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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

आत्मबोध

( २१ )

कहैं कबीर तहाँ जागती जोति है, कर्म अरु भर्म सब दूर भागा ॥
हृदके जीव सो बोलना कौनसा, बात बेहदकी कहा जानै ।
प्रवृत्ति प्रपञ्चमें रैन दिन जूझना, शब्द अवधूतका कहा मानै ॥
दृष्टिदीसै तहाँ कालका जाल है, नामनिवांण नहीं हाथ आया ।
प्रेम प्रकाशका भेद पाया नहीं, कहैं कबीर तहाँ सहज विलाया ॥
आपनी आपनी खालमें सबमस्त है, चार अरु असीका जीवसारा ।
करत आचार तहाँ गरकमनहोयरहा, होय उदास नहीं होय पारा ॥
सूकरा कूकरा तनको पायकरि, झूकरा कूकरा भोग भावै ।
कहैं कबीर यों नर्कमें झूलना, बिना सतसंग नहीं पार पावै ॥
इशक साईं तहाँ तर्क वजूद है, इशकवजूद तहाँ नर्क साईं ।
योगिया यतियां शेष संन्यासियां, भेषहूं देखिये बहुत माही ॥
बिनाही बन्दगीविहिस्त पावैनहीं, बन्दगीकरत नहीं खेलहासी ।
कहैं कबीर ये इशक वजूद का, दोजरखकी राहको लिया जासी ॥
तर्क वजूद सो इशक साईं करो, छाड़ि बदफेल रस एक पीजे ।
मनीको मारिदिलमाँहि नेकी गहो, भिस्तिकी राहकूँसोधिलीजे ॥
सबआपपैदाकियाघटनहींफोड़िये, फर्जन्दसब आपका देखभाई ।
कहैं कबीर यह सतका शब्द है, विहिस्तके राह को सहज जाई ॥
मियाँजीजीवतामारिकरिकहत हलालहुआ, सुदीरनहीं खूबखाना ।
मिहरिको दूरिकरिकहर दिलमेंधरी, दोजरखकीराहको सहीजाना ॥
नफसके वास्ते कुफ बहुत करतेहौ, ज्वाब दर्गाहमें भरै कैसा ।
कहैं कबीर इन्साफ तब होयगा, मार दर्गाह में खूब वैसा ॥
मियाँजीराहकोछाड़िवेराहक्यों, चलतहौ ज्वाबदर्गाहमेंनाहिंआवै ।
करत बदफेल दिन चारिके वास्ते, देखि वजूद क्यों शाक खावै ॥
सुसलमानईमानसो पाककमालभरो, जीवकोमारिकरिनाहिंखाना ।
नकसशैतानको मारिकिरिदूरिकर, बावरे कहैंकबीरयोंभिश्तिजाना ॥

( ३० )

बोधसागर

मियाजीआबकानीपनाहक दर्गाहमें, पिशाबकानीपनाहकनाहीं ।
कहर कोडुरि मिहरदिलमें धरो, यो बन्दगी करत कबूल साई ॥
पांचबिसमिलकरो पाकरोजा धरो, गुस्सेका गला तूका भाई ।
कहैं कबीर यह सत्यका शब्द है,विहिस्तकी राहकं सहज नाई॥
जैनके मांहि तो खेन पैदा हुआ, खेनका रोग तो जाय नाहीं ।
कण बिना तूसडा कूटते हैं सदा,कर्ममें लीन नहिं सांच पाई ॥
दयाको कहै अरु सदा निर्दई रहै, तोडि सर्जीव नरजीव पूजै ।
कहैं कबीर यों जन्मका आँधला, सांच अरु झूठ नाहिं सूझे ॥
खेनके रोगते श्वांस बैठे नहीं, श्वांस बैठे बिना कहां साता ।
नामनिज औषधीनिकट न्यारीरही,छाडि निजऔषधी कर्मराता ॥
आपप्रकाश बिन कहा नहीं ऊपजे, कालके चक्रमें खाय फेरा ।
कहैं कबीर यों जैनमें खेन हैं, नाम निर्वाण नहिं निकट हेरा ॥
कौड़ियां कौड़ियां जोड़ी करि एकठी, खाय खचै नहीं मूलपापी ।
धरै घरमाहिं फिर व्याज बाढो करै, रैन दिन माहिले बुरीथापी ॥
दोयगा सर्प अरु भूत भर्मत फिरै, खाय खचै नहीं मूल भाई ।
कहैं कबीर जब ज्वाब कैसे भरे, यमराज के घेसले खूब खाई ॥
शब्द उपदेश मैं सबनकं कहत हूं, समुझिकरिआपनासूखलीजे ।
राग अरु द्वेषकूरूरिसब छोडिके, आपने जीवका भला कीजे ॥
आय सतसंगमें कुबुधिको दूरिकरि,सुबुधि सन्तोषउरमाहिंधारो ।
कहैं कबीर यह शब्द निर्दोष है, आपने जीवका काज सारो ॥
टेरि पुकारि सब जीवसों कहत हौं, सत्यका शब्द तुम गुनलोई ।
गुरुदेव करतूत गुरु देवही पाइये, शिष्यकरतूतसो शिष्य होई ॥
शिष्य दुर्बुद्धि गुरुदेव क्या दोषहै, शिष्य अवधूत गुरुवार वैसा ।
करै करतूति सो आपनी पाइहै, शिष्यगुरुदेवका काम कैसा ॥
शब्द सांचा कहूं गुप्तका कामना, सांचके शब्दको लाज कैसी ।

आत्मबोध

(३१)

आप अरु बाप गुरुदेव अरु शिष्य है, करै करतूतसो पायतैसी॥
सांचके खेलकूँ सांच मीठा लगै, कपटके खेलकूँ सांच खारा ।
कहैं कबीर ये एकठे ना रहे, दिवस अरु रैन प्रकाश न्यारा ॥
आपने आपने सांचसो खेलना, कपटका खेल नाहीं काम आवे।
कपटके खेलसो काम कोई नासरै, अंतकी बेरदुख प्राणपावे ॥
बाहिरा भीतरा साफ दिलको करो, मैलको धोय रसराम पीजै ।
दास कबीर यों कहत पुकारिके, कपटकी कोथली दूरि कीजै ॥
सांच करणी करै सांच मुखऊचरे, दम्भ अरु कपटको दूरिडारे ।
शील अरु सांच संतोष हृदयधरै, कामअरुकोधमदलोभमारै ॥
कनकअरु कामिनी त्यागि साई भजै, रामतेजे जनाराम गावै ।
कहैं कबी जनपार तेही लहै, कालकी चोट फिर नाहिं खावै ॥
सांच करनी करै दम्भकूँ परहरै, सांच करतूतको संत गावै ।
सांच करनी रहै सांच मुखते कहै, सांच दर्गाहमें दाद पावै ॥
दया अरु शील संतोष सांचे गहै, झूठ दर्गाहमें दाद नाहीं ।
कहैं कबीर जन्म झूठहै जर्दरू, सांचके बीच है आप साई ॥
सांच करनी बिना काज सीझे नहीं, झूठप्रपंच सो जीव राजी ।
मानमस्तान अरु खानहै लूनकी, कालकी चोट यों स्वायताजी॥
शब्द चर्चा नहीं ज्ञानहै घेसला, देखि शैली करो पेट मोटा ।
कहैं कबीर यों जानि जड़होयरहो, सुमिरिसतनाममतखायखोटा॥
मिलै जो साधुतहाँ बोलना खूबहै, होय बकवाद तहाँ ज्ञान टूटै ।
साधुके बोलने प्रेम सुख होत है, मूढके बोलने काल कूटै ॥
रैनदिन चित्तकी वृत्तिकूँ घेरिये, युक्ति जाने तिको युक्त योगी ।
कहैं कबीर मनपवन कूँ फेरिकरि, सदाआनन्दरस नामभोगी ॥
सबकपटकूँ दूरिकरि सांचकरणीकरौ, कपटकरतूतिनिहिं पारपावे।
कपटकरतूतसो काज कोई नासरै, सांचकरतूतसो काज थावे ॥

(३२)

बोधसागर

सांचकरतूतितहांआप हाजिर खड़ा, कपटकरतूततहां आपनाहीं ।
कहैं कबीर सब संतजन कहत हैं, वेद कितेबहु देख माहीं ॥
नामनिर्गुण कहैं रहत हैं गुणमई, सुखसूं कहत नहिलाज आवै ।
कामअरुकोधघटमाहियोधासबल, ज्ञानअरुध्याननहिरहनपावै ॥
जासुके झूपडे लाय लागेसहीं, झूपडा मांहि क्या रहै भाई ।
कोधसी अग्नि तहाँ देखु प्रकटभई, कहैंकबीर यह कैसी कमाई ॥
कहतभी खूब जो रहित रजमारहै, कहतभी खूब जो सांचबोलै ।
कहतभी खूब सबत्यागि साईभजे, कहतभी खूब मनमैल खोलै ॥
रहत रजमाविना नफा नाही कछु, कहा आकाशका शब्दबोला ।
कहैं कबीर सुनु शब्द सांचाकहूं, कहा जो प्याजकाछोतछोला ॥
सांचके शब्दको सुनत निंदाकरे, झूठके शब्दसूं प्यार होता ।
झूठ अरु सांचएकठे क्यों रहें, जमीं आस्मान नहीं एकहोता ॥
प्रवृत्तिप्रपंचसब जमींका खेलहै, गुणातीतअवधूतका खेलनाई ।
कहैं कबीर कोइ रीझभावेखीझिहै, कहांगे सांच नहिं झूठ भाई ॥
सांचके शब्दमें पक्ष कोई नारहै, पक्षतो सांचका शब्द कैसा ।
सांचके शब्दमें पाप लागे नहीं, झूठके शब्दमें पाप वैसा ॥
साधुकी चालतो सांच सबकहतहैं, झूठतो साधुकीचाल नाही ।
कहैं कबीर यह खेल आकाशका, साधुपद दूरकहूं निकटनाहीं ॥
सांचका शब्द तो एकही बहुत है, बारही बार नहीं बकनाजी ॥
पाषाणके बीचमें तीरलागेनहीं, यों मूढसों बहुत नहीं झकनाजी ।
रैनदिन होत घनघोर वर्षाघणी, चीकटे घडे नहिं पुनगलागै ।
कहैं कबीर तहाँ कर्मकी जोड है, जीवजड होरहा कहां जागै ॥
पाषाणके बीचमें तीर बेधेनहीं, बाहनेहार क्या दोष भाई ।
सुनतही सुनत सबअवधि पूरीभई, इन्द्रियाद्वार मनजहरखाई ॥
कर्मसत्राहकी कडीसजडी जड़ी, ज्ञानगोली तहाँ नाहिं लागै ।

आत्मबोध

( ३३ )

कहैं कबीर तहाँ कर्मकी जाड है, जीवघोर निद्रापड़ा कहाँ जागे ॥
आपनी २ बीज अंकूर है, करै करतृति सो पाय तैसी ।
बोई है आम तो आम्बफल खाइहै, बोई है बबूलतो सूलबैसी ॥
पापअरु पुण्य दोउबीज अंकूर हैं, वाहिसो बीजफल हाथआवै ।
कहैं कबीर ये संतका शब्द है, करै करतूतसो नाहिं जावै ॥
सदगति जीवको भलीमति ऊपजे, दुर्गतीजीवकी बुरी आवै ।
सदगति जीव सुखसार साई भजे, दुर्गतिजीवमिलिजहरखावै ॥
सदगतिजीव सतसंगजनबन्दगी, दुर्गतिजीव विषधार पैसा ।
कहैं कबीर ये बीज अंकूर है, बाहि है बीज फलखाय तैसा ॥
बुराभी आपना आपही करत है, भला भी आपना आप सारै ।
आपही आपको पारले ऊतरे, आपही आपको बोरि मारै ॥
आपही उलझिकरि बहेविषधारमें, आपहीसुलझिहरिनामलगौ ।
कहैं कबीर ये भाव सब आपना, आपही सोयकरि आपजागै ॥
जीव अज्ञान सबअंध चेतै नहीं, बहे विषधारमें खाय गोता ।
पाप करनी करै नाम उरना धरै, पापके बीचसों फिरै रोता ॥
यार आशनासूं प्रीतिअतिकरत है, रामके जनोंकी करतहांसी ।
कहैं कबीर नर ऊबरे कौनविधि, मारिहैं काल गलडार फांसी ॥
मोहके वृक्षमें जीव सब मगन है, देत हैं अंड तहाँ हर्ष माने ।
काल अकराल तहाँ रैनदिनतकतहै, चलतहै चक्रतहैं सकलभाने ॥
राव अरुंरकसबएकनाके चले, नहिंपावअरुपलककी खबरजाने ।
कहैं कबीर सोइ संतजन ऊबरे, रैन दिन रामही नाम गावे ॥
मोहिके माँहि सब जीव मस्तान हैं, खान अरुपानमें मगन हुआ ।
नारिसूंपुरुषअरु पुरुषसूंनारिहै, अरसअरु परसमिलि नाहिंजुआ ॥
नारिके रैनदिन ध्यान है पुरुषका, पुरुषको ध्यान है नारिकेरा ।
कहैं कबीर यों जीवसबउलझिया, कहौ क्यों छूटि है भर्म फेरा ॥

बो० सा० ९/

( ३४ )

बोधसागर

नारिकी बासना पुरुषकी मारिहैं, पुरुषकी बासना नारि खोवै ।
सुरतिमनपवनकोसमिति साईभजे, जन्मअरुमरनतबनाहिहोवै ॥
शीलअरुसांच संतोषकीसेहजले, क्षमा अरुदया दिलमाहिं धारे ।
नारि अरु पुरुषका काम कैसारहा, कहैं कबीर सो आप तारे ॥
जन्मअरुमरनतोभजनविनुनामिटे, कछुबांटकरिखायतोहाथ आवै ।
रावअरुरङ्ग सबएक गैले चले, विना हरिभजन सबवाद जावै ॥
बेगही चेतले बावरे मूर्खा, जीवते जीव कछु हाथ कीजै ।
कहैं कबीर नरचेत सोवै कहाँ, होयगा ढोड़ तब प्राण छीजै ॥
देह तो देख मिल जायगी खेहमें, देहसों काज कछु कीजियेरे ।
रामका भजन अरु जनोंकी बन्दगी, देहधरि लाहडालीजियेरे ॥
चालती घोड़ियाकाज कछुकीजिये, कौड़ियासाथकछुनाहिंजाई ।
प्राणके छूटते पलकमें पारकी, कहैं कबीर सुनुचित्त लाई ॥
बीचउजाड़के पुरुषसक भूलिया, सो भर्माता भर्माता कूपपाया ।
कूपके माहितहाँ नीर तिन देखिये, तिसनीरकेऊपर लीलछाया ॥
पीवना होय तो पीयले बावरे, यों विनशिहै नीर थिर रहै नाहीं ।
कहैं कबीर फिर नीरनहिं पायहौ, बहुरि बे बानके बीच जाई ॥
दौयदरियावके बीचएककाज है, तासुके बीच एक पुरुष ठाढ़ा ।
एक दरिआवमें सही सो झूलिहै, करो कोइ बन्दगी करो जाड़ा ॥
जाड़ितो जन्म अनेकके जीवको, बन्दगीकरतसोइ पुरुष पूरा ।
कहैं कबीर कोइ ब्रह्मदरियावमें, रहत भवसिन्धुते सदा दूरा ॥
घड़ीघड़ीनरकहत पुकारिके, पलकही पलक नरआव छीजै ।
चेतरेचेत अब अंध सोवै कहाँ, नामभजि नामभजि काज कीजै ॥
आगिलगायाअरुपाछिलाथिरनहीं, बहुरिउपजे सोइ फेरजासी ।
दास कबीर यों कहे पुकारि करि, नामभजनाम नहिं कालखासी ॥
अंधचेते नहीं अवधि सारीगई, शीसपर कालका हुआ डेरा ।

आत्मबोध

( ३५ )

पलटा साजका कोईनासरा, गिर्दसे कोट सब आइघेरा ॥
नहीं श्रवणसुने अरु नैनभी झरत है, चालता पाँवमें परत आटी।
कहैं कबीरकोइकान मानै नहीं, जरा जब योगनी गद्दा माटी ॥
चेतरेचेत अबमूठ क्यासोरहा, सठसब अवस्था जाय बीती।
आययमराज जबचहुँदिशिचेरिहै, होयगी तोहिमें बहुत फजीती ॥
देखऔसान यह फेरिपावैनहीं, सुमिरि हरिनामसबतज अनिती।
कहैं कबीर संसारकुल स्वार्थी, नहीं परमार्थी छाड़ प्रीती ॥
चेतरेचेत अब अंध सोवै कहा, खोजगुरु ज्ञानमनजागमेरा।
तात अरुमातसुनबन्धुयुवतीसखा, कहोकालकीचोटमेंकौनतेरा ॥
येमिलेसब स्वार्थी नाहिंपरमार्थी, तासुके बीचतैं किया डेरा।
सबठगोंकावासहै झूठविश्वासहै, काटिमोहफांसीगहोनाममेरा ॥
कहैं कबीर निजनामको सुमिरिले, बहुरि नहिंहोय संसार फेरा।
संतसब कहतहैं अंध चेतैनहीं, मोहके महलमें जीव सोवै ॥
देखहीरो जन्म फिरि पावै नही, काँचके राचने काह खोवै।
वस्तुनहिं पाइहै बहुरिपछताइहै, सीखसुनि लेहु सतमान मेरी ॥
कहैं कबीरजबकालचपेटिहै, होय छिन एकमें खाक ढेरी।
भर्माता भर्माताहाथहीरा चढा, सोकौडियामाहि नै काहि दीधौ ॥
देखहीरोजन्म फिरि पावै नहीं, बड़ीनिधि पायकैतै कहाकीधौ।
विनशिहैं पलकमें आशनाहींकछु, रामभजुरामभजुकाज सीजै ॥
कहैं कबीर नरखायखोटामति, मोहके जालमें कहा छीजै।
देखनिर्मौलको हाथहीरोचढ़्यो, चेतरे अंध अब कहाँ सोवै ॥
भजोभगवानअरुकरोजनबन्दगी, कौडियारुयालकणिकाहिखोवै।
सुखसारहृदयधरोछारको परहरो, सुरतिसुरझाय जौ मुक्तिपावै ॥
कहैं कबीर नर चूक अवसानको, दावँको खोय करि कहाँ रोवै।
खतामत खायतू चेतरे बावरे, शीस आई जरा नाम लीजै ॥

( ३६ )

बोधसागर

सत्यकाशन्दसब संतजन कहतहैं, काटिभ्रमजाल भजिरामजीतै॥
देहतो देख मिलजायगी खेहमें, ये मिले सब स्वार्थीसगी नाही ।
कहैं कबीर जब काल गढ़ घेरि हैं, तब आपने आपने पंथजाही ॥
देह तो देत है तोहिचिंताघणी, सुमिरिहरिनामअबचेत अंधा ।
करतबहुय नयहविनशिहैपलकमें, यादकरिपीवयमकाटिफन्द ।
दुःखको रूप अरुराशि औगुन भरी, यादकरहकसुखकहाभूल्यो ।
कहैं कबीर यादेहसोतरक करि सदा सुख सिन्दुके माहि झूलो॥
देह दुख रूप सुख लेश मात्र नहीं, देहसुखरूपजोनाहिलागै ।
जन्म अरु मरनकी त्रासतबहींमिटै, काल कांटासबैदूरिभागै ॥
धारि इस कामकोकरहरिबन्दगी, सुवाविषधारमें जीव सारा ।
कहैं कबीर कोइ कोटिमें ऊबरा, परसि निर्वाण पदहुआन्यारा ॥
गर्भ बासके बीचमें देख रक्षा करी, आबकी बून्दसो पिंडकीया ।
अन्न पानी सब भस्म हो जातहै, प्राण सूक्ष्म तहांराखिलीया ॥
उबत दशमास तहां पोना ले दिया, कौलकेबोलकरिजन्मपाया ।
कहैं कबीर नर फूलि संसारमें, बिसरि कर्ताको जहर खाया ॥
दीद बरदीद प्रतीत आवै नहीं, दूरिकी आशा विश्वास भारी ।
कथा अरु कबित श्लोक रसरी बड़ी, कथैबहुभांतिबूझेअनारी ॥
हृदय सूझे नहीं सन्धि बूझे नहीं, निकटकीबात ले दूर डारी ।
तत्त्वको छाडिनःतत्त्वको सब कथै, भर्ममें पड़े सब भेष धारी ॥
जटाधारी घने यती योगी बने, पहिर मुद्रा लिये कानफारी ।
एक मौनी रहै एकत्रक त्यागीरहै, एक दराडी रहै एकब्रह्मचारी ॥
एक नागा रहै सर्व लज्या तजै, एक छेद वजूदको नाथडारी ।
एक बांधिपगधैघरु निरत करता रहै, स्वांगकेने करे भर्मभारी ॥
एक आकाशद्रष्टा रहै मौनी रहै, एकउर्द्धबाहु रहै नखधारी ।
एक भोगी रहै भोग भोगत रहै, एक बजरकछोटी कसिकाम जारी॥

आत्मबोध

( ३७ )

एक पग बांधिके अद्द झूलत रहै, एक ठादेश्वरी कष्ट कारी ।
एकगर्भमरते रहे पञ्चाग्निपतारहे, एक बैठिजलसेज आसनआरी ॥
कहाँ लौं कहूँ बहु रूपकोपेखनो, आप आपनपौ सवनेपिसारी ।
एक अन्न भोजन तजै दूबरंगनरहै, एकदूध भोजनकरै दूधाहारी ॥
एक लूनछोड़िके भये अलूनिया, एक बैठिके गुफामैलायतारी ।
एकतिलकमालादियेटोपचोलालिये, एकगुदढीपहरिकरिडिम्भधारी ।
एक पूजिकै मूर्तीगर्भ भारिधरी, एक शंखधुनिआरतीजोति वारी ।
सेव कीन्ही सहीदेवचीन्हानही, आत्माछोड़िभये जड़के पुजारी ॥
पूजिपाषान अभिमान अंधाफिरै, सतचेतनसूं बीच यारी ।
योगी पण्डित बडे सर्वगीता पढे, भर्मकी भीति नहिं टरतटारी ॥
कहै कबीर कोइ सन्त जन जौहरी, मेटि यमफन्द उठे संभारी ।
इतने विटम्ब सो वस्तु न्यारी रही, ज्ञानकीसुरतिसोल्योविचारी ॥
अगमकोगमकरोध्यानहृदयधरो, चढशून्यकीशिखरकरजिकिरभाई ।
फिक्रकोत्यागिनिजनामसो लागिकरि, सुषुप्ता ताँत तूतू बजाई ॥
गगनअरुधरनिबिचरुयाल अद्वुतरचा, गैवकीकलासतगुरुलखाई ।
कहै कबीर अब भोग पूरन भाया, ज्ञानके मौज वैराग पाई ॥
दौडदौडरेबालकाखबरिकरदर्बारमें, अलमस्तअवधूतफकीरआया ।
जाकेछाप अरुतिलकगलमालमस्तकवना, सत्तकी एकआवाज आया ।
खोलिपटदेखले जगमगीजोतिहै, नादअरु बिन्दुगठजीतकाया ।
कहै कबीर सर्वांग अविगत मिला, भर्मको छाड़िगुरुज्ञानपाया ॥
उलटि यंत्र धरो शिखरआसनकरो, देखसो देव दर्गाह माहीं ।
जहाँ तेल बाती बिनाअधरदीपकबलै, युक्तिकी जोतसो घटैनाहीं ॥
जहाँ तालतांतीबिना रागरमतासुना, पावैबिन निरत झंकारखाहीं ।
हाथबिनपांवबिनशीसमस्तकबिना, हुकुमहथियारबिन फौजधाई ॥
जहाँ जत्रतेजी नहीं गैद छाजे नहीं, युद्धमंडा तहाँ घाव नाहीं ।

( ३८ )

बोधसागर

पातबिन पेड बिन वागडम्बररहे, पालिबिनसर्वहिलोलखाहीं ॥
नीरबिनकमलतहैफूलिनर्मलरहै, पोखबिनभैवरगुंजार खाही ।
नैवबिनमहलकेदशोछाजाबना, रूपबिन देव जहाँ मौज पाई ॥
कहैं कबीर कोइनिरतिलोनिरखियो, पपिलके पंथमें गयंदजाई ।
दरसबिनदीदपरतीति आवै नहीं, पार की कहैं नब झूठ झाई ॥
हकार सकार झनकार लागि रहै, बैठमनतख्त जहाँ तत्त पाई ।
रूपबिन रेख जहाँ राग रमतासुना, तालमृदंगपर टेर खाई ॥
अजरअरुअमरका अगम बासाबसे, नादअरुबिन्दकीखबरपाई ।
सोधि अस्थूलरहमान जबभैटिया, नामकी छापजबजायखाई ॥
जहाँ फूहिरि परबोकै अमीझरबोकै, प्रेमकी पुरीसो घटैनाई ।
आपकी तापधरि काललागै नहीं, कालकौमारि जंजालखाई ॥
शून्यकी ध्वजा जहाँ फरकखाबोकै, सेतही गगन गुंजारखाई ।
अगम अरु निगमका खूबछाजा बना, रूपबिनदेवजहाँगमपाई ॥
अखंड अपार जहाँ तारलागारहै, तारमें मिलै सो पार होई ।
भर्मको छेकि परब्रह्मको भैटिकरि, सुरतिको कोटिब्रह्मांड मोई ॥
कोटके कंगुरे ज्योति झलमलकरै, माझरी शून्यमें फरकखाई ।
दासकबीर निर्वानपद परसिया, मिटिगया झूठ झकझोर आई ॥
सतकबीरका सेतही घर रहै, श्वेतही शून्यमें रमै भाई ।
जहाँ यती औ सतीतो निरतकरबोकै, प्रेमरस पीवे सोघटै नाई ॥
ताल मृदंग अनहद लागा रहे, सुषुम्नासाधि संतोष पाई ।
विहंगमशब्दजहाँ फरक खावो करै, शब्दकीखोजकोइसंतलाई ॥
जहानकी टेक अस्मान लागी रहै, सहजमें भैवरगुंजार खाई ।
उलटिकरिपवनतहाँ गगनलागीरहै, लूमझरलाल आकाशलाई ॥
देखिधरिध्यान जहाँ इंद्र गवनीकरै, अमीका कुंड हिलोलखाई ।
शब्दका चांदना अगम लागारहै, उठै झनकार ब्रह्माण्डमाई ॥

आत्मबोध

( ३९ )

दासकबीर लौलीन लंका चढे, पलककी दरसमें झलक पाई ॥
शून्यकी शिखरपर जिकर ऐसी, घटा चंघोर संजोर बाजे ।
शब्दकी आवाज जहांगाजबानीकहै, भँवर गुँजारनिशिदिनगाजे ॥
हीरा अरु लाल अवेध मोती पड़े, श्वेतही शून्यजहाँ सन्तजूझै ।
कहैं कबीर ये पन्थहै अगमका, सोहंगमें सुरति सतलोक सूझै ॥
वाहवाहसिदकेजाऊँमैमुर्शिदकेकदमोंपर, एकहीस्वात्ममेंनिहालमनकिया है ।
पीरमेराखासामैं सुरीदहुंताका, करिकेमिहरदस्तपंजाशिरदिया है ॥
ज्ञानकेकमानबानमारतेहैंतानि२सोइजनजानैजाकीसुरतिकरिवारवारहुआहै ।
अकिलकीगिलोलकरनिजमनठहरायदेस, वैतोरहमानयारमुवाहैनजियाहै ।
साईसर्वज्ञहराओर वेकैववेऐब, कहैंकबीर वैतोसाहिबमहबूबमियाहै ॥
बदन विकशत खुशालआनंदमें, अधरमेंमधुरसुस्कात बानी ।
सतडोलैनहीं झूठबोलैनहीं, सुरति औ सुमतिसोसत्यज्ञानी ॥
कहतहुँ मैं ज्ञान उपदेश सबनसुँ, देत उपदेश दिलदई जानी ।
ज्ञानकेपूर है रहनिके सूर है, दयाकी भक्तिदिलमाहिं ठानी ॥
और सो तोडिलैएकसोरत रहै, ऐसे जन जगतमें बिरलाप्रानी ।
ठगवटपार संसार भरपूर है, संत इसकी चाल कहाकागजानी ॥
चञ्चल चपल चित्त रङ्ग हैं चीकने, बातमें दूरस दिलकपटजानी ।
पेटमें कतरनी दया जिनके नहीं, कहतमें सुध मन बगध्यानी ॥
जीवकी दुर्मती भर्म छूटे नहीं, जन्म जन्मात्र पड़े नर्कखानी ।
कौवा कुबुधि सुबुधि पावै नहीं, कठिन कठोरविकरालबानी ॥
अग्निके पुञ्ज है शील शीतल नहीं, विष अमृत लिये एकसानी ।
कहा भयोसाखीकटो दृष्टि उभरी नहीं, सत्कीचालविनुधूरधानी ॥
सत सुकृतकी साँची रहनी सही, कागबुग अधमकीकौनबानी ।
कहैं कबीरकोइबिरलाजनसुघइहै, सदाशब्दध्यानसुनैनिशानी ॥
छाडिघोखादियाआपनिश्रयकिया, आदिअरुअंतसाहबएकजानी ।

( ४० )

बोधसागर

सुरतिके थाकते निरतभी थाकिया, निरतके थाकते शेषकंपा ॥
शेषके कंपते धरनिभी धसमसी, धरनिके धसमसे मेरुडोला ।
मेरुके डोलता शब्दसायर मिला, उर्द्धमें शब्द घनघोर गाजा ॥
बखत बखतीमिली कर्मयारी जुरी, बांधिपाताल आकाशफेरा ।
सत कबीर तहां ब्रह्म चौरी रचा, सत साहब तहां लिया फेरा ॥
अथर दरियाव दरगाहकुछअजबहै, निर्मली ज्योतिजहांखूबसाई ।
ज्योतिके ओट यम चोट लागे नहीं, तत झँकार ब्रह्माण्डमाहीं॥
ज्ञानका बाग जहांगैवका चांदना, वेद कितेबकी गम्म नाहीं ।
खुल गयेचश्मजवहश्मसब पशमहै, दीनअरुदुनीका कामनाहीं ॥
कहैं कबीर यह भेद बिरलालहै, झलमलैज्योतिजहांझूलेझाई ।

इति आत्मबोध रेखता प्रथम भाग समाप्त

जैनधर्मबोध ग्रन्थ

जैनधर्मबोधप्रारंभः

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, light-colored illustration of a seated figure, possibly a deity or a person in traditional attire, centered on the page. The figure is depicted in a meditative or formal pose, wearing a long robe and a headpiece. The background is plain and light-colored.

सत्यमुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष
मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतायन,
धनी धर्मदास चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कु-
लपति नाम, प्रमोध गुरुवालापीर, केवल नाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र
नाम, दयानामकी दया वंश-
व्यालीसकी दया ।

अथ श्रीबोधसागरे

अष्टाविंशतिस्तरंगः ।

अथ जैनधर्मबोधप्रारम्भ ।

★

दोहा-तीर्थकर जहँ देवकह, गुरुजतिहैं जो जैन ।
जैनेश्वर मुख भाख जो, ग्रन्थ है केवल बैन ॥

उत्पत्ति कथावर्णन

भागकट षट जैन मत, तामैं द्वे विधि कीन ।
तीनकाल औ सर्पिणी, उपसर्पिणी है तीन ॥

( ४६ )

बोधसागर

आदि काल तिहुँ प्रथमके, तामें उत्पति होय ।
नामजुगलिया नारि नर, प्रकटहोय द्वै दोय ॥
जगत अनादि निधन कहै, तासु न कबहुँ नाश ।
बीजते रचना सकल हो, यह जगत स्वयमप्रकाश ॥
याको कर्तानाहिं कोई, यह जग आपे आप ।
कर्म प्रेरि करवाव सब, कर्महि रचना थाप ॥
ईश बसे वैकुंठमें, अलग कर्मते सोय ।
निर्विकार निलैप सो, नाम निरञ्जन होय ॥

चौपाई

सो प्रभु करे करावे नाहीं । जिवस्वच्छन्दनिजवशमें आही ॥
जीव जनतु जग नाना जाती । जेते जड चैतन ते पांती ॥
कर्म जनित फल भोगें सारे । आतम सबके न्यारे न्यारे ॥
जस कछु कर्म करै जो कोई । उग्र छुद्रता के वश होई ॥
विश्वमाहिं जड़ चेतन केते । जेते जीव आतमा तेते ॥
निर्विकार जो ईश्वर होई । जग विकार ताते नहिं कोई ॥
सो नहिं कर्मके बंधन पड़ता । राग द्वेष ता हृदय न बर्ता ॥
नहिं उपजाव न पालै कोई । नहिं संहार सृष्टि कर सोई ॥
सकल विकारते सो प्रभु न्यारा । जीव कर्म निजु भोग निहारा ॥
यहि षट्कालमेंदुख सुखठाटा । तीनमें वृद्धि तीनमें घाटा ॥
तीन काल सुख स्वर्ग समाना । उगै धरनि कल्पद्वुम नाना ॥
पाम रहित मानुष तब सारे । नर सुर दूनों संग विहारे ॥
द्वै द्वै प्रकट होय तब सोई । नाम जुगलिया तिनको होई ॥
आयू परम दीर्घ रह जाको । सब सुख छाय रहा महिताको ॥
कर्म कृपा कछु सो नहिं जाना । राव रंक सब एक समाना ॥
सदा काल यक सम उजियारा । कल्पद्वुमकी ज्योति अपारा ॥

जनधर्मबोध

( ४७ )

दिन औ राति कोइ जाने । रवि शशि उड्डुगण सकल डुराने॥
चन्द सूर नूर प्रचण्डा । पारिजात आमा नौ खंडा ॥
दरदर पर सुरतरु वर लागे । सकल नारि नर सुखमें पागे ॥

पूरबी बोल-छन्द बरवै

दमक देव डुम बमकै महि शशि सूर ।
गममि रहल चहुँ ओरवा चमकै नूर ॥
पूरन धरनि अकसवा जोति अपार ।
यक समान दिन रतिया नहिँ अँधियार ॥
छपे सुरतरुकी जोतिया लगनमें मन्द ।
एक न दीख नखतिया नहिँ रवि चन्द ॥
नर तिय सकल जुगलिया सब निस पाप ।
पुण्य पाप कछु नाहीं कर्म न थाप ॥
तब नहिँ बोध बिचरवा नहिँ गुरु शिष्य ।
कतहुँ न वरणाश्रम वासव सम दिष्य ॥
कतहुँ उग्र न सदवों रंक न राव ।
नर सुर विचर धरनिया कछु न बराव ॥
हिल मिल दोउ दल रहते जनु सँग भाय ।
भोग भूरि कल्पडुम काम पुराय ॥
महि सुख छाय स्वरगवा छबि सरसाय ।
हीरा लाल कि स्वनियां कविको गाय ॥
नहिँ कछु वेदन बानी नहिँ श्रुति छंद ।
धर्म न कछु अधरमवा सहजानन्द ॥

इति

अथ चौथा कालवर्णन

सोरठा-लागत चौथा काल, सुरतरुजबही लोप हो ।
नर गह न्यारी चाल, कृत चली कृतकाल तिहि ॥

नं. ९ कबीरसागर - ३

( ४८ )

बोधसागर

चौपाई

चौथा काल लगे जब आई । तबसे रात्रि द्यौस बिलगाई ॥
कल्पवृक्ष तब जाहि लुपाई । चन्द्र सूर तारे दरशाई ॥
जिहि औसर निशदिन बिलगाना । भिन्नभाव तब जगको जाना ॥
तब मानुष ऊपरको देखे । चकिंत होय सब कहैं विशेषे ॥
यह क्या हमरी नजरमें आयो । जो हम काहू देखि न पायो ॥
तब कुलकर ब्यौरा कहि देही । चन्द्र सूर तारे हैं येही ॥
कुलकर सोई नाम धरावै । जो मानुष कुलको बिलगावै ॥
जाति वर्ण कुल न्यारा करही । तिहि अनुसार धर्म आचरही ॥
राजनीति सब भाषै ओई । खेती कर्म सिखावै सोई ॥
जब मानुष सुरतरु नहि राखै । कुलकर तबहि कूसानी भाषै ॥
तबते कृतक रही सब लोगू । अन्न उपायके भोजन भोगू ॥
जबहि देव दुम गयो दुगई । ईश्व उगी मानुष सुखदाई ॥
भांति भांतिके ऊख गन्ना । जिवको दुख दरिद्र सबभन्ना ॥
कल्पवृक्षके बदले ईखा । प्रथमहि जाको मानुष चीखा ॥
ताकी खेती प्रथमहि चाला । कुलकरकी आज्ञा सबपाली ॥
कुलकर अनुभव ज्ञान गहाई । सब जीवनको राह बताई ॥
कुलकर आदि भूप इक्ष्वाका । प्रथम चली जग जाकीशाका ॥
इक्ष्वाकू कुलकर कहलाये । प्रथम जो नरको ईश्व चुसाये ॥
अर्थ सहित यह नाम कहाया । इक्ष्वाकू जिन ईश्व चुसाया ॥
तिहि अवसर गुणदोष विभागा । पुण्यपाप मानुषको लागा ॥
कर्म दोष गुण तबते पागे । प्रकट करे कुल करके आगे ॥
कछु औगुन जब नरमें पावै । निहि कुलकर धिक वचन सुनावै ॥
सो धिक वचन सुने नर नारी । निजुमनमें अति होहि दुखारी ॥
यतनमें अस लज्जा माना । तजे तुरंत आपनो प्राना ॥