कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २२८ )
अमरमूल
सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।
धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥
इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।
पंचम विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥
बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥
पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥
रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥
चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥
अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥
अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥
भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥
जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥
हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥
तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥
सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥
तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥
यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥
लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥
अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥
नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥
एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥
बोधसागर
( २२९ )
तुम सतगुरु मोहिदिय उपदेशा । मैं हंसनसों कहौ सँदेशा ॥
यह तौ बात कही नहि जाई । जब पावे तब ज्ञान समाई ॥
जब तुम दया करी हियमाही । तबहीं पाऊ नामकी छाहीं ॥
कहिये बचन मोर मन भावै । जातैं हंसा लोक सिधायै ॥
सद्गुरु वचन-चौपाई
तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । सब कहैं देह शब्दका चीन्हा ॥
जो नहि पाव शब्द सहदानी । तो कस करहु लोकपहचानी ॥
सब कहैं ज्ञान गम्य कर देहु । शब्द लखाय आपनकर लेहु ॥
प्रथमहि देहु पान परवाना । ता पीछे फिर ज्ञान लखाना ॥
समय जान सब कहौ बिचारी । यही भांति सब जिव निर्वारी ॥
साधुनकी सेवा चित लावै । सो जिव भवसागर नहि आवै ॥
गुरुकी दया मान सिरलीन्हा । भाव सहित पूजातिन कीन्हा ॥
इतनौ भेद एक नहि जानी । सो कैसे पुन शिष्य बखानी ॥
ज्ञानवन्त कहैं यह उपदेशा । मूरखसों जिन करहु संदेशा ॥
सार शब्द जाके घट होई । तिहि हंसा सम और न कोई ॥
धर्मदास तुम कहैं नहि भारा । सबके तारन है करतारा ॥
यह उपदेश कहहु बहु भांती । माने सोई हंस की जाती ॥
जो नहि मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहै यम के द्वारा ॥
यमके हाथ परै सो आई । बहता जाय थाह नहि पाई ॥
साखी-कहै कबीर धर्मदाससों, दीजो पान प्रवान ।
यही हंस जो पावहीं, पहुँचे पद निर्वान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी । अब चौकाको कहौ बिचारी ॥
कवन शब्दसो आरति साजी । कवन शब्द सतगुरुकी पाँजी ॥
( २३० )
अमरमूल
कवन शब्दसों नरियर मोरा । कवन शब्दसों तिनका तोरा ॥
कवन शब्दसों चौका करई । कवन शब्दसों दीपक बरई ॥
कवनै शब्द पान लिख दीन्हा । कवन शब्द प्रसाद जो लीन्हा ॥
कवन शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कवन शब्दसों छत्र तनावा ॥
कवन शब्द पनवारौ साजा । धोती कवनै शब्द विराजा ॥
कवन शब्दसों चंदन दीजे । कवन शब्दसों पुहुप चढ़ीजे ॥
दल प्रसाद किहिं शब्द बनाई । यही भेद गुरु कहु ससुझाई ॥
सद्गुरु वचन
यहे भेद अब तोहिं बताऊँ । चौका साज सकलसमझाऊँ ॥
प्रथमहि तौ चौका अनुसारा । सोई शब्द मैं कहौं पसारा ॥
सेत सिंहसन चौका चारी । कंचन थार आरती वारी ॥
तहाँ धनी जीव बैठे आई । लिखनी लिख बहुभाँति बनाई ॥
धर्मदास उठ बिन्ती कीन्हा । चन्द्र सूर्य दोइ साखी दीन्हा ॥
शब्द माहिं बहु भाँति समावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥
अमर शब्द उच्चार कराया । अमर प्रवान अमरभइ काया ॥
अमर प्रवान अमर कर जाना । अमर शब्द बिरले पहिचाना ॥
अमर शब्दका पावै भेदा । कहैं कबीर प्रवान अच्छेदा ॥
एक बीज धरती कहैं दीन्हा । पान सुपारी नरियर कीन्हा ॥
सो प्रसाद संतन कहैं आई । सत्त सुकृत के लोक सिधाई ॥
तीन लोक सों भिन्न पसारा । बाहर भीतर शब्द पसारा ॥
दूजी दुर्मत चित सों मेटो । एकहि चीन्ह कबीरहि भेटो ॥
यहि शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥
सवा शेर मिष्टान्न मँगावहु । सत्य पुरुष कहैं आनचढ़ावहु ॥
सत्य सुकृत कहैं आन चढ़ाई । दीन भाव कर बिन्ती लाई ॥
बोधसागर
( २३१ )
धर्मदास वचन
अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥
शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥
केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥
सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥
बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥
सुमिरन नरिअर तिलकको
मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥
बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥
साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।
कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥
खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।
कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥
सम्पूर्ण
चौपाई
तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥
अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥
तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥
सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥
सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥
सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥
भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥
तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥
( २३२ )
अमरमूल
सुम्रन तिनका तुरावेका
असन वसन मन कल्पना, देखो सर्वहि भूत ।
कहे कबीर सतगुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ॥
सम्पूर्ण
चौपाई
तबै प्रवाना दीजौ जानी । सुक्ति होय हंसा पहिचानी ॥
दहिने छोड़ धर्म स्थाना । बांये दुर्गदानी को थाना ॥
आगे चित्र गुपित्र कौ भारा । नाम सुनायकै हंस उबारा ॥
टूटे घाट अठासी कोरी । हंसा उतरै नामकी डोरी ॥
सारखी-कितरे वृक्ष कितरै पक्षी, कहाँ विलमेऊ आय ।
कहैं कबीर जो गुरु मिले, हंस देहि पहुँचाय ॥
चौपाई
दे परवाना हंस बचावा । ज्ञान परम पद घटहि समावा ॥
घट की परिचय कोई पाया । जाते जीत चले यमराया ॥
तब स्नान का शब्द सुनावा । विना शब्द पानी नहि पावा ॥
विना शब्द जो पीवे पानी । मानहु मदिरा रुधिर समानी ॥
सुम्रन जल पीवनेका
आगम सरोवर विमल जल, हंसा पिये अघाय ।
काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटजाय ॥
सुम्रन स्नानका
सत्य सुकृत के नीर मँगावा । धनीके बालक स्नान करावा ॥
कर स्नान पुनि शीश नवावा । साहिबके चरणन चित लावा ॥
कहैं कबीर सुनौ धर्मदासा । आदि अंत इक ज्योति निवासा ॥
सारखी-आदि अंत इक ज्योति है, अमरनाम स्थीर ।
चौदह भुवन नव खण्डमें, एकहि सत्य कबीर ॥
सम्पूर्ण
बाधसागर
( २२२ )
सुव्रन प्रसाद मालूम करनेका
निर्भय पदका चौका दीन्हा । शील संतोष ले मज्जन कीन्हा॥
प्रेम प्रतीत परम उजियारा । सत्य सुकृत है जेवनहारा ॥
सत्य सुकृत की फिरी दुहाई । जल भयो पाकसंतन सुखदाई॥
सब संतन मिल कियो प्रसादा । जेवै कर्तार जिववै धर्मदासा ॥
सब संतन प्रसाद जब कीन्हा । मुक्ति अभयपद कहैं तब चीन्हा॥
साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, आरतिको परमान ।
ये विधि सेवक जो करै, पावै पद निर्वान ॥
धर्मराज वचन चौपाई
धर्मदास विनती कर जोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥
कवन वस्तु आरति मँहै धरई । कवन शब्द लै सेवा करई ॥
सो सब मोहिं कहौ समुझाई । आरति विधि मैं करौ बनाई ॥
सद्गुरु वचन
प्रथमहि मंदिर सेत सम्हारा । सुतं निर्त भक्त चित धारा ॥
कञ्चन केर थार बनवाओ । तामे मोती आन धराओ ॥
मुक्ता तो अन बेघे होई । ऐसी विधि प्रकार है सोई ॥
झारी एक कञ्चनकी होई । ता मँहै दाल प्रसाद करसोई ॥
नरियर इकसत एक प्रवाना । सवा तीन मन लै मिष्ठाना ॥
पाटम्बर धोती तहैं चहिये । दीपमालिका बहुतक लहिये ॥
नई वेद तहैं आन धराई । कञ्चन और कपूर मगाई ॥
जरी केर तहां छत्र तनावा । पान सहस्र द्वादश बनवावा ॥
लौंग सुपारी लायची लीजै । मेवा अष्ट भांति धर दीजै ॥
ता पीछे प्रसाद सहिदानी । सुखपूजा साधन कर जानी ॥
आरति फल तबही जिव पावै । सवा सेर महाकंद मँगावै ॥
सोना केर कलस धरवाई । तहां प्रवाना लिखे बनाई ॥
( २३४ )
अमरमूल
परमाना बालक कहैं दीजै । हंस रूप ता कहैं कर लीजै ॥
ऐसी आरती धरे धर्मदासू । सोई पावै लोक निवासू ॥
मनमें बहु आनन्द बड़ाई । आरत फल सोई पुन पाई ॥
अपने स्वार्थ आरती करई । भवसागर तैं कैसे तरई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास बिनती अनुसार । तुम सतगुरु मोरे करतारा ॥
ऐसी विधि आरति नहिं करई । सो जिव किम भवसागर तरई ॥
कलि में जीव दरिद्री होई । द्रव्य विना किमि भक्तिसँजोई ॥
जिहि विधि होय हंस मुक्ताऊ । सो मोहे स्वामी भेद बताऊ ॥
सदगुरु वचन
तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । यही मती हम तुम कहैं दीन्हा ॥
एतिक विधि जापै नहिं होई । सहज भाव आरति करै सोई ॥
सवा सेर मिश्रान्न मँगावै । नरियर इक तहैं आन चढ़ावै ॥
सवा सौ पान कहैं परवाना । लौंग लायची एही बँधाना ॥
धोती एक आन तहैं धरई । सतगुरु केर निछावर करई ॥
साधन सों वह प्रेम बढ़ावै । सत्य रूप होय ज्ञान सुनावै ॥
ज्ञान गम्य कर शब्द बुझावै । सन्तन सों बहु प्रेम बढ़ावै ॥
पांचों पद ताही महाँ लावै । साधन की सेवा मन लावै ॥
ऐसी बिधि सों आरति करै । सो प्राणी भवसागर तरे ॥
धर्मदास वचन
जो इतना नहिं करै कडिहारा । ताको मोसो कहौ विचारा ॥
हे साहिब मोहे कहौ पुकारी । बन्दी छोड़ जाउँ बलिहारी ॥
सदगुरु वचन
जो इतना नाहीं बन आवै । सो कडिहार पार किमि पावै ॥
बारह आरति जो नहिं करै । दो आरति सेवाचित धरै ॥
बोधसागर
( २३५ )
फागुन और भादों परवाना । दो आरति नहीं छोड़ सुजाना ॥
साधन को परवाना देई । वर्ष रोज के कर्म नसाई ॥
साखी-पान प्रवाना पावही, सतगुरु महिमा दान ।
तबही हंसा सत्य है, और झूठ सब ज्ञान ॥
चौपाई
धर्मदास में तुमहिं सुनाऊं । आरति भेद ज्ञान समझाऊ ॥
अक्षर सार आरती सोई । बिन अक्षर सब गए बिगोई ॥
अक्षर भेद जान परसंगा । ताके काल रहै नहीं संगा ॥
आरति बहुत भांति सो करई । अक्षर भेद हिये नहीं धरई ॥
साखी-अक्षर भेद जाने नहीं, बातें कहै बनाय ।
ताको कहौ न मानिये, आपन जीव नशाय ॥
चौपाई
आरति भक्ति औ अक्षर सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥
जा कहैं अक्षर परिचय होई । आरति फल पावत है सोई ॥
मूल शब्द घट मांहि विराजै । शून्य शिखर अक्षर धुन साजै ॥
ताकी महिमा तुलै न कोई । ऐसा साधू विरला होई ॥
सो कडिहार जो अक्षर जाना । और गुरु सब झूठ बखाना ॥
गुरु सोई जो अक्षर जाना । बिन अक्षर मूरखसम जाना ॥
कडिहार वही जीवन कहैं तारै । अक्षर बिन जिव नरकहि डारै ॥
जो गुरु दगा शिष्य कहैं देता । नरक परै गुरु शिष्य समेता ॥
अक्षर बिन गुरु आरति करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥
इतना भेद न जानत प्रानी । पेटके कारण ज्ञान बखानी ॥
जैसे ठनिया करै ठगिहारी । जैसे जानहु सो कडिहारी ॥
अक्षर की परिचय नहीं पावे । आपहि आप जो गुरु कहावे ॥
( २३६ )
अमरमूल
छन्द-कडिहार सोई सांच है, जिन शब्द सों परिचय करी ।
सूरत नित ससेट कै सोई, नाम निह अक्षर धरी ॥
रहन शूरे ज्ञान पूरे, पंथ परमारथ लहौ ।
दुष्ट मित्र समान यकचित, दुतिया भाव न चित गहौ ॥
सोरठा-सद्गुरु सिन्धु कबीर, उन पटतर अब को लहै ।
सुनियो धर्मनि धीर, सरिता सब कडिहार हैं ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल चौका बंधन वर्णन
षष्ठ विश्राम
धर्मदास वचन-चौपाई
यह सुन धर्मदास हर्षाना । जिमिपंकज विकसे लखि भाना ॥
हे सद्गुरु मोपर दया कीन्हा । जन्म स्वार्थ अब मैंने चीन्हा ॥
धर्मदास कहै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिन्ती मोरी ॥
यक संशय मोरे घट मांही । कौनउ विधि सों छूटत नाहीं ॥
मृतलोक में पाखंड धर्मा । कैसे जीव होय निह भर्मा ॥
तुम सतगुरु निजज्ञान सुनाया । शिष्य पाखण्ड तजे नहिं माया ॥
सो मोहे सतगुरु भेद बताओ । तासो जीव होय मुक्ताओ ॥
सद्गुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो विचारी । पाखण्डी गति सब निवारी ॥
सत्य शब्द घट माहिं समावै । ता लग सब पाखंड कहावै ॥
तुम जानतहौ शब्द प्रवाना । विना ज्ञान नहिं शब्द समाना ॥
पाखण्ड जिव मुक्ति न होई । कितो उपाय करे पुनि सोई ॥
पाखण्ड जाके हृदये होई । सोई हंसा कर मुक्ति कर बिगोई ॥
जप तप ज्ञान बहुत कर जाना । नेम धर्म बहुतक लिपटाना ॥
इतना कष्ट कीन्ह अधिकाई । तौ पाखण्ड भेट नहिं जाई ॥
बोधसागर
( २३७ )
ज्ञान शब्द घट मांहि समाना । सो पावेगा पद निर्वाना ॥
माथे तिलक गले जयमाला । हिय पाखंड न मिले गुपाला ॥
साखी—कहैं कबीर विचारके, सुनियो हो धर्मदास ।
सत्य शब्द जिहिं घट बसे, तहैं पाखंड विनास ॥
चौपाई
धर्मदास तुम सत्त कै जानहु । पाखण्ड भर्म हृदयमत आनहु ॥
जाको मन पाखंड सों राता । सोई नरक कहैं निश्चय जाता ॥
पाखंड हिये भक्ति ना होई । सत्य वचन मानो घट सोई ॥
दान देय औ पूजा करई । पाखंड धर्म जीव नहिं तरई ॥
योग यज्ञ तीरथ फिर आवे । पाखंडी जिव ठौर न पावै ॥
धर्मदास निश्चय सुन लीजे । सत्य शब्द में वासा कीजे ॥
साखी—धर्मदास सुन लीजिये, सत्य शब्द उपदेश ।
बिना सत्य पहुँचे नहीं, सत्य लोक निज देश ॥
चौपाई
सत्य शब्द सतपुरुषहि जानौ । नाम बिना सब झूठ बखानौ ॥
नाम छोड़ नहिं औरहि जानौ । निर्गुण सर्गुण एकहि मानौ ॥
निर्गुण सर्गुणतैं नाम नियारा । जो चीन्हें सो हंस हमारा ॥
जहैं देखे तहैं शब्द स्वरूपा । बोलन हारको अचरण रूपा ॥
अचरज बात कहन की नाही । बिन सतगुरु नहिं पावै थाहीं ॥
साखी—निह अक्षर निज पावही, मिटि है सकल अँदेश ।
निह अक्षर जाने बिना, घटही में परदेश ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनती अनुसार । अर्ज एक सुनिये करतारा ॥
सकल भेद गुरु मोहि बतावा । बिना ज्ञान भेद नहिं पावा ॥
( २३८ )
अमरमूल
ज्ञान रूप कहे सों कहिये । ज्ञान भेद कैसे के लहिये ॥
बिन सतगुरु को भेद बतावे । किहिविधि मनकी संशय जावे ॥
सद्गुरु वचन
ज्ञान शब्द सत गुरुसों पावे । बिन सतगुरु को भेद बतावे ॥
ज्ञान नाम है बीज स्वरूपा । विना ज्ञान सो यह को रूपा ॥
ज्ञान बीज प्रथम अनुसारा । ज्ञान बीजतैं सकल पसारा ॥
ज्ञान बीज सों द्रीप निर्माया । अभी अंकूर ज्ञान उपजाया ॥
प्रथमहि तहां पुरुष को मूला । जिहि तैं भये सकल स्थूला ॥
सोलह सुत जबभय उतपानी । ज्ञान बीज तैं सबकी खानी ॥
तुम सहज धर्मबल जोरा । धर्मराय को माथा तोरा ॥
सुतनाम ज्ञानी अनुसारा । धर्मलोक तैं दीन्ह निकारा ॥
विषम सरोवर आन विराजा । अति अहँकार महाबल गाजा ॥
भाँति भाँतिके बाजन बाजा । रंग छत्तीसों होत अवाजा ॥
पाँच तत्त्व गुण तीन बनाया । तातैं सकल सृष्टि निर्माया ॥
जात पाँच यहि तैं उतपानी । ब्राह्मण क्षत्री शूद्र बखानी ॥
ब्रह्मासों जब जाति पसारा । चार वर्ण कीन्है निरधारा ॥
मुखसों ब्राह्मण कीन्ह उचारा । भुज सों क्षत्री कीन्ह पसारा ॥
जंघसों वैश्य करी उतपानी । पाँव सो शूद्र कीन्ह सहिदानी ॥
चार वर्ण को सकल पसारा । वर्तमान वतैं संसारा ॥
ब्राह्मण धर्म ब्रह्मको जाना । तातैं ब्राह्मण वेद बखाना ॥
ब्राह्मण जानौ शूद्र समाना । बिन जाने बूढ़े अभिमाना ॥
गायत्री जप हैं दिनराती । समुझत नहीं ज्ञानकी पाँती ॥
गायत्री जप कर अभिमाना । हमसम और कोइ नहीं आना ॥
संध्या तर्पण औ षट कर्मा । वेद विचार साध शुचि धर्मा ॥
मुमति विचारकै ज्ञान बखाने । धर्म विधान कथा बहु आने ॥
बांधसागर
( २३९ )
पिण्डा पार तर्पण करि दीन्हा । आपन मन अहंकार बड़ कीन्हा ॥
पित्र भक्ति कीन्ही ज्योनारा । मन मैं कीन्ह बहुत अहंकारा ॥
हम तो पित्र भक्ति लवलार्ई । हम सम भक्त और नहिं भाई ॥
हम सम नाहिं कोइ कुलीना । पित्र भक्ति बहुतक लवलीना ॥
जेवहि ब्राह्मण पुण्य बड़ होई । कुटुम समान और नहिं कोई ॥
वेद शास्त्र पढ़ ज्ञान जो जाना । भाषा ज्ञान सुने नहिं काना ॥
साधु संत जो द्वारे आई । तिनकहैं देखै बहुत रिसआई ॥
इन तो नष्ट कर्म बढ कीन्हा । मूढ़ मुड़ायकै टोपी दीन्हा ॥
जाति पांतिकी लज्जा त्यागी । निस दिन फिरहिं ब्रह्म अनुरागी ॥
ताते इन्हि न मानत कोई । पेटके कारण जाति बिगोई ॥
जाति समान न और बिचारा । जाते ब्राह्मण जाति सम्हारा ॥
यह सब मत ब्राह्मणने कीन्हा । जातैं सृष्टि कर्ममें दीन्हा ॥
जिन प्रभु रचा सकल संसारा । तिनहिं बिसार बूड अहंकारा ॥
प्रभुहि छोड़ अन्त चित बासी । जन्म अनेक फिरहिं चौरासी ॥
ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जानी । ब्रह्मरूप नाहिन पहिचानी ॥
मुनिवर स्मृति पढकै राता । ज्ञान हीन मिथ्या मद माता ॥
ब्राह्मण तो ऐसहि चलि गएऊ । ब्रह्म धर्म काहू नहिं गहेऊ ॥
साखी-ब्रह्म भेद जानैं नहीं, बहुत करै अभिमान ।
ताते ब्राह्मण बूड़हीं, कहैं कबीर बखान ॥
चौपाई
क्षत्री धर्म सुनौ व्यवहारा । गौ ब्राह्मण त्रियको रखवारा ॥
गाय मार दैत्यन सब खाई । क्षत्री धर्म सबै नस जाई ॥
ब्राह्मण से भरवावत पानी । क्षत्री धर्म कहाँ रहु जानी ॥
आनकी त्रिया आन घर जाई । द्रव्य आन को आन लुटाई ॥
न्यायहु पै ठाढा नहिं होई । क्षत्री धर्म सहज ही खोई ॥
( २४० )
अमरमूल
धर्म न चल न गुरुकहँ मानै । अपने मन महाँ ज्ञान बखानै ॥
जो गुरु मिलै तौ ज्ञान लखावै । बहुरि न योनि संकट आवै ॥
एक नाम को करै नवेरा । चारों वर्ण तासु के चेरा ॥
एक धर्म कहँ बिनवै प्रानी । चार वर्ण साधन कहँ जानी ॥
साधुन की सेवा नहिं करई । बहु अभिमान हिये में धरई ॥
सारखी-भक्त रूप चीन्हत नहीं, चाल चले कहु आन ।
क्षत्री गण अभिमानमें कहैं कबीर निदान ॥
चौपाई
तातैं परसराम औतारा । उन क्षत्रिनको कीन्ह सँहारा ॥
बारन बूढ़न के भए काला । क्षत्री मार विप्र प्रतिपाला ॥
मूर्ख लोग सब करै बखाना । सत्यभक्ति परचित नहिं आना ॥
कोटिन हत्या क्षत्री करई । तिनकी लोग बढ़ाई धरई ॥
क्षत्री धर्म को होय निवाहा । तौ नहिं छोड़ै कालको चाहा ॥
धर्मराय तिन करै सँहारा । जारे वार करै जर छारा ॥
क्षत्री सोइ क्षमा जिहिं आवै । परजा दुखी आप दुख पावै ॥
वैश्य धर्म अब वेद बखानै । विष्णु जान मन और न कानै ॥
भूखा देख दया चित धरई । वैश्य धर्म व्यवहारहिं करई ॥
तीरथ व्रत करै विधि नाना । प्रभुकी भक्ति नहीं चित आना ॥
जेनी जीव करे प्रतिपाला । जैननामगत आहिं रिशाला ॥
पानी छान पिये दिन राती । नहिं ज्योनार करै निशिपांती ॥
हरिप्रतीत मन माहिन आनै । सूखे काठ सों मन चितठानै ॥
भक्ति रूप न्यारो धर्मदासू । जासों मिटै कालकी फांसू ॥
जीव श्वास ना धर्म चलावै । नाटक चेटक ज्ञान बतावै ॥
लिंग पूजावै घर घर जाई । कामिनि सों बहु प्रेम बढ़ाई ॥
कामिनी काम न चितसों छूटे । यहि विधि घर यम निशिदिन लूटे ॥
बाधसागर
( २४१ )
जप तप माया कीन्ह खुआरा । ऐसे जीव अटक यमद्वारा ॥
पारसनाथ पूजा मन लाई । बहुत भाँति सों पूजहि जाई ॥
पारसनाथ परम गुरु ज्ञानी । ताकी नहिं पावैं सहदानी ॥
ताके कर्म काट सब जाई । सतगुरु चरण रहै लवलार्ई ॥
जब सतगुरु की दाया होई । अक्षर भेद पाय नहिं सोई ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य बखाना । अक्षर भेद नहीं पहिचाना ॥
साखी—अक्षर भेद जानैं नहीं, करे बहुत अभिमान ।
वैश्य सबै वे नष्ट हैं, सत्य वचन परमान ॥
चौपाई
चार वर्णमें शूद्र अधीना । सेवा कर सबसों लवलीना ॥
इतनी भक्ति सतगुरु की पाई । चार वर्णमहैं सो अधिकाई ॥
ब्राह्मणकी सेवा अनुसारे । काम कोध औ लोभ निवारै ॥
क्षत्री सों बहु करै मितार्ई । नित नये प्रेमसहित अधिकाई ॥
वैश्य धर्मही विधि कर पूजे । सत्य धर्म दाया चित कीजे ॥
ऐसे शूद्रहि ब्रह्म बखाना । ब्रह्मलोक में सेवा माना ॥
कलियुग शूद्र धर्म अधिकारा । तीन धर्म को भयो सँहारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । गुरुके चरण हृदय महैं धरई ॥
साखी—यह तौ करनी शूद्रकी, सुनियो हो धर्मदास ।
सतगुरुके चरण जो सेवई, सत्य लोक महैं वास ॥
चौपाई
धर्मदास तुम शूद्र औतारा । जाते सतगुरु भक्ति चित धारा ॥
तुम्हरे पीछे ब्राह्मण तरि हैं । तुम्हरे पीछे क्षत्रि उबरि हैं ॥
चारों वर्ण मुक्ति घर जैहैं । जो तुम्हरो चरणोदक लैहैं ॥
कबहैं न जल आवैं तेई । मुक्ति पदार्थ पावैं जेई ॥
नं. ७ कबीरसागर - ९
( २४२ )
अमरसूल
साखी—जो प्राणी जन्मत भये, शूद्र सकल संसार ।
कह कबीर जब बाचि हैं, करिहैं ब्रह्म विचार ॥
चौपाई
यह तुम सुनहु वर्णनका लेखा । मुक्ति भेद करहु विवेका ॥
तुम्हरे शिष्य शब्द जो पावैं । बिना शब्द नहिं शिष्य कहावैं ॥
शब्द भेद जो पावैं अंगा । ताको काल नहीं परसंगा ॥
बिन अक्षर सबकहैं दुख होई । येही विधि सब जाय बिगोई ॥
और सकल यमको द्वारा । तिनको धर्मराय जो मारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विन्ती कर जोरी । स्वामी सुनियो विनती मोरी ॥
तुम्ही दयाल हो अन्तर्यामी । करहु कृपा अब मोपर स्वामी ॥
तुम्हरे वचन मुक्ति हम पाई । हमरे वंश कस मुक्ति न आई ॥
सद्गुरु वचन
तब कबीर जो कहिबे लीन्हा । अब मैं कहौं वंशकर चीन्हा ॥
जिहि विधि मुक्ति होय रे भाई । सब अब तुम्हैं कहौं ससुझाई ॥
प्रथमहि विधि वंश ज्ञान मन लावै । सहज समाधि परम पद पावै ॥
निमोही हो जगसों रहई । मोह प्रीति मन हर्ष न करई ॥
जो मानै तौ अति भल जाना । नहिं मानै तौ समता ज्ञाना ॥
जो कोइ नाम कबीरहि लेही । तिनसो कछु न अन्तर देही ॥
आपा छोड़ नाम लव लावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥
जो मनमें करि है अहँकारा । निश्चय बूझै सब परिवारा ॥
सत्य भक्ति सत्यही मन लावै । आप तरे जीवन मुक्तावै ॥
जो कोई माया आन चढ़ाई । साधुन कहैं सब देय खवाई ॥
सत्य वचन सबही सों भाषै । सत्यनाम मनमें अभिलाषै ॥
कबहुँ न क्रोध कर मनमांही । जो बोले सो नामकी छांही ॥
बोधसागर
( २४३ )
ज्ञान विचारै शब्द सुनावै । सब जीवन कहैं लोक पठावै ॥
तुम्हरे वंश जो आगे होई । तिनके गर्व बहुत मन सोई ॥
गर्वके किये भक्ति नहिं होई । बिना भक्ति सब जाँय विगोई ॥
सात पिढ़ी लग गर्व गुमाना । आठै पिढ़ी भक्ति परवाना ॥
पावै सार शब्द परवाना । तब पुनि पावै लोक ठिकाना ॥
सात बाल जो तुम्हरे होई । तब लग रहै अभिमान समोई ॥
शब्द पेल कै करहिं धिगाई । पंथहिं मेट अपंथ चलाई ॥
आठे वंश तबै औतारा । तिनसों होय पन्थ उजियारा ॥
वे गुरु आय करै संसारा । तीन लोकमहैं बास पसारा ॥
स्वर्ग माहि नामी जिहि आही । धर्मराय तिनकी सुधि पाहीं ॥
तब अपना वह दूत पठाहीं । बहुतक छल करहै तिनपाहीं ॥
सार शब्द सों निकट न जाई । भागे दूत रहै पछताई ॥
वंश तुम्हार केर यह लेखा । बिना नाम नहिं होय विवेका ॥
जा कहैं अमर नाम मिलगयऊ । सो प्राणी निहसंशय भयऊ ॥
अमरशब्द जो घट परकाशा । तहैंवा है हमरौ निज वासा ॥
छन्द—जो अमरनाम न पाय है, सो अध है पछताय ।
जन्म जन्मत कष्ट बहुतक, जरा मरन समाय हो ॥
हंस वंशन हंस पंगत, कही सब दरसायके ।
यह रहन रहै सो लोक पहुँचै, कहै कबीर समझायके ॥
सोरठा—दीन्ह जकत को राज, धर्मन तुम्हरे वंश कहैं ।
करेहि जीव को काज, सत्यनाम समझायके ॥
इति श्रीग्रंथ अमरमूल चारवर्णवर्णन वंशमहिमावर्णन
( २४४ )
अमरमूल
सप्तमविश्राम
धर्मदास बचन चौपाई
धर्मदास कहे कर जोरी । स्वामी सुनये विन्ती मोरी ॥
जो तुम कही सोई परवाना । गुरुके वचन सत्य हम जाना ॥
हम जानी पुरुष रु गुरु माहीं । तुमहिं पुरुष कुछ अंतर नाही ॥
हमरे दिल यह पारख आई । तुम्हरी दया हंस मुक्ताई ॥
हमरे बालक तुम्हरे पाछे । तुम्हरी दया नाम मिल आछे ॥
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहि समुझाई । वंश तुम्हार मुक्ति घर जाई ॥
जो कोइ बालक होय तुम्हारा । तिनसों भक्ति होय उजियारा ॥
पंथ माहिं जे बालक आवैं । ते तुम वंशन माथ नवावैं ॥
तिनसों भक्ति मर्यादा होई । सार शब्द चलि है निज सोई ॥
नाँद केरि बालक जो होई । तिनको मुक्ति नाम सो सोई ॥
नाँदके बालक शब्दहि जाना । भवसागर तज लोक पयाना ॥
विन्दके बाल रहैं अरुझाई । मान गुमान और प्रभुताई ॥
सत्य शब्द जिहि बालक जानी । सोई पावैं लोक सहिदानी ॥
जेहो बाल प्रवाना पावा । तिन कहैं जानहु वंश स्वभावा ॥
साखी-हमरे बालक नामके, और सकल सब झूठ ।
सत्य शब्द कहैं जानही, काल गहे नहिं खूंट ॥
चौपाई
धर्मदास सुन शब्द पसारा । बिना शब्द नहिं उतरहि पारा ॥
बिना शब्द तुम मुक्ति न पाओ । केतो ज्ञान गम्य फैलाओ ॥
वंश हमार शब्द निज जाना । बिना शब्द नहि वंशहि माना ॥
धर्मदास निर्मोह हिय गेहू । वंशकी चिन्ता छांड़ तुम देहू ॥
तुम तो भयऊ शब्द समाना । यही बचन तुम चित नहिं आना ॥
बोधसागर
( २४६ )
तुमहि कही अस बस्तु गुसाईं । मैं बूझों यह संशय जाईं ॥
तुम्हरी दया आज जो पाऊं । तौ सब बालक लोक पठाऊं ॥
सद्गुरु वचन
तब साहिब अस कहि समुझाईं । बिना नाम नहीं लोक पठाईं ॥
नाँद बिन्दकै बालक दोईं । बिना नाम कोई मुक्ति न होईं ॥
के तौ पढ़ै गुणै औ गावै । बिना नाम भव भटका खावै ॥
हमरे माया मोह न होईं । सब संसार सत्य कर सोईं ॥
धर्मदास तुम बड़े हो ज्ञानी । यह संशय कस मन मँहै आनी ॥
गुरु को भार सबन कर होईं । तुम मनमें पछताव न कोई ॥
तारन तरन सत्य हम सोईं । बिन सतगुरु बूझा सब कोई ॥
सतगुरु तौ सब सृष्टि उबारा । तुम बालक अब कौन है भारा ॥
तुम जिन चिन्तामन मँहै करहूँ । सद्गुरु नाम हृदय मँहै धरहूँ ॥
एक काल आवे जब भाईं । सबै सृष्टि यह लोक सिधाईं ॥
जहाँ लग जीव जन्तु सब कहिये । तहाँ लग सब सद्गुरु मँहै लहिये ॥
सबै भार सद्गुरुके काँधे । पार लगावहि यम नहीं बाँधे ॥
यमका अमल छूट जब जाईं । सद्गुरु शरण जीव जब आईं ॥
साखी—कहे कबीर बिचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।
अमरमूल जो जान है, ताको सब परकाश ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास बिनवै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिनती मोरी ॥
तुम्हरे कहे जगत तर जाईं । कौन मतासों लोक सिधाईं ॥
ज्ञान दिव्य जो घट नहीं होईं । सोइ कवन बिधि लोकसमोईं ॥
तब मैं जानो ज्ञान तुम्हारा । सकल सृष्टिको होय उबारा ॥
( २४६ )
अमरमूल
कहै कबीर तबै समुझाई । यह संशय तुम कवन कराई ॥
तुम तो आपन हंस उबारो । जीवन शोच कहा निर्धारी ॥
सतगुरु लीन्ह जगतको भारा । तेई करि है सृष्टि उबारा ॥
जापर गुरु चितवैं चितलाई । ताकर हंस बिगोय न जाई ॥
जब यह सृष्टि कीन्ह परकाशा । हंस अनंत सतलोक निवासा ॥
अबहुँ अनंत लोक कहैं जाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥
तुमको संशय कछु न भाई । आपन हंस करौ मुक्तार्ई ॥
साखी—सतगुरु तारनहार हैं, कहैं कबीर बिचार ।
तुम क्या शंका करत हो, आपन करौ उबार ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास विनवै कर जोरी । बिनती साहिब सुनिये मोरी ॥
तुम शिर आहि जत्तको भारा । सब जीवन को करौ उबारा ॥
हमको नाहिं गुरुवाई दीजे । आपन भार आप शिर लीजे ॥
सद्गुरु वचन
तब सतगुरु अस वचन उचारा । तुम कहैं दीन्ह जत्तको भारा ॥
तुम्हरे मुहर चले संसारा । अक्षर अक्षर करै पुकारा ॥
तुम्हरे कहे खोज जो करई । अक्षर पाय हंस निस्तरई ॥
जो नहिं मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहैं यमके द्वारा ॥
धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥
तुम तो सत्य लोकके वासी । किहिं कारन आये अविनासी ॥
मृत्यु लोक मैं कवनै काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥
तहैंवां कवन काज पगुधारा । सो मोहिं स्वामी कहौ बिचारा ॥
तुम साहब सत पुरुष कहाए । मृत्यु लोक में काहे आए ॥
बोधसागर
( २४७ )
सद्गुरु वचन
तब साहिब बोले बिहसाई । अब यह ज्ञान सुनौ मन लाई॥
जब नहिं हते शून्य बे शून्या । तब नहिं हते पाप औ पुन्या॥
तब नहिं धरती गगन अकाशा । मेरे मन्दर नाहीं कैलाशा ॥
तब नहिं चन्द्र सूर्य औतारा । तब नहिं शेष सकलविस्तारा॥
तब नहिं इन्द्र कुबेर समोई । वायु वरुण तहैंवां नहिं कोई ॥
सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहिं कालकी छाहीं॥
तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि भवानी गौरि गणेशा॥
आदि पुरुष तब हते अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥
आप पुरुष अस कीन्हौ साजा । शब्दहि माहि लोक उपराजा॥
प्रथमहि शब्द सुरत अनुसारा । तेहि पीछे सब द्रौप सवौरा ॥
तेहि पीछे पुन मूल बनावा । तेहि पीछे सोहं उपजावा ॥
ता पीछे अचिन्त जो कीन्हा । ते पीछे अक्षर रच लीन्हा ॥
ता पीछे कूर्महि निर्मयऊ । ताहि भार पृथ्वीको दयऊ ॥
तब जल रंग सूरत इस भाखा । सप्त पातालके नीचे राखा ॥
जिह्वितै भयो जलको विस्तारा । सकल सृष्टि कौ भयो पसारा॥
तिहि तैं तेज तत्त्व अनुसार । जेहिं गुण तैं काल औतारा ॥
पांच तत्त्वतैं सब निर्मावा । तीनों गुण तिहि माहि समावा॥
तीनों गुण स्वरूपके धामा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा ॥
रज गुण तैं ब्रह्मा उत्पानी । सतगुरु भाव विष्णु कर जानी॥
तमगुण शिव संहार पसारा । इतने भयो सकल संसारा ॥
तेजके गुणहि काल उत्पानी । तासों भये जीव दुखदानी ॥
तातैं पुरुष दया चित आई । हंसन कारण मोहिं पठाई ॥
यातैं मृत्यु लोकहि आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥
तुम जीवनकैं बन्द बुझाये । सुमरन सत्य नाम समुझाये ॥