कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( ४१ )
सुलतान वचन
जाओ विहिश्त मानो विश्वासा । सहस्र सुई लेना हम पास॥
सतगुरु वचन
इतनी गोष्ठि शाह सो कीना । तब तहाँ से पयाना दीना ॥ एक सुई उन हम सो लीना । सहस्र सुईका कौल तब दीना ॥ साखी-इतना कहि हम उठि चले, चानक शाह लगाय ।
नीमशाम के वक्त में, जुड़ी अदालत आय ॥
चौपाई
सब मिलि आय जुडे दरिखाना । बैठे आय तहाँ सुलताना ॥ शाह के हाथ सुई जब देखा । तब वजीर मन कीन विवेखा ॥ हाथ जोड़िके विनती लावा । कैसे सुई हाथ में आवा ॥
वजीर वचन
कैसे सुई हाथमें लीना । कारन कौन कहो हम चीना ॥
सुलतान वचन
कहे सुलतान सुनो दीवानाँ । बन्दा अल्लाह दिया सहिदाना॥ दुरवेश एक यहाँ चलि आया । जिन या सुई दीन हम पाया ॥ कहा दुरवेश विहिश्त तुम आव । तब या सुई लेब तेहि ठाँव ॥ ऐसे वचन कह्यो दुर्वेशा। सुई हम देन कही तेहि देशा ॥ एक सुई हम उनसे लीना । सहस्र सुईका कौल हम दीना ॥ इतना वचन कहे सुलताने । सुनत वचन विन्ती तिन ठाने॥
दीवान वचन
दीवान कहे सुनो हो साई । सुई विहिस्त कौन विधिजाई ॥ गाम परगना और ठकुराई । सबही धरा रहै यहि ठाई ॥ तात मातु सुत सुन्दर दारा । तन धन धाम सकल परिवारा॥
१ दीवान
( ४२ )
मुलतानबोध
अंत समय ये काम न आवैं । आपु चिन्हेतब जिव सुख पावैं॥ जहँ लगि जगमें दृष्टि दिखाहीं । सो सब विनशि जाय क्षणमाहीं॥ जतन करे बहुत सुख पावे । सो तन जले गडे मिटि जावे ॥ ऐसे कहि वजीर शिर नायौ । कैसे सुई संग ले जायौ ॥ समझि देखु अपने दिलमाहीं । सुई संग कौन विधि जाहीं ॥
मुलतान वचन
तब मुलतान वचन अस कहई । सुनो वजीर मता यक आहई॥ इतना लशकर संगलै जायब । हस्ती चार सो सुई भरायब ॥
वजीर वचन
हस्ती संग चले नहिं शाहा । खोजा करो तुम दिलके माहा॥ हस्ती घोडा माल खजाना । यह सब संग चले न निदाना ॥
मुलतान वचन
शाह तबै अस वचन सुनावे । बैठि सुखपालविहिश्तको जावे॥ लेवैं बाँस में सुई भरायी । यहि विधि सुई संग ममजायी॥
वजीर वचन
तब दिवान कर जोरि सुनावे । यह सुखपालकबर लगि जावे॥ आगे कस तुम करहु साई । सो मोहि वचन कहो समझाई॥
मुलतान वचन
आगे हम घोड चढ़ि जायब । लेइ जीन में सुई भरायब ॥ अहो दिवान एसेई करिहौ । ले दरवेश के आगे धरिहौ ॥
कबीर वचन
सुना दिवान तबै हसि दीना । दोइ कर जोरिके विन्ती कीना॥ दादा बाबा तुम्हरे रहैया । घोडे चढ़ि कोऊ ना गैया ॥ साखी-इतने में संग नहिं चले, मुनहु शाह चित लाय ॥ यह बज्रद दिन चार है, सो भी संग न जाय ॥
बोधसागर
(४३)
चौपाई
मनमें चकितशाह तब भयऊ । झूठी माया हम चित दयऊ ॥ सुई संग चले नहीं जाही । झूठी राज पाट सब शाही ॥ सहस्र सुईका का परसंगा । एके सुई चले नहीं संग ॥ अबतो खाना हम तब खावें । जब जिन्दाका दर्शन पावें ॥ इतना ज्ञान शाह घट आवा । जिन्दा दरशको सुरति लगावा ॥ इबराहीम ऐसि मति ठाना । राज माँहि भक्ती जिन जाना ॥ साखी-जिन्दा जिन्दा रट लगी, हिरदय रहा समय ॥ जो जिन्दा अबकी मिले, पूछू सब घर पाय ॥
चौपाई
ऐसी रटना शाह तब लावा । जिन्दा मिलन भयो उर भावा ॥ बहुत दिवस रट लागी ऐसी । आगे कहूँ भयी गति जैसी ॥ शाह कीन माँहि बिचारा । जिन्दा मिले सो कौन प्रकारा ॥ सब सिद्धन को लाउ बुलायी । उनसे पूछो मति अस भाई ॥ जोई सिद्ध अजमत बतलावें । उनसे खबर जिन्दाकी पावें ॥ जवे शाह ऐसी मति ठानी । लिये बुला सिद्ध सब ध्यानी ॥ साखी-सब सिद्धनको टेरिके, शाह किये सन्मान ॥ देउ करामत सिद्ध मोहिं, तब मेरो मन मान ॥
चौपाई
सन्मुख शाह सिद्ध सब आनी । तबही शाह कहे अस बानी ॥
सुलतान वचन
अधिक प्यारे तुमहौ अछः को । करामात दिखलाऔ अब हमको ॥ ना मैं तुम्हको बांधि झुलाऊँ । ना तो तुम्हको छुरी मराऊँ ॥
सिद्ध वचन
तब बोले सिद्ध चौरासी । हम हरि के आहिं उपासी ॥ निशि दिन रामा नाम गुण गावें । करामात ढिग हम नहीं जावें ॥ यह मुनि शाह बहुत रिसियाना । हुकम कीन सब बन्दी खाना ॥
(४४)
सुलतानबोध
सुलतान वचन
तुम काफिर अछ्हाह ते दूजा । भूत प्रेत चित लाये पूजा ॥ चक्की ढिग इनको बैठाओ । निशि दिन इनसे नाज दराओ ॥ जो नहीं करामात तोहि होई । क्यों कर सिद्ध कहाओ सोई ॥
सतगुरु वचन
बैठे सिद्ध सब चाक चलावें । चित विस्मय सब हरिगुणगावे ॥ त्रास देखि मुनि आयी दाय। ततछिन् शाहद्वार चलि आया ॥ सोटा मारा चक्की माहीं । घूमहु सतगुरु दाय। कराहीं ॥ बिदा सिद्ध भये हम भयगुती । देख्यो आय शाहके जपती ॥ कहा साह सों तिन्ह कर जोरी । चक्की सब आपहिं चलि दौरी ॥
सुलतान वचन
मुनि के शाह कैफदिल आयी । कौन शरूश यह चक्कि चलायी ॥ वेगहि दूँडि लाओ यहि वारा । चक्की चलायो सो अछ्हाह प्यारा ॥
सतगुरु वचन
दूंदत नगर थके दिल जबहीं । नहिं पाये व्याकुल चित तबहीं ॥ जबहि शाह घर लगन विचारा । तब हम जीवदया उर धारा ॥ तुरतहि जाय तहां पगु धारा । शाहके महलन चढे गोहारा ॥ महलपर देखत फिरो वहुँ खुठा । करो पुकार हेरानो ऊंटा ॥ मुनि के शाह कोधकरि धाये । कौन हमारे महलन पर आये ॥ कहो तुम कौन कहाँ से आवा । कौन काज महल पर धावा ॥ तब हम कहा ऊंट यक छूटा । दूंदत फिर्ह मैं अपनो ऊंटा ॥ बहुत अधीन ऊंट हम भायो । खोजत ऊंट महल पर आयो ॥ मुनिके शाह तबे हँसि दीन्हा । कैसे ऊंट महल पर चीन्हा ॥ जँगल माहिं तेहि खोजो जाओ । कैसे ऊंट महल पर आओ ॥ तब हम कहा सुनो तुम ज्ञाना । चढे तरक्त अछ्हाह किन जाना ॥ ऐसी बूझ करो मन माहीं । सत्य वचन धरो मन ठाहीं ॥
बोधसत्तार
(४५)
सारखी-तस्वत चढे किन पाइया, सुनो शाह सुलतान ॥
हरदम साहब याद करू, रचा जिन सकल जहान ॥
महल न आवे ऊंट हमारा । तस्वत ऊपर अछ्हाह निहारा ॥
अछ्हाह तस्वत पर कैसे पावे । जहाँ लगि घट महाँ गर्व रहावे ॥
जब तुम छोड़ो राज शरीरा । अछ्हाह लखो तुम अपने पीरा ॥
छोड़ो मान गुमान रे भाई । अछ्हाह रूप तबही मिलि जाई ॥
सुनत शाह सन्मुख जब आवा । तब जिन्दा से पूछन लावा ॥
सुलतान बचन
कौन रूप कौन नाम तुम्हारा । कहो अछ्हाह मिले कौन बिचारा ॥
जिन्दा बचन
सांचे दिलसे सुरति लगाओ । प्रेम प्रीति लौलीन रहाओ ॥
सुख संपति की करो न आशा । निशि दिन दीया प्रेम प्रकाशा ॥
मन अस्थिर करि सुरति लगाओ । तबहि दर्श अछ्हाह को पाओ ॥
कहे कबीर खोजे सो पावे । खोजत खोजत अलख लखावे ॥
सारखी-प्रेम प्रीति करि खोजिये, हियमें आवे ज्ञान ॥
अलख अछ्हाहकी खोजमें, जागत भये सुलतान ॥
जिन ढूढ़ा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि ॥
जो बौरा ढूबन डरा, रहा किनारे बैठि ॥
चौपाई
जब कीन मन शाह अन्देशा । नहिं तहाँ ऊंट नहीं दुवैशा ॥
ऐसे बहुत दिन बीता भाई । काल कला घट आन समाई ॥
बहुरि एक दिन बलख मैझारा । शाहके महलनमें पगु धारा ॥
नौरोजा खेले सुलताना । गिलम बिछायबहुविधि जाना ॥
महलन माहीं पहुँचे जायी । देखत फिरे महल चौपायी ॥
इब्राहीम अधम सुलताना । हमको देखत बहु रिसियाना ॥
(४६)
मुलतान बोध
मुलतान वचन
कहे शाह तुम कौन है भाये । केहि कारण तुम महलन आये॥
जिन्दा वचन
हम परदेशी दूर दिशारा । देखत फिरहिं सराय बसोरों ॥
मुलतान वचन
शाह कहे यह महल हमारा । कहाँ सराय जो करइ बसारा ॥
जेहि महल हीरा जडा अपारा । तापर धुनी तुम कैसे बारा ॥
अब तुम जाओ शहर बजारा । तहाँ जाइ करो सराय बसारा ॥
जिन्दा वचन
कहे दुवैशा सुनो तुम शाहा । करि विचार परखो दिल माहा॥
महल तुमारा तुम कहैं पावा । करो खोज यह किन निर्मावा ॥
महल तुम्हारो होय न भाई । तुम भी सुसाफिर बसो सराई ॥
सुनो शाह तुम चतुर सयाना । सुरति निरति बूझो तुम ज्ञाना॥
बहुत बादशाह तुम आगे भयऊ । महल न संग काहुके गयऊ ॥
दादा बाबा तुम्हरा रहिया । महल काहुके संग न गैया ॥
जा तुम थापा महल हमारा । अन्त काल सब छुटे घर बारा ॥
यह जग सकल सराय बसेरा । इनमें नाहि कोउ केहि केरा ॥
जहाँ के ताहाँ छूटहिं धामा । यह सबही दिनचार सुकामा ॥
हरदम साहिबको पहिचानो । महल सराय एक करि जानो ॥
ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आवै । राज छोड़ि साहिब गुण गावै ॥
साखी-ज्ञानें दृष्टि दिल आवई, सब तजि होय फकीर ॥
कहे कवीर मुलतानसे, ज्ञानके लागे तीर ॥
१ गुजारा, निबाहि ।
२ इस साखीके आगे एक प्रतियें नीचे लिखे पद हैं । किन्तु यहाँ इनका मेल न मिलनेसे नोटमें
लिखा है ।
बोधसागर
( ४७ )
चौपाई
यक दिन शाह जु चले शिकारा । चुनि चुनि साथ लीन्ह असवारा छोडे बाज पक्षी गहि आने । देखत शाह बहुत सुख माने ॥ बहुविधि मारग करत कलोल्ला । जहँ तहँ फिरे शिकारिन टोला ॥ बहुत समय बीति जब गयऊ । एक शिकार हाथ नहिं अयऊ ॥
चौपाई
ज्ञानदृष्टि जब दिलमें आही । छोडो राज पाट बादशाही ॥ होय फकीर जंगलमें बासा । छोड़ी राज तख्तकी आसा ॥ शाह जो बैठे जंगलमें जाई । नगरकी सब परजा चलि आई ॥ काजी पण्डित मोख मुलाना । महंत महाबत गुलामनकराना ॥ सेठ सेनापति परजा आई । सबही धरे शाह की पाई ॥
प्रजा वचन
ऐसी बात न करहु गुसाई । सबही राज छण्ड होय जाई ॥ ओ तुम तजो तख्त औ राजू । सब परजा का होय अकाजू ॥
मुलतान वचन
नाहीं तख्त निकट हम जाबें । नहिं अपने शिर भार चढ़ाबें ॥ यह बादशाही हमसे नहिं होवे । कौन तख्त चढ़ि दोजख जोवे ॥ हम छोडा तख्त बादशाही । फिरि संराय महँ हम नहिं जाहीं ॥ बिना भक्तिमुक्ति किन पायी । राज करे सो दोजख जायी ॥ हमको जाय मिले यक साई । बहिं साहब मुझको फरसाई ॥ मैं अपराधी उनाहिं न चीन्हा । बिछ छाँडि उन हमको दीन्हा ॥ अबतो करें मैं कौन उपाई । साइ मुझको कस मिलि है आई ॥
परजा वचन
अब तुम चलो महलके माहीं । हम सब संग तुम होहु गुसाहीं ॥ तुमको छाँडि एको नहीं जहँ । सब मिलि संग पयाना देहँ ॥ सबि मिलि लाये महल मेंशारा । शाहके मनमें शोब अपारा ॥ कैसे के जिन्दा मैं पाऊं । कैसेके मैं जिब मुक्तताऊं ॥ मुठे झूठ मिल सब संसारा । दोजख कुंडमें नाखन हारा ॥ साखी-बेर बेर हमको मिले, नाम जिन्दा सो आहि ॥ अमरापन यक मुलतान है, किसविधि मिलेंगे आहि ॥
( ४८ )
सुलतानबोध
तबै शाह बहुत रिसियाना । खोजु शिकार हुकम फरमाना ॥ तबै शिकारी दुहुँ दिशि धावैं । पावैं न शिकार मनहि पछतावैं ॥ यहि विचलीला अस भइ भाई । सुनु धर्मनि तुम चित लगाई ॥ हरिन एक जो कनक रंग देखा । हीरा रतन मणि जडे विशेषा ॥ देखि सरूप शाह ललचाई । यहि मिरगा कहैं घेरो भाई ॥ आज्ञा पाइ चले असवारा । घरयो हिरण सेन मझारा ॥ कहे शाह जो मिरगा जाई । तुमसे मिरगा लेहौं भाई ॥ सेना सब से तब कहे पुकारी । मिरगा भागि शाह तर गयऊ ॥ शाह सब से तब कहे पुकारी । मिरगा मारि लाऊँ यहि बारी ॥ मिरगा संग सुलतान अकेला । नहिं कोइ सेना नहिं कोइ चेला ॥ छिन में मिरगा देखि लुपाना । तेहि पीछे धावहि सुलताना ॥ लागी प्यास शाह को भांरी । महा भयानक बनही मझारी ॥ वट का वृक्ष तहाँ यक देखा । शीतल छाया बहुत विशेषा ॥ मिला फकीर एक तहैं वासा । कुत्ता दोग्य रहै उन पास ॥ शीतल कलशा पानिहि भरिया । जापर ठिलिया मठका धरिया ॥ खोजत नीर शाह चलि आये । दुआ सलाम करि वचन सुनाये ॥
सुलतान वचन
कहे सुलतान प्यास सुहि भारी । जात जान तुम लेहु उबारी ॥
दुर्वेश वचन
हम फकीर दुर्वेश कहावैं । सुरति होय तो भरो पियावैं ॥ पियो शाह जल लियो निवासा । जिन्दे कीना अजब तमाशा ॥
१ दूर से आहू उते आया नजर । पहुँचा उसपर शाह घोडा मारकर ॥ होके वह अपने सवारों से जुड़ा । पीछे दो फरसंग तक उसके गया ॥ जाते जाते हो गया आहू खड़ा । वाफ़िहतत आबिन अब्रम से कहा ॥ तुम्हको इस खातिर नहीं पंदा किया । वहसियों पर ता करे जोरोजका ॥ है गरज ईजाद से तेरे कुछ और । कर जरा तू विलम अपने आप गौर ॥ बात यह कहकर वह गायब होगया । नक्शा उसका शाह के विलपर हुआ ॥
बोधसागर
( ४९ )
साखी-गाकर कठी अगिनसे, मिश्री घूतहि मिलाय ॥ न्यामत धरी रिकाबमें, कुत्तासे कहे खाय ॥
बोपाई
कुत्ता न्यामत खाय न भाई । मार डुरवेश कुत्ता के ताई ॥ ऐसो चरित कीन दुर्वेश । तब शाहके मनमें भयो अंदेशा ॥
मुलतान बचन
कहे शाह तुम सुनो दिवाना । यह पशुजीव न्यामत कहजाना ॥
जिदा बचन
कहे फकीर सुनो बेनादाना । जैसा दिया तैसाही खाना ॥ जौसि करे करतूत कमाई । तैसि देह धरि भुगते भाई ॥ यामें फेर फार नहि होई । जो बोवे लुनिहे वह सोई ॥
मुलतान बचन
दोयकर जोरिके विन्ती कीन्हा । साहब तुमरी गति हम चीन्हा ॥ वानी अगम क.हो समझाई । आगे कौन हते यह साई ॥
दुर्वेश बचन
तब दुर्वेश कहे समझायी । सुनो शाह तुम मन चितलायी ॥ बलख शहर यक नगर रहाई । तहँके हैं यह दोनों राई ॥ इब्राहीम अहै यक राजा । एक बाप अरु दूजो आज्ञा ॥ राज पाय कछु भक्ति न कीना । ताते जन्म श्वान को लीना ॥
१ यहां जो शाह इब्राहीम अदम साहबके बाप दादेको बलखका बादशाह लिखा है यह बात इतिहास और विचार द्वारा एकदम निर्मूल ठहरता है, क्यों, कि बलखके बाद शाह इब्राहीमके बाप दादे नहीं थे बरन इसके उल्टा उनके पिता एक महान संत थे जो परम विरागमान और एकांतवास करने वाले थे । शाह इब्राहीमको उत्पत्तिको कथा बहुतही रोचक और आश्चर्य दायक है । यहां स्थानाभावसे नहीं वे सकता गुरुको कृपा होगी तो कबीर साहबके जीवन चरित्रके सहित मुलतान चरित्र भी बहुत स्वरूपमें लिखेंगे । यहां दोनों कुलों को बलख के बादशाह और शाह इब्राहीम अदमको बाप दादा बतलाना बहुत ही भूल है इस हेतुसे जाना जाता है कि, इस पुस्तकमें भी उत्तरोत्तर मिलावट होती गयी है और मिलावट करनेवाले भी साधारण
( ५० )
सुलतानबोध
सुलतान वचन
तब सुलतान कहे सुनु साईं । एक बात और कहो समझाई॥ दोय खूँटे दोय श्वान बंधाये । तीजा खूँटा क्यों खालि रहाये॥
दुर्वेग वचन
कहे दुर्वेग सुनो रे भाई । याकी गतिहि कहुँ समझाई ॥ इब्राहीम नाम जेहि होई । बलख शहर का राजा सोई ॥ राज माहि बहुत सुख करिहैं । भाव भक्ति नाही मन धरिहैं ॥ विना बन्दगी जिन छूटे देहीं । वे पुनि जनम श्वान को लेहीं॥ इसमें जड़ूँ आनि के ताही । तब ये तीनों रहें एक ठाहीं ॥ इतनी सुन दुर्वेगहि बाता । शाह के मन में लागी घाता॥
सुलतान वचन
मुनि सुलतान अचम्भा भयऊ । तब दुर्वेग हि पूछन लयऊ ॥ श्वान योनि कस छूटे साईं । ताका भेद कहो समझाई ॥
दुर्वेग वचन
कहे दुर्वेग भक्ति जो करई । सो नर श्वान देह ना धरई ॥ करे बन्दगी साहिब केरी । दया मिहिर की दशा जा होरी॥ प्रेम प्रीति परमारथ नीका । माया मोह जाने सब फीका ॥ सब सुख नामहि से लौलावे । सो जिव श्वान जनम नहि पावे॥
सुलतान वचन
शाह कहे जो लेह बचाई । सो दुर्वेग साँच है भाई ॥ सो दुर्वेग खुदा का बन्दा । श्वान योनि का काटे फन्द ॥
विचारके जान पठते हैं । ऐसी ऐसी मिलाव और मूलके कारण कबीरपंथी साहित्यकी निन्दा होती है। किन्तु बुद्धिमानों को विचार पूर्वकही उसे ग्रहण त्याग करना चाहिये।
बोधसागर
( ५१ )
मन में शाह तब ऐसा जाना । यह दुर्वैश है खुदा समाना ॥ बार बार मोहि आनि चितार्ह । सोह दुर्वैश आप है साँई ॥ तब अपने दिल कीन्ह विचारा । इनसे कारज होय हमारा ॥ जो यह कहे सोई चित दीजे । इनका वचन मान शिर लीजे ॥ इतना शाह मन करत अन्देशा । नहीं वहाँ कुत्ता नहीं दुर्वैशा ॥ तबहि शाह मन कीन विचारा । निश्चय है यह सिर्जन हारा ॥ सार्वी-कहे शाह अबकी मिले, पुरवे मनकी आस ॥ कदमें शिरे छुआवहुँ, पलक न छाडूँ पास ॥
चौपाई
बन ते शाह नगर में जाई । मन जिन्दा में रहा समाई ॥
जिन्दा वचन
गुप्त रूप तब शब्द उचारा । इब्राहिम सुनु वचन हमारा ॥ नाहक जिव तुम मारि उडाई । तैसा हाल तुम्हारा भाई ॥ जाहि समय इजराइल ऐहैं । महा भयंकर रूप दिखाहैं ॥ हनिहैं सुगदर धरिहैं चोटी । उठै अगिन तब बोटी बोटी ॥ ताहि समय पुनि करिहो रोरा । काम न आवे सेन करोरा ॥ मारत पंछी दरद न आई । एक दिन ऐसा तुम पर भाई ॥ बैन सुनत सुरछित मन माहीं । गुप्त भये पछताने ताहीं ॥ कहे शाह खोजो तेहि जायी । जिन ऐसी सुहि बात सुनायी ॥ खोजि थके पुनि सुहि नहीं पाये । सुरछित शाह भवन चलि आये ॥ तबहि शाह मन ज्ञान समाना । जिन्दा वचन साँच कर माना ॥ राज पाट सुख सम्पति देहा । यह सब दीखत स्वप्न सनेहा ॥ ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आही । छोडेउ तरस्त तबे बादशाही ॥
१ मुसलमानों धर्मके विस्वासके अनुसार इजराइल एक फिरीस्ता है जो सब प्राणियोंके आत्माको शरीरसे अलग करता है तब मृत्यु होती है ।
( ५२ )
सुलतानबोध
होय फकीर जंगल कियो बासा । राज काज की छाडी आसा ॥ सबही लोग नगर के आये । आइ शाह के लागे पाये ॥ काजी वजीर औ शेखमुलाना । महन्त महावत नफर गुलामा ॥ लागे सबही शाह के पाईं । सबहि मिलि के विन्ता लाईं ॥ ऐसी बात न कीजे साईं । तुम विन यह परजा दुःख पाईं ॥ जो तुम तरुत न बैठो राजा । सब परजा को होत अकाजा ॥ राजा से परजा सुख पावे । जहाँ तहाँ आनन्द रहावे ॥
सुलतान वचन
कहे सुलतान सुनो रे भाईं । हमतो तरुत के निकट न जाईं ॥ ना हम पावैं तरुत पर लावैं । ना अपने शिर भार चढावैं ॥ अब हम तरुत न बैठे आईं । बैठे तरुत सो नरकहिं जाईं ॥ अब हम राज तजी बादशाही । यम की मार सही नहिं जाही ॥ भक्ति विना जिव मुक्ति न पावे । राज करे सो नरकहिं जावे ॥ हमको आज मिले यक साईं । सो साहिब ऐसी फरमाईं ॥ मैं अपराधी उन्हे न चान्हा । अधविचछोडिसोमोकोदीन्हा ॥ अब हम करिहैं कौन उपाईं । वह अवसर मुझको कब आईं ॥
प्रजा वचन
प्रजा कहे सुनो हो साईं । अब तुम चलो महल के माईं ॥ जो तुम राज छाडि बन जैहो । तो सब संगं तुम्हारे ऐहों ॥ सार्वी-यहां रहन को छोडि के, तुम सँग करिहैं प्यान ॥ ऐसे वचन प्रजा कहि, लाये गृह सुलतान ॥
चौपाई
जब आये शाह महल मैझारा । उठी बिरह मन माहिं अपारा ॥ अबमैं किस विधिजिन्दा पाऊँ । उन विनु होय न मोर बचाऊँ ॥ यह सब लोक अहै संसारा । नरक कुंड में डारनहारा ॥
बोधसागर
( ५३ )
ऐसी करूणा भयि दिल माहीं । जिन्दा महल मिले केहिं ठाहीं॥ भयी शाह मन विरह अपारा । जिन्दा जिन्दा करइ पुकारा ॥ साखी-उन मनमें सुझको मिले, नाम न दिया बताय ॥ ईब्राहीम सुलतानको, भयो मिलनको भाय ॥
चौपाई
सुछित शाह मन चलि आवा । मनमें जिन्दा आनि बसावा ॥ थोडे दिन विरहा अधिकार्ई । फिरतो धरम जाल फैलाई ॥ माहिं पुनि राज तहैं सुख पाये । माया मोह देखि ललचाये ॥ गया ज्ञान सुखे में लपटाना । काल शाह घट आनि समाना ॥ उरझे शाह स्वाद सुख रंगा । देखि रंग मन बहुत उमंगा ॥ पुनि कछु दिवस जो ऐसे बीता । बिसरे शाह अछ्हाहकी चिन्ता ॥ ऐसी चाल देखि हम राही । राज न छोडे लोभ मनमाही ॥ तब हम रूप जो कीन खवासा । जेहि ते तरुत की छाडे आशा ॥ जैसा जिव तैसा तन धारा । कोइ विधि जिय उतारूँ पारा ॥ चतुर सहेली रूप अपारा । शोभा अंग अंग अधिकारा ॥ होय खवास बागमें जायी । फूल लाय रचि सेज विछायी ॥ बहु विधि फूलन सेज विछावें । जहां शाह पौढन निज जावें ॥ ऐसहि करत बहुत दिन गयऊ । तब हम एक अचम्भा कियऊ ॥ एक दिवस चित ऐसी आयी । ताहि सेज हम पौढे जायी ॥ रूप खवासिन तहैं हम कीन्हा । घडी एक पौढी सुख लीन्हा ॥ आये महल सेज ढिग शाहा । पौढि सहेली करे सुखलाहा ॥ इब्राहीम देखत रिसियाना । मनमाहीं बहुते खिसिआना ॥ हमरी सेज आई पौढाना । हमरी त्रास तनिक नहिं माना ॥ हांक मारि तिहि टेरि जगायी । देखत शाह मन क्रोध समाई ॥ शाह कहे क्यों पौढी नारी । बढचो क्रोध तब ताजन मारी ॥
( ५४ )
सुलतानबोध
❁ छन्द—हुकुम कीन शाह तन छीन लाव ताजन मारिये ॥ ताहि पीछे शीश उतारो पकडि भुजा फटकारिये ॥ मारन लागेउ शाह तेही खन हम कौतुक कीन्हे ॥ हँसी सहेली रोवे नहीं त्रास अतिशय तेहि दीन्हे ॥ सोरठा-बूझे तेहि सुलतान, मैं मारी तैं क्यों हँसी ॥ कहो साँची सहि दान, कहो सत ना कुम्हलाय मुख ॥
चौपाई
बहुत क्रोध करि मारा जबही । बहुते हँसी सहेली तबही ॥ हँसत सुलतान अचम्भा कीना । निकट बुलाय पूछि तब लीना ॥ निकट बुलाय आप सुलताना । वस्त्रशयो चूक करचो जिवदाना ॥
सुलतान वचन
यह तुम मोहि कहो समझायी । मारत तोहि हँसी क्यों आयी ॥ सच सच बात कहो निःशंका । तुमतो जनि मानो हमारी शंका ॥
सहेलीवचन—चौपाई
तबहि सहेली करे बखाना । सुनो शाह तुम चतुर सुजाना ॥ एक घड़ी सुख हम जो लीना । ता कारण इतना दुःख दीना ॥
- इस छन्द और उसके नीचेके सोरठाका पुरानी प्रतियोंमें गन्ध भी नहीं है । वरन् आगेसे जो चौपाई चली है उसका ऊपरकी चौपाईके साथ सम्बन्ध है । यह छन्द और सोरठा किसी महात्माने बैरागके जोशमें आकर लिखमारा है किन्तु कविताकी कंसी मिट्टी खराबकी है उसकी बात पाठक छन्द और सोरठासे समझ जायेंगे । देखिये सोरठाके प्रथम दोनों चरण तेरह २ मात्रासे पूर्ण हैं और तीसरे चरणमें भी १३ मात्रा हैं और चौथेमें पन्द्रह । कहीं तक कहें इसी प्रकारसे उत्तरोत्तर मट्टाचार्योंने ग्रन्थोंके विगाडनेमें ऐसा भाग लिया है कि ; जिससे कबीरपन्थकी साहित्य मूर्तप्राय होरही है । मुझे सब ग्रन्थोंके शोधनेमें कंसी २ कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं मैं हो जानता हूँ तिसपर भी मुझे कहीं तक सफलता हुई है पाठक स्वयम् समझ सकते हैं । वर्तमानमें यद्यपि कुछ कुछ विद्याकी ओर मुकाव कबीर पंथियोंकी हो रही है तथापि असीतक दो चारी को छोड़कर कोई भी ऐसा कबीरपन्थी नहीं है जो अपना कलंक और अपना विचार कबीर साहब कबीर पन्थी साहित्यके वे मत्थे न थोपता हो ।
बोधसागर
( ५५ )
सदा सर्वदा जो सुख करई । तापर मार कितो सो परई ॥ कहा कहै मोहि रही न जायी । ता कारण मोहि हौंसी आयी ॥ उमर भरे सुख कीना ऐसा । ताका हाल होयगा कैसा ॥ या कारण हँसी हम शाहा । कीजे जो तुम्हारे दिल चाहा ॥ राज करइ बहुतै सुख पावे । तन छूटे चौगसी जावे ॥ चौराशीमें है कष्ट अपारा । बिना नाम नहिं होय उबारा ॥ आखिर खाक होय तन तेरा । वचन मानि ले यह अब मेरा ॥ कहा तरुत शज्या सुख पाओ । राह खुदा में चित लगाओ ॥ देह मिलेगी खाक तुम्हारी । चतुर सहेली कहे विचारी ॥ सांची राह गहो तुम शाहा । जन्म पाय कछु लागो लाहा ॥ सतगुरु मिले तो भेद बतावै । जाने जीव मुक्ति घर पावै ॥ तहां जाय जिव करे अनन्दा । जनम जनम का मिटे सब फन्दा ॥ सारखी * सद्रू भेद जो पावई, होय मुक्ति घर बास ॥ जन्म मरन फन्दा मिटे, तब सुख पावै दास ॥
चोपाई
वचन सुन्यो जब शाह सुजाना । तब कछु दिल में उपज्यो ज्ञाना ॥ तेरा वचन सही सुनु नारी । सब सुख छोंड़ि अछाह चित धारी ॥ शाह विचार कीन मन तबहीं । निकसि जाउँ जंगल बिच अबहीं ॥ कहे सहेली सुनु सुलताना । दिलमें धरो अछाह को ध्याना ॥ जंगल बडा जेरी जिन देही । हवा हिसै तजु निज मति एही ॥ नेकी करो बदी तुम छोंडो । दया मिहर दिल अपने माडो ॥ परमारथ पर सब कछु वारो । पाक जात अछाह चित धारो ॥ सुनत वचन लागा चित घाऊ । शाह वचन सुनि लागे पाऊ ॥ कहे सहेली ज्ञान अपारा । जो दिल धरो तो उतरो पारा ॥
- यह साखी भी पुरानी प्रतिषेधोंमें नहीं है ।
( ५६ )
मुसलमानबोध
❁ सुनि कर शाह अचम्भा भयऊ । ऐसो वचन कबही नहिं कहेऊ ॥ भयो ज्ञान शाह सुनि वानी । काल कला फिर आनि समानी ॥ अरुझे शाह स्वाद सुख पायी । भयो मगन मन अति ललचायी ॥ साखी-सखी सहेली सँग लिये, करत रंग अरु राग ॥ बिसरे ज्ञान विचार सब, मोह बान उर लाग ॥
चौपाई
यक दिन शाह सेजहीं सोया । तोशक झूल विछौना जोया ॥ देह उण्ण छेह अवसर ताही । नींद न आवे बहुत सिसाही ॥ कोई सखि पंखा पवन डुरावे । कोह चन्दन घसि अङ्क लगावे ॥ तबहू नींद न आवे शाहा । बहु व्याकुल अतितन भइ दाहा ॥ एक चरित्र तहाँ हम कीना । साखी रूप धरि दर्शन दीना ॥ सुबुधि सखी जोरे दोह पाना । सुनिये एक अरज सुलताना ॥ कहूँ वचन परमारथ जानो । सुनत कोध दिल जो नहिं आनो ॥ यह तन पाय बहुत सुख कीना । कबहू धनी नहीं दिल दीना ॥ जिन साहिब यह देह बनावा । तख्त सेज सुख राज करावा ॥ कोठा कोट अमीरी भारी । गज औ तुरंग हरष संग नारी ॥ ऐसा साहिब क्यों विसराये । राग रंग चित अति हरषाये ॥ जब वह साहिब कोप कराई । तेहि समय को होय सहाई ॥ साखी-साहिब गीझे जेहि समय, देह विहिश्त को वास ॥ मालिक मेटे पलक में, करइ राज सुख नाश ॥
चौपाई
आखिर देह मिलेगी खाका । साहिब नेह करि होऊ पाका ॥ वचन सुनत चित गहबर भयऊ । आँसू बहुत चक्षु ते गयऊ ॥
१ इस चौपाईसे लेकर आगे जिस चौपाईके अन्तमें इसी प्रकारका फूल दिया है वहाँ तक पुरानी प्रतिबोधि नहीं है ।
बोधसागर
( ५७ )
तबहि शाह दिल अपने जाना । नारी मैं अस होय न ज्ञाना ॥ यह तो मुशिद मालिक मेरा । धरचो रूप इन नारी केरा ॥ तबहि शाह दिलमाहि बिचारा । हम कारण इन यह तन धारा ॥ जो यह कहे मानि शिर लीजे । जाते कारज अपना कीजे ॥ अब मैं वचन मानि शिर लेऊँ । चरण कमल में मस्तक देऊँ ॥ हम पुनि गुप्त भये तेहि थाना । देखत शाह बहुत अकुलाना ॥ कहे शाह कही अस बाता । घाव अचानक किये मुहि जाता ॥ कछु दिन शाह विरहमें रहेऊ । बहुरि शाह दिल मोह सो गहेऊ ॥ तब दिन एक श्वान यक आवा । जाके शीस माहि बड घावा ॥ कीन माथ देह भरि जाही । कल बल करि व्याकुल तन ताही ॥ श्वान विकल डोले चहुँ ओरा । आयो शाह ढिग तबही दोरा ॥ सखी सहेली मारन धायी । शाह श्वान कहँ लीन बुलायी ॥ कहे श्वान सुनु शाह सुजाना । हमहुँ रहे बडे सुलताना ॥ सुख सम्पति पुनि तिरियारंगा । जीव सतावे बहुत अस अंगा ॥ सोना रूप कटक गज बाजा । अंत समय कोइ आवे न काजा ॥ साखी-मातु पिता सुत बाँधव, औरौ दुलहिन नारि । अंत समय सब बिछुरई, यह शोभा दिन चारि ॥
चोपाई
प्यासे जल नागे पट दीजै । भूके नाज मिहर दिल कीजै ॥ जैसी परी आप कहँ जानो । तैसी सकल जीव पहिचानो ॥ हवा हिस तन साधो भाई । साधो पीर मिटै दुचितार्ई ॥ इतना कही श्वान उठि धाया । सखी सहेली मोह लगाया ॥ पुनि हम कहा गैब की बानी । सुनहि शाह सह सखी सयानी ॥
आकाश बानी
यह नर नरकहि फेर बनाया । तुम तो बहुत नरक मन लाया ॥ सखी सहेली काम न आवे । जबही धरि यम आनि सतावे ॥
( ५८ )
मुलतान बोध
तात मात सुत नारि खजाना । काम न आवे सब बिलगाना ॥ झूँठे करे खुशामद तेरा । बांधे यम तब देख घमेरा ॥ उठि अकुलाय शाह चित लागा । देखे नहीं उपजे अनुरागा ॥ दया मिहर घट आन समाना । छोड़े जीव घात अभिमाना ॥ पीर शाह के घटहि समायी । भूखे नंगे सब दीन बुलायी ॥ मनमाँ कहे करो सो पीरा । जिन दिन्ह मोही चेत शरीरा ॥ प्रेमविरह निशिदिन चित लागा । अहक नाम सुमिरन अनुरागा ॥ जेहि दिवस छूटे मम जामा । झूठा सुख नहि आवे कामा ॥ यक दिन शाह किये अशवारी । बलख शहर देखा निरुवारी ॥ कहवाँ देखों पीर सुजाना । जिन सुहि कहा भेद निर्वाना ॥ डेरा सहित सखी रंग सेना । चले बेगि चित नाहिं न चैना ॥ बैठे एक ऊँट तजि प्राना । पहुँचे आप तहाँ सुलताना ॥ देखि ऊँट दिल भये उदासा । रोवे बहुत विकल धरि स्वासा ॥ ऐसी गति यक दिवस हमारी । अपने मन में यही विचारी ॥ माया मोह अहे जंजाला । दिना चार का झूठा ख्याला ॥ इब्राहीम कब्बो गोहराई । जाहु सबें अपने घर भाई ॥ ❁ छंद-गजसे उत्तरी ठाढे भये सब दिये भूषण डारिहो ॥ चोला पहिर शिर ताज दे तब चले निर्धार हो ॥ सेना सकल विलखित वदन सब कगहीं शोर सहेलियाँ ॥ मम खबर लय को सखी शिर कूटि मरहिं सहेलियाँ ॥ सोरठा-घेरि राह सब लोग, कोइ न छोड़हिं शाहको ॥ ऐसे सबको सोग, पुत्र मरे जिमि विकल जग ॥
- पुरानी प्रतियोंमें समस्त ग्रन्थभरमें छन्दका गन्ध भी नहीं है किन्तु नयी प्रतियोंमें ये बेतुकी छन्द कई मिलते हैं। इसी प्रकारसे कई सोरठे और बोहे (साखी) को भी पाया है। पुरानी प्रतियोंमें तो वह ही ही नहीं हैं किन्तु नई प्रतियोंमें एकदम बेतुक हैं।
बोधसागर
( ५९ )
छन्द-कहे शाहको समझ दिल हमरी खबर को लेइगा ॥ सब माहि दाता सबनको सो सबन भक्षण देइगा ॥ मां के रहे शिकंम में तहाँ को खबर जग लेत है ॥ जल थल है घट सकल पूरण जो जहाँ तहाँ देत है ॥ सोरठां-साझ कहे भोरे एक हन, सुनत दिन बीति गये ॥ शाह दिये नहिं चैन, पिछले पहर उठि चले ॥
चौपाई
निकलत शाह कोइ नहिं जाना । उठि चल्यो जंगल कहैं सुलताना ॥ नंगे पावैं पनही नहिं लीना । ऐसे शाह धनी दिल दीना ॥ स्वाद सलाह तजी सुख मेहा । राजपाट जान्यो सब खेहा ॥ साखी-सोलहसे सहेलियाँ, तुरी अठारह लख ॥ साईं तेरे कारणे, छोडा शहरबलख ॥
चौपाई
सकल छोड़ि के भये फकीरा । लागे विरह बान गंभीरा ॥ पिव कारण तज्यो सब आशा । जगत नेह तजि भये उदासा ॥ शाह निपट बहुतहि सुकुमारा । तिन सुख तजि गह्यो दुःखपारा ॥ क्षुधा लगे कोइ जांचे नाही । गहि संतोष रहे मन माहीं ॥ छन्द-पाँव छाले पड़ि गये चलि पंथ पग थहरावई ॥ कोइ संग आगे पाछे नाही धूप लगे कुम्हलावई ॥ अन्न बिना दिन तीन बीते हरष शोक नहिं चित गहे ॥ शाह निशि दिन अति विरागी नाम अबिचल पद चहे ॥
१ पेट । २ वर्तमानके अथवा इसके पोंडे दिन प्रथमके परम भक्त महात्माओंके विहृत्ताके नमूनेके लिये यह सोरठा जंसाका तंसा रखा हो ।
२ पुरानी प्रतियोंमें इसी साखीसे पुस्तककी समाप्ति होती है किन्तु इसके प्रथम बहुत कुछ विषय है तो इस पुस्तकमें आगे आवेगा इस नोटमें इस विषयमें विशेष नहीं लिखा जा सकता अन्यके अन्तमें “प्रथ विवेचन” नामक हेडिंगके नीचे लिखा जायगा ।
( ६० )
मुक्ताननबोध
सोरठा-तब साहब कछु दीन, रूखा सूखा टूकडा ॥ शीस नायके लीन, खरी कसौटी नामकी ॥
चौपाई
कछु भायो कछु औरहि दीना । मनमें नाहि गुनावन कीना ॥ जो मुख पांचो अमृत पावत । सो मुख सूखा टुकडा खावत ॥ आसन वासन अभूषण नाना । सो सब तजे भूरि मनमाना ॥ जेहि लागीं तिन ऐसी कीन्हा । कहे कबीर प्रेम मन चीन्हा ॥ प्रेम गली अति सांकरि भाई । राई दशावां भाग रहाई ॥ मनअहिरावत किस विधि जावे । विरले सत कोइ मारग पावे ॥ साखी-प्रेम बन्ध अति दुर्लभ, सब कोइ सके न जाय ॥ चढना मोम तुरंग पर, चलना पावक माय ॥ छन्द-मिही सुई को नाको जिमि तिमि इशक मारग ठानिया ॥ ताही ते कोउ झीनि होइ के प्रेम अगम गम जानिया ॥ जिन करि फना मरो आपको सो लहैं सुखको धामहो ॥ कहैं कबीर आप जहाँ तहाँ नहिं मिलत अराम हो ॥ सोरठा-मन महाँ शाह उदास, कबहुँक दरश मैं पाइहौ ॥ पुरवहिं मोरी आस, प्रगट रूप जब देखिहौ ॥ जबहि शाह घट विरह समायी । दोय कर जोरिके बिन्ती लायी ॥ दीन दयाल दया अब कीजे । अपना दर्शन मोको दीजे ॥ शंख्द स्वरूप रहिरूप छिपाओ । प्रकटरूप मुहिदरश दिखाओ ॥ जब हम लगन शाह घट चीन्हा । तब हम रूप प्रकट तहैं कीन्हा ॥
१ पुरानी प्रतियोंमें यह चौपाई इस प्रकार है :
नारि रूप तुम लेउ छिपाई । पुरब रूप धरि बरसा दिखाई ॥
और इसका सम्बन्ध उस कथासे है जहाँ सहैनी बादशाहके सेजपर सोगयी है और उसे मार पडा है ।
पर जब सबीने बादशाहको समझाया है तब बादशाह अपने मनमें विचारने लगा है कि ।