कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १४६ )
बोधसागर
धर्मदास धरनीमें आये । करि प्रपंच तिहि काल भ्रमाये ॥
धर्मदास सुकृत औतारा । भूलयौ पुरुष नाम निज सारा ॥
प्रतिमा पूजामें लपटाई । परमपुरुषकी सुधि विसराई ॥
तीरथ व्रत आचार अपारा । क्रम उपाह्लाको व्योहारा ॥
पुरुष वचन--चौपाई
पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
सुकृत भवसागर चलि जाई । काल जालते गये झुलाई ॥
तिनकहैं जाय चेतावहु ज्ञानी । जाते वंश चले रजधानी ॥
वंश बयालिस अंश हमारा । सुकृत गेह लेहै अवतारा ॥
ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । धर्मदास उर मेटहु शंसा ॥
ज्ञानी वचन--चौपाई
चले ज्ञानी तब शीस नवाई । धर्मदास हम तुम लगि आई ॥
पुरुष अवाज कहा तुम पासा । चीन्हो शब्द गहो विश्वासा ॥
धर्मदास वचन--चौपाई
धनि सतगुरु तुम मोहिं चेतावा । काल जालते मोहि बचावा ॥
मैं किंकर तुव दासके दासा । लीन उबारि काटि यम फांसा ॥
मेरे चित अति हर्ष समाना । तुव गुण मोहिं न जात बखाना ॥
भागी जीव शब्द तुम माने । पूरण भागते तुव वर ठाने ॥
मैं अघकर्मों कुटिल कठोरा । रहचो अचेत भर्म चित भोरा ॥
मोहि आय तुम लीन जगाई । धन्य भाग तुव दरशन पाई ॥
कहिये मोहि जीवके मूला । रविके उदय कमल मन फूला ॥
भवसागर कौनी विधि छूटे । यमबंधन कौनी विधि टूटे ॥
करौं भक्ति कै योग कमावौं । देउँ दान कै तीर्थ नहावौं ॥
करौं यज्ञ कै इंद्री साथौं । बाहर फिरौं कि मनको बांधौं ॥
करौं अचार कि साधन साथौं । बर्त करौं कै हरि अवराधौं ॥
स्वसमवेदबोध
( १४७ )
जो तुम कहो सोइ सो करऊं । वचन तुमार हृदयमें धरऊं ॥
सत्यकबीर वचन-चौपाई
सुन धर्मदास मैं सत्य बतावों । भवसागरको दुःख मिटावों ॥
सुन धर्मदास भक्ति पद उँचा । इहि सीठी कोइ विरला पहुँचा॥
योगी योग साधना करई । भवसागर तेऊ नहिं तरई ॥
दान देय सोई फल पावै । भवसागर भुक्तैको आवै ॥
तीर्थ नहाये जो फल होही । सर्व मर्म समझावों तोही ॥
जन्म लेय सुन्द तन पावै । संपति दौरि बहुरि जग आवै॥
ऊँचे घर लेवै औतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यौहारा ॥
इंद्री साधन है अति नीका । बिना भक्ति जानो सब फीका॥
इंद्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥
कोध किये गति मुक्ति न पावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥
बर्त एक भक्तिको पूरा । और बर्त कीजै सब दूरा ॥
और बर्त सब यमकी फाँसी । भक्तीबर्त मिलै अविनाशी ॥
हरि अवराधनकी सुनि बाता । कहो भेद तुम सुनियो ज्ञाता ॥
हरिहर नाम सदा शिव केरा । तातै मिटे न भवको फेरा ॥
बहुत प्रेमते शिवको ध्यावै । रिध अरु सिद्ध द्रव्य बहु पावै॥
जो मन चित निश्चय करि धरई । गिरि कैलास में बासा करई ॥
फिरके काल झपेटै ताही । डारि देय भव चक्रर माही ॥
साखी-शिव साधनकी यह गति, शिव हैं भवके रूप ।
बिन समझे यह जक्त सब, पन्यौ महा भ्रमकूप ॥
चौपाई
हरिहर नाम विष्णुको भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म द्वे राखा॥
इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ॥
बहुत प्रीतिसे विष्णुहि ध्यावै । सो जिव विष्णुपुरीमें जावै ॥
विष्णुपुरी सो निरभय नाही । फिरि कै डारि देइ भव माही ॥
( १४८ )
बोधसागर
साखी-हरीहर नाम जो विष्णुको, जाने किय जिव जेर ।
चौरासी भरमै सदा, मिटै न भवको फेर ॥
चौपाई
हरिहर ब्रह्माको है नाऊँ । रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥
ब्राह्मणको पूजै संसारा । सो जिव होय न भवके पारा ॥
साखी-यहि तिनगुनकी भक्तिमें, मति भूलो भ्रमदास ।
इनके ऊपर निरगुन, तहाँ योगीको बास ॥
चौपाई
निर्गुण धाम निरञ्जन भाई । जिन सगरी उपपत्ति बनाई ॥
निर्गुणते मन भया प्रचंडा । ताते बसै सकल ब्रह्मण्डा ॥
निर्गुण अंश सकल औतारा । पीर पगंबर सब तन धारा ॥
यही निरञ्जनके पसारा । तामें अटका सब संसारा ॥
धर्मदास तुम भक्त सनेही । इनमें जनि अटकावो देही ॥
भक्त अनेक भये जग माहीं । निरभय घर कोइ पावत नाहीं ॥
भक्ति करे तब भक्त कहावै । भगतिसे रहित बचनको पावै ॥
चौदह लोक बसै भग माहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥
सत्य नामकी खबरि न पाई । क्या करि भक्ति करो रे भाई ॥
जगमें भक्त दोय भै भारी । धू प्रहलाद सदा अधिकारी ॥
ये दोनों जन द्वै व्रत साधा । एकहि एक इष्ट आराधा ॥
ध्रुव तौ गृह तजि बाहर गयऊ । नारदको उपदेशी भयऊ ॥
छठे मास प्रकटे हरि आई । राज दियो वैकुंठ पठाई ॥
साठि हजार वर्ष करि राजू । कुट्टैब सहित वैकुंठ विराजू ॥
एक दौस जब परलय आई । ताहि बासते देय गिराई ॥
दुतिय भक्त प्रहलाद कहाई । इंद्रासनको सुख जो पाई ॥
स्वर्ग दोन चौकरी भुक्ती । बन्धनभावते भई न भुक्ती ॥
स्वसमवेदबोध
( १४९ )
साखी-इंद्रराजको भोगिके, फिर भवसागरमाहिं ।
यह सर्गुनकी भक्ति है, निर्भय कबहुँ नाहिं ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
कौन भांतिते करिये भक्ती । सतगुरु मोहि बतावो युक्ती ॥
निर्गुन सद्गुण पार लखावो । तीसर न्यारा मोहि लखावो ॥
सत्य कबीर वचन-चौपाई
एक पुरुष है अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसे न्यारा ॥
ताको भक्ति करै जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥
आदि ब्रह्म नहिं था ओंकारा । निर्गुन रूप नहीं विस्तारा ॥
नहिं तब बीज नहीं अंकुरा । आदि भवानी चन्दन सूरा ॥
पुरुष कहो तो पुरुषो नहीं । पुरुष भया मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दो नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न अधर अवाजा । कहो काहिं यह काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताको । नामराय काल है जाको ॥
है अनाम अक्षरके माहीं । निह अक्षर कोइ जानत नाहीं ॥
धर्मदास तहैं बास हमारा । काल अकाल न पावै पारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कह सुनो गोसाँई । इन बातें बनबेकी नाहीं ॥
संशय किये एक ही ओरा । तुम ही हते कि है कोइ ओरा ॥
सत्य कबीर वचन चौपाई
जौ परतीति होय उर तोरे । भवको मेटि संग रहु मोरे ॥
आदि पुरुष निहअक्षर जानो । देही धरि मैं प्रकट बखानो ॥
मोहि न व्यापो जगकी माया । कहन सुननको है यह काया ॥
देह नहीं अरु दरसे देही । रहौं सदा जहँ पुरुष विदेही ॥
गुप्त रहौं नाहीं लखि पाया । सो मैं जगमें आनि चेताया ॥
( १५० )
बोधसागर
चारों युगमें चारों नाऊँ । माया रहित रहौं सब ठाऊँ ॥
सबसे कहौं पुकारि पुकारी । कोई न मानै नर अरु नारी ॥
इनको दोष कछु नहिं भाई । धर्मराय राख्यो बिलमाई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अंतको भेद सब लीन्हा ॥
तुम ही वार तुमहि हो पारा । तुमहीते उपजा संसारा ॥
समरथ सब गति पाई तोरी । अब सब संशय छूटी मोरी ॥
अब यहि भवमें बहुरि न आवों । तुमरे चरणकमल चित लावों ॥
सत्य कबीर वचन-चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं कीन प्रकाशा ॥
अब तुम भक्ति करो चित लाई । सेवो साधु तजि मान बढ़ाई ॥
पहिले कुल मरजादा खोवै । भयते रहित भक्त तब होवै ॥
सेवा करो छोड़ि मत दूजा । गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा ॥
गुरुसे करे कपट चतुराई । सो हंसा भवभ्रममें आई ॥
ताते गुरुसे परदा नाही । परदा करे रहै भवमाहीं ॥
गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोइ देवा ॥
गुरुसे अन्तर कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥
साखी-गुरुकी महिमा अगम है, शिव विरंचि नहिं जान ।
गुरु सतगुरुको चीन्हि के, पावै पद निरबान ॥
धर्मदास वचन
साखी-कर्म भर्म भव भार सब, दिया भारमें झोंक ।
सतगुरुके परतापते, मिट गया सबही धोख ॥
इति
अथ धर्मदासजीकी कथा-चौपाई
धर्मदासकी कथा बखानो । वैश्यके कुल तनधरि प्रकटानो ॥
धर्मबइल्लव परम अचारी । जासु सुजस गावै संसारी ॥
स्वसमवेदबोध
( १५१ )
धर्मदास गुरु चरनन परेऊ । तनमनधनतृणसम परिहरेऊ ॥
छप्पनकोटिकि संपति सारी । दियौ लुटाय सो रंक भिखारी ॥
एकै पुत्र परम प्रिय जाही । तजत बार नहिं लायौ ताही ॥
नारि पुत्र तजि भये उदासी । धर्मधुरंधर गुन गन रासी ॥
तन मन गहे भक्ति सो गाढ़ी । सतगुरुचरनप्रीति अति बाढ़ी ॥
परल्यौ ताको भक्ति प्रभावा । तब तेहि सतगुरु बचन सुनावा ॥
धर्मदास सुनिये मम बानी । तुमरे गृह प्रकटैगो आनी ॥
दशमें मास लेइ औतारा । हंसन काज देह निजु धारा ॥
सो जीवन को पार लँचावै । वंशकेर कँडिहार कहावै ॥
मेरे बचनते सो तन धारे । बचन सुरामनि नाम पुकारे ॥
धर्मदास बचन--चौपाई
हे प्रभु हम इद्री बस कीना । कैसे अंश जन्म तौ लीना ॥
धर्मदास अस बचन सुनाई । तब सतगुरु तिहि कह्यौ बुझाई ॥
पुरुष नाम धर्मन लिखि देहो । ताते अंश जन्म जो लेहो ॥
लखो सैनमें देहुँ लखाई । धर्मदास सुनिये चित लाई ॥
लिखो पान पूरुष सहिदाना । आमिन देहु पान परवाना ॥
धर्मदास आमिनिहि बोलाई । ले सतगुरुके चरन टिकाई ॥
धर्मदास परवाना दीना । आमिन पाय दंडवत कीना ॥
दशये मास जब पूजी आसा । प्रकटे अंश सुरामनि दासा ॥
सतगुरु बचन ते प्रकटे आई । बचन सुरामनि नाम कहाई ॥
मुक्तामनि पुनि नाम है ताका । जाते चली वंशकी साका ॥
इति
अथ चारों गुरुकी कथा--चौपाई
स्वसमवेद सतगुरु मुख बानी । चौदह कोटि ज्ञानकी खानी ॥
तत्त्व ज्ञान पुनि ताते काढ़ा । चारो वेद कान तिहि ठाढ़ा ॥
ऋग यजु साम अथर्वन चारो । ताते सब जग धर्म प्रचारो ॥
( १५२ )
बोधसागर
स्वसमवेदको चारो अंगा । ताते भये अनेकन ढंगा ॥
चारो वेद चहुँ गुरु गहेऊ । परमपंथ जाते जिव लहेऊ ॥
चारो गुरुकी कथा बखानो । सुकृत आदि भेद ग्रंथ प्रमानो ॥
इति
अथ प्रथमगुरु भवसागरमें उत्तर दिशा गोसाई धर्मदासजी-चौपाई
लोकमें सुकृत अंश कहलाई । भवसागर धर्मदास गोसाई ॥
उत्तर दिशा तासु गुरुवाई । गहि ऋगवेद जो पंथ चलाई ॥
जम्बूदीपो भारथ खंडा । प्रकटै गढ़बानौ महि मंडा ॥
सो गह कोट ज्ञानकी बानी । पंथ प्रचार कीन रजधानी ॥
वंश बयालिस ताने पाया । भवसागरमें पंथ चलाया ॥
इति
अथ धर्मदासजीके बयालिस वंशके नाम
दोहा-बचन सुरामनि प्रथम कह, बहुरि सुदर्शन नाम ।
कुलपति नाम प्रमोद गुरु, कौल नाम गुणधाम ॥
नाम अमोल कहाव पुनि, सुरति सनेही जान ।
हक्क नाम साहिब कहो, पाक नाम परधान ॥
प्रकट नाम साहिब बहुरि, धीरज नाम कह फेर ।
उग्र नाम साहेब कहो, उदै नाम पुनि टेर ॥
गीर्ध नाम साहिब तथा, नामप्रकाश कहाय ।
उदित मुकुन्द बखानिये, अर्ध नाम पुनि गाय ॥
ज्ञानी साहिब हंस मनि, सुकृत नाम अर्जनाम ।
पुनि रसनाम रु गंगमनि, परस नाम अभिराम ॥
जागृत नाम अरु भृगमनी, अकह कंठमणि होय ।
पुनि संतोषमनी कहो, चात्रिक नाम गनोय ॥
आदि नाम नेह नाम है, आदिनाम महानाम ।
स्वसमवेदबोध
( १५३ )
पुनि निज नाम बखानिये, साहेबदास गुणग्राम ॥
उद्दैदास करु नाम पुनि, दृगमनि महामनि हंस ।
मुक्तामनि धर्मदासके, बिदित बयालिस वंस ॥
अथ बयालिस वंशकी स्थिति वर्णन—चौपाई
वंशबयालिसकी थिति भाखों । सत्य कबीर प्रमान जो राखों ॥
बीस द्यौस अरु वर्ष पचीसा । सिंहासन थिति येती दीसा ॥
वर्ष पचीस बीस दिन केरी । भोग पूर्ण थित हो जिहि बेरी ॥
गद्दी सौंपे जो अधिकारी । निज इच्छा पर धाम पधारी ॥
जबलों थित करार नहि पूजै । तबलों राजसिंहासन भूजै ॥
तिनको कबहुँ न मृत्युकी पीरा । अमर कीन तेहि सत्यकबीरा ॥
गद्दीको करार नियरावै । सन्त महंत खबरि तब पावै ॥
सुने सन्त पृथ्वी चहुँ खूटे । दर्शन हेत जाय तहँ जूटे ॥
लेहि चलानेको जब बीरा । जग प्रत्यक्ष निरखे तेहि तीरा ॥
यहि विधि आप लोकचलि जाई । सन्त महन्त बिदा तब पाई ॥
हंसन प्रति गद्दी थिति ऐसे । वंश बयालिस भै जे जैसे ॥
संवत पंद्रहसौ अरु बीसा । वंश थाप तेहि समयसे दीसा ॥
जब तेरही पीढी चलि आवै । मुक्तामनि तबही प्रकटावै ॥
धर्म कबीर होय परचारा । जहाँतहँ सतगुरु सुयस उजारा ॥
इति
अथ दुतिये गुरुभवसागरमें दक्षिण दिशा गोसाईं चतुर्भुजदासजी—चौपाई
लोकमें अकह अंश परकाशा । महिमें सोई चतुर्भुजदासा ॥
दक्षिणदिशि गुरु ताहि प्रसंशा । ताके हैं सत्ताइस वंशा ॥
यजुरवेद विधि पंथ चलाई । कुशहर द्रौप माहिं प्रकटाई ॥
नय करनाटक तेहि रजधानी । गह टकसार ज्ञानकी बानी ॥
इति
( १५४ )
बोधसागर
अथ चतुर्भुजदासजीके सताइस वंशके नाम--चौपाई
प्रथम प्रेम कह दुतिय हुलासा । तीजे अन्हंद चौथ विश्वासा ॥
पंचम हित प्रीति है छठवें । सतवें निरख बिबेक है अठवें ॥
नौवें सत् छमा दशमें वद । ग्यरहें धीरज बरहें अनहद ॥
तेरहें शील संतोष चौदहें । पंद्रहें सुमति बुद्धि सोरहें ॥
सत्रहवें पुनि भक्ती जाना । उन्निस दया बीसवें जाना ॥
एकिस कृपा विचार बाइसे । एकपन तेइस मोक्ष चौबिसे ॥
पचिसवें मेद छबीसवें मोखा । सताईसवें सुमती चोखा ॥
लोकमें यह सब नाम कहाये । महिमें न्यारे नाम धराये ॥
इति
अथ तृतीये गुरुभवसागरमें गोसाई बंकेजी पूर्वदिशा--चौपाई
लोकमें जो हं अंश कहाया । भवसागर बंकेजी राया ॥
सोलह वंश तासुके होई । पूरब दिशिमें प्रकटे सोई ॥
पुश् द्रौप दरभंगा नगरे । सामवेद मम भाषे सगरे ॥
सो गहि मूलज्ञानकी बानी । पंथप्रचार आपनो ठानी ॥
इति
अथ राय बंकेजीके सोलह वंशके नाम जो लोकमें प्रसिद्ध हैं--चौपाई
माया प्रथम कर्म दुसरोई । तीसर अदल अष्ट कह सोई ॥
चौथ निरंजन छत्र मुनि पंचम । छठे आपमुनि पेख मुनिसतम ॥
अठयेजीत मुनिनौमशीतलमुनि । दशमें भृगुमुनि ग्यरहे कंठमुनि ॥
बरहे कलंकमुनि तेरहे गंगमुनि । चौदहे बिहंगमुनि पंद्रहेसोमुनि ॥
मुनि सो रहे जलरंग गोसाई । षोडशवंश केरि गुरुवाई ॥
इति
अथ चौथे गुरुभवसागरमें गोसाई सहतेजी पश्चिमदिशा--चौपाई
अंश हिरम्मर लोकमें होई । सहतेजी भवसागर सोई ॥
स्वतमवेदबोध
( १५५ )
पश्चिम दिशा करें गुरुवाई । वेद अथर्वन ताने पाई ॥
शालमलय जो द्वीप कहाई । मानपुर शहरमें सो प्रकटाई ॥
कथे ज्ञान लहि बीजक बानी । सात वंश ताके परमानी ॥
इति
अथ सहतेजीके सातवंशके नाम--चौपाई
प्रथमवर्ष पारस कहवाये । दुतिये स्वातिसनेही गाये ॥
तीजे भृंगसमीप बखानी । चौथे लहरसिंधु कहि गानी ॥
पञ्चम दीपक ज्योति कहाई । पुनि जलभाष षष्ठमें जोई ॥
सप्तम मलयागिर कहि टेरा । सात वंश सहतेजी केरा ॥
निज निज वंशन युत गुरुवारी । सत्यकबीरको धर्म प्रचारी ॥
जक्त जीवको कर उपदेशा । परम धरमको कहे सँदेशा ॥
इनते इतर पंथ बहुतेरो । सत्यकबीरकी कृपा चनेरो ॥
इति
अथ सत्यकबीरके बारह पंथ वर्णन--चौपाई
बारह पंथके नाम बतावो । प्रथम नरायणदास कहावो ॥
जेठ पुत्र धर्मदासके सोई । जागू पंथ दूसरो होई ॥
तीजे सुरति गोपाल पुकारा । मूल निरंजन चौथ उचारा ॥
पंचम पंथ आहि टकसारी । छठवाँ भागू पंथ पसारी ॥
सो बीजक ले ज्ञान सुनाया । सतयेमें सतनामी आया ॥
अष्टम पंथ कमाली होई । नौमें राम कबीर कहोई ॥
दशमें प्रेम धामकी बानी । ग्यरहें जीवा पंथ बखानी ॥
बरहें एक अचारज आयौ । अपनौ नाम कबीर बतायौ ॥
बारह पंथ सुयश गुरु गैहैं । सतगुरु कृपा परमपद पैहैं ॥
इति
( १५६ )
बोधसागर
अथ सत्य कबीरके इतरपंथ वर्णन चौपाई
प्रथमें नानक पन्थ बखानो । पानप बहुरि पंथ कहि गानो ॥
दास मलोक पन्थ परचारा । बहुरि गरीबदास विस्तारा ॥
इत उत देशन देशन माहीं । सत्यकबीर पन्थ जहँ ताहीं ॥
जहँतहँ देखो सत्य कबीरा । हिंदू मुसलमान गुरु पीरा ॥
निज इच्छाते सो तन धारे । कालजालते जीव उबारे ॥
कबहुँ योनि संकट नहि आवै । जीव दया करि सतगुरु ध्यावै ॥
जिन जिन सतगुरुको पहिचाना । सो अवश्य लह पद निर्बाना ॥
शब्द
हम बसैं चामके धाम हमें कोई क्या जाने ॥
पशुपंछी नरनाग जहां लगि सबै चामको साज ।
चामै चामको दाम बटोरै चामरंगको राज ॥
चामै मांडै चामै पोवै चामै करै रसोई ।
चामै चामको परसि जिवावै चाम करे सो होई ॥
चामै गावै चाम बजावै चाम करावै नाच ।
चामै चामको भाव बतावै चाम बीच है सांच ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो हम हैं पूरे चमार ।
जो कोई हमको पहिचानै उतरे भवनधि पार ॥
सो गुरु खोज सो सन्त सुजाना ॥
जो गुरु खोजि अमरघर आवै पावै मूल ठेकाना ।
जिन गुरु गुरु पञ्च निरमाये रच्यौ जमीं असमाना ॥
तिनके कर्म कटे भवबंधन जिन ओहिगुरुको जाना ।
टीका मूल बिनपरगट कीनो चौदह कोटि जो ज्ञाना ॥
नहीं बोल भाषामें आवै शब्दसैन सो जाना ।
आशा बन्धते परगट कीनो जो जैसे अनुमाना ॥
स्वसमवेदबोध
( १५७ )
सारशब्द दियौ है पुरुषने आप तो गुप्त रहाना ॥
जिहि पारसते पुरुष ददाने करि चौका बंधाना ।
कहैं कबीर ये अगम गुरु है सही छाप परवाना ॥
दोहा-जेते पंथ कबीरके, भिन्न भिन्न विधि थाप ।
कहैं चौका अरु आरती, कंठी माला छाप ॥
तिलक रु कंठीमात्र कहैं, कहैं शब्दहि निरधार ।
कहैं आँढ़ कहैं भिन्न कछु, सबको तारन द्वार ॥
कोई त्रिगुणकी भक्तिमय, कोई तिनते न्यार ।
योग युक्ति करि सुक्तिपद, पावत यहि संसार ॥
इति
अथ नारायणदासजीकी कथा--चौपाई
धर्मदाससुत दास नरायन । भिन्न कथा कछु तं सु बतायन ॥
न्यारो पंथ आपनो ठाना । बारह पंथमें तासु मिलाना ॥
वंश माह द्वै भेद बखाना । प्रथम नारायणदासहि जाना ॥
वचन चुरामणि दुतिय बताई । वंशकेरि कड़िहारी पाई ॥
दोनो जगमें पंथ चलावैं । धर्मदासके वंश कहावैं ॥
इति
अथ जगजीवनदासजी सत्यनामकी कथा--चौपाई
सतनामी जगजीवन दासा । अवध देशमें पंथ प्रकाशा ॥
कोटवा नग्रमें सो प्रकटाना । आहि मध्यमहि हिंदुस्थाना ॥
राजपूत कुल कर ठकुराई । सतगुरु कृपाते पंथ चलाई ॥
न्यारो ज्ञान आपनो भाखा । ताके भई बहुत शिषसाखा ॥
कारी तिलक देहिं निज माथा । आन्दू बाँधें अपने हाथा ॥
आँढ़ एक भांतिको धागा । कंठीके बदले कर लागा ॥
इति
(१५८)
बोधसागर
अथ रामकबीरजीकी कथा--चौपाई
राम कबीरकी कथा कहीजै । वैरागिनको ज्ञान गहीजै ॥
ठाकुर प्रतिमा पूजे सोई । रामकृष्णको ध्यावै ओई ॥
इत कबीर पंथिनसे मेला । उत वैरागिनमें मिलि खेला ॥
रामकृष्ण सम्बन्धी जोई । प्रीति करे पूजै सब सोई ॥
इति
अथ नानकशाहजीकी कथा--चौपाई
नानकशाह कीन तप भारी । सब विधि भये ज्ञान अधिकारी ॥
भक्ति भाव ताको लखि पाया । तापर सतगुरु कीनो दाया ॥
जिदा रूप धरयो तब साई । प्रभु पंजाब देश चलि आई ॥
अनहद बानी कियौ पुकारा । सुनिकै नानक दरश निहारा ॥
सुनिकै अमर लोककी बानी । जानि परा निज समरथ ज्ञानी ॥
नानक वचन
आवा पुरुष महागुरु ज्ञानी । अमरलोककी सुनी न बानी ॥
अर्ज सुनो प्रभु जिदा स्वामी । कहैं अमरलोक रहा निजुधामी ॥
काहु न कही अमर निजुबानी । धन्य कबीर परमगुरु ज्ञानी ॥
कोई न पावै तुमरो भेदा । खोज थके ब्रह्मा चहुँ वेदा ॥
जिन्दा वचन
जब नानक बहुतै तप कीना । निरंकार बहुते दिन चीन्हा ॥
निरंकारते पुरुष निनारा । अजर द्रौप ताकी टकसारा ॥
पुरुष बिछोह भयौ तुव जबते । काल कठिन मग रोंक्यौ तबते ॥
इत तुव सरिस भक्त नहीं होई । क्यौ परपुरुष न भेटैउ कोई ॥
जबते हमते बिछुरे भाई । साठि हजार जन्म तुम पाई ॥
धरि धरि जन्म भक्ति भलकीना । फिर काल चक्र निरंजन दीना ॥
गहु मम शब्द तो उतरो पारा । बिन सतशब्द लहै यम द्वारा ॥
स्वसमवेदबोध
( १५९ )
तुम बड़ भक्त भवसागर आवा । और जीवको कौन चलावा ॥
निरंकार सब सृष्टि भुलावा । तुम करि भक्तिलौटिक्योंआवा॥
नानक वचन
धन्य पुरुष तुम यह पद भाखी । यह पद अमर गुप्त कह राखी ॥
जबलों यम तुमको नहीं पावा । अगम अपार भर्म फैलावा ॥
कहो गोसाईं हमते ज्ञाना । परमपुरुष हम तुमको जाना ॥
धनि जिंदा प्रभु पुरुष पुराना । विरले जन तुमको पहिचाना ॥
जिन्दा वचन
भये दयाल पुरुष गुरु ज्ञानी । गहो पान परवाना बानी ॥
भली भई तुम हमको पावा । सकलो पंथ कालको धावा ॥
तुम इतने अब भये निनारा । फेरि जन्म ना होय तुम्हारा ॥
भली सुरति तुम हमको चीन्हा । अमरमंत्र हम तुमको दीन्हा ॥
स्वसमवेद हम कहि निज बानी । परमपुरुष गति तुम्हें बखानी॥
नानक वचन
धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकटे संसारा ॥
धनि करता तुम बंदी छोरा । ज्ञान तुम्हार महा बल जोरा ॥
दिया दान गुरु किया उबारा । नानक अमरलोक पग धारा ॥
इति
चौपाई
यहि विधि नानक गुरुपद गहेऊ । शिष शाखा तेहि जगमें रहेऊ ॥
गुरुपद तजि बहु पंथ चलाये । अन्य देवकी सेव गहाये ॥
परमपुरुष पद नहीं पहिचाना । भांति अनेक बनायो बाना ॥
अजहुँ गुरुकी तीन निशानी । गहै कछुक गुरुकी निजबानी ॥
द्वितिये सत्यनामकी साका । तृतिये देखा श्वेत पताका ॥
क्षत्री कुल नानक तन धारी । ताको सुयश गाव संसारी ॥
इति
( १६० )
बोधसागर
अथ गरीबदासजीकी कथा--चौपाई
गरीबदासकी कथा बखानो । जाटके कुलमें सो प्रकटानो ॥
दिखी निकट नग्र छोटियानी । सतगुरु कृपा भयो सो ज्ञानी ॥
सत्यकबीरको सुशाय उचारा । जक्तमाहिं निज पंथ पसारा ॥
सतगुरुकी अस्तुति भल गावै । अधिक प्रीति मनमाहिं बढ़ावै ॥
एकसौ वर्ष ताहि चलि गयऊ । प्रकट गरीबदास तब भयऊ ॥
इति
अथ कबीर आचार वर्णन--चौपाई
सत्यनामकी सेवा धारा । सुमिरण ध्यान नाम निरधारा ॥
सतगुरु वर्णन प्रीति सुहाये । मूरतिको नहिं शीस नवाये ॥
तीरथ व्रत मूरति भ्रमजाला । सत्यभक्ति गहिये सत चाला ॥
निरगुण सरगुणको तजि दीजै । सत्यपुरुषकी भक्ति गहीजै ॥
संत गुरुकी सेवा धारे । तन मन धन अर्पण करि डारे ॥
कोटिन तीर्थ गुरुके चरना । संचय सोच पोच सब हरना ॥
दुखी दीन देखत दुख लागा । परमारथ पथ तन धन त्यागा ॥
गृही साधु दोउ एक समाना । परमदयाल दोहूको बाना ॥
मद्य मांस भेष जगमें जोई । महा मलीन जानिये सोई ॥
परम दया सब जिवपर पालौ । अधोहृष्टि मारगमें चालौ ॥
हिंसा कर्म जेते जगमाहीं । ताके कबहुँ निकट न जाहीं ॥
सब जीवनकी कर रखवाली । जीवघात कहुँ बात न चाली ॥
वर्षा ऋतु जब जिव अधिकारा । तब नहिं कबहुँ पंथ पग धारा ॥
अमल नाम जगमें हैं जेते । सकल अभक्ष जानिये तेते ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-विष्णुधर्म जैनी दया, मुसलमान यकतार ।
ये तीनों जब जानि लै, तब जिव उतरे पार ॥
स्वसमवेदबोध
( १६१ )
चौपाई
तीनों जहाँ होय संध्या । सो कबीर आचारको ठड़ा ॥
शौच अचार शुद्ध सब करनी । उज्ज्वल किया बइल्लव बरनी ॥
अंतर बाहर परम पुनीता । हिसा रहित कर्म चितचीता ॥
जस जैनी जिव दाया पाला । ताही सम कबीर मुनि चाला ॥
मुसलमानके जिमि अछाहा । ताहीते निज नेह निवाहा ॥
तिमि कबीर मुनिके सतनामा । रह लौलीन सदा सो तामा ॥
स्वसमवेद विधि करि शुभकर्मा । सार शब्द गहि पावै मर्मा ॥
सतगुन गहे बइल्लव ताते । भाषे परम पुरुषकी बातें ॥
शुद्ध भेष सब शुक्लाचारा । शुक्लवर्ण शुक्ले व्यौहारा ॥
शली टोपी तुलसी माला । कंठी कंठमें तिलक विशाला ॥
सूत्र रु शिखा बइल्लव बाना । योग युक्ति गुरुधर्म प्रमाना ॥
करकमंडल चोला पहिरे । चर्चा ज्ञानमाहिं बड़ गहिरे ॥
तत्त्वमाहिं निःतत्त्व बताई । झीना ज्ञान कथै ऋषिराई ॥
असन वसन विधिवत सो धरई । धर्मवस्तु कछु संग्रह करही ॥
इति
अथ तिलकस्वरूपवर्णन—चौपाई
ऊर्द्धपुण्ड्र अरु दंडाकारा । शुभ्रतिलक तेहि सोह लिलारा ॥
नासा अग्र भागते काढा । मस्तक अंत प्रयंत लो ठाढा ॥
नाकबांस दोउ भुकुटी बीते । मस्तक अंत प्रयंतलों खींचे ॥
दंडाकार सो तिलक बताई । तासु महामन कहो न जाई ॥
यमदंडनको दंडक दंडा । कर्म भर्म सो कर शतखंडा ॥
परम बइल्लव तिलक जो धारी । तिलक देखियम बिलखि सिधारी
ताको अर्थ कहो किमि जाई । सुर नर मुनि कोइ पार न पाई ॥
बो० सा० ९/
( १६२ )
बोधसागर
दोय स्वरूप अकार बखाना । एक शूल यक सूक्ष्म जाना ॥
सूक्ष्म रूप अकार है एही । विष्णु विश्वंभर कहिये तेही ॥
स्वर व्यंजन द्वे भांतिके अक्षर । सबहीको मह पितु अकारबर ॥
स्वर अक्षरको आदि अकारा । सोई सर्व धर्म नय सारा ॥
स्थूलस्वरूप अकार जो कहिये । सकल स्वरनके आदिमें लहिये ॥
स्थूल रूप है जग विस्तारा । सूक्ष्म रूप रमै संसारा ॥
परम पुरुष है आदि अकारा । अमल अलेख अभेद अपारा ॥
आदि अकार जो गह्यो विकारा । ताते भयो सकल संसारा ॥
आदि अकारते तीनों गुन है । सतगुणरूप अकार विष्णु है ॥
शूल अकार विकार गहंता । सबही वर्णन माहिं रमंता ॥
वासुदेव सो रमै चराचर । लखि नहि परत सो अलख अगोचर ॥
संसृत महँ सोई आकारा । अछिफ पारसीमाहिं पुकारा ॥
सो अछिफ अछीह कहाया । ताहि अलिफते सबजम जाया ॥
ताकी सिफत कही नहि जाई । पीर पयंबर पार न पाई ॥
जो कोई अछिफ पहिचाना । ताही रूपमाहिं मिलि जाना ॥
चार खानि जेते जगमाहीं । बिना अछिफ कतहुँ कछु नाहीं ॥
कहुँ गुप्त कहुँ प्रकट निहारी । यह अछिफ सब माहिं बिहारी ॥
देखे ताहि कोइ कोइ साधू । जिनके हृदये ज्ञान अगाधू ॥
तेहि अछिफकी कथा अपारा । गिरा गनेश शेष कथिहारा ॥
नर बपुरा सो किहि विधि कहई । शिव सनकादिक मूक है रहई ॥
सत्य कबीरको तिलक है येही । वंशके साधु जो मस्तक देही ॥
इतर पंथको तिलक है न्यारे । वेद धर्मकी रीति बिचारे ॥
इति
अथ सत्यकबीरको धामक्षेत्र वर्णन—वार्ता
सहज सुरति संप्रदा धीरज धाम दशमद्वार त्रिपुटी तीरथ ॥
स्वसमवेदबोध
( १६३ )
मुष्मना सुख विलास । काया रामशाला अगम इष्ट । निश्चित
नाम उपाशी लौ माला मनसा देवी मनसो देव अलख अचा-
रज सत्य गोत्र समुद्ध शाखा वेदविचार खासा सुमिरन निह
अक्षर मंत्र प्रीति परिक्रमा जीव योग ऋषि निजमन निजब-
इच्छव निर्भय मुक्ती गुरु शब्द गुरुपाठ येता धाम क्षेत्र अवि-
नाशीकी सेजपर कबीरने सुनाया । इतना अर्थ ले काशी कबीर
गुरु रामानन्द पास आया ।
इति धामक्षेत्र
अथ जीवके अंतकालको वर्णन--चौपाई
अंतकाल जब जिवको आवै । यथा कर्म तस देही पावै ॥
हेट द्वार जब जीव निकाशा । नरकखानिमें ताको बासा ॥
ठेले नरक शीस बल जाई । ताहींमें पुनि रहै समाई ॥
नाभिद्वार जो प्रान चलाना । जलचर योनि माहिं प्रकटाना ॥
मूलद्वार कर जीव पयाना । पशू योनिमें तासु ठिकाना ॥
जीभ द्वारते जिव कढ़ि आवै । अन्नखानिमें बासा पावै ॥
श्वासद्वारते जिव जब जाता । अंडजखानिमें सो प्रकटाता ॥
नेत्र द्वार जब जीव सिधारा । मक्खी आदिक तन सो धारा ॥
श्रीन द्वारते जिव जब चाला । प्रेम देह पावै ततकाला ॥
दशमद्वारते निकसै प्राना । राजा होय भोग विधि नाना ॥
रंभ द्वारते जिव जब जाता । परम पुरुषके लोक समाता ॥
इति
अथ हंसनको स्थानवर्णन सत्य कबीर वचन--चौपाई
तेज अंड है पालँग बारा । द्वै पालँग मध्य अँघियारा ॥
सालोकमुक्ति मृतलोक बखाना । मानसरोवर तिहि अस्थाना ॥
धीया अंश तहाँ बैठारा । चौसठ कामिनि संग बिहारा ॥
( १६४ )
बोधसागर
जो कोइ बाम मताको ध्यावै । सो सालोक मुक्तिको पावै ॥
सहस साठ वैकुंठ रहाई । तहाँ सुमेर रहा ठहराई ॥
धर्मराय अविनाशी रहई । पुण्य पापको लेखा गहई ॥
तहाँ सामीप मुक्ति है सोई । नौसे सरखी तेरह सँग होई ॥
पांच शिखा सुमेर रहाई । पांचो अंश कला तहाँ लाई ॥
ईशान कोन ध्रुव आसन कीना । बाइब कोन इन्द्र अस्थाना ॥
नैऋत कोन यमनको थाना । अग्नीकोन इन्द्र अस्थाना ॥
जाको धर्मरायमें कहिया । मध्य विष्णु सिंहासन लहिया ॥
सहस साठ वैकुंठ प्रमाना । तहाँते शून्य डोरि बंधाना ॥
मारग जो निर्वाणहि ध्यावै । सो समीप वैकुंठहि पावै ॥
मेरुते शून्य अठारह कोरी । तहाँवा लगी शून्यकी डोरी ॥
शून्य मध्य है द्वीप अत्रूपा । तहाँ निरञ्जन ज्योतिस्वरूपा ॥
अंधकार है शून्य मझारा । द्वै पालंग शून्य बिस्तारा ॥
चार करोर ज्योति उजियारी । शोभा अद्भुत तासु निहारी ॥
सारूप मुक्ति सोई तब पाई । मारग भेद अघोर चलाई ॥
आगे अक्षरको अस्थाना । पालंग एक तहाँते जाना ॥
अक्षर योग माया विस्तारी । मुक्ति सायुज्य महे मतधारी ॥
तहाँते चार वेद परमाना । चौथी मुक्तिको यही ठेकाना ॥
तहाँते आगे कोइ न गैऊ । यह मत चारो वेदन कहेऊ ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनती चित लाई । साहेब कहो भेद समुझाई ॥
चार मुक्ति अस्थान बतावो । आगे कहो भेद जिमि पावो ॥
बस्ती शून्य बीचकी भाखो । समरथ मोहिगोय जिनिराखो ॥
सत्य कबीर वचन
धर्मदास तुम भलकै जानी । जो बूझो सो कहों बखानी ॥
स्वसमवेदबोध
( १६५ )
एक असंख्य अक्षरते आगे । अर्चित नामको डोरी लागे ॥
अथर द्रौप है ताको नामा । परम रम्य अक्षर विश्रामा ॥
निरतै प्रेम सुरति तिहि द्वारा । तिहि सँग सखी बारहहजारा ॥
तीन अंश आगे परमाना । ओहं सोहं को अस्थाना ॥
आठ अंश तहवों उपजाये । अंश वंश अस्थान बनाये ॥
ओहं सोहं होत उचारा । तहाँति शून्य डोर बंधाना ॥
आगे सहज सुरति अस्थाना । तहाँति शून्य डोर बंधाना ॥
आगे शून्य है पांच असंखा । मूल सुरत अस्थान विसंखा ॥
तेहि सँग हंस बावन हजारा । पांच ब्रह्म उनते उपचारा ॥
चार असंख्य शून्य तेहि आगे । इच्छा सुरति तहाँ अनुरागे ॥
खात सनेही जिनको धारा । तिन संग हंस पचीस हजार ॥
आगे शून्य असंख्य द्वै जाना । तहाँ अकूर सुरति अस्थाना ॥
पांचहजार हंस सँग सांचे । तिनकी सुरति हंस सब बांचे ॥
जहाँ अकूर केर परमाना । तिल परमान द्वार अनुमाना ॥
बिहग शब्द तहँ लागी डोरी । चढ़ि हंसा गये पुरुष सोरी ॥
साखी-सोरह असंख्य लोक है, धर्मन करो विचार ।
चार असंख्य है बस्ती, बारह सुत्र पसार ॥
चोपाई
आदि अन्त अरु वंश पसारा । तहँलगि देख शून्य बिस्तारा ॥
यतना तजि जब होय निनारा । हंसा आवै लोक हमारा ॥
हमैं चीन्हि सतगुरु रस पीये । कर्म तोरिके युग युग जीये ॥
निशदिन सतगुरु सुरति लगावै । साधु सन्तके चितै समावै ॥
जापर दया सन्त गुरु केरी । तिनकी कटी कर्मकी बेरी ॥
करि करनी अभिमान भुलाई । तन छूटे यम ले धरि खाई ॥
तन मन धन ले प्रीति लगावै । सो हंसा सतलोक सिधावै ॥
सत्यलोक है अथरस नीपा । ता मध्ये सत्ताइस द्रौपा ॥