कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
स्वसमवेदबोध
( १०१ )
चौपाई
पुष्पावती वचन अस बोले । माता सत्य वचन नहिं डोले ॥
दरसन शीस लह्यौ चतुरानन । चढ़न शीस यह धरिनिश्चलमन ॥
शाप सुनत आद्या अकुलानी । यह अचरज भो मरम न जानी ॥
अलखनिरंजन असपुनिभाखी । मोकहैं कोइ न देखे आंखी ॥
तीनों बोलैं झूठी बानी । सुनि माता बहुतै अकुलानी ॥
यह सुनि माता कीनेहु दापा । ब्रह्माको पुनि दीनेसु शापा ॥
पूजा तोर करे कोइ नाही । जो मिथ्या बोल्यौ हम पाही ॥
आगे ह्वैहै शाप तुम्हारा । मिथ्या पाप करे बहु भारा ॥
प्रकट नियम बहु करै अचारा । अंतरमैल पाप विस्तारा ॥
विष्णु भक्तसे कर हंकारा । ताते परे नरककी धारा ॥
कथा पुराण औरन समुझावै । चाल बिहीन आप दुख पावै ॥
उनत और सुने जो ज्ञाना । करै भक्ति सो कहो प्रमाना ॥
देवन पूजा, बहुबिधि लावै । दछिना कारन गलाकटावै ॥
जाकह शीस करे पुनि जाई । परमारथ तिहि नाहिं हढ़ाई ॥
अपने स्वारथ ज्ञान सुनैहै । आपन पूजा जगहि हढ़ैहै ॥
परमारथके निकट न जाई । स्वारथ अरथ सबै समुझाई ॥
गायत्री तोर वृषभ भतारा । पाँच सात अरु बहुत पसारा ॥
धरि औतार अखज तुम खाई । बहुत झूठ तुम वचन सुनाई ॥
सुनो पुष्प तुमरो विश्वासा । होय विगंध मध्य तौ बासा ॥
जो तोहि सींच लगावै आनी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । केवडा केतकी नाम तुमारा ॥
छंद-शाप तीनोंको दियो मनमाहैं तब पछितावई ।
कैसे करे मोहि निरंजन पल छमा मोहि न आवई ॥
आकाश बानी तब भई यह कहाँकी नभ बानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठयौ कह चरित यह ठानिया ॥
( १०२ )
बोधसागर
सोरठा-नीचहि ऊँच सताव, ओल मोहिते पाय हो ।
द्वापर युग जब आव, तोहि पाँच भरतार हो ॥
चौपाई
शाप ओल जब सुने भवानी । मनमें गुने कहे नहि बानी ॥
ओल प्रभाव आपते पाई । अब कह करो निरंजन राई ॥
तुमरी वशय परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥
आई माता विष्णु दुलारा । सुनहु विष्णु यक बचन हमारा ॥
अब तुम बेगि पिता लगि जाई । बेगि पिताको परसहु पाई ॥
आज्ञा पाय विष्णु तब चाला । पिता दरश कहै गये पताला ॥
अछत पुष्प लीने कर माहीं । चले पताल पंथ गम नाहीं ॥
पहुँचे शेष नाग पहुँ जाई । विषके तेज विष्णु अलसाई ॥
भयौ श्याम विष तेज समावा । निरंकार अस बचन सुनावा ॥
अहो विष्णु माता पहुँ जाई । कहियो सत् बचन ससुझाई ॥
सतयुग त्रेता जैहै जबही । द्वापर होय चौथा पद तबही ॥
जब तुम है हो कृष्ण शरीरा । लेहु ओल सो कहो बलवीरा ॥
जो जीव देय पीत जेहि काहूँ । हम पुनि ओल दिलावैं ताहूँ ॥
नाथहु नाग कालिंदी जाई । अब तुम जाहु विलंब न लाई ॥
बिल्लु पहुंचे जननी पास । कीनो सत् बचन परकाशा ॥
भेत्यौ नाहि मोहि पद ताता । विषके ज्वाल श्यामभो गाता ॥
व्याकुल भयौ तबहि फिरि आई । पितादरश नाहीं हम पाई ॥
सुनिकै हरषी आदि कुमारी । लीन विष्णु कहै निकटदुलारी ॥
चूम्पौ बदन शीश दियो हाथा । सत्य वचन बोल्यौ सुतगाथा ॥
देहुँ पुत्र तोहि पिता भेटाई । तोरे मनको धोख छुड़ाई ॥
प्रथमहि ज्ञान दृष्टि तुम देखो । बचन मोर हृदयेमें पेखो ॥
मनस्वरूप करि ताकर जानो । मनते दूजा और न मानो ॥
स्वसमवेदबोध
( १०३ )
स्वर्गं पताल दौर मन केरा । मन अस्थिर मन फिरै अनेरा ॥
छनमहँ कला अनंत देखावै । मनकहँ पेरि न कोई पावै ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनके आस दौस निशि रहिये ॥
देखहु पलटि सुन्नमें ज्योती । जहाँ झिलिमिलि झलके मोती ॥
यहिविधिविष्णुदरसपितुपायौ । भांति भांतिको रंग दिखायो ॥
श्वेत पीत हरितो जंगाली । रूप अन्तूप गगनमें भाली ॥
सुनि बाजा हियमें हरपाना । पिता दरसते अति सुख माना ॥
बहुत अधीन मातुसे भैऊ । शीश नाय मृदु बानी कहेऊ ॥
तव प्रसाद मम मातु विशेषा । पिताको दरश दृष्टि देखा ॥
मातु गई पुनि रुद्रके पास । देखि रुद्र मनमाहँ हुलासा ॥
दौय पुत्र कह मता बतावा । माँग महेश्वर तोहि जो भावा ॥
हे जननी यह कीजै दाय । कबहुँ न विनसै हमरी काया ॥
कह जननी तुम ऐसे होही । साधो योग सत्य कहाँ तोही ॥
जबलों पृथ्वी अकाश सनेहा । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देहा ॥
तिहुँ सुतनको मता बताई । आदि पुरुषको नाम छपाई ॥
आद्या ऐसो छल बल कीना । पुरुष छपाय प्रकट यम कीना ॥
निरंकारको भेद बतावा । पुरुषसँदेश न सुनत सुनावा ॥
पुरुषभेद विष्णुहू न जाने । निरंकारको करता माने ॥
जैसो छल बल आद्या कीन्हा । सोई चला जक्तमें चीन्हा ॥
देखो ऐसो नारि स्वभाऊ । मात पिता कह सो विसराऊ ॥
केतो प्रीति मातु पितु करही । कन्या एक न चितमें धरही ॥
गै पुत्री जब स्वामी गेहा । रातयौ रंग तासुके नेहा ॥
मातु पिता सबही विसरायौ । अपने पतिकी नारि कहायौ ॥
आदर मान खसमको होई । पिताको नाम लेय नहि कोई ॥
ताते आद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥
( १०४ )
बोधसागर
ब्रह्मा निज मन कीन उदासा । तब चलि गये विष्णुके पास ॥
जाय विष्णुसे बिनती ठाना । तुम हो बुद्धिदेव परधाना ॥
तुमपर माता भई दयाला । हम तो आप बस भये बिहाला ॥
निज करनी फल पायों भाई । कैसे दोष लगावों माई ॥
अब सोयतन करो हो आता । चले परिवार वचन रहै माता ॥
कहैं विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करि हौं सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सब ही तुमरो परिवारा ॥
यज्ञ धर्म पूजा जो होई । विप्र बिना कछु होय न सोई ॥
जत्तमें ऐसो ज्ञान हटावै । पुन्यफलनकी आस लगावै ॥
जो कोइ करे द्विजनकी सेवा । हरषित हों तिहि विष्णुदेवा ॥
सोरठा-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु अस भाषेऊ ।
मेलो मनको द्रंद, साख मोर सुखते रहै ॥
चौपाई
ब्रह्मा भाष्यौ झूठ संदेशा । ताते ताको भयो अंदेशा ॥
विष्णु जो सांचो वचन सुनाया । माता कीन ताहिपर दाया ॥
शिव लजायके चुप है रहेऊ । झूठ सांच एको नहिं कहेऊ ॥
दृढत पिता तिहुं गे हारी । पिताको रूप न कतहुं निहारी ॥
माता कही बिहँसि निज बानी । ब्रह्मा झूठ झूठकी खानी ॥
शिव कछु झूठसांच नहिं भाखो । ताते योग ध्यान चित राखो ॥
योग समाधि करो अब जाई । जटा रखाय बिभूति रमाई ॥
माता विष्णुसे बोलै बानी । तीन लोक करिहो रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहै तब सेवा । गन गंधर्व रचिहो मुनि देवा ॥
चार बरण ब्रह्मा निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥
शिवके वरण भेद ना होई । कौध रूप धरि भेष बिगोई ॥
स्वसमवेदबोध
( १०५ )
मातु जो दया विष्णुपर कीने । पिता देखाय निकटही दीने ॥
माता पिता एक मिलि गेऊ । विष्णु देखिके हर्षित भैऊ ॥
माता पिता सुत एकै ठेऊ । विष्णुसमाधिज्योति मिलिगैऊ॥
तीनों मिलि जब एकै भयऊ । तिहि पीछे जग सिरजै लियऊ॥
तब माता अस बचन उचारा । रचो सृष्टि तुम तीनों बारा ॥
अंडज उत्पति कीनी साता । पिंडजको ब्रह्मा उत्पताता ॥
उखमज खानि विष्णु न्यौहारा । शिव थाबरको कीन पसार ॥
चौरासी लख जूनी कीना । आधा जल आधा थलदीना ॥
नौलख जलके जीव बखाना । चौदह लख पंछी परमाना ॥
कृमी कीट सत्ताइस लाख । तीस लक्ष अस्थावर भाषा ॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना । मनुषदेह लह पद निर्वाना ॥
और योनि परचे नहीं पावै । तत्त्वहीन भव भटका खावै ॥
एक तत्त्व अस्थावर जाना । उखमज दोय तत्त्व परमाना ॥
अंडज तीन तत्त्वगुन जाना । पिंडज चार तत्त्व परमाना ॥
ताते होय ज्ञान अधिकारा । मानुष देह भक्ति अनुसारा ॥
अंडज खानि तीन तत्त्वव्यापा । वायू तेज तीसरो आपा ॥
थावर एक तत्त्व है पानी । उखमज वायु तेजते सानी ॥
पिंडज चार तत्त्वसे बरनी । पौनो पावक जल अरु धरनी ॥
पिंडज नरकी देह देह सँवारा । ताते पंच तत्त्व परमाना ॥
नर नारीमें तत्त्व समाना । ज्ञान विभेद ताहुमें जाना ॥
चारो खानि जीव भरमावा । तब मानुषकी देही पावा ॥
पांच तत्त्व मानुष विस्तारा । तीनों गुण तेहिमाहँ सँवारा ॥
देह धरे छोडे जस खानी । तैसो ज्ञान लहे सो प्रानी ॥
प्रथम कहो अंडजकी खानी । दारिद्री निद्रा अलसानी ॥
चोरी चुगली निंदा माया । घर बन झाड़ी आगिलगाया॥
(१०६)
बोधसागर
तृष्णा दूत भूत सेवकाई । रोवै कभीके मंगल गाई ॥
और को देत देखि पछिताई । गुरु सतगुरु चीन्है नहिं भाई ॥
वेद शास्त्र सब देत उठाई । आपन मन सब ही दरसाई ॥
जगमें और तुच्छ सब आही । मोहि समान बड़ को जगमाही ॥
मैले वस्त्र सो नहीं नहाई । आँखि चिपर मुख लार बहाई ॥
पासो जूवा खेल अरु दाऊ । कूबर मूंड अरु लामा पाऊ ॥
दूजी उखमज खानि कहावा । ताते जो नर देही पावा ॥
जाय सिकार जीव कहैं मारा । बहुत आनंद होय तिहि बारा ॥
बहुविधि मांसु राँधिके खाई । गुरुको मेटि करे अधिकार्ई ॥
निंदै नाम शब्द गुरु देवा । बहुत बात कथ ज्ञानको भेवा ॥
झूठी बचन सभामें लाई । टेढी पाग छोर ओरमाई ॥
दया धर्म मनमें नहिं आवै । करे पुन्य तिहि हाँसी लावै ॥
माला तिलक अरु चंदन करई । हाट बजार चिकन पट धरई ॥
अन्तर पापी ऊपर दया । सो जिव यमके हाथ बिकाया ॥
लम्बा दन्त रु वदन भयावन । पीरे नैन ऊँच अनपावन ॥
तीजे अचल स्वानिको लेखा । देह धरेते होय जो भेखा ॥
छिनक बुद्धि होवै जिव केरा । पलटत बुद्धि न लगै बेरा ॥
झगा फेटा शिरपर पागा । राजद्वारसे वामे लागा ॥
घोडेपर होवै असवारा । तीर खड्ग अरु कमर कटारा ॥
इत उत सैन चित्तसे लावा । परनारीको सैन बोलावा ॥
पर घर रति कर चोरी जाई । शरमभाव उपजै नहिं भाई ॥
छन यकमें कर पूजा सेवा । छन यकमें बिसरै सो देवा ॥
छन यक मनमें सूरा होई । छन यक मनमें कादर सोई ॥
छन यक मनमें करे सुधर्मा । छन यक माहँ करे अपकर्मा ॥
भोजन करत माथ खजुआवै । बाँह जाँघ पुनि मीजत जावै ॥
स्वसमवेदबोध
( १०७ )
भोजन करे सोय पुनि जाई । जो जगाव तिहि मारन धाई ॥
आँखी लाल होय पुनि वाको । और अनेक न लक्षण ताको ॥
चौथे पिंडज खानि सुनावों । गुन औगुनको भेद बतावों ॥
वैरागी उन मुनि मत धारी । धर्म पुण्य कर वेद विचारी ॥
तीरथ पुण्य अरु योग समाधी । गुरुके चरण चित बल बाँधी ॥
पढे पुराण कथे भल ज्ञाना । सभामें बैठि बात भल ठाना ॥
राजभोग कामिनि सुख माने । मनशंका कबहुँ नहि आने ॥
धन संपत्ति सुख बहुत सोहाई । लौंग सोपारी बीरा खाई ॥
खरचै दाम पुण्यमें सोई । हृदये सुख पुनि ताके होई ॥
चक्षु तेज ताकर अति मानी । परा कर्म देही बल ठानी ॥
देखो खड्ग सदा ता हाथा । प्रतिमा निरखि नवावै माथा ॥
सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरो फिरि आय जब ।
ताको कह्यो सनेह, धर्मदास सुन कान दे ॥
चौपाई
आयू आछत जिव मरिजाई । जन्म धरे मानुषको आई ॥
शूरा होय सो रणके माहीं । भै डर ताहि निकट न जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुरमति ताहि देखि डर कांपे ॥
सत्यशब्द परतीत कै आने । निंदारूप कबहुँ ना जानै ॥
सतगुरु चरण सदा चित राखे । प्रेम रु प्रीति दोनता भाखे ॥
यहिविधि चारों खानि बनाया । सबमें रमे निरंजन राया ॥
कर्मजाल महाँ सबै फँसाई । रेखाकर्म प्रत्यक्ष देखाई ॥
कर्मकी रेख लिखे सबमाही । ताते जीव भवमें भरमाही ॥
लिखे निरञ्जन कर्मको रेखा । ताते जीव धरे बहु भेषा ॥
कर्मरेख कबहुँ नहि छूटे । फिर फिर जीव निरंजन लूटे ॥
चारि खानि रचिकियो पसारा । चार बरन पाखेंड व्यौहारा ॥
( १०८ )
बोधसागर
चौरासी लख योनी कीन्हहा । चार खानि जिव एकै चीन्हहा ॥
चौरासी लख बचन बखाना । चारखान जिव एक समाना ॥
रचना रचे सृष्टि बहु रंगा । कामदेवकी कला अनंगा ॥
सुर नर मुनि गण काम तरंगा । पशु पक्षी सबहीके संगा ॥
कर्म काल सबही भरमावा । शिवशक्ती सँग कला नचावा ॥
कनक कामिनी फंद बनाया । तिहि फन्दे सबही अरुझाया ॥
जाति पांति कुल मान बढ़ाई । ब्रह्मा यह यम फंद बनाई ॥
शिव शक्ती द्वै रूप बनाया । नारि पुरुष सो नाम धराया ॥
भगद्वारे है सब जग आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥
नखशिख रची काल फुलवारी । फूल कुवास सुवास सँवारी ॥
कनक कामिनी काल बनाई । चार खानिमें रही समाई ॥
कामिनि काम सँवारा ज्ञानी । चारो खानि रहा विष सानी ॥
काल कर्मकी खानि बनाई । सब संगतमें रहा समाई ॥
सुर नर मुनि सबहीको डहके । चारखानि सबही घटमहके ॥
तीनों देव निरंजन रूपा । येई भवसागरके भूपा ॥
चारो मिलि सब सृष्टि सँवारी । पञ्चम कहिये आदि कुमारी ॥
जहाँ तहाँ तीरथ व्रत दाना । देवल देव पूजा पाषाना ॥
मथुरा तीनि देव औतारा । ब्रह्मा पुनि काशी पग धारा ॥
यहिविधि आया साज्यौसाजू । तिहुँ पुत्रनकहँ दीनो राजू ॥
मथुराते चलि आदि भवानी । कोटकगंडे पहुची आनी ॥
कोटकगंडे करि निज थाना । हींगलाज पुनि कीन पयाना ॥
आदि भवानी रही तहाँई । तिहुँ पुत्र जग राज कराई ॥
नाना भांति कर्म बिस्तारा । वेद कितेब प्रपंच अपारा ॥
भर्मजाल जगमें फैलाई । नर नारी तामें अरुझाई ॥
जहतहँ तीन देवकी सेवा । कोइ न जान पुरातन देवा ॥
स्वसमवेदबोध
( १०९ )
तीन देव निज हुकम चलाईं । अध्याहूको नाम छपाई ॥
तीन देव सेवैं संसारी । पूछै नहिं कोइ आदि कुमारी ॥
तब अध्या मनमाहिं बिचारा । मम सुत मेरो महातम टारा ॥
कीनो तब असि युक्ति भवानी । ऐसो कलारूप गुनखानी ॥
तीन शक्ति निज तन प्रकटावा । महामोहनी रूप बनावा ॥
दोहा-रंभा सूची रेनुका, तीन रूप निज कीन ।
गंधर्बनको मोहि मन, वश अपने कर लीन ॥
चौपाई
तिहुँ रूप मोहनी बनाई । सब गंधर्व निज संग गहाई ॥
भाँति भाँतिके बल्ल अन्तूपा । भूषन भूषित अद्वुत रूपा ॥
छतिस भाँतिके बाजा लेई । चली त्रिदेवपाहिं तब येई ॥
राग रागिनी यकसठ जाती । महा मधुर सुर गाव सुभाँती ॥
तीन देव सुर नर मुनि झारी । निज बस करि लीने तिहुँ नारी ॥
जगमें अपनो अदल चलाई । जहँ तहँ शक्तीसेव थपाई ॥
तीनो देव निरंजन शक्ती । इन पांचोंकी सब कर भक्ती ॥
मन ऊँकार निरंजन राई । अलख शून्य अविकार कहाई ॥
कैलकाल निर्गुन निरंकारा । धर्मराय यम ब्रह्म पुकारा ॥
इत्यादिक बहु यमके नामा । रमै सर्वमें सोई रामा ॥
जैसे तिलमें तेल समाया । तिमि सबमाहिं निरंजन राया ॥
मनसे और नहीं बरिबंडा । गाजै तीन लोक नौ खंडा ॥
सुर नरमुनिसब छलि छलि मारा । कोई जीव नहिं बचा कड़ारा ॥
रचना रुचिर अपार बनाई । सकल जीवको सो भरमाई ॥
कबहुँके हेठ कबहुँके ऊपर । कबहुँके डारि देय जिव भूपर ॥
पंजाबी भाषा-छंब झूलना
इत्थते उत्थ कर उत्थते इत्थ धर जित्थेही जाय जिव नाहिं छुट्टे ॥
( ११० )
बोधसागर
भट् तिहुँ लोक है नट्ट जित जाइये तित्थही तित्थही काल कुट्टै ॥
सत्यकबीर बचन
तीन लोकमें लागी आग । कहैं कबीरा कहँ जैहो भाग ॥
चौपाई
पूर्व प्रसंग करो पुनि वर्णन । कूर्मपाहिं जिमि गये निरंजन ॥
तीन माथ जब ताको छीना । बहुरि शून्यमें बासा कीना ॥
कूर्म भये तिहि काल दुखारी । ध्यानमें पुरुषते बचन उचारी ॥
अहो पुरुष दया भल कीना । मोकहँ धर्मराय दुख दीना ॥
यहि विधि पुरुषपै कूर्म पुकारी । तब सतपुरुष दया उर धारी ॥
बोले तब अस पुरुष पुराना । सुनो कूर्म मम बचन प्रमाना ॥
यह तौ काल भयो अन्याई । जो मैं ताहि देब बिनसाई ॥
तौ सबही रचना मिटि जैहै । सोलह पुत्र सबहि बिनसैं है ॥
सोलह पुत्र एक ही नारा । ताही सूत मध्य यह कारा ॥
विषयते रचित निरंजन देही । मम दरसन अब पाव न येही ॥
लक्ष जीव नित करे अहारा । सवालक्ष नित प्रति बिस्तारा ॥
यहि विधि आप दीन प्रभु तेही । परमपुरुष ढिग जाय न येही ॥
रचना करि पुनि भोजन करई । सबमें रमै न सो लखि परई ॥
षट दरसन छानवे पाखंडा । धर्म कर्म जहँलों महि मंडा ॥
सो सब आहि निरंजन खेला । गह जिव त्रिगुन शक्तिके मेला ॥
नाना भौतिके धर्म चलाई । जक्त जीवको सो भरमाई ॥
एक विरुद्ध पंथ कर दूजा । नानाविधिको थापे पूजा ॥
सबहि भरमायके भोजन करई । कालकलानहिं जिव लखि परई ॥
चार मुक्ति जो वेद बखाना । सो सब देव निरंजन थाना ॥
योग युक्ति सब तासु पसारा । पुरुषद्वार ते परदा डारा ॥
मुक्तिपंथ नहिं पावै कोई । काल भ्रमावै सब नर लोई ॥
स्वसमवेदबोध
( १११ )
तस शिला यक नाम पुकारा । सब जिव पकरि ताहिपरजारा ॥
तस शिलापर जो जिव परही । हाय हाय करि चटपट करही ॥
तलफि तलफि जिव तहँरहिजाही । भूनि भूनि सब यमधरिखाही ॥
केते युग जीवन धरि खायौ । जारि वारिके योनि भ्रमायौ ॥
जरत जीव जब कीन पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥
यमको कष्ट सहो नहि जाई । हो साहिब दुःख टारो आई ॥
यहि बिधि जिव जब कीन पुकारा । पुरुष दयाल दया उरधारा ॥
तब पुरुष ज्ञानीको टेरो । ज्ञानी सुनिये आज्ञा मेरो ॥
सत्यकबीर वचन
छंद—जब देखि जीवन कहैं बिकल तब दया पुरुष जनाइया ॥
दया विधि सतपुरुष साहिब तबै मोहि बोलाइया ॥
कह्यौ मोहि समुझाय बहुविधि जीव जाय चितावहो ॥
तुव दरशते जिव होय शीतल जाय तपत बुझावहो ॥
सोरठा—आपा लीनो मानि, पुरुष सिखावन शिर धरचो ॥
तत्क्षण कीन पयान, शीस नाय सतपुरुषको ॥
चौपाई
आयो जहँ जहँ जीव सतावै । काल निरंजन जीव नचावै ॥
चटपट करे जीव तहँ भाई । ठाढ़ भयो मैं तहँ पुनि जाई ॥
मोहि देखि जिव कीन पुकारा । हो साहिब मोहि लेव उबारा ॥
तब हम सत्य शब्द गोहरावा । पुरुष शब्द ते जीव बुझावा ॥
सब जीवनमिलि अस्तुति लाई । धन्य पुरुष यह तपन बुझाई ॥
यमते छोरि लेहु मोहि स्वामी । दया करो उर अंतर्यामी ॥
इति
अथ जीवनकी स्तुति—छंद तोटक
जय सत्य कबीर कृपाल घनं, दल दुष्टहनं पय पुष्ट जनं ॥
नं. ९ कबीरसागर - ५
( ११२ )
बोधसागर
योग जीत अतीत पुनीत प्रभू, वपु धारण कारन तारन भू ॥
सत सुवकृत सत्यस्वरूप सदा, जन ध्यावत पावत मुक्तिपदा ॥
मुक्ता मनिते जिव जो जुगता, मृतलोक सशोकन भौ भुगता ॥
हम दीन दुखी किमि त्याग चहो, करूणामय हो करूणामयहो ॥
करूणातन धार करी करूणा, करूणामयधौ करूणा वरूणा ॥
सुर सिद्ध बखानत खान दया, जिव देखि अनाथ सनाथ भया ॥
यहि ज्वाल जला यम भक्ष करे, बिन देव दयालको रक्ष करे ॥
यम जालिम जीवन जेर कियौ, सुधि लेत दयादधि देर कियौ ॥
सुख लेशन के तक लेश भरे, जगदीश परे जगदीश परे ॥
जिव काल करालके ज्वाल दहे, तर ऊपर भूपर धाय गहे ॥
हम जानि दयाल जो काल भजे, गुणश्राम प्रनाम सो नामतजे ॥
घटवाह मलाह सलाह कहो, फिर कैलकि गेलको सैल न हो ॥
वह सिंह समान शिकार करे, प्रिय पीव बिना कह जीव तरे ॥
हरि केहरि देहरि पार करौ, सरकार बडे बरकार करौ ॥
भयभंजन रंजन दासनको, खल डाटत काटत फांसनको ॥
भवसागर झागर काल बली, तह जीवकि उक्ति न युक्ति चली ॥
नहि एक उपाय बनाय बनी, करू काज गरीब निवाज गनी ॥
प्रभु पेखतही जिव शीतल है, श्रुति वेद पुराण बखानत है ॥
करूणा दृग कोटिन काल हने, खुगसिंधु कणा गिर बंधु बनै ॥
मतिधीर कबीर कबीर भजो, हितनाम प्रिया बिन नाम तजो ॥
तपखान कृशान शिला दहके, जरते प्रभु मारगते बहके ॥
तलफै तप तीख सभी तलते, बिन नाथ किने हन सोपलते ॥
निजु सुधि निवाज मुदधि लखो, सिरपै समरत्थ जो हत्थ रखो ॥
नरबाल बेहाल निहाल मही, दुखद्वंद्व दवारिन देह दही ॥
मनभौ मदमोचन लाचन है, जनरक्षक भक्षक पोचन है ॥
स्वसमवेदबोध
( ११३ )
सबलायक नायक हंसनके, जिवमोषक पोषक अंशनके ॥
सर्वोपर साहिब जीवनके, तुम जीवननाथ हो जीवनके ॥
प्रभुके भ्रमते यमते बजरे, यहि तस शिला पर आनि जरे ॥
तपिया जपिया न पिया परखे, विधि वेद लवेदन ते हरखे ॥
जिवकाज चले शिरताज सभी, महाराज मयासुख साज सभी ॥
भवभार हरो करतार धनी, भ्रमराय न पय दुखाय दुनी ॥
करि नेह बिदेह जो देह घृतं, शबदाभूत जीव भे कृतकृतं ॥
मृत नायक सायक तीख हते, पद प्रीत प्रतीत सहीत गते ॥
परमारथि भारथि नाथ सदा, गहते लहते भव पाथ हदा ॥
जनजाय समाय अमाय पदा, शुभज्ञान फुरानन सान मदा ॥
सुनि मानस हंस सुनीन्द्रमता, समता लह पाय पता रमता ॥
तब नाम सुधा वसुधा जो पिया, न खुधा युगही युग जीव जिया ॥
दुखिया हितआय महा सुखिया, लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥
कहँ और न दौर तो पौर परे, सरनी परनी करनी नखरे ॥
पद तीर कबीर शरीर जिते, लह सारभे ब्रह्म अकार तिते ॥
जग योनि जहान महान महा, गुरुदेवको भेव नते बलहा ॥
कमलापति क्यों कमलापति हो, पदकीरति कीरति कीरति हो ॥
मृगब्याध समाध अगाध गहे, कलपानसिरान न ध्यान लहे ॥
गुन गाय फनी गणराय निती, नहिं पावत पार अपार गती ॥
लवलीन प्रवीन नवीन जसै, कलिपंक कलंक निशंक नसै ॥
विषया बनराय भुलाय परे, दुखदौन बिनाकर कौन धरे ॥
कह कौन सँदेश अँदेश बड़ा, भग भूलि गई ठग आनि अडा ॥
शिव शोक कि झोकमें झुलि रहा, करता भरता भ्रम भूलि रहा ॥
तिहुँ लोक बिलोक लगीअगिनी, यह जामिन है यमकी भगिनी ॥
तब सूरको नूर जहूर हुआ, ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥
बो० सा० ९
( ११४ )
बोधसागर
सगरे झगरे रगरे बगरे, पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥
बकचाल सभी न मरालमती, बिन एक रतीबन एकरती ॥
जब गर्भमें अर्भक अर्ज करे, तिहि गाढते साहिब गाढि धरे ॥
इत औरहि ढालको ख्याल खिला, बुधि खप्त मरे यहि तप्त शिला ॥
वह औध अचेत सुखोपति सो, कह पाय पराग बनारसको ॥
निज धामते राम पथाम लिया, जगती भगती पद पाय पिया ॥
कित हो झलकी मनसा मलकी, अरु अंध अचेतकिभयटलकी ॥
दुगदानी कि वानि विहानि इतै, मकरंदके फंदको जीव जितै ॥
मृतभृंगन बिंग बिहार करे, क्रम रेख विशेष न देख परे ॥
नहिं कोधित अंध कि गंध मिले, जिव दंडक भंडक भीर हिले ॥
गुरुपीर कबीर उजागर है, भव बोहित सोहित सागर है ॥
जगबंदन भर्म निकंदन है, सरनी सतलोककि संदन है ॥
सतनाम सनेह सुधाम चढे, कलिमा कलिमा कलिमाह पढे ॥
गुणग्राम निकास कबीर कबी, जस गावत पावत कोटि छबी ॥
धुरधर्म धराधर धार कहो, भवतारक पंथ प्रचार कहो ॥
नर पामर घामर बुद्धि बिना, यमज्योति पतंगके ढंग बना ॥
जग व्याधि रु आध असाध करे, चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥
भवतारन हेत निकेत कृपा, पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥
सुरभूप स्वरूप अनूप छिपा, रवि सोम जो कोटि करो मदिपा ॥
गुरुगुप्त कियो धुरको बरनं, भव और भयावन तौ शरनं ॥
हमरे उरके पुर बास करो, निज दासनको अब दास करो ॥
बिन कंतकै भौ जलजंत घने, दुखद्वंद कफंद कफंद फने ॥
जगमाह कि बाह निबाह लहे, भ्रम भो डरभे डरभीर बहे ॥
दनुजात बलात निपात भये, रणधीर बहीर गहीर गये ॥
जिहि जानत जान सुधाम धरे, मुनिके मन मंदिरमें बिहरे ॥
स्वसमवेदबोध
( ११५ )
मनमत्त मतंग मते यहि गौं, तुहि रावत होय महा उतजौं ॥
चित्तचञ्चर बञ्चर बञ्चक है, समसञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥
यम बंकट संकट जीव महा, दमको गमको रमको न रहा ॥
भवसेत अभय पद देत तुही, कलिकंटक कोटिन कर्म दही ॥
चटि सेत पपीलन ढील तहाँ, लैचि दीन पयोनिधि पीन महाँ ॥
नहिं वञ्चको हाड न चाड रहो, मन वाक शरीर कबीर कहो ॥
गुरु नेह न दीसन दीस जिन्हैं, सुखवासन आस है त्रास तिन्हैं ॥
तुम दीनन बन्धु न पीननके, नित पास हो दास अधीननके ॥
मद मान मलान हिये अरभौ, नर नागर सागर भौ गरभौ ॥
करि पाप कलाप करे दुनिया, विष बीज अर्माफल को लुनिया ॥
हरिमें हरिमें हमही वरषे, लहरी भवभक्ति हरी हरषे ॥
दुखदारिद वारिद ज्ञानघनं, निरभय करि भय शमनं शमनं ॥
जिव कालके जाल परे बपुरे, सतनाम निकास सदा जपु रे ॥
गुरुभक्ति निनार किनार गहे, चतुरे लुतरे भवधार बहै ॥
भ्रमभूलते मूलते जात भगे, बुध बालन डालन पात लगे ॥
मन बाचक याचक हौं दरको, तुम छोड अजोड सभी घरको ॥
प्रभु नामको दान निदान चहो, कोई आसरुवास बिकाश न हो ॥
तरनी बरनी तब नाम जहाँ, गहिये लहिये विशराम तहाँ ॥
रसना रसरास रसै रससो, जसतौ बस और सबै कस हो ॥
चढ नाम रथा गइ बीत विथा, रसना रसना बिन कीर्त कथा ॥
पदपंकज प्यार जो छूटि गया, अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥
ठग ठाकुर आनिके जूटि गया, जगजीवनकी बुधि छूटि गया ॥
रहगी रमते बड़ि भीर भई, सतपंथ विहाय कुपंथ लई ॥
गुरुभक्ति बिना भव भूलि परे, शरणागत पाहि कबीर हरे ॥
( ११६ )
बोधसागर
दोहा—यह कबीर पंचाशिका, पढ़ै सप्तीति प्रतीत ।
परम पुरुष पद पावही, काल कष्ट जा बीत ॥
इति श्रीकबीर पंचाशिका
सत्यकबीर वचन—चौपाई
तब हम कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसाई ॥
जब तुम जाय धरो नर देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा ॥
पुरुष नाम सुमिरन सहिदानी । बीरा सार करो परमानी ॥
देह धरे सत शब्द समाई । तब हंसा सतलोकहि जाई ॥
देह धरे कीने जहँ आसा । अन्तकाल लीनो तहँ बासा ॥
अब तोहि कष्टभयौ जिव आनी । ताते यहि बिधि बोलो बानी ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । बिसरे पुरुष काल धरि खाई ॥
जीव वचन—चौपाई
कहै जीव सुन पुरुष पुराना । देह धरे बिसरो नहिं ज्ञाना ॥
पुरुष जानि सुमिरौं यमराई । वेद पुरान कहैं समुझाई ॥
वेद पुरान कहै मत येहा । निराकारसे कीजै नेहा ॥
सुर नर मुनि तैंतीस कोरी । बंधे सबहि निरंजन डोरी ॥
ताके मत कीने हम आसा । अब यह जानि परा यमफांसा ॥
ज्ञानी वचन—चौपाई
सुनो जीव यह छल यमकेरा । यह यमफन्दा कीन घनेरा ॥
छंद—कला कला अनेक कीनो जीव कारन ठाट हो ।
वेद पुरानो शास्त्र स्मृती याते हूँध्यौ बाट हो ॥
आप तनधरि प्रकट है यम सिफत आपन कीनहो ।
नाना गुन मन कर्म फाटो जीव बंधन दीन हो ॥
सोरठा—कला कला परचण्ड, जीव परे बस कालके ।
जन्म जन्म सह दण्ड, सत्यनाम चीन्हे बिना ॥
कबीर पंचाशिका एवं अन्य बोध
स्वसमवेवबोध
( ११७ )
चौपाई
छन यक जीवनको सुख दैऊ । जिव बँध मेटि पुरुषपहँ गेऊ ॥
अथ जीवमुक्तावन हेत सत्य कबीरको संसारमें आगमन कथा—चौपाई
यहि विधि काल जक्त धरि खायौ । जिव नहिं कोई मुक्तिपद पायौ ॥
तीनों पुर पसरा यमजाला । सकल जीव कहँ कीन बिहाला ॥
कालके करते जीव न छूटे । बहुविधि योगयुक्तिमें जूटे ॥
विनशत शब्द न जीव उवारा । तब समरथ अस वचन उचारा ॥
सत्य पुरुष वचन—चौपाई
कैल सकल जग बारचौ खाई । एको जीव लोक नहिं आई ॥
तातै समरथ मोहि फरमाई । साँचे जीव आन मुक्ताई ॥
पुरुष वचन कीने तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
प्रथमहि चलयौ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीस पर छाजा ॥
सतयुग सत्य सुकृत मोर नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव बर आऊँ ॥
करि परनाम तब पगधारा । पहुँच्यौ आय धर्म दरबारा ॥
द्रीप झांझरी नाम बखानी । कैल पुरुषकी सो रजधानी ॥
पगके देत झांझरी गाजा । कैल पुरुष बैठा तहँ राजा ॥
गये झांझरी द्रीप मँजारा । गर्बित काल न बुद्धि विचारा ॥
मोकहँ देखि धर्म ढिग आई । महाक्रोध बोले अतुराई ॥
योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसे वचन सुनावो ॥
योगजीत वचन—चौपाई
तासो कह्यौ सुनो धर्मराई । जीवकाज संसार सिधाई ॥
तुम तो कष्ट जिवनको दीना । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीना ॥
जीव चिताय लोक ले आवो । काल कष्टते जीव छोड़ावो ॥
ताते मैं संसारहि आवो । देय परवाना लोक पठावो ॥
अथ कालपुरुष और सत्यकबीरका युद्धवर्णन—चौपाई
काल क्रोध करि वचन उचारा । भवसागरमें राज हमारा ॥
( ११८ )
बोधसागर
तुम कस जिव मुक्तावन आवा । मारो तोहि अबहि भलदावा ॥
काल अनंत रूप तब धारा । योगजीत कह आनि प्रचारा ॥
महाभयंकर रूप बनावा । गज स्वरूप है सम्मुख धावा ॥
सत्तरयुग हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥
परमपुरुष सेवा वस भैऊ । राज तिहुँ पुरको मोहि दैऊ ॥
तब तुम नारि निकारौ मोही । योगजीत नहि छोडो तोही ॥
अस कहि धाय सुंड फटकारा । दंतसो योगजीत पर मारा ॥
योगजीत कै लहि ललकारा । गहि कर सुंड दूर तिहि डारा ॥
पुरुषप्रताप सुमिर मन माहीं । मारचो सत्य शब्द से ताहीं ॥
ततछन ताहि दृष्टि पर हेरा । श्यामलिलार भयौ तिहिकेरा ॥
पंख घात जिमि होय पखेरू । तैसे कैल मोहि प्रति हेरू ॥
जब फटकार कर गहे डाला । भागा काल पैठ पाताला ॥
गयौ पाताल कूर्मके आगे । योगजीत गये पीछे लागे ॥
बिनती करे कूर्मसे जाई । राखो कूर्म शरन हम आई ॥
योगजीत मोहि मारि निकारा । जिव ले जाय पुरुष दरबारा ॥
युगन युगन हम सेवा कीना । पुरुष मोहि भवसागर दीना ॥
एक पायँ हम ठाढे रहेऊ । तबहि पुरुष सेवा सब भैऊ ॥
तीन लोक दीना मोहि हारी । अब कस मोकहँ मारि निकारी ॥
जाय कूर्मकी शरन जो परेऊ । तब ताने दाय़ा उर धरेऊ ॥
कूर्मवचन--चोपाई
तबै कूर्म उठि बिनती लाई । को तुम आहु कहाँ ते आई ॥
अपनो नाम कहो मोहि स्वामी । पुरुष अंश तुम अंतरयामी ॥
योगजीत वचन--चोपाई
तब हम कहा नाम मोर ज्ञानी । योगजीत हम अंश बखानी ॥
समरथ वचन जीव बर आवा । काल फौंस जीवन मुक्तावा ॥
स्वसमवेदबोध
( ११९ )
कैलवचन
सुन ज्ञानी मोर वचन अलेखा । अपने मनमें करो बिवेका ॥
सत्तर युग हम सेवा कीना । पुरुष बकसि भवसागर दीना ॥
समरथ वचन दीन मोहि हारी । तीन लोक पायौ संसारी ॥
तबकी बात रहित भै भाई । अब कस उलटी अदल चलाई ॥
सबै अंश भुक्तै रजधानी । हमपर कोप भयौ तुम ज्ञानी ॥
अब जस निरणय हमै सुनावो । तस सीषा पन जानि चलाओ ॥
कूर्मवचन
तबै कूर्म बोले अस वानी । बिनती एक सुनो हो ज्ञानी ॥
जो तुम बिनती मानो मोरा । तौ हम तुमसे करे निहोरा ॥
तुमहू कैल वचन जौ मानो । तौ हम ज्ञानी निर्णय ठानो ॥
ज्ञानी सुनौ पुरुष कै अंशा । धर्मरायको मेटो संसा ॥
चौका पान कजाव तुमारा । लोक वेदको काल पसारा ॥
जो कोइ करे जोर बरियाई । तौ हम ताके संग न भाई ॥
कूर्म जबै अस बिनती ठानी । ज्ञानी कैल दोहू सुख मानी ॥
फिरके कैल झांझरी आनो । ज्ञानी कैलको वचन सुनावो ॥
ज्ञानी और कालपुरुषको वार्ता--चौपाई
बिना शीसके यमकी देही । काल पुरुषको चीन्ह है येही ॥
सत्य कबीरसे बिनय उचारी । सुनिये ज्ञानी अरज हमारी ॥
अपनी देह नाथ मोहि दीजै । ऐसी मोपर दाय़ा कीजै ॥
ताको वचन मानि हम लीना । अपनी देहको कैलको दीना ॥
शीश समेत और बिन माथा । दोनों देह निरंजन साथा ॥
जब चाहे तब शीस देखाई । निज इच्छा पुनि ताहि लोपाई ॥
जो साधू बैराट निरेखे । सो यह कौतुक नैनन दीखे ॥
रूप विराट शून्यमें निरखे । निजु आगूको लेखा परखे ॥
जब षट्मास मरन रहि जावै । काल कबीर कि देह छपावै ॥
( १२० )
बोधसागर
अपनी देह देखावै काला । तब साधू जाने जंजाला ॥
बिना शीस जब दरसै देहा । काल पुरुष तब जाने येहा ॥
मरन काल निज साधु निहारी । होहि सचेत लगावै तारी ॥
निरंजन वचन
सोरठा-तुमहुँ करो बखशीश, पुरुष जो दीनो राज मोहि ।
षोडशमें तुम ईश, ज्ञानी पुरुष एक सम ॥
ज्ञानी वचन--चौपाई
ज्ञानी कहै सुनो धर्मराई । जीवनकहँ मैं आन बचाई ॥
पुरुष आज्ञाते मैं चलि आवों । भवसागरते जीव मुक्तावों ॥
पुरुष अवाज टार यहि बारी । तौ मैं तोकहँ देब निकारी ॥
शब्द
अपने नामकी सोंकर गह मैं पाटि डरी हो ।
तना तनतकै बेटवा मारे निधिया गई बौराई ॥
देहरि चढ़िके मेहरि मारे निर्ई देखो गुरुवाई ।
परवा फोरि द्वैचोखा निकसे बीचमें मिलि गई हस्ती ॥
सोटा चार कमरमें मारेनि निकर गई अलमस्ती ।
आसन लूटेनि वासन लूटेनि लूटे तिनपाई पौवा ॥
ताल अस मोर सनहक लूटी हांडी चलावन डौवा ।
हँसियाको बेट कोदोकै भूसी ईमोर न्यामत लूटी ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो दुविधा गै अब छूटी ।
निरंजन वचन--चौपाई
धर्मराय अस बिनती ठानी । मैं सेवक दुतिया नहिं मानी ॥
ज्ञानी बिनती एक हमारा । सो न करो मोर होय बिगारा ॥
पुरुष मोकहँ दीनो राजू । तुमहू देव होय तब काजू ॥
बिनती एक करो हो ताता । दृढ़ करि जान्यौ हमरी बाता ॥