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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

THE NEW YORK

THE NEW YORK

बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका

इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें- चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।

पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।

छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।

सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।

आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।

उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-

अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक.
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तरराजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना११
धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देनाराजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना१२
सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देनामंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना१५
कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जानाइति
राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करनाअथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका
राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृताधर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर२१
रानीका सद्गुरुके अधीन होनागर्भोत्पत्ति वर्णन२२
कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझानाजगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना२३

( ६ )

बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकरसदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना
गर्भसे मुक्त करना२५कर गमन करना४९
पिशुन कर्म वर्णन२६राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना
पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ-और अधिकारी हूँताँका साथ जाना५०
का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमेंसत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का
मगन होना२९वातालाप५१
सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखेकामिनीसे बातचीत५२
बागमें ठहरना, उसका हरा होजानाहंस गुज्रन जनसे बातचीत५३
और राजाका खबर पाकर बाग देखनेसब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके
आना फिर कबीर साहबसे मिलना३२सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता५४
सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल यादग्रन्थसार५६
दिलाना३४इति
राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना३५अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका
सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप-सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर
देश देना३०जीवोंको चितानेको आज्ञा देना६५
राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना औरज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे
सदगुरुका उत्तर देना३७भेट होना६६
राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद-गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना६७
गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरकागुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना६८
हट करना पीछे शरणमें आना३९श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु
कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय४०बनानेको आज्ञा देना७०
सत्यलोकके आनेका मार्ग"गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना७१
आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों-गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके
का पान लेना४३लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना"
तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्नमहादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें
२ लोककी प्राप्ति४४समझाना७२
राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्लीगुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और
करना४५गुरुका परवाना लेना७३
सदगुरुका प्रसाद पाना४६गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना७४
पान माहात्म्य४७गुरु और ब्रह्मासे जर्बा"
काल ज्ञान"ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव
सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगटको बुलाना७७
करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली४८

बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका

( ७ )

विषय.पृष्ठांक.
ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत७९
गरुड़ और महादेवका बातलाप८१
तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद
पूछनेको जाना८३
निर्गुण भेद वर्णन८६
लौकिक ज्ञान वर्णन८७
महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान८८
गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये
बालक लाना८९
बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे
विनती करना९०
तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ
होना और गरुड़का बालकको जिलाने की
प्रतिज्ञा करना९३
गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये
फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा
करना९६
गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना
और तीनों देवका हार मानना१०४
गरुड़ बोधका संक्षेपसार१०५
इति
अथ हनुमान बोधकी अनु-
क्रमणिका
धर्मदास साहबका प्रश्न११३
हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका
भाव (टीप्पणीमें)
बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना
हनुमानका अपनी बड़ाई करना और
मुनीन्द्रजीका समझाना११५
हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर
बापना (रामनामकी बड़ाई)११६
मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन
कर देना११७
हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई
करना११९
विषय.पृष्ठांक.
मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना
और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ
की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी
बात कहना१२१
हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें
लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास
करनेकी बात कहना१२३
मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका
घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका
प्रगट होना
हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर
लेनेको प्रार्थना करना१२४
मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर
आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको
सुनाना
हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे
प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग
युक्ति का वर्णन करना१२५
साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन)१२६
हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां
पहुँचनेकी युक्ति पूछना१२७
मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना
समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना
हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी
युक्ति पूछना
मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये
सुरति निरति एक करनेकी युक्ति
हनुमान को बताना१२८
हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना१३१
ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास
प्रति१३२
सारविचार पचीसी१३३
इति

( ८ )

बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.
अथ लक्ष्मण बोधकी अनुक्रमणिका संगत्ता-
चरण और उत्थानिका१४१
कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजी
का संदेश और कृष्णका समझाना
बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके
समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उडीसा
के राजाको स्वप्न देना१४२
राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्ण
के शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझ
कर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना१४३
समुद्रका अपना बहला लेनेके लिये मंदि-
रको छः बार बहा ले जाना
सातवें बार कबीर साहबका समुद्र तटपर
बैठना और समुद्रका पीछे लौट जाना
लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातलाप१४४
समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत१४६
ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध)१४८
समुद्रका द्वारिका दुबा लेना और कबीर
साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना पण्डा
का संदेह और अनंत कबीरका दर्शन
तथा जगन्नाथमें छूत छात माननेवाले
के दंडका वर्णन१४९
ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना
वहां कबीर साहबकी देखकर घृणा
करना उसके देहमें कोढ़ फूटना राजा
विषय.पृष्ठांक.
का कबीर साहबसे प्रार्थना करके
ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना१५०
जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके
लिये राजाको स्वप्न देना१५१
राजाका मलयगिरिसे चन्दन लाना और
मूर्ति बनानेके लिये कारीगरका खोजना
और कारीगर न मिलनेसे राजाका
विकल होना
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे
कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर
जाना और सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका
वचन लेकर प्रतिमा बनानेको बैठना१५३
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे
कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार
पर जाना और सोलह दिनतक द्वार
न खोलनेका वचन लेकर प्रतिमा
अपूर्ण रहना१५४
जगन्नाथजीका गोरखको शाप देना और
योगियोंका जगन्नाथ दर्शन बन्द होना
सम्मानित और कबीर साहबका सिंहल
दीप गमन
संक्षेपसार और ग्रन्थपर साधारण दृष्टि१५४
इति

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-भोपालबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

नं. ५ कबीरसागर - २

श्री कालिका

प्रकाशक : श्री कालिका पुस्तक संख्या : १०१ प्रकाशक : श्री कालिका

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a staff or lotus, with a small figure to the right. The figure is depicted in a meditative or seated posture, wearing robes. Above the figure is a small, triangular, umbrella-like structure. The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a faded print on the page.

विष्णु विष्णु वि

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर

सत्यकबीराय तमः

यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् । तं कबीरमहं वन्दे मनोवाक्यायकर्मभिः ॥

अथ श्रीबोधसागरे

चतुर्थस्तरंगः

श्रीग्रन्थ भोपालबोध प्रारंभः

धर्मदासवचन चौपाई

धर्मदास कहे बन्दी छोरा । कैसे जीवन मारत चोरा ॥ केहि विधि जीवन मारत आई । साहिब सो मोहि भाष सुनायी ॥ कारण कौन मारत यम जीवा । मारन काल कौन है नीवा ॥

सतगुरु वचन

सद्गुरु कहै अंश सुनु वानी । महा कालकी कहौं निशानी ॥ धर्मराय आज्ञा जब करई । तबहीं मीच पृथ्वी पग धरई ॥

धर्मराय वचन

भयी मृष्टि बहुत अधिकार्ई । पृथ्वी भार न जाय सहाई ॥ ताते मीच पृथ्वी तुम जाऊ । जीवन धरि हम पर ले आऊ ॥ आनो जीव हमारे पास । जाहु मीच पृथ्वी करु बासा ॥ पवनरूप घट जाइ समाओ । जीवन जाय बाँधि ले आओ ॥ खांसी जूडी ताप तिजारी । काम क्रोध होउ रोग अपारी ॥

कबीर साहबका जालंधर देशमें राय भोपाल के घर जाना

( ६ )

भोपालबोध

लोभ मोह भ्रम फाँस अपारा । यह नहीं मर्म लखै संसारा ॥ यहि फन्दा जग सबहिं फन्दाओ । विरले हंस सुकृत बन्दाओ ॥ साखी-यहि विधि जगमें जाइके, जीव लाउ हम पास ॥ फन्दा डारहु जीव पै, होहु मीच दुख रास ॥

चौपाई

यहि विधि काल जब आज्ञादीना । चले यमदूत सब साज सजीना ॥ उत पुरुष आज्ञा मोहि दीन्हा । जीव सुक्तावन कहै पठावन लीन्हा कहे पुरुष सुनु ज्ञानी बाता । काल करे अब जीवन घाता ॥ घात करी सो भक्षण करिहै । बहुरि जीव भौसागर परि है ॥ काल दुष्ट बहु जीव सतावै । सारशब्द विनु मोहि न पावै ॥ याते जगमहँ अब तुम आओ । जीवहिं चिताय लोक कहँ लाओ ॥ आज्ञा मोरि लेहु सहिदाना । जाइ जगत जीव लाओ निदाना ॥ साखी-सुकृत जाहु संसार में, उल्टी राह चलाउ ॥ शब्दसार जीवन कहो, काल हंस सुक्ताउ ॥

चौपाई

पुरुष आज्ञा हम शिर मानी । करि प्रणाम तब जगत पयानी ॥ देश जलंधर राय भोपाला । गयउ तहां जिन्दाके हाला ॥ जाई पौरिमें ठाढ रहायी । कह्यो पौरिया बहुत चितायी ॥ राजहिं लाउ हमारे पास । दर्शन करै कर्म नृप नासा ॥ लागे कुंजी कुलुफ किवौरा । बहुत लोग बैठे शठिहारा ॥ कोइ कहै न्याय जिन्द चाहै । कोइ कहै बटपार यह आहै ॥ कोई कहै मारि यहि खेदो । निर्गुण भेद तिन्है नहिं भेदो ॥ चारि पहर तब रैन बितावा । भयो भिनसार भोर हो आवा ॥ तब हम चरित दिखावन लागे । फूटि कपाट भये दोह भागे ॥

राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना

बोधसागर

( ७ )

सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥

साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥

जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥

चौपाई

करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥

राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥

कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥

कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥

जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥

मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥

तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥

ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥

साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥

तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥

चौपाई

सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥

विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥

आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥

एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥

तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥

कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥

बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥

साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥

कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥

राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकटना

( ८ )

भोपालबोध

ज्ञानीवचन चौपाई

सत्य पुरुषके हम शठिहारा । जीवन काज आये संसारा ॥ पुरुष लोक सत्य परवाना । ताका मरम कोई नहि जाना ॥

साखी-हो राजा भोपाल सुनु, चीन्हौं यमका जाल ॥

शब्द हमारा परखहु, नातो पैहो काल ॥

चौपाई

छोडहु राम नाम हित जाना । सद्गुरु बचन गहो मतिमाना ॥

अलख निरञ्जन छाडो देवा । भ्रम तजिकरु सतगुरुकी सेवा ॥

सुमता होय करो दृढ करनी । पहुँचो लोक पुरुषकी शरनी ॥

आवागमन रहित होय जाऊँ । जो प्राणी सत्यगुरु कहैं पाऊँ ॥

पुरुष अवाज जाव उबराई । ताते दर्शन दीन्ह तोहि भाई ॥

छन्द-करहु राजा भक्ति दृढ होय छोडु राजा गुमान रे ॥

नारि पुरुष पुत्र पुत्री लेहु हिलिमिलि पान रे ॥

पुरुष नाम ले करहु आरती जीव तृण तुराय के ॥

पुरुष अंक ले पाव वीरा काल गहे नहि आयके ॥

राजा भोपाल वचन चौपाई

तब राजा बन्दे दोनों पाई । करगहि महलन लैं जाई ॥

धन्य भाग मोहि दर्शन दीना । अधमजीव आपनकरि लीना ॥

कुटिल कठोर अधम अघपापी । दर्शन दीन छुटै त्रयतापी ॥

महामोह तम पुञ्ज अपारा । वचन तुम्हार कीन रविधारा ॥

उठो सुधर्मा मन चित लायी । साहब चरण पखारहु आयी ॥

छन्द-गुरु ब्रह्म रूप प्रकाश अघहर पुंज तमहिं विदारनं ॥

मुक्ति दाता अखिल ज्ञाता कोटरवि छवि वारणं ॥

सोई रूप धरि जगत प्रगट होय जिन दीन पतितन दुख हरे ॥

भवसिन्धु ताप बुझाय शीतल जीव गहि आपन करै ॥

रानीका सद्गुरुके अधीन होना

बोधसागर

( ९ )

सोरठा-निज मन सुकुर सुधार, गुरु पदपंकज उर धारिए ॥ मिटै सकल अँधियार, अस्थिर घर तब पाइए ॥

चोपाई

राजा आज्ञा रानी मानी । साहब चरण पखारे आनी ॥ कश्चन झारी ले जल धायी । साहब चरण पखारी आयी ॥ राजा रानी चरण धुवाये । अँचरन रानी तबहि पुछाये ॥ चरण हिये मन्थे पर लायी । चरणाभूत सबही मिलि पायी ॥ कीन्ह दण्डवत पलपल रानी । साहब दरस दीन्ह भल आनी ॥

रानी वचन

साखी-हमहिं जनि भार चढ़ावहु, हमरे नाम कबीर । अगम निगम वह पुरुष है, जे गहि लागो तीर ॥

रानी वचन-चोपाई

सुनिके रानी वचन पतियानी । तब साहब सों बिननी ठानी ॥ और पुरुष जानो नहिं नीका । तुम सतपुरुष आहु यहि जीका ॥ तुमहि पुरुष आहु दृढ़ जानी । और पुरुष नाहीं मन मानी ॥ रानी कहै सुनो महाराजा । साहिब आये तुमरे काजा ॥ रानी कहै बेगि गहु चरना । काल अजापी है निज मरना ॥ आये पुरुष हमारे पास । हमरे मनकी पूजी आसा ॥

रानी वचन

सुनहु राय रानी निज वचना । यह तो जाल कालकी रचना ॥ मेटहु काम कोध हंकारा । माया मोह तजौ संसारा ॥ ज्ञान हेतु दृढ़ करनी करई । आवागमन का पूग परई ॥ तजि संसार शब्द कहँ ध्याओ । गुरुगम पुरुष नाम चितलाओ ॥

साखी-ना फिर जन्मे जोइनि ना, स्वर्ग नर्क को जाय ॥ सो हंसा रहित भये, अजर अमर घर पाय ॥

( १० )

भोपालबोध

यह तो माया जाल है, कठिन बीर झतवाल ॥ जीव शब्द न मानई, यक दिन खेहे काल ॥ मोह नदी विकराल है, कोई न उतारे पार ॥ सतगुरु केवट साथ ले, हंस होय यम न्यार ॥

चौपाई

कोटि जुहार होत नित तोहीं । कैसे कै लौ लावहु मोहीं ॥ कैसे छोड़ो राज गुमाना । किमि छोड़ो पाखण्ड अभिमाना ॥ कैसे छाड़हु राज बड़ाई । कैसे छाड़हु सुख चतुराई ॥ बैठि सभा बोलहु हँसि बाता । कुँवर पचास संग निशि राता ॥ बैठि महल महाँ खेलहु सारी । कामिनि के संग सदा बहारी ॥ छुटे न नाति कुटुम्ब की आशा । छुटे न कश्चन भोग विलासा ॥ सारखी-यह सुख कैसे छोड़िहो, हम तो कथे निरास ॥ सैन चैन जब छोड़हु, चलहु पुरुषके पास ॥

राजा भोपाल वचन

कहै राय सुनिये गुरुदेवा । मोकहाँ राखु चरन की सेवा ॥ मस्तक मोर दीजिये हाथा । दम अघ करमी होयँ सनाथा ॥ छोड़ो सहस बीस मैं हाथी । अब मैं चलौं तुम्हारे साथी ॥ अब हम दौलत छोड़ैं तुर्गंगा । छोड़ों सकल कामिनी संगा ॥ देह गर्व औ राज गुमाना । छोड़ैँ सकल भक्ति मनमाना ॥ जब तुम अमृत वचन पुकारा । तेहि क्षण छूटा सकल विकारा ॥ छन्द-दया निधान करूणा विलोकहु महादारुण दुःख दहै ॥ मैं अधम जीव अघोर अकरमी पतित पावन पद गहै ॥ तुम ज्ञान घन विज्ञान आगर धर्म कंटक मर्दन ॥ तुव नाम अमोल समरथ करहु दया निर्धन ॥

राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना

बोधसागर

( ११ )

सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये । विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥ पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥ जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥ दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥ मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥ कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥ पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥ कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥ कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥ सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥ नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥ यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥ चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥ सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥ सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥ राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥

राजा भोपाल वचन

तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥ अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥ यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥ अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥

राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना

( १२ )

शोपालबोध

सत्गुरु वचन

नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥ बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥ साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥ कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥ सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥ लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥ दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥ लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥ जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥ काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥ लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥ सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥ छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥ आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥ बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥ हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥ हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥ सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥ बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥ ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥ सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥ सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥

बोधसागर

( १३ )

देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥ बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥ सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥ पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥ कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥ राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥ अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥

सुकृत बचन

सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥ जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥ तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥

राजा भोपाल बचन

विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥ ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥ छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥ हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥ चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥ दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥

सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥ आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥

बचन-चौपाई

एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥ भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥ दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥

( १४ )

भोपालबोध

तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥ कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥ कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥ कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥ रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥ जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥

साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥

रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥

नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥

की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥

चौपाई

कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥ जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥ कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥ राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥ राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥ मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥

साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥

आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥

चौपाई

नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥

भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥

साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥

धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥

मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना

बोधसागर

( १५ )

छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥ इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥ कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥ अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥ सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥ काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥

इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो नाम चतुर्थस्तरंगः