कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ५४ )
बोधसागर
तिय सुन्दर पीय विहायगता । अरधंगन सङ्ग अनंग मता ॥
कर पाप अनंत भनंत कहा । परिताप संतापन लोग दहा ॥
श्रुतिपन्थ बिहायकुपन्थ चले । तजि अमृतछाकसो खाकडले ॥
गृह सम्पति दंपति हीन भये । दरवेश अलेखको भेष भये ॥
नहिं साध विषय क्रमसाधतये । विन सार लखे यमद्वार गये ॥
मदनातुर युत्य फिरै युवती । किमि भोग नरा नरही कुवती ॥
तिय ठाट भये जब घाट नरा । न अधार कहू विभिचार भरा ॥
उठिगे श्रुति धर्मनके बकता । मनमानता जो जेहि सो छकता ॥
बरणाश्रम धर्मके मर्म नहीं । सब शंकर भे न सुकर्म कहीं ॥
समता बिगता ममता गरको । जिव रोग वो शोकनमें ढरको ॥
अघ औगुन सौगुन जीव लदा । मन वांछित बोध न वेद वदा ॥
चौपाई
यहि विधि जक्त धर्म बिनसावै । तब हयश्रीव प्रगट हो आवै ॥
शिर तुरंग देही नर जाको । धावै सकल घरा परि पाको ॥
पौन प्रसंग अङ्ग तिहि पाई । जीवकि बुद्धि शुद्ध है जाई ॥
लघु प्रलय जब धर्मकि हानी । महाप्रलय अब कहो बखानी ॥
चीन्ह अनेक भयावन होई । औबा मरी भरी दुखजोई ॥
पश्चिम दिशिते रवि उगि आवै । द्वितीया दक्षिणमें प्रकटावै ॥
उत्तर पूरव सूर्य देखे । दशाहु दिशा दश रवि यह लेखे ॥
एक सूर्य प्रथमै ते रहऊ । बडवा अग्नि ते सोई कहेऊ ॥
बडवानल अरु ग्यारह सूर। द्वादश सूर्य तेजते पूरा ॥
शिव पुनि तीसर नैन उधारा । शेषके मुखते अग्नि प्रचारा ॥
महा तेज पृथ्वीमें भरेऊ । थावर जङ्गम सब कछु जरेऊ ॥
पौन प्रचंड अण्ड भरि पेखे । परवत उडहि तूलके लेखे ॥
गिरि सुमेरु आदिक गिर नाना । सूखे पत्र सो गगन उडाना ॥
आगमनिगमबोध
( ५५ )
सात सिंधु तिहि काल छुभाही । जलकी वृद्धि एक है जाही ॥
पुष्कर मेघ कीन पुनि कोपा । जलसे सकल भूमिको तोपा ॥
मुसल धार पानी बरसाई । मोटा धार पुनि वृक्ष कि नाई ॥
बहुरि नदीकी धारा जैसे । नभसे पानी वरवै ऐसे ॥
ये तो जल दिशा उर्ध चढता । पहुँचे ब्रह्मलोक परजंता ॥
इन्द्र कुबेर आदिक दिगपाला । भोगिके ब्रह्म लोकको चाला ॥
यहि बिधि सकल जलामय होई । जीव जंतु कहुँ रहै न कोई ॥
पृथ्वी गलि जलमें मिलि जाई । तिहि औसर भैरों प्रकटाई ॥
पृथ्वीते आकाश लों देही । महा भयानक रुद्र है येही ॥
तिहु दृग मानहु सूर्य है तीनी । ऐसो तेज मयी कहि दीनी ॥
तिही भैरोंकी श्वासा चाले । पानीके ऊपर सो डाले ॥
पौन प्रचंड नासिका बाटा । ताते होय बारिको घाटा ॥
ताकी श्वासा जल जब सोखे । रहे रुद्र पुनि आपै चोखे ॥
दशहु दिशा शून्य है जाई । रविशशि अग्न्यादिक बिनशाई ॥
गुन अरु तत्त्व न कबहुँ प्रकाशा । सर्व शून्य वतैं चहुँ पासा ॥
भैरों तनते निजु तन धारी । प्रकटे महा भैरवी नारी ॥
महा भयावन मूरत जाकी । सप्त सिन्धुकर कंगन ताकी ॥
मानुष छाया देखो जैसे । भैरों तनते प्रकटै जैसे ॥
इन्द्र कुबेर वरुण यम काला । तिनके मुंडको पहिरे माला ॥
नृत्त करे सो तहैं तिहि बारा । अट्ट अट्ट करि शब्द उचारा ॥
भैरों और भैरवी दोई । नृत्त करे तब शून्यमें सोई ॥
बहुरि लय भैरवी है जाई । भैरोंके तन माह समाई ॥
अब कछु शेष रहा नहीं खेला । तब भैरों रहि गयो अकेला ॥
दोहा-धरतीसे आकाशलों, भैरोंकी जो देह ।
सर्व शून्य करि दशदिशा घटन लगी तब येह ॥
( ५६ )
बोधसागर
प्रथमें पर्वत सम भई, बहुरि वृक्षके भाय ।
पुनि अंगुष्ठ पुनिरेनसम, पुनि सो गई लोपाय ॥
सर्व शून्य दशहू दिशा, पिसा सकल संसार ।
दृश्य कतहुँ कछु नालहा, रहा अलख करतार ॥
ब्रह्माते ले जीव सब, जहाँ लगि कीट पतंग ।
मुक्ति विदेह महाप्रलय, रचना पावै वेद प्रसंग ॥
सब जिव मुक्ति विदेह लह, रचना जब पुनि होय ।
आतम सत्ता ब्रह्मने जक्त, फुरै पुनि सोय ॥
इति श्रीवेदधर्म वर्णन
अथ न्यायधर्म वर्णन
दोहा-कर्ता पुरुष है देव जहाँ, गुरु संन्यासी जान ।
न्याय शास्त्र सब मम कथा, धर्म ग्रंथ परमान ॥
अथ उत्पत्ति कथा वर्णन
सोरठा-न्याय शास्त्र परमान, नित्यानित्यको बाद बहु ।
जग सबही प्रकटान, सूक्ष्म तत्त्वसे जानिये ॥
प्रलय बहुरि जब होय, सूक्ष्म परमाणू रहै ।
ताते थूल गहोय, दूनों तिगुनो चौगुण ॥
परमेश्वर करतार, आदि अंत नहीं तासुको ।
गहे आप औतार, देते सोई चहुँ वेदको ॥
नर्क स्वर्ग आनित, जीवको सो शुभ ज्ञान ।
सो प्रभुसबको हितकहे सो तासुगुन आठ बिधि ॥
चौपाई
प्रथमहि ज्ञान प्रयत्न है दूजे । तीजे इच्छा संख्या चौथे ॥
पंचम पुनि परमान गनीजै । परथक्त्वा षष्ठमें भनीजै ॥
पुनि संयोग विभाग कहाये । ये ईश्वर गुन आठ गनाये ॥
आगमनिगमबोध
( ५७ )
जेती वस्तु जगतमें उपजाया । सोलह पदार्थते सबकी काया॥
तिनको भेद जो भलिविधिजाना । सोई पावै पद निर्वाना ॥
तीनों गुण ईश्वरके अंशा । तिनको ताही रूप प्रशंसा ॥
इति
अथ आदि सन्यासी दत्तात्रेयजीकी कथा—चौपाई
अत्री मुनि अनसूया नारी । नारि पुरुष कीनो तप भारी ॥
तीन देव तब हरिषित भेऊ । ब्रह्मा विष्णु शम्भु जिहि कहेऊ ॥
ताकै भौन गौन तिहि कीने । आदर मान तिन्हैं ऋषि दीने ॥
अनसुइया पुनि कीन रसोई । तीनों देव जिवावत होई ॥
भे प्रसन्न तब तीनों देवा । मांगो बर पूरण तब सेवा ॥
तब अनसुइया वचन उचारे । तुम समान हौ पुत्र हमारे ॥
दीन सोई बर मांग्यो जोई । पुनि मारग निज लीनो ओई ॥
अनुसुइया जैसो वर पाया । तीन पुत्र भे ताके जाया ॥
तिहुते तीन अंश परकाशा । दत्त चन्द्रमा अरु दुर्वासा ॥
दत्त विष्णु औतार कहाये । ब्रह्मा अंशते चन्द्र उपाये ॥
शिव औतार कहे दुर्वासा । धर्म चला जग तिनकी आशा ॥
दत्तसे दीगांबर संन्यासी । अवधूता मारग जो भाषी ॥
ब्रह्मा अंशते चन्द्र उपाये । सो निज भौन अकाश बनाये ॥
डुरवासा ते दंडी भेऊ । दंडी आदि ताहिको कहेऊ ॥
दत्तात्रेय के चौबिस चेले । धर्म कर्म संन्यास गहेले ॥
इति
अथ द्वितीय सन्यासी शंकराचार्यकी कथा—चौपाई
वरने भव्य न्यास बर बानी । जब कलि होय वेद मतहानी ॥
जैन बुद्ध मत अधिक पसारा । वेद धर्म निंदहि निरधारा ॥
जैन बुद्ध विधि गह नर लोई । वेद धर्म मानै नहि कोई ॥
( ५८ )
बोधसागर
तिहि औसर शिव परम सनेही । वेद धर्म थापै करि देही ॥
जैसो आगम व्यास बखाने । जैन बुद्ध मत महि अधिकाने ॥
वेद धर्म तब भयो मलीना । बिरला कोई आदर दीना ॥
बिकमादितके समयमें कहेऊ । शंकर शंकराचार्य भैऊ ॥
दक्षिण देश द्विजकुल औतारा । वेद धर्मको पालन हारा ॥
चहुँदिश जाय विजय दिग कीना । कथि निजज्ञान नीति जगलीना ॥
वेद धर्म मरयाद धराया । बाढ़ी सन्मुख तासु पराया ॥
स्मृती धर्म कीन परचारा । धर्म स्मार्त नामसो धारा ॥
जैन बोधको जीत्यौ सोई । राजा शंकरकी वश होई ॥
तिहि औसर भूपाल छुभाया । केते जैनी सरित डुबाया ॥
मंडन मिश्र ब्रह्मा औतारा । धर्म मिमांसा जग विस्तारा ॥
शंकर जब तापर जय पाई । ताकी नारि ताहि ससुहार्ई ॥
मंडन मिश्र गये जब हारी । कामशास्त्र कथ ताकी नारी ॥
शंकराचार्य बाल ब्रह्मचारी । काम शास्त्र विद्या नहि धारी ॥
तिहि औसर अस कारण भयऊ । नृप अमरूक देह तजि गैऊ ॥
योगके बलते शंकराचार्य । नृपतन प्रवेश कियौ निजुकार्य ॥
काम कला सीखे षट् मासा । नृपतनमें कर भोग विलासा ॥
काम शास्त्रको ग्रन्थ बनाई । सो अमरूकशतक कहलाई ॥
नृप तन तजि मंडन पहुँ आये । तासु नारि पर तब जय पाये ॥
मंडनमिश्र भे शंकर चेला । ताको धर्म गह्यौ तिहि बेला ॥
इति
अथ पूर्व आचार्यनके नाम-चौपाई
जहां तो आदि संप्रदा चाली । पीढी पीढी कथौ निराली ॥
प्रथम विष्णु दूजे शिव होई । पुनि तृतीय वसिष्ठ मुनि जोई ॥
आगमनिगमबोध
( ५९ )
पुनि संगत वशिष्ठ सुत भैऊ । ताके बहुरि पराशर कहेऊ ॥
छठयें व्यासदेव गुरखानी । सतयें मुनि मुखदेव बखानी ॥
अष्टम गोडाचार्य कहोई । पुनि गोविंद पुनि शंकर होई ॥
इति
अथ शंकराचार्यजीके शिष्यके नाम
दोहा-प्रथमस्वरूपाचार्य कहा, पृथ्वीधरा चारय टेर ।
पद्माचारय तीसरे, तोटकाचारय फेर ॥
इति
अथ दशनाम संन्यासीको वर्णन
दोहा-स्वरूपचार्यके शिष्य है, तीरथ आश्रम जान ।
पद्माचारयके दोय पुनि, वन आरण्य बखान ॥
तोटकाचारयके पर्वतो, सागर गिरि शिष्यतीन ।
पृथुराचार्यके सरस्वती, भारति पुरी प्रवीन ॥
इति
अथ शंकरी अथवास्मार्त संप्रदाय वर्णन--चौपाई
अब शंकरी संप्रदा भाषों । चार भेद पुनि तामें राखों ॥
पूरव पश्चिम उत्तर दक्षिण । चारों दिशा चार मठकोगिन ॥
अथ पूर्वदिशा वाचा
गोबर्धन मठ भोगंबार संप्रदा वन अरण्य पद पुरुषोत्तम
क्षेत्र जगन्नाथ देवता पद्माचार्य चैतन्य ब्रह्मचारी तीर्थ महोदधि
विमला देवी ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद कठ केन उपनिषद अकार
मात्रा प्रज्ञान ब्रह्म महावाक्य ॥
इति
अथ पश्चिमदिशा वार्ता
पश्चिम दिशा शारदा मठ कीटंबार संप्रदातीर्थ द्वारिका क्षेत्र
सिद्धेश्वर देवता भद्रकाली देवी स्वरूपाय नन्दा ब्रह्मचारी तीर्थ
( ६० )
बोधसागर
गोमती सामवेद उपनिषद ब्राह्मणकेनतत्त्वमसिमहावाक्यओंकार
मात्रा तीर्थ आश्रम द्वै पद ॥
इति
अथ उत्तर दिशा वार्ता
उत्तर दिशा जोशीमठ आनंदबार संप्रदा पद तीन गिरि पर्वत
सागर क्षेत्र बद्रिकाश्रम नारायणदेवतापुण्यागिरीदेवीत्रोटकाचार्य
नंदा ब्रह्मचारी तीर्थ अलकनंदा ब्राह्मण ब्रह्माअथर्वणवेद मांडूक्य
उपनिषद आ मात्रा अहं आत्मा ब्रह्मा महावाक्य ॥
इति
अथ दक्षिणदिशा वार्ता
दक्षिण दिशा शृंगेरी मठ भूरीबार संप्रदा सरस्वती भारतीपुरी
पदानि क्षेत्र रामेश्वर आदि वाराह देवता कामाक्षीदेवीशृंगीऋषि
पृथ्वीधराचार्य तुंगभद्रा तीर्थ यजुर्वेद बृहदारण्यउपनिषदब्राह्मण
इच्छावश है अहं ब्रह्मास्मि महावाक्य अर्थमात्रा ॥
इति
अथ संन्यासआचार वर्णन
दोहा—सकल कर्मको छोड़िके, जो लेवै संन्यास ।
स्वर्ग आदिक सब सुख घने, रहै न कोई आस ॥
चौपाई
सुत बित नारि ईषणा तीनी । तजि संन्यास धर्मनिजलीनी ॥
यज्ञहु वेदपाठ नहिं भाषा । संग्रह सदा उपनिषद राखा ॥
करहि कमंडल हाथमें दंडा । फिरै स्वच्छंद पृथ्वी नौ खंडा ॥
कछु सुख साजन यकठे धरहीं । काहूसे विवाद नहिं करहीं ॥
आगमनिगमबोध
( ६१ )
सदा शौच असनान जो कीना । संध्या बदले आत्म लैलीना ॥
जब कबहूँ चित चंचल होई । पढ़ै उपनिषदको तब सोई ॥
औषद सम भोजनको भोगा । चाहे नहिं कछु सुख संयोगा ॥
शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । सदा सैन पृथ्वीपर सोई ॥
धरतीपर धरि भोजन करही । चार मास वर्षा न बिचरही ॥
फिरै अकेले संग न कोई । भिक्षा भोजन गहै न ओई ॥
सोलह त्रास अहार प्रमाना । लेय हाथपर भिक्षा दाना ॥
जाके घर भिक्षाको जाही । मुखसे तहैं कछु माँगै नाही ॥
जेती बारमें गऊ दुहाई । गृही द्वार तबलों ठहराई ॥
जहैं माँगन को कारण पावै । तहां प्रणवको शब्द उठावै ॥
तीन बार कर शब्द उठाना । जाते गृही सुनै निज काना ॥
तीन भौन कै पांच कि साता । येते घरलों भीखको जाता ॥
जौ भिक्षा संयोग न लहई । तौ संन्यासी भूखा रहई ॥
भिक्षा ले पुनि बनहि सिधारे । मता श्रेष्ठ संन्यास उचारे ॥
पहिले वेदपाठ करि लीजै । तब पीछे संन्यास कहीजै ॥
वेदकि विधिते बोध न जबलों । धर्म मर्म जाने कह तबलों ॥
ऐसी विधिते भोजन करही । मोट देहि जिहि नजर न परही ॥
सदा काल आतम लौलीना । सकल भर्म भयतजि तिनदीना ॥
प्रथमे सब सुख भोग भरीजै । सब इंद्रिनको तृप्त करीजै ॥
तब पीछे लीजै संन्यासा । रहै न काहू वस्तुकि आसा ॥
शीतकालको गुदरी एका । राखे सो निज सहित विवेका ॥
यह मध्यम संन्यास प्रमाना । अब उत्तमको करें बखाना ॥
नम्र दिगम्बर बाना होई । शीत उष्ण दुखसुखसह सोई ॥
सहदुख सुखदुखसुखनहिंमाना । ऐसे निज मनमें अनुमाना ॥
ज्ञान अग्निमें तन हम दाहा । अब याकी कछु रही न चाहा ॥
( ६२ )
बोधसागर
यह विचार निज मनमें धारे । भूतक संन्यासीको नहीं जारे ॥
जीतेहि निज तन जिन दाही । सुये दग्ध पुनि उचित न वाही ॥
दोहा-जो मध्यम संन्यासते, उत्तम विधि गहि लेय ।
परमहंस ताको कहै, नम्र दिगंबर तेय ॥
काहूको परनामसो, करै न शीश झुकाय ।
सेवासे नहीं कछु सुखी, निरादरते नहीं दुख पाय ॥
मधूमास भोजन दोउ, तजि दीजै निरधार ।
धातु वस्तु सुद्रादि सब, नहीं कर परसनहार ॥
चौपाई
भोजन पाकते राखै काजू । तजे इतर सुख स्वाद समाजू ॥
पक भोजन तजि और न लेही । गृही जो पाक भोग नहीं देही ॥
ताहि गृहीको पापी जाना । देत नहीं जो भोजन दाना ॥
संन्यासीकी तप बड याही । कछु काहूसे मांग जो नाही ॥
दुण्डी संन्यासी जो होई । दंड हाथमें धारे सोई ॥
दंड बाँसकी लकड़ी भाषा । सात गाठि पुनि तामें राखा ॥
सरस्वति आश्रम तीरथ तीनी । दंड ग्रहण अधिकारी कीनी ॥
ब्राह्मण बिना न दंडी होई । द्विज गृहते अहार गह सोई ॥
चारों मठके जो ब्रह्मचारी । सोछ विप्र कुलते तनुधारी ॥
उत्तम मध्य कनिष्ठ संन्यासा । भिन्न २ करि वेद प्रकाशा ॥
शिव अरु विष्णुभाव नहि दूजे । पंचम देव संन्यासी पूजे ॥
शिव नरसिंहगणगतिरविदेवी । इन पाँचोंकी स्मृत देवी ॥
सिंहासन धरि पूजा करही । इष्ट आपनो बीचमें धरही ॥
अधिक नेम जिहि देवसे लावै । बीच सिंहासन तिहि बैठावै ॥
चौपाई
शिव शक्तीको धर्म जो धरही । चन्द्राकारतिलकलिलारमेकरही ॥
योगा संन्यासी ब्रह्मचारी । भगवां भेष तिलक सो धारी ॥
आगमनिगमबोध
( ६३ )
अथ मीमांसाधर्म वर्णन
दोहा—देव अलख करतार जहँ, गुरु दरवेष कहाय ।
शास्त्र मीमांसा धर्म कह, कर्मफल जिव पाय ॥
चौपाई
व्यास शिष्य जैमिनि ऋषिराया । धर्म मिमांसा सो ठहराया ॥
ताके शिष्य न करी सहाई । धर्म मिमांसा जग फैलाई ॥
शिष्यनको अस नाम उचारी । भट्ट कुमार अरु मिश्र सुरारी ॥
बहुरि प्रभाकर कुरकहि टेरे । भे प्रसिद्ध जगमाह बडेरे ॥
जैमिनि शिष्य बुद्धिगुणधारा । भली भांति निज धर्म प्रचारा ॥
धर्म मिमांसा जो कोई गहई । ताके नाम मिमांसक अहई ॥
एसो धर्म सो कीन उचारा । ईश्वर नहिं जग सिरजनहारा ॥
जो कुछ दुख सुख जगमें होई । जीव कर्मको कारण सोई ॥
जैसो कर्म करे जो कोई । तैसो उदय ताहि को होई ॥
ईश्वर नहिं कछु करे करावै । नर स्वच्छंद जस कर तस पावै ॥
सृष्टि अनादिनिध करि जानो । सदा स्वभाविक ऐसेहि मानो ॥
परमागुनते जग उत्तपाता । ज्ञान कर्म दोउमुक्तिको दाता ॥
वेदान्ती जस करे बखाना । तीन वेद ईश्वर गुण माना ॥
मीमांसक नहिं माने सोई । तीन वेद मानुष तन होई ॥
कर्म सुकर्म करे जो कोई नर । होय सो ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥
कर्मैते जिव सब पद पावै । कर्महि ऊँच नीच गति जावै ॥
जेतो देखो कर्म पसारा । कर्मको खेल खिला जग सारा ॥
ब्रह्म कर्म करहि विधि नाना । देव अराधन सुख व्रत दाना ॥
होय यज्ञ तिनके बहुतेरे । साधन करि करि देवन टेरे ॥
इति मीमांसा धर्म
( ६४ )
बोधसागर
अथ शिवधर्म वर्णन
दोहा—देव रुद्र योगी गुरु, योग मुक्ति चित धार ।
पातञ्जल यह शास्त्र है, कथे धर्म व्यौहार ॥
इति
अथ शेष अवतार कथा वर्णन—चौपाई
करे एक ऋषि संध्या तरपन । ताके अंजुल प्रकटै धरि तन ॥
अंजुलते कलि बाहर परेऊ । नाम तासु पातांजल धरेऊ ॥
पातांजल है शेष औतारा । सो जग मल शोधन हितकारा ॥
शास्त्र चिकित्सा कीन प्रकाशा । देह रोगमल ताते नाशा ॥
शब्द अशुद्ध उचारा मल हंता । पाणिनिकरनिकाभाज्य करंता ॥
तिमि वक्षित अंतह मल शोधू । योग सूत्र करि जीव प्रबोधू ॥
प्रथमहि चित्तकि वृत्ति निरोधन । कथे समाधि अरुताको साधन ॥
वैराग आदिक विधि विधाना । कथे तहां साधन विधि नाना ॥
तेसे चित्त वक्षित जो साधी । नाहित कीनो योग समाधी ॥
यम नियमों आसन प्रतिहारा । प्राणायाम धारण धारा ॥
ध्यान समाधि आठ यह भाषी । द्वितिये पदमें सबसों राषी ॥
तृतियें पदमें योग विभूती । वरनो सकल जो सिद्ध प्रसूती ॥
बहुरि चतुर्थहि चरणके माही । मोक्ष योग फल बनें ताही ॥
इति
अथ नव नाथोंके नाम
दोहा—गोरखनाथ मछंद्रो, सुरतिनाथ मङ्गल नाथ ।
चर पट चम्बा प्राणनाथ, घध्यू गोपीनाथ ॥
इति
अथ गोरखनाथजीकी कथा चौपाई
नवो नाथ सिद्धौ चौरासी । गोरख श्रेष्ठ सर्व गुण रासी ॥
आगमनिगमबोध
( ६५ )
मुद्रा सकल ताहिने कीनो । ऐसो योग माहि चित दीनो ॥
दोहा-मुद्रा सन्मुख स्वेष्टि भूचरि चाचरि जान ।
शामभवी उन्मीलनी, पुनि अगोचरी मान ॥
आत्म भावनी बडुरि कह; पूर्ण बोधिनगाय ।
सर्व साक्षिनी आदि दै, मुद्राते जित लाय ॥
चौपाई
ऐसो योगी भया समाधी । आठों भांति योग भलसाधी ॥
राज योग हठ योग बखानो । त्राहठ अरु कुण्डली प्रमानो ॥
योग लंबिका तारक साधा । योग मीमांसकसांख्य समाधा ॥
आठों योग भली विधि कीना । ऐसो योगी परम प्रवीना ॥
वज्र कीन पुनि अपनी अङ्गा । करि चौरासी कल्प सुटङ्गा ॥
ऐसी वज्र शरीर बनाई । कबहुँ मरे न जरे न जाई ॥
सारी मांस देह गलि गिरेऊ । हाड गूद जमि एकै भयऊ ॥
हाड गूद जब एकमें पागा । हीरा सम तनु चमकन लागा ॥
योगको रस भल गोरख लीना । सत्य कबीर प्रशंसा कीना ॥
केते गोरखनाथ के चेले । सिद्ध भये गहि ज्ञान दुहेले ॥
गोरख यती जक्त गुन गाये । योग युक्ति जगमें फैलाये ॥
शिवजी आदि अचार्य येहा । योग समाधि आदि गुनगेहा ॥
पुनि नौनाथ सिद्ध चौरासी । योग धर्म जग माह प्रकासी ॥
शिवगोरख सम और न योगी । ब्रह्मानन्द योग रस भोगी ॥
अथ चौरासी सिद्धनके नाम
दोहा-भङ्कर सङ्कर संघरो, जङ्कर ऋम होय ।
दूरम कनी फाहनीफा, लडुरूपा सङ्कर रोय ॥
लङ्करहनीरतन कह, पूरन बिवालक बर्न ।
जलकाखिघडसुरतिसिध, निरतिसिधकेवलकर्न ॥
( ६६ )
बोधसागर
समरथ असरन गौन गुल, चतुर वैन राय ऐन ।
केवल करन औघड दरवत, ईस्वरभरथरी भूतवैन ॥
कनका शंस् अक्षर दैन, पलका निधि शिवराम ।
पिपल्का गिरधर सालस, कसक गैलस नाम ॥
मगनधार मुक्तीसरो, चलन नाचत सूर ऐन ।
गिरवर जोति लगन कहो, जोति मनसिध सैन ॥
विमल जोति शीतल जलो, अघडधान्य पतिप्रान ।
तोल संयोग अकाल निर, बहुरि भोलसर जान ॥
राजकुमार बखानिये, विष्णुपति कृष्णकुमार ।
शंकर योग ब्रह्म योग है, मीरहुसेन बिचार ॥
मीर जअलीक धारिजो, पुनि कालिंदर नैन ।
फिर नालिन्दर नैन है, सरस्वती गुरुधन सैन ॥
गुफाबासी कल नासी, कलके संगी होय ।
यक रंगी केवल क्रमी, पुनि कम नासी जोय ॥
कलक विनाशी मूल मंत्री, योग तन्त्री परमान ।
जंग गहिर दीपक रंगी, आपो रूपी जान ॥
फिर अकलेस प्रतापी, बीरम योगी नाम ।
खल समोगल भोगी कहो, इन्द्रयोगी गुण ग्राम ॥
पुनि केदार योगी गनो, कीन धर्मकी वृद्ध ।
मुनि विचित्र रहमी योगी, ये चौरासी सिद्ध ॥
अथ षट् यतियोंके नाम
दोहा--गोरख नाथो दत्तजी, पुनि लक्ष्मण हनुमन्त ।
भैरो भीषम जानिये, ये षट् यती वदन्त ॥
इति
आगमनिगमबोध
( ६७ )
अथ बारह पंथ वर्णन
दोहा—आइ कुनकाई प्रथम, तुसलाई कपिलान ।
तृतीये सप्तनाथ पंथ है, चौथ धर्म नाथ जान ।
वैराग्य नाथके भरथरी, षष्ठम गङ्गा नाथ ।
रामचन्द्र सप्तम कहै, अष्टम लक्ष्मण नाथ ।
फिर नटेश्वरी नवम है, पिंगल दशम कहाय ।
पुनि धजपंथ इग्यारहे, बारहे कानी फाय ।
इति
अथ अष्टांगयोगवर्णन
दोहा—जमनियमोआसनकहो, प्राणायाम अगाध ।
प्रत्याहारो ध्यान कह, पुनि धारण समाध ॥
अथ यमकी दश शाखा वर्णन
दोहा—युक्ति सहित सब कर्मकर, ताको यमबतलाय ।
जाते साधन सुगमहो, सकल कलुषता जाय ॥
चौपाई
प्रथम अहिंसा जीव बताई । नर पशु आदि एक समताई ॥
मनसा बाचा कर्म या तीनों । काहूको कछु दुःख नहिं दीनों ॥
द्वितीये बोले साची बानी । मिथ्यावाक्यते धर्मकी हानी ॥
तृतीये पर धनको मति हरना । चौथे परतिय संग न करना ॥
पञ्चम दायो हृदय महार् । दुखी दरिद्री करो सहाई ॥
छठये अर्चा ताहि बखानी । बुधिते धर्म कीजिये प्रानी ॥
अहंकार मद मान न धरिये । औरहि कबहु तुच्छ मति करिये ॥
सप्तम क्षमा ताहि को जाना । लाभालाभ न सुखदुख माना ॥
अष्टम धौत धर्म भल साजी । जो कछु लाभ ताहिमें राजी ॥
नवमें अल्प अहार करीजै । दशमें शोच भली विधि कीजै ॥
इति
( ६८ )
बोधसागर
अथ नियमकी दशा शाखा वर्णन—चौपाई
प्रथमै तप द्वितिये सन्तोख्या । तृतिये कोकह नाम असंख्या ॥
श्रुति ईश्वरहिय निश्चय जाना । चौथे धनते दीजै दाना ॥
पंचम करता पुरुषको पूजा । ताहि छोड़ि न्यावो मतिदूजा ॥
पुनि सिद्धांत श्रवण है छठये । विद्वत जनकी संगत गठये ॥
श्रुति पुरान विद्या आध्ययना । सब शुभकर्मनमें चित देना ॥
सप्तम औ इंद्री धिक्कारे । जब कछु अबुचित कर्म निहारे ॥
अष्टम सत्य जाहि को कहते । भले कर्मकी इच्छा कहते ॥
नवमें जब हरि चर्चा कहिये । इंद्रिन सहित चित्तको धरिये ॥
दशमें होय अर्थ अस कहिये । तन मन धन इंद्री जो गहिये ॥
प्रभुकी हेतु सकल सुख त्यागे । ज्ञान कृशातु विषय धन दागे ॥
इति
अथ चौदह आसन वर्णन—चौपाई
पञ्चो बीरभद्र सृ संगकरी । पुनि दन्ददास वृश्चिक सृंबासरी ॥
बकरी मोर सिंह जसको अस । समान अंतरशुद्धपुनिवैठकजस ॥
अथत्रिविधि प्राणायाम वर्णन
दोहा—प्रथम सहज मध्यम बहुरि, कठिन तीसरो आहि ।
प्राणायाम त्रिविधि कहो, साधे योगी जाहि ॥
चौपाई
प्रथम सहज कहिये द्वै शाखा । श्वासा परशवासा मय भाषा ॥
पूरक कुम्भक रेचक माही । तरसु जान नाकाम है ताही ॥
द्वितिये पूरक इडाहै नारी । बाम नाक नथुन थित धारी ॥
बाहरकी वायू लेजाई । भरे इडा नाडीमें लाई ॥
कुम्भकको अस कारय कथना । बन्द करे दोउ नाकके नथुना ॥
थित प्रयन्त रोके रहे पौना । रेचक कर्म कहौ अब तौना ॥
आगमनिगमबोध
( ६२ )
शनैः २ पुनि पौन निकारे । पिङ्गला रग मारगको धारे ॥
बाहर पौन करो सो जबलों । नश्रुना बाम बन्द रख जबलों ॥
तृतीये तहैं करम आरम्भन । बाहर मात्रालों कर थम्भन ॥
मात्रा ताहि कालको नाऊ । नाम उचार शुद्ध करि पाऊ ॥
नहि विलम्ब नहिं शीघ्रविवेका । शब्द शुद्ध सो मात्रा एका ॥
चौथे जब यह युक्ति संभाला । राखे थित तामैं कछु काला ॥
फिर द्विगुना फिर तिगुना करिये । तिगुणते अधिकमें जबचितधरिये
एकबावर ऐसी विधि ठाना । कुंभकमें यह युक्ति प्रमाना ॥
इडाको पलटि पिंगला करना । पुनि पिंगल इडाकरि धरना ॥
पंचम ऐसी युक्ति विलोको । वायूको निज चलते रोको ॥
छठे जो पूरक रेचक भासा । आपते हो श्वासा पर श्वासा ॥
इकीस सहस्र अरु षट् सठथापू । चले श्वास सो अजपा जापू ॥
तापर ध्यान करै जो कोऊ । ताको जाप रैन दिन होऊ ॥
सप्तम वृद्ध होय वय ताही । वय प्रमान श्वासते आही ॥
द्वितिये मध्यम यहि विधि भाला । प्रथम प्राण वायू कर चाला ॥
बाहर अंगुल बाहर आवै । पुनि अदना वायू ले जावै ॥
प्राण कि ठौर अपान ले जाई । पूरकमें यह युक्ति कराई ॥
द्वितिये कुम्भकमे यह डौरा । प्राण अपान करो झक ठौरा ॥
लेकर बन्द करो यहि उक्ती । बरतै अंत रेचक द्वौ युक्ती ॥
पहिले सदाके ढंग न रहई । फेर इडा वायू जो कहई ॥
जोर कियेतै बाहर आई । पहुँच न बाहर अंगुल तार्ई ॥
तृतिये अष्ट कर्म कहि दीनी । पूरक तीन अरु कुम्भक तीनी ॥
दो रेचक भे आठौ कर्मा । अब चौथेको भाखो मर्मा ॥
खैचत थंभन त्यागन प्राना । पूरकगह रेचक नहिं ठाना ॥
( ७० )
बोधसागर
ताको कुम्भक नाम बखाना । प्राणनको निज वशमें आना ॥
एकीस लाख अरु साठि हजार । हो नर श्वास पूर्ण जिहि बारा ॥
तिहि अवसर अस युक्ति जो कीये । तौ सौ दो सौ वर्ष लौ जीये ॥
तृतिये कठिन कि बुक्ति सो अहाँ । प्रथम खैचरी मुद्रा गहई ॥
ऐसी लांबी जीभ बढ़ावै । तालूमें पुनि ताहि लगावै ॥
पुनि सो ऐसी युक्त गहावै । प्राणवायु धौले नहि पावै ॥
कान नाक मुख हगलों जोई । तहलों जान न पावै सोई ॥
द्वितीये भूचरि मुद्रा गार्ह । दक्षिण पगकी एडी रूयाई ॥
गुदा लिंग जड दावै बाँही । बाम पाव एडी रख ताही ॥
बार २ एडी बदले दोऊ । पुनि अपान ऊपर खैचेऊ ॥
अथ प्रत्याहारवर्णन-चौपाई
प्रत्याहार सो नाम भनंतो । इन्द्री दमन कीजिये संतो ॥
प्राणायाम प्राण दम धारा । तिमि इन्द्री दम प्रत्याहारा ॥
प्रथमें विषम स्वादते भाजा । द्वितिये बहु विरुद्ध जो काजा ॥
कबहुँ ताहि न करत सयाने । दृष्टिहु ताके दिश नहिं ताने ॥
तृतिये विषम सर्वथा त्यागी । मनहु दृष्टि सन्मुखते भागी ॥
चौथे हर्ष न शोक रहाई । पंचम प्राणायाम हटाई ॥
इति
अथ धारण अथवा परमेश्वरकी प्रीति-चौपाई
प्रीतम प्रीति हिये अति बाढे । सदा ध्यान सुमिरनमें गाढे ॥
प्रथमहि गुरुको ध्यान गहीजै । हग सन्मुख जो कछुक लहीजै ॥
सो सब गुरुकी दाया जाना । बारह मात्रालों हठ ठाना ॥
होयरपक जो पूरन जाना । मात्रा सहस दोसौ षट् पाना ॥
इति
आगमनिगमबोध
( ७१ )
अथ ध्यानको वर्णन-चौपाई
ध्यानते ऐसो ज्ञान गहीजै । तातैं बुद्ध धारणा कीजै ॥
दो सहस पांच सो बानवे मात्रा । तहँलो तिहि पहुँचाव सुमात्रा ॥
इति
अथ समाधि वर्णन-चौपाई
अष्टम योग समाधि कहावै । सो धारणा तहँलो पहुँचावै ॥
पांच सहस एकै सो चौरासो । मात्रा धारे शंक विनासी ॥
द्वितिये चिता दूर पराई । तृतिये रूप दृष्टि प्रिय आई ॥
चौथे यहू चितवनि त्यागे । पँचयें मोहि तोहि भेद न लागे ॥
छठयें नहीं कछु रहा दराई । सतयें आप आपमें छाई ॥
तू मोहिमें तोहि माह समाई । जीवहि शिवकी भै एकताई ॥
सहस गिरा इत भाषे येही । जीअत साधु त्याग जब देही ॥
सहज समाधी ज्ञात बखाना । प्राणवायु तहँ लों परमाना ॥
एक सहस सत्तर अरु दोई । मात्रा लों जब निजवश होई ॥
ताको संयम नाम उचारा । यह अर्धांग योग निरधारा ॥
इति
अथ षट्चक्र भेदनकी युक्ति
दोहा-षट् चक्रको भेदके, योगी जन चढ़ि जाय ।
गगन गुफामें बासकर, आवागमन नशाय ॥
चौपाई
अब षट् चक्रको करें बखाना । मूलद्वार प्रथमैं कहि गाना ॥
मूल द्वार कमल जो अहई । नाम अधार चक्र सो कहई ॥
पाखुरि चार सो कमल विराजा । कृपा गनेश करे तिहि काजा ॥
गुदासे पानी खँचन लागे । खँच खँच जलपुनि तिहि त्यागे ॥
यहि विधि गुदा शुद्ध कर जोई । बस्ती किया नाम सो होई ॥
( ७२ )
बोधसागर
पुनि ऊपरको पौन चढाई । द्वितिये भेदन करे उपाई ॥
जो अधार चक्रके ऊपर । स्वाधिष्ठान चक्र है दूसर ॥
लिंग भूमिका परसों अहई । षट्दल कमल तासुको कहई ॥
पौनके बल गुदाचक्र बँधाई । स्वाधिष्ठान चक्रपर जाई ॥
स्वाधिष्ठानके भेदन काजा । द्वादश अंगुलको गज साजा ॥
सो गज लिंगमें देत चलाई । लिंगद्वार तिहि शुद्ध कराई ॥
ग्रह गज करत किया कहँ लावै । बहुरि लिंगते दूध पिलावै ॥
लिंगते सहतको खैंचे जबहीं । गजकी कियापूर्ण हो तबहीं ॥
पौन खैंच पुनि लिंगके द्वारा । स्वाधिष्ठान बेधि चल पारा ॥
बहुरि अपान समान मिलाई । धोती कियामें तब मन लाई ॥
मणि पूरक चक्र जो कहई । नाभी द्वारेमें सो अहई ॥
दश दल कमल तासु परमाना । ताके भेदनको मन ठाना ॥
दो अंगुल पट चौडा लीजै । अरु नौ हाथको लामा लीजै ॥
लीलै ताहि वस्त्रको सारा । बहुरि काटि तिहि मैलनिकारा ॥
तीन बार ऐसी विधि सारा । बहुरि काटि तिहि मैलनिकारा ॥
तीन बार ऐसी विधि कीजै । धोती किया सो पूर्ण कहीजै ॥
नाभिते बहुरि पौन उलटाई । मणि पूरक चक्रर भेदाई ॥
फेरि अपान प्रान जो दोई । मेले प्रान माह तब सोई ॥
अनहद चक्र भेद तब जाई । हृदय स्थान माह जो पाई ॥
बारह पशुरी ताकी होई । हृदये मध्य कमल सो जोई ॥
ताकी सिद्ध हेत जो दीशा । कुंजर किया करे योगीशा ॥
तीन बार भल पानी पीजै । पुनि पुनि सो उलटीकर दीजै ॥
सवा हाथकी दातन लेना । भीतर नाड चलायसोदीना ॥
बार बार पानीको पीना । दातन डारि छोड पुनि दीना ॥
ताकी सिद्ध पूर्ण जब लहिये । कुंजर किया नामसो कहिये ॥
आगमनिगमबोध
( ७३ )
बहुरि पौनको लेहु उठाई । अनहद चक्र भेदिके जाई ॥
प्रान अपान समाना, तीनों । कण्ठमें तिनहि मेलि तब दीनो ॥
चक्र विशुद्ध कण्ठके माही । षोडश दल है कमल तहाँही ॥
योग लंबिका ताहित करना । दूध अधार ते काया धरना ॥
सूक्ष्म बोलते कार्य कीजै । पुनि तब ऐसी उक्ति गहीजै ॥
जीभके हेटकी नस जो सगरो । मस्का संधो लोनसे रगरो ॥
जीभ दुहन पुनि प्रातहि काला । या विधि रसना करो विशाला ॥
ऐसी अपनी जीभ बढावै । ऊर्ध्व द्वारमें ताहि लगावै ॥
जरमें अमृत चूवै जोई । ताको पान करे तब सोई ॥
पीअत अमृत जागी देहा । योग लंबिका सिद्ध भो येहा ॥
बहुरि विशुद्ध चक्रकी भाना । आगेको तब करे पयाना ॥
अग्नि चक्र है त्रिकुटी थाना । द्वै दल कमल तासु परमाना ॥
ताहि तनेती किया कराई । बत्ती निज नासिका चलाई ॥
नाक शुद्ध करि बत्ती कीता । मूर्द्धा शुद्ध भो ज्ञान गहीता ॥
पुनि उद्यान महा सुख पावै । बहुरि कण्ठते पौन उठावै ॥
चक्र विशुद्ध भेद जब लावै । अग्नि चक्रमें वायू लावै ॥
तिहि औसर जिह्वा लेजाई । ऊरध द्वारे माह लगाई ॥
बन्द करे तब ऊरध द्वारा । अग्नी चक्र भेदि हो पारा ॥
चलि ब्रह्माण्ड श्वास लय होई । कुंभक करिके तनु शिथलोई ॥
काम अरु क्रोध लोभ मोहानी । तब इन सबकी सेन परानी ॥
कर ब्रह्माण्डमें योगी वासा । जबहि चढायो गगनमें श्वासा ॥
जहँ नहि द्यौस नहीं जहँ राती । नहि सूरज शशि उडुगणपाती ॥
तहँ सुषुमना वेधि ब्रह्माण्डा । गडा जाय योगीके झण्डा ॥
जब ब्रह्माण्डमें माहरम जाई । सङ्गी साथी सकल पराई ॥
सङ्गी साथी जब रहि गयऊ । निर्विकल्प योगी तब भयऊ ॥
इति षट्चक्र