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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना

ज्ञानसागर

( ७७ )

पय औ रुधिर चल्योगुरु अंगा । पावक उठी शाह के अंगा ॥
तवै शाह ने सुधि अस पाई । महिमा जान कबीर बुलाई ॥

सारखी-कबीर दर्शन दीन्हा जबै, तपन भई सब दूर ॥

शाह कहा तुम सांच हो, औ अल्लहका नूर ॥

सिक्कन्दरवन-चोपाई

पय औ रुधिर चल्यो गुरु अंगा । शाह कहै यह कौन प्रसंगा ॥

कबीरवन

जेहि तन मान्यो शब्द हमारा । तेहि तैं चले दूध की धारा ॥

कीन्हा कालउ केर विचारा । आधा अङ्ग रुधिर अनुसारा ॥

अगले जन्म मुक्ति जो होई । अंकूरी जीव कहावै सोई ॥

गोको बिलाना

यहै चरित्र तहां पुनि भयऊ । तब नूरी के मंदिर गयऊ ॥

काजी मुह्ता सबै रहाये । गाय आनि के गलो कटाये ॥

देखि दुखित भये सत्त कबीरू । महा व्याधि गाई की पीरू ॥

केहि कारण गाई जो मारा । सो सब मोहि कहो उपचारा ॥

काजी काया देख विचारी । एकहि ब्रह्म गाय क्यों मारी ॥

गाय ज़िवावहु मुर्गा सारू । नातर वेद अथर्वन हारू ॥

सत्त शब्द है जासु शरीरू । व्यापी महा गाय की पीरू ॥

सारखी-उठिके गाय ठाढ़ी भई, आज्ञा जबही कीन्ह ॥

काजी मुह्ता जानि कै, पाव पकर तब लीन्ह ॥

चोपाई

नगर के लोग अचंभो लागा । यह कबीर कर्ता हो जागा ॥

मगध गवन

तब तहैं से पुनि कीन पयाना । उत्तर देश मगध अस्थाना ॥

नूवा नूरी काल बस भयऊ । तिन पुनि जन्म मनुष्य हिलयऊ ॥

( ७८ )

ज्ञानसागर

राजा बीरसिंह देव बड़ राज । ताके गृह अब धारचो पाऊँ ॥
कमलावती तासु नृप नारी । तिन बड़ सेवा कीन्ह हमारी ॥
ताकौ दीन्ह पान परवाना । तिन कछु भेद हमारा जाना ॥
कह्यो तासों मुक्ति प्रभाऊ । सुनत भयो आनंदित चाऊ ॥
विजुलीखां पठान बड़ ज्ञानी । सन्त जान जिन सेवा ठानी ॥
तासों कही मुक्ति परभाऊ । ज्ञान गम्य तिन बहुत कराऊ ॥

साखी-अति आधीन जब देखा, ता कहैं दीन्हहा नाम ॥

प्रीति जानि कै ताकी, कछु दिन किय विश्राम ॥

चोपाई

विजुलीखां कहै पीर हमारे । नृप वीरसिंह शिष्य तुम्हारे ॥
साहिब आप तजो जब देहा । दोह दीन सो कीन्ह सनेहा ॥
सुनि विहंसि अस आज्ञा ठानी । दोह दीन से हम निरवानी ॥
हिन्दू तुरक नहीं हो भाई । सुन पठान संशय उपजाई ॥
जो तुम दोइसों न्यारी रीती । मेरे मन कैसे होय प्रतीती ॥
तुम तो हो अछह के बन्दा । यह तो अहै आदमी गंदा ॥
तुमहि शरीर तजौगे जबही । शरीर उपाय करों क्या तबही ॥
कै पृथिवी कै देहों जारा । करहु हुकम सो पीर हमारा ॥
जो कछु होई लोक व्यवहारा । सोई कहो मम पीर पियारा ॥
जो साहिब हुकम जस करिहौ । मजार तुम्हारा रचिके धरिहौ ॥

साखी-बिहंसि कह्यो तब तिनसैं, मजार करौ सम्हार ॥

हिन्दू तुरक नहीं हौं, ऐसा वचन हमार ॥

चोपाई

दिन कछु गये तासु संबादा । राजा बीरसिंह ने भेजे प्यादा ॥
बन्दीछोर आवैं मम गेहा । रानी विन्ती कीन्ह सनेहा ॥
ताकी प्रीति तहाँ पगुधारा । दुःखद्वन्द्व तिन सबै विसारा ॥

ज्ञानसागर

( ७१ )

तिन पुनि कही सुनौ गुरु ज्ञानी । दुतिया ब्याह लगन में ठानी ॥
ब्याह जो होय बिकट अस्थाना । क्या जाने होवे संग्रामा ॥
कोइ घायल कोइ जाई मारा । खाड़ो आही दुहु दिशि धारा ॥
ताकी आज्ञा करौ गुसाई । तिनहि देह क्या करो उपाई ॥
कै गाड़ौ कै जारौ धूरी । यह संशय मेटो प्रभु मोरी ॥
करौ सोई लोक कुल धर्मा । बिन लागै कोई जानै न मर्मा ॥
साखी-जो गाड़ौ तो माटी, जो जारौ तो छार ॥
करो लोककी जो कृति, बोलता ब्रह्म निनार ॥

चौपाई

हे स्वामी तुम मोहि बताओ । तुम तनतजोतो काहि कराओ ॥
जस प्रभु तस पुन सेवक करई । सेवा युक्ति सदा सो तरई ॥
जो तुम कितहू करहू प्याना । गाड़हि लागै तुमहिं पठाना ॥
हँसै सबै यह देखि परतच्छा । गुरु तुम्हारो आहि मलेच्छा ॥
तस कछु भेद बताओ स्वामी । करो कृपा सो अन्तर्यामी ॥
वास्तव तेहो कहाँ बुझाई । जारौ देह जो क्षार उड़ाई ॥
तातैं लोक मैं नहीं छुड़ाओ । यातैं दोह दीन फरमाओ ॥
गयो नृपति तहैं साज बराती । कौतुक रचो देह तब त्यागी ॥
सुनत साज दल चले पठाना । राना मुर्दा ले बिल खाना ॥
लेकर गाड़ै करै निमाजा । करन बिहानक दूरी काजा ॥
साखी-रानी भेजे प्यादहीं, तन जब तजो कबीर ॥
आयो बिजुली खान तब, सुनि वृत्तान्त गंभीर ॥

चौपाई

राजा पास पठाओ पाती । सुनतहि क्रोध जरी तब छाती ॥
छाड़्यो ब्याह चले दल साजी । हनें निशान सम्हर की बाजी ॥
बाजा गाजी तुरही आवहि । यह बिजुलीखां युक्ति बनावहि ॥
ऐसी भांति सो कीन्ह प्याना । रन के आगे बजै निशाना ॥

रतनाकी कथा

( ८० )

ज्ञानसागर

बांधी अस्त्र अस चले बहु बीरा । कुहुक बान औ बहु धन तीरा ॥
बरछी सेल औ छुरी कटारी । खड्ग रु तुरी चपल परचारी ॥
दोड़ दिशि देख अस्त्र चमकारा । मानो साज चलो जल धारा ॥
राजा कीन्ह मरन का ठाना । वयरख रोप जो रहो पठाना ॥
जब देखा मैं होत लराई । युद्ध जानि अस कन्यो उपाई ॥
रानी जान मोर कछु मर्मा । तिन पुनि कही तजो नृप भर्मा ॥

साखी-पहिले खोदो माटी, मुदां देखु निहार ॥

सुरदा नहिं वहि भीतरे, कहा करत ही रार ॥

चोपाई

सत् कबीर नहीं नर देही । जारै जरत ना गाई गड़ही ॥
पठयो दूत पुनि जहां पठाना । सुनिके खान अचंभी माना ॥
दोड़ दल आई सलाहा जबही । बने गुरु नहिं भेटे तबही ॥
दोनों देख तबै पछतावा । ऐसे गुरु चीन्ह नहिं पावा ॥
अपने मैं अचंभा ठाना । रंक माहिं धन गया छिपाना ॥
दोड़ दीन कीन्ह बड़ शोगा । चकित भये सबै पुनि लोगा ॥

रतनाकी कथा

तब अपने मन कीन्ह विचारा । रतना कँदोइन कै पगु धारा ॥
रतना समाधान बहु कीन्हा । राजहि पठय सँदेशा दीन्हा ॥
तुम नृप किमि करते पछताना । निश्चय आही शब्द प्रवाना ॥
रहौ सदा शब्दहि मन लाई । दर्शन मोक्ष होय नहिं भाई ॥
साखी-विजुलीखां सौं दुआ कहि, किमि कारण पछताव ॥
रहौ नाम लौ लाइके, जाते कर्म कटाव ॥

चोपाई

लोक वेद मैं ऐसे विचारा । किमि कारण मन दुखी तुम्हारा ॥
सुने दंडवत बहु विध कीन्हा । तत्त्व मता नामहि गहि लीन्हा ॥
रतना सौं कहि मता अपाना । तेहि सुनिके हरष बहु आना ॥

ज्ञानसागर

( ८१ )

हे स्वामी मोहिं कीजै चेरी । जातै कटै कर्म की बेरी ॥
धन्य शब्द धनिजो कह्यु चहिये । सो सब स्वामी मोसों कहिये ॥
सवा सेर मिष्ठान ले आवहु । और सवासौ पान मैगावहु ॥
इतना चहिये और न काजा । तातै भाग चले यमराजा ॥
सोई अंश पान निज लीन्हा । ताको जीव दान मैं दीन्हा ॥
अंकुरी जिव भेटे निज गेहा । नूवा नाम जो प्रथम सनेहा ॥
साखी-ताको पठयो निज भवन, तीन लोक तें न्यार ॥
नूरी के मन इच्छा, धर्मदास अवतार ॥

चौपाई

सुन धर्म दास यहै कुल धर्मा । मेटो तीरथ बरत कुल भर्मा ॥
कोटि जन्म कीन्हौ तप धर्मा । विनसत गुरु नहिं मिटिहै भर्मा ॥

धर्मदासवचन

हंस राज जो दर्शन दीन्हा । जन्म स्वारथ अधमको कीन्हा ॥
हे प्रभु मोरे बन्दी छोरा । हौं आधीन दास मैं तोरा ॥
आनहु पान और मिठाई । जितनौ रतना के मन भाई ॥
आनहु रतना कहौ तुम स्वामी । कृपा करो तुम अन्तर््यामी ॥

कबीरवचन

प्रथम हि जो पावै निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥
जाके रहे पुरुष औ नारी । बीरा नाम जीव रखवारी ॥
सवा लक्ष जीव नित जो मारा । तातैं सवा सेर व्यवहारा ॥
साखी-सवा सेर मिष्ठान जो, और सवा सौ पान ॥
इतना ले जो शिष्य हो, यम तेहि देखि डरान ॥

चौपाई

सुहर देखि जैसे घट वारा । जिनहैं घाट ऊपर बैठारा ॥
जो कोइ झूठा रूप बनावै । बिना पान जान नहिं पावै ॥

( ८२ )

ज्ञानसागर

आने फेर परवाना सोई । जैसा अंक सुहर पर होई ॥
इतनी सुन हरषे धर्म दासा । शिरनी पान लाइ धरे पासा ॥
सेत सिंहासन सेतु ई साजा । सेत पान सिर क्षत्र बिराजा ॥
पाने दलतै सबहीं कीन्हहा । तामें अंक अग्र को दीन्हहा ॥
प्रथम हि तितुका वेग तुरायी । मारग भेद तबै समुझायी ॥
बाएं दाहिने है सहि दानी । इकदिशि धर्म द्वितीय दुर्गदानी ॥
पाछे चित्र गुपित्र को थाना । तेहि तजि हंसा देइ पयाना ॥
टूटै घाट अठासा कोरी । हंसा चढ़े नाम की डोरी ॥

साखी-यमसों तितुका तोरकै, तब दीजौ निजपान ॥

पाई प्रसादै हर्ष तब, शब्द देख मन मान ॥

चौपाई

जाई उबारौ हंस अंकुरा । मन की दिशा देख मन भुला ॥
हे प्रभु कौन शब्द है सारा । तौन शब्द तैं जीव उबारा ॥
एक शब्द पुनि दीन्हहा हेरी । यही शब्द तैं जीव उबेरी ॥
जस दरपर लै दीजे हाथा । दर्शन देखै मुख औ माथा ॥
धर्म दास सुनत मन माना । बिकसे कमल उदैं जनु भाना ॥
यही वस्तु से जीव उबारा । और ज्ञान है बहुत अपारा ॥
मूल नाम अक्षर धुनि साचा । जेहि तैं जीव काल सों बाचा ॥
आदि नाम पुरुष कर आही । भाग जीव पाव पुनि ताही ॥
धन्य भाग वस्तु जिन पाया । मोकहँ सत गुरु अलख लखाया ॥
अक्षर मूल और सब डाला । डारहि में फल फूल रसाला ॥
किंचित को फल पावै सोई । कहैं कबीर अमर सो होई ॥
अक्षर मूल अमी पैंच शाखा । साखी रमैनी ताकी पाता ॥
सुमिरन डार पुहुप है जोगा । तेहि सम आहिना दूसर भोगा ॥
साखी-अक्षर धुनि लौ लावई, अपराधै परिचय योग ॥
कहैं कबीर संशय गयी, भोगहि मध्ये भोग ॥

चौका आरतीकी विधि

ज्ञानसागर

( ८३ )

चौपाई

भव मैं अक्षर परचे पावे । सत्त गहै सतलोक सिधावे ॥
पुहुपहि से फल उपजे सारा । फल है मुक्ति भोगसे न्यारा ॥
हे प्रभु जो इतना नहि जाना । सो जिव कैसे लोग पयाना ॥
पंच अमीका सुमिरन दीजे । बंदी छोर ताहि किमि कीजे ॥
औ पुनि ताहि देव जप माला । आवहि लोकसो भौनहि डाला ॥
निश्चय कहौ पंथ कर भाऊ । दुविधा भाव लरो मत काऊ ॥
कहो पंथ जो पाँजी वाका । धरती शीश स्वर्ग का नाका ॥

साखी-यहि विधि राह चलावहु, सुनहु हो धर्मदास ॥
जीव छुड़ाओ काल सो, सत्त शब्द परकाश ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे प्रभु मैं कहत डराऊँ । कहों सो एक वस्तु जो पाऊँ ॥
जो नहि पावहि एती साजा । तासों किमि डरि है यमराजा ॥

कबीर वचन

साठ समय बारह चौपाई । एही तत्व हंस घर जाई ॥
पांच अमी महाँ एकौ पावे । है परमान सो लोग सिधावे ॥
अथवा जो एकौ नहि पावे । चार करी तत्त्व मन लावे ॥
चार करी बूझे मन लाई । यमराजा तेहि देख डराई ॥
अदेख देख तत्व मन धरयी । बोलता ब्रह्म सो परिचय करई ॥
इनकी देख नाम लौ लावे । डोर गहै सत्य लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि जानै । सो जिव कहा करै विश्रामै ॥
नामहि पाइ तत्व मन धरई । दुविधा भाव कबहुँ नहि करई ॥
निर्गुण नाम रहे लव लाई । ताके निकट काल नहि जाई ॥

( ८४ )

ज्ञानसागर

साखी-खोजकर सत शब्द का, गहै तत्त्व मत धीर ॥
निश्चय लोक सिधाइ है, अस कथ कहैं कबीर ॥

धर्मदासवचन-चोपाई

हे प्रभु जा पर दाय़ा होई । पावै वस्तु सार पुनि सोई ॥
अथवा जो ऐती नहि पावै । हे प्रभु तो कैसी बनि आवै ॥

साहब कबीर वचन

पावै सार जान निज बीरा । निश दिन सुमिरे धन्य कबीरा ॥
जहाँ सुने सतगुरु को नामा । सुने भक्ति छाड़ै सब कामा ॥
सुने जो भक्ति तत्त्व मन लावै । देह छोड़ि सत लोक सिधौवै ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जो इतना नहि राता । तासौ कैसी कहिये वाता ॥
माया जीव अधिक लपटाना । तातैं प्रभु पूछौ इठ ग्याना ॥

साहब कबीर वचन

धर्मदास मोहि यदि भावै । करही जाप धनी जो पावै ॥
आवै मल्ल तब करै लड़ाई । जाने दाव घात चतुराई ॥
तबही बने कृपी को साजा । कोठी बीज खेत उप राजा ॥

साखी-शूरा बैर भल खोजिये, बीज धरहि को सार ॥
रयाया बीज न बोइये, ऐसा मता हमार ॥

चोपाई

बिना नाम बहु तन डहकाया । फिर फिर भौजल भटकाखाया ॥
जुग जुग जन्मबहुरि भवलीन्हा । होई हित नहि नाम विहूना ॥
नाम पाय जो तत्त्व न धरई । ते पुनि जन्मै गुरु क्या करई ॥
तत्त्व प्रमाण यही धरमदासा । तातैं मिटै कालकी फाँसा ॥

धर्मदास वचन

बालक कहा तत्त्व को जानैं । मुक्त होय तेहि कौन प्रमानै ॥

योग कर्मका वर्णन

ज्ञानसागर

( ८५ )

साहित्य कवीर वचन

बालक नाम कौ दीजै बीरा । पहुँचे लोक जब तजे शरीरा ॥
त्रिया कह सनेह है सारा । उपजै भाव होय जम न्यारा ॥
जातैं नर अचेत अज्ञाना । तातैं तत्त्व नाम परमाना ॥
तत्त्व है मूल और सब साखा । ताकौ नाम जोग मय भाखा ॥
जो नर तत्त्व न राखे ज्ञाना । ताकौ ज्ञान बालक सब जाना ॥
पावै आदि अंत निज बीरा । पुरुष रच्यो सुख सागर तीरा ॥
छठै मास बीरा निज पावै । है प्रमान सो लोक सिधवै ॥

साखी-तत्त्व मुक्ति है निश्चय, औ बीरा निज सार ॥

माया लीन्ह नर प्राणी, भूल परा संसार ॥

धर्मदास वचन-चोपाई

निसिदिन रह माया लपटाना । सो प्रभु कैसे होय निर्वाना ॥

साहित्य कवीर वचन

निस दिन रहे माया विस्तारा । पलकौ भज तो उतरै पारा ॥
पलकौ नाम चित्त ना धरई । ते पुनि जन्मैं गुरु क्या करई ॥
कर्म निवारन जेहिते होई । परिचय सहज तत्त्व है सोई ॥

धर्मदास वचन

सो मोहि स्वामी प्रगट बताऊ । केहि विधिजोगकर्मसमझाऊ ॥

साहित्य कवीर वचन

प्रथम सत्य आसन आराधै । निवरी कर्म जो या विधि साधै ॥
काम मारिये अरूप अहारा । जहाँ काम तेहि जोग बिकारा ॥
कोइ कछु कहै हृदय नहीं धरई । निन्दा विन्दा मब परिहरई ॥
तजै देह जिमि कांचरि सांपा । आलस निद्रा सहज निदापा ॥
दृष्टि न जावै भल औ मंदा । मनहि न आनै संसो नंदा ॥
धोती वस्ती नेती करई । जिमि कामिन सो ग्रहै बहरई ॥

अष्ट कमल वर्णन

( ८६ )

ज्ञानसागर

तिनका खेह मंदिर में होई । करई दूर भामिनी सोई ॥
या विधि काया संयम राधै । बांधै मूल अरु नाको साधै ॥

छंद-मूल बांधै नाम साधै काया संयम जानिकै ।

मन पवन दोई तुरी साजै युक्ति जीव बनायकै ॥

देह ताडना चित्त को तुबक सर छाड़ै आस हो ।

तेही आस चढ़टोरै ममासा जीव होय निकास हो ॥

सोरठा-ऐसी बाजी होई, मनके संग दौराइये ।

मन शूरा पुनि सो, कष्ट परै पुनि ना टरै ॥

चोपाई

परै कष्ट तब तोरिगे वासा । राखै खड़ नाम को पासा ॥

नाम अछ ते दूत डराई । भागे अरि शूरा जिमि पाई ॥

अरि के भाजैं होय हुलासा । दुविधा भिटै कमल परगासा ॥

अष्ट कमल देखै पुनि सोई । मानौ रंक महा धन होई ॥

देखै ब्रह्म जहाँ अस्थाना । भय भाजैं तब हो निर्वाना ॥

अष्टकमल वर्णन

अष्ट कमल तोहि भेद बताऊँ । अजपा सोहं प्रगट बुझाऊँ ॥

मूल कमल दल चार ठिकाना । देव गणेश तहाँ कीन्ह पयाना ॥

ऋद्धि सिद्धि बासा तहाँ होई । छै सौ जप अजपा तहाँ सोई ॥

द्वितीय कमल पटदल परमाना । तहाँ कमलन कर आहि ठिकाना ॥

सावित्री ब्रह्मा है जहवाँ । षट सहस्र जाप है तहवाँ ॥

छन्द-त्रय कमल दल अष्ट है हरि लक्ष्मी तिहि संग मौँ ।

षट सहस्र जहँ होई अजपा निरखि देखो अंग मौँ ॥

कमल चौथा द्वादश दल शिव को तहाँ निवासु हो ।

सुरति नरति करि लोक पहुँचै षट सहस्र जहाँ जासु हो ॥

ज्ञानसागर

( ८७ )

सोरठा-पञ्चयें कमल प्रकाश, तिहिं पोडश दल अहै ॥
आतम जीव निवास, कइ सहस्र अजपा कह्यो ॥

चौपाई

छठवां कमल अहै दल तीनी । सरस्वती तहैं वासा कीनी ॥
दोसौ एक अजपा जहैं होई । बूझे भेद सो बिरला कोई ॥
भौर गुफा दो जल परवाना । सातों कमलकोआहि ठिकाना ॥
एक सहस्र अजपा परकाशा । तहां बोलता ब्रह्म को वासा ॥
तहां जोग साधे बहु जोगी । इंगलापिंगला सुखमनि भोगी ॥
तहां देख असंख्य जो फूला । ब्रह्म थाप काया में भूला ॥
सात कमल जाने सब कोई । अष्टम कमल विनुमुक्ति न होई ॥
विनु सतगुरु को भेद बतावै । नाम प्रताप जोग हि आवै ॥
काया तें जो बाहिर होई । भाग जीव पावै पुनि सोई ॥
छन्द-बहु भांति मुनि ऋषिजोग ठान्यो भयोरहित नहिं लेस हो ॥
काया थापी सुरति सों सब काग भये नहिं हंस हो ॥
पक्षी होई तब होइ महाबल नाम विना तो काग हो ॥
पक्षी त्यागी जो नाम साधे हंस होय बड़ भाग हो ॥
सोरठा-जोग तो आहि अपार, पक्षी भया पर नयन नहीं ॥
जोग नाम उजियार, नाम तेहि जो पावही ॥

चौपाई

पक्षी भाग नयन जिन पावै । ताके जहां तहां उड़ जावै ॥
देखे लोक जो गुरु बतावै । पक्षी नयन को यहै स्वभावै ॥
अथवा नाम नेक जो पावै । साधे तत्त्व जो लोक सिधावै ॥
नाम नयन पक्षी जो होई । तेहि समान दूसर नहिं कोई ॥
बाहिर को मैं कहब ठिकाना । सुरतिकमलसतगुरु निरवाना ॥

( ८८ )

ज्ञानसागर

छः सौ एक एकसौ बीसा । अजपा ऊपर देखे ईसा ॥
सातदलकमल देवऋषि माना । अष्ट कमल उनहूँ नहिं जाना ॥

छन्द-यह भांति अजपा तत्त्वऽराधे बस करे पाँचों भूत हो ।
रुनक झुनक बाजेआदि अक्षर दिमँकर बाचे तार हो ॥
षट् चक्र बांधे देह में तब जोग मुद्रा सार हो ।
प्रेम को बाजे पखावज प्रति दिना ततकार हो ॥

सोरठा-आतम जीव जो जाय, मुक्ति मुक्ता संग में ॥
तिन सँग ब्रह्म समाय, जिमि जा सरिता सागरेँ ॥

चौपाई

सरिता परै सिन्धु महाँ जबहीं । दुबिधा भाव न उपजै कबहीं ॥
सरिता संग रहे यक नीरा । भिन्न भाव कथ कहैं कबीरा ॥
दक्षिण नयन जब नेह निहारी । ते समरै बहुतै अधिकारी ॥
चन्दन निकट वृक्ष जो होई । भेद सुवास प्रबल है सोई ॥
संगति का फल ऐसा होई । यह तो भेद जाने जन कोई ॥
चन्दन नाम सुमेर है जोगा । इतनी प्रगट करै जो भोगा ॥
आतम जीव भेद पुनि होई । चन्दन बेल कहै सब कोई ॥
चन्दन कष्ट सब कोई जाना । यहै भेद विरले पहिचाना ॥

छन्द-जोग सम कछु भोग नाहीं देखु हृदय विचारि कै ।
पांच को बस करो आपने बसै पांच सम्हारि कै ॥
तीन गुण औ नाम चौथा बहुरि इनहि सम्हारिये ।
तब जीतिये निष्कंटका हो प्रति योग यहि विधि साधिये ॥

सोरठा-मेटें जम को दंड, मुक्ति होय तेहि अटल पुन ॥
विष को करे निकन्द, जोग होय जो नाम फल ॥

ज्ञानसागर

( ८९ )

चोपाई

संशय मिटे जोग के धारे । मैं अपने मन कीन्ह विचारे ॥
संशय को खंडन है जोगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥
जीव को काज जाहितें होई । सोई जतन करो सब कोई ॥
अथवा देह जोग कोई न साथे । तो अब सहज जोग अवराधे ॥
ता मैं मिल जो यह निस रहई । दुविधा भाव कबहुँ नहिं करई ॥

साखी-पांच तत्त्व गुण तीन हैं, और प्रकृति पञ्चीस ॥

चौतीस ऊपर डेरा करई, नाम तत्त्व इक्कीस ॥

चोपाई

चौतीस ऊपर डेरा करई । नाम तत्त्व पलक नहिं टरई ॥
ये सब एक नखा मैं राखै । गुरु प्रसाद अमीरस चाखै ॥
सत गुरु दया सम्पुट उघराई । शून्य शहर में बैठे जाई ॥
देखे बोलता ब्रह्म तेहि ठाई । करे हर्ष धर्ष सी जाई ॥
ब्रह्म देखि त्रिकुटी मैं मुक्ता । जीव सीव होय इक जुगता ॥
जीव सीव एकै लख जाना । देह जीव तब देख पयाना ॥
शब्द प्रतीत देख सत लोका । गुरु की दया मिटे सब धोखा ॥
अगम अलख सो गुरु समझावै । सुरती निरति से दर्शन पावै ॥
गुरु की दया गम्य जो होई । निश्चय दर्शन पावै सोई ॥
एक बार जो दर्शन पावै । देखै बहुरि विलम्ब न लावै ॥
एकै सुरति निरति जो धारे । सुरति सनेही दीप निहारे ॥
यह निस तत्त्व मता जो धारे । गुरु प्रताप सों लोक सिधारे ॥
जाते सहज योग नहिं होई । तातैं आरति साथे लोई ॥
जो मनसा मारे नहिं कोई । तो पुन दासी कर निज सोई ॥
जो कोई काछे सन्त का भेखा । तासों कहिये जोग का लेखा ॥

साखी-गेही लीन्हें आरती, संत सोई सो भोग ॥

इडा पिंगला साधिकै, सुषमनि राधे जोग ॥

गैबी रहनी

( ९० )

ज्ञानसागर

चौपाई

जैसे ग्रेही के मन नेहा । तैसे साथे जोग सनेहा ॥
आसन हठ पर नारि न जावै । ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥
देखी देखा भेष बनावै । राध जोग तो शोभा पावै ॥
भेषै धरे सूरता चाही । कादर भेष की हांसी आही ॥
जाते मन सूरमा नहिं होई । तातैं ग्रेही थाप्यो सोई ॥
ग्रेही मैं छल मता अपारा । तातैं सत्य भक्ति चित धारा ॥
करे जो सेवा सन्त की सोई । आरत भक्त महा फल होई ॥
धन्य सन्त जो आरति साजा । काल जंजाल तेहि घरतैं भाजा ॥
आरति समान भक्ति नहीं दूजा । सब ते भली सन्त की पूजा ॥
चरणामृत तासु को लेई । सुरति निरति चरणन चित देई ॥

साखी-सन्त आरती जोग मन, करहि गगनमें बास ॥

ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकाश ॥

चौपाई

विना जोग मैं होय उबारा । कै नेवर कै दीपक बारा ॥
तातैं सहज जोग मैं भाखा । शिरनि पान महातम राखा ॥
आरति तो नानाविधि साजै । पान मिष्टान्न भक्त भय भाजै ॥
जो कछु आहि जोगकर भाऊ । सब भाखौ आरति पर भाऊ ॥
वह देही यह ग्रेही व्यवहारै । काया संजम दै अनुसारै ॥
निशिदिन सुरति निरति बिचारा । तातैं मंदिर सेत सद्धार ॥
पांचौ तत्त्व तीन गुण साथै । तातैं मन बिच आरति राधै ॥
इंगला पिंगला सुषमनि वासा । मन बिच कर्म आरत परकाशा ॥
बांधै मूल नाम को साथै । दुबिधा मिटै एक अवराधै ॥
एक घरै कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरति मैं दीसा ॥

साखी-उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेट जो होय ॥

गुरु की दायो प्रकट हो, संपुट उघरै सोय ॥

आरतीका योगरूपसे वर्णन

ज्ञानसागर

( ११ )

चौपाई

उघरै संपुट गुरु की दाय़ा । नरिअर को देखै परभाया ॥
तत्त मूल नरिअर मो जाना । ज्ञानवंत भजि हो निर्वाना ॥
अनहद बाजै त्रिकुटी ताला । तातैं भक्ति जो होय रिशाला ॥
बिन करताल पखावज बाजे । अनहद धुन निस दिन तहैं गाजै ॥
अष्ट दल कमल फूल जो फूला । तातैं सुमिरन किये समतूला ॥
सुन अति जोग छतीसौ रागा । तातैं भांति भांति पद जागा ॥
जोग करत मैं देह बिसारै । या संसार मैं काज सम्झारै ॥
जोग समाधि छूटत नहिं देखा । आरत से मिटै कर्म विशेषा ॥
प्रतिदिन जो समाधि मन लावै । तातैं सदा आरति गावै ॥
जोग हीन तत्त नहिं लहई । तातैं पान पढोता चहई ॥
देखो मन बहुरंग अपारा । तातैं पुहुप सेत विस्तारा ॥
देह समाधि गंध बहु होई । साथै अग्र प्रबल है सोई ॥
चौका सेत हंस भल छाजै । सेत सिंहासन छत्र विराजै ॥

साखी-परचै मैं मन बांधै, करे जोग मन बास ॥
संतन आरत जोग मन, दीपक करे प्रकाश ॥

चौपाई

मन औ पवन आहिं दो धारा । तातैं पवन अनिल घूत जारा ॥
जोग जुगत बिन संग न होई । पालै पवन पाहन है सोई ॥
गगन बाव गरजै जो जाई । दीप शिखर द्वारै ठहराई ॥
ह्यावै जोग अमीरस चाखा । तातैं महाप्रसाद जो भाखा ॥
धन्य अंकुर जीव है सोई । परिचय जोग करै तन जोई ॥
जोग न होय आरती करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥
मूल नाम और सब शाखा । पुहुप जोग महातम राखा ॥
जोगी दृष्टि भाव बहु करई । घट घटमें सुमिरन अनुसरई ॥

पुनोकी बड़ाई

( ९२ )

ज्ञानसागर

मूल नाम मुक्ति फल जोगा । ताते नरिअर मिष्ठानका भोगा ॥
देह बिसार जोग फल चाखा । मन वच कर्म नरिअर सत भाखा ॥
उज्ज्वल मंदिर सेत सम्हारा । तेहि रूप साज्यो पनवारा ॥
मुक्ति पदारथ अबेधा हीरा । तेहि पाये कोई गहिर गंभीरा ॥
चंदन काष्ठ सिंहासन चाही । सुमिरण नाम इकोतर आही ॥

साखी-उत्तम पान बडो ना, टूटा भंग न होय ॥
नरिअर चहिये निर्मल, महा मुक्ति फल होय ॥

चौपाई

और कछू बात संपत्ति आही । काचा जीव सुन बिचलेताही ॥
ताते सहज बताओ भाऊ । परचै जीवको परम स्वभाऊ ॥
अथवा जो इतना नहिं होई । सहज आरती थापो सोई ॥
सवा सेर आनो मिष्ठाना । सत्त सवासो आनो पाना ॥
प्रति पूनौ जो आरति करई । सोई जीव भवसागर तरई ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु पूनौ कह अधिकारा । दया करौ दुख भंजन हारा ॥

साहिब कबीर वचन

तुम कह दोन्ह यही दिन पाना । तासौँ पूनौ आरति ठाना ॥
अथवा सबई अर्थ नहि जाना । दोई आरति थाप प्रमाना ॥
छठे मास साजौ निज बीरा । ताते दोई आरती मत धीरा ॥

साखी-जोग आरती फल बड़ा, सत्त वचन परकाश ॥

दुविधा मेटो निश्चय, सत्तलोक होय वास ॥

चौपाई

सत्तभाव देखहु मति धीरां । लगन साखि देख निज बीरा ॥
बिना लगन करो मत शिक्षा । जोती खेती जो भल दिशा ॥
ऊसरू बीज डारही कोई । निःफल खेती किसान की होई ॥

गुरुवाके लक्षण

ज्ञानसागर

( १३ )

ऊसर बीज का ऐसा भाऊ । बोवहि बीज अवृथा जाऊ ॥
काचे जीवकहैं सुमिरत देई । परिचय जीव तात गहि लेई ॥
ता कहैं कैसी करहि जमराजा । देह धरै तो गुरु कहैं लाजा ॥
बिना लगन मगन भयो जानी । ऐसो अहे शिष्य सहिदानी ॥
पूरा जब शिष्य जो होई । गुरु देव भेद बतावै सोई ॥
अथवा जो गुरु अन्तर राख्यौ । गुरुमें धोख सन्त में भाखौ ॥
लीक करी औ पंथ बतावै । शोभा अधिक गुरु सो पावै ॥
जस बाना तस होवै करनी । ता गुरु सम औरन बरनी ॥
सदा लीन नाम जो भाखै । पांच आत्मा अनुरुचि राखै ॥
पांचमें करे पच्चीसों नारी । ते बस किये जोग अधिकारी ॥
मरत तजो जस कांचरी सांपा । तातें सब को मेटव दापा ॥
करो शिष्य जो यहि विधिकोई । पुरइन पान रहैं जनु सोई ॥
साखी-जो ऐसी बनि आवै, और बान है सार ॥
तातें ग्रेही थापो, कडिहारी संसार ॥

गुरुवाके लक्षण चौपाई

आप स्वारथी भेष बनावै । मन की दशा ताहि चित लावै ॥
तृष्णा जुक्त करे गुरुवाई । जम सो बाचै कौन उपाई ॥
निश्चय मानो शब्द हमारा । पर द्रोही कैसा कडिहारा ॥
आप अबूझ औरन समझावै । साखी रमैनी झगरो लावै ॥
जातें साधु सेवा नहिं आवै । तृष्णा कारण भेष बनावै ॥
सिंह न चाहै स्वान सियारा । पैरच बिना कैसे कडिहारा ॥
पर नारी औ मन्मथ कर्मा । यह तो भेद काल को मर्मा ॥
मारहि मनसा होइ सो होई । नातर नारि करे पुनि लोई ॥
ग्रेही माहि भक्ति को भेवा । नाम जपै औ साधू सेवा ॥
जोपै सहज भाव कडिहारा । शिष्य कियेका क्या अधिकारा ॥

( १४ )

ज्ञानसागर

ग्रेही माहि मुक्त फल बासा । सो सब वचन कहौं परकाशा ॥
नाम गहै राखै सत करमा । सब जीव तजै एक पुनि भरमा ॥
साखी-मद रु मांस को त्यागै, और न करै जीव घात ॥
अथवा जो कछु चूकि है, साधु सेव चित राख ॥

चौपाई

करे आरती मन विच करमा । पर घर तजै जान निज भरमा ॥
गृह में जो रहे उदासा । निश्चय सत् लोक में वासा ॥
जो कोई यहै अवज्ञा करई । कछु दिन रूपहीन अनुसरई ॥
जो को चूके साधु की सेवा । ताकर फल भारवों कछु भेवा ॥
जाई सो लोक नाम परतापा । तजै देह जिमि कांचरी सांपा ॥
देखै जाइ हंसन की पांती । ता मध्ये अस बैठ अजाती ॥
जातें चूक परैं सेवकाई । तातें शोभा हीन लजाई ॥
जो कोई याकी करे उछेदा । तातें मैं समझाऊं भेदा ॥
गृही तरे सो कौन विशेषा । गुरु को अचरज यौ बड़ देखा ॥
गुरु नहीं कोई यहि भवसागर । सतगुरु आप अजर मनि आगर ॥
जाप आहि जो नाम हमारा । तातें नाम धरा कडिहारा ॥
कडिहार लेवै जीवका भारा । तेहि न सूझ किमि उतरे पारा ॥
साखी-जैसे महिमा प्रकट है, तैसे सिन्धु का नीर ॥
सरिता सब कडिहार भये, सतगुरु सिन्धु कबीर ॥

चौपाई

सरिता माहि बारि जो होई । जीव जन्तु सुख पावै सोई ॥
सरिता लहै पुण्य परमारथ । सत कडिहारी जोग स्वारथ ॥
अथवा नीर अथाह न होई । सहज जोग भारवों पुनि सोई ॥
भदी में सोह सदा जो बारी । ऐसी उत्पति आहि हमारी ॥
प्यासा जाय नदी के पास । बिन पानी सो जाय पियासा ॥

ज्ञानसागर

( १५ )

प्यासा पानी नदी न पावै । जहैं पानी तहैं तृपा बुझावै ॥
इक जीव ग्रेही आप उवारा । वार नदी नहि सत कडिहारा ॥
बांधे अस्त्र करे शुग्माई । तिन के त्रास सौ दुर्जन डराई ॥
काछे रहै शूर का साजा । आयो समय कादर हो भाजा ॥
यहि विश्वास रहै जो कोई । स्वारथ पिंड परै जन सोई ॥
परै पिंड तब होवै हांसी । दै विश्वास जीव जो फांसी ॥
चतुरा पहिले करै उपाई । द्रव्य न मिले अनते नहि जाई ॥
धन मिले का यही उपाई । ग्रेही भाव रचो जो भाई ॥
क्षुधावंत जाके गृह आवै । भले बुगैके असन न जावै ॥
क्षुधावंत जो करही त्रासा । सन्तुष्ट होय तुरते हो पास ॥
औ जहां देखे सत् का वाना । ता कहैं बहुत करे सन्माना ॥
करै साधु सेवा मनराता । ता कहैं मैं बणों विख्याता ॥
जस जासूस द्रव्य नहि पावै । ताके नग्र सैध दै आवै ॥
चतुरा करै तामु सन्माना । जो पुन ताको करै वखना ॥
ताके पुर का मता बतावै । विवेककी महिमा द्रसावै ॥
ताके गेह दरब न चले जबही । ताकी महिमा दूत करे तबही ॥
बहुविधि महिमा करे जमदूता । तासौ कोई न करे अजगूता ॥
भाजै कादर नगर बधाई । ताके निकट जान नहि पाई ॥
धन्य सोई जो गेही करई । भल मन्दा को उदर भरई ॥
ता कहैं होई पुन्य परमारथ । नाम गहैं जन्मैं होय स्वारथ ॥
कडिहार सोइ जो शूरा होई । भाखों ताहि आपसम सोई ॥
सारखी-कडिहारा औ गृही को, कोई न जाने अन्त ॥
बिन परचै विसमाद है, हरषत परचै सन्त ॥

चौपाई

भाषो संयम सत के राऊ । अस गेही जो करै उपाऊ ॥
प्रात नेम जो करै अस्त्राना । प्रथम प्रफुल्लित कमल बिगसाना ॥

गुरुलक्षण

( १६ )

ज्ञानसागर

मद रु मांस कहैं त्यागै दोऊ । मिथ्या जीव घात पुनि सोऊ॥
सत आमन पर निद्रा त्यागी । भली बुरी सैं रहत बिरागी ॥
जाइ जहाँ बर जहैं हितकारी । ऊचट न परई अन्तर भारी ॥
शुध्दावन्त हित कारी होई । अति प्रिय जानसमोवहि सोई॥
यहि सम दूसर व्रत नहि जाना । ते जन पूनौ आरत ठाना ॥
कहौ जान दासा तन जोई । भागी जीव पावहि निजसोई॥
शिष्य होय जो तन मन वारे । गुरु आज्ञा कबहुँ नहि टारे ॥
गुरु दे शब्द मुक्ति जे होई । तेहि समान दूसर नहि कोई ॥

साखी-तन मन गुरु को दीजिये, मुक्ति पदार्थ जान ॥

गुरु की सेवा मुक्ति फल, यह गेही सहिदान ॥

गुरु लक्षण-चोपाई

गुरु सोई जो सब ते न्यारा । सो सब मैं भाखौ उपचारा ॥
जल तैं पुरइन का है मूला । पानी पत्र न लागै फूला ॥
जातैं देह धरा कडिहारा । तातैं चाहिये सब उपचारा ॥
जैसे मूल पुरइन को पानी । ऐसेहि दुनियाँ की सहिदानी ॥
काया धरे सब न कडिहारा । पुरइन भेद तैं उतरे पारा ॥
केतो शिष्य करे सनमाना । ते पानी पुरइन सम जाना ॥
इतना सुनै रहै लपटाई । तो वह जग समान है भाई ॥
पुरइन मुक्ति लोक में बासा । गुरुबिनपरहि कालकी फांसा ॥
काल बस जीव नहि तरई । तेहि विश्वास जन्म सोइ धरई ॥
कहा सन्त सबहि में भेदा । आप स्वारथी करहि उच्छेदा ॥

साखी-नहीं सहज सत गुरु वचन, करम कुटिलता ठान ॥

चले लोक गति नरकहुँ, सरिता सिंधु समान ॥

लोक गर्व गति राखे भाऊ । ताको देख मास पुनि खाऊ ॥
बहुत यत्न मैं भाव बताया । जो नहि बूझ अन्त पछिताया ॥