृद्धिके कीजे जगत उजागरा ॥ प्रथमहीं दूत पठाय नीति बहु विधि कहो ॥ नहि माने सतभाय तबहि आयुध गहो ॥
टीका—विवेक राजाके पूछनेपर सुमतिने कहा कि, हे राजन् ! आप बुद्धिमान हो विग्रह करनेमें जहाँतक हो विचार कर कार्य करना चाहिये । प्रथम दूत भेजकर मोहको बहुत प्रकारसे नीति द्वारा समझाइये यदि वह मान जाय तब तो ठीक ही है और नहीं तो फिर पीछे हथियार उठाकर युद्ध करना चाहिये ॥
शील दूत कहैं बोली शिशुवापन दीनेऊ ॥ चलयो तुरत शिर नाय विदा जब कीनेऊ ॥
टीका—हे धर्मदास ! जब सुमतिने इस प्रकारसे कहकर नीति का मार्ग बताया तब विवेक राजाने शीलको बुलाकर कहा कि, हे शील ! आप दूत बनकर मोहराजाके पास जाओ । और जो कुछ मोह राजासे कहना था वह सब अच्छी प्रकार शीलको सिखाकर विदा किया । फिर तो शीलविवेकके पाससे चल कर मोह राजाके दरबारमें पहुँचा ॥
मोह आदि भ्राता जे सबहि सुनायऊ ॥ बन्धु विमात संदेश सो सबहि बुझायऊ ॥
टीका—शील दूतने मोह राजाकी सभामें जहाँ सब भाइयों सहित मोह राजा बैठा था पहुँच उसके सौतेले भाई विवेकका संदेश सुनाया ॥
कारण कौन विरोधेऊ बोलहु नागरा ॥ बन्धव सम होय कीजे राज उजागरा ॥
(१०२)
विवेकसागर
टीका-शीलने मोहकी सभामें कहा कि, हे चतुर राजा मोह ! किस कारणसे आपने विरोध ठाना है सो कहिये, आपको तो सब भाइयोंके साथ मिलकर पूर्ण शक्तिके साथ राज्य करना चाहिये ! देखिये तो-
मन राजा तुवतात त्रिभुवनपति स्वामिया ॥
शुभ अरु अशुभको कारण अन्तर्यामिया ॥
अनुमादिक अनुगामि अनुज त्रिदशपति ॥
तेहिके सुत कुमति कहा कीनी गति ॥
टीका-आपके पिता मनराजा जो हैं सो स्वर्ग (सत्तेगुण) मृत्युलोक (रजोगुण) और पाताल (तमोगुण) के राजा हैं तीनों लोकमें उनका आन फिरता है । और वही मनराजा शुभ अशुभ दोनोंका कारणस्वरूप हो अन्तर्यामी बना हुआ है ? हे मोह राजा ! आपके पिता आपके पीछे २ सदा आपको मद (काम) देते रहते हैं और जहाँ २ आप जाते हो सदा आपके पीछे वह भी जाते हैं । और आपके पिताका जन्म आपके पश्चात् होकर तेरहों भुवनके राजा बनते हैं । ऐसा समर्थ राजा मन उसके पुत्र होकर आपने यह कुमति क्यों ठानी है ।
अनुमादिक शब्द अनु और मादिक शब्दोंके संयोगसे बना है इसका अर्थ है अनु = पीछे । मादिक = मद करनेवाला अर्थात् पीछे जो मद अर्थात् काम करे उसे कहते हैं अनुमादिका । यहाँ मन जब प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब मोहकी प्रबलता होती है । मोहकी प्रबलता होने पर मन सदा उसको सहायता देता है ।
अनुगामी शब्दका अर्थ है पीछे चलनेवाला, जब मन प्रवृत्तिमें लुब्ध होता है तब सदा मोहके पीछेही पीछे दौड़ता रहता है अर्थात् जहाँ मोह दृढ़ होता है वहाँही मन भी लुब्ध होता है उससे अलग नहीं होता ।
अन्तर्यामी कहिये सवके अन्तर अर्थात् अन्तःकरण का जाननेवाला हो ।
विवेकसागर
(१०३)
अनुज कहते हैं (अनु = पीछे, ज = जन्मना) पीछे जन्म लेनेवा-लेको सो यहाँ मन को अनुज कहनेका तात्पर्य यह है कि जहाँ मोह नहीं हो वहाँ मन भी नहीं होता। इस शरीरमें मोह दृढ़ होनेहीसे मन की विशेष प्रवृत्ति इसमें होती है।
त्रयोदशपति (त्रयोदश = तेरह, पति = राजा) तेरह जो पांच ज्ञानेन्द्री और पांच कर्मेन्द्री तथा बुद्धि, चित्त, अहंकार इन तेरहों का राजा है। अर्थात् जब ये इंद्रियाँ विषयमें प्रवृत्त होती हैं तब मनमें उन विषयोंका राग उत्पन्न होता है। इन तेरहोंको पश्चात् उन विषयोंमें मन प्रगट होने पर भी आप सबका राजा बन जाता है। अर्थात् प्रथम इंद्रियाँ विषय को ग्रहण करती हैं पश्चात् मन उनके ऊपर राज करने लग जाता है, इंद्रियाँ सब मनकी आज्ञाकारिणी बनती हैं और मन उनका शासक राजा बनता है।
छन्द-कुमति कीन्हो अयश दीन्हो बन्धु चित्त धरिबूझिये ॥ अंत गर्व न रहत काहू मिथ्या आश न कीजिये ॥ भुनत मोह राज समाज युत्थप क्रोध दारुण खर भरचो ॥ चाहत संघारन दूतको जिमि आज्य अनिल में परचो ॥
टीका-शीलने कहा है मोहराज ! ऐसे प्रतापी जो आपके पिता मन राजा हैं उनको भी आपने अपने इस विरोधसे अय-शका भागी बनाया है। सब यही कहेंगे कि देखो मनराजा ऐसा हो गया है कि अपने पुत्रोंको भी सम्हाल नहीं ले सकता, उसके पुत्र सब स्वतन्त्र बनकर परस्पर कटे मरते हैं। इस हेतु हे मोह-राजा ! आप कुमतिके कहनेमें न आकर बन्धु विरोधमत कीजिये। और यदि इस बात को नहीं मानते हैं तब इस बातको स्मरण
(१०४)
विवेकसागर
रखिये कि, गर्व किसीको रहा नहीं हैं इस लिये मिथ्या आशा को छोड़कर सब भाई प्रेमपूर्वक राज्य करो ।
हे धर्मदास ! शील दूतके उपर्युक्त शिक्षाप्रद वचन सुनकर मोह राजा सहित उसके सर्व समाज और सेनाभरमें कठिन क्रोधका आविर्भाव हुआ । सब चारों ओरसे लाल र आखें करके शीलको इस प्रकार देखने लगे मानो उसे नाश करनाही चाहते हैं । शीलदूतको विवेक राजाने तो समझा बुझाकर मोहको युद्धसे रोकने और सन्धि कराने के लिये भेजा था, किन्तु दूतके वचनने मोह के समाजमें उल्टाही फल प्रगट किया । जिस प्रकार जलती हुई अग्निमें घृत पडनेसे उसकी ज्वाला और भी बढ़ती है उसी प्रकार मोहकी सेनाका क्रोध अधिक बढ़ गया । मोहराजाने उसी क्रोधके आवेशमें शीलसे कहा ।
जाय कहौ निजनाथही जो उबरन चहै ॥ भागै तजि पितुराज मौनव्रत गहि रहै ॥
टीका-मोहने कहा है शील ! अपने राजा से जाकर कहो कि, यदि वह अपना कुशल चाहता है तो चुपचाप पिता (मन) के राजसे निकल कर अन्यत्र भाग जावे । अथवा यदि राज्यमें रहनाही है तो मौनव्रत धारण करके अपना कालक्षेप करले ।
मोह राजाके ऐसे गर्वित वचन को सुनकर शीलदूत विवेक राजाके पास पहुँचा ।
दूत वचन प्रति उत्तर आय सुनायउ ॥ सुनत विवेक समाज निशान बजायउ ॥
टीका-शीलने विवेक राजाके सम्मुख आकर मोह राजाके दरबारमें जो जो कुछ बीता था सब सुनाय दिया । जब विवेक-
युद्ध वर्णन
विवेकसागर
(१०५)
ने देखा कि मोहराजा किसी प्रकार नहीं मानता तब युद्धके लिये प्रस्थान करनेकी आज्ञा देदी । आज्ञा पातेही निशानदार सबसे पहले निशान लेकर आगे निकला और उसके साथ ही साथ बाजेवाले भी रणका बाजा बजाते हुए रवाने हुए ॥
महा मोह कुलाहल रिपुदल आयुक्त ॥
अहं डिम्भ युत्थ व्याकुल बहुत सिधायुक्त ॥
टीका-इधर तो विवेक राजाकी सेनाने चढ़ायी की । उधर शील दूतको कड़ी २ बातोंको सुनाकर मोह राजा विवेक राजाको भय-भीत जानकर आनन्द विलासमें अचेत हो गया । इतनेहीमें विवेक राजाके दलके निकट पहुँचने पर दूतोंने जाकर मोह राजाको समाचार दिया कि, विवेक राजाकी सेना युद्ध करनेके लिये सजग होकर आगयी है । दूतके वज्र समान वचनको सुनते ही मोह राजाकी सेनाभरमें कोलाहल मच गया । अहंकार सेना और दम्भ दोनोंही सेनापति बहुत व्याकुल होगये और अपनी सेनाको लेकर वेभी आगे बढ़े । डिम्भ शब्द दम्भ शब्दका अपभ्रंश है ॥
(मोहवश हो देहाभिमानमें पड़े हुए विषयासक्त मनुष्योंके हृदयमें सत्संग और सत्शास्त्रोंके श्रवण द्वारा जब विवेक प्रवेश करने लगता है उस समय हृदयमें घबराहट उत्पन्न होती है )
चल्यो तुरत गहि शूल कुबुद्धि आयुध गह्यो ॥
समर युक्त है आयो अघमंत्री कह्यो ॥
टीका-घबराहटमें पड़ा हुआ मोह राजा पापमंत्रीके कहनेसे स्वयम् शूल और कुबुद्धि शास्त्रोंको धारण कर युद्ध करनेके लिये तैयार हो आया । राजाको स्वयं रणमें जानेके लिये प्रस्तुत
काम और सुभतिका युद्ध
( १०६ )
विवेकसागर
देखकर सेनापतियोंमें से काम सेनापति हाथ जोड़कर कहने लगा ॥ कामसेन सेनापति तेहि शिर नायऊ ॥ हे स्वामी केहि कारण निजहिं सिधारहु ॥
टीका-सेनापति कामसेन शिर नवा करके मोह राजासे कहने लगा कि हे स्वामी ! आप स्वयम् युद्धके लिये क्यों जाते हैं ?
आज्ञा करौ विवेकहिं गहिलै आवऊँ ॥
भ्राता सब सेनापति तुरत बँधावऊँ ॥
टीका-हे राजन् ! यदि आप आज्ञा करो तो राजाको उसके सब भाइयों और सेनापतियों सहित बांधकर ले आऊँ । कामसेनकी युक्ति और उत्साहपूर्वक वचनको सुनकर मोहराजाने उसे युद्धमें जानेकी आज्ञा दी । तब-
आयसु मांगि चले तब रिणुदल आयऊ ॥
रदपट फरकत आतुल वचन सुनायऊ ॥
टीका-मोह राजासे आज्ञा मांगकर काम विवेक राजाके दलके सन्मुख आकर उपस्थित हुआ । उस समय कामके हाँठ क्रोधके मारे फरक रहे थे । क्रोधके आवेशमें आकर कामने विवेक-राजाकी ओर सम्बोधन करके बहुत आतुरतासे कहना आरम्भ किया । रद = दांतपट = परदा अर्थात् दांतोंका परदा हाँठ ॥
रे विवेक तोहि कच धरि तुरत संहारि हैं ॥
मोहि देखत कौन सो मूल उच्चारि हैं ॥
टीका-काम विवेकराजासे कहता है रे विवेक ! देख अभी तेरे बाल पकड़कर मैं तेरा नाश कर देता हूँ । देखे कौन मेरे सम्मुख शब्द भी बोल सकता है ? मैं तेरा मूल नाश करता हूँ ।
( अन्तःकरण जब शुद्ध हो जाता है तब उसी शुद्ध अन्तःकरण
विवेकसागर
(१०७)
में विवेक प्रगट होता । इस कारण विवेकका मूल शुद्ध अन्तःकरण है जिस समय मनुष्यको काम उत्पन्न होता है उस समय अन्तःकरण मलिन वासना और देहाभिमानसे पूर्ण हो जाता है तब शुद्धान्तःकरणका अभाव होकर मलिन अन्तःकरणका प्रादुर्भाव होता है ) ॥
मूल गही उधार डारूँ मोसन करत सरभरै ॥
विचार सुनि बोलत विवेकहि संपुट युगकरधरै ॥
टीका—काम कहता है रे विवेक तू क्या मेरी बराबरी करना चाहता है ? मैं तेरे मूलको ही उखाड़ कर फेंक दूँगा । कामके ऐसे अहंकार युत वचनको सुनकर विचारने राजा विवेकसे हाथ जोड़कर विनय किया कि—
सुनु सुमतिनायक परमलायक दास कौतुक देखिये ॥ काम क्रोध अभिमानिया नट चेटका सम लेखिये ॥
टीका—हे सुमतिके मालिक परम योग्य विवेकराजा ! इन काम क्रोध और अभिमानादिकोंको नाटकी चेटकियोंके समान जानिये । इनका बलही क्या ? सुझा दासके कौतुकको देखिये । इस प्रकार विनय करके और विवेककी आज्ञा लेकर विचार रणमें कामके सम्मुख उपस्थित हुआ ॥
एक दिशि गर्जत काम विचार तब उभय दिशा ॥ काम करत बल जब अंत तब तरजत रसा ॥
टीका—हे धर्मदास ! अब एक ओर तो महा दुर्धर्ष काम गरजने लगा और दूसरी ओर विचार अपना प्रकाश फैलाने लगा । अब दोनोंका युद्ध होना आरम्भ हुआ । कामने जब अपना पौरुष कहके सुनाया, तब विचारने उसको तुच्छ बताया विचारके मुखसे तिरस्कारके वचन सुनकर काम कहने लगा ॥
(१०८)
विवेकसागर
रे विचार मतिहीन सकल वशि मैं कियो ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश सबहि ताजन दियो ॥
टीका-काम कहता है रे मतिहीन विचार ! तेरी क्या विसात है, मैंने सब चराचरको अपने वशमें कर लिया है । औरकी कौन कहै ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सबको मैंने ताजन दिया है, (मारा है) । इतनेही नहीं मेरे बलका प्रताप तू और सुनले ।
सुरपति शसि द्वि राते गौतम त्रिय कही ॥
विवेक विचार जो थाके बासा मैं गही ॥
टीका-रे विचार ! सुन जिस समय मैंने इंद्र और चन्द्रमा को वशमें किया, तब उनकी बुद्धि नष्ट होगयी, विवेक विचार सब जाता रहा और मेरी आज्ञासेही परम पवित्र गौतम मुनिकी पतिव्रता स्त्रीको भ्रष्ट किया । उस समयभी मैंने तुम दोनों (विवेक और विचार) को पराजय किया था । इतनी ही नहीं और भी सुन ।
व्यास पिता मीन दुहिता रतिबर बस कियो ॥
सुमन शरासन बाण शिवहि बेध्यो हियो ॥
टीका-रे विचार व्यासके पिता परमज्ञान और विवेक विचार में प्रसिद्ध जो पराशर ऋषि थे उन्हींको जब मैंने अपना बाण मारा तब वहाँ भी तुम्हारा कोई बश नहीं चला, उन्हींने मछली के पेट से निकली मत्स्यगन्धा (मच्छोदरी) से नदी के बीचमें भोग किया । और जब मैंने अपने बाणका लक्ष्य शिवजी को बनाया तब उन्होंने कामातुर होकर मोहिनी को पकड़ने की इच्छा की ।
दोहा-कहि कहाय मनसिज हस्यो, बोल्यो वचन उदार ॥
मो सम्मुख जलपै कहा, मेरो बल अपार ॥
विवेकसागर
( १०९ )
मो रति अति दुस्तरण लखि, जीतैं मोहिं जग कोन ॥ ज्ञान विवेकै आहिदे, लखत मोहिं करि गौन ॥ पग नहिं टिकत सुधर्मको, नहिं धीरज ठहराय ॥ मेरी दृष्टि परतही, वैरागो नशि जाय ॥ मैं मन हरचो विरञ्चि को, निज पुत्री वश कीन ॥ शतंमख द्विजंजाया निरखी, भयो परम अर्धान ॥ है कोतो बल अंग तुव, अरे सुभट कहु मोहि ॥ मेटों मार विलम्ब नहिं, प्रलय करत हौं तोहि ॥ पछितान्यो कांप्यो हृदय, शोचत वस्तु विचार ॥ हौं निर्बल वैराग बिन, अहै सबल अतिमार ॥ वस्तु विचार फिरे तबै, महा समर भय मान ॥ तुरते राय विवेक पहैं, बन्धन कीन्है आन ॥ मन संकोचि दृग नीच करि, कहत वचन नृपपास ॥ मेरो बल पहुँचे नहीं, निष्फल भयी सब आस ॥ तब मन्त्री सत्संग कर, औ दूजी अभ्यास ॥ उत्तम मन्त्र विचार के, कहत नृपति के पास ॥ मकरध्वज भुज बल अमित, बाक वीर समरत्थ ॥ वस्तु विचार महाबली, करे ताहि निजहत्थ ॥ दीजै ताहि सहायको, भक्ति ज्ञान वैराग ॥ विजय करे रण सहजही, वस्तु विचार बडभाग ॥ सुनि विवेक मन सुख भयो, मान्यो मन्त्र हिय जु ॥ तीनों तुरत बुलाइके, ताके संग किय जु ॥ बल पायो फूलो हृदय, चले समर समुहाय ॥ मनसा भूमि सुहावनी, रचे युद्ध तहैं जाय ॥
१ इन्द्र । २ गौतमकी स्त्री । ३ कामदेव ।