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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्वसमवेदबोध

( १५१ )

धर्मदास गुरु चरनन परेऊ । तनमनधनतृणसम परिहरेऊ ॥
छप्पनकोटिकि संपति सारी । दियौ लुटाय सो रंक भिखारी ॥
एकै पुत्र परम प्रिय जाही । तजत बार नहिं लायौ ताही ॥
नारि पुत्र तजि भये उदासी । धर्मधुरंधर गुन गन रासी ॥
तन मन गहे भक्ति सो गाढ़ी । सतगुरुचरनप्रीति अति बाढ़ी ॥
परल्यौ ताको भक्ति प्रभावा । तब तेहि सतगुरु बचन सुनावा ॥
धर्मदास सुनिये मम बानी । तुमरे गृह प्रकटैगो आनी ॥
दशमें मास लेइ औतारा । हंसन काज देह निजु धारा ॥
सो जीवन को पार लँचावै । वंशकेर कँडिहार कहावै ॥
मेरे बचनते सो तन धारे । बचन सुरामनि नाम पुकारे ॥

धर्मदास बचन--चौपाई

हे प्रभु हम इद्री बस कीना । कैसे अंश जन्म तौ लीना ॥
धर्मदास अस बचन सुनाई । तब सतगुरु तिहि कह्यौ बुझाई ॥
पुरुष नाम धर्मन लिखि देहो । ताते अंश जन्म जो लेहो ॥
लखो सैनमें देहुँ लखाई । धर्मदास सुनिये चित लाई ॥
लिखो पान पूरुष सहिदाना । आमिन देहु पान परवाना ॥
धर्मदास आमिनिहि बोलाई । ले सतगुरुके चरन टिकाई ॥
धर्मदास परवाना दीना । आमिन पाय दंडवत कीना ॥
दशये मास जब पूजी आसा । प्रकटे अंश सुरामनि दासा ॥
सतगुरु बचन ते प्रकटे आई । बचन सुरामनि नाम कहाई ॥
मुक्तामनि पुनि नाम है ताका । जाते चली वंशकी साका ॥

इति

अथ चारों गुरुकी कथा--चौपाई

स्वसमवेद सतगुरु मुख बानी । चौदह कोटि ज्ञानकी खानी ॥
तत्त्व ज्ञान पुनि ताते काढ़ा । चारो वेद कान तिहि ठाढ़ा ॥
ऋग यजु साम अथर्वन चारो । ताते सब जग धर्म प्रचारो ॥

( १५२ )

बोधसागर

स्वसमवेदको चारो अंगा । ताते भये अनेकन ढंगा ॥
चारो वेद चहुँ गुरु गहेऊ । परमपंथ जाते जिव लहेऊ ॥
चारो गुरुकी कथा बखानो । सुकृत आदि भेद ग्रंथ प्रमानो ॥

इति

अथ प्रथमगुरु भवसागरमें उत्तर दिशा गोसाई धर्मदासजी-चौपाई

लोकमें सुकृत अंश कहलाई । भवसागर धर्मदास गोसाई ॥
उत्तर दिशा तासु गुरुवाई । गहि ऋगवेद जो पंथ चलाई ॥
जम्बूदीपो भारथ खंडा । प्रकटै गढ़बानौ महि मंडा ॥
सो गह कोट ज्ञानकी बानी । पंथ प्रचार कीन रजधानी ॥
वंश बयालिस ताने पाया । भवसागरमें पंथ चलाया ॥

इति

अथ धर्मदासजीके बयालिस वंशके नाम

दोहा-बचन सुरामनि प्रथम कह, बहुरि सुदर्शन नाम ।
कुलपति नाम प्रमोद गुरु, कौल नाम गुणधाम ॥
नाम अमोल कहाव पुनि, सुरति सनेही जान ।
हक्क नाम साहिब कहो, पाक नाम परधान ॥
प्रकट नाम साहिब बहुरि, धीरज नाम कह फेर ।
उग्र नाम साहेब कहो, उदै नाम पुनि टेर ॥
गीर्ध नाम साहिब तथा, नामप्रकाश कहाय ।
उदित मुकुन्द बखानिये, अर्ध नाम पुनि गाय ॥
ज्ञानी साहिब हंस मनि, सुकृत नाम अर्जनाम ।
पुनि रसनाम रु गंगमनि, परस नाम अभिराम ॥
जागृत नाम अरु भृगमनी, अकह कंठमणि होय ।
पुनि संतोषमनी कहो, चात्रिक नाम गनोय ॥
आदि नाम नेह नाम है, आदिनाम महानाम ।

स्वसमवेदबोध

( १५३ )

पुनि निज नाम बखानिये, साहेबदास गुणग्राम ॥
उद्दैदास करु नाम पुनि, दृगमनि महामनि हंस ।
मुक्तामनि धर्मदासके, बिदित बयालिस वंस ॥

अथ बयालिस वंशकी स्थिति वर्णन—चौपाई

वंशबयालिसकी थिति भाखों । सत्य कबीर प्रमान जो राखों ॥
बीस द्यौस अरु वर्ष पचीसा । सिंहासन थिति येती दीसा ॥
वर्ष पचीस बीस दिन केरी । भोग पूर्ण थित हो जिहि बेरी ॥
गद्दी सौंपे जो अधिकारी । निज इच्छा पर धाम पधारी ॥
जबलों थित करार नहि पूजै । तबलों राजसिंहासन भूजै ॥
तिनको कबहुँ न मृत्युकी पीरा । अमर कीन तेहि सत्यकबीरा ॥
गद्दीको करार नियरावै । सन्त महंत खबरि तब पावै ॥
सुने सन्त पृथ्वी चहुँ खूटे । दर्शन हेत जाय तहँ जूटे ॥
लेहि चलानेको जब बीरा । जग प्रत्यक्ष निरखे तेहि तीरा ॥
यहि विधि आप लोकचलि जाई । सन्त महन्त बिदा तब पाई ॥
हंसन प्रति गद्दी थिति ऐसे । वंश बयालिस भै जे जैसे ॥
संवत पंद्रहसौ अरु बीसा । वंश थाप तेहि समयसे दीसा ॥
जब तेरही पीढी चलि आवै । मुक्तामनि तबही प्रकटावै ॥
धर्म कबीर होय परचारा । जहाँतहँ सतगुरु सुयस उजारा ॥

इति

अथ दुतिये गुरुभवसागरमें दक्षिण दिशा गोसाईं चतुर्भुजदासजी—चौपाई

लोकमें अकह अंश परकाशा । महिमें सोई चतुर्भुजदासा ॥
दक्षिणदिशि गुरु ताहि प्रसंशा । ताके हैं सत्ताइस वंशा ॥
यजुरवेद विधि पंथ चलाई । कुशहर द्रौप माहिं प्रकटाई ॥
नय करनाटक तेहि रजधानी । गह टकसार ज्ञानकी बानी ॥

इति

( १५४ )

बोधसागर

अथ चतुर्भुजदासजीके सताइस वंशके नाम--चौपाई

प्रथम प्रेम कह दुतिय हुलासा । तीजे अन्हंद चौथ विश्वासा ॥
पंचम हित प्रीति है छठवें । सतवें निरख बिबेक है अठवें ॥
नौवें सत् छमा दशमें वद । ग्यरहें धीरज बरहें अनहद ॥
तेरहें शील संतोष चौदहें । पंद्रहें सुमति बुद्धि सोरहें ॥
सत्रहवें पुनि भक्ती जाना । उन्निस दया बीसवें जाना ॥
एकिस कृपा विचार बाइसे । एकपन तेइस मोक्ष चौबिसे ॥
पचिसवें मेद छबीसवें मोखा । सताईसवें सुमती चोखा ॥
लोकमें यह सब नाम कहाये । महिमें न्यारे नाम धराये ॥

इति

अथ तृतीये गुरुभवसागरमें गोसाई बंकेजी पूर्वदिशा--चौपाई

लोकमें जो हं अंश कहाया । भवसागर बंकेजी राया ॥
सोलह वंश तासुके होई । पूरब दिशिमें प्रकटे सोई ॥
पुश् द्रौप दरभंगा नगरे । सामवेद मम भाषे सगरे ॥
सो गहि मूलज्ञानकी बानी । पंथप्रचार आपनो ठानी ॥

इति

अथ राय बंकेजीके सोलह वंशके नाम जो लोकमें प्रसिद्ध हैं--चौपाई

माया प्रथम कर्म दुसरोई । तीसर अदल अष्ट कह सोई ॥
चौथ निरंजन छत्र मुनि पंचम । छठे आपमुनि पेख मुनिसतम ॥
अठयेजीत मुनिनौमशीतलमुनि । दशमें भृगुमुनि ग्यरहे कंठमुनि ॥
बरहे कलंकमुनि तेरहे गंगमुनि । चौदहे बिहंगमुनि पंद्रहेसोमुनि ॥
मुनि सो रहे जलरंग गोसाई । षोडशवंश केरि गुरुवाई ॥

इति

अथ चौथे गुरुभवसागरमें गोसाई सहतेजी पश्चिमदिशा--चौपाई

अंश हिरम्मर लोकमें होई । सहतेजी भवसागर सोई ॥

स्वतमवेदबोध

( १५५ )

पश्चिम दिशा करें गुरुवाई । वेद अथर्वन ताने पाई ॥
शालमलय जो द्वीप कहाई । मानपुर शहरमें सो प्रकटाई ॥
कथे ज्ञान लहि बीजक बानी । सात वंश ताके परमानी ॥

इति

अथ सहतेजीके सातवंशके नाम--चौपाई

प्रथमवर्ष पारस कहवाये । दुतिये स्वातिसनेही गाये ॥
तीजे भृंगसमीप बखानी । चौथे लहरसिंधु कहि गानी ॥
पञ्चम दीपक ज्योति कहाई । पुनि जलभाष षष्ठमें जोई ॥
सप्तम मलयागिर कहि टेरा । सात वंश सहतेजी केरा ॥
निज निज वंशन युत गुरुवारी । सत्यकबीरको धर्म प्रचारी ॥
जक्त जीवको कर उपदेशा । परम धरमको कहे सँदेशा ॥
इनते इतर पंथ बहुतेरो । सत्यकबीरकी कृपा चनेरो ॥

इति

अथ सत्यकबीरके बारह पंथ वर्णन--चौपाई

बारह पंथके नाम बतावो । प्रथम नरायणदास कहावो ॥
जेठ पुत्र धर्मदासके सोई । जागू पंथ दूसरो होई ॥
तीजे सुरति गोपाल पुकारा । मूल निरंजन चौथ उचारा ॥
पंचम पंथ आहि टकसारी । छठवाँ भागू पंथ पसारी ॥
सो बीजक ले ज्ञान सुनाया । सतयेमें सतनामी आया ॥
अष्टम पंथ कमाली होई । नौमें राम कबीर कहोई ॥
दशमें प्रेम धामकी बानी । ग्यरहें जीवा पंथ बखानी ॥
बरहें एक अचारज आयौ । अपनौ नाम कबीर बतायौ ॥
बारह पंथ सुयश गुरु गैहैं । सतगुरु कृपा परमपद पैहैं ॥

इति

( १५६ )

बोधसागर

अथ सत्य कबीरके इतरपंथ वर्णन चौपाई

प्रथमें नानक पन्थ बखानो । पानप बहुरि पंथ कहि गानो ॥
दास मलोक पन्थ परचारा । बहुरि गरीबदास विस्तारा ॥
इत उत देशन देशन माहीं । सत्यकबीर पन्थ जहँ ताहीं ॥
जहँतहँ देखो सत्य कबीरा । हिंदू मुसलमान गुरु पीरा ॥
निज इच्छाते सो तन धारे । कालजालते जीव उबारे ॥
कबहुँ योनि संकट नहि आवै । जीव दया करि सतगुरु ध्यावै ॥
जिन जिन सतगुरुको पहिचाना । सो अवश्य लह पद निर्बाना ॥

शब्द

हम बसैं चामके धाम हमें कोई क्या जाने ॥
पशुपंछी नरनाग जहां लगि सबै चामको साज ।
चामै चामको दाम बटोरै चामरंगको राज ॥
चामै मांडै चामै पोवै चामै करै रसोई ।
चामै चामको परसि जिवावै चाम करे सो होई ॥
चामै गावै चाम बजावै चाम करावै नाच ।
चामै चामको भाव बतावै चाम बीच है सांच ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हम हैं पूरे चमार ।
जो कोई हमको पहिचानै उतरे भवनधि पार ॥

सो गुरु खोज सो सन्त सुजाना ॥

जो गुरु खोजि अमरघर आवै पावै मूल ठेकाना ।
जिन गुरु गुरु पञ्च निरमाये रच्यौ जमीं असमाना ॥
तिनके कर्म कटे भवबंधन जिन ओहिगुरुको जाना ।
टीका मूल बिनपरगट कीनो चौदह कोटि जो ज्ञाना ॥
नहीं बोल भाषामें आवै शब्दसैन सो जाना ।
आशा बन्धते परगट कीनो जो जैसे अनुमाना ॥

स्वसमवेदबोध

( १५७ )

सारशब्द दियौ है पुरुषने आप तो गुप्त रहाना ॥
जिहि पारसते पुरुष ददाने करि चौका बंधाना ।
कहैं कबीर ये अगम गुरु है सही छाप परवाना ॥
दोहा-जेते पंथ कबीरके, भिन्न भिन्न विधि थाप ।
कहैं चौका अरु आरती, कंठी माला छाप ॥
तिलक रु कंठीमात्र कहैं, कहैं शब्दहि निरधार ।
कहैं आँढ़ कहैं भिन्न कछु, सबको तारन द्वार ॥
कोई त्रिगुणकी भक्तिमय, कोई तिनते न्यार ।
योग युक्ति करि सुक्तिपद, पावत यहि संसार ॥

इति

अथ नारायणदासजीकी कथा--चौपाई

धर्मदाससुत दास नरायन । भिन्न कथा कछु तं सु बतायन ॥
न्यारो पंथ आपनो ठाना । बारह पंथमें तासु मिलाना ॥
वंश माह द्वै भेद बखाना । प्रथम नारायणदासहि जाना ॥
वचन चुरामणि दुतिय बताई । वंशकेरि कड़िहारी पाई ॥
दोनो जगमें पंथ चलावैं । धर्मदासके वंश कहावैं ॥

इति

अथ जगजीवनदासजी सत्यनामकी कथा--चौपाई

सतनामी जगजीवन दासा । अवध देशमें पंथ प्रकाशा ॥
कोटवा नग्रमें सो प्रकटाना । आहि मध्यमहि हिंदुस्थाना ॥
राजपूत कुल कर ठकुराई । सतगुरु कृपाते पंथ चलाई ॥
न्यारो ज्ञान आपनो भाखा । ताके भई बहुत शिषसाखा ॥
कारी तिलक देहिं निज माथा । आन्दू बाँधें अपने हाथा ॥
आँढ़ एक भांतिको धागा । कंठीके बदले कर लागा ॥

इति

(१५८)

बोधसागर

अथ रामकबीरजीकी कथा--चौपाई

राम कबीरकी कथा कहीजै । वैरागिनको ज्ञान गहीजै ॥
ठाकुर प्रतिमा पूजे सोई । रामकृष्णको ध्यावै ओई ॥
इत कबीर पंथिनसे मेला । उत वैरागिनमें मिलि खेला ॥
रामकृष्ण सम्बन्धी जोई । प्रीति करे पूजै सब सोई ॥

इति

अथ नानकशाहजीकी कथा--चौपाई

नानकशाह कीन तप भारी । सब विधि भये ज्ञान अधिकारी ॥
भक्ति भाव ताको लखि पाया । तापर सतगुरु कीनो दाया ॥
जिदा रूप धरयो तब साई । प्रभु पंजाब देश चलि आई ॥
अनहद बानी कियौ पुकारा । सुनिकै नानक दरश निहारा ॥
सुनिकै अमर लोककी बानी । जानि परा निज समरथ ज्ञानी ॥

नानक वचन

आवा पुरुष महागुरु ज्ञानी । अमरलोककी सुनी न बानी ॥
अर्ज सुनो प्रभु जिदा स्वामी । कहैं अमरलोक रहा निजुधामी ॥
काहु न कही अमर निजुबानी । धन्य कबीर परमगुरु ज्ञानी ॥
कोई न पावै तुमरो भेदा । खोज थके ब्रह्मा चहुँ वेदा ॥

जिन्दा वचन

जब नानक बहुतै तप कीना । निरंकार बहुते दिन चीन्हा ॥
निरंकारते पुरुष निनारा । अजर द्रौप ताकी टकसारा ॥
पुरुष बिछोह भयौ तुव जबते । काल कठिन मग रोंक्यौ तबते ॥
इत तुव सरिस भक्त नहीं होई । क्यौ परपुरुष न भेटैउ कोई ॥
जबते हमते बिछुरे भाई । साठि हजार जन्म तुम पाई ॥
धरि धरि जन्म भक्ति भलकीना । फिर काल चक्र निरंजन दीना ॥
गहु मम शब्द तो उतरो पारा । बिन सतशब्द लहै यम द्वारा ॥

स्वसमवेदबोध

( १५९ )

तुम बड़ भक्त भवसागर आवा । और जीवको कौन चलावा ॥
निरंकार सब सृष्टि भुलावा । तुम करि भक्तिलौटिक्योंआवा॥

नानक वचन

धन्य पुरुष तुम यह पद भाखी । यह पद अमर गुप्त कह राखी ॥
जबलों यम तुमको नहीं पावा । अगम अपार भर्म फैलावा ॥
कहो गोसाईं हमते ज्ञाना । परमपुरुष हम तुमको जाना ॥
धनि जिंदा प्रभु पुरुष पुराना । विरले जन तुमको पहिचाना ॥

जिन्दा वचन

भये दयाल पुरुष गुरु ज्ञानी । गहो पान परवाना बानी ॥
भली भई तुम हमको पावा । सकलो पंथ कालको धावा ॥
तुम इतने अब भये निनारा । फेरि जन्म ना होय तुम्हारा ॥
भली सुरति तुम हमको चीन्हा । अमरमंत्र हम तुमको दीन्हा ॥
स्वसमवेद हम कहि निज बानी । परमपुरुष गति तुम्हें बखानी॥

नानक वचन

धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकटे संसारा ॥
धनि करता तुम बंदी छोरा । ज्ञान तुम्हार महा बल जोरा ॥
दिया दान गुरु किया उबारा । नानक अमरलोक पग धारा ॥

इति

चौपाई

यहि विधि नानक गुरुपद गहेऊ । शिष शाखा तेहि जगमें रहेऊ ॥
गुरुपद तजि बहु पंथ चलाये । अन्य देवकी सेव गहाये ॥
परमपुरुष पद नहीं पहिचाना । भांति अनेक बनायो बाना ॥
अजहुँ गुरुकी तीन निशानी । गहै कछुक गुरुकी निजबानी ॥
द्वितिये सत्यनामकी साका । तृतिये देखा श्वेत पताका ॥
क्षत्री कुल नानक तन धारी । ताको सुयश गाव संसारी ॥

इति

( १६० )

बोधसागर

अथ गरीबदासजीकी कथा--चौपाई

गरीबदासकी कथा बखानो । जाटके कुलमें सो प्रकटानो ॥
दिखी निकट नग्र छोटियानी । सतगुरु कृपा भयो सो ज्ञानी ॥
सत्यकबीरको सुशाय उचारा । जक्तमाहिं निज पंथ पसारा ॥
सतगुरुकी अस्तुति भल गावै । अधिक प्रीति मनमाहिं बढ़ावै ॥
एकसौ वर्ष ताहि चलि गयऊ । प्रकट गरीबदास तब भयऊ ॥

इति

अथ कबीर आचार वर्णन--चौपाई

सत्यनामकी सेवा धारा । सुमिरण ध्यान नाम निरधारा ॥
सतगुरु वर्णन प्रीति सुहाये । मूरतिको नहिं शीस नवाये ॥
तीरथ व्रत मूरति भ्रमजाला । सत्यभक्ति गहिये सत चाला ॥
निरगुण सरगुणको तजि दीजै । सत्यपुरुषकी भक्ति गहीजै ॥
संत गुरुकी सेवा धारे । तन मन धन अर्पण करि डारे ॥
कोटिन तीर्थ गुरुके चरना । संचय सोच पोच सब हरना ॥
दुखी दीन देखत दुख लागा । परमारथ पथ तन धन त्यागा ॥
गृही साधु दोउ एक समाना । परमदयाल दोहूको बाना ॥
मद्य मांस भेष जगमें जोई । महा मलीन जानिये सोई ॥
परम दया सब जिवपर पालौ । अधोहृष्टि मारगमें चालौ ॥
हिंसा कर्म जेते जगमाहीं । ताके कबहुँ निकट न जाहीं ॥
सब जीवनकी कर रखवाली । जीवघात कहुँ बात न चाली ॥
वर्षा ऋतु जब जिव अधिकारा । तब नहिं कबहुँ पंथ पग धारा ॥
अमल नाम जगमें हैं जेते । सकल अभक्ष जानिये तेते ॥

सत्यकबीर बचन

साखी-विष्णुधर्म जैनी दया, मुसलमान यकतार ।
ये तीनों जब जानि लै, तब जिव उतरे पार ॥

स्वसमवेदबोध

( १६१ )

चौपाई

तीनों जहाँ होय संध्या । सो कबीर आचारको ठड़ा ॥
शौच अचार शुद्ध सब करनी । उज्ज्वल किया बइल्लव बरनी ॥
अंतर बाहर परम पुनीता । हिसा रहित कर्म चितचीता ॥
जस जैनी जिव दाया पाला । ताही सम कबीर मुनि चाला ॥
मुसलमानके जिमि अछाहा । ताहीते निज नेह निवाहा ॥
तिमि कबीर मुनिके सतनामा । रह लौलीन सदा सो तामा ॥
स्वसमवेद विधि करि शुभकर्मा । सार शब्द गहि पावै मर्मा ॥
सतगुन गहे बइल्लव ताते । भाषे परम पुरुषकी बातें ॥
शुद्ध भेष सब शुक्लाचारा । शुक्लवर्ण शुक्ले व्यौहारा ॥
शली टोपी तुलसी माला । कंठी कंठमें तिलक विशाला ॥
सूत्र रु शिखा बइल्लव बाना । योग युक्ति गुरुधर्म प्रमाना ॥
करकमंडल चोला पहिरे । चर्चा ज्ञानमाहिं बड़ गहिरे ॥
तत्त्वमाहिं निःतत्त्व बताई । झीना ज्ञान कथै ऋषिराई ॥
असन वसन विधिवत सो धरई । धर्मवस्तु कछु संग्रह करही ॥

इति

अथ तिलकस्वरूपवर्णन—चौपाई

ऊर्द्धपुण्ड्र अरु दंडाकारा । शुभ्रतिलक तेहि सोह लिलारा ॥
नासा अग्र भागते काढा । मस्तक अंत प्रयंत लो ठाढा ॥
नाकबांस दोउ भुकुटी बीते । मस्तक अंत प्रयंतलों खींचे ॥
दंडाकार सो तिलक बताई । तासु महामन कहो न जाई ॥
यमदंडनको दंडक दंडा । कर्म भर्म सो कर शतखंडा ॥
परम बइल्लव तिलक जो धारी । तिलक देखियम बिलखि सिधारी
ताको अर्थ कहो किमि जाई । सुर नर मुनि कोइ पार न पाई ॥

बो० सा० ९/

( १६२ )

बोधसागर

दोय स्वरूप अकार बखाना । एक शूल यक सूक्ष्म जाना ॥
सूक्ष्म रूप अकार है एही । विष्णु विश्वंभर कहिये तेही ॥
स्वर व्यंजन द्वे भांतिके अक्षर । सबहीको मह पितु अकारबर ॥
स्वर अक्षरको आदि अकारा । सोई सर्व धर्म नय सारा ॥
स्थूलस्वरूप अकार जो कहिये । सकल स्वरनके आदिमें लहिये ॥
स्थूल रूप है जग विस्तारा । सूक्ष्म रूप रमै संसारा ॥
परम पुरुष है आदि अकारा । अमल अलेख अभेद अपारा ॥
आदि अकार जो गह्यो विकारा । ताते भयो सकल संसारा ॥
आदि अकारते तीनों गुन है । सतगुणरूप अकार विष्णु है ॥
शूल अकार विकार गहंता । सबही वर्णन माहिं रमंता ॥
वासुदेव सो रमै चराचर । लखि नहि परत सो अलख अगोचर ॥
संसृत महँ सोई आकारा । अछिफ पारसीमाहिं पुकारा ॥
सो अछिफ अछीह कहाया । ताहि अलिफते सबजम जाया ॥
ताकी सिफत कही नहि जाई । पीर पयंबर पार न पाई ॥
जो कोई अछिफ पहिचाना । ताही रूपमाहिं मिलि जाना ॥
चार खानि जेते जगमाहीं । बिना अछिफ कतहुँ कछु नाहीं ॥
कहुँ गुप्त कहुँ प्रकट निहारी । यह अछिफ सब माहिं बिहारी ॥
देखे ताहि कोइ कोइ साधू । जिनके हृदये ज्ञान अगाधू ॥
तेहि अछिफकी कथा अपारा । गिरा गनेश शेष कथिहारा ॥
नर बपुरा सो किहि विधि कहई । शिव सनकादिक मूक है रहई ॥
सत्य कबीरको तिलक है येही । वंशके साधु जो मस्तक देही ॥
इतर पंथको तिलक है न्यारे । वेद धर्मकी रीति बिचारे ॥

इति

अथ सत्यकबीरको धामक्षेत्र वर्णन—वार्ता

सहज सुरति संप्रदा धीरज धाम दशमद्वार त्रिपुटी तीरथ ॥

स्वसमवेदबोध

( १६३ )

मुष्मना सुख विलास । काया रामशाला अगम इष्ट । निश्चित
नाम उपाशी लौ माला मनसा देवी मनसो देव अलख अचा-
रज सत्य गोत्र समुद्ध शाखा वेदविचार खासा सुमिरन निह
अक्षर मंत्र प्रीति परिक्रमा जीव योग ऋषि निजमन निजब-
इच्छव निर्भय मुक्ती गुरु शब्द गुरुपाठ येता धाम क्षेत्र अवि-
नाशीकी सेजपर कबीरने सुनाया । इतना अर्थ ले काशी कबीर
गुरु रामानन्द पास आया ।

इति धामक्षेत्र

अथ जीवके अंतकालको वर्णन--चौपाई

अंतकाल जब जिवको आवै । यथा कर्म तस देही पावै ॥
हेट द्वार जब जीव निकाशा । नरकखानिमें ताको बासा ॥
ठेले नरक शीस बल जाई । ताहींमें पुनि रहै समाई ॥
नाभिद्वार जो प्रान चलाना । जलचर योनि माहिं प्रकटाना ॥
मूलद्वार कर जीव पयाना । पशू योनिमें तासु ठिकाना ॥
जीभ द्वारते जिव कढ़ि आवै । अन्नखानिमें बासा पावै ॥
श्वासद्वारते जिव जब जाता । अंडजखानिमें सो प्रकटाता ॥
नेत्र द्वार जब जीव सिधारा । मक्खी आदिक तन सो धारा ॥
श्रीन द्वारते जिव जब चाला । प्रेम देह पावै ततकाला ॥
दशमद्वारते निकसै प्राना । राजा होय भोग विधि नाना ॥
रंभ द्वारते जिव जब जाता । परम पुरुषके लोक समाता ॥

इति

अथ हंसनको स्थानवर्णन सत्य कबीर वचन--चौपाई

तेज अंड है पालँग बारा । द्वै पालँग मध्य अँघियारा ॥
सालोकमुक्ति मृतलोक बखाना । मानसरोवर तिहि अस्थाना ॥
धीया अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनि संग बिहारा ॥

( १६४ )

बोधसागर

जो कोइ बाम मताको ध्यावै । सो सालोक मुक्तिको पावै ॥
सहस साठ वैकुंठ रहाई । तहाँ सुमेर रहा ठहराई ॥
धर्मराय अविनाशी रहई । पुण्य पापको लेखा गहई ॥
तहाँ सामीप मुक्ति है सोई । नौसे सरखी तेरह सँग होई ॥
पांच शिखा सुमेर रहाई । पांचो अंश कला तहाँ लाई ॥
ईशान कोन ध्रुव आसन कीना । बाइब कोन इन्द्र अस्थाना ॥
नैऋत कोन यमनको थाना । अग्नीकोन इन्द्र अस्थाना ॥
जाको धर्मरायमें कहिया । मध्य विष्णु सिंहासन लहिया ॥
सहस साठ वैकुंठ प्रमाना । तहाँते शून्य डोरि बंधाना ॥
मारग जो निर्वाणहि ध्यावै । सो समीप वैकुंठहि पावै ॥
मेरुते शून्य अठारह कोरी । तहाँवा लगी शून्यकी डोरी ॥
शून्य मध्य है द्वीप अत्रूपा । तहाँ निरञ्जन ज्योतिस्वरूपा ॥
अंधकार है शून्य मझारा । द्वै पालंग शून्य बिस्तारा ॥
चार करोर ज्योति उजियारी । शोभा अद्भुत तासु निहारी ॥
सारूप मुक्ति सोई तब पाई । मारग भेद अघोर चलाई ॥
आगे अक्षरको अस्थाना । पालंग एक तहाँते जाना ॥
अक्षर योग माया विस्तारी । मुक्ति सायुज्य महे मतधारी ॥
तहाँते चार वेद परमाना । चौथी मुक्तिको यही ठेकाना ॥
तहाँते आगे कोइ न गैऊ । यह मत चारो वेदन कहेऊ ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनती चित लाई । साहेब कहो भेद समुझाई ॥
चार मुक्ति अस्थान बतावो । आगे कहो भेद जिमि पावो ॥
बस्ती शून्य बीचकी भाखो । समरथ मोहिगोय जिनिराखो ॥

सत्य कबीर वचन

धर्मदास तुम भलकै जानी । जो बूझो सो कहों बखानी ॥

स्वसमवेदबोध

( १६५ )

एक असंख्य अक्षरते आगे । अर्चित नामको डोरी लागे ॥
अथर द्रौप है ताको नामा । परम रम्य अक्षर विश्रामा ॥
निरतै प्रेम सुरति तिहि द्वारा । तिहि सँग सखी बारहहजारा ॥
तीन अंश आगे परमाना । ओहं सोहं को अस्थाना ॥
आठ अंश तहवों उपजाये । अंश वंश अस्थान बनाये ॥
ओहं सोहं होत उचारा । तहाँति शून्य डोर बंधाना ॥
आगे सहज सुरति अस्थाना । तहाँति शून्य डोर बंधाना ॥
आगे शून्य है पांच असंखा । मूल सुरत अस्थान विसंखा ॥
तेहि सँग हंस बावन हजारा । पांच ब्रह्म उनते उपचारा ॥
चार असंख्य शून्य तेहि आगे । इच्छा सुरति तहाँ अनुरागे ॥
खात सनेही जिनको धारा । तिन संग हंस पचीस हजार ॥
आगे शून्य असंख्य द्वै जाना । तहाँ अकूर सुरति अस्थाना ॥
पांचहजार हंस सँग सांचे । तिनकी सुरति हंस सब बांचे ॥
जहाँ अकूर केर परमाना । तिल परमान द्वार अनुमाना ॥
बिहग शब्द तहँ लागी डोरी । चढ़ि हंसा गये पुरुष सोरी ॥

साखी-सोरह असंख्य लोक है, धर्मन करो विचार ।

चार असंख्य है बस्ती, बारह सुत्र पसार ॥

चोपाई

आदि अन्त अरु वंश पसारा । तहँलगि देख शून्य बिस्तारा ॥
यतना तजि जब होय निनारा । हंसा आवै लोक हमारा ॥
हमैं चीन्हि सतगुरु रस पीये । कर्म तोरिके युग युग जीये ॥
निशदिन सतगुरु सुरति लगावै । साधु सन्तके चितै समावै ॥
जापर दया सन्त गुरु केरी । तिनकी कटी कर्मकी बेरी ॥
करि करनी अभिमान भुलाई । तन छूटे यम ले धरि खाई ॥
तन मन धन ले प्रीति लगावै । सो हंसा सतलोक सिधावै ॥
सत्यलोक है अथरस नीपा । ता मध्ये सत्ताइस द्रौपा ॥

( १६६ )

बोधसागर

सत्य शब्दको टेका दीना । ऐसे विधि पुहमी रचि लीना ॥
सागर सात तहाँ बिस्तारा । चलि हंसा जहाँ करे बिहारा ॥
पुहुपद्गीप है मध्य सिंहासन । कलाद्गीप हंसनको आसन ॥
सारखी-अबिगति भूषन अंगमें, अबिगति करे शृंगार ।
अबिगति बस्तर छाजई, अबिगति करे अहार ॥

इति

अथ प्रलय वर्णन--चौपाई

तीन प्रकारकी सृष्टि बखानो । प्रथमे ब्रह्म सृष्टि कहि गानो ॥
द्वितिये जीवकि सृष्टि कहायौ । तृतिये माया सृष्टि बतायौ ॥
ब्रह्म सृष्टि आचिन्त प्रमाना । जीव सृष्टि अक्षरते जाना ॥
माया सृष्टि निरञ्जन करता । सिरजै पोषै पुनि संहरता ॥
माया सृष्टि जाय बिनसाई । जीव ब्रह्म नहि प्रलैमें आई ॥
रचना सेखि निरंजन लेता । गूमट शीस माहि धरि देता ॥
शिरमें गूमट अजब कहाई । सकल सृष्टि तेहिमाहँ समाई ॥
प्रलयको घौस आव जेहिबारा । जत्त समस्त होय संहारा ॥
पुनि जलते पूरे संसारा । उठै चहुँ दिसि लहरि अपारा ॥
जलकी ऐसी बृद्धि बताई । अति उतंग पानी चढि जाई ॥
पृथ्वीते ऊपर जल सोई । दश योजन लों ऊँचा होई ॥
अन्तकाल कलियुग जब आवै । चीन्ह भयापन बहुत देखावै ॥
सवासौ वर्ष ग्रहन निरधारा । चंद ग्रहण सत वर्ष बिचारा ॥
ताहि ग्रनते लेखा लीजै । कलियुग लोक प्रवाना दीजै ॥

नानक बचन

परलय की विधि कहो दयाला । अलख ज्योति वर्षे केहि रूयाला ॥
काल बली तुमको नहि माना । प्रलयकाल तेहि कहा ठिकाना ॥

जिवा बचन

मुन नानक यह भेद अपारा । काल प्रलय जब करे संहारा ॥

स्वसमवेदबोध

( १६७ )

रचना निगलि निरंजन लेता । अमरलोकसे अलगहि रहता ॥
लै रचना फिरता सो रहई । गूमत शीशमें सब जिव गहई ॥
प्रलय द्वीपते पुरुष निनारा । सो साहिब नहिं जग औतारा ॥
प्रलय निरंजन संग पसारा । ले बैठे सब आप मझारा ॥
तेज रूप बतैं नौ खंडा । लेय समेटि सकल ब्रह्मंडा ॥
तीन देव चौकी उठि जाई । मेरु सुमेरु सिंधु चलि आई ॥
श्रुत्र अकाश बर्त नौ खंडा । पाँच तत्त्वको रहै न झंडा ॥
ऊँकार मठ रहै समाई । सो फिरता रह श्रुत्रमें भाई ॥
सत्तर युग लों झूलत रहई । ता पीछे अति संकट गहई ॥
तब युग सत्तर श्रुत्र रहीता । प्रलय करे सब जिवन भरीता ॥
फिर अमरावति छाह सिधाई । फिर सतपुरुषको टेरत भाई ॥
दुखित होय अरजी तब लाया । पुरुष दयाल देह मन भाया ॥
तबहिं पुरुष ज्ञानीको टेरो । जाय श्रुत्रमें कीजै फेरो ॥
कहो निरंजनपै अब जाई । कूर्म पीठपै बैठहु भाई ॥
चलिकै फिर हम तापहैं आये । पुरुष बचन ताको समुझाये ॥
सुनो निरंजन बचन हमारा । जाय कूर्मपै करो पसारा ॥
रचना करो सकल ब्रह्मंडा । जाय कूर्मपै रोपौ झंडा ॥
सुन्यौ निरंजन सो फरमाना । सुनिके बचन कियौ परमाना ॥
सुनि सो बचन निरंजन धाये । जहां कूर्म तहवाँ चलि आये ॥
बैठ कूर्मपै सतशब्द उचारा । रचना प्रकट भई सतसारा ॥
पाँचतत्त्व परगट तब कीना । सात शून्य पर आसन दीना ॥
जलके ऊपर मही छवाई । नवो खंड सूमेर रचाई ॥
तहैं सुमेर परबत फैलाई । तब मुखते अध्या प्रकटाई ॥
मिलि दोनो तिरदेव उपाई । यहि विधि सब रचना फैलाई ॥
उपजे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद शारद गौरि गनेशा ॥

इति

( १६८ )

बोधसागर

अथ नरक वर्णन--चौपाई

प्रथमहि जल रंगी कहि गाया । ताके ऊपर कूर्म बताया ॥
कूर्मके ऊपर मीन कहीते । मीनके ऊपर कच्छप थीते ॥
कच्छपपर बाराह बखाना । तापर शेष नाग अस्थाना ॥
शेषनाग निज शिरपर धारा । पृथ्वी सहित सकल महिभारा ॥
सात नरक चौरासी कुंडा । पर तामें पापिनको झुंडा ॥
तहुँ यमदूत ताडना करही । दंड प्रचंड जीव दुख भरही ॥

इति

अथ चौदह यमके नाम

दोहा-मृत्यु शृंग प्रथमै कहो, कोधित अंध बताय ।
दुगदानी तीजे कहो, मन मकरंद जताय ॥
चित्तचंचल पंचम गनौ, छठे अपर्बल नाम ।
अंध अचेत है सप्तमै, कर्मरेख पुनि मान ॥
अग्निघंट नौमै कहो, कालसेन पुनि चीत ।
मनसा मलई ग्यारहै, बरहे कह भयभीत ॥
पुनि तालुका है तेरहै, सूरधार दशचार ।
यमगन जेते नरकमै, ये चौदह सरदार ॥

इति

अथ सत्यकबीरके गुप्त होनेका वर्णन--चौपाई

संवत पंद्रहसौ उनहतर । देश उदैसे सतगुरु पगधर ॥
पुनि मगहर चलिगे गुरुदेवक । हिंदू मुसलमान जहँ सेवक ॥
बीरसिंह नरनाथ बघेला । सत्तकबीरको सो तहँ चेला ॥
बिजुलीखाँ पठान सोऊ राजा । शिष्य कबीरको तहां विराजा ॥
बिजुलीखाँ जब यह सुनि पाई । अब गुरु जगसे जाहि लुपाई ॥
तब तासे पूछौ सो भेवा । हिंदू मुसलमान गुरुदेवा ॥

वसमवेदबोध

( १६९ )

जब सतगुरुको निज तन त्यागे । कौन धर्म प्रभुको सुभ लागे ॥
हिंदू कैधौ मूसलमाना । मृत्युकर्म किहि विधिते ठाना ॥
तब कबीर तेहि उत्तर देऊ । जौ तुम लोथ हमारी लेऊ ॥
तौ अपनी कुलरीति विचारा । मृत्युकर्म कर तेहि अनुसारा ॥
पुनि गुरु बीरसिंह गृह गयऊ । राजा रानी हर्षित भयऊ ॥
चादर तानके पौढ़े जाई । भये अबोल कबीर गोसाई ॥
राजा रानी जब अस लखेऊ । बिकल भये सतगुरु तन तजेऊ ॥
रुदन करे जब राजा रानी । नग्र शोर भा लोगन जानी ॥
बिजुलीखां नृपको गुरुभाई । सुनत खबर तुरितै उठि धाई ॥
बीरसिंहसे बचन सुनावो । सतगुरु लोथ हमैं देखलावो ॥
नृप गुरुलोथ जो परगट कीन्हा । बिजुलीखां तेहि जोरसे लीना ॥
ले भाग्यौ सो गाड़ौ जाई । राय बीरसिंह तब रिसियाई ॥
लै निजु सैन संग तेहि बेला । चढे बीरसिंह राय बघेला ॥
दोनों दिशिते दल उमड़ाने । एक न कहा एकको माने ॥
जब घमसान होनेपर भयऊ । तब अकाशबानी अस कहेऊ ॥

कवित्त

अकथ कहानी तहैं बोले नभबानी सुनो, दोहु दल ज्ञानी ॥
जिव हानीमें न दीजिये । बिज्लीखां पठान कह ठाढे हो पठान ॥
पीर, सिंहजी बघेल दहपेल मति कीजिये ॥ हाड चाम देह ॥
जन्म मरन न पीर ऐसो, साहिब कबीर सत्य बातको पती-
जिये । कबुर खुदाय नहिं लोथ कहुँ पाय कछु, तहैं दरसाय
दोऊ भाग करि लीजिये ॥

बोपाई

यह सुनि दोनों रह ठहराई । तब चलिके सो कबुर खुदाई ॥
अस अचरज तहैं देख्यो जाई । कतहुँ लोथ गुरु दधि न आई ॥

( १७० )

बोधसागर

कबुरमें चादर पुष्प सो पाई । ले दोनों द्वे भाग बनाई ॥
मुसलमान तेहि कबुरमें धरेऊ । हिंदू ले समाधसो करेऊ ॥
हिंदुनके कबीर चौरा है । तुरकनके कबीर रोजा है ॥
इत हिंदू सेवै गुरुदेवा । सुरशिद मुसलमान उत सेवा ॥
बालरूप जब गुरु प्रकटाना । कमलपुष्पमें कर निज थाना ॥
अंतकाल जब गयौ दुराई । गौरमें सोइ पुष्प देखलाई ॥
आदि अंत जाके नहिं देही । जन्म मरण कबहुँ नहिं तेही ॥
सकल विकार तो जो प्रभुपारा । जीवकाज तनधर संसारा ॥
सह्यौ निरादर दुःख अधिकार्ई । निज दासनको दास कहाई ॥
सो सब जीव हेतको दीसा । समरथ परमगुरु जगदीशा ॥
कबुर बीचते गये लोपाई । मथुरा नग्रमें पहुँचे जाई ॥
नीरू नीमा जोलह जोला ही । तन तजिके परकटभे ताही ॥
दोनोंको निज शब्द गहाई । जाते भवनधि फेर न आई ॥
मथुरा नग्रते बहुरि सिधाई । धर्मदास ढिग सतगुरु आई ॥
धर्मदासहि बहु भांति शिखाई । सहितदेह पुनि गयौ लोपाई ॥
महा कठिन युग कलियुग होई । शुभ करनी जिव करे न कोई ॥
यज्ञ योग जप तप व्रत दाना । भावन भक्ति विषय लपटाना ॥
तिनको काज कौन बिधि सुधरे । बिन कबीर गुरु पार न उतरे ॥
दयासिंधु तेहि पार लँघावै । सत्यकबीर कि सरन जो आवै ॥

सत्यकबीर वचन

बावन बीर कबीर कहावो । कलियुगकेर जीव सुत्तावो ॥

इति

अथ स्वसमवेदकी स्फुटवार्ता-चोपाई

एकलक्ष अरु असी हजारा । पीर पयंबरको औतारा ॥
सो सब आहि निरंजन वंशा । तन धरि धरि निज पिता प्रसंशा ॥
दश औतार निरंजन केरे । राम कृष्ण सबमाहि बडेरे ॥