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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( १७ )

तेज अंड अंचितकूं दीन्हा । प्रथम सुर जब उत्पन्न कीन्हा॥
सोई अंस दूसरे भय भाई । धीरज अंड तिन्हें बैठक पाई ॥
तिसरे अंस अण्ड निर्माई । क्षमा अण्ड तिन्हें बैठक पाई ॥
चौथे अंस है सुकृत सारा । सत्य अंड है ताहि पसारा ॥
पांचों अंस हिरम्मर भाई । सुमत अंड तिन्हें बैठक पाई ॥
दोई अंस दोह करी समाने । तिनका भेद गुरुगम जाने ॥
एक अंस निर्गुण अवतारा । ते तब सृष्टिके भये कडिहारा ॥

साखी-एती उत्पन्न चार सुरतकी, भिन्न भिन्न परकार ।
कहै कबीर धर्मदाससों, आगे बन्स पसार ॥

धर्मदास वचन

साँचे सदगुरु की बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥
धन्य भाग्य मोहि मिले गुसाई । अपना कै मोहि लीन्ह सुत्ताई ॥
चारि वेद अरु शास्त्र पुराना । सबहीके मैं सुनो प्रमाना ॥
अविगति गती काहु नहि जानी । जो तुम कही आदि की बानी ॥
सुरत सोहंगके आठ भय अंशा । तिनके सृष्टि सबही भए वंशा ॥
अपरंपार है तिनका सेषा । अर्चित्य सृष्टिको कहां विवेका ॥

साखी-तुम निज सतगुरु सत्य हो, हम निज चीन्हा सोय ।

अर्चित सृष्टिको भेद कहो, अविगति पूछौं तोय ॥

धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घटमें बुधि बड़ देखी ॥
अर्चित्य सृष्टिको कहां पसारा । तेज अंड तिन्ह पायो सारा ॥
बारहि पालंग अंड विस्तारा । तिहिमें पांच तत्व है सारा ॥
इनको बैठक आसन दीन्हा । अंड सीखपर लोक तिन्हें कीन्हा ॥
प्रेम सुरति तिन कीन उपचारा । तिन्हते भयो अक्षर विस्तारा ॥
अक्षर सुरत तब मोहमें आई । ताते अंस चार निर्माई ॥

( ९८ )

कबीरबानी

चारि अंस भये चारि प्रकारा । चौविध दीप चौविध हि पसारा ॥
प्रथम अंश पर माया भयऊ । सोपृथिवितत्वको वीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कर्म भये अवतारा । पालंग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥
तिसरे अदली अंश निरमावा । शेष नाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंश भये धर्म राई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारी अंश अक्षर ते भयऊ । चार अंश चार मत ठयऊ ॥
तब समर्थ अविगति एक कीन्हा । पूरी नींद अक्षरकूँ दीन्हा ॥
चौसठ युगलौं सोए सिराई । तोलों कैल सुरती ठहराई ॥
समर्थ सुरति जल तत्व समानी । कैल अंड की कीन्ह उपानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त्व भये अतुरागा ॥
चकित होय अक्षर बिलखाना । सोह मोह सब सृष्टि समाना ॥
अंड दृष्टिमें देखो भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समर्थ छाप अंडसिर दीन्हा । अक्षर छाप देखि सौ लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें विराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
तहवां ज्योति निरञ्जन भयऊ । तिनको सब जग कर्ता कहेऊ ॥
अक्षर सुरति समर्थकी बानी । तेहि गुण खेल भए उतपानी ॥
निरंजन नाम अक्षर ठहराई । अचित भेद नहि पावै भाई ॥
कैलहि देखा सकल पसारा । तब अक्षर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आज्ञा सोई । जो कुछ इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोले पुरुष अतीता ॥
जीव पुत्र जहां पृथ्वीको मूला । तहां कर्म बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूर्मको भाई । सोलह माथ हाथ चौसठ पाई ॥
चले निरञ्जन कूर्मलिंग आये । पुरुष ध्यानते कर्म जगाये ॥
उत्पति हमकूँ मागे देहू । ना देहो तौ तौ मारिकै लेहू ॥
तबहि कूर्म अपने मन मानी । एतो कैल भए अभिमानी ॥

बोधसागर

( ११ )

हम मांगे कछु देव न भाई । जाऊ पुरुष लगि वेगि सिधाई ॥
कल कूर्मते युद्ध निर्मयऊ । छीन माथा तीन पुनि लयऊ ॥
लेकर माथै सुन्यमें आवा । कैल सुरति घट मोह समावा ॥
तीनों माथे भक्ति तब लीन्हा । तबसे अक्षर पुरुष डर कीन्हा ॥
मनमें तब अभिमान समाई । तब कर जोरिके सेवा लाई ॥
सोला चौकड़ा तब चलिआई । तब लगि निरंजन सेवा लाई ॥
अक्षरपुरुष जो कीन्ह विचारा । तिन्हको समरथ वचन उचारा ॥
विदेह बानि तब अक्षर पाई । सो बानीते कन्या भइ भाई ॥
ताको बहुत सिखावन दीन्हा । अष्टांगी तिन कन्या कीन्हा ॥
पुत्रि निरंजन लागि सिधाई । तुमको समरथ सदा सहाई ॥
तब कन्या निरंजन लगि आई । एक पाँव पर सेवा लाई ॥

साखी—कहै कबीर

देखे पलक उधारिके, कन्या आगे ठाढ़ि ।
उपज्यो मोहऽरुप्रेम, तब विप्रीत मनमें बाढ़ि ॥

चौपाई

पलक उधारि कैल तब देखा । अपने मनमें कीन्ह विवेका ॥
कहै कबीर सुनो तुम बानी । मोहिकारनपुरुषतोहिउतपानी ॥
हम तुम कीजे सृष्टि पसारा । तीनहि लोक सकल महि भारा ॥
तब अष्टांगी कैलसों कहाई । मोहि तोहि नाहीं होय सगाई ॥
मैं तोरि बहिनी तू मोरा भाई । सो अनरीती सब दीन चलाई ॥
कहैं कैल सुनो आदि भवानी । हमरे वचन तुम काहै न मानी ॥
जो तुम कहा हमारा मानौ । तौ तुम उत्पति निर्णय ठानौ ॥
तब अष्टांगी कहै बुझाई । बिन आज्ञा तोहि पुरुष रिसाई ॥
बिन आज्ञा कूरम सिर छीना । ताते पुरुष अन्त करि दीना ॥

( १०० )

कबीरबानी

साखी-कहै कबीर

देखि स्वरूप कन्यहिको, मनमें रोष समाय ।
मनमें रोष भयो अति, कन्या लीन्हीं खाय ॥

लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हृदय सम्हारा ॥
तब सुरति बानते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै बहि पारा ॥
एहि प्रपंच अक्षर तब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥
कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥
पिता पिता कैलसो कहेऊ । मदन प्रचंड कल छन भयेऊ ॥
अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥
किया संयोग भयो त्रीवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥
तीजे शंभु विष्णु ते छोटा । येकही निरंजनहि के ढोटा ॥

साखी-कहै कबीर

जैसे रूप निरञ्जनहिं, तैसे तीनों भाय ।
जे उत्पत्ति कैलकी, आगे सृष्टि उपाय ॥

चौपाई

करि प्रपंच शून्य इंडमें गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥
एहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते श्वासा सुरति उठाई ॥
तेहि श्वासाते वेद कटि आई । रूपनिधान चारों बने भाई ॥
हाथन पोथी सुसरस बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥
चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अक्षर शून्यमें आवा ॥
कैल प्रचण्ड भयो बरियारा । तब अक्षरते बुद्धि विचारा ॥
येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥
अक्षर चले अर्चित लगिगयऊ । महाशून्य छोड़ी तब दयऊ ॥
तब अर्चित्य अक्षर समुझावा । यह अविगति गति काहु न पावा ॥

बोधसागर

( १०१ )

तुम तो सुरति हमारी हो भाई । कैल सुरति समरथ निर्मायी ॥
लक्ष जीव नित करे अहारा । सवा लक्ष नितप्रति निस्तारा ॥
अंशवंश मिलिएक मत कीन्हा । चारों ज्ञान विचारि तब लीन्हा ॥
तुम गति हंसरूप हो भाई । वह तो कैल जीव दुखदाई ॥
तुम समर्थको ध्यान लगावो । अन्तर्गति समर्थ सुख पावो ॥
चारी ज्ञानमें निर्णय कीन्हा । सो निरणय अंशको दीन्हा ॥

साखी-कहै कबीर

कहे कबीर धर्मदाससों, एता सकल पसार ।
तीन शक्तिको खेले भयो, चौथे हंस उबार ॥

धर्मदास बहुतै सुख पावा । उठि सतगुरुसों विनती लावा ॥
सांचे वचन तुम्हारी बानी । आदि अन्तकी निरणय ठानी ॥
कौन है अण्ड कौन है अंशा । काहे अंश कौन है वंशा ॥
कौन कैल कौन गुण धारी । कौन मृष्टि कौन संसारी ॥
एती बात मोहि सों भाखो । और गुप्त गोये जिनि राखो ॥

साखी-कहै धर्मदास

विन देखे सबही कहै, सुनि पाइहै कान ।
सोइ अदेख तुम दिखावहु, आदि अंत परमान ॥

चौपाई-सतगुरु कबीर उवाच

तब सतगुरु मन में बिहसानै । तुमसों धर्मनि निर्णय ठानै ॥
तेज अण्ड अशर है वंशा । अचित्य अण्ड सोहं गहै हंसा ॥
निरंजन कैलचारि गुणधारी । तीन मृष्टि अविगति संसारी ॥
तेज अंड अचिन्त्य है अंशा । नववंश अक्षर है वंशा ॥
सत्य अण्ड जोहं गहै अंशा । सो रहै तिनके उपज्यो वंशा ॥
पालंग पचीस तासु विस्तारा । पातालपाँजि ते तिनको बैठारा ॥
तिसरों अंडहि क्षमा बखानी । अकह अंश तिन्हकी रजधानी ॥

( १०२ )

कबीरबानी

अकहनामते सताविस वंशा । तिन्हके सकल और हैं अंशा ॥
चौथा धीरज अंश है भाई । ताते सुकृत अंश निरमाई ॥
वंश बयालिस है कड़िहारा । तिनकी सदन चलै संसारा ॥
पाँचों अण्ड सुमत निर्माई । अंश हिरम्बर बैठक पाई ॥
तिन्हके वंश सात परवानी । इह सब भेद लेहो पहिचानी ॥
अंडहि अंड आठ भए अंशा । सात सुरति इक्कोत्तर वंशा ॥
चारि अंडको एक विचारा । दोए करीको भेद अपारा ॥
एक वंश कोई पार न पावै । सतगुरु निजही भेद बतावै ॥

खुद होय कहै

सुरति सरूप हमहीं सबकीन्हा । मान बड़ाई अंशोंको दीना ॥
जबे अचिन्त्य सुरत ठहरानी । सुरति समर्थ घट आनि समानी ॥
दोह मध्य एक आए समाई । तिन्हको नाम अक्षर ठहराई ॥
अक्षर इच्छा उपजो भाई । दुसरा अंश कैल होय आई ॥
आठों अंस कालकी बानी । अक्षर घट जो आये समानी ॥
सो वासा होय बाहि ढिआई । तिन्हकी गति कोई बिरलै पाई ॥
पांच प्रगट तीन गुप्त सारा । इनके हंस अग्यारा सारा ॥
चारि अंशभवभार हम दीन्हा । चारि वैद्यमें निर्णय कीन्हा ॥
तीन देव मृष्टि अधिकारी । उपजनविनसुन दुखसुख भारी ॥
तिन्हें चौरासी लक्ष बनावा । जीव अनेक बहुत उपजावा ॥
यह अविगति काह नहीं पावा । सारथ ऐसा खेल बनावा ॥

सारखी-वेद कितेब जाने नहीं, पावे ग्यानी थाह ।

तीन अंशलौ सबहीं खेले, आगे अगम अथाह ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती चितलाई । तुम्हरे शरण मुक्ति गति पाई ॥
उत्पति कारण हम सब पावा । वंश अंश दूनों निरतावा ॥

बोधसागर

(१०३)

लोक दीपको ठौर बतायो । बैठक अस्नेह हंस चिन्हायो ॥
साखी-कैसे सरूप समर्थ हैं, कैसे हैं सब हंस ।
केहि करनीते पाइये, कैसे कटे कालकी फंस ॥
चौपाई-सतगुरु कबीर उवाच

कहे कबीर सुनो धर्मदासा । अल्पबुद्धि घटमाँह निवासा ॥
सत्य लोक है अधर अन्तुपा । तामें है सत्ताविस दीपा ॥
सत् शब्द का टेका दीना । अगम पोहुमीरचीतिन लीन्हा ॥
सागर सात ताहि विस्तारा । हंस चले तहाँ करै विस्तारा ॥
अग्रवास वह सुवरन कांती । तहाँ बैठे हंसनकी पांती ॥
पुहुपद्दीप है मध्य सिंहासन । करूपदीप हंसनको आसन ॥
अविगत भूषण अविगत सिंहारा । अविगत वस्त्र अविगत अहारा ॥
कमलस्वरूप भौम्य है भाई । कहाँकी उपमा देउ बताई ॥
आभा चन्द्र सूर्य नहीं पावहिं । भूल चूकके शीस नवावहिं ॥
कला अनेक सुख सदा होई । वह सुखभेद यहाँ लहे न कोई ॥
निरतै हंस पुरुषके सङ्ग । नखशिख रूप बन्यो बहु अंगा ॥
पुरुष रूपको बरनै भाई । कोटि भानु शशि पार न जाई ॥
छत्र सरूप को वरणै भाई । अविगत रूप सदा अधिकई ॥
सत्ताइस द्वीपमें करे अनन्दा । जो पहुँचे सो काटें फन्दा ॥
हंस हिरम्मर और सोहंगा । श्वेत अरुण रूप दोउ अंगा ॥
विमल जोतको है उजियारा । झलकै कला पुरुषमें भरा ॥
चारि शब्दका लोक बनावा । पाँच सरूप लै हंस समावा ॥
सत्य शब्दकी भूमि बनाई । क्षमा शब्द आसन निरमाई ॥
धिर्ज शब्दसों छत्र उजियारा । सुमत शब्दसों वस्त्र पसारा ॥
प्रेम शब्दसों हंस निरमाई । आप शब्दते लोक समाई ॥
दीपन करै दीप हंस बिहारा । तहाँ पुरुष निर्मल उजियारा ॥
जब विहंसे मुखमोड सुहाई । निरत हेरि विहंसे चितलाई ॥

(१०४)

कबीरबानी

चिकुरझलक बरनी नहिं जाई। कोटिनवार शशि वारन जाई॥
एति सिद्ध सतगुरु फरमाई। मानुष रूपन्हि लोके जाई॥
अविगति रूप है लोक हमारा। करनी भेद कहो निर्घांरा ॥

करनी भेद

काया करनी चार है भाई। मनकरनी दोई लेहों उठाई ॥
प्रथम करनी चौका है सारा। तिनकीसन्धतिनहुका विचारा॥
दुसरे पुनि चरणामृत कीन्हा। तिसरे शीत प्रसाद जो लीन्हा॥
चौथे साधुकी सेवा करहु। यम औ कालसों कबहु न डरहु॥
काया करनी कही विचारी। मन करनी सो हंस उबारी ॥
पारस परशे कञ्चन होई। लोहा वासों कहै न कोई ॥
स्वाति सनेहकी करनी है भाई। सो करनी काहु विरले पाई ॥
स्वाति बून्द सीप जो लेही। बून्द स्वरूपहि पलटे देही ॥
इक करनी है हंस सनैदा। पहुँचे लोक काँपि यमफंदा ॥
लोक वेद कुल जगत विसारे। बोलत वचन जीव निवारे ॥
माया चारि कालकी भाई। इनहि जीव राखे उरझाई ॥
इह छोडे सद्गुरुके ओटा। मेटे कर्म भर्म सब खोटा ॥
दोइ माया सद्गुरुके ठहराई। दौय करनीसे सत्य मिलाई ॥
हंस करनि तीनलोकसो न्यारी। सद्गुरु मिले तो कहै विचारी ॥
धर्मदास कर चौका प्रमाना। मेटो कुल पाखंड अभिमाना ॥
सोरा असंख्ययुग गयोसरसाई। काहु न खबरिसमर्थकी पाई ॥
जीव निकाल यमधरधर खाई। चारि वेद सब जक्त भ्रमाई ॥
धर्मदास तुम अंश हमारा। तुमसो वचन कहौं टकसारा ॥

सारखी-कहै कबीर

मैं कबीर बिचलौ नहीं, नाम मेरो समरत्थ ।
ताही लोक पठाइहों, जो चढ़ शब्दके रत्थ ॥

बोधसागर

( १०६ )

धर्मदास उवाच

धर्मदास तब सौंज मँगाई । सोरह अंश तब दीन्ह चिन्हाई॥
चौका पुरस तब युक्ति बनाई । तनुका तोड़े जल अचनाई ॥
लिख्यो पान समरथ सहिदानी । दीन्हो सन्देश सत्यकी बानी ॥
तीनि अंशकी लगन विचारी । नारीअर अंशको हंस उवारी ॥
नारी पुरुष होय एक संगा । सदगुरु बचन दीन्ह सोहंगा ॥
सोहँग शब्द है अगम अपारा । तुमसों धर्मनि कहौ विचारा ॥
पेड़ सोहँग और सब डारा । साखा सोहँ कीन्ह प्रकारा ॥
प्रथम सहज सोहँगकी बानी । दूसरि इच्छा सोह उपतानी ॥
तिसरे मूल सोहँ है भाई । चौथे सोहँ सोहँ निर्माई ॥
सोहँगते भये सोह अतीता । जाको नाम जो कह्यो अचित्ता ॥
अचित्तिते अक्षर सोहँगा । अक्षर सोहँगते कैल सोहँगा ॥
कैल सोहँगते त्रिगुण सोहँगा । सोहँगते सकल सृष्टिको रंगा ॥
अमृत वस्तुते नौ पकारा । सोहँग शब्दके सुमिरन सारा ॥
सो सोहँ अचीन्हि जो पावै । सोहँ डोर गहि लोक सिधावै ॥
जा घट होई सोहँ मतसारा । सोई आवहु लोक हमारा ॥
सुरति सोहँ हृदये महाँ राखो । परचे ज्ञान तुम जगमें भाषो ॥
एती सिद्धि सोहँकी भाई । धर्मदास तुम गहौ बनाई ॥
चौका करि दीन्य परमाना । तब जीवहि छूटे अभिमाना ॥
अजावन बीरा आवै हाथा । तब हंसा चले हमरे साथा ॥
ताकैं पुनि चहि आवै डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥
कुल करनी जिन्ह खोय निसाई । काटि फन्द निज घरकू जाई ॥
तन मन धनको मोह न आवै । सो जिव दर्स हमारा पावै ॥
गुरुसों अन्तर कबहुँ न कीजै । साधु सन्त सेवा मन दीजै ॥
एती सनद जीव उजियारा । ताको सुकृत आवै सठिहारा ॥
सोहँ करनी सोहँ विचारा । सोहँ शब्द है जिव उजियारा ॥

( १०६ )

कबीरबानी

सारखी-कहै कबीर

धर्मदास उन मन बसौ, करौ शब्दकी आस ।
सोहैं सार सुमरन करो, सुनिवर मरें पियास ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सत्य नाम संतन सुखदाई । कथा अनूप कहौं चितलाई ॥
बन्दौं गुरु दोऊ कर जोरी । जिमि कलहिते तुम बँदे छोरी ॥
को प्रवीन है लोक तुम्हारा । सो मोसों सब कहौं विचारा ॥
बस्ती सून्य बिचकी सब भाखो । जो देखो सो गोय जिन राखो ॥

धर्मदास बचन

सारखी-जैसे है तैसी कहौं मैं बलिहारी जाऊँ ।
अंस वंस निवारके, जीव सकल मुक्ताऊँ ॥

चौपाई

तुमरे कारन भेद हम दावा । सर्वमूल गुरु समरथ आवा ॥
लोक परेलोक दोउ हम पाए । जब सद्गुरु मोहिं दर्श दिखाए ॥
पांजी भेद कहौं ससुझाई । कौन अंस कौन लोक बैठाई ॥
केते पवन इहाँते होई । जहाँ समर्थ बैठक सोई ॥
वेद कितेकी सन्ना दीजे । इतनी दया गुरु हमपर कीजे ॥

सारखी-लोक भेद केते वहै, पांजी भेद कहो ससुझाय ।
अंस वंस अस्थान बतावो, सब संशय मिट जाय ॥

सद्गुरु पेडी भेदः पठ्यते

धर्मदास मैं कहा ससुझाई । पांजी अंस को भेद बताई ॥
तज अंडवार पलंगबिस्तारा । मध्यमेशून्यदोयपालैंगअंधियारा ॥
मृतुलोकमें सालोक मुक्तिप्रमाना । ताकी नाम मानसरोवर स्थाना ॥

बांधसागर

(१०७)

चारिमुक्तिकी कमाई अस्थान

धीरज अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनी संग विहारा ॥
मध्यसरोवर पिंडसिला लै धारी । चौसठकामिनी निरते घरियारी ॥
जो कोई वाम मार्ग को ध्यावै । सो सालोक्य मुक्ति को पावै ॥
पेडी ॥१॥ तहाँते वैकुण्ठ चौवीस कोटी रहाई । तहाँ सुमेर रहचो
ठहराई ॥ तहाँ धर्मराय अविनासी रहही । जो पाप पुण्यका
लेखा लहही ॥ तहाँ रंभा सामीप्य मुक्त है सोई । नवसौ सखी
ताके सँग होई ॥

(पेडी २ वैकुण्ठको विस्तारा)

पांच सीखर सुमेरके रहही । पांचों अंसकाला तहाँ धरही ॥
ईशानकोन ध्रुव आशन कीन्हा । वायु कोन कुबेरको
दीना ॥ नैऋत कोन जमको अस्थाना । अग्नि कोन इन्द्रासन
ठाना ॥ जिनकूं धर्मराय मैं कही । मध्यसिंहासन विष्णुको
सही ॥ सहस्र साठजोजन वैकुण्ठ प्रमाना ॥ ६००००० तेहिके
आगे सुन्य डोर बन्धाना ॥ निर्वाणमारगको जो कोई ध्यावै ॥
सो सामीप्यमुक्ति वैकुण्ठको पावै ॥ पेडी ॥६॥ वैकुण्ठते शून्य
अठारह १८ करोरी ॥ तहाँ लागी सून्यकी डोरी । शून्यमध्य है दीप
अनूपा । आदि निरंजन तहाँ जोतिसरूपा ॥ तहाँ अँधियारी हैं
सुन्य मंझारा । दोय पलंग है सुन्य विस्तारा ॥ तहाँ कोटि
चारि है जोति उजियारी ॥ तहाँ अष्टंगी है शक्ति नारी ॥
सारूप्य मुक्ति सो तब पावै ॥ अघोर मार्गको जो कोई ध्यावै ॥

चौथी मुक्ति आगे अस्थान

ते अक्षर आगे अस्थाना । एक पलंग तहाँते परवाना ॥ तहाँ
अक्षर योग माया विस्तारा । चारि अंश जिनके अधिकारा ॥
तहाँते चार वेद परवाना । चौथी मुक्तिको येथि ठिकाना ॥ तहाँते
आगे कोह ना गएऊ । एहि मता चारों वेद मिलितयेऊ ॥ चारों

( १०८ )

कबीरबानी

मुक्ति सम्पूर्णन ॥ (पेडी) तहाँते चारी मुक्तिको जाना । तहाँते एक
इण्ड परवाना ॥ तहाँते है इण्डको छौरा ॥

इण्डके आगे अनहद अँजोरा । आगे असंख्य शून्य विस्तारा ॥
तहाँ अचिंतनाम अंस करे व्यौहारा । अधर दीप है ताकर नामा
प्रेम ध्यान ताकर विसरामा प्रेमसुरति नचि बारंबारा ॥ ताके
सँग लखिबारहजारा ॥ १२००० ॥ तहाँ आगे सोहं अस्थाना ।
तहाँ तीन असंख बीच सून्य प्रमाना । तहाँते आठअंस उप-
जाई उन्हे वंस अंसके स्थान बनाई ॥ तहाँ ओहं सोहं उजियारा ।
तिन संग हंस छतीस हजारा ॥ ३६००० ॥ ११ ॥ पेडी ॥ तेहि
आगे मूलगति अस्थाना । तहाँ बीच सून्य आग असंख्य
प्रमाना । हंसा तिन संग बावना हजारा ॥ ५२००० ॥ तिन्हते
पांच ब्रह्म उपजारा ॥ पेडी ॥ १२ ॥ आगे सुरति मूल इच्छाको
मूला । स्वाति सनेह जाको है स्थूला ॥ वीस सून्य चार असंख
निरधारा । तिन संग हंस पचीस हजारा ॥ २५००० पेडी १३ ॥
तिनके आगे सुरति निशानी । सर्वोत्पत्तीकी रजधानी ॥ बीचशून्य
दो असंख्य प्रमाना । तिन्ते भये अंकूर ठिकाना ॥ सोरा असंख्य
तिन्हते विस्तारा । हंस तिन्हि संग पांच हजारा ॥ ५०००० ॥ धर्म-
दास बचन सुन सांचे ! ताके संग हंस सब बांचे ॥ पेडी ॥ १४ ॥
तहाँ आगे अंकूरको प्रमाना । तिल प्रमान द्वार अनुमाना ॥
विहंग शब्दकी लागी डोरी । तेहि संग हंस गये पुरुषलगि सोरी ॥
पेडी ॥ १५ ॥ बीच अँधियारी घोर अपारा । एकअसंख्य दस-
लाख विस्तारा ॥ १०००००००००० १०००००० ॥ आगे हमार
निजलोक ठिकाना ॥ ताको मर्म काल नहिं जाना ॥ पेडी ॥ १६ ॥

सारखी—कहैं कबीर

इतना पांजी भेद है, धर्मनि सुनि चितलाइ ।
समरके प्रतापते सब, हंस लोके जाइ ॥

बोधसागर

( १०९ )

चौपाई

सोरा असंख्य उत्पत्ति पसारा । चार असंख्य शून्य विस्तारा ॥
सात शून्य दोउ बेशून्य कहावै । एकै शून्य कोई विरला पावै ॥
तहांते तीन शून्य भए प्रवाना । आदि अंश शून्य सुरत ठिकाना ॥
तिहिंते तीन भए परकारा । चार सुरतको सकल पसारा ॥
प्रथम शून्य लोकते लागी । तीनिसुरत भए शून्य अनुरागी ॥
आठ अंश अरु वंश पसारा । तहाँ लगि देखो शून्य विस्तारा ॥
इतना जीके होय निन्यारा । ताके आगे लोक हमारा ॥
हम चीन्है और गुरुको सेवै । कर्म तोड़ि के जुग जुग जावै ॥
लोक वेद कुल माया धारी । काल फंद यम फंद विचारी ॥
निसदिन सुरत सतगुरुसों लावै । साधु संतके चितहि समावै ॥
जनपर दाय़ा सतगुरु केरी । तिनकी कटै कर्मकी बेरी ॥
करनी कर अभिमान भुलाई । तब छूटै यम धरि ले आई ॥
करनी करिये गुरुके साथ । ताकु काल उठि नावै माथा ॥
करनी करी जो होय अधीना । ताको वासा लोकमें दीन्हा ॥
करनी करे निज सुतं लगावै । ताको सुकृत लोक पहुँचावै ॥
करनी करत कसरि होय आई । तबहि काल घर बाजु बंधाई ॥
सेवा करि राखे मन आसा । तन छूटै जीव परिहै सासा ॥
सद्गुरुसों अभिमान जो करिहै । तन छूटै जीव यमफंद परिहै ॥
बंस टेक औ नाम हमारा । पथ पूजा सद्गुरु कनहारा
चारों अंश चिन्है जो पावै । तनमन धनसों प्रीति लगावै ॥
माता पिता बंधु सब भाई । पुत्री पुत्र हेतु लोलई ॥
घरकी घरणी पुरुष है सोई । इनकी प्रीति न कारज होई ॥
तासों काल रहै मुख गोई । नारी पुरुष सुरति कारज होई ॥

( ११० )

कबीरबानी

गुरुसों अंतर कबहु न राखै । प्रेमप्रीतिसों दीनता भाखै ॥
गुरुको निंदै अक्षरकू ध्यावै । बिन गुरु अक्षर कैसे पावै ॥
गुरु संगाती शब्द लखावै । जाके बल हंसा घर आवै ॥
गुरुस्वाती, गुरुरूप स्वरूपा । गुरु पार्स है आदि अनूपा ॥
गुरुभृङ्गी गुरु सो बहुरंगी । कीटते करही आप हितसंगी ॥
गुरु है सांचे सिद्ध समाना । गुरु मलयागिर वास प्रमाना ॥
गुरु सदगुरु दीपक अस होई । ताको सनेह कहों मैं सोई ॥

गुरुसीखको सनेहवर्णन

जैसे स्नेह कमल और भौरा । जैसे स्नेह चन्द्र अरु कोरा ॥
जैसे स्नेह बीन जल अंगा । जैसे स्नेह है दीप पतंगा ॥
जैसे स्नेह मृगा और जन्त्री । जैसे स्नेह चकमक और पथरी ॥
जैसे स्नेह स्वाति और पपीहा । जैसे स्नेह चुम्बकअरु लोहा ॥
जैसे स्नेह मीन अरु नीरा । जल बिछुरै वह तजै शरीरा ॥
ऐसे गुरु शिष्यको सन्देशा । मुक्तिहोय गुरुमिटचो अँदेशा ॥
एते स्नेह सीख सहिदानी । इतने गुरुके तत्व बखानी ॥
गुरुसनेह सीख जो पावै । गुरु रूप होय शिष्य समुद्भावै ॥
गुरुकी दया चलौ रे भाई । बिन गुरु पार न पावै कोई ॥
गुरु सोई सत्य शब्द बतावै । और गुरु कोई काम न आवै ॥

साखी- उपमा कहा दीजिये, पटतर कोहु नाहि ।
पलपल करो जु बन्दगी, छिन छिन देखो ताहि ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती चितलाई । कहनी योग गुरु देहु बताई ॥
योग ध्यान भाखो टकसारा । जीव उतारौ भवजल पारा ॥
कायास्थान आदि ते भाखो । कमलभेद गोयें निजराखो ॥

बोधसागर

( १११ )

साखी-कहै धर्मदास

तुमही करता आदि हो, जिन सब रचना कीन्ह ।
सत्य शब्द सार निर्मौलिके, सतगुरु साँचे दीन्ह ॥

कहै कबीर योग विधि बानी । जाते पुरुष सो हो पहिचानी ॥
प्रथम कमल कहूँ रे भाई । चारि पंखुरी तोहि बनाई ॥
सिद्ध पवन गनेस है सोई । छेसे जाप अखंडित होई ॥
दुतिय कमल नाभी तर होई । षष्ठ पंखुरी ताकर सोई ॥
ब्रह्मवास तेहि कमलमें होई । छे हजार जाप तहां सोई ॥
६००० । २ तिसरे कमलकी आठ पंखुरी । लक्ष्मीनारायण
मूर्ति तहां धरी ॥ छे हजार जप तहां प्रमाना । जो कोई साधू साधे
प्राणा ॥ ६००० चौथे कमल शक्ति शिव रहिऊ ॥ षट सहस्र
जप तहां कहिऊ ६००० ॥ बारा पँखुरी ताकर भाई । सोहैं तत्त्वमें
ध्यान लगाई ॥ पांचे कमल अकाशको बासा । सोरा पँखुरी
तहां निवासा ॥ अमी चन्द्र है ताकर नामा । सहस्र जाप ताको
विश्रामा ॥ १००० ॥ तहांते कला अवतारकी आवै । चारि वेद ताके
गुण गावै ॥ अबमें छठो कमल कहि भाखों । तीन पंखुरी ताकी
पुनि राखों ॥ परमात्मा ताहि कमलमें रहई । एक सहस्र जाप
तहँ करई ॥ १००० ॥ ६ सहस्र जाप दोए पँखुरी १००० षष्ठ ध्यान-
तिहिभीतर धरी ॥ गम्य अगम्य अंश दो रहई । तीन देव तहँ
लगि कहई ॥ आठेक मल दश पखुरी कहिये । अगिन वान ताके
बल कहिये ॥ कामदहन ताको है नामा । जो लखेसो पावै विश्रामा
प्रकाश

नामो कमलकी अविगत बानी । अन्त पाँखुरी ताकर प्रानी ॥
ता मैं पूर्ण ब्रह्म अखण्डा । निसवासर धरणी नहिँ चन्दा ॥
एक नाम सत्य है बानी । ताहि नाम सृष्टी उत्पानी ॥

( ११२ )

कबीरबानी

उनकी छाया सबको भाई । तौन छांह घटहि सब समाई ॥
दो सरूप आदि सहेदानी । दो सरूप काया बन्धानी ॥
तिसरा रूप रहित हैं आपै । भेद लखो तिहिगुरु प्रतापै ॥
तेहि प्रतिमा दोय हैं भाई । एक नारि एक पुरुष कहाई ॥
जिसका भेद कहो समुझाई । एक नाद एक बिंदु कहाई ॥
नाद सनेही सुरति हमारी । बिंदु सनेही शब्द बिचारी ॥
माया नारि सुरति है नादा । चार नाम है एक समादा ॥
नरमन शब्द और कहि बिंदा । चार नाम भये कहि बिंदा ॥
नरही नाम मनुष्य बिचारां । मन नाम काल अवतारां ॥
शब्द नाम सूर्यको दीन्हां । बिंदू नाम नीरको लीन्हां ॥
मेदी नाम इक्षीको चीन्हां । माया नाम भूतक जो कीन्हा ॥
सुरति नाम चन्द गहि दीन्हा । याहि सूरती मम करि लीन्हा ॥
रज्जु नाम श्वासाघट राज्यो । पुरुषहिं एक सुरतिको साज्यो ॥
शब्दको धातू जाही थापा । बनावन हारौ आपै आपा ॥

खुद होई कहैं कबीर

जहां तहां हमही है भाई । दुविधा छोड़े काल भगाई ॥
दुविधा काल बढ़ो अन्याई । तन छूटेते लेह धरि खाई ॥
पिंडका लेखा दीन्ह चिन्हाई । पिंड ब्रह्माण्ड लेहु अर्थाई ॥
अनंत पंखुरीका कमल है भाई । शुक्ल हंस तेहि माहि समाई ॥
आपै कमल उत्पत्ति पसारा । तेहिमें जीवकीन्ह विस्तारा ॥
दुसरो कमल सहज है स्थाना । तिन्हते सृष्टि भई बन्धाना ॥
तृतीय कमल इच्छा उत्पानी । चौथा मूल ले बोले बानी ॥
पांचये सुरति सोहंग बँधाना । आठ अंश तिनके परवाना ॥
छठो कमल आर्चन्यको बासा । निसवासर जहैं प्रेम विलासा ॥
ताते कमल अक्षर ठहराई । तिनकी तो अस्तुति वेदन गाई ॥

बोधसागर

( ११३ )

अठवें कमल कैल को वासा । नाम निरञ्जन तहाँ निवासा ॥
नौमे कमल तीन लोक बनाई । तीनि देव तहाँ रहे भुलाई ॥
पिंड ब्रह्मांडको लेखा सारा । ज्ञानी पंडित करौ विचारा ॥

साखी-कहै कबीर

पिंड ब्रह्माण्डको लेखा, हम दियो प्रकट बताय ।
कहै कबीर धर्मदाससों, तुम निर्भय लोक जाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास पूछे चित लाई । सदगुरुसे उठि विनती लाई ॥
सांचे साहबकी बलिहारी । कैल पुरुषकी जुगति विहारी ॥
पन्थ विकट कोइ भेद न पावै । जो नहिं सदगुरु आप लखावै ॥
प्रपंची है कैल अपारा । मोसो चलै न पन्थ तुम्हारा ॥
कैसे कै गुरुवाई करहुँ । कैल पुरुषसो मैं बहु डरहुँ ॥
जम्बुद्वीप है यम को देशा । कैसे चलिहै मुक्ति उपदेशा ॥
चार वेदमें सब जीव राचै । कैल फांसते कोइ न बांचै ॥
हम सेवक हैं आज्ञाकारी । सोइ करों मोहिं लेहु उबारी ॥

साखी-कहैं धर्मदास

हमसो पन्थ चलै नहीं, काल अपरबल बीर ।
घाट बाट सब रोक है, जिय कस लागे तीर ॥

चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच

धर्मदास तुम्हें सांच न आवा । अन्तर खोली मैं तुम्हे बुझावा ॥
का पुनि करिहै काल तुम्हारा । सिरपर समरथ है रखवारा ॥
मारहु कैल रसातल जाई । केती कै हमही निर्माई ॥
केतिक कैल भये मम आगे । केति सृष्टि उत्पत्ति प्रलै भागे ॥
सत्य वचन सुनिये चितलाई । कैल जुगति मैं देहुँ लखाई ॥
सत् चल्ला है सबते न्यारी । तीनहि लोक प्रपंच पसारी ॥

नं. ७ कबीर सागर - ५

( ११४ )

कबीरबानी

कैल सकल युग डारो खाई । एकौ जीव लोक नहिं जाई ॥
ताते समरथ मोहिं फरमाई । सांचै जीव आतु मुक्ताई ॥
कर्म काल है बहुत अपारा । तुमसों धर्मनि कहौं विचारा ॥
तीन सुरतिका खेल नियारा । भिन्न भिन्न तिनको विस्तारा ॥

चार प्रकारके ज्ञान

अचित अंश समरथको भाई । बारा पलंग राज तिन पाई ॥
ताते ब्रह्म सृष्टि भई भाई । ब्रह्म ज्ञाति नहीं उपजाई ॥
ब्रह्महि लरनि ब्रह्मकी वानी । एके मारग एक रहानी ॥
तिनको चिह्न चले संसारा । अक्षर अतीत नाम है सारा ॥
जो कोई येहि मारगको ध्यावे । अचित लोकमें जाय समावे ॥
प्रेम सुरति उहाँ मंगलचारा । तिनके सँग सखि बार हजारा ॥
अब अक्षरको कहूँ विचारा । अक्षर कीन्हा अविगतिविस्तारा ॥
जीव सृष्टिको कीन्ह पसारा । अनभै ज्ञान कीन्ह विस्तारा ॥
अनभै करनी अनभै बानी । अनभै चाल है अनभै रानी ॥
तिनके चार अंश हैं भाई । आठहि सुरति नहीं ठहराई ॥
नी पवन दोउ गहो निसानी । सुरतियोग अनहद सहिदानी ॥
यह प्रकार जो ध्यान लगावै । अक्षर लोकमें जाय समावै ॥
सुरति योग है महा हितकारी । बीस हजारतिन जीव उबारी ॥
तिसरे कैल निरञ्जन गई । तिन पुनि माया सृष्टि उपजाई ॥
माया सृष्टि है तीस हजार । त्वचा ज्ञानको कीन्ह विचारा ॥
तीर्थ व्रत जप तप है करनी । क्रिया कर्म आचार है रहनी ॥
इच्छा वाञ्छित जो करनी कही । सो फललेहि जन्म जब धरही ॥
जोगहि दान यज्ञ मन लावै । चारिहुँ वेद साखी ससुझावै ॥
कोउ राजा कोउ पंडित भाई । कोउ सिद्ध कोउ साध कहाई ॥
चार अंश चारों फल पाई । माया सृष्टिको धरधर खाई ॥

बोधसागर

( ११६ )

ताके संग सखी बारा हजार । तहाँ महंमद गये सुखसारा ॥
तेहि सुखको उन्ह लहे भाना । आगे ओहं सोहंके स्थाना ॥
चौथी सृष्टि त्रिगुण परकासा । जो उपज्यो अक्षरकी श्वासा ॥
तिनके ज्ञान क्षुद्र है भाई । जन्त्र मन्त्र औ वेद भनाई ॥
राग रँग पूजा चतुराई । अहंकार मद गर्भ भुलाई ॥
जीव भोजते करे अहारा । नौलाखजीव सँग तिनके धारा ॥
तैंहिके ज्ञान जग रहे समाई । घर घर आये कुल बरन दड़ाई ॥
कोई उग्र कोइ क्षुद्र कहावै । कोइ जीवकोइ नारियर खावै ॥
कोई रोगी औषध भावै । कोई देवी कोई देव कहावै ॥
कोई प्रेत होय बोले आई । इह विधि सकल जीव भरमाई ॥
त्री देवा गुण रूप निवासा । इन सब भेद कीन्ह परकासा ॥
पाहन पूजा तिन ठहराई । कई विष्णु तहैं शम्भु कहाई ॥
ब्रह्मा तहाँ वेद धुन करहीं । विष्णु रूप तहैं पूजा धरहीं ॥
शम्भु भये फलके अधिकारी । तीन देव यह युक्ति विचारी ॥
इहि प्रपंच पांच मुख बानी । तेहि प्रपंचमें जीव भुलानी ॥
शुक्लहि पांच काल सहेदानी । जाये ले देह नर्ककी खानी ॥
धर्मदास तुम विन राचौ । सत्य चाल उहिकैलसों बांचौ ॥

चारि सुरतिका लेखा

चार सुरतिका भेद निन्यारा । सो सब खोलि कहूं भण्डारा ॥
तिनकी सनद एक है भाई । तेहि सनद ले जाय लेवाई ॥
यह ज्ञान ताकी चारों बानी । पांचे समर्थक पांच प्रमानी ॥
चारों गुरु चारी हैं बानी । पांचे शब्द सुरति सहिदानी ॥
पांचों भेद हैं अगम अपारा । इह पांचों सर्वांग विचारा ॥
चार अंश चार अण्ड प्रमाना । एके सनद एक बन्धाना ॥
चारों गुरु है जगमें आवा । तिन भवसागर पंथ चलावा ॥

( ११६ )

कबीरबानी

चारों गुरुकी पेडी

प्रथम धर्मदास तुम्हैं भाई । वंश बयालिस है अधिकाई ॥
दुसरे सत्त्व बंकेजी राजा । सत्ताइस अंश तेहसंगबिराजा ॥
तिसरे गुरु चतुर्भुज हैं भाई । सोरा अंश तेहि संग समाई ॥
चौथे गुरु सहतेजी भाई । सात अंस मत तत्त्व बनाई ॥
चारहि गुरु मता अर्थावा । जीव सरूप है जगमें आवा ॥

चार बानी

चार बानि ले तुम्हें समुझावा । प्रथमहि कोटिज्ञान कहि आवा ॥
धर्मदास तुम करो विचारा । कोटिबान है ज्ञान पसारा ॥
दुसरे है टकसारकी बानी । रायबंके जैसे निरणय ठानी ॥
टकसार भेद चढ़ि हारी लेखा । जो पेखे सो सत्यलोकहि देखा ॥
नीर पवनको कीन्ह विवेका । तिसरे मूल ज्ञानका एका ॥
राय चतुर्भुज लीन्ह प्रमानी । चारों गुरु मुक्ति फलदानी ॥
चारि गुरु मुक्ति कडिहारा । बहु जीवनको करिहैं उबारा ॥
सारखी-कहे कबीर चारि बानि, खानी चार ज्ञान निधान ।
चारि पदारथ चारि वेद, चारि गुरु प्रमान ॥

धर्मदास उवाच

हम चारोंको गुरुकर थापै । पांचे अर्चित राजा है आपै ॥
तीन अंश वे कहाँ रहे छाई । तौन भेद गुरु कहो समुझाई ॥
तिन्हकी कला कहो गुरु सांचै । औ पुनि कौन खेलमें रांचै ॥
साखी-सत्य सत्य मोसो कहो, कछु ना राखै गोंय ।
सुर नर मुनि ऋषि सबही ठगे, रीते चले सब रोय ॥

चौपाई-सद्गुरु कबीर

धर्मदास घटभय उजियारा । ताते आगम्य मुर्ति विचारा ॥
आठ अंश सब जमा है भाई । चारि अंश सब ठाँव बनाई ॥
अविगति मोसन कहा न जाई । मैं जो कहों तुम धरौ समाई ॥