कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
नरकका वर्णन
बोधसागर
(७७)
दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥
त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥
नरकको वर्णन
एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥
एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥
एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥
एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥
कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥
ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥
एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥
त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥
योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥
परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥
साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥
मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥
चौथाई
पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥
योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥
करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥
राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥
झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥
झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥
झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥
१ अच्छी तरहसे ।
(७८)
अमरसिंह बोध
बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥
स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥
पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥
अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥
एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥
एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥
काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥
जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥
संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥
ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥
ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥
साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥
साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥
चौपाई
नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥
जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥
राजा बचन
तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥
यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥
साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥
सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥
सतगुरु बचन-चौपाई
कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥
धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥
बोधसागर
(७९)
पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥
करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥
कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥
सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥
सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥
ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥
आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥
ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥
लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥
रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥
काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥
धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥
व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥
ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥
सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥
धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥
चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥
जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥
ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥
जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥
रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥
यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥
साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥
रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥
(८०)
अमरसिंह बोध
चोपाई
सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥
लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥
यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥
बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥
आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥
ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥
ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥
जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥
कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥
इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥
रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥
जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥
जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥
जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥
बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥
परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥
ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥
चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥
गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥
तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥
साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥
झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥
तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥
जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥
बोधसागर
(८१)
दान देत लखि भांजी मारै । योग्यअयोग्य जो नाहि उचारे ॥
पर तप मँह कर विघ्न अनेका । नहिं हिय मँह जो करत विवेका ॥
आप छूँछ औरन ब्रत टारै । वेद शास्त्र जिन नाहि उचारे ॥
हरि यश सुनत दहैं मन माहीं । दूसर सुनै तो चित विचलाहीं ॥
तिनकर देह सो कूकर भखहीं । पुनि असिपत्रमांझ दुख भरहीं ॥
एकहु अक्षर गुरुसों सीखै । ताहि न मानै मन कर तीखै ॥
ते परहीं नर रौरव माहीं । बहुविध दुख भुगतहिं सो ताहीं ॥
जे नर हरत दीनके प्रानन । मित्रहि मारत दाहत कानन ॥
तिनहि अँगारन मांझ सुतावैं । यमगण दारुन त्रास दिखावैं ॥
जे गुरुधन हारक संसारा । किम कूप मँह परत निहारा ॥
जौन गुरु व्यभिचारी होई । प्रजहिं दुःख देई नर जोई ॥
शिष्य शंक जो नाहिं मिटावत । प्रजहिं न्याय जो नाहिं चुकावत ॥
युक्त अयुक्त न जानत जोई । करत सपक्ष न्याय शठ कोई ॥
ते नर अंध तामिस्त्र मँझारे । गिरत लखे पावत दुख भारे ॥
विन देखे पर दोष गिनावैं । यम गण तिनके नैन टँकावैं ॥
अप्रिय वचन औरहीं कहहीं । कारण छेददुख ते शठ लहहीं ॥
देव साधु ब्राह्मण धन हरई । तृष्णावश लोभहिं मन धरई ॥
सूचीमुख नरकहिं कर नाऊँ । ते तहैं जाइ वसावैं गाऊँ ॥
जे परतिय अभिलाषत प्रानी । निन्दत सुर गुरु भूसुर जानीं ॥
धर्मशास्त्र तीरथ हरिजन कर । निन्दा करत सुनहु दुख तिनकर ॥
पहिले शूलन पर बैठावैं । मुद्गर शूलनसे करि घावैं ॥
पाछे काक श्वान तेहि खाहीं । छेदहिं दुख सुख हेरत नाहीं ॥
भोगी बहुत काल प्रिय नारी । त्यागत ताहि अधम अविचारी ॥
विनु वैराग ताहिको त्यागे । ताहि त्यागि औरिन मँह पागे ॥
सो शठ नरकमाँहिं दुख पावै । कहँ लग कहौं कहत नहिं आवै ॥
कर पद बाँधि यम सासत देहीं । जो जस किये सो तस फल लेहीं ॥
(८२)
अमरसिंह बोध
सूरज सुत जस आज्ञा देई । दूत उठाय सबै शिर लेई ॥
चित्रगुप्त सो लिखनी लेखै । धर्मराय न्याय तहैं पेखै ॥
सारखी-कै कमाई जो कछू, कभी न निष्फल जाय ॥
सात समुन्दर आडा परै, मिलै अगाऊ धाय ॥
भूमि ताभ्रमय तहां बनाई । तापर अग्नि प्रचण्ड बिछाई ॥
दहकत ज्वाला सो महि कैसी । अति दुस्सह प्रलयगिनि जैसी ॥
तहैं नर जाइ जरत दुख पावैं । यमगण हानि तेहि मांझ जरावैं ॥
तीव्र नख रद शूचीकच केते । पापिन कहैं दुख देहि सब तेते ॥
अति तनु कृश तनु बहु पापी । तहैं दुख पावत जन परितापी ॥
सांकरि बांधि बांधि गज लावैं । अति दृढ सुदूर हानि तेहि ढावैं ॥
दुख लहि जब इतउत नर धावैं । यमगण धरि तिहि माहिं गिरावैं ॥
पुनि निज कृतकर याद करावैं । परिघन हनि बहु त्रास दिखावैं ॥
तस थम्भ बहु ठाड रहावैं । पर तिय गामी ताहि सटावैं ॥
निज पति छोड परपुरुष लुभावैं । सोइ तिया तहैं लाइ मिलावैं ॥
यमगण ताहि मारि भिटावत । कर वचन पुनि ताहि सुनावत ॥
यमके दूत अस कहैं पुकारी । तबतौ तन मन सकल विसारी ॥
प्राण समान चही परनारी । अबकिन भेटेहु रुचि किमि मारी ॥
उन्नत कुच भुजभरि जिमि भेटे । मुख चुम्बन रति करि दुख मेटे ॥
रही जो तव जीवन जग नारी । यह सोइ अपर न करहु विचारी ॥
कलनहिछनजेहि विनतोहि पापी । मिलहु न तिय सँग करत अलापी ॥
यहि विधि यमगण वचन सुनावैं । हनि हनि अधमन खम्भ लगावैं ॥
मद पीवत सँग जे करि प्रीती । मांसहिं खाइ करत अनरीती ॥
तस तैल तेहि मारि पियाई । कहत मदहि पीवहु शठ आई ॥
हाहाकार करै जब सोई । करै विनती सो बहु रोई ॥
ता ऊपर तैलहिं सो डारैं । भीतर बाहर दोऊ विधि जारैं ॥
इतना करैं बहुरि सो आगे । करन शासना सो फिर लागे ॥
बोधसागर
(८३)
असिपत्र बिंपिन महाँ चलहूँ । खायो माँस सोई फल लहहूँ ॥
तहाँ अहँतरु दल अतिही तीखैँ । ऊपर परत कटत तनु दीखैँ ॥
रहत न बने तहाँ पुनि भाजत । करिविलापबहुविधिदुखपावत ॥
करि परघात पाल निज देही । कूटकरमबहु विधिकिय जेही ॥
ते असिपत्र नरक महाँ जावैं । पुनि रकटाइशिर दुख पावैं ॥
एक शिर काटि फेरि होइ आवै । बहुरि कटैं बहुरि है जावै ॥
जे परहिंसक अधम नरेशा । तेलयंत्र तनु पिसत इमेशा ॥
तेल चुराय जो जगमहाँ लेते । यमगण तेहि बहुत दुख देते ॥
तेल चोर कहीं तेल कराही । घृत चोरहिँ घृत माँझ गिराहीं ॥
जेपर दूध मधू दधि हरहीं । ते गण रक्त कुण्ड महाँ परहीं ॥
पाश बाँधि गल तेहि महाँ डारैं । यम गण दारुण त्रास विडारैं ॥
तीरथ चलत जानि फन हरहीं । ते नर रक्त पीब दह परहीं ॥
देव सदन महिसुर गुरुधामा । जे तोडत मन करहिँ अरामा ॥
बन वाटिका पुहम बहु छेदैं । मठ मखं भवन सुरभिधर भेदैं ॥
दीन भवन चटशाल गिरावैं । अस्थिचूर्ण महाँ ते दुख पावैं ॥
पर उपांनत वस्त्र शठ हरहीं । पर भोजन छिपाय जो धरहीं ॥
लोहयंत्र बिच ताहि पिरावैं । बहुविधि तेही दुःख दिखावैं ॥
जे नर घर पुर विपिन जरावत । अग्निकुण्ड तनु तासु गिरावत ॥
जे निज स्वामिहि दोष लगावैं । पर अपवाद प्रीति करि गावैं ॥
तिन कहीं नकं शाल्मली डारै । पाश बाँधि लटकात तरारै ॥
मुद्गर परिघन यमगण मारैं । निर्दय तनक न करूणा धारैं ॥
जो तिरिया परपति रत होई । नाथवती विधवा किन होई ॥
तस लोहमय खम्ब नराकृति । यम वशसे तेहि तिय भेटति ॥
लोह शूल खर तस विशाला । जीभ छेद मुख करत विहाला ॥
इमिदुख लहँहि अधम नरनारी । कहाँ लगिकहाँ सोलेहु विचारी ॥
१ यज्ञशाला । २ गोशाला । ३ जूता ।
चित्रगुप्तसे वार्तालाप
(८४)
अमरसिंह बोध
यहिविधिजोयम शासतिकरई । कहैं लगि कहौं पार नहिं परई ॥
सुनत हाल व्याकुल धर्मदासु । सुख प्रस्वेद नहिं आवै श्वासु ॥
देखि दशा सदगुरु बोले । केहि कारण धर्मनि तुम डोले ॥
धरि धीरज तब धर्मनि भाषा । नरककथासुनिभयमन भाखा ॥
धर्मदास वचन
हो साहेब यम बड विकरारा । केहि विधि हंसा पावे पारा ॥
यही भय मम मन महाँ आवै । चितवत चितव्याकुलहोयजावै
सतगुरु वचन
सुनत वचन प्रभु मन विहँसाये । कही शब्द धर्मनि समुझाये ॥
धर्मनि तुमही भय कलु नाही । सतगुरु शब्द है तुमरे पाही ॥
अपर कथा सुनहु चितधारी । संशय मिटै तो होहु सुखारी ॥
जब राजा विनती ममकीन्हा । तब हम ताहि दिलासा दीन्हा ॥
शब्द गहै सो नाहि डराई । तुम किमिडरहु सुनहु हो राई ॥
सत्य शब्द मम जे जिव पैहैं । काल फांस सो सबै नशैंहैं ॥
सुनत वचन राजा धरु धीरा । बोले वचन काल बलबीरा ॥
चित्रगुप्त वचन
है साहब तुम काह विचारो । नगर हमार उजारन धारो ॥
हो साहब जो तुम अस करहु । न्याय नीति सबही तुम हरहु ॥
सुनो साहेब एक बात हमारी । पंथ तुम्हारा चले संसारी ॥
ताते बिनती करैं बहोरी । सुनो गुसाइयाँ अरनो मोरी ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव अधिकारी । तीनकी आशजगतमहैं भारी ॥
उनको हम नहिं कबहु डरावैं । चूक चाल तो ताहि नचावैं ॥
और जीवकी कौन चलावे । हमते उबरन एको न पावे ॥
सीधि चाल चलुजीव सुजाना । सो जीव देहों लीक पयाना ॥
परंपंच करी साहेबको धावे । हम ते जीव जान नहिं पावे ॥
चाल चलत लागै बडिबारा । ताते नाहीं दोष हमारा ॥
बंकुच्छका वर्णन
बोधसागर
(८५)
सतगुरु वचन
ज्ञानी कहे सुनो जमराई । हमरो हंसा न्यार रहाई ॥
परंपंच तुमरो देखि डराये । जीवघात कबहू नहिं लाये ॥
निशिदिन जीव दया उर धारे । ज्ञान ग्रंथ मन माहिं बिचारे ॥
अहो यमराय जाहु वैकुंठा । राजा विष्णुसों करावहु भेटा ॥
चित्रगुप्त वचन
चित्रगुप्त उठे कर जोरी । साहेब चूक जो बखशो मोरी ॥
तुम हो धनी मैं दास तुम्हारा । अपने दिल हम कीन बिचारा ॥
साखी-इतना कही चलत भये, राजा लीना पास ॥
मध्य चौक ठाडे भये, देख्यो सबको बास ॥
चौपाई
अगिन कौन है इंद्र कुबेरा । दक्षिण दिशा है काल बसेरा ॥
नैऋत कौन सुरनको बासा । पश्चिम देवी कीन निवासा ॥
देव वास वायव है भाई । गण गंधर्व सुनि देव रहाई ॥
उत्तर दिशा भगवान जो होई । निज वैकुंठ कहावैं सोई ॥
कनक भूमि रतननकी पोती । बने वैकुंठ अधिक जग जोती ॥
सकल देव दर्शनको आये । लक्ष्मी सहित बैठे प्रभु राये ॥
राजा साथ हमहूँ चलि गयऊ । देखि विष्णु तब ठाडे भयऊ ॥
डारि सिंहासन बैठक दीना । आज सुफल तुम हमको कीना ॥
भले आय तुम दर्श दिखाये । भूपति लेइ कहाँ तुम लाये ॥
अमरसिंह वचन
ओ भगवान सुनो मम वानी । सेवा तुम्हरी निष्फल जानी ॥
हम एकोत्तर मंदिर बनावा । तामैं मूरति लै पधरावा ॥
साधु राखि मंदिरके मांही । छाजन भोजन दीना ताही ॥
जेता धर्म हम सुने पुराना । विप्रन कहे धरम ठिकाना ॥
सुरभी सोने सींग मढाई । पीतांबर पुनि ताहि ओढाई ॥
(८६)
अमरसिंह बोध
भगवान वचन
यहि विधि गौ एकशत भाई । दइ विप्रनको सुनो प्रभुराई ॥
यहि विधि सेवा कीन तुम्हारी । तहू कर्म तुम हम शिर डारी ॥
सुनु राजा तोहि कहिसमझाऊं । पाप करे कस धरो छिपाऊं ॥
राजालोक कर्म बहु धरहीं । जीव मारिके भक्षण करहीं ॥
तुरी चढ़े बन खेले शिकारा । नाहक मारै जीव बिचारा ॥
मारे जीव तुमहु सुनाई । इतनो पाप कहां धरो छिपाई ॥
साखी-चार खानमें भरमहु, कीनो कर्म अपार ॥
विष्णु कहै राजा सुनो, कैसे होइ उबार ॥
चौपाई
सतगुरु ऐसी जुगति बनाई । लीला करी एक तेहि ठाई ॥
नृप शिर हाथ धरचोतेहिवारी । निकसे कागमुखमांहिअपारी ॥
बहुत काग जरे उद्र मंझारा । बहुतक भये पिंडते न्यारा ॥
लखि भगवान रहे शरमाई । फेर बात ना बोले भाई ॥
ततखन हमहूँ चले रिगाई । पहुँचे मानसरोवर जाई ॥
कामिनि शोभा बहुत अपारा । राजापरचो तब चरण मँझारा ॥
दयावंत भल लोक दिखाई । जुत्थजुत्थकामिनिअधिकाई ॥
करे ध्यान पुरुषको जहयँ । चारभानुकी शोभा जहवाँ ॥
झलके अंगकामिनिके भाई । रैन दिवस तहांजानि न जाई ॥
सिंहासन एकधर्यो तेहि ठाई । चंद्रअंश तहां बैठक पाई ॥
भाव प्रीति साहेब सो कीना । भले ज्ञानी तुम दरशन दीना ॥
बैठे एक सिंहासन दोई । राजा संग इत पुनि सोई ॥
अहो अंश दया अब होई । राजाकूँ ले जाओ सोई ॥
चन्द्रअंश तब शीश नवाई । आतुर हम तब चले रिगाई ॥
ले राजा तब शरीर समाया । भूपति बेगि उठे अकुलाया ॥
तबही राजा शीश नवाई । हमको तारो बेग गुसाई ॥
बोधसागर
(८७)
सतगुरु बचन
राजा सुनो वचन अब मोरा । करो आरती तितुका तोरा ॥
धर्मदास सब तोहि सुनाई । अमरहिंको वैकुण्ठ दिखाई ॥
धर्मदास बचन
धर्मदास तब दोउ कर जोरा । दया करो तुम बंदीछोरा ॥
और कथा मोहि वरनि सुनाओ । दया करो जनि मोहि डुरावो ॥
धर्मदास मैं कहूं समुझाई । जो कह्यु भगति करी सो राई ॥
जेतक जीव मुक्ति पद पाई । सो अब तुमकूँ वरनि सुनाई ॥
अमरसिंह बचन
साखी-राजा शीश नमाइके, बिनति करै कर जोर ॥
हमको सतगुरु तारिये, हम सो अधम न ओर ॥
सतगुरु बचन -चौपाई
सुन हो राय तजो सुरखाई । युग कंकवत हम चल आई ॥
मानसिंह भूपति बड़ राजा । तासो कीना ज्ञान समाजा ॥
तीस लाख अरु सात हजार । इतने हंसलोक पग धारा ॥
युग परवान चौकरी गयऊ । इतने युग मोहि आवत भयऊ ॥
कहैं लेख पूछो राय सुजाना । अपने जीवको करो छुटाना ॥
छन्द-गुरुचरण पद्मपराग पावन मृदुल मंजुल सोहावनी ॥
तरु सम सील परकासते तिमिर मोह नशावनी ॥
करहिं आरती बिसरि जन उरमांहि जे नर लावहीं ॥
भक्ति ज्ञान वैराग्य प्रगटे मोक्षपद तब पावहीं ॥
अमरसिंह बचन
सोरठा-तव चरनन अनुराग, और न दूजी आस ॥
मैं किंकर पद लाग, करहु अनुग्रह दास पर ॥
छन्द-आदि ब्रह्म अर्चित अविगत आदि अदली गाइए ॥
अजर नाम अर्चित अमर अकह अविचल धाइए ॥
(८८)
अमरसिंह बोध
अक्षय नाम आनंदरूपी अखिल सम अस्थिर मही ॥
अधम उधारण अखिलपति अखंडसरूपी हौ सही ॥
सोरठा-हंस उवारण नाम, हंसराज हंसनपति ॥
हंस श्रवण सुखधाम, सारशब्द दातार गुरु ॥
चौपाई
मैं कृमि गुरुभुंगी होय आये । अमी पिलाइके रूप फिराये ॥
मैं हूं लोह कुधात कहाया । गुरु पारस मोहि हेमबनाया ॥
एक मुख महिमा कही न जाई । जो मुख कहूँ पदमसत पाई ॥
जिमि पंछीका जोडा होई । नर नारी जुग बंध है सोई ॥
जिमि मोहि शब्द दीन गुरुराई । तिमि रानीको करिय मुक्ताई ॥
तुम बैदिछोर सबै विधिलायक । हम हैं जीव अकाम अलायक ॥
तेहि ते अरज करौ प्रभु साई । करि दया जिव मुक्ताऊ भाई ॥
तानी बचन
सुनो अमर हम कहे तुम सो । करनी बने करो कछु तुम सो ॥
हम कहे सोइ सुन तुम राई । भक्ति करो अब सुरति लगाई ॥
तन मन धन साहेबको दीना । शिरके साटे भक्ती लीन्हा ॥
रंभा नाम पुरेथंकी नारी । गुरु सेवामें रहे हुशियारी ॥
राजा बचन
तब राजा गुरुसे विनती कीना । अपनाकर मोहि निजकर लीना ॥
अब साहेब परवाना दीजे । जो कछु कहो सोई हम कीजे ॥
कौन वस्तु आनू गुरुदेवा । सो साहेब भाषो मोहि भेवा ॥
जेहि विधि तरन होय भवसागर । शब्द सरूप कहो तुम नागर ॥
साखी-मुक्त लोक जाते मिले जहां पुरुष अस्थान ॥
जरा मरण व्यापे नहीं सदा पुरुषको ध्यान ॥
१ पुरेय शब्द राजा अमरसिंहका सम्बोधन है।
राजाका कबीर साहबकी आज्ञासे चौका आरती करना
बोधसागर
(८९)
ज्ञानी बचन-चौपाई
भलमत बुझे राय ते मोही । निज गत कहूं बचन हट तोही ॥
तब हम दीन सिखापन राजा । जाते होय जीवका काजा ॥
साखी-चौदा कदली खंभ ले, उत्तम ठौर गडाय ॥
मध्य चैंदवा बांधिये, सिंहासन कनक बनाय ॥
चौपाई
गजमुक्ताहल थाल भराई । चन्दन चूनको चौक पुराई ॥
कंचनके पनवारा करहू । कंचन झारी जल भर धरहू ॥
तीन हजार मँगाये पाना । कंद पसेरी सात प्रमाना ॥
सात पसेरी मिष्टान्न मँगाओ । छतिस नारियल संगहि लाओ ॥
डुइसै एकतिस आनु सुपारी । तितनी खारक कहूं संभारी ॥
एतिक लौंग इलायची धारी । मेवा अष्ट लाओ यहि वारी ॥
मिर्च जायफल आनो भाई । द्राख जावत्री बेगि मँगाई ॥
शकर बदाम कपूर बखाना । सात हाथ बस्तर परवाना ॥
कंचनथाल गजमोती भराओ । मध्य आ ती मानिक धराओ ॥
कंचन कलस धरो बहु भांती । तापर बारो पाँचो बाती ॥
फूल चमेली अगर मगाई । परिमल और सुगंध धराई ॥
नाना पुष्प बताये माला । सब कछु आनि धरे ततकाला ॥
तब हम बैठे सिंहासन जाई । सकल समाज शब्द धुनि गाई ॥
अर्चित नामका चौका कीन्हा । ततक्षण थार हाथमें लीन्हा ॥
ठाढे सकल लोग अनुरागा । शब्द विरह सबहिन मिलि पागा ॥
दिवस कोकिला जिमि आनंदा । सकल हंस तिमि आनैंदकंदा ॥
तब हम बैठे थार धराई । अति आधीन परे सब पाई ॥
जब हम नारियल लीन्हा हाथा । सकल जीव तब भये सनाथा ॥
नरियल मोरि अंसगहि लीना । तितुका तोर परवाना दीना ॥
भय छूटे जप निरभे नामा । सतगुरु नाम भए विशरामा ॥
राजारानीका सत्यलोक जाना
(१०)
अमरसिंह बोध
कालजालते हंस छुडाये । राजा रानी भक्ति मन लाये ॥
सारखी-राजा रानी प्रेमसे, और सकल जिव साथ ॥
नाम पान सबहिन दिये, मस्तक धरिके हाथ ॥
चौपाई
कीन्हा दंडवत् सब बहु भांती । राजा रानि पुत्र औ नाती ॥
पुरेथभाणसा लीनो पाना । रंभा नाम पुरेथनी जाना ॥
तबही दिवान खेमसिंह आये । नर नारी परे गुरुके पाये ॥
आये बखशी लीन्हा पाना । भाव भक्ति मनमाहि समाना ॥
नाम रतनचंद्र कहे कर जोरी । दया करो मम बंधन छोरी ॥
आये चौधरी प्रेमचंद नामा । तन मन अरपी कीन्ह प्रनामा ॥
तबहीं शेष शामजा आये । प्रेमभावसे शीश नवाये ॥
और जीव बहु लीन्हा पाना । सबको चित्त गुरुचरण समाना ॥
छन्द-राजा खडा करे विनती प्रभु दीनबंधु दयाल हो ॥
हंस नायक प्रभू लायक शब्द दीन्हा रसाल हो ॥
जेहि खोज ऋषि मुनि नारद ब्रह्मा हरि हर थक रहे ॥
नहि पार पावत शारदा सोह नाम सतगुरु मोहिं दिये ॥
सोरठा-मोहि अनुग्रह कीन्ह, दास जानि दाया करी ॥
भक्तिदान मोहिं दीन्ह, लेह चलो समरापुरी ॥
ज्ञानी बचन-चौपाई
ज्ञानी कहे सुनो हो राऊ । तुमरी अवध सो सबै रहाऊ ॥
एते दिवस रहो भवसागर । पीछे चलो लोक कहैं नागर ॥
राजा रानी बचन
राजा रानि कहे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥
कठिन दुःख भवसागर मांही । क्षण भर इमपै रहौ न जाही ॥
इकइस लाख जीव तुव शरना । बहुत बरसमें होइ निज मरना ॥
बोधसागर
(११)
जो तुम सतगुरु हंस सहायक । होहु दयाल हंस सुखदायक ॥
अधम उधारन नाम तुम्हारा । अवगुन मोर न करहु विचारा ॥
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहे गोहराई । राजा सकल हंसा बुलवाई ॥
सकल हंस सतगुरु संग लागा । इकइस लाख हंस तन त्यागा ॥
पावत पान गये एक ठारा । पहुँचे जाय पुरुष दरबारा ॥
भाव भक्ति भल कीन्ह बनाई । सर्वस अरपि चग्नामृत पाई ॥
काल जालको चिह्न जो पावे । सार शब्दमें सुरति लगावे ॥
मन निरंजन तेज ओंकारा । ये सब चीन्हे काल पसारा ॥
नाभि कमलते सुरति लगावे । मकरतार चढ़ि शब्द समावे ॥
पुरुष दरश पावे जब हंसा । जनम मरणको मेटै संसा ॥
षोडश भानु हंस तेहि रूपा । समझ न परे रंक औ भूपा ॥
एक बरन राजा औ रानी । ताकी भेद सब जाने जानी ॥
पुरुष सज्या हंस तहाँ आये । अमृत भोजन करत अघाये ॥
काया अमर अमरवर पाई । दुःख और द्वंद सबै मिट जाई ॥
एही विधि सकल जीव तहाँ आवा । सबही हंस एक नाम समावा ॥
सोरठा-कहा जीव करनी करे, कहा चलेगा चाल ॥
सतगुरु नाम प्रतापते, कबहुँ न खावे काल ॥
कहन सुननकी है नहीं, देखा देखी नाय ॥
सार सबद जो चिन्ही, सोइ मिलेगा आय ॥
चौपाई
पुरुष हुकुमसे जीव बुलाये । राजा रानी हंस तहाँ आये ॥
हंसन कह तब वचन सुनाये । भाग बडे तुव दर्शन पाये ॥
पुरुष वचन
अहो जीव कस कीन्ह कमाई । हंस सज्जन मोहि कहो सुनाई ॥
(९२)
अमरसिंह बोध
राजा रानी वचन
माथ नवाय कह राजा रानी । बार बार विनती बहु ठानी ॥
करनी चाल हम नहि जाना । परे ते कूपमें अति अज्ञाना ॥
आय जगाये अंध अचेता । सतगुरु शब्दते बांधे हेता ॥
पुरुष हुकुमते ज्ञानी चलि आये । कहो जीव कस करहि कमाये ॥
ज्ञानी वचन कहैं परमाना । इन सम हंस और नहि आना ॥
इनकी डोरी जीव सब आवा । पुरुष सुनी यह आनंद पावा ॥
अंक मिलाई हंस तब लीना । अरध सिंहासन बैठक दीना ॥
सेत छत्र शिर दीन्ह तनाई । सूरज कोटि छबि राजा पाइ ॥
यहिविधि राजा लोक सिधाये । सुनत बोध धर्मनि मन भाये ॥
एक वचनको संशय आई । सो मोहि नाथ कहौं समुझाई ॥
षोडश रवि सब हंस सराई । कैसे रायको दइ अधिकार्ई ॥
कबीर वचन
धर्मदास तोहैं कहि समुझाऊँ । तुमरे मनको धोख मिटाऊँ ॥
राज गुमान उन दिये विसारा । और जीवकी मुक्ति सुधारी ॥
पुरुष रायको पूछ न कीना । निज करनी कर नाम न लीना ॥
अपने मन तजि मान बढाई । ताते पुरुष दया उर आई ॥
धर्मदास सुनो चित लाई । यहिते राजा बढती पाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे युग कर जोरी । दया करी तुम बंदीछोरी ॥
दीनदयाल दयाके सागर । अच्छी कथा सुनाये आगर ॥
साखी-धर्मदास आधीन होइ, विनती करै कर जोर ॥
कथा कही अमरसिंहकी, संशय मिटायो मोर ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे राजा अमरसिंहबोध कथा वर्णनो
नाम द्वितीयस्तरंगः ॥ श्री अमरसिंहबोधः समाप्तः
श्री-बीरसिंहबोध
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भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्द ( विहारी ) द्वारा संशोधित
हेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,
बम्बई
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
1947-1948
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
शिवलिंग
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Shiva, wearing a crown and holding a trident (trishula). The figure is surrounded by a decorative border.
शिवलिंग