कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जनधर्मबोध
( ४९ )
अस कहि नर छोडे निजचोला । आज हमें कुलकर धिकबोला ॥
कछु दिस बीते मनुष दिठाई । धिक बोलीसे सो मल जाई ॥
जब धिक वचनसे राह न धरही । बहुरिधिकाधिककुलकर करही ॥
यतनेहु पर जब शर्म न माने । अधिक दंड तब कुलकर ठाने ॥
कमही क्रम औगुन अधिकाई । बेडी बांसके दे ठहराई ॥
झूली फासो दण्ड प्रचंडा । लगा होन पृथ्वी नौ खंडा ॥
इति
अथ वर्णविभाग वर्णन—चौपाई
चौथा काल आनि जब लागा । तबते मानुष जाति विभागा ॥
तीन वर्ण प्रथमहि तब कीने । छत्री वैश्य शूद्र कहि दीने ॥
दोय प्रकार शूद्र पुनि कीना । एक लीन भौ दुतिय मलीना ॥
तबते जाति बरन ठहराई । कुलकर भिन्न २ बिलगाई ॥
दोय प्रकारके लोग कहाये । यक नर यक विद्याधर गाये ॥
मानुष भू गोचरी बखानो । विद्याधर खगोचरी मानो ॥
भूगोचरी भूमि पग डाले । उडि अकाश विद्याधर चाले ॥
जाति वर्ण दोनोमें कीना । नर विद्याधर धर्म धुरीना ॥
नर विद्याधर जैनी सारे । तिरथंकर सेवा चित थारे ॥
पंचम काल लगे जब आई । तब मिथ्यात्र फैल अधिकाई ॥
जबते मिथ्या मत सरसाने । तबते विद्याधर बिलगाने ॥
चौथे काल माहँ परिपाका । प्रकटे तिरसठ पुरुष शलाका ॥
एक सौ उनहत्तर जिव सारा । चौथे काल माहँ औतारा ॥
मुक्तिपात्र कहिये नर जोई । चौथे काल प्रकटे सब सोई ॥
प्रकटे तबहि तिरथंकर देवा । सुर नर मुनि कर जाकी सेवा ॥
सुर सुरपति पृथ्वीपर आवे । तिरथंकरकी अस्तुति गावै ॥
बो० सा० ९
( ५० )
बोधसागर
ऋषभनाथ है आदि तिर्यंकर । तिनके पुत्रभे भरथ भूपवर ॥
चक्रवर्ति थे भरथ भुवाला । चौथा वर्ण कीन तिहि काला ॥
सब मानुषकी पारख लीन्हें । दायावंत अधिंक जिहि चीन्हे ॥
ब्रह्म चीन्हि जिन दाया धारा । तिनको भिन्न कियो तिहि बारा ॥
ब्रह्मन तिनको नाम पुकारी । जिनके हृदये दाया भारी ॥
चौथा वर्ण भरथ नृप थापा । तबते चार बरणकी छापा ॥
ऋषभनाथकी केवल बानी । तिहि औसर असकहैं बखानी ॥
भरथ विप्र थापे हैं जाको । चलै जगतमें तिनकी साको ॥
पञ्चम काल जाहि दिन ऐहै । ब्रह्मन जैन विरोधी ह्वैहै ॥
जैन विरुद्ध कर्म सब करिहैं । द्रोह सदा जैनीसे धरिहैं ॥
कछुदिन यहिविधि गयोसिराई । मन मत ब्रह्म न वेद बनाई ॥
जैन विरुद्ध कर्म सब ठाना । हिंसा कर्म करहिं विधि नाना ॥
अश्वमेध गोमेध रचाई । अजामेध नरमेध बनाई ॥
ब्राह्मणजातिकी अधिक प्रशंसा । लिख्यो ताहि ब्रह्माको वंसा ॥
अपने मन सब शास्त्र बनाये । सबते आपको श्रेष्ठ बताये ॥
करि प्रपंच सब थाप अचारा । जैन विरुद्ध पाखंड पसारा ॥
चौथा काल बहुरि जब ऐहै । फेर न ब्राह्मण वर्ण थपैहै ॥
बहुरि प्रतिष्ठा देय न ओही । थपै न जैन धर्मको द्रोही ॥
जाति वर्णकी बात बखानी । अब पुरुषनकी कहो कहानी ॥
छंद त्रिभंगी
चौबिस तीर्थकर जैनी शंकर बस कम कंकर धूल कियौ ।
गुण ज्ञान गहंत मुक्ति लहंत अरि हंतअतिचूल कियौ ॥
दाया उपदेशं रहित कलेशं मोह न लेशं धर्मधनी ।
कुल पद बत्तीशं बानी दीशं जैन मुनीशं भर्म भनी ॥
जनधर्मबोध
( ५१ )
अथ चौबीस तीर्थकरके नाम वर्णन
दोहा-ऋषभ नाथ प्रथमै कहो, अजित नाथ कह फेर ।
शंभो अभिनंदन कहो, सुमतिनाथजी टेर ॥
पदम प्रभू क्षुपारसो, चंद्र प्रभू बखान ।
पुष्पदंत शीतल श्रेयस, वासपुञ्ज पुनि जान ॥
बिमल अनन्तो धर्मनाथ, शांतिकुन्थ नाथोय ।
अर्हनाथ अरु मल्लजी, मुनि सुवृत्त कह जोय ॥
निमनाथो नेमनाथ कह, पारसनाथ कहोय ।
महावीर नाथो कहो, अन्त तिर्थकर सोय ॥
इति
अथ बारह चक्रवर्तियोंके नाम
दोहा-भरथ सगर मघवा कहो, सनतकुमार गनाय ।
सांतिनगधकुंथनाथजी, अर्हनाथ कहवाय ॥
पुनि सुभूमि पञ्चो विजय, हरिखेनो ब्रह्मदत्त ।
सारी पृथ्वी बश करे, कर निज्ज चक्र गहत्त ॥
अथ नौ बलिभद्रके नाम
दोहा-विजय अचलजी धर्मधर, बहुरि सुप्रभुजी होइ ।
फेर सुदर्शन जानिये अरु सुनन्द कहै जोइ ॥
नन्दमित्र पुनि लेखिये, रामचंद्र पुनि जान ।
पञ्च फेर कहि मानिये, नौ बलिभद्र प्रमान ॥
अथ नौ नारायणके नाम
दोहा-प्रथम दुपिष्ट तृपिष्टजी, बहुरि स्वयंभू गाय ।
पुरुषोत्तम नरसिंहजी, पुण्डरीक बतलाय ॥
केवल दत्त बखानिये, फेर लक्ष्मण मान ।
कृष्णचन्द्र नौमैं कहो, यदुकुल दीपक जान ॥
( ५२ )
बोधसागर
अथ नौ प्रतिनारायणके नाम
दोहा-अश्वग्रीव तारक मेरक, मधु निशुम्भ प्रहलाद ।
बलि रावण जरासंध नव, प्रतिनारायण बाद ॥
इति
अथ तिरसठ शलाकापुरुषके नाम-चौपाई
तिरसठ पुरुष शलाका येही । जन जान अति उत्तम तेही ॥
मात पिता तिरथंकर करो । अरतालीस जीव सो हेरो ॥
चौबिस कामदेव नौ नारद । चौदह कुलकर बुद्धिविशारद ॥
ग्यारह रुद्र यक सौ उनहतर । मुक्तिपात्र अवश्य येते नर ॥
इतने इतर और अधिकाई । केवल ज्ञान गहि मुक्त कहाई ॥
अथ जैनशास्त्र संख्या प्रमाण-चौपाई
जैन शास्त्र संख्या परमाना । ऐसे ताको सुनो बखाना ॥
बत्तिस पद सब शास्त्र कहावै । ऐसे ताको लेख लगावै ॥
प्रतिपद ढाई सौ मन स्याही । यक पद पूरन लिखिये ताही ॥
यक चावल कजल जौं लीजै । यकश्लोक पूरण तिहि कीजै ॥
बत्तिस पद यह लेख लगाई । सर्व शास्त्र ताते लिखि पाई ॥
कजल आठ सहस मन लागे । केवल वैन जैनपति जागे ॥
केवल वानी जैनको जोई । अंथ प्रमाणिक इनमें सोई ॥
अथ अष्टकर्म विधान वर्णन
दोहा-अष्टकर्म जो जैन कह, ताके बंधन जीव ।
भवसागर भोगे सदा, पावे नहिं निजु पीव ॥
ज्ञानी बरनी प्रथम कह, दर्शना बरनी फेर ।
बहुरि बेदनी जानिये, महा मोह पुनि टेर ॥
जैनधर्मबोध
( ५३ )
आयू कर्म बहुरि कहो, नाम कर्म पुनि भाष ।
गोत कर्म अंतराय कर्म, बरनौ तिनकी शास्त्र ॥
कर्म एकही जानिये, आठभांति सो दीस ।
प्रकृत जैन बानी कहै, एक सौ अरतालीस ॥
इति
अथ ज्ञानावर्नी कर्मकी पंच प्रकृति वर्णन--चौपाई
मति ज्ञानावर्नी जो कर्मा । सो आवरि राख्यो मतिधर्मा ॥
श्रुति ज्ञानी वरनी जब होई । शुभश्रुति ज्ञान फुरे नहिं कोई ॥
औध ज्ञान आवर्नी जबही । औध ज्ञान हिय होय न तबही ॥
मन पर्जय अबरन उगि आवै । सो मन पर्जय ज्ञान छपावै ॥
प्रकटे केवल ज्ञाना वरनी । केवल ज्ञान गोप तिह करनी ॥
मतिश्रुति औधअरुमनपरजाई । केवल ज्ञान पंच विधि गाई ॥
मति ज्ञान सो नाम बताई । मति बुधिते जेती चतुराई ॥
कारीगरी अरु गुन गन जेते । मति ज्ञान करि ल्हिये तेते ॥
द्वितिये श्रुति ज्ञानजिहि कहई । सर्व शास्त्र मुख पाठ जो रहई ॥
तीन काल देखे श्रुति द्वारा । जाने सकल अचार विचारा ॥
श्रुति केवल ज्ञानी कह सोई । पूरन जो श्रुति ज्ञान ते होई ॥
श्रुतिके बली जो पंडित पूरा । श्रुति द्वारे संशय कर दूरा ॥
तृतिये औध ज्ञान जब होई । मनकी बात जाने सब सोई ॥
जाके मनमें जो कछु भासा । सब औधते होय प्रकाशा ॥
चौथे कह मन परजय ज्ञाना । जो मनकी परजायको जाना ॥
जहाँ जहाँ मन छन २ करदौरा । जो कछु फुरै जाय जिहि ठौरा ॥
मन परजय सो सबही जानो । सूक्ष्म गति मन कछु नदुरानो ॥
पंचम केवल ज्ञान कहावै । ताकी उदय मुक्ति जिव पावै ॥
केवल ज्ञान जो हृदय प्रकाशा । सकल भर्म भयकेर विनाशा ॥
( ५४ )
बोधसागर
केवल ज्ञानी साधू जोई । गुप्त बस्तु तिनते नहीं कोई ॥
पंच पौरि जो ज्ञानको कहिया । ताको ऐसो लेखा लहिया ॥
मति ज्ञान जिहि पूरन होई । श्रुतिज्ञान अधिकारी सोई ॥
श्रुति ज्ञानते औध गहावै । औधते मन पर्जय जगिश्नावै ॥
मन परजयते केवल ज्ञाना । मतिश्रुतिऔधजोप्रथमबखाना ।
तीन पौरि लो भ्रम नहीं दूटै । चौथ पौरिते पंचम जूटै ॥
तीन ज्ञान लो हो अरु जाई । मन पर्जय नहीं फिर बिनशाई ॥
मन परजय अरु केवल ज्ञाना । होके बहुरि न कबहुँ लुपाना ॥
याहुमें विधि बहुत बखाना । पौरिहुको नहीं कछु बंधाना ॥
अकसमात कबहुँ अस होई । बिना औध केवल लह लोई ॥
बिन मन पर जयकेवल ज्ञाना । निर्णय जैन धर्मपर माना ॥
ज्ञानावर्ण ते ज्ञान न होई । अवरन भंजि लाभ हो सोई ॥
ज्ञानावरनी पंच बताओ । बहुरि दर्शना वरनी गावो ॥
इति
अथ दर्शना वरनी कर्मकोना प्रकृति वर्णन--चौपाई
द्वितिय दर्शना वरनी पहारा । जाके ओट अलख कर तारा ॥
चक्षु दर्शना वरनी जो बंध । जोजिव करै होयसो अंधा ॥
अक्षर दर्शना वरनी जाही । शब्द परसरस व्यौरा नाही ॥
औध दर्शना वरनी उदोता । विमल औध दर्शन नहीं होता ॥
केवल दर्शना वरनी जाहा । केवल दर्शन होय न ताहा ॥
ध्यान अरुझि निद्रामें परई । सो प्रानी विशेष बल करई ॥
उठि उठि चले करे कछु बाता । करे प्रचंड कर्म उत्तपाता ॥
निद्रा निद्रा उदय पुकारी । सके न सो जिव पलकउघारी ॥
प्रचला प्रचला जबलो गहई । चंचल अंग लार मुख बहई ॥
निद्रा उदय जीव दुःख भरता । उठै चले बैठै गिर परता ॥
जनधर्मबोध
( ५५ )
रहै आँखि प्रचलाते बांधी । आधी बंद खुली रह आधी ॥
सोवत माहँ सुरति कछु रहई । बार बार लछु निद्रा गहई ॥
इति
अथ वेदिनी कर्म द्विविधिवर्णन--चोपाई
कर्म वेदिनी द्वे विधि हुवा । साता एक असाता दूवा ॥
साता कर्म उदय जब होई । जीव विषय सुखवेदक होई ॥
कर्म असाता उदय जो होई । जिव वेदै दुख खेदत होई ॥
इति
अथ मोहनी कर्म द्विविधि वर्णन--चोपाई
दो विधि मोहनी कर्म बखानी । यक दर्शन यक चारित हानी ॥
दर्शन मोह दुविध उच्चार । चारित मोह पचीस प्रकारा ॥
प्रथम मोह मिथ्या ती होई । जिव जब और कि और गहोई ॥
दूजे मोह मिश्रकी चाला । सत् असत् गहै समकाला ॥
तृतीय मोह समकित कहीदीनी । जिन मलीन सम कितकह कीनी ॥
दर्शन मोह त्रिविध यह भाषा । सुन पचीस अबचारितशाखा ॥
प्रथमै सोलह कहो कषाई । फिर नौविधिको लेखलखाई ॥
प्रथम कषाय क्रोध कहि दीजै । जाकी उदय क्षमा गुन छीजै ॥
द्वितीय कषाय मान परचण्डा । बिनय बिनाश करे सतखण्डा ॥
द्वितीय कषाय है माया रूपी । जाकी उदय सरलता गूपी ॥
चौथे लोभ कषाय प्रकाशा । जासु उदय संतोष बिनाशा ॥
येही चार कषाय कहीजै । अनुक्रम सूक्ष्म थूल गहीजै ॥
सो चारो चौगुना करीजै । ताते सोलह भेद भनीजै ॥
अनन्ता अनबाँधिया कषाई । तासु उदै नहिं समकित थाई ॥
जाको कहिये प्रत्याख्यान । तहां सर्व संयमकी हानी ॥
उदय अप्रत्याख्यान होई । सो पञ्चम गुन थान करखोई ॥
जोत ज्वलन नाम कहलावै । यथा ख्यात चारित विनशावै ॥
( ५६ )
बोधसागर
क्रोध मान माया अरु लोभा । चारो चार चार विधि शोभा ॥
यह कषाय षोडश विधि बाना । नौकषाय अबनिज चितधरना ॥
राग द्वेषकै हासी होई । हास्य कषाय कहावै सोई ॥
मगन होय जबजिव सुखमाही । रति कषाय रस बरनौ ताही ॥
कछु न सोहाय जीवको जहवाँ । अरति कषाय बोलिये तहवाँ ॥
थर हर जहाँ जीव कँपाई । भय कषाय सो नाम धराई ॥
रुदन विलाप वियोग दुखारी । जहाँ होय सो सोग विचारी ॥
जहँ गलानि उपजै मनमाही । सो दुग्धा रोग कहाही ॥
त्रिविधि वेद स्थिति वर्णों सोई । नर अरु नारि नपुंसक जोई ॥
प्रथमैं सोई करिये वर्णन । जीव पुरुष वेदीको लक्षण ॥
यथा अग्नि तृण मूला केरी । शिखा उत्तंग तासुकी हेरी ॥
अल्पकाल अति आतप ताई । अल्पै काल माह विनसाई ॥
पुरुष वेद धारी जिव ऐसे । धर्म कर्ममें रह नित जैसे ॥
महा मगन तप संयम माहीं । तन तावै तनको दुःख नाहीं ॥
चित औदार उद्भूत परमाना । पुरुष वेद धर आतमरामा ॥
बनिता वेदी बहुरि कहींजै । जिमि कोइलाकी अग्नि गहीजै ॥
जिमि कोइलाकी अग्निहोतीखी । परकट धुवाँ न तामैं दीखी ॥
सिलिगिसिलिगि उरअंतरदाहा । रहै निरन्तर अति अवगाहा ॥
तिमि बनिता वदी नर होई । मीठी बोल बोलता सोई ॥
बाहर ताकी मधुरी बानी । भीतर कपट छिद्रछल सानी ॥
कपटलपट करिके अधिकारी । निजगलकुगतिको बंधन डारी ॥
पापकर्म औरनको सिखई । सबको अंध करे सो विषई ॥
आपा हनि औरनको हनता । निज कुमंत्र बहुतनते भणता ॥
बनिमा वेदी ऐसो गुनिये । तृतीय नपुंसक वेदी सुनिये ॥
नगनदाह सम प्रकट न दीसा । गुप्त पजावा अग्नि सरीसा ॥
जनधर्मबोध
( ५७ )
जैसे हो करसीकी आगी । रहै सदा उर अंतर लागी ॥
महाकलुषता नित उर जेही । वेद नपुंसक धर नर येही ॥
नर अरु नारि नपुंसक माही । भविधि मदनमद जैन कहाही ॥
प्रथम तीन मिथ्यात बखाना । बहुरि पचीस कषाय विधाना ॥
दोनों मिलि अद्रठाइस होई । मोह प्रकृत जानिये सोई ॥
इति
अथ आयुकर्म चारप्रकार वर्णन-चौपाई
आयू कर्महै चार प्रकारा । नरपशु देव नारकी धारा ॥
उदय मनुष आयू नरभोगा । पशुआयूते पशु संयोगा ॥
सुरआयू सुरपदको जाता । नारक आयू नरक निपाता ॥
इति
अथ नामकर्मको तिवानव प्रकृतवर्णन- चौपाई
छठये नाम कर्म कहलावै । जीवको मूरतवंत बनावै ॥
नाम कर्म यह चतुर चितेरा । मूरतखंच रंच नहिं फेरा ॥
पिंडप्रकृत चौदह परतारा । अद्रठाईस अपिंड विस्तारा ॥
पिंडभेद पुनि चौसठ भाषा । अद्रठाईस अपिंड मिलिसाखा ॥
ते दूनों तिरानवे होई । पिंड अपिंड बयालिस जोई ॥
सो तिरानवे करो बखाना । श्रवण लायके सुनो सयाना ॥
प्रथमहि पिण्डप्रकृत गतिनाना । सुरनर पशु नारकदुखधाना ॥
देवदेह सुरगति उद्यौता । नरशरीर नरगतिसे होता ॥
पशुगतिसे जिव पशुतन पावै । नरक गती ले नरक बसावै ॥
चहुगति पूरबी चारो गनिये । द्वितिये पिंडप्रकृतअब सुनिये ॥
मरनसमय तनतज जिवजबही । परभवगौन तौनकर तबही ॥
पूर्वप्रकृत ल्यावै तिहि प्रेरी । भावी गतिमें ल्यावै घेरी ॥
करे पूरबी आनि सहाई । धरि नवीनतन जिव प्रकटाई ॥
( ५८ )
बोधसागर
तृतीये प्रकृत इंद्री अधिकारा । यक द्वै त्रै चौ पंच प्रकारा ॥
परस जीव नासा हग काना । यथायोग जिव नाम बखाना ॥
सूक्ष्म इंद्री धरे जो कोई । मुखनासा हग कान न होई ॥
सो एकेंद्री थावर काया । भू जल अग्नि बनपती बाया ॥
जाको तन रसनायुत बादी । जलचर शंख जौं क गेडुवादी ॥
ऐसे जंत अनंत जो दीसा । ते द्वै इंद्री कह जैनीशा ॥
जाके तन मुख नाक हजुरा । घुन पमील अरु कान खजुरा ॥
ये सब जिव त्रै इंद्री भाषो । आंखिकानयुत रसजिनचाखो ॥
जाके तन मुख नासा आंखी । बीछूशलभ टीडी अलिमाखी ॥
यहि प्रकारके जिव जो नाना । सो चौ इंद्री जैन बखाना ॥
त्वच रसना नासा हग काना । ज्योंके त्यों पंचेद्रिय जाना ॥
नर नारकी देव पशुचारी । ये पंचेद्री करो बिचारी ॥
चौथी प्रकृत शरीर उचारी । औदारिक बसकिय वपुधारी ॥
औदारिक जो उदरसे होई । नर पशु योनि जानिये सोई ॥
देव नारकी भय किय देही । गर्भवास करते नहिं येही ॥
सुर नारक वय किय वपु धरते । देव देह मुनि तपबल करते ॥
जस प्राकृत तैसो तन गहेऊ । चौथी पिंड प्रकृत यह कहेऊ ॥
तनबंधन संघातन दोई । प्रकृत पंचमी छट्ठी होई ॥
बंधन उदय काय बंधाना । संघातनते हठ संधाना ॥
दोहुकी द्वै साखा द्वै खंधा । यथायोग काया सनबंधा ॥
अब सातमी प्रकृतको कहिये । सांगोपांग तीन मन लहिये ॥
कहो आठमी प्रकृत विचारा । षटविधि रूप शरीराकारा ॥
जो सर्वांग चारु परधाना । सो तनसम चतुरंश बखाना ॥
ऊपर थूल अधोगति ठामा । सोनिगोद पर मंडल नामा ॥
हेठ थूल ऊपर कृश होई । शांतिक नाम धरावै सोई ॥
जनधर्मबोध
( ५१ )
कूबर सहित वक्र वपु जांको । कुबजाकार नाम है ताको ॥
लघुस्वरूप लघुजाहि निहारो । तासु नाम बावन वपु धारो ॥
जो सरवंग असुंदर भुण्डा । ताको नाम कहावै हुण्डा ॥
अष्टम प्रकृत भेद षट भाषा । अब नौमे कह अस्थिकि साखा ॥
प्रथम बखान अस्थि आरंभा । सो षट विधिसै तनको थंभा ॥
वज्र कील कीलित संधाना । ऊपर वज्र पट्ट मंडाना ॥
अन्तर हाड वज्रमय राचा । सो कह वज्र ऋषभ नाराचा ॥
दुतियों हाडजह वज्र सो होई । वज्र मेखते अविचल सोई ॥
ऊपर बैठन रूप समाना । ताहि वज्र नागच बखाना ॥
तृतिये हाड जहवज्र सो देखो । रहित वज्र पट ऊपर लेखो ॥
नहीं वज्रकी लीजो होई । नाम नराच कहावै सोई ॥
चोथे हाड जो वज्र सो नाही । अर्धबेध कीली न तेहि माही ॥
ऊपर बैठन वज्र न जाही । अर्धन राव बोलिये ताही ॥
पंच महाडन वज्रसो जिनको । नहि पटबंधन कीली तिनको ॥
कीलित तब हट्ट बंधन धारे । नाम कीलका तासु उतारे ॥
छठी अस्ति अब वर्णन करही । जो यहि काल जीव सब धरई ॥
जहाँ हाडते हाड न बंधा । अमिल परस्पर संधिन संधा ॥
ऊपर नसा जाल अरु चामा । ताको कहिये छेवट नामा ॥
दशमी प्रकृत गमन आकाशा । शुभ अशुभ दो भेद प्रकाशा ॥
शुभ उग जीवकर्म शुभ करई । अशुभके उगे कुमारग धरई ॥
जैसी प्रकृत उदय जिहि होई । तैसा कर्म करे जिव सोई ॥
कहाँ ग्यारही प्रकृत बिचारा । ताको भेद पंच परकारा ॥
श्वेत अरु दुति पीत कहीजै । हरित श्याम पांचोगति लीजै ॥
जिहि जो संगप्रकृत उगि आवै । ताको तैसा बरण बनावै ॥
प्रकृत बारहीको रसनामा । पंच मकार देखिये तामा ॥
( ६० )
बोधसागर
कटुम मधुर अरु तित्त बखाना । अमल कषाय पंच परमाना ॥
रसके उदय रसीली काया । निजुनिजुप्रकृतिजीवसबपाया ॥
जो प्रकृत जाको उगि आवै । तिमि सो देह रसीली पावै ॥
तेरही प्रकृत गंधमय जाना । दुविधि कुगंध सुगंध बखाना ॥
जो जिव जैसी प्रकृत बंधा । ताके तनमें तैसो गंधा ॥
परसनाम चौदही बर्नीजै । आठ शाख तिहि माहैं गनीजै ॥
चिकनी रूप कोमल कठिनाई । लघुभारी तप शीतलताई ॥
औ चिकनी प्रकृत सुभाया । तब जीव गहै चीकनी काया ॥
रूपी प्रकृति उदयहो जिनकी । रूपी काया देखो तिनकी ॥
कठिनउदयतिन कठिनविहारो । मृदुल उदय मृदु अंग निहारो ॥
तस उदय हो तप तन येही । शीतल उदय शीत सो देही ॥
भारी नाम जो प्रकृत उद्योता । सो जिव भारी तनधरि होता ॥
लघुप्रकृतिजिहिजिवकह परई । हरई काया सो तब धरई ॥
चौदह पिण्ड प्रकृति यह भाषा । कहो बहुरि तिहिपै सठ शाखा ॥
अब अपिंडको वर्णन कीजै । अट्टाइस शाखा गनि लीजै ॥
प्रकृतअगुर लघु जब उगिआवै । जीव अगुर लघु तन तब पावै ॥
जबअपु घावउदय निजअंगा । आपु दुखी नर तासु प्रसंगा ॥
जब परघात प्रकृत परकाशा । तब जिव औरकोप्राणविनाशा ॥
जब उश्वासा प्रकृत निवासा । तब जिव लेत श्वास उश्वासा ॥
आतप उदय यथा इन भानू । उदितउदय तब शशीसमजानू ॥
तिस प्रकृत जब प्रकट निहारी । जंगम तनधरि जीवविहारी ॥
थावर प्रकृति प्रकाश जो होई । थिर तनधरि जिव चलैनकोई ॥
सूक्ष्म प्रकृति जाहिको परई । औरके मारे सो नहिं मरई ॥
बादल उदय न तन पावै । सबके मारे सो मरि जावै ॥
प्रजापति प्रकृति प्रकटाई । पूरी परजापति जिव पाई ॥
जनधर्मबोध
( ६१ )
उदय अपरजा पति जिहिपाही । पूरी देहु तासुकी नाहीं ॥
प्रकृति प्रत्येक उदय जब होई । काय बनस्पति हो जिव सोई ॥
जड़ त्वचकाठ फूल फल पाता । बीज मही तरास कह साता ॥
सातभेद तन जिव तहैं एकू । सो जिव कहिये राम प्रत्येकू ॥
दो विधि प्रत्येक बनस्पति जानो । प्रतिष्ठित अपरतिष्ठित मानो ॥
धार अनंत रास जो कायक । ताहि प्रतिष्ठित कहै सुभायक ॥
जामैं नहिनि गोदको धामा । अप्रतिष्ठित प्रत्येक सो नामा ॥
काय बनस्पति कह साधारण । सूक्ष्म बादर दुविधि विचारण ॥
संग्रह एक एकही देहा । तिहि कारण निगोद कहयेहा ॥
पिंडनिगोद है रास अनंता । पूरित नभको पावै अंता ॥
सूक्ष्म बादर दोय प्रकारा । नित्य अनित्य नाम जो धारा ॥
गोलक रूपी पाँचो धामा । अँडर खँडर इत्यादिकनामा ॥
सो सब नरक पातको जानी । तिनको दुख को सकै बखानी ॥
जीव निगोध एक तन माही । एते जिव कछु वर्ण न जाही ॥
धरे जन्म सब एकै बारी । मरण एकठे मास बिचारी ॥
एक श्वास उच्छ्वासके माहीं । तिनको जन्म भरन असआहीं ॥
जन्म अठारह बारहैं जिनको । मरब अठारह बारहि तिनको ॥
एक श्वास उच्छ्वासहि काला । तिनके जन्म मरणकोख्याला ॥
एक निगोद शरीरके माहीं । एते अमित जीव तहैं आहीं ॥
तीन कालके सिद्ध जो नाना । तिनकै एक अंश परमाना ॥
जीवगोदकी कथा अनंतो । वर्णन इत न होय बुधवंतो ॥
साधारण प्रकृति जब लहई । ताते जिव निगोदतन गहई ॥
साधारण प्रकृत लो बरना । चौदह शाखा तामैं धरना ॥
शेष और जो चौदह रहई । ऐसो ताको व्यौरा कहई ॥
थिरप्रकृत तनमें थिरताई । अथिर उदैते तन अथिराई ॥
( ६२ )
बोधसागर
शुभ प्रकृतिते सब शुभ रीती । अशुभ उदैं ते अशुभ गहीती ॥
जब सुभाग प्रकृत जिव धारा । सो प्रानी हो सबको प्यारा ॥
जब दुरभाग प्रकृति उगि आवै । तिहिलखिसबको जीव घिनावै ॥
जब स्वस्वर प्रकृति प्रकटानी । होय मधुर कोकिल सम बानी ॥
जब दुःस्वर प्रकृति तनधारा । साकी धुनि स्वर मनहुँ पुकारा ॥
जब आदेय प्रकृति संजूता । ताको आदर मान बहुता ॥
अनादेय परप्रकृत जब होई । आदर मान करे नहिं कोई ॥
जब जस नामप्रकृति नर पाहीं । ताको यश कीरति जगमाहीं ॥
अयश नाम परकृत फुरानी । अपयश अपकीरति जगठानी ॥
जब निरमान चितेरा आवै । सुंदर अंग उपंग बनावै ॥
तिरथंकर प्रकृतिके भेवा । सो जिव हो तिरथंकर देवा ॥
नाम प्रकृति अब पूर्ण कीने । पिंड अर्पिंड दोउ कहि दीने ॥
पिंड प्रकृति भाषे दशचारी । ताकी पैसठ शाख उचारी ॥
अट्टठाइस अर्पिंड गति बरनो । ते सब मिलि तिरानमें धरनो ॥
तन संबंधी दश पुनि औरा । यकसौ तीन गनो यक ठौरा ॥
इति
अथ गोत्रकर्मकी दो शाखावर्णन-चौपाई
गोत्र कर्म प्रकृति है दोई । ऊंच नीच कुल ताते होई ॥
ऊंच गोत्र उद्यौत प्रमाना । पावै जिव ऊंचे कुल थाना ॥
नीच गोत्रफल संगत पाई । नीच गोत्रगहि जिव प्रकटाई ॥
इति गोत्र
अथ अंतराय कर्मकी द्वि शाखावर्णन-चौपाई
अब सुन अंतराय निरबारा । अष्टम करम परम ठगहारा ॥
अंतरायकी नौ द्वै धारा । निश्चय एकएक व्यौहारा ॥
प्रथम कहो निश्चयकी बाता । जासु उदय आतम गुणघाता ॥
जैनधर्मबोध
( ६३ )
परगुण त्याग होय नहिं जहँवा । दान कि अंतराय कह तहँवा ॥
आतम तत्त्व लाभकी हानी । लाभ कि अंतराय सो जानी ॥
जबलो आतम योग न होई । योगको अंतराय कह सोई ॥
बार बार नहिं जगि उपयोगा । उपयोग अंतराय सो भोगा ॥
अष्ट कर्मते नहिं बिलगावै । बीरज अंतराय उगि आवै ॥
निश्चय कहीं पंच परकारा । अब सुन अंतराय व्यौहारा ॥
तुच्छ वस्तु कछु देय न सकई । दान कि अंतराय बल ठकई ॥
उद्यम किये न संपति होई । लाभ कि अंतराय कह सोई ॥
विषयभोग सामग्री जाही । जीवभोग करि सकै न ताही ॥
रोग होय कै भोग न जुरई । भोग कि अंतराय बल फुरई ॥
एक भोग सामग्री सारा । भोग ताहिको बारहि बारा ॥
कीजै सो कहिये उपभोगा । ताहूको न जुरै संयोगा ॥
यह उपभोग घात बिरुयाता । बीरज अंतराय सुन बाता ॥
जीवकी शक्ति अंत बताई । सो जग दशामें रही दवाई ॥
जगमें शक्ति कर्म आधीना । कबहुँ सबल कबहु बलहीना ॥
तन इन्द्री बल फुरै न जहँवा । बीरज अंतराय कह तहँवा ॥
ताते जक्त दशा परमाना । जैन धर्मध्वज बैन बखाना ॥
यह व्योहार प्रकृतिकह पंचो । तिहि विचार भ्रम रहै न रंचो ॥
प्रकृति विचार वर्ण यह भयऊ । जन जेष्ठ जस वानी कहेऊ ॥
इति अष्टकम्
अथ अष्ट कर्मकी आयुस्थितिवर्णन—चोपाई
ज्ञानी बर्नीकी स्थिति दीशा । कोडा कोडी सागर तीसा ॥
यह उत्कृष्ट दशा परमाना । एकमुहूर्त जघन्य बखाना ॥
दुतिय दर्शना वरनी कर्मा । थित उत्कृष्ट कहो सुन मर्मा ॥
कोडा कोडी तीस समुद्रा । एक मुहूरतकी थित छुद्रा ॥
( ६४ )
बोधसागर
तीजा कर्मवेदिनी जानी । कोडा कोडी तीस बखानी ॥
यह उत्कृष्ट महाथित सोई । जघन मुहूरत द्वादश होई ॥
चौथे महामोहको मानी । थित उत्कृष्ट जैनपति बानी ॥
सागर सत्तर कोडा कोड़ी । लघु थित एक मुहूरत जोड़ी ॥
पंचम आयू कर्मशरीसा । उत्कृष्टी सागर तैंतीसा ॥
थित जाघन्न मुहूरत एका । जैन ज्येष्ठ कह सहित विवेका ॥
छठये नामकर्म निरुवारी । कोडाकोड़ी बीस विचारी ॥
यह दीरघ आयू थितधारी । जघन मुहूरत कहिये चारी ॥
गोत्र कर्म सातमा कहाये । उत्कृष्टी थित बीश बताये ॥
कोड़ाकोड़ी काल प्रमाना । लघु थित एक मुहूर्त बखाना ॥
अष्टम अंतराय जो उजागर । कोडाकोडी तीस है सागर ॥
लघु थित एक मुहूरत धर्मा । आयू विविधि भांतिसे बर्ना ॥
दीरघ मध्यम लघु कहि भाषा । काल प्रमान भांतिबहुराखा ॥
इति
अथ सागरप्रमाणवर्णन—चौपाई
सागरको अब करों बखाना । जैनधर्मको सुनो प्रमाना ॥
योजन दोय केर चौकोरा । सागर नाम ताहिको शोरा ॥
दोय सहस्र कोश जिहि माहीं । योजन पक्वा कहिये ताही ॥
सोई योजन सुनो प्रमाना । ताका यह चौकोर बखाना ॥
भेडरोमके तहाँ लेआई । ताका यह चौकोर बनाई ॥
रोमखंड अस करे जो कोई । खंड एक पुनि खंडन होई ॥
रोमभाग सब यकठे करिये । सो सब तिहि सागरमें भरिये ॥
रोमखंड जब पूरन कीजै । सागर ऐसो कठिन भरीजै ॥
दाबि दाबिके ऐसे भरना । परमकठिन सो सागर करना ॥
चक्रवर्त सेना समुदाई । तिहि सागरपरसे लंघि जाई ॥
जनधर्मबोध
( ६५ )
दवै न हेठ भारसो पाईं । रोमखण्ड पूरण कठिनाई ॥
ऊपर हेठ रोम तहाँ भाली । रश्मिहु कतहूँ रहै न खाली ॥
अस पूरण चौकोर जो होई । सागर नाम बखानो सोई ॥
जितने खण्ड रोम गनि लीजै । तितने वर्ष प्रमान करीजै ॥
ऐसे कठिन पूर्ण लखि जाको । सागर एक नाम है ताको ॥
कोड कोड पर ताको गुनिये । कोडा कोडी सागर सुनिये ॥
तीस कोड अरु तीसै कोडो । सोलह सुन्न ताहिमें जोड़ो ॥
कोडा कोडी तीस कहीजै । यों सागरको लेखा लीजै ॥
कोडा कोडी सागर बनते । मानुष आयू ताते गनते ॥
एते कोडा कोडी जीये । ता पीछे तन त्याग सो कीये ॥
ऐसहि कूप समुद्र कहानी । जिमि सागरको लेखा जानी ॥
विविधि भांतिसे कीना लेखो । जैन धर्म सो निर्णय देखो ॥
लघु दीर्घ आयू बहुतेरी । यथाकाल बल तैसो हेरी ॥
जबलौं आगे कर्म न टूटै । तबलौं जीव योनिमें जूटै ॥
अष्टकर्म रिपु जो संहारे । तासु नाम अरिहंत पुकारे ॥
जब ये कर्म जीवते टलके । तिमिर विहाय रूप तब झलके ॥
इति
अथ बारह भावनी अथवा आत्मगुण वर्णन
दोहा—प्रथम अथिर अशरण जगत, एआन असुचान ।
आश्रय संबर निरजुरा, लोकबोध दुलभान ॥
चौपाई
जक्तवस्तु कछु थिर नहिं परसै । देहरूप आदिक जो सरसै ॥
थिर बिन प्रीति कौनते कीजै । अथिर जानि ममता तजिदीजै ॥
अशरण तोहि शरण कोइ नाही । देखो तीन लोकके माहीं ॥
बो० सा० ९
( ६६ )
बोधसागर
तेरो कोइ न राखनहारा । कर्मके वश चेतन निरधारा ॥
यहि संसार भावनी येहा । पर दर्बनसे कीजै नेहा ॥
तू चेतन ये जड सरबंगा । ताते तजो पराया संगा ॥
जीव अकेला आपतकाला । अर्ध मध्य भौन पाताला ॥
दूजा कोइ न तेरे साथा । सदा अकेला फिरै अनाथा ॥
भिन्य सद पुदगलसे रहई । भर्मभाव करि जडता गहई ॥
ये पुदगल रूपीके खंथा । चिदानंद तू सदा अबंधा ॥
अशुचि देखि देहादिक अङ्गा । कौन कुवस्तु लागि तेहि संगा ॥
हाड मांस रुधिरो गदगेहा । निरखि सूत्र मल तजो सनेहा ॥
असै परसे कीजै प्रीती । ताते बन्ध बढै विपरीती ॥
पुदगल तोहि अपन कोइ नाही । तू चेतन ये जड सबआहीं ॥
संवरपर रोकनको भाऊ । सुख होनेको यही उपाऊ ॥
चिदानंद हो निर्मल आपू । मिटै सहज परसंग मिलापू ॥
गहि लीजिये आपनो कर्मा । जाते प्रकट होय निज धर्मा ॥
थिति पूरी हो खिरखिर जाई । निरज्वर भाव बढै अधिकार्ई ॥
लोकमाहैं तेरो कछु नाही । लोक आन तू आन लखाहीं ॥
है यह षट्दर्बनको धामा । चिदानंद तू आतम रामा ॥
धर्म सुभाव आपनो जानो । आप सुभाव धर्म सो मानो ॥
जब तोहि धर्म प्रकट है आवै । तब परमात्म पदै लखि पावै ॥
दुर्लभ पर दर्बनको भाऊ । आपा नहिं दुर्लभ सुन राऊ ॥
जाँ तेरो है ज्ञान अनूपा । तौ नहिं दुर्लभ शुद्ध स्वरूपा ॥
इति
अथ जनयतिके अट्टाईस मूलगुण वर्णन
सोरठा-पञ्च महाव्रत सञ्च, सुमति पञ्च परकार है ।
इंद्रियाणि दम पञ्च, षट् अचार पृथ्वी शयन ॥
जनधर्मवोध
( ६७ )
तज मज्जन निरधार, बसन त्याग कच लुंचकर ।
लघुभोजन थित धार, दातन लेपन त्यागकर ॥
चोपाई
सब जीवनपर दाय्या पाला । सत्य वचन बोले तेहि काला ॥
परसे नहिं धन करे ससोई । मदन विकार न व्यापै कोई ॥
सकल परिग्रहको जिन डाले । अधो दृष्टि मारगमें चाले ॥
सूखी भूमि निरखि पद धरही । दयासहित शिवपन्थ विचरही ॥
निरभिमान अनवद्य अदीना । कोमल मधुर दोष दुख हीना ॥
ऐसे सुवचन सदा उचारा । सो जैनेश सुक्तिपद धारा ॥
उत्तम कुल स्नावक आचारा । तासु भौन सूक्ष्म आहारा ॥
दोष बयालिसको सो टाली । भिक्षा भोजनकी यह चाली ॥
धर्मवस्तु कछु संग्रह धारा । सूखी भूमि निरखि मल डारा ॥
सीत उष्ण दोउ यक सम वादा । गंध कुगंधो स्वाद कुस्वादा ॥
शब्द कुशब्द कुरंग सुरंगा । स्तुति निंदा दोउ यक ढंगा ॥
शब्द मित्र दोउ यकसम भाला । सामा यक साधै तिहुँ काला ॥
अरि हंतो सिद्धौ आचारी । उपाध्याय साधूगुण धारी ॥
पंच परम परमेशी बाना । सदा काल तिनका गुण गाना ॥
दोष विचारिके प्राश्रित करही । कृपा कर्ममें निजु चित धरही ॥
जैनेश्वर बानी अनुसारा । द्वादशांग आदर उर धारा ॥
काऊ सम मुद्रा नित धारे । हृदये सुद्ध स्वरूप विचारे ॥
सूखी भूमि शयन हितकारा । त्यागे त्रिविधियोग ममकारा ॥
पश्चिम राति नींद लघु गहई । धर्म ध्यानमहँ पावन रहई ॥
अंतर बाहर परम पुनीता । लेप नहान त्याग सब कीता ॥
नग्र दिगंबर मुद्रा धारी । विगलित लज्जा लोक विहारी ॥
एक बार लघुभोजन लेही । कच लुंचै तजि दातन देही ॥
इति
( ६८ )
बोधसागर
अथ जैन यतिको बाइस परीसा वर्णन
सोरठा-भूख प्यास हिम गर्म, हंस मशक डँस नम्र तन ।
अरतिकेरे दुख पर्मे, चर्जा आसन शयन कह ॥
खल वध बंधन बाद, जाँचै नहीं अलाभको ।
रोग परस न विषाद, मलमय आदर मान विन ॥
प्रज्ञा अरु अज्ञान, दरस मलीन दो बीसये ।
जैन परीसा जान, सहै जाहि रिषि राय नित ॥
चौपाई
एकपक्ष जब दिन बित गैऊ । उन ओदर भोजन तब लैऊ ॥
विधिवत जौं भिक्षा नहिं पाई । अंग शिथिल मनमें हटताई ॥
पर अधीन भिक्षा ऋषि राया । प्रकृति विरुद्ध जो भोजन पाया ॥
ग्रीष्म काल विहाली ठानी । सहै प्यास मांगै नहिं पानी ॥
हिम ऋतुमें कम्पै संसारी । बाहर तबहि खड़े व्रतधारी ॥
वर्षा वायु शीतको जोरा । सहै सकल नहिं तन मन मोरा ॥
भूख प्यास उर अंतर दगै । कोपे पित्त देहज्वर जागै ॥
ग्रीष्म धूप अग्नि सो लागे । सहत सबीसन धीरज त्यागे ॥
दंश मशा माखी डँसै सर्पा । भाल शृगाल केहरी दर्पा ॥
कनखजूर आदिक दुख देहीं । पाड़ा सह हटता गह येहीं ॥
विषय विकार जासु उर भरई । भेष दिगम्बर सो किम धरई ॥
महाकठिन यह नम्र परीसा । सहै शील धर जैन मुनीशा ॥
देश काल कारण को पाई । जक्त जीव मन व्याकुलताई ॥
ऐसी अरति परीसा भारी । सहै जैन सुनिधर्म सँभारी ॥
तियहग तीर शरीर न लागा । जगमें को असजन्म सुभागा ॥
को अस जेहि रतिनाथ न चंपा । मन सुमेर मुनिको नहिं कंपा ॥
चार हाथ देखत महिं चारे । कठिन कंकरी पायँ विदारे ॥