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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

शवासुखार

( २३ )

खोजि थाकि माता पई आए । काहु साँच काहु झूठ सुनाए ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेशा । सकुचि वचननहिं कहेवोमहेशा ॥
भाषा विष्णु सत्यकी रेखा । खोजि थाकि पिता नहिं देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूठ झूठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । साँच झूठ एको नहिं भाषा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढाय विश्रुति रमाई ॥
( तुम सुत करो योग तप जाई । शीश जटा तन भवम चढाई ) ॥
लेहु आमण्डल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवनी दीन्हा ॥

साखी—जप तप योग समै हठ, आगे ध्यान पसार ।

माना कह्यो क्रोध करि, चतुरमुख अन्ध अहार ॥

मातहि कीन्ह विष्णु पर दाय। मुखहि चूमके कण्ठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहु लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहैं तोर सेवा । गण गन्धर्व ऋषि मुनि देवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूठ लगावा । तेहि कारण विधि झूठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढ़े बहु भांति । कुकरम कर दिवस औ राती ॥
( विद्या वेद पढ़े बहु भांती । कुकरम करे दिवस औ राती ) ॥
एहि अवगुण गायत्री गार्ई । ब्रह्मा दोष शाप तिन पाई ॥
मृत्यु लोक गो धरे शरीरा । अघ भुगते चौरासी थीरा ॥
गोय होय नारी कल्यारी । अघनिचोए होए पातक भारी ॥
जहाँ लग पुहुप खान परकाशा । निरधिन ठारे तुम्हारो बासा ॥
झूठी बात वेद में निर्माई । च्यार वर्णमें बड़ी बड़ाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दक्षिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावे पूजा । गायलै सभे ब्रह्मा नहीं दूजा ॥
लए मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भए सो काल कसाई ॥

( २४ )

बोधसागर

खाए अखज चले एडाई । जस मडवाको स्थान अघाई ॥
ब्राह्मणहुको झूठी आसा । हरि नहिं भजे न हरिके दासा ॥
कहके बिर ब्रह्मा करोए । उत्तम जन्म पाय जड खोए ॥
जूठी बात वेद निरमाई । चार वर्ण आश्रमहिं दृढ़ाई ॥
ऋषि अगसी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उतपानी ॥
जेते ऋषि तेते मतधारी । अस्तुति करि हसेब तुम्हारी ॥
ब्रह्मादिक सुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विष्णु तुम्हारी ॥
निशिदिन ध्यानपिताकोधरिहो । किंचित ध्यानजोतअनुसरिहो ॥

साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि ।
तीनलोकगुण विस्तरेऊ, निरञ्जन आदि भवानि ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊमिलि यह मत परकाशा ॥
यह सब खेल कामनी कीन्हा । निरञ्जन बास झून्यभी लीन्हा ॥
ज्योति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥
सेवहु विष्णु निरञ्जन ध्याना । हे सुत वचन निश्चय मम जाना ॥
ताते ज्ञान अगम फैलाहो । जाते तामस सिद्ध कहा हो ॥
सिद्ध न कामत होइहै भारी । ज्ञान अगम गुण होहि भिखारी ॥
अंश दहन तन तामस भारी । असुरभाव पशु वासु वतारी ॥
मतपा खंड ठगोरी टोना । षट् दर्शन पाखंड खिलोना ॥
यंत्र मन्त्र विखया अधिकारी । अन्तर ध्यान भक्त बुव धारी ॥
तव गुण सहस्र नाम ऊचरिहे । एक अंश चौसठ योगिन होइहे ॥
कर खपरलें मंगल गैहे । यह उपदेश महादेव देहे ॥
( शंकर चिह्न इहै सो पैहैं । ) " " " " ॥
रजशुचि सतगुन दया समानी । असुरहतन भक्तन रजधानी ॥
आगम कहो संघ सुनि लिन्हेउ । जहां जसभावतहांतस कीन्हेउ ॥

शवासुआर

( २५ )

चारि खानि ब्रह्मे निरमाई । चामहि त्वचा लुब्ध लौ लाई ॥
शिवको वरन भेद नहीं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥
मात विष्णुपर दाया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥
(अनुभव दया विष्णु परकीन्हौ । )

पिताको दर्श विष्णु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥
माता पिता एक है गयऊ । विष्णु देखि चित हर्षित भयऊ ॥
माता पिता एक मिलि गयऊ । विष्णु समाय जोति महाँगयऊ ॥
तेहि पाछे जग सिरजे लेऊ । ताको वरण सविस्तर कहेऊ ॥
प्रथमें चारि खानि निरमाई । लक्ष चौरासी योनि बनाई ॥
चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीनिलोक सहिदानी ॥
चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाखण्ड सँवारा ॥
(चौदहभुवन करचो विस्तारा । )

लक्ष चौरासी योनी कीन्हौ । चारि खानि महाँ एकही चीन्हौ ॥
लक्ष चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जीव एकै साना ॥
रचना रची सखा बहु रंगा । सुर नर मुनि गणका मतरंगा ॥
कामदेवकी कला अंगंगा । पशु पक्षी सुर नर मुनि संगा ॥
कामकला सबही भरमावै । शिव शक्ती संग काम लगावै ॥
उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँशी ॥
कनक कामिनी फन्द बनावा । तेहि फन्दे सबही अरुझावा ॥
कनक कामिनी फंदा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥
नर बानर कीट पतंग सँवारी । सबके सँग करै रखवारी ॥
(नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥
पशु पक्षी जत कीट पतंगा । रक्षक भक्षक सबके सङ्गा ॥
शवासा सार होय गुआरी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥
पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढ़े साहु औ चौरा ॥

( २६ )

बोधसागर

चारिउ खानि होय गुञ्जारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥
देहदशा जस पुरुष सवारा । तैसी देह रची करतारा ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥

( अष्टधातु पिंजरा उपराजा ) ॥

पिंजरामें सुगना एक रहई । वाकी गति मञ्जारी लहई ॥
(यामध्य सुवना एक रहई । दावपरे मैजारी गहई ) ॥
सुगना पढ़ै दिवस औ राती । रक्षक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥
रक्षक भक्षक सङ्ग रहावै । सदा पढ़ावै घात लगावै ॥

) एक घातक एक सुआ पढ़ावै ॥

जस सुअना पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥
नख सिख रचाकाल फुलवारी । फूली वास कुबास सवारी ॥
कनक कामिनी काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥
कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ बखानि रहा विकशानी ॥
चारि खानि महाँ श्याम अमाना । काल कुटिल तेहि माहि समाना ॥
काल कलाकी खानि बनाई । शिव शक्ती महाँ रहा समाई ॥
(दया क्षमाकी खानि बनाई । नर नारि महाँ रहा समाई ) ॥
सुरनर मुनि सबही कह डहकै । चारिखानि सबके घट महकै ॥
चारिखानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन कोक सहिदानी ॥
तीन लोक श्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥
श्वासा संग काल अवतारा । विष अमृत दोनों संचारा ॥
श्वासा संगम काल औकाली । श्वास संग भये वनमाली ॥
प्रकृति पचीस सङ्ग जञाली । पञ्च पांचदश माल तमाली ॥
चन्द्र सूर श्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुष्मनि जोरा ॥

दोहा-श्वासा संग श्वासा, तेहिसे उपजा बरि आर ।

चन्द्रसूर्य हैं श्वासामध्ये, सकल विधिविस्तार ॥

श्वसगुञ्जार

( २७ )

शिव शक्ति सुखधाम है, जो चितज्ञानसमाय ।
सुखसागर अभिराम है, कालत्रासठरिजाय ॥

चौपाई

चन्द्र सूर जीवन सहिदानी । शक्ति शिवकी उपजे खानी ॥
(संयोग जड़ चित विदानी ) ॥

एक संग विष लहरी समानी । एक संग बसे अमृतकी खानी ॥
एक संग मन बसे अपारा । एक संग अमी जीव रखवारा ॥
एक संग काम क्रोध दुखभारी । लोभ मोह पाण्ड विकारी ॥
अहंकार लालच औ ममता । घिन्न औछतिलाज प्रतिहता ॥
एते एक वीरके साथी । माया मद जस मैगर हाथी ॥
एक संग शीतल शीलसुभेपी । इक संग छेमा सुबुधि विशेषी ॥
एक संग भक्ति रहे हितकारी । ज्ञान विवेक संतोष सुधारी ॥
दया दीनता निर्भय रमता । धीरज मतीसहज सुधि समता ॥
दुई घर दुवो राव कर वासा । इक घर राहु केतु प्रकाशा ॥
राहु अमावस सूर्यहि आसे । आसे केतु पूरणीमा चंद्रहीफाँसे ॥
दोउ करे यहि भांति बसेरा । खन बाहर खन भीतर डेरा ॥

( दोउ करे एक नगर बसेरा ) ॥

एकहि रथ दोऊ असवारा । बाहर भीतर मध्य दुवारा ॥
पांचों अविचल तुरे तुषवारा । ता ऊपर है जीव असवारा ॥
एक तुरे पियरे पट नेहा । एक नील रंग है देहा ॥
कुबेत एक लाल बहु रंगी । एस सजुज हरियारे अंगी ॥
एक श्याम सुशकी रंग भारी । पांचों एकते एक अधिकारी ॥
एक श्याम बदन रूपचारी । आप आप पांचों अधिकारी ॥
पांचों बसे एकही संग। एकही रथ मन जीव सुसंगा ॥
एक तब ले पांचों वासा । दाना घास पानीकी आसा ॥

( २८ )

बोधसागर

पांचों पांच घाट जल पीवै । दाना घास खाए सुख जीवै ॥
पांचों तुरै पहली पल धावै । छिनबाँधहि छिनछोरि कुदावै ॥
छिनबाहिर छिनभीतर आवहि । पांचों पांच ढुंड फिरि धावहि ॥
सुसरवर पार सो तवे ले आवै । सकल पराश तवे ले आवै ॥
इहि प्रकार जाही ओर आवहि । कोइ नियरे कोई दूर सिधावहि ॥
सुरंग तुरै जोजन भरि जावै । सुसकि योजन डेढ सिधावै ॥
हरियर दुह योजन पर जावै । योजन तीन पति पहुँचावै ॥
हंसा चारि योजन जो जावै । फिरिके दंडवत बेलै आवै ॥
(श्याम रंग आवै नाहिं जाई) ॥

यहि विधि पांचों आवै जाहीं । अपनि अपनि मंजिलके माहीं ॥
पांच तुरै रथ एक सुधारा । ताऊपर मन जीव असवारा ॥
जीव पराहै मनके हाथा । नाच नचावै राखै साथा ॥
पांचों तुरै होय असवारा । घेरे काल कलीके द्वारा ॥
यहि धोखा गहि जीव झुलाना । सत्य शब्दको भाव न जाना ॥
सत्य लोकके तुरै तुखारा । ताऊ पर सतगुरु असवारा ॥
हाहाकार करै चहुँ भाती । करै शिकार दिवस औ राती ॥
रथ ऊपर चढ़ि तुरो कुदावै । मारि जनावर ले घर आवै ॥
मारै बाण जान पर तानी । नख शिर वेधे धाव न जानी ॥
ताहि जानवरके शिर नाही । रुधिर मांस देह नहिं ताही ॥
देखत देहदृष्टि नहिं आवै । बिन देखे असमाने धावै ॥
( बिन देखे असमानहि धावे । ता धोकेमें जिव डहकावे ) ॥
ऐसा देखो जनावर जोरा । बन औ नगर करै घनघोरा ॥
ऐसो विषम जनावर भारी । मारि पारधी लीन्ह संभारी ॥
मारि जनावर नगर बसावै । वाहि ओल देहे बिलमावै ॥
एक नगर दुह रहे नरेशा । भित्र २ दोनों कर देशा ॥

शवासुञ्जार

( २९ )

ताहि नगर दुइ महल बनाये । दुइ दरवानी तहाँ रह्याये ॥
महा विकार दोऊ दरवानी । दोऊ रायकी सेवा ठानी ॥
करै उत्तपन्न दोऊ रजधानी । धर्म धीर औ आदि भवानी ॥
जो कछु उत्पति शहरमें होई । सो सब बांटे लेहि नृप दोई ॥
बांटे खजाना धरै दुराई । लेखा खरच उठावहि राई ॥
लेखा जानि खरच उठाई । लेखा खरच उठावै आई ॥
एक हवेली दस दरवाजा । अहुठ हाथ गढभीतर राजा ॥
राजा प्रजा सबैहि रहवै । इकछत राज चले नहि पावै ॥
दोउ राहुके शहर बताऊँ । बाहर भीतर प्रकट दिखाऊँ ॥
एक घर बसे मोह नृप भारी । ताकी साज विषय अधिकारी ॥
दूसरे घर विवेक बलधारी । ताकी सात सबै हितकारी ॥
इकघर राजा एकघर रानी । विधि संयोग मिलावै आनी ॥
एकघर सूर एक घर चन्दा । एक तेज विष अमृत मन्दा ॥
इकघर शक्ती इकघर शीवा । इकघर मन एकघर जीवा ॥
इकघर पाप एकघर पुन्या । इकघर सांच एकघर शुन्या ॥
इकघर भक्षक बसे अपारा । इकघर रक्षक है रखवारा ॥
इक राजा कर रक्षक नाऊ । रक्षा करै सदा सब ठाऊ ॥
एक राजाकर भक्षक नाऊ । भक्षै सबै न छाड़ि काऊ ॥
दूनों नृपति एकपुर माहीं । एक रथ चढ़ै एक सङ्ग ताही ॥
प्रथमहि भक्षक होइ असवारा । तहाँ जाय जहाँ है करतारा ॥
विषम सरोवर पहुँचे जाई । पैठि विषम जल माहि नहाई ॥
करि असनान तीर्थ परसै । झाई झलकि ज्योति तहाँ दरसै ॥
दुइ प्रतिमाको दर्शन पावै । आदि निरंजन ज्योतिदिखावै ॥
काली कालरूप विस्तारा । नाना रंग तरङ्ग अपारा ॥
देखि रूप मन हर्ष समावै । ज्यों पतङ्ग दीपक कहँ धावै ॥

नं. १० बोधसागर - ४

( ३० )

बोधसागर

देखत बहुत सुहावन ज्योती । नाना रङ्ग लागे बहु मोती ॥
जब परसै तब तेज अपारा । लागे आंच महा विष झारा ॥
सो विष लै भक्षक घर आवै । आनि जीव कहैं घोरि पियावै ॥
विषपिलाय जिव घात लगावै । रथते उत्तरि आपु घर आवै ॥
जब विष चढ़े आप बिसरावै । तब रथ चढ़िके रक्षक धावै ॥
रक्षक दूरि देश कहैं धावै । विषम सरोवर पार सिधावै ॥
विषम सरोवर तजि है पारा । जाइ जहाँ सतनाम पियारा ॥
अमर चोलना देखे जाई । चरण स्वरूप महाँ रहे समाई ॥
परसे सुरति नामकै पाया । मिटे जहर भइ निर्मलकाया ॥
दया तूरे चढ़ि उत्तरे पारा । परसे अमी तत्त्व विस्तारा ॥
अमी तत्त्व तूरे जब परसे । अग्र ज्योति अखंडित दुरसै ॥
वरषै अमृत अग्रही धारा । पिवे जीव विष होय निनारा ॥
सुख सागरमें सुधारस पीवै । लै अमृत फिरि घरहि सिधावै ॥
घरमें आइ रहा ठहराई । अग्र अमी धर राख छिपाई ॥
घरी आध घर माहि जुडावै । भक्षक जहर बहुरि लै आवै ॥
फेरि जहर जीवहि पहुँचावै । जीव सुख होइ अमी गँवावै ॥
जब भक्षक विष जीव पिआवै । फिर रक्षक अमृतकह धावै ॥
एहि विधि रक्षक भक्षक धावहि । एक विष एक अमृत लावहि ॥
विषम सरोवर भक्षक जाई । रक्षक सुख सागर पहुँचाई ॥
इहिविधि दोऊ करै रजधानी । इक दारुण इक शीतल बानी ॥
जादिनघर विधिने दुइकीन्हा । तादिन सोंपि खजाना दीन्हा ॥
दोइ नृपतिके दोइ स्वरूपा । राखै दाम चन्द सूर भूपा ॥
इकघर सूर्य एक घर चन्दा । इक दुख दारुण एक अनन्दा ॥
सकल समाज दोऊके हाथा । अविधि समानखजानासाथा ॥
भयर मता दोऊ घर भारी । श्वासा सार सुधारि सुधारी ॥

श्वसगुञ्जार

( ३१ )

बाँटिके दाम दोउ घर दीन्हों । अमृतविष विश्वासकर कीन्हों॥
रचि खानी बहु रंग अपारा । देह माहिं बहु देह सुधारा ॥
(रची देह बहु रंग अपारा । विष अमृत बहु रंग अपारा) ॥
अग्र देह एक देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य दुआरा ॥
(अष्ट देह यदि देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य अखारा) ॥
चारि विमल हैं चारि तरंगा । चारि सुरंग एक बहु रंगा ॥
(चारि विमल हैं फटिक तरंगा । चारि सुरंग श्याम बहुरंगा) ॥
दुइ उज्वल हैं बाहर वासा । दुइ उज्वल जलमध्य प्रकाशा॥
(दुइ उज्वल दल मध्य प्रकाशा । श्याम सुरंग अधर दुइवासा) ॥
श्वासा सुरंग अधर दुइवासा । जरद नील घर माहिं निवासा ॥
बाहर दुइ सफेद बहुरंगा । रूप अनन्त सत शक्ती संगा ॥
पार बसै सत्त्व सुकृतको डेरा । मध्यमें विषम सरोवर घेरा ॥
निस्तत्त्वकमलसुकृतसंयवासा । विषम सरोवर काल निवासा ॥
पुहुपदीप साहेबको वासा । सुखसागर ज्ञानी रहि वासा ॥
ताके और काल उच्छवासा । मान सरोवर काम निवासा ॥
ताके और कालकी आसा । विषम सरोवर काम निवासा ॥
सबके डरे निरंजन वासा । धरम दास तुम लखो तमाशा ॥
धर्मराह सुख पौन उड़ाई । विषकी लहरि ध्वजा फहराई ॥
ज्ञानीके सुख ज्ञान प्रकाशा । अमरसार सुधा रहि वासा ॥
गुप्त झांझरी पुरुष बनाई । अक्षे अमान ध्वजा फहराई ॥
प्रकट झांझरी काल प्रकाशा । तेजपूज विविधि रहिवासा ॥
जो रचना बाहरकी भाषा । सो रचना भीतर रचि राखा ॥
जो भीतर सो बाहर दरशै । तत्त्वहि तत्त्व तत्त्वतहँ दरशै ॥
तत्त्वकि रथचढ़ि बाहर आई । अमीकी रथ तहाँ परशै धाई ॥
क्षण बाहेर क्षण भीतर आवै । सतगुरुमिलै औ सहज बुझावै ॥
( निरखि परखि जब हेरे जाई । )

( ३२ )

बोधसागर

चारि तीर्थमहँ प्रतिमा भारी । सत्यसुकृत तहाँ पुरुष औ नारी ॥
स्वासा संयम राह सुधारी । देवल चारि देव हैं चारी ॥
घट भीतर घट राह अपारा । चाँद सूर्य ताके रखवारा ॥
उत्तर चँद तीरथ कहँ धावै । परसि तीर्थ अमृत लै आवै ॥
एकजीव दुइ अंग समाना । जन्द्र सूर्यके हाथ विकाना ॥
दक्षिण स्वर तीरथको धावै । तीरथ परसि जहर लै आवै ॥
शुक्लपक्ष जब पूनो जब आवै । तबही जीव चन्द्र घर आवै ॥
जलरैंग तत्व चँद असवारा । सो परसै घाइअमृत रसधारा ॥
जीव चन्द्रके साथेहि धावै । योजन चारि पार पहुँचावै ॥
करि असनान पुरुष पग परसै । निर्मल ज्योति अखंडितदरसै ॥
जब फिरि चन्द्र सरोवर आवै । बहुरि जीवसँगहि फिरि धावै ॥
आवत जात बार नहिँ लावै । पल पल जीव दरसतहाँ पावै ॥
कृष्णपक्ष अमावस जब आवै । तब फिरि जिव सूर्यघर आवै ॥
सूर्य तेजपर होइ असवारा । बरसै अग्नि अखण्डित धारा ॥
जाय निकसि योजन परवाना । विषय सरोवर करै अस्नाना ॥
परसै देव निरंजन पाई । लागे झार जीव कुँभिलाई ॥
जीव सूर्य फिरि कमल समावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥
सूर्यसंग विष पीवै अघाई । मूर्च्छित होय चन्द्रघर जाई ॥
जाय अमावस परिवा आवै । चढि रथ ऊपर चन्द्र सिधावै ॥
वायु तत्वपर होय सवारा । चले चंद दुइ योजन पारा ॥
विषम सरोवर पार सिधावै । मान सरोवर पारस पावै ॥
नागिनि एक सरोवर माहीं । पीय अमृत विषछांडे ताहीं ॥
सो विष खाय चन्द्रघर आवै । अमृतकी कछु खबर न पावै ॥
पल पल करै तीर्थ अस्नाना । भीतर बाहर एक समाना ॥
अमृत रहै भुजंगिनि पासा । भीतर बाहर एक प्रकासा ॥

श्वसगुआर

( ३३ )

साइ विष लेय तीर्थको आवै । चंद्र कमल पर जाय समावै ॥
एहिविधि चंद्रपक्ष चलि जाई । पाछै जीव सूर्य घर जाई ॥
पूनिमा बीते परिवा आवै । तब रथ चढिके सूर्य सिधवै ॥
सुरंग तुरै पर होय असवारा । योजन तीनि जाय चढिपारा ॥
सुखसागरमें पैठि नहाई । परसै योग सँताय न पाई ॥
अमृत मानसरोवर माहां । कामिनि दूरि धरै बोले ताहां ॥
सो अमान सुखसागर माहां । सूर्यके संग पीवे जिव ताहां ॥
पिये अमी जिव सूर्यके संग । मिटै तपत होय शीतलअंगा ॥
पल भीतर पल बाहर आवै । पीवै अमी रस तेज समावै ॥
जबही सूर्य अमीरस पावै । चंद्रहि पकरि आपुघर लावै ॥
जब चंदा आवै रवि द्वारा । होइ संक्रमण तेज अपारा ॥
तेज किरण पूरण जब होई । दरशाहि काल तपै रवि सोई ॥
तपै तेज बारहको धावै । सुखसागरमें पड़ि नहावै ॥
सुखसागरमें कर अस्नाना । उदितकमलहोइ द्वादश भाना ॥
सूर्यपर चंद होय जब जोरा । तब घर काल करै घनचोरा ॥
चन्द्र सूर्य कह राहु जो फाँसे । पल चन्दा पल सूर्यहि आसे ॥
इहि विधि देह डुइनको बाजी । पूनम धरिहि अमावससाजी ॥
चन्द्र सूर्य लै जाय अकाशा । सुखमुनिके घरदोजकर फाँसा ॥
मुसकि तुरौपर होइ असवारा । घरे शशि सूर्य अकाशके द्वारा ॥
जंबूद्वीप काल अस्थाना । सहज शून्य कह करै पयाना ॥
सहज शून्यमहैं पहुँचे जाई । सहज रहावै संग लगाई ॥
योजन डेठ सहजकर बासा । तहवाँ करै काल रहवासा ॥
सहज कालसों अंतर नाही । जीवहि छलै सहजकी बाही ॥
पलमें जंबूद्वीपहि आवै । पलमहैं सहज शून्यकहैं धावै ॥
एहिविधि चंद्र सूर्य दोह कांसै । काल सहज होय जीव गरासै ॥

( ३४ )

बोधसागर

चंद्र सूर्य दोउ अमृत पावै । काल सहज संग बाण लगावै ॥
बाण लगाय श्रुधा लेइ छीनी । जहर देइ चिव बुद्धि मलीनी ॥
जीवहि सदा कालकी आसा । तजि अमृत विष करही आसा ॥
कालहि राहु केतु होइ आवै । कालहि चंद्रहि सूर्य सतावै ॥
कालहि अमृत जीवसों लेही । कालहि जल थल बाजी देही ॥
कालहि प्रहण असत है जाई । देह विष अमृत लेइ छुडाई ॥
कालहि आगे पाछे धावै । कालहि रचै काल बिगडावै ॥
कालहि चारि खानि रचि राखा । कालहि सब घट बोलै भाखा ॥
घट २ काल करै रखवारी । एक देह दुइ अंग सँवारी ॥
एकअंग चंद एक अंग सूर । श्वासा पारस हाल हजूर ॥
इकइस हजार छःसै श्वासा । इतने एक घरी परकाशा ॥
निशिवासर बीते युग चारी । देओं अंग श्वासा संचारी ॥
दश हजार आठसै भारी । श्वासा चंद्र रनेह सुधारी ॥
जेतिक श्वासा चंद्र सनेहा । तेतिक चलै सूर्य सँग नेहा ॥
दशहजार तीनसै घाटी । चले चन्द्र अरु सूर्यकी बाटी ॥
दुइ हजार दुइसै अधिकारा । ताको भेद एक विस्तारा ॥
मध्यद्वार सहजके जाई । ता सुन्नह मों रहै ठहराई ॥
बारईस हजार चारिसै ऊने । जाप जपे जिव आप विहूने ॥
एकजीव तीनों घर संगा । राहु केतु शशि सूर्य अनंगा ॥
जाप जपै और तीर्थ नहाई । परसै देवल देय सहाई ॥
जब जिव सत्य सुकृत पगपरशे । तब निज ज्योति अखंडितदरशे ॥
जब जीव आदि निरञ्जन दरशे । हीरामें ज्योति तत्वजसपरशे ॥
तासु भेद मैं कहां बनाई । असिले गगनरु श्रुधा छुडाई ॥
जब परिवा पूनमकी साथी । तब चंद्रहि ले आवहि बाँधी ॥
राहुकाल होइ जाय समाई । अमृत छोड़ि पीवै दुखदाई ॥

श्वासगुआर

( ३५ )

चन्द्रके सुगममें जीवहि आसे । ग्रहण लगाय शून्यमहँ फांसे ॥
राहु काल जिव चन्द्र समाई । विष तजि मृत होइ छुड़ाई ॥
इहि विधि राहु चन्द्र कह घेरे । गहन गरासि ज्ञान कह फेरे ॥
अमृत छोड़ि विष सङ्ग लगावै । ज्ञान गर्मी उपजे नहिं पावै ॥
इहि विधि सूर्यहि केतु गरासे । अमृत हरि विष तेज तरासे ॥
इहि विधि दोउ सतावै काला । ता सँग जीवहि करै बिहाला ॥
जब चन्दा कह राहु गरासै । करमकाल ब्याल होय फासै ॥
उग्र होत है थास विवेखै । शशि और सूर्य दोऊ घर देखै ॥
छांडि केतु आप घर आवै । अपने घरमहँ सूर्य समावै ॥
सुरंग तुरेपर बाहर जाई । सुखसागर महँ पैठि नहाई ॥
योग सन्ताइनके पग परशै । निर्मलज्योति अखण्डितदर्शै ॥
अमृत पीवे तेज बल पावै । पल पल पीवे बहुरिघर आवै ॥
आपुहि मह विष अछप छिपावै । बहु विधि अमी सुधारस पावै ॥
पल भीतर पल बाहर जाई । जीवका मूल परसि सुखहाई ॥
पुनि जो चले सूर्यकी श्वासा । पूरण तत्व तेज परकासा ॥
कबहुँ सूर्य चन्द्र घर जाई । चन्द्रहि लाभ सूर्य पछिताई ॥
ज्यों लगि रहै चन्द्रघर सूर। तब लगि अमी अमान हजुरा ॥
इहि विधि तत्व छानि जब आवै । विद्वत्पुरुष हो अधिक पढ़ावै ॥
चन्द्र सनेह जीव तब पावै । पावे जानि भव बहुरि न आवै ॥
शशि और सूर्यग्रहण जब होई । तब देखै तन भेद बिलोई ॥
ग्रहण आसि छांडि जब कूरा । तब घर आवै शशि और सूर। ॥
अपने अपने घर जब आवै । तब नहिं कोई तत्व गवावै ॥
एकके घर एक जब आवै । कोई जीते कोई तत्व गवावै ॥
ग्रहण आस होत जब जाने । तो शशि घरही सुरलै आने ॥
शशि घर आवै शशि घरजाई । अग्रवास बासै लौलाई ॥

( ३६ )

बोधसागर

पुडुपबास तिल राखै छाई । तबके बासना बाहर जाई ॥
पुडुपके भीतर बास रहाई । सोई बास बाहर महकाई ॥
बाहरते भीतर लै आवै । ताके भीतर आनि समावै ॥
ताते वासन बाहर जाई । तिलके भीतर है ठहराई ॥
तिलते वासन बाहर आवै । बाहरते जो भीतर समावै ॥
भीतर वेधि एक जब होई । बास तेलमो रहै समोई ॥
समय-तौ लगि वास बहुत विधि, ज्यों लगि परैना तेल ।
तेल लाज छाड़िके डारै, दुइ मिलि होय फुलेल ॥

चौपाई

बास तेल मई रहे समाई । तेल काड़ि नहिं बाहर जाई ॥
तेलके संग बास महकाई । बासके संग तेल रहु छाई ॥
समय-लहा बास जहाँ तेल रहु जहाँ तेल तहाँ बास ।
एकै संग दूनों बसौ, महकै वास सुवास ॥

चौपाई

इहि विधि रहै दोऊ इक ठाऊँ । एकै बासना एक सुभाऊ ॥
बाहर कहि जब अंग लगावै । दुहे प्रतिमाको रूप दिखावै ॥
सुरति फूल मन तिलकी खानी । नाम बास जीव तेल बसानी ॥
बाहर फूल भीतर फुलवारी । रवि शशि करै दोय रखवारी ॥
तिल फूले विखियाकी खानी । दिनफूले निशि गिरतनजानी ॥
ऐसो फूल कुत्रिम उपराजा । तत्त्व तैल सबमध्य विराजा ॥
सोई तत्त्व मो अन्न सनेहा । तत्त्वहि तत्त्व मिलै तिल देहा ॥
तिल औ फूल एक सम कियऊ । तेहि पाछै पुनि प्राण बसियऊ ॥
दुख दीयते निकसेउ तेल । फुल देह तजि भयऊ फुलेला ॥
यहि विधि गुरु शिष्य जो होई । मुक्ति पंथ पावै पुनि सोई ॥
धर्मदास यह अद्भुत बानी । कही विचारि सुकृत सहिदानी ॥

शवासुआर

( ३७ )

उत्पत्तिकी गति सब हम पाईं । परलैकी गति कहौ बुझाईं ॥
रक्षक भक्षक एकहि सङ्ग । कहौ विचारि दोऊको अङ्ग ॥
जब साहब शिवशक्ति बनाईं । सो तो गम्य सबै हम पाईं ॥
सो शिवशक्तिकालरचिराखा । दोनों अङ्गधरि प्रकटी भाखा ॥
कामरूप विष वाण बनाया । कला अनन्तधरि प्रकटी काया ॥
घर घर शिवशक्तीसुत नारी । विरह वियोगसोगसुख भारी ॥
नाना रूप रंग उपराजा । उपजनविनसनसुखदुखसाजा ॥
कुल व्यवहार सकुचऔं लाजा । नात गौत रस लीला साजा ॥
चारि खानि बानिधरि गाजा । चारि बर्ण औ शर्म उपराजा ॥
लाज वरन कूरी कुल काजू । योग्य यज्ञ व्रत दान समाजू ॥
संपत्ति बिपत्ति रंक औ राजा । अन्न वस्त्र माया उपराजा ॥
सब ऊपर मन आप विराजा । मनबसि होय सैर सब काजा ॥
मन इन्द्री मई भोग संयोगा । मनै स्वाद औ स्वाद वियोगा ॥
मनहरता मन करता सोगा । मने रोग औ दुखसुख भोगा ॥
मनते कोई और न दूजा । मनसाहब मन सेवक पूजा ॥
मन देवल मन प्रतिमा साजा । मनपूजा मन तीर्थ विराजा ॥
मन शिवभक्ती विरह अपारा । रुधिरबिन्दु मनसिरजनहारा ॥
मनै जियावन मरने हारा । मनहिअशुभशुभ कर्मव्योहारा ॥
कर्मा कर्म मनहिते होई । भोग करै भुगतावै सोई ॥
मन भर्मित मन चेतन हारा । चारि खानि मनखेल पसारा ॥
मनशीतल मन तेज अपारा । मनश्वासा मन बोलनि हारा ॥
समय-चन्द्र सूर्य संग मन वसे, शुभ अशुभ मन आहि ।
श्वासा श्वासा मन बसे, कहि बरण गुण ताहि ॥

चौपाई

खानि खानिमनहोयअसवारा । फैलि रहा मन अगम अपारा ॥

( ३८ )

बोधसागर

चारि खानि मन रहा समाई । चारि चक्र चढ़ि बोले आई ॥
रोम रोम मन रहा समाई । आपहि मारे आपहि खाई ॥
आपहि भिक्षुक आपहि दाता । आपहि ईश्वर आपु विधाता ॥
आपहि चोर आप रखवारा । आपहि रचे आप संहारा ॥
आपहि सीखै आप बिसरावै । आपहि मेटे आप बनावै ॥
आपहि अन्य आपडिठिहारा । आपहिज्योतिआपउजियारा ॥
आपहितिमिर आप अँधियारा । आपहि मासपक्ष व्यवहारा ॥
आप निरक्षर अक्षर होई । गुप्त प्रकट होय बोले सोई ॥
नानारङ्ग ज्योति दिखलावै । आदि अन्त मनमनहिसमावै ॥
मनही नाद शून्य महाँ बोले । मनही ज्योति शून्यमहाँ डोले ॥
मनही कह सब ध्यान लगावै । मनको अन्त न कोई पावै ॥
मनही शास्त्र वेद है चारी । तीनलोक मन कथा पसारी ॥
निर्गुण सगुण मनहीकी वाजी । कवी पुराण कोकमन साजी ॥
ब्रह्मज्ञान कथि मनहि सुनावै । आपु छिपाय दूसर दिखलावै ॥

समय-आदिअन्तमन कर्ता, चारि खानि मनबास ।

बन्द छोरि करी मोपै, कहू मन्त्र प्रकाश ॥

चौपाई

सुनहुँ संदेश हंसपति आगर । पुरुष पुराण हंसपति सागर ॥
सुरति पुरुष हंसनके नायक । ज्ञान अतृप्त सुनी चितलायक ॥
कहो अग्र आग्रकी खानी । कहो ज्ञान विज्ञान बखानी ॥
चार खानिके श्वासा जेती । कहो बिचारि चले दम तेती ॥
अचल खानिप्रथमहि विस्तारा । तेहि पाछे पिंडज अनुसारा ॥
तिसरे अण्डज खानि सचारा । चौथे ऊषमज रचा अपारा ॥
चारि खानिको रचना भारी । चारि खानि संगहि अनुसारि ॥
प्रथम खानि सतसुकृत कीन्हा । रचना रचे निरञ्जन लीन्हा ॥

श्वासगुप्कार

( ३९ )

प्रथम अक्षय वृक्ष प्रभु कीन्हां । अक्षय बट है ताकर छीन्हां ॥
आदि अन्त पिंडज अनुसारा । जाते जग शिवशक्ति सुधारा ॥
तिसरे अंडज अर्ध निवासा । जाते जग पंछी परकासा ॥
चौथी खानि अमीरज कौन्हा । तेहि संयम उषमजकर चीन्हा ॥
चारि खानिकी चारिज बानी । श्वासा नेह देह सहिदानी ॥
चारि खानि मह एकै श्वासा । कहुँ खंडित कहुँ पूर प्रकाशा ॥
अचल खानिकी श्वासा भारी । चालि तीस पांच अधिकारी ॥
गिनती सौ हजार औ लाखा । श्वासा अचल खानि महराखा ॥
चारि पहर चारिज जग भारी । तीनी पहर श्वासा अधिकारी ॥
एक पहर वह उनमुनि रहै । ताते काल न आतुर गहै ॥
तीन तत्त्वकी रचना भारी । अचल खानकी देह सुधारी ॥
धरती तत्त्व भास अस्थूला । जल औ तेज ताहि कर मूला ॥
बाँए आकाश नहिं रहिवासा । तातेजड अचल खानि परगासा ॥
तत्त्व बिहून देह अनुसार । ताते जड नहिं वचन उचारा ॥
गहन ग्रास होत नहिं ताही । ताते बहु विधि बाढत जाही ॥
जाको गहन गारसे काला । सौ नहिं बाढे बेलि बेहाला ॥
अचलखानि बहुभांति सँवारी । नाना रंग रूप अधिकारी ॥
कतहुँ छोट कतहुँ बड भारी । कतहुँ साय सरवन सुधारी ॥
एक सुक्षम है एक अस्थूला । एक अमृत एक विषकर मूला ॥
एक खात पलमह मरि जाई । एक खातकछु अवधि बढाई ॥
इक खट्टा इक कडुवा होई । एक मधुररस खावे सोई ॥
एक विसौइध विषके रूपा । नामशब्द गुण भेद अन्त्रपा ॥
पांच सदा औ पांचौ रोगा । पांचौ औषध पांचौ भोगा ॥
पांच वास और पांच कुबासा । पांच पचीस रंग परकासा ॥
पांच पानि पांचौ रहि बासा । पांच शुभ और पांचविश्वासा ॥

( ४० )

बोधसागर

पांच पांच सकल पसारा । पांच रंग श्वासा अनुसारा ॥
तीनि तत्त्व अस्थूल निवासा । तीनि मध्य दुई बाहर वासा ॥
पांच तत्त्व सब इनके पास । जहाँलिंगआपलखनि परकासा ॥
पांच तत्त्व तीन गुण साजा । नारि एक तामध्य विराजा ॥
अचल खानिमह कीन्हे वासा । तामध्ये श्वासा रहि वासा ॥
चन्द्र सूर्य बिन श्वासाहीनी । ताते खानि जड भई मसीनी ॥
अचल खानि ताते जड होई । सूर्य चन्द्र नहि मध्य समोई ॥
नारी एक श्वासा संग ताहां । जहाँलै अचलखानिजगमाहां ॥
नारिसुषुमण अचल घटबासा । ताहि संग श्वासा रहि वासा ॥
ता घट दोई नारी नहीं होई । ताते चन्द्र सूर्य नहि दोई ॥
इंगला पिंगला नाहिन बासा । ताते रवि शशि नाहि निवासा ॥
चन्द्र सूर्य घटके रखवारा । एहि डोले एहि बोलन हारा ॥
चन्द्र सूर्य बिन जागे नाहीं । ताते अचल खानि जगमाहीं ॥
दुई दिन कोई मास गलिजाई । कोई छ मास कोई वर्ष रहाई ॥
कोई दश वर्ष माह जग राते । कोई तीस चालिस तन बासे ॥
कोइ पचास साठि रहि वासा । कोइ सत्तरी कोई असी नेवासा ॥
वर्ष इकावन कोई तन राखा । कोइ सौ हजार कोइ लाखा ॥
कोइ कोटि कोइ अरब निवासा । कोइ पेड चारों युग बासा ॥
इहिविधि अचलखानिकरभावा । औषधि व्याधिरोग उपजावा ॥
एक सजीवन जड़ी अनूपा । एक जडी विश्व तेज सरूपा ॥

समय-कोई शीतल कोइ तेज है, कोइ पारसकी खानि ।

फूल विना फल ऊपजै, सब फलफूल समानि ॥

चौपाई

इहिविधि अचलखानिउपजावा । तेहि पाछे अंडज निरमावा ॥

अंडज खानि सजीवक कीन्हा । चन्द्र सूर्य सङ्ग जीवन दीन्हा ॥

शवासुञ्जार्

( ४१ )

नख शिख खचोप उपराजा । श्वासा सहज अर्थ धुनिगाजा ॥
दुह सूर्य एक सहज घर शुन्या । तिहिं घर कर्म पापनहिं पुन्या ॥
दुई घर इंगला पिंगलाभारी । चांद सूर्य संग जीव संचारी ॥
ताकी श्वासा शक्ति सुधारी । अमृत प्रसन्नसहज सुख भारी ॥
पाँच तत्त्व रथ साजी थारा । तापर चंद्र सूर्य असवारा ॥
ताके संग जीव उठि धावै । मन तरंग रूप उपजावै ॥
सुरंग तुरै पर होय असवारा । सूर्य स्नेह जाए चढ़ि पारा ॥
विषम सरोवर पहुँचे जाई । विष धारामें पैठि नहाई ॥
करि असनान ध्यान लौ लावै । धर्मराय कह माथ नवावै ॥
परसै राय निरंजन देवा । पल मल करै ज्योतिकर सेवा ॥
चरण परसि भरमत घर आवै । रविजीवहि विष आनि पिवावै ॥
रवि रथ रहै चन्द्र उठि धावै । तुरै लीला सरवर पहुँचावै ॥
जीवसहित शशि पहुँच्यो जाई । मान सरोवर पढ़ि नहाई ॥
करि असनान देवपग परशै । कामिनि देह कमलमहँ दरशै ॥
लेके वास चन्द्र घर आवै । घर आवत यम ग्रहण लगावै ॥
पल पल कमल कमल महनावै । अंडज खानि दर्श नहिं पावै ॥
परसै चरण सरोवर दोई । आवत जात न लागे कोई ॥
श्वासा नेह देह व्यवहारा । एक लाख औ सात हजार ॥
एतिक श्वासा अंडज खानी । करै कुलाहल बोले बानी ॥
तत्त्व चले जोजन एक दोई । झाझरि पाटन बसे बिलोई ॥
खाज अखाज विचारै नाहीं । भर्मत फिरै सदा भव माहीं ॥
पल धरती पल फिरै अकासा । जल थल महिँहफिरै उदासा ॥
कायाके बहु रूप सवारी । नानारंग वरन विष धारी ॥
चञ्चल कुटिल कला मनधरहीं । नाना बानि शब्द उच्चरहीं ॥
करै कल्पना जगमँह भारी । नाचै गावै करै खुमारी ॥

( ४२ )

बोधसागर

उड़ि अकाश तरुवर फलखाहीं । पानी उत्तरि पीवै जगमाहीं ॥
जो चन्दा घर चन्दा आवै । तो चन्दा सत्यलोक सिधावै ॥
मान सरोवर पैठि नहावै । विष तजि अमृत घर ले आवै ॥
पुष्प द्रौप होय फिरि घर आवै । पुष्प द्रौपमहँ जाय समावै ॥
एहि विधि चन्द्रग्रहणको देखे । चन्द्र अंशकी श्वास बिवेखे ॥
आयु अंश श्वासा महँ पावै । तो चन्दा नहि मूल गमावै ॥
अंश जो आयु घरहिफिरिआवै । पूरी तत्व सदा सुखपावै ॥
उग्रह होते सुरघर आवै । तादिन चंदा मूल गमावै ॥
एहि विधि सूर सतावे काला । ग्रहण गरासि करे जंजाला ॥
उग्रह होते श्वास विवेखे । शशि औ सुर दोऊ घर देखे ॥
जहाँ पीवै पानी सब आवै । तहाँ दूतलै फंदा लावै ॥
एक तरुवर बनलासा लावहि । एकजल पीत चुगत सँतावहि ॥
एक पींजरा महँ जीव आवहि । रामनाम कह सदा पढावहि ॥
एक अमृत मुक्ताफल खाही । एकजलाहारफलआनिअघाही ॥
एक जीव मारिकै करै अहारा । एक जीव जीवहि कर चारा ॥
एक जोने बल बजाये अधीना । एकउज्वलजल ज्योतिमलीना ॥
जीव एकमत बहुत अपारा । एकउज्वलजलज्योतिअपारा ॥
श्वासा तेजी ज्ञानगा देहा । काम कलाते बहुत सनेहा ॥
अंडज देह महाबल भारी । वचन बिचारि करै सब झारी ॥
शुभ औ अशुभ दुही हैं ताहीं । एक मधुर एक तेज सुहाहीं ॥
एक सुहावन वचन सुनावहि । एक अपावन सुनतन भावहि ॥
तीनलोक भरि रहा समार्ई । ज्ञान गुमान करे सेवकाई ॥
त्रिविध ज्ञान लीए तन डौले । ऋतुऋतु बिरहका लिपै बोले ॥
तेजहीन नाना दशा कीन्हार् । ताकर भेद न काहू चीन्हार् ॥