कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २८ )
ज्ञानसागर
सुनतहिं बलि अब धरे उपाऊ । अर्घ पाबडे कीन्ह बनाऊ ॥ नमस्कार कर पूछी बाता । आज्ञा कहा सुनौ तुम दाता ॥ माँगौं सो मोहि दीजै राऊ । दानी सुन आएऊ तोहि ठाऊ ॥ मोहि देव माँगौं जो स्वामी । महा पंडित तुम अन्तर्यामी ॥
छन्द
परनकुटी छावन चहैं महि देव तुम बलिराई हो । पग तीन माँगौं नापतै जायैं होय अटाव हो ॥ सुनि विहँसे बलिराय तबही अहो विप्र माँगौं कहा । हीरा रत्न मानिक पदार्थ छांड महिमें क्या रहा ॥ सोरठा-माँगौं थोरा दान, यही रुचि मोहि सुन नृपति । प्रथम वचन परमान, तृष्णा स्वारथ निधि कहौ ॥
चोपाई
शुक्र मंत्रि सुन शीश डुलावा । हे नृप दान मोहि नहिं भावा ॥ राजा सुनत कोथ तब कीन्हा । बृद्धि बोल मन्त्री मतिहीना ॥ लीन्हा नृपति हाथ कुशपानी । कीन्ह संकल्प मही दियो दानी ॥ मानहु विप्र वचन परवाना । लेव तहां जहँवौं मन माना ॥ तीनौं पुर तीनौं पग कीन्हा । प्रगटे हरि तब सबहिन चीन्हा ॥ देव पूरा नृप आधा पाऊँ । नातर जाय पुण्य परभाऊ ॥ लेव नापि प्रभु पीठ हमारी । तातैं विष्णु वाक्य मैं हारी ॥
छन्द
नाप दीन्ही पीठ अपनी बलि नृपति बड़ राइ हो । वाचा व्रत में बांधि राख्यो लक्षमता पैठाय हो ॥ विश्वास दीन्हा मुक्ति कौ भरमाई राख्यो तेहि हो । यही भांति प्रपंच कीन्ह्यो तपी सिद्ध सबहि हो ॥ सोरठा-बूझो सन्त मुजान, हरि दीन्हा जस मुक्ति फल । पछतइहो अन्त निदान, एक नाम जाने विना ॥
सनक सनन्दन चरित्र
ज्ञानसागर
( २९ )
सनक सनंदन चरित्र
चौपाई
सनक सनंदन चले हरषाई । पुर वैकुंठ सुमेर पर जाई ॥ जय रु विजय दोह रहैं प्रतिहारा । रोकि न तेहि न दीन पैठारा ॥ सुनिकै क्रोध ऋषि तब कीन्हा । जय रु विजय कहैं शाप जो दीन्हा ॥ हाऊ दैत्य तुम दोनों भाई । जाई रहो मृत्यु मंडल ठाई ॥ सुनिकै शाप दोनों गये जहँवा । हरि बैठे लक्ष्मी संग तहँवा ॥ कहिन जाइ तिहि ऋषिकर भाऊ । सुनकर विष्णु कीन्ह पछताऊ ॥ थोरी चूक शाप बड़ दीन्हा । नहिं भल कीन्ह अवज्ञा कीन्हा ॥ ऋषिन बुलाय कही अस बाता । है परभाव वैर कर घाता ॥
साखी—जय रु विजय कहैं शापेऊ, होहु दैत्य प्रभाव । ताको सुत तुम होहु अब, शाप का बदलौ पाव ॥
चौपाई
अब स्वामी तुम वचन प्रमाना । मो कहैं देव भक्ति भगवाना ॥ जय अरु विजय काल वश भयऊ । तिन कौ जन्म मनुष्यहि ठएऊ ॥ हिरनाकुश वा हिरनाक्ष राऊ । कीन्हा सेवा बहु शम्भू ठाऊ ॥ पा वरदान भये बलवन्ता । नहिं कोई देव यक्ष गुणवता ॥ सोई आन पुनि कीन्ह संग्रामा । भाजे देव छांड़ि सब धामा ॥
साखी—तब प्रपंच हरि कीन्हा, अस ठाना व्यवहार ॥ ताकी नार औधान रहि, भयो पुत्र अवतार ॥
चौपाई
हिरनाकुश जब भये हरषता । चले असुर घर जन्मो पूता ॥ सेवकन दीन्हैं रतन पदारथ । शिव सुत दीन्ह जन्म ममस्वारथ ॥ बर्ष पांच को भयो जो बारा । गुरु बुलाय पढ़ने बैठारा ॥ शिवकी भक्ति तुम याहि पढ़ावहु । माँगहु इच्छा सो फल पावहु ॥ लै घर विप्र गये तब बारा । पढ़ौ सुसुत शिव भक्ति विचारा ॥ प्रहलाद शिवको भक्ति जो धरहुं । हरषे नृप मम विथा बिसरहुं ॥
( ३० )
ज्ञानसागर
साखी-केतौ गुरु प्रबोधै, शिव न पद्वै प्रहलाद । विष्णु विष्णु गुरहार्वई, सुन गुरु करै विपाद ॥
चोपाई
एक बार नृप सभा मझारी । बैठे सुत कहैं कीन्ह गुहारी ॥ गये प्रतिहार ले आए बारा । गुरु समीप पढ़ने बैठारा ॥ हर्षत चूम्यो सुत को शीसा । सकलसभादियो बहुत अशीसा ॥ सुत मोहि कछु पाठ सुनावहु । कहौ वचन मम हृदय जुड़ावहु ॥ तब प्रहलाद पढ़न अनुसारा । धन्य विष्णु जिन काय सम्भारा ॥ पानी तैं जिन पिण्ड बनावा । तिहि प्रभुको कोइ अन्त न पावा ॥ अलख निरंजन देव सुरारी । सुनौ तात मैं तुव बलिहारी ॥ सुनत वचन हिरनाकुश राऊ । कोध कीन्ह जस अग्नि स्वभाऊ ॥
साखी-अहो मंद जड़ अकरमी, किमि ठानो मम बार ॥ जाइ 'पढ़ावहु' शंकर, नातर झोंको भार ॥
चोपाई
दिन दशमें पढ़ाइ लै आवहु । शिव कि भक्ति भली भांति सिखावहु ॥ नृप आज्ञा पढ़वे को दीन्हा । तब प्रहलाद पढ़े अस लीन्हा ॥ हरि तज काहि पढ़ौ मैं ताता । चार पदारथ के फलदाता ॥ भक्ति पक्ष सन्तन सुखदाई । जिन प्रभु सकल सृष्टि उपजाई ॥ तब नृप सुन अस वचन उचारा । मारहु सुत यह शत्रु हमारा ॥ हस्ति बुलाए अति बलवन्ता । चलत छांहि भुव देह पदंता ॥ ता कहैं आज्ञा दीन्ह भुवारा । देव महाबल आंकुश भारा ॥ साखी-हस्ति देख प्रहलाद कह, चले पराइ पराय ॥ नरसिंह रूप दिखराय हरि, भक्ति करत मन लाय ॥
चोपाई
तब नृप ऐसी युक्ति विचारी । जरत अग्नि देव सुत कहैं डारी ॥ अग्नि जरत तब पवन उड़ानी । प्रहलाद पढ़ै तब सारंग पानी ॥
नारदचरित्र
ज्ञानसागर
( ३१ )
तब नृप ऐसी युक्ति अरंभ । बांधो सुत कई गाड़ो खंभा ॥ जो कोइ होय तोर रखवारा । ता कई सुमिरो सुत हो वाग ॥ नातर छांडु विष्णु कर नाऊँ । अबही घात करो यहि ठाऊँ ॥ तब प्रहलाद सुभिरै भगवाना । कहा तू करब दैत्य बलवाना ॥ अहो धरणिधर अहो सुरारी । यहि औसर प्रभु लागु गुहारी ॥
साखी-खंभा सौं हरि नीकसे, की भयंकर गात ॥
आधा नर आधा सिंह का, कीन्ह दैत्य ही घात ॥
दोऊ बंधु महा बलि मारा । दैत्य मारि महि भार उतारा ॥ फारचो उदर नखन सौं छीना । सुर औ नरन हरष बहु कीना ॥ मांग प्रहलाद इच्छा फल आजू । तोहि भक्तलगहनौ दैत्यहि राजू ॥ कर जोरे प्रहलाद अस भाखा । हे स्वामी भक्तन प्रण राखा ॥ मोक्ष पिता कई दीजे स्वामी । मोहि भक्ति सुन अन्तर्यामी ॥ साधु साधु विष्णु अस भाखा । पुत्र पिता प्रण भल तुम राखा ॥ दोई जन्म आगे औतारब । तब तोर पिता देख मैं तारब ॥ तैं मम भक्ति कीन्ह बडि सेवा । ताकर फल भाषौ कछु भेवा ॥ दैत्य हते जब बाल कन्हई । आवै देव सबै तेहि ठाई ॥ करहि सुयस हरि सबहि बखाना । प्रहलादहि देवस्वर्ग अस्थाना ॥
साखी-कीन्ह इन्द्र प्रहलाद कई, सब मिलि कीन्ह विचार ॥
नरसिंहरूप नर कीन्हा, ताको यह व्यवहार ॥
नारद चरित्र
चौपाई
एक समय इन्द्र यज्ञ ठानी । निवते सिद्धि ऋषि औ ज्ञानी ॥ पहुँचे गन गंधर्व सब झारी । सब मिलि कीन्ह ज्ञान सुधारी ॥ जो कोई गया इन्द्र अस्थाना । इच्छा भोजन सब कई ठाना ॥
विभीषणचरित्र
( ३२ )
ज्ञानसागर
बहु विधि इंद्र करे सतकर्मा । पुरै न घंट जानसको मरमा ॥ तब नारद अस कीन्ह विचारा । धरौ धीर कहौ वचन उचारा ॥ ऋषि जमदग्नि इच्छा खावा । तिहिं प्रभाव अनंग जनावा ॥ ऋषि रत करें कै छाड़ैं ठावा । बजै घंट अस मता सुनावा ॥ सुनतहि ऋषितबकीन्ह पयाना । बज्यो घंट पूरण यज्ञ जाना ॥ साखी-ऋषि मन में तब बूझ्यो, जान करौ अब व्याहु ॥ ऋतमान जब आये, राजा कश्यप ठांहु ॥
चौपाई
देव नृपति कन्या इक मोही । मांगौ आजु जाव नृप तोही ॥ तब कन्या नृप दीन्ह बुलाई । कीन्हो व्याह ऋषी तेहि ठाई ॥ लै कन्या ऋषि घरहि सिधाये । भृगुकुलहरि औधानहि आये ॥ जो धर्मदास संशय कछु तोही । कहौ बुझाय चरित्र अब वोही ॥ भय क्षत्री महि व्याकुल भयऊ । मारन तासु जन्म हरि लयऊ ॥ निछत्र कीन्ह बहु जीव संहारा । बैर हेतु भृगुकुल औतारा ॥ सहसबाहु ऋषिगन जो मारी । पिता बैर सो प्रथम सम्हारी ॥ क्षत्री मारि निक्षत्री कीन्हा । भृगु रूप विष्णु को चीन्हा ॥ साखी-यहि विधि क्षत्री निकंदऊ, परसराम बली वीर ॥ आगे भाव बतावऊँ, सुनौ संत मत धीर ॥
श्रवण चरित्र
चौपाई
अवध नगर दशरथ बड़ राऊ । पुरुषारथ जिन कहौ प्रभाऊ ॥ तिनहि नारि बहु सबहि पियारी । रात दिवस जौ कर हित भारी ॥ एक समय आखेटहिं गये राऊ । पशु भोरे कियौ ऋषिकहँ घाऊ ॥ पानी तट ऋषि हरि हरि कीन्हा । नृप पछितानो जब मुनि चीन्हा ॥ ताके पितहि श्रवणकी बाता । तुव सुत दशरथ कीन्हौ घाता ॥
सती दाहकी कथा
ज्ञानसागर
( ३३ )
साखी-अहो ऋषि तुव सुत कहैं, दशरथ मारचो बाण ॥
यह चरित्र सुन सुनिवर, तत्क्षण छांड्यो प्राण ॥
दोनों ऋषी काल बस भयऊ । नृप अन्याय बैर हरि ठयऊ ॥
सुत बिहून जस ऋषितन त्यागा । तैसे काल नृप तोर अभागा ॥
पुत्रके शोक काल होय तोरा । देहू बैर कहा सुन मोरा ॥
नारद ऋषि तब कीन्ह तिवाना । राजा दक्ष यज्ञ जो ठाना ॥
देव ऋषी आये तिहि ठाई । सब नृप बहुते सेवा लाई ॥
ऋषि तब कहै सुनो दक्ष राऊ । शिवको जियत निवत बुलवाऊ ॥
इन्द्र यज्ञ जब निवत जु आये । गण गन्धर्व सब देव रहाये ॥
तहाँ शिव कीन्ह तोर अपमाना । आई कहौ सुन नृपति सुजाना ॥
सुनतहि क्रोध नृप पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-शिव विहाय सब निवते, चलै सबै तिहि पास ॥
देख गगना सुनि वरन को, सती वचन परकास ॥
चोपाई
हे प्रभु कहाँ जायैं सुनि राई । सो प्रभाव प्रभु मोहि बताई ॥
राजा दक्ष यज्ञ जो ठाना । तहाँ जायैं ऋषि चढे विमाना ॥
हे प्रभु मो कहैं आयसु होई । यज्ञ तात कर देखौ सोई ॥
निवते बिन न बूझियत नारी । ऐसी इच्छा आहि तुम्हारी ॥
चली सती तब लागि न बारा । पिता भवन तहैंवा पगु धारा ॥
देखत नृपति महा उर जरेऊ । काहू समाधान नहिं करेऊ ॥
व्याकुल भई दिगम्बर नारी । यही ब्याह मम कुल भई गारी ॥
सुनत विषाद सती मन जागा । परी अनल तब देही त्यागा ॥
हाहाकार भयो सभा मझारी । यज्ञ विध्वंस भयो सुन चारी ॥
हिमाचल गृह सती अवतरिया । गणदीन्ह नाम पारवती धरिया ॥
यहै चरित्र विष्णु जब देखा । शिव विवाह गुण मनमें पेखा ॥
शिवकी समाधि छुड़ानेके लिये कामदेवका प्रयत्न करना और नारदका कामवश होना तथा विष्णुको शाप देना
( ३४ )
ज्ञानसागर
साखी-शिव समाधि छूटै नहीं, कीन्हौ विष्णु उपाय ॥ काम भाग परंपंच कर, संगहि दीन्ह छिपाय ॥
चौपाई
सर समीर लागौ जब अंगा । बाल वृद्ध व्यापौ सब संगा ॥ बार बार सब जग बस भयऊ । ऋषिमुनिव्याप्तिकाम जो ठयऊ ॥ नारद ऋषि पारासर दोऊ । भये काम बस मुनिवर सोऊ ॥ तिन कुल व्यासदेव उतपानी । इनहू रति जो बरबस ठानी ॥ पारासर गए सागर तीरा । देख नारि मन धरहि न धीरा ॥ मछोदरी जा कहैं जग कहैं । व्यास देवकी जबनी अहैं ॥ नारद ऋषि किय तहां तिमाना । राजा एक स्वयम्बर ठाना ॥ ता कुल कन्या है कुलवंती । निश्चय व्याह करो जिहि संती ॥ चल ऋषि हरिमों बिन्ती कीन्हा । ब्रह्मा पुत्र कहि वचन अधीना ॥ हे स्वामी मोहि दीजे रूपा । करिहौ व्याह मोहि रुचि भूपा ॥ विष्णु अपन मन कीन्ह विचारा । कर परंपंच ऋषि सब झारा ॥ साखी-शिव की नारि बनाऊं, सोई करब उपाय ॥ भयो काम बस नारद, वैर देव मम भाय ॥
चौपाई
नहिं जाने नारद मतिहीना । वानरकर मुख ऋषिकर दीन्हा ॥ चलो ऋषी मन भयो अनंदा । कृपा कीन्ह मोहि बालगुविन्दा ॥ अवशि जाय हम व्याहैं नारी । जहैं पुनि पहुँचे तहां कुँवारी ॥ दर्पन दीन्हों सभा मैझारी । ऋषि अपनो प्रतिबिंब निहारी ॥ देखन ऋषि क्रोध तब कीन्हा । विष्णु भाव कबहुँ नहिं चीन्हा ॥ जब हरि बिहँसे नारद पाहीं । सती यज्ञ तुम बूझव नाहीं ॥ परबस देखत मैं तन जारा । अब मैं कीन्हा भाव तुम्हारा ॥ साखी-बूझ परचो नारद जबै, गहे विष्णु के पांय ॥ क्षमा करो अपराध प्रभु, नर कौ रूप बनाय ॥
विष्णुका दशरथके घर अवतार लेना अर्थात् रामकथावर्णन
ज्ञानसागर
(३५)
चौपाई
कन्या हाथ लीन जयमाला । नावहु गले गहि चरण गुपाला ॥ शिव विवाह पार्वती सों कीन्हा । सती हेत तिन भल कै चीन्हा ॥ तबही रूप प्रथम कर दीन्हा । दीन्ह शाप विष्णु सुन लीन्हा ॥ अहो विष्णु तुम वैर विचारा । तुमहु वैर देव व्यवहारा ॥ वसुधा भारहि व्याकुल आही । सुत पुलस्त महा बल ताही ॥ ले अवतार मारहुगे मोई । सो पुन हर तुम्हारा जोई ॥ नारदका जस कीन्हौ अंगा । तईसन जाय करो परसंगा ॥ बरबस वैर लेव सब पाहीं । विधिना रूप बनावै ताहीं ॥ विष्णु अपन मन कीन्ह तिवाना । काके गिरह लेहुँ अवधाना ॥ पूर्व जन्म जो दशरथ राऊ । सेवा कीन्ह यहा परभाऊ ॥ माँगिन तिन फल अंतक बारा । पुत्र होहु गोपाल हमारा ॥ आये नृपति संग त्रेनारी । सेवा कीन्ही यही प्रकारी ॥
साखी-लेव अवतार अयोध्या, दैत्य बधन जो होय ॥
आज्ञा भयी आकाश तैं, करु उपाय अब सोय ॥
चौपाई
हिरनाकुश हिरण्याक्षहि मारा । ताकौ दियो सुनिगृह अवतारा ॥ सुनि पुलस्त गृह जन्मौ बारा । रावन कुंभकर्ण बरियारा ॥ जा कहैं विष्णु स्वर्ग कर राऊ । भक्ति हेतु ता कहैं जन्माऊ ॥ नाम विभीषण भक्त हरि केरा । जपै विष्णु नहि लावै बेरा ॥ नृप कश्यप दुतिया अवतारा । सो तो भयऊ अवध भुवारा ॥ तिनके गृह अवतारहि लीन्हा । अपने अंश चार तिन कीन्हा ॥ राजा के गृह जन्मौ बारा । ज्योतिष राम वर्ग उच्चारा ॥ जेष्ठ पुत्र कौशलया सुतही । राम नाम थापो पुन तबही ॥ सुमित्रा के दोई बालक आही । लषन शत्रुहन भाषौ ताँही ॥
( ३६ )
ज्ञानसागर
दोई जन्म सुमित्रा किये सेवा । तातें हरि प्रगटे दोई भेवा ॥ कैकई सुतहि भरत जो भाखा । विप्रन दीन्ह पदारथ थाका ॥ कौशिक ऋषि आये तेहि ठाई । नृप दशरथ तब हित बहु पाई ॥ बार अनेक दण्डवत कीन्हा । नृप कहँ आशिर्वाद जो दीन्हा ॥ है प्रभु कह आयसु जो होई । कृपा करो जिन राखौ गोई ॥ जेष्ठ पुत्र जो राम सुजाना । ताहि देव नृप हो मम माना ॥
साखी-नृप बूझौ मन आपने, दिये बनै परकाज ॥
थाती सौपौ पुनि तुमहि, आन देखु मुनिराज ॥
चौपाई
राम लक्षण चले मुनिके साथ। ताडुका बांधि व्याहब रघुनाथा ॥ चले राम लछमन मुनि संग। देख रूप जैसे कोटि अनंगा ॥ दिक्षा मंत्र दियो ऋषि जानी । दीन्ह जाप कहि अमृत वाणी ॥ ऋषि आश्रम आये रघुराया । यज्ञ शाला मुनिवर बैठाया ॥ दीन्ह तुरंत तब निर्भय भारा । मुनिकै दैत्य जो करै संबारा ॥ आये बीर महाबल भारी । लागी होन परस्पर मारी ॥ मुनिवर आज्ञा दीन्ही जबही । ताडुका दैत्य मार हरि तबही ॥ ताडुका दैत्य राम जब मारा । ऋषि मुनिवर तब कियो यज्ञ शाला
साखी-मिथिला नगरी रहत हैं, रच्यो स्वयंवर राय ॥
चलो राम सो देखिये, मुनिवर संग सहाय ॥
चौपाई
चले राम लक्ष्मण औ राऊ । मिथिलानगर अब धरिये पाऊ ॥ पाहन शिला जबै पग लाग। प्रभु प्रगटे जो खटका भागा ॥ गौतम नारि अहिल्या नाऊँ । ताको हरि पठई निज ठाऊँ ॥ समाचार मिथिलापति पाये । आदर कै मुनिवर लै आये ॥ समाधान नृपति बड़ कीन्हा । उत्तम मंदिर बैठक दीन्हा ॥
ज्ञानसागर
( ३७ )
जो कोइ आय जान यज्ञ शाला । सब कई पोषण कीन्ह भुवाला ॥ पहुँचे अवधि सुदिन आये । राजा नगर महाँ ढोल बजाये ॥
साखी-जाके बल बहु होवै, धनुष उठावै सोय ॥
सीता ब्याहों ताहिको, मिथ्या वचन न होय ॥
चौपाई
चल भइ सीता जहाँ फुलवाई । देवी पूजन मातु पठाई ॥
आवत राम मार्ग जब देखा । सुफल जन्म आपुनतब लेखा ॥
अहो अंबिका आदि भवानी । सुनिये मातु तुम अन्तर्जाभी ॥
मोर मनोरथ पुरबो माता । सो बर देव जो मनमें राता ॥
बिधि विन्ती सीताकी जानी । ततक्षण भई अकाश तें वाणी ॥
अहो सीता लक्ष्मी अवतारा । निश्चय तोर राम भरतारा ॥
सुनत संदेशा भयो अनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चंदा ॥
देवी पूजि गई निज सीता । मनमें हर्ष बहुत पुनि कीता ॥
आई सिय जहाँ सृष्टि भुवारा । उठै न धनुष सबै बल हारा ॥
रावन बालि महा बलधारी । उठै न धनुष सबै बल हारी ॥
जब नृप जनक भयो विसमादा । उठै न धनुष जन्म मम बादा ॥
तब रघुवर सुनिको शिर नावा । सभा मांझ तब धनुष उठावा ॥
रैवेंचो राम धनुष चढ़ो जबही । महा अघोर शब्द भयो तबही ॥
साखी-सुनि गण त्याग्यो ध्यान तब, महि मंडल भुई चाल ॥
हरष्यो राजा जनक तब, सिया दीन्ह जयमाल ॥
चौपाई
टूटचो धनुष धूम भइ भारी । परसराम तब लाग गुहारी ॥
आवत तासु जो नृपति सकाने । बहुत नाम जो सुनत प्रमाने ॥
सभा मांझ आये परसरामा । सब मिलि दंडवत कीन्ह प्रणामा ॥
भृगुकुल कह सुन मिथिला राज । तोरचौ धनु किन मोहि बताऊ ॥
( ३८ )
ज्ञानसागर
रघुपति कहैं धनुष मैं मापा । तुम किहि काज करत है दापा ॥ देखि राम भृगुकुल किय रोषा । मारौं शीस जो करौ सरोषा ॥ बिहैंसे राम लखन दोइ भाई । हे द्विज यान करौ सुरमाई ॥ जान बूझि जिन होहु अयाना । मिटै तिमिर ऊगै जब भाना ॥ द्विज कुल देखि किया परमाना । तातैं तुमको भयो अभिमाना ॥
साखी-द्विज कुल धनुष जो आपनो, दीन्ह रामके हाथ ॥ मैं क्षत्री बल भजन, खैंचो हो रघुनाथ ॥
चोपाई
खैंच्यो राम तासु धनु कैसा । तृणहि उठाय लेत हैं जैसा ॥ परशराम गहि ताके पाऊ । क्षमा करो कौशिल्या राऊ ॥ कर प्रणाम भृगु वनहिं सिधारे । रामचन्द्र रहै सभा मझारे ॥ ये जो आहि सो त्रिभुवन राऊ । तिन महि मंडल तेज प्रभाऊ ॥ कहैं सबै हरि को अवतारा । परशुराम औ राम भुवारा ॥ जो निज इच्छा आवत जाई । तौन गर्भ काहे दुख पाई ॥ ऐसा निरंकार परकाशा । सब ते न्यारा सब में बासा ॥ इच्छा कर जस त्रिभुवन राऊ । इच्छा आस कैं निर्माऊ ॥ बाजा लगा जीव जो राखा । ताकी भक्ति सबै मिल भाखा ॥
साखी-कोइ इक ज्ञानी पारखी, परखे खरा औ खोट । कहे कबीर तब बाँचि हैं, रही नाम की ओट ॥
चोपाई
राम लखन के सुनो प्रभावा । मिथिलापति एक दूत पठावा ॥ नृप दशरथ बेगहि चलि आहू । राम लखन कर सुनो विवाहू ॥ नृप दशरथ बेगिही चलि आएहू । ऋषिन करायवो तहां विवाहू ॥ चारौं भाइ ब्याह तिहिं पाहीं । बहुत अनँद कीन्ह मन माहीं ॥ चारौं भाई और भुवारा । ले चलि आये अवध मझारा ॥ तहां आइ विप्रन दिय दाना । कछु दिन कियौ सुखराम सुजाना ॥
ज्ञानसागर
( ३१ )
भरत गये जहाँ जननी ताता । विद्या पढ़ै बहुत हरपाता ॥ अवध नरेश मता अस ठाना । रामहिं राज देहु मन माना ॥ सब मिलि ऐसा मत उपराजा । करब बिहान राम कहै राजा ॥ यह चरित्र जब देख भवानी । समझी निराकार की वानी ॥
साखी-सूठ मनुष्य न बूझै, राम लीन्ह अवतार ॥ मारे दैत्य संघारे, लंका के सरदार ॥
चौपाई
सवा लक्ष जीव प्रतिदिन खाई । कौतुक राज बनावत राई ॥ अंबिका गई कैकेई पास । हे रानी तुव पति मति नाशा ॥ रामहिं काल देत हैं राजू । निश्चय है हैं तोर अकाजू ॥ जो वर दियो नृपति तोहि काहीं । सो तुम मांगो आजुहि माहीं ॥ भरतहिं राज राम बनो बासा । माँगहु आज जो होइ हुलासा ॥ गयी कैकेई मांगा बर सोई । राम बिछोह प्राण नृप खोई ॥ त्यागो प्राण अवध नृप जबहीं । सरवन बैर जन्म लियो तवहीं ॥ चले राम लक्ष्मण सिय साथ । करहिं शोक धुनहीं बहु माथा ॥ रामहिं संग दूर लग जाई । फिरहु राम तुम तात दुहाई ॥ सुमंत मंत्री अस वचन सुनाये । पठये दूत तव भरत बुलाये ॥ जाइ बुलावहु भरतहिं आजू । उन कहैं देहु अवध कर राजू ॥ आज्ञा भयी फिरयो सब लोग । सब कहैं भयो राम कर शोगा ॥
साखी-भरतहिं पठे संदेश पुनि, तबहि भयो रवि सांझ ॥ गये जहां तहां रघुपति, बैठ गये वनमांझ ॥
चौपाई
राम लखन बैठे सिया लाई । फिरहु भरत तुम तात दुहाई ॥ फिरहु भरत प्रभु आयसु होई । प्रजा लोक संग सब कोई ॥
( ४० )
ज्ञानसागर
राम लक्ष्मण औ सिय साथा । वन मारग लीन्है धनु हाथा ॥ बहु दिन रहै ऋषिनके ठाई । समाचार लंकापति पाई ॥ लीन संग मारीच बलवंता । हरे सिया मन हो हर्षता ॥ मारीच ही कीन्ह मृग वेषा । नहि छल बूझे राम नरेशा ॥ मृग को देख नृपत तब भूला । लोभ मोह को वन जो फूला ॥ प्रगटचो सांझ अन्ध भो भाना । बिगरचो मोह जो ज्ञान छिपाना ॥ राम लखन गए मृगहि शिकारा । सीतहि रावन रथ बैठारा ॥ आगे मारग रोक जटाऊ । मार गयो तिहि रावण राऊ ॥ मारीचहि राम कीन्ह जब घाता । बूझ परी नारदकी बाता ॥ सिय हर रावन मार लुटेवा । जाकी जगत करत है सेवा ॥ दूँढहु लक्ष्मण वन गुहराई । मोह भयो जब सिया न पाई ॥ मारीचहि मार राम पछिताना । जबहि जटाउ कही सहिदाना ॥ हनुमान मिल पंथ मँझारा । रावन मारचो राम भुवारा ॥ सुन स्वामी तू त्रिभुवन नाथा । कृपा करो तुम मोरे साथा ॥ हनुमान जब कीश अनुसार । कुशल प्रभाव पूछ तिहि बारा ॥ बालि सुग्रीव दोइ जन भाई । बालि लीन्ह वध बंधु छुड़ाई ॥ जो प्रभु कीजे कपि पर दाय। मारो बालि सुनो रघुराया ॥
साखी-रामचन्द्र अस बोले, कीने बालि कुकर्म ॥
मारौं ताहि पल भीतरै, जान कहौं अस मर्म ॥
चौपाई
आए रघुपति जहँ गए राजा । बालि मार सुग्रीव निवाजा ॥ मार बालि कहँ एकहि तीरा । बूझे सन्त गही नहि पीरा ॥ यह तो भेद जानि है सोई । सतगुरु दया जाहि पर होई ॥ तब हनुमान लंक कियो गवना । पहुँचै जाय जहाँ रह रवना ॥ पहुँचे जाय भेट भइ सीया । देत्य देख वह कीतुक कीया ॥
ज्ञानसागर
( ४१ )
मारहिं कपि कहैं कौतुक जानी । तब हनुमान आप बल ठानी ॥ जारि नगर तब कीन्हों छारा । नगर लोग सब कहैं विकारा ॥ साखी-आय कहौं रघुपति सौं, समाचार हनु वीर ॥ सिंधु बांधि हरि उत्तरे, दैत्य वधन रनधीर ॥
चौपाई
आए कीन्ह दैत्य संग्रामा । मारे दैत्य बहुत तब रामा ॥ कुंभकरण निद्रा सौं जागा । रघुवर सौं युद्ध करे अचुरागा ॥ कहै विभीषण सुन नृप रावन । आए राम जो असुर सतावन ॥ सिया संग लै जाहु तुरंता । क्षमा अपराध गहु पग हर्षता ॥ मारी लात विभीषण भाई । कोधित मिलो राम कहैं आई ॥ समाधान नृपति बड कीन्हौं । लंका बकसि ताहिं कौ दीन्हौं ॥ कुंभकरण गहि समर अपारा । ताको हरि बहु बल सौं मारा ॥ इंद्र जीत तब लाग गुहारी । कर अश्वमेध तपस्या भारी ॥ तिन कपि रोके कपिदल जुथ्या । विभीषण भेद कहो अज जुथ्या ॥ जौलौं पूर्ण जह ना होई । मारहु राम वध करे सोई ॥ भयो प्रभात राम जब देखा । लक्ष्मण लाग्यो बान विशेषा ॥ साखी-मार सो महाबली, मेघनाद जिहि नाम ॥ सुनत क्रोध रावन कियो, कठिन कीन्ह संग्राम ॥
चौपाई
दैत्य महाबल शक्ति संधाना । जूझे लक्ष्मण भया निदाना ॥ तुम हनुमान लै आवहु मूरी । उत्तर दिशा देश बड़ दूरी ॥ दौनागिर पर्वत कर नाऊ । संजीवन सहित ताहि लै आऊ ॥ संजीवन बास तैं लक्ष्मण जागा । हर्ष भये तब कपिकर भागा ॥ तब रघुवीर घेर गढ लंका । दैत्यनके जी उपजी शंका ॥ तब रावन गहि समर अपारी । बंधुहि व्याकुल है सब झारी ॥
( ४२ )
ज्ञानसागर
रामचन्द्र रावन कहै मारा । वार अनेक सीस झुइ पारा ॥ मारचो हृदय ताक कै जबही । रावन काल वश्य भयो तबही ॥ सीता समाधान हरि कीन्हा । ताको रूप न काहू चीन्हा ॥ सिया लीन्ह रघुवीर बुलाई । राज विभीषण दीन्ह सुहाई ॥ लै सीतहि अवधपुर आना । भरतहि कीन्ह बहुत सनमाना ॥ सीता सती रही अवधाना । गर्भ वास लौकृश उत्पाना ॥
साखी-राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ॥
थाप्यो कोट अयोध्यहि, सुनौ मंत्र हनुमान ॥
चौपाई
जबहि राम लंका से आये । अयोध्या कोट उठावन लाये ॥ लक्ष्मण भाइ संग तब लीन्हा । सुदिन जानकै तब निव दीन्हा ॥ उठत कोट सो भय अस शोरा । है कछु द्रव्य नीच अस बोला ॥ सुन अस वचन राम रघुराई । खनहु खनहु अस आज्ञा पाई ॥ चहुँ दिश खने जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥ लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥ भौह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥ देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥ छाँड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥
साखी-बोले वचन ऋषी तब, कोहो सो कहु मोहि ॥
रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सम तोहि ॥
रामचंद्र वचन-चौपाई
दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥ ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कह करब भुवारा ॥ हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥ कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाँडो कोट कहा सुन मोरा ॥
ज्ञानसागर
( ४३ )
राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥ लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म को कह्यो प्रभाऊ ॥ आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहैं सब कोई ॥ दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एकदिवस पित्रन को जाना ॥ वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥ बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो वखाना ॥ सप्त मनु जबही जाइ विगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥ सप्त इन्द्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई विनाशा ॥
साखी-सप्त ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥
सप्त विष्णु जब वीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥
सोरा रुद्र गति जब हो जाई । तब इक रोम मम परे खसाई ॥
तातैं लोमस नाम है मोरा । करा समाध जीतवै है थोरा ॥
सुन रघुवीर अचंभित भयऊ । ऋषिको वचन प्रतीत न लयऊ ॥
राम चरित्र ऋषी तब जाना । क्या सोंचौ रघुवीर सुजाना ॥
देव अंगुष्ठ भैंटहु जो मोही । तैसे अंगुष्ठ दैऊ मैं तोही ॥
यहै कमंडल मोरे साथा । काढ़ौ गिन जो आवहि हाथा ॥
क्रोधित हाथ डार भगवाना । गिनि उनचास कोट परवाना ॥
परचो पाय रघुवीर न जाना । लोमश वचन सत् कर माना ॥
एतिक सुदरी गिनी विशेषा । कमंडलको कहैं कहिये लेखा ॥
इतने राम रावन होय गएऊ । सुनि रघुवीर अचंभौ भएऊ ॥
साखी-जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥
निराकार निरञ्जन, तासु मर्म नहि जान ॥
चौपाई
त्याग्यो राजपाट बन्धु चारी । गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥
आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
नं. १ कबीरसागर-
कृष्णचरित्रवर्णन
( ४४ )
ज्ञानसागर
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥ बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥ काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥ जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥ काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥
साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥
होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥
चोपाई
सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥
कृष्णचरित्र
राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥ करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥ एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥ प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥ देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥ नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥ करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥ गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥ नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥ नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥ उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥ सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥ कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥ ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥ चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥ जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥
ज्ञानसागर
( ४५ )
सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥
भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥
चौपाई
चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥
लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥
एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥
मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥
इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥
डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥
सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥
क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥
चौपाई
एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥
लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥
देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥
पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥
सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥
बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥
चौपाई
केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥
तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥
सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥
चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥
सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥
सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥
अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥
( ४६ )
ज्ञानसागर
चौपाई
मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥ रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥ चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥ मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥ मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥ रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥ चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥ पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥
साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥
हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥
चौपाई
मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥ मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥ उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥ पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥ जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥ तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥ नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥
साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥
जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥
चौपाई
कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥ सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥ दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥
ज्ञानसागर
( ४७ )
जाय सबै ले जमुनहि पारा । ले चलि भोजन भर भर थारा॥ जमुना बहु विधि आप गुसाई । तब हरि ऐसा वचन सुनाई ॥ कही जाइ कालिन्दी तीरा । कृष्ण छुवा नहि मोर शरीरा ॥ होई है थाह जाइ हो पारा । चल भो गोपी लाग न बारा ॥
साखी-कृष्ण सन्देशा कहिके, सबै भई तब पार ॥
जाइ कराइन भोजन, तब विन्ती अनुसार ॥
चौपाई
तब गोपिन अस बचन सुनावा । हे प्रभु पार जाहिं किहिं भावा॥ कालिन्दी से कहि सब मांदा । ऋषि नहि खाइब मोर प्रसादा ॥ कहत सन्देशा सब भई पारा । अचरज भयो मनमाहिं विचारा ॥ ठगई लगा तीनों पुर माहीं । कृष्ण कहाये अचरज नाही ॥ चौथे लोक बसे परधाना । ताहिखबर कहु विरलन जाना ॥ तपके तेज कहा बड़ भएऊ । तीन लोक जो अचरज ठएऊ ॥ एकवार शिशुपाल भुवारा । कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥ मारचो तबै दैत्य बल बीरा । निकसे प्राण जो छांडि शरीरा ॥ सब के देखत कृष्ण जो खावा । तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥ सब के देखत आस जो कीन्हा । तासों कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥
साखी-काल सबन को आस्थो, वचन कह्यो समुझाय ॥
कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥
चौपाई
बूझो संतो काल की हानी । हरि को भाव भले मैं जानी ॥ कृष्ण के भयो जो प्रदुमनबारा । ताकुल अनिरुधलीन्ह अवतारा ॥ सुन प्रवीन बानासुर राऊ । शिव सेवही महाबल पाऊ ॥ ता नृप कै दुहिता एक भयऊ । ऊखा नाम तासु सो ठयऊ ॥ रूप आगर किमि करें बखाना । ताहि देख कर काम लजाना ॥ उन्मद यौवन भयो पुन जबही । काम बान सर लागेउ तबही ॥