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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानसागर

( ३७ )

जो कोइ आय जान यज्ञ शाला । सब कई पोषण कीन्ह भुवाला ॥
पहुँचे अवधि सुदिन आये । राजा नगर महाँ ढोल बजाये ॥

साखी-जाके बल बहु होवै, धनुष उठावै सोय ॥

सीता ब्याहों ताहिको, मिथ्या वचन न होय ॥

चौपाई

चल भइ सीता जहाँ फुलवाई । देवी पूजन मातु पठाई ॥

आवत राम मार्ग जब देखा । सुफल जन्म आपुनतब लेखा ॥

अहो अंबिका आदि भवानी । सुनिये मातु तुम अन्तर्जाभी ॥

मोर मनोरथ पुरबो माता । सो बर देव जो मनमें राता ॥

बिधि विन्ती सीताकी जानी । ततक्षण भई अकाश तें वाणी ॥

अहो सीता लक्ष्मी अवतारा । निश्चय तोर राम भरतारा ॥

सुनत संदेशा भयो अनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चंदा ॥

देवी पूजि गई निज सीता । मनमें हर्ष बहुत पुनि कीता ॥

आई सिय जहाँ सृष्टि भुवारा । उठै न धनुष सबै बल हारा ॥

रावन बालि महा बलधारी । उठै न धनुष सबै बल हारी ॥

जब नृप जनक भयो विसमादा । उठै न धनुष जन्म मम बादा ॥

तब रघुवर सुनिको शिर नावा । सभा मांझ तब धनुष उठावा ॥

रैवेंचो राम धनुष चढ़ो जबही । महा अघोर शब्द भयो तबही ॥

साखी-सुनि गण त्याग्यो ध्यान तब, महि मंडल भुई चाल ॥

हरष्यो राजा जनक तब, सिया दीन्ह जयमाल ॥

चौपाई

टूटचो धनुष धूम भइ भारी । परसराम तब लाग गुहारी ॥

आवत तासु जो नृपति सकाने । बहुत नाम जो सुनत प्रमाने ॥

सभा मांझ आये परसरामा । सब मिलि दंडवत कीन्ह प्रणामा ॥

भृगुकुल कह सुन मिथिला राज । तोरचौ धनु किन मोहि बताऊ ॥

( ३८ )

ज्ञानसागर

रघुपति कहैं धनुष मैं मापा । तुम किहि काज करत है दापा ॥
देखि राम भृगुकुल किय रोषा । मारौं शीस जो करौ सरोषा ॥
बिहैंसे राम लखन दोइ भाई । हे द्विज यान करौ सुरमाई ॥
जान बूझि जिन होहु अयाना । मिटै तिमिर ऊगै जब भाना ॥
द्विज कुल देखि किया परमाना । तातैं तुमको भयो अभिमाना ॥

साखी-द्विज कुल धनुष जो आपनो, दीन्ह रामके हाथ ॥
मैं क्षत्री बल भजन, खैंचो हो रघुनाथ ॥

चोपाई

खैंच्यो राम तासु धनु कैसा । तृणहि उठाय लेत हैं जैसा ॥
परशराम गहि ताके पाऊ । क्षमा करो कौशिल्या राऊ ॥
कर प्रणाम भृगु वनहिं सिधारे । रामचन्द्र रहै सभा मझारे ॥
ये जो आहि सो त्रिभुवन राऊ । तिन महि मंडल तेज प्रभाऊ ॥
कहैं सबै हरि को अवतारा । परशुराम औ राम भुवारा ॥
जो निज इच्छा आवत जाई । तौन गर्भ काहे दुख पाई ॥
ऐसा निरंकार परकाशा । सब ते न्यारा सब में बासा ॥
इच्छा कर जस त्रिभुवन राऊ । इच्छा आस कैं निर्माऊ ॥
बाजा लगा जीव जो राखा । ताकी भक्ति सबै मिल भाखा ॥

साखी-कोइ इक ज्ञानी पारखी, परखे खरा औ खोट ।
कहे कबीर तब बाँचि हैं, रही नाम की ओट ॥

चोपाई

राम लखन के सुनो प्रभावा । मिथिलापति एक दूत पठावा ॥
नृप दशरथ बेगहि चलि आहू । राम लखन कर सुनो विवाहू ॥
नृप दशरथ बेगिही चलि आएहू । ऋषिन करायवो तहां विवाहू ॥
चारौं भाइ ब्याह तिहिं पाहीं । बहुत अनँद कीन्ह मन माहीं ॥
चारौं भाई और भुवारा । ले चलि आये अवध मझारा ॥
तहां आइ विप्रन दिय दाना । कछु दिन कियौ सुखराम सुजाना ॥

ज्ञानसागर

( ३१ )

भरत गये जहाँ जननी ताता । विद्या पढ़ै बहुत हरपाता ॥
अवध नरेश मता अस ठाना । रामहिं राज देहु मन माना ॥
सब मिलि ऐसा मत उपराजा । करब बिहान राम कहै राजा ॥
यह चरित्र जब देख भवानी । समझी निराकार की वानी ॥

साखी-सूठ मनुष्य न बूझै, राम लीन्ह अवतार ॥
मारे दैत्य संघारे, लंका के सरदार ॥

चौपाई

सवा लक्ष जीव प्रतिदिन खाई । कौतुक राज बनावत राई ॥
अंबिका गई कैकेई पास । हे रानी तुव पति मति नाशा ॥
रामहिं काल देत हैं राजू । निश्चय है हैं तोर अकाजू ॥
जो वर दियो नृपति तोहि काहीं । सो तुम मांगो आजुहि माहीं ॥
भरतहिं राज राम बनो बासा । माँगहु आज जो होइ हुलासा ॥
गयी कैकेई मांगा बर सोई । राम बिछोह प्राण नृप खोई ॥
त्यागो प्राण अवध नृप जबहीं । सरवन बैर जन्म लियो तवहीं ॥
चले राम लक्ष्मण सिय साथ । करहिं शोक धुनहीं बहु माथा ॥
रामहिं संग दूर लग जाई । फिरहु राम तुम तात दुहाई ॥
सुमंत मंत्री अस वचन सुनाये । पठये दूत तव भरत बुलाये ॥
जाइ बुलावहु भरतहिं आजू । उन कहैं देहु अवध कर राजू ॥
आज्ञा भयी फिरयो सब लोग । सब कहैं भयो राम कर शोगा ॥

साखी-भरतहिं पठे संदेश पुनि, तबहि भयो रवि सांझ ॥
गये जहां तहां रघुपति, बैठ गये वनमांझ ॥

चौपाई

राम लखन बैठे सिया लाई । फिरहु भरत तुम तात दुहाई ॥
फिरहु भरत प्रभु आयसु होई । प्रजा लोक संग सब कोई ॥

( ४० )

ज्ञानसागर

राम लक्ष्मण औ सिय साथा । वन मारग लीन्है धनु हाथा ॥
बहु दिन रहै ऋषिनके ठाई । समाचार लंकापति पाई ॥
लीन संग मारीच बलवंता । हरे सिया मन हो हर्षता ॥
मारीच ही कीन्ह मृग वेषा । नहि छल बूझे राम नरेशा ॥
मृग को देख नृपत तब भूला । लोभ मोह को वन जो फूला ॥
प्रगटचो सांझ अन्ध भो भाना । बिगरचो मोह जो ज्ञान छिपाना ॥
राम लखन गए मृगहि शिकारा । सीतहि रावन रथ बैठारा ॥
आगे मारग रोक जटाऊ । मार गयो तिहि रावण राऊ ॥
मारीचहि राम कीन्ह जब घाता । बूझ परी नारदकी बाता ॥
सिय हर रावन मार लुटेवा । जाकी जगत करत है सेवा ॥
दूँढहु लक्ष्मण वन गुहराई । मोह भयो जब सिया न पाई ॥
मारीचहि मार राम पछिताना । जबहि जटाउ कही सहिदाना ॥
हनुमान मिल पंथ मँझारा । रावन मारचो राम भुवारा ॥
सुन स्वामी तू त्रिभुवन नाथा । कृपा करो तुम मोरे साथा ॥
हनुमान जब कीश अनुसार । कुशल प्रभाव पूछ तिहि बारा ॥
बालि सुग्रीव दोइ जन भाई । बालि लीन्ह वध बंधु छुड़ाई ॥
जो प्रभु कीजे कपि पर दाय। मारो बालि सुनो रघुराया ॥

साखी-रामचन्द्र अस बोले, कीने बालि कुकर्म ॥

मारौं ताहि पल भीतरै, जान कहौं अस मर्म ॥

चौपाई

आए रघुपति जहँ गए राजा । बालि मार सुग्रीव निवाजा ॥
मार बालि कहँ एकहि तीरा । बूझे सन्त गही नहि पीरा ॥
यह तो भेद जानि है सोई । सतगुरु दया जाहि पर होई ॥
तब हनुमान लंक कियो गवना । पहुँचै जाय जहाँ रह रवना ॥
पहुँचे जाय भेट भइ सीया । देत्य देख वह कीतुक कीया ॥

ज्ञानसागर

( ४१ )

मारहिं कपि कहैं कौतुक जानी । तब हनुमान आप बल ठानी ॥
जारि नगर तब कीन्हों छारा । नगर लोग सब कहैं विकारा ॥
साखी-आय कहौं रघुपति सौं, समाचार हनु वीर ॥
सिंधु बांधि हरि उत्तरे, दैत्य वधन रनधीर ॥

चौपाई

आए कीन्ह दैत्य संग्रामा । मारे दैत्य बहुत तब रामा ॥
कुंभकरण निद्रा सौं जागा । रघुवर सौं युद्ध करे अचुरागा ॥
कहै विभीषण सुन नृप रावन । आए राम जो असुर सतावन ॥
सिया संग लै जाहु तुरंता । क्षमा अपराध गहु पग हर्षता ॥
मारी लात विभीषण भाई । कोधित मिलो राम कहैं आई ॥
समाधान नृपति बड कीन्हौं । लंका बकसि ताहिं कौ दीन्हौं ॥
कुंभकरण गहि समर अपारा । ताको हरि बहु बल सौं मारा ॥
इंद्र जीत तब लाग गुहारी । कर अश्वमेध तपस्या भारी ॥
तिन कपि रोके कपिदल जुथ्या । विभीषण भेद कहो अज जुथ्या ॥
जौलौं पूर्ण जह ना होई । मारहु राम वध करे सोई ॥
भयो प्रभात राम जब देखा । लक्ष्मण लाग्यो बान विशेषा ॥
साखी-मार सो महाबली, मेघनाद जिहि नाम ॥
सुनत क्रोध रावन कियो, कठिन कीन्ह संग्राम ॥

चौपाई

दैत्य महाबल शक्ति संधाना । जूझे लक्ष्मण भया निदाना ॥
तुम हनुमान लै आवहु मूरी । उत्तर दिशा देश बड़ दूरी ॥
दौनागिर पर्वत कर नाऊ । संजीवन सहित ताहि लै आऊ ॥
संजीवन बास तैं लक्ष्मण जागा । हर्ष भये तब कपिकर भागा ॥
तब रघुवीर घेर गढ लंका । दैत्यनके जी उपजी शंका ॥
तब रावन गहि समर अपारी । बंधुहि व्याकुल है सब झारी ॥

( ४२ )

ज्ञानसागर

रामचन्द्र रावन कहै मारा । वार अनेक सीस झुइ पारा ॥
मारचो हृदय ताक कै जबही । रावन काल वश्य भयो तबही ॥
सीता समाधान हरि कीन्हा । ताको रूप न काहू चीन्हा ॥
सिया लीन्ह रघुवीर बुलाई । राज विभीषण दीन्ह सुहाई ॥
लै सीतहि अवधपुर आना । भरतहि कीन्ह बहुत सनमाना ॥
सीता सती रही अवधाना । गर्भ वास लौकृश उत्पाना ॥

साखी-राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ॥

थाप्यो कोट अयोध्यहि, सुनौ मंत्र हनुमान ॥

चौपाई

जबहि राम लंका से आये । अयोध्या कोट उठावन लाये ॥
लक्ष्मण भाइ संग तब लीन्हा । सुदिन जानकै तब निव दीन्हा ॥
उठत कोट सो भय अस शोरा । है कछु द्रव्य नीच अस बोला ॥
सुन अस वचन राम रघुराई । खनहु खनहु अस आज्ञा पाई ॥
चहुँ दिश खने जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥
लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥
भौह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥
देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥
छाँड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥

साखी-बोले वचन ऋषी तब, कोहो सो कहु मोहि ॥

रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सम तोहि ॥

रामचंद्र वचन-चौपाई

दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥
ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कह करब भुवारा ॥
हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥
कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाँडो कोट कहा सुन मोरा ॥

ज्ञानसागर

( ४३ )

राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥
लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म को कह्यो प्रभाऊ ॥
आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहैं सब कोई ॥
दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एकदिवस पित्रन को जाना ॥
वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥
बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो वखाना ॥
सप्त मनु जबही जाइ विगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥
सप्त इन्द्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई विनाशा ॥

साखी-सप्त ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥

सप्त विष्णु जब वीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥

सोरा रुद्र गति जब हो जाई । तब इक रोम मम परे खसाई ॥

तातैं लोमस नाम है मोरा । करा समाध जीतवै है थोरा ॥

सुन रघुवीर अचंभित भयऊ । ऋषिको वचन प्रतीत न लयऊ ॥

राम चरित्र ऋषी तब जाना । क्या सोंचौ रघुवीर सुजाना ॥

देव अंगुष्ठ भैंटहु जो मोही । तैसे अंगुष्ठ दैऊ मैं तोही ॥

यहै कमंडल मोरे साथा । काढ़ौ गिन जो आवहि हाथा ॥

क्रोधित हाथ डार भगवाना । गिनि उनचास कोट परवाना ॥

परचो पाय रघुवीर न जाना । लोमश वचन सत् कर माना ॥

एतिक सुदरी गिनी विशेषा । कमंडलको कहैं कहिये लेखा ॥

इतने राम रावन होय गएऊ । सुनि रघुवीर अचंभौ भएऊ ॥

साखी-जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥

निराकार निरञ्जन, तासु मर्म नहि जान ॥

चौपाई

त्याग्यो राजपाट बन्धु चारी । गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥

आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥

नं. १ कबीरसागर-

कृष्णचरित्रवर्णन

( ४४ )

ज्ञानसागर

जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥

साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥

होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥

चोपाई

सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥

कृष्णचरित्र

राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥
करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥
चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥

ज्ञानसागर

( ४५ )

सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥

भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥

चौपाई

चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥

लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥

एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥

मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥

इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥

डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥

सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥

क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥

चौपाई

एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥

लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥

देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥

पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥

सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥

बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥

चौपाई

केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥

तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥

सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥

चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥

सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥

सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥

अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥

( ४६ )

ज्ञानसागर

चौपाई

मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥
रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥
चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥
मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥
मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥
रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥
चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥
पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥

साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥

हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥

चौपाई

मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥
मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥
उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥
पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥
जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥
तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥
नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥

साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥

जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥

चौपाई

कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥
सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥
दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥

ज्ञानसागर

( ४७ )

जाय सबै ले जमुनहि पारा । ले चलि भोजन भर भर थारा॥
जमुना बहु विधि आप गुसाई । तब हरि ऐसा वचन सुनाई ॥
कही जाइ कालिन्दी तीरा । कृष्ण छुवा नहि मोर शरीरा ॥
होई है थाह जाइ हो पारा । चल भो गोपी लाग न बारा ॥

साखी-कृष्ण सन्देशा कहिके, सबै भई तब पार ॥

जाइ कराइन भोजन, तब विन्ती अनुसार ॥

चौपाई

तब गोपिन अस बचन सुनावा । हे प्रभु पार जाहिं किहिं भावा॥
कालिन्दी से कहि सब मांदा । ऋषि नहि खाइब मोर प्रसादा ॥
कहत सन्देशा सब भई पारा । अचरज भयो मनमाहिं विचारा ॥
ठगई लगा तीनों पुर माहीं । कृष्ण कहाये अचरज नाही ॥
चौथे लोक बसे परधाना । ताहिखबर कहु विरलन जाना ॥
तपके तेज कहा बड़ भएऊ । तीन लोक जो अचरज ठएऊ ॥
एकवार शिशुपाल भुवारा । कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥
मारचो तबै दैत्य बल बीरा । निकसे प्राण जो छांडि शरीरा ॥
सब के देखत कृष्ण जो खावा । तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥
सब के देखत आस जो कीन्हा । तासों कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥

साखी-काल सबन को आस्थो, वचन कह्यो समुझाय ॥

कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥

चौपाई

बूझो संतो काल की हानी । हरि को भाव भले मैं जानी ॥
कृष्ण के भयो जो प्रदुमनबारा । ताकुल अनिरुधलीन्ह अवतारा ॥
सुन प्रवीन बानासुर राऊ । शिव सेवही महाबल पाऊ ॥
ता नृप कै दुहिता एक भयऊ । ऊखा नाम तासु सो ठयऊ ॥
रूप आगर किमि करें बखाना । ताहि देख कर काम लजाना ॥
उन्मद यौवन भयो पुन जबही । काम बान सर लागेउ तबही ॥

( ४८ )

ज्ञानसागर

साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥
दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥

चौपाई

दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥
बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥
युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥
छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥
दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥
कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥
मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥
नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥
चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥

साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥
जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥

चौपाई

आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥
मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥
मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥
बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥
बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥
दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥
दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥
दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥
दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥
दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥

ज्ञानसागर

( ४९ )

साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥
बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥

चोपाई

चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥
कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥
जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥
प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥
हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥
यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥
बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥
अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥

साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥
पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥

चोपाई

चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥
काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥
विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥
सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥
सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥
तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥
बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥
यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥
ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥
तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥

साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥
मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥

( ५० )

ज्ञानसागर

चौपाई

तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥
पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥
मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥
दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥
बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥
राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥
दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥
कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥
तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥
कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥
मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥
मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥

साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥

धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥

चौपाई

चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥
ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥

ज्ञानसागर

( ५१ )

साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल ।
गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल

कृष्ण वचन-चोपार्द

कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥

निरंजन वचन

तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥
पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥
उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥
क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥
जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥
छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥
तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥

कृष्ण वचन

साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥
सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥

निरंजन वचन-चोपार्द

कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥
पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥
यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥
कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥
तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥
या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥
बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥

पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन

( ५२ )

ज्ञानसागर

पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥
साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥
सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥

चौपाई

भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥
कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥
चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥
कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥

साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥
चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥

चौपाई

कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥

ज्ञानसागर

( ५३ )

कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥
मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥

सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥

आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥

चोपाई

अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥

चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥

कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥

तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥

चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥

आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥

राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥

भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥

बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥

पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥

सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥

गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥

चोपाई

सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥

सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥

सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥

कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥

बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥

कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥

गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥

कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना

( ५४ )

ज्ञानसागर

मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु । जाहु तुरन्त गहर जनिलावहु ॥
चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा । गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥
आपस में जो करे लड़ाई । इक मारे एक मरजाई ॥
छप्पन कोटि जो सबै सिरानो । सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥
अष्ट कन्या लखी चित्रसारी । तिनकहैं कृष्णजो यहि विधि मारी ॥

साखी-मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरि यान ॥
तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥

चौपाई

वधिक देव घात संधाना । बालि बैरको भाव जो जाना ॥
जम सब प्रान घेर लै गयेऊ । मारचो कृष्ण मूर्च्छित भयेऊ ॥
निरंकार निरंजन राऊ । आपहि मारिजो ताहि नसाऊ ॥
बालि का बैर व्याधा जबलीन्हा । यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥
तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥
जो जीव आप स्वारथहि मारा । सो जीव अपनौ किमि निस्तारा ॥
तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्त्व मता अस रूप संहारा ॥
जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥
गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि बिधि मारी ॥
आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥

साखी-कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥

हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परंपंच अपार ॥

गये पारथ जहँ चारौं भाई । चलौ वही जहँ यादो राई ॥
कहै सन्देश सुनौ हो राऊ । यहवाँ मोर दर्श नहि पाऊ ॥
मृत मंडल नहि मेटव मोही । छाड़ौ महि बोलों अस तोही ॥
छाड़ौ राज पाट सब भाई । पुत्र राज देख सब जाई ॥

निकलंक अवतारकी वार्ता

ज्ञानसागर

( ५५ )

चारेउ पांडव काल बड़ा भयेऊ । रायशुधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥
ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा । नाम विना देखो अस चीन्हा ॥
देखत कृष्ण अपन तन त्यागा । चिता तासु की रचन जो लागा ॥
चन्दन काष्ठ तासु तन जारा । चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥
इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ । तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥
सुंधायो द्वार काहु नहि जाना । ठक २ उठै दिन रात प्रवीना ॥
शिशुपाल भुजा चार रहो जाही । मारचो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥

साखी-सबै अंग सम्पूर्ण हैं, जगन्नाथ को भाव ॥

शिशुपाल की भुजा उखारी, ताको वैर दिवाव ॥

चौपाई

दोह भुजा काष्ठ जेहि उरेहा । वैर न छूटे सो गहि देहा ॥
जो काइ जीव जोर कर मारा । तासु जन्म किमिहो निस्तारा ॥
राम कृष्ण तैं को बड़ आही । वैर घात तासों न रहाही ॥
कृषी करै किसान जस भाऊ । ऐसी दसों जनम निर्माऊ ॥
दसों जनम ऐसे ही बीते । तासों कहै कि सुक्ति करीते ॥
बूझो नहि चरित्र भगवाना । तीन जुग गये काल नियराना ॥
है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा । तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥
आप स्वार्थी तिनहु मारे । ज्यों नकटी विश्वासहि वारे ॥

साखी-जिस सिरदार मही को, करै चरित्र भुवार ॥

जहैं तहैं शील पटावै, मछ बली तब धार ॥

चौपाई

कलियुग अन्त मलेच्छ व्यवहारा । तब हरि निष्कलंक अवतारा ॥
मारहि मलेच्छ सबै पुर कैसे । पावक मध्य तृण है जैसे ॥
पावक रूपनि कलंक अवतारा । तृण समान मलेच्छ संहारा ॥
बहुर कलंकी ज्योति समाई । कौतुक करै निरंजन राई ॥
ऐसे दसों जन्म निर्माये । निरंकार पुनि ताहि सताये ॥

उत्पत्ति परलयका लेखा

( ५६ )

ज्ञानसागर

धर्मदास वचन

धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई । दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥
कलप अनेक निरंजन राजा । आगे कैसा करि है साजा ॥
सो सब स्वामी मोहि जनाओ । उत्पति प्रलय भाव बताओ ॥
उत्पति प्रलय सुनौं तुम पाही । कहौ सबै जो संशय जाही ॥

साहिब कबीर वचन

चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ । सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥
चारौं युग अंत जब होई । वषैं अग्नि निरंजन सोई ॥
पृथ्वी जार करै सब पानी । रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥
रहै जो देव तैंतीस करोरी । रहै जब तपसी तपकी जोरी ॥
चन्द्र सूर्य तारागण झारी । जबही देह तजै सुख चारी ॥
विष्णु बीतही दस अवतारा । नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥
यहि विधि बहत रचौकड़ी जाई । सेवा फल पावै अन्याई ॥
उत्पति करै पुन प्रथम स्वभाऊ । ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥

छंद-महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो ।
लोमस ऋषितबहोय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥
तीन गुन पांच तत्त्व बीते दस चार सुत आकाश हो ।
महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥
सोरठा-सब भक्षे निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै ।
शिव कन्यानाम विहाय, सब जी राखै आपमें ॥

चौपाई

सतगुरु दया जाहि पर होई । नाम प्रताप बाचे जन सोई ॥
निज घर हंसा करहि पयाना । और सकल जीवतहां समाना ॥
जाई रहैं जहां धर्महि द्वीपा । प्रथम करी जो लोक समीपा ॥
उत्पति कारण सेवा करहीं । पुनियहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥