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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

(१०६)

बोधसागर

तृष्णा दूत भूत सेवकाई । रोवै कभीके मंगल गाई ॥
और को देत देखि पछिताई । गुरु सतगुरु चीन्है नहिं भाई ॥
वेद शास्त्र सब देत उठाई । आपन मन सब ही दरसाई ॥
जगमें और तुच्छ सब आही । मोहि समान बड़ को जगमाही ॥
मैले वस्त्र सो नहीं नहाई । आँखि चिपर मुख लार बहाई ॥
पासो जूवा खेल अरु दाऊ । कूबर मूंड अरु लामा पाऊ ॥
दूजी उखमज खानि कहावा । ताते जो नर देही पावा ॥
जाय सिकार जीव कहैं मारा । बहुत आनंद होय तिहि बारा ॥
बहुविधि मांसु राँधिके खाई । गुरुको मेटि करे अधिकार्ई ॥
निंदै नाम शब्द गुरु देवा । बहुत बात कथ ज्ञानको भेवा ॥
झूठी बचन सभामें लाई । टेढी पाग छोर ओरमाई ॥
दया धर्म मनमें नहिं आवै । करे पुन्य तिहि हाँसी लावै ॥
माला तिलक अरु चंदन करई । हाट बजार चिकन पट धरई ॥
अन्तर पापी ऊपर दया । सो जिव यमके हाथ बिकाया ॥
लम्बा दन्त रु वदन भयावन । पीरे नैन ऊँच अनपावन ॥
तीजे अचल स्वानिको लेखा । देह धरेते होय जो भेखा ॥
छिनक बुद्धि होवै जिव केरा । पलटत बुद्धि न लगै बेरा ॥
झगा फेटा शिरपर पागा । राजद्वारसे वामे लागा ॥
घोडेपर होवै असवारा । तीर खड्ग अरु कमर कटारा ॥
इत उत सैन चित्तसे लावा । परनारीको सैन बोलावा ॥
पर घर रति कर चोरी जाई । शरमभाव उपजै नहिं भाई ॥
छन यकमें कर पूजा सेवा । छन यकमें बिसरै सो देवा ॥
छन यक मनमें सूरा होई । छन यक मनमें कादर सोई ॥
छन यक मनमें करे सुधर्मा । छन यक माहँ करे अपकर्मा ॥
भोजन करत माथ खजुआवै । बाँह जाँघ पुनि मीजत जावै ॥

स्वसमवेदबोध

( १०७ )

भोजन करे सोय पुनि जाई । जो जगाव तिहि मारन धाई ॥
आँखी लाल होय पुनि वाको । और अनेक न लक्षण ताको ॥
चौथे पिंडज खानि सुनावों । गुन औगुनको भेद बतावों ॥
वैरागी उन मुनि मत धारी । धर्म पुण्य कर वेद विचारी ॥
तीरथ पुण्य अरु योग समाधी । गुरुके चरण चित बल बाँधी ॥
पढे पुराण कथे भल ज्ञाना । सभामें बैठि बात भल ठाना ॥
राजभोग कामिनि सुख माने । मनशंका कबहुँ नहि आने ॥
धन संपत्ति सुख बहुत सोहाई । लौंग सोपारी बीरा खाई ॥
खरचै दाम पुण्यमें सोई । हृदये सुख पुनि ताके होई ॥
चक्षु तेज ताकर अति मानी । परा कर्म देही बल ठानी ॥
देखो खड्ग सदा ता हाथा । प्रतिमा निरखि नवावै माथा ॥

सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरो फिरि आय जब ।

ताको कह्यो सनेह, धर्मदास सुन कान दे ॥

चौपाई

आयू आछत जिव मरिजाई । जन्म धरे मानुषको आई ॥
शूरा होय सो रणके माहीं । भै डर ताहि निकट न जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुरमति ताहि देखि डर कांपे ॥
सत्यशब्द परतीत कै आने । निंदारूप कबहुँ ना जानै ॥
सतगुरु चरण सदा चित राखे । प्रेम रु प्रीति दोनता भाखे ॥
यहिविधि चारों खानि बनाया । सबमें रमे निरंजन राया ॥
कर्मजाल महाँ सबै फँसाई । रेखाकर्म प्रत्यक्ष देखाई ॥
कर्मकी रेख लिखे सबमाही । ताते जीव भवमें भरमाही ॥
लिखे निरञ्जन कर्मको रेखा । ताते जीव धरे बहु भेषा ॥
कर्मरेख कबहुँ नहि छूटे । फिर फिर जीव निरंजन लूटे ॥
चारि खानि रचिकियो पसारा । चार बरन पाखेंड व्यौहारा ॥

( १०८ )

बोधसागर

चौरासी लख योनी कीन्हहा । चार खानि जिव एकै चीन्हहा ॥
चौरासी लख बचन बखाना । चारखान जिव एक समाना ॥
रचना रचे सृष्टि बहु रंगा । कामदेवकी कला अनंगा ॥
सुर नर मुनि गण काम तरंगा । पशु पक्षी सबहीके संगा ॥
कर्म काल सबही भरमावा । शिवशक्ती सँग कला नचावा ॥
कनक कामिनी फंद बनाया । तिहि फन्दे सबही अरुझाया ॥
जाति पांति कुल मान बढ़ाई । ब्रह्मा यह यम फंद बनाई ॥
शिव शक्ती द्वै रूप बनाया । नारि पुरुष सो नाम धराया ॥
भगद्वारे है सब जग आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥
नखशिख रची काल फुलवारी । फूल कुवास सुवास सँवारी ॥
कनक कामिनी काल बनाई । चार खानिमें रही समाई ॥
कामिनि काम सँवारा ज्ञानी । चारो खानि रहा विष सानी ॥
काल कर्मकी खानि बनाई । सब संगतमें रहा समाई ॥
सुर नर मुनि सबहीको डहके । चारखानि सबही घटमहके ॥
तीनों देव निरंजन रूपा । येई भवसागरके भूपा ॥
चारो मिलि सब सृष्टि सँवारी । पञ्चम कहिये आदि कुमारी ॥
जहाँ तहाँ तीरथ व्रत दाना । देवल देव पूजा पाषाना ॥
मथुरा तीनि देव औतारा । ब्रह्मा पुनि काशी पग धारा ॥
यहिविधि आया साज्यौसाजू । तिहुँ पुत्रनकहँ दीनो राजू ॥
मथुराते चलि आदि भवानी । कोटकगंडे पहुची आनी ॥
कोटकगंडे करि निज थाना । हींगलाज पुनि कीन पयाना ॥
आदि भवानी रही तहाँई । तिहुँ पुत्र जग राज कराई ॥
नाना भांति कर्म बिस्तारा । वेद कितेब प्रपंच अपारा ॥
भर्मजाल जगमें फैलाई । नर नारी तामें अरुझाई ॥
जहतहँ तीन देवकी सेवा । कोइ न जान पुरातन देवा ॥

स्वसमवेदबोध

( १०९ )

तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥
तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥
तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥
कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥
तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥
दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन ।
गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥

चौपाई

तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥
भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥
छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥
राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥
तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥
जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥
तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥
मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥
कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥
इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥
जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥
मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥
सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥
रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥
कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥

पंजाबी भाषा-छंब झूलना

इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥

( ११० )

बोधसागर

भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥

सत्यकबीर बचन

तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥

चौपाई

पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥
तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥
कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥
अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥
यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥
बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥
यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥
तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥
सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥
विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥
लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥
यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥
रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥
षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥
सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥
नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥
एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥
सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥
चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥
योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥
मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥

स्वसमवेदबोध

( १११ )

तस शिला यक नाम पुकारा । सब जिव पकरि ताहिपरजारा ॥
तस शिलापर जो जिव परही । हाय हाय करि चटपट करही ॥
तलफि तलफि जिव तहँरहिजाही । भूनि भूनि सब यमधरिखाही ॥
केते युग जीवन धरि खायौ । जारि वारिके योनि भ्रमायौ ॥
जरत जीव जब कीन पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥
यमको कष्ट सहो नहि जाई । हो साहिब दुःख टारो आई ॥
यहि बिधि जिव जब कीन पुकारा । पुरुष दयाल दया उरधारा ॥
तब पुरुष ज्ञानीको टेरो । ज्ञानी सुनिये आज्ञा मेरो ॥

सत्यकबीर वचन

छंद—जब देखि जीवन कहैं बिकल तब दया पुरुष जनाइया ॥
दया विधि सतपुरुष साहिब तबै मोहि बोलाइया ॥
कह्यौ मोहि समुझाय बहुविधि जीव जाय चितावहो ॥
तुव दरशते जिव होय शीतल जाय तपत बुझावहो ॥
सोरठा—आपा लीनो मानि, पुरुष सिखावन शिर धरचो ॥
तत्क्षण कीन पयान, शीस नाय सतपुरुषको ॥

चौपाई

आयो जहँ जहँ जीव सतावै । काल निरंजन जीव नचावै ॥
चटपट करे जीव तहँ भाई । ठाढ़ भयो मैं तहँ पुनि जाई ॥
मोहि देखि जिव कीन पुकारा । हो साहिब मोहि लेव उबारा ॥
तब हम सत्य शब्द गोहरावा । पुरुष शब्द ते जीव बुझावा ॥
सब जीवनमिलि अस्तुति लाई । धन्य पुरुष यह तपन बुझाई ॥
यमते छोरि लेहु मोहि स्वामी । दया करो उर अंतर्यामी ॥

इति

अथ जीवनकी स्तुति—छंद तोटक

जय सत्य कबीर कृपाल घनं, दल दुष्टहनं पय पुष्ट जनं ॥

नं. ९ कबीरसागर - ५

( ११२ )

बोधसागर

योग जीत अतीत पुनीत प्रभू, वपु धारण कारन तारन भू ॥
सत सुवकृत सत्यस्वरूप सदा, जन ध्यावत पावत मुक्तिपदा ॥
मुक्ता मनिते जिव जो जुगता, मृतलोक सशोकन भौ भुगता ॥
हम दीन दुखी किमि त्याग चहो, करूणामय हो करूणामयहो ॥
करूणातन धार करी करूणा, करूणामयधौ करूणा वरूणा ॥
सुर सिद्ध बखानत खान दया, जिव देखि अनाथ सनाथ भया ॥
यहि ज्वाल जला यम भक्ष करे, बिन देव दयालको रक्ष करे ॥
यम जालिम जीवन जेर कियौ, सुधि लेत दयादधि देर कियौ ॥
सुख लेशन के तक लेश भरे, जगदीश परे जगदीश परे ॥
जिव काल करालके ज्वाल दहे, तर ऊपर भूपर धाय गहे ॥
हम जानि दयाल जो काल भजे, गुणश्राम प्रनाम सो नामतजे ॥
घटवाह मलाह सलाह कहो, फिर कैलकि गेलको सैल न हो ॥
वह सिंह समान शिकार करे, प्रिय पीव बिना कह जीव तरे ॥
हरि केहरि देहरि पार करौ, सरकार बडे बरकार करौ ॥
भयभंजन रंजन दासनको, खल डाटत काटत फांसनको ॥
भवसागर झागर काल बली, तह जीवकि उक्ति न युक्ति चली ॥
नहि एक उपाय बनाय बनी, करू काज गरीब निवाज गनी ॥
प्रभु पेखतही जिव शीतल है, श्रुति वेद पुराण बखानत है ॥
करूणा दृग कोटिन काल हने, खुगसिंधु कणा गिर बंधु बनै ॥
मतिधीर कबीर कबीर भजो, हितनाम प्रिया बिन नाम तजो ॥
तपखान कृशान शिला दहके, जरते प्रभु मारगते बहके ॥
तलफै तप तीख सभी तलते, बिन नाथ किने हन सोपलते ॥
निजु सुधि निवाज मुदधि लखो, सिरपै समरत्थ जो हत्थ रखो ॥
नरबाल बेहाल निहाल मही, दुखद्वंद्व दवारिन देह दही ॥
मनभौ मदमोचन लाचन है, जनरक्षक भक्षक पोचन है ॥

स्वसमवेदबोध

( ११३ )

सबलायक नायक हंसनके, जिवमोषक पोषक अंशनके ॥
सर्वोपर साहिब जीवनके, तुम जीवननाथ हो जीवनके ॥
प्रभुके भ्रमते यमते बजरे, यहि तस शिला पर आनि जरे ॥
तपिया जपिया न पिया परखे, विधि वेद लवेदन ते हरखे ॥
जिवकाज चले शिरताज सभी, महाराज मयासुख साज सभी ॥
भवभार हरो करतार धनी, भ्रमराय न पय दुखाय दुनी ॥
करि नेह बिदेह जो देह घृतं, शबदाभूत जीव भे कृतकृतं ॥
मृत नायक सायक तीख हते, पद प्रीत प्रतीत सहीत गते ॥
परमारथि भारथि नाथ सदा, गहते लहते भव पाथ हदा ॥
जनजाय समाय अमाय पदा, शुभज्ञान फुरानन सान मदा ॥
सुनि मानस हंस सुनीन्द्रमता, समता लह पाय पता रमता ॥
तब नाम सुधा वसुधा जो पिया, न खुधा युगही युग जीव जिया ॥
दुखिया हितआय महा सुखिया, लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥
कहँ और न दौर तो पौर परे, सरनी परनी करनी नखरे ॥
पद तीर कबीर शरीर जिते, लह सारभे ब्रह्म अकार तिते ॥
जग योनि जहान महान महा, गुरुदेवको भेव नते बलहा ॥
कमलापति क्यों कमलापति हो, पदकीरति कीरति कीरति हो ॥
मृगब्याध समाध अगाध गहे, कलपानसिरान न ध्यान लहे ॥
गुन गाय फनी गणराय निती, नहिं पावत पार अपार गती ॥
लवलीन प्रवीन नवीन जसै, कलिपंक कलंक निशंक नसै ॥
विषया बनराय भुलाय परे, दुखदौन बिनाकर कौन धरे ॥
कह कौन सँदेश अँदेश बड़ा, भग भूलि गई ठग आनि अडा ॥
शिव शोक कि झोकमें झुलि रहा, करता भरता भ्रम भूलि रहा ॥
तिहुँ लोक बिलोक लगीअगिनी, यह जामिन है यमकी भगिनी ॥
तब सूरको नूर जहूर हुआ, ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥

बो० सा० ९

( ११४ )

बोधसागर

सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥
बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥
जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥
इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥
वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥
निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥
कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥
दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥
मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥
नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥
गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥
जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥
सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥
गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥
धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥
नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥
जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥
भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥
सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥
गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥
हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥
बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥
जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥
दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥
जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥

स्वसमवेदबोध

( ११५ )

मनमत्त मतंग मते यहि गौं, तुहि रावत होय महा उतजौं ॥
चित्तचञ्चर बञ्चर बञ्चक है, समसञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥
यम बंकट संकट जीव महा, दमको गमको रमको न रहा ॥
भवसेत अभय पद देत तुही, कलिकंटक कोटिन कर्म दही ॥
चटि सेत पपीलन ढील तहाँ, लैचि दीन पयोनिधि पीन महाँ ॥
नहिं वञ्चको हाड न चाड रहो, मन वाक शरीर कबीर कहो ॥
गुरु नेह न दीसन दीस जिन्हैं, सुखवासन आस है त्रास तिन्हैं ॥
तुम दीनन बन्धु न पीननके, नित पास हो दास अधीननके ॥
मद मान मलान हिये अरभौ, नर नागर सागर भौ गरभौ ॥
करि पाप कलाप करे दुनिया, विष बीज अर्माफल को लुनिया ॥
हरिमें हरिमें हमही वरषे, लहरी भवभक्ति हरी हरषे ॥
दुखदारिद वारिद ज्ञानघनं, निरभय करि भय शमनं शमनं ॥
जिव कालके जाल परे बपुरे, सतनाम निकास सदा जपु रे ॥
गुरुभक्ति निनार किनार गहे, चतुरे लुतरे भवधार बहै ॥
भ्रमभूलते मूलते जात भगे, बुध बालन डालन पात लगे ॥
मन बाचक याचक हौं दरको, तुम छोड अजोड सभी घरको ॥
प्रभु नामको दान निदान चहो, कोई आसरुवास बिकाश न हो ॥
तरनी बरनी तब नाम जहाँ, गहिये लहिये विशराम तहाँ ॥
रसना रसरास रसै रससो, जसतौ बस और सबै कस हो ॥
चढ नाम रथा गइ बीत विथा, रसना रसना बिन कीर्त कथा ॥
पदपंकज प्यार जो छूटि गया, अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥
ठग ठाकुर आनिके जूटि गया, जगजीवनकी बुधि छूटि गया ॥
रहगी रमते बड़ि भीर भई, सतपंथ विहाय कुपंथ लई ॥
गुरुभक्ति बिना भव भूलि परे, शरणागत पाहि कबीर हरे ॥

( ११६ )

बोधसागर

दोहा—यह कबीर पंचाशिका, पढ़ै सप्तीति प्रतीत ।

परम पुरुष पद पावही, काल कष्ट जा बीत ॥

इति श्रीकबीर पंचाशिका

सत्यकबीर वचन—चौपाई

तब हम कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसाई ॥

जब तुम जाय धरो नर देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥

पुरुष नाम सुमिरन सहिदानी । बीरा सार करो परमानी ॥

देह धरे सत शब्द समाई । तब हंसा सतलोकहि जाई ॥

देह धरे कीने जहँ आसा । अन्तकाल लीनो तहँ बासा ॥

अब तोहि कष्टभयौ जिव आनी । ताते यहि बिधि बोलो बानी ॥

जब तुम देह धरो जग जाई । बिसरे पुरुष काल धरि खाई ॥

जीव वचन—चौपाई

कहै जीव सुन पुरुष पुराना । देह धरे बिसरो नहिं ज्ञाना ॥

पुरुष जानि सुमिरौं यमराई । वेद पुरान कहैं समुझाई ॥

वेद पुरान कहै मत येहा । निराकारसे कीजै नेहा ॥

सुर नर मुनि तैंतीस कोरी । बंधे सबहि निरंजन डोरी ॥

ताके मत कीने हम आसा । अब यह जानि परा यमफांसा ॥

ज्ञानी वचन—चौपाई

सुनो जीव यह छल यमकेरा । यह यमफन्दा कीन घनेरा ॥

छंद—कला कला अनेक कीनो जीव कारन ठाट हो ।

वेद पुरानो शास्त्र स्मृती याते हूँध्यौ बाट हो ॥

आप तनधरि प्रकट है यम सिफत आपन कीनहो ।

नाना गुन मन कर्म फाटो जीव बंधन दीन हो ॥

सोरठा—कला कला परचण्ड, जीव परे बस कालके ।

जन्म जन्म सह दण्ड, सत्यनाम चीन्हे बिना ॥

कबीर पंचाशिका एवं अन्य बोध

स्वसमवेवबोध

( ११७ )

चौपाई

छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥

अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई

यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥

तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥

कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥

विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥

सत्य पुरुष वचन—चौपाई

कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥

तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥

पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥

प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥

सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥

करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥

द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥

पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥

गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥

मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥

योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥

योगजीत वचन—चौपाई

तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥

तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥

जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥

ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥

अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई

काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥

( ११८ )

बोधसागर

तुम कस जिव मुक्तावन आवा । मारो तोहि अबहि भलदावा ॥
काल अनंत रूप तब धारा । योगजीत कह आनि प्रचारा ॥
महाभयंकर रूप बनावा । गज स्वरूप है सम्मुख धावा ॥
सत्तरयुग हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥
परमपुरुष सेवा वस भैऊ । राज तिहुँ पुरको मोहि दैऊ ॥
तब तुम नारि निकारौ मोही । योगजीत नहि छोडो तोही ॥
अस कहि धाय सुंड फटकारा । दंतसो योगजीत पर मारा ॥
योगजीत कै लहि ललकारा । गहि कर सुंड दूर तिहि डारा ॥
पुरुषप्रताप सुमिर मन माहीं । मारचो सत्य शब्द से ताहीं ॥
ततछन ताहि दृष्टि पर हेरा । श्यामलिलार भयौ तिहिकेरा ॥
पंख घात जिमि होय पखेरू । तैसे कैल मोहि प्रति हेरू ॥
जब फटकार कर गहे डाला । भागा काल पैठ पाताला ॥
गयौ पाताल कूर्मके आगे । योगजीत गये पीछे लागे ॥
बिनती करे कूर्मसे जाई । राखो कूर्म शरन हम आई ॥
योगजीत मोहि मारि निकारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥
युगन युगन हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥
एक पायँ हम ठाढे रहेऊ । तबहि पुरुष सेवा सब भैऊ ॥
तीन लोक दीना मोहि हारी । अब कस मोकहँ मारि निकारी ॥
जाय कूर्मकी शरन जो परेऊ । तब ताने दाय़ा उर धरेऊ ॥

कूर्मवचन--चोपाई

तबै कूर्म उठि बिनती लाई । को तुम आहु कहाँ ते आई ॥
अपनो नाम कहो मोहि स्वामी । पुरुष अंश तुम अंतरयामी ॥

योगजीत वचन--चोपाई

तब हम कहा नाम मोर ज्ञानी । योगजीत हम अंश बखानी ॥
समरथ वचन जीव बर आवा । काल फौंस जीवन मुक्तावा ॥

स्वसमवेदबोध

( ११९ )

कैलवचन

सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥
सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥
समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥
तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥
सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥
अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥

कूर्मवचन

तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥
जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥
तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥
ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥
चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥
कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥
फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥

ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई

बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥
सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥
अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥
ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥
शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥
जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥
जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥
रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥
जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥

( १२० )

बोधसागर

अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥
बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥
मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥

निरंजन वचन

सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि ।
षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥
पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥
पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥

शब्द

अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो ।
तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥
देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई ।
परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥
सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती ।
आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥
ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा ।
हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।

निरंजन वचन--चौपाई

धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥
ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥
पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥
बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥

स्वसमवेदबोध

( १२१ )

कहा तुमार जीव नहीं माने । हमरी दिशभै वाद बखानै ॥
मैं हठ फंदा रच्यौ बनाई । जामें जीव परा अरुझाई ॥
वेद शास्त्र सुमिरन गुन नाना । पुत्र हैं तीन देव परधाना ॥
देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मन लाई ॥
यज्ञ होम अरु नियम अचारा । और अनेक फंद हम डारा ॥
जौ ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुमारा ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । काटो फंद जीव ले जाई ॥
जेतो फंद रची तुम बारी । सत्यशब्द ले सकल विडारी ॥
जिहि जिवको हम शब्द हटै हैं । फंद तुम्हार सबै सुतैहैं ॥

निरंजन वचन चौपाई

सतयुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों युग जिव थोरे रहिजाही ॥
चौथा युग जब कलऊ आई । तब तुव शरण जीव बहु जाई ॥
ऐसे वचन हारि मोहि दीजै । तब संसार गौन तुम कीजै ॥

ज्ञानी वचन चौपाई

अरे काल परंपंच पसारा । तीनो युग जीवन दुख डारा ॥
बिनती तोरि लीन मैं मानी । मोकहैं ठगे काल अभिमानी ॥
चौथा युग जब कलऊ आई । तब हम अपनो अंश पठाई ॥
काल फन्द छूटे नर लोई । सकल सृष्टि परवानिक होई ॥
घर घर देखो बोध विचारा । सत्य नाम सब ठोर उचारा ॥
पांच हजार पांचसौ पांचा । तब यह वचन होयगा सांचा ॥
कलियुग बीत जाय जब येता । सब जिव परम पुरुषपद चेता ॥

निरंजन वचन चौपाई

ज्ञानी बिनती सुनो हमारी । द्वापर अंत होय जिहि बारी ॥
बोध शरीर धरब हम जाई । जगन्नाथको नाम धराई ॥

( १२२ )

बोधसागर

राजा इंद्रदौन पहाँ जैहैं । मेरो मंदिर सोई उठै हैं ॥
तब समुद्र ढाहनको धावै । मंदिर मेरो तोरि बहावै ॥
कृपा करो तब तुम तहाँ जाई । मेरो मन्दिर देहु थपाई ॥
जो हंसा तुमरो गुण गाई । ताके निकट तो हम नहिं जाई ॥
जो कछु वर माँग्यो धर्मराया । सो ज्ञानी दीनो करि दाया ॥
धर्मराय उठि शीस नवाई । तब ज्ञानी संसारहि आई ॥

इति

अथ सतयुगमें ज्ञानीजीको मृत्युलोकमें आगमनकथा और सत्य

सुकृत नाम धारण और जवत जीव तारण--चौपाई

ज्ञानी योगजीत कहलाये । सत्यसुकृत सुनींद्र बतलाये ॥
पुनि अचित मुक्तामणि होई । योग संतायन कहिये सोई ॥
अविनाशी करुणामय जानी । कबीर आदि बहुनाम बखानी ॥
चारों युगके चारों नामा । सतयुग सत्यसुकृत गुणधामा ॥
त्रेतामाँह सुनींद्र नामधर । करुणामय स्वामी कह द्वापर ॥
कलियुगमाँह कबीर कहाये । हिंदू मुसलमान गुण गाये ॥
सैद अहमद कबीर बखाना । शेख कबीर कहे मुसलमाना ॥
सोई सकल जक्त गुरु पीरा । नाम अनेकन ताके तीरा ॥
देश देशमें नाम है न्यारा । सारे जीव जक्तको तारा ॥
वेद पुराण जासु गुण गावै । नाम अनंत जासु निरतावै ॥
आदिकाल जब सतयुग आया । सत्यसुकृत सो नाम धराया ॥
तीन देवते कीन पुकारा । सो नहिं माने मन हंकारा ॥
प्रथमहिं जब पृथ्वीपर आये । नृप घोघल कह नाम हढ़ाये ॥
सतगुरु चीन्हि चरण लपटाना । नरनायक लह पद निर्वाना ॥
पुनि सतगुरु मथुरामें आई । खेमसरी तिय तहाँ रहाई ॥
खेमसरी ग्वालिनहि चितावा । कुल परिवार सहित मुक्तावा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२३ )

पुनि सत सुकृत लोक सीधारा । पहुँच हंस पुरुष दरबारा ॥
पुरुष दरश सब हंसन पाईं । कोटि सोम रवि रोम लजाईं ॥
पुरुष स्वरूप भये सब हंसा । बीती सब यमकी भ्रम शंसा ॥
कछु दिन कीने लोक निवासा । बहुरि आय देख्यो निजदासा ॥
निशि दिन रहौं गुप्त जगमाहीं । मोकहँ कोइ जिव चीन्हत नाहीं ॥
जिहि जीवन परबोध्यौ आईं । दीन्हौं तिनको लोक पठाईं ॥
सत्यलोक हंसनको बासा । सदा वसंत पुरुषके पास ॥

इति

सतयुगका वृत्तान्त

अथ त्रेतायुगमें सतसुकृतजीको पृथ्वीमें आगमनकथा और

मुनींद्रनाम धारण और जबत जीवतारण

सत्कबीर वचन-चौपाई

सतयुग गत है त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव मुक्तावा ॥
जब आयो जीवन उपदेशा । धर्मराय उर हुआ अँदेशा ॥
इन भवसागर मोर उजारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥
कितनो छल बल करो उपाईं । ज्ञानी डर मोर नाहिं डेराईं ॥
पुरुष प्रताप ज्ञानीके पास । ताते मोर न लागे फाँसा ॥
इनते काल बसावै नाहीं । नाम प्रताप जीव घर जाहीं ॥
छंद-सतनामके परताप धर्मन हंस निज घरको चले ॥
जिमि देखि केहरि त्रास गज हो कँपिके धरनी रले ॥
पुरुष नाम प्रताप केहरि काल गज सो जानिहै ॥
नाम गहि इसलोक पहुँचे बहुरि भव नाहिं आनिहै ॥
सोरठा-सतगुरु शब्द समय, गुरु आज्ञा निरखत रहै ।
रहै नाम लौ लाय, कर्म भर्म ममता तजे ॥

चौपाई

त्रेतायुग तबही पग धारा । मृत्युलोक कीनो पैसारा ॥

( १२४ )

बोधसागर

जीव अनेकन पूछेहु जाई । यमसे को तोहि लेय छोड़ाई ॥
कहै कर्म वश जिव अज्ञाना । हमरे कर्ता पुरुष है ध्याना ॥
विष्णु सदा हमरे रखवारा । यमसे मोहि छोडावनहारा ॥
कोई महेश कि आसा लावै । कोइ चंडी देवीको गावै ॥
कहा करो जिव भयो बिगाना । खसम छोड़िकर जार बिकाना ॥
भरम कोठरी सब जग डारा । धोखा दे यम जीवन मारा ॥

साखी सोई काल सोई है करता, भक्ति मुक्ति तिहि हाथ ।
हमरो कहा न आदरे, मन यम जिवके साथ ॥
परंपंची निरंजन, मन सोई ओंकार ।
फंदे तीनों लोक सब, कोई न पावै पार ॥

चौपाई

सत्यपुरुषको आयसु पावो । कालहि मेटिछोरि जिव ल्यावो ॥
जोर करो तो वचन नशाई । सहज जीवन लेहु चेताई ॥
जो ग्रासै जिव सेवै ताही । अनचीन्है यमके मुख जाही ॥
चहुँदिशि फिर आयौ गढलंका । जहँवाँ रावण बसै निशंका ॥
भाट विचित्र पन्यौ गुरुचरना । पायौ अमर धाम गहि शरना ॥
मंदोदरी प्रेममें पागी । सतगुरुके सो चरनन लागी ॥
रानीको दीनो गुरुदिच्छा । पूरन भई तासुकी इच्छा ॥
पुनि आयौ रावण दरबारा । जहाँ पौरिया रह रखवारा ॥
कह्यौ पौरियाते तब जाई । रावणको मम पांह बोलाई ॥
जबहि पौरिया खबरि जनाई । सिद्ध एक प्रभु तुमहिं बोलाई ॥
सुनि प्रभु क्रोधकीन तेहि बारा । तैं मतिहीन आहि प्रतिहारा ॥
शिवसुत मोर दरश नहि पावै । भिक्षुक मोकहँ कहा बोलावै ॥
यह मत ज्ञान हन्यौकिन तोरा । जो तू मोहि बोलावन दोरा ॥

स्वसमवेदबोध

( १२५ )

हे प्रतिहार सुनो यह बानी । सिद्धरूप तुम कहो बखानी ॥
कौन बरन अरु कौन है भेखा । मोसन कहो दृष्टि जो देखा ॥
अहो राव तिहि श्वेत स्वरूपा । श्वेतहि माला तिलक अनुपा ॥
शशिसमान तिहि रूप विराजा । श्वेतबरन सब श्वेतहि साजा ॥
मंदोदरि कह सुन रावण राजा । यह तो रूप पुरुषको साजा ॥
वेगिहि आय गहो तुम पाई । तौ तुव राज अटल है जाई ॥
छोड़िहो अपनो मान बढ़ाई । गहो चरण तिहि शीस नवाई ॥
रावण सुनत कोध अति कीना । जरत हुताशन जनु घृत दीना ॥
रावण चलो अस्त्र गहि हाथा । तुरत जाय तिहि काटो माथा ॥
मारो ताहि शीस खसि परई । देखो भिक्षुक कहा मोर करई ॥
जहैं सुनींद्र तहैं रावण आई । सत्तर बार तरवार चलाई ॥
लै सुनींद्र यक तृणको ओटा । अतिबल रावण मान्यो चोटा ॥
रावण अस्त्र अफल जब भयऊ । तब खिसियायके सोरहि गयऊ ॥
तृण सुनींद्र लीने यहि भावन । बल तुमार देखो नृप रावण ॥
काटे जो तृण कटै न तेरे । कौन भाँति शिर खंडै मेरे ॥
मन्दोदरी कहै समुझाई । हे नृप सतगुरुको गहु पाई ॥
रावण कहे सहित अभिमाना । सेवों शिव नहिं जानों आना ॥
जाने अटल राज मोहिं दीना । ताहि दंडवत पलपल कीना ॥
ऐसो वचन सुनींद्र पुकारी । हो रावण तुम गर्व प्रहारी ॥
भेद हमारा तुम नहिं जानी । वचन एक तोहि कहौं बखानी ॥
रामचंद्र तोहि माँरें आई । मांस तुम्हार स्वान नहिं खाई ॥
रावणको कीनो अपमाना । औध नग्र कह कीन पयांना ॥
मारगमाहँ चलो जब जाई । मधुकर विप्र मिला तब आई ॥
सो सुनींद्रके चरनन परेऊ । अतिसै प्रेम मोद मन भरेऊ ॥
तापर सतगुरु कीनी दाय। सहितकुटुम निजलोक पठाया ॥