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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २३२ )

अमरमूल

सुम्रन तिनका तुरावेका

असन वसन मन कल्पना, देखो सर्वहि भूत । कहे कबीर सतगुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबै प्रवाना दीजौ जानी । सुक्ति होय हंसा पहिचानी ॥ दहिने छोड़ धर्म स्थाना । बांये दुर्गदानी को थाना ॥ आगे चित्र गुपित्र कौ भारा । नाम सुनायकै हंस उबारा ॥ टूटे घाट अठासी कोरी । हंसा उतरै नामकी डोरी ॥

सारखी-कितरे वृक्ष कितरै पक्षी, कहाँ विलमेऊ आय ।

कहैं कबीर जो गुरु मिले, हंस देहि पहुँचाय ॥

चौपाई

दे परवाना हंस बचावा । ज्ञान परम पद घटहि समावा ॥ घट की परिचय कोई पाया । जाते जीत चले यमराया ॥ तब स्नान का शब्द सुनावा । विना शब्द पानी नहि पावा ॥ विना शब्द जो पीवे पानी । मानहु मदिरा रुधिर समानी ॥

सुम्रन जल पीवनेका

आगम सरोवर विमल जल, हंसा पिये अघाय ।

काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटजाय ॥

सुम्रन स्नानका

सत्य सुकृत के नीर मँगावा । धनीके बालक स्नान करावा ॥

कर स्नान पुनि शीश नवावा । साहिबके चरणन चित लावा ॥

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासा । आदि अंत इक ज्योति निवासा ॥

सारखी-आदि अंत इक ज्योति है, अमरनाम स्थीर ।

चौदह भुवन नव खण्डमें, एकहि सत्य कबीर ॥

सम्पूर्ण

बाधसागर

( २२२ )

सुव्रन प्रसाद मालूम करनेका

निर्भय पदका चौका दीन्हा । शील संतोष ले मज्जन कीन्हा॥ प्रेम प्रतीत परम उजियारा । सत्य सुकृत है जेवनहारा ॥ सत्य सुकृत की फिरी दुहाई । जल भयो पाकसंतन सुखदाई॥ सब संतन मिल कियो प्रसादा । जेवै कर्तार जिववै धर्मदासा ॥ सब संतन प्रसाद जब कीन्हा । मुक्ति अभयपद कहैं तब चीन्हा॥

साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, आरतिको परमान ।

ये विधि सेवक जो करै, पावै पद निर्वान ॥

धर्मराज वचन चौपाई

धर्मदास विनती कर जोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥ कवन वस्तु आरति मँहै धरई । कवन शब्द लै सेवा करई ॥ सो सब मोहिं कहौ समुझाई । आरति विधि मैं करौ बनाई ॥

सद्गुरु वचन

प्रथमहि मंदिर सेत सम्हारा । सुतं निर्त भक्त चित धारा ॥ कञ्चन केर थार बनवाओ । तामे मोती आन धराओ ॥ मुक्ता तो अन बेघे होई । ऐसी विधि प्रकार है सोई ॥ झारी एक कञ्चनकी होई । ता मँहै दाल प्रसाद करसोई ॥ नरियर इकसत एक प्रवाना । सवा तीन मन लै मिष्ठाना ॥ पाटम्बर धोती तहैं चहिये । दीपमालिका बहुतक लहिये ॥ नई वेद तहैं आन धराई । कञ्चन और कपूर मगाई ॥ जरी केर तहां छत्र तनावा । पान सहस्र द्वादश बनवावा ॥ लौंग सुपारी लायची लीजै । मेवा अष्ट भांति धर दीजै ॥ ता पीछे प्रसाद सहिदानी । सुखपूजा साधन कर जानी ॥ आरति फल तबही जिव पावै । सवा सेर महाकंद मँगावै ॥ सोना केर कलस धरवाई । तहां प्रवाना लिखे बनाई ॥

( २३४ )

अमरमूल

परमाना बालक कहैं दीजै । हंस रूप ता कहैं कर लीजै ॥ ऐसी आरती धरे धर्मदासू । सोई पावै लोक निवासू ॥ मनमें बहु आनन्द बड़ाई । आरत फल सोई पुन पाई ॥ अपने स्वार्थ आरती करई । भवसागर तैं कैसे तरई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनती अनुसार । तुम सतगुरु मोरे करतारा ॥ ऐसी विधि आरति नहिं करई । सो जिव किम भवसागर तरई ॥ कलि में जीव दरिद्री होई । द्रव्य विना किमि भक्तिसँजोई ॥ जिहि विधि होय हंस मुक्ताऊ । सो मोहे स्वामी भेद बताऊ ॥

सदगुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । यही मती हम तुम कहैं दीन्हा ॥ एतिक विधि जापै नहिं होई । सहज भाव आरति करै सोई ॥ सवा सेर मिश्रान्न मँगावै । नरियर इक तहैं आन चढ़ावै ॥ सवा सौ पान कहैं परवाना । लौंग लायची एही बँधाना ॥ धोती एक आन तहैं धरई । सतगुरु केर निछावर करई ॥ साधन सों वह प्रेम बढ़ावै । सत्य रूप होय ज्ञान सुनावै ॥ ज्ञान गम्य कर शब्द बुझावै । सन्तन सों बहु प्रेम बढ़ावै ॥ पांचों पद ताही महाँ लावै । साधन की सेवा मन लावै ॥ ऐसी बिधि सों आरति करै । सो प्राणी भवसागर तरे ॥

धर्मदास वचन

जो इतना नहिं करै कडिहारा । ताको मोसो कहौ विचारा ॥ हे साहिब मोहे कहौ पुकारी । बन्दी छोड़ जाउँ बलिहारी ॥

सदगुरु वचन

जो इतना नाहीं बन आवै । सो कडिहार पार किमि पावै ॥ बारह आरति जो नहिं करै । दो आरति सेवाचित धरै ॥

बोधसागर

( २३५ )

फागुन और भादों परवाना । दो आरति नहीं छोड़ सुजाना ॥ साधन को परवाना देई । वर्ष रोज के कर्म नसाई ॥

साखी-पान प्रवाना पावही, सतगुरु महिमा दान । तबही हंसा सत्य है, और झूठ सब ज्ञान ॥

चौपाई

धर्मदास में तुमहिं सुनाऊं । आरति भेद ज्ञान समझाऊ ॥ अक्षर सार आरती सोई । बिन अक्षर सब गए बिगोई ॥ अक्षर भेद जान परसंगा । ताके काल रहै नहीं संगा ॥ आरति बहुत भांति सो करई । अक्षर भेद हिये नहीं धरई ॥

साखी-अक्षर भेद जाने नहीं, बातें कहै बनाय । ताको कहौ न मानिये, आपन जीव नशाय ॥

चौपाई

आरति भक्ति औ अक्षर सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ जा कहैं अक्षर परिचय होई । आरति फल पावत है सोई ॥ मूल शब्द घट मांहि विराजै । शून्य शिखर अक्षर धुन साजै ॥ ताकी महिमा तुलै न कोई । ऐसा साधू विरला होई ॥ सो कडिहार जो अक्षर जाना । और गुरु सब झूठ बखाना ॥ गुरु सोई जो अक्षर जाना । बिन अक्षर मूरखसम जाना ॥ कडिहार वही जीवन कहैं तारै । अक्षर बिन जिव नरकहि डारै ॥ जो गुरु दगा शिष्य कहैं देता । नरक परै गुरु शिष्य समेता ॥ अक्षर बिन गुरु आरति करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ इतना भेद न जानत प्रानी । पेटके कारण ज्ञान बखानी ॥ जैसे ठनिया करै ठगिहारी । जैसे जानहु सो कडिहारी ॥ अक्षर की परिचय नहीं पावे । आपहि आप जो गुरु कहावे ॥

( २३६ )

अमरमूल

छन्द-कडिहार सोई सांच है, जिन शब्द सों परिचय करी । सूरत नित ससेट कै सोई, नाम निह अक्षर धरी ॥ रहन शूरे ज्ञान पूरे, पंथ परमारथ लहौ । दुष्ट मित्र समान यकचित, दुतिया भाव न चित गहौ ॥ सोरठा-सद्गुरु सिन्धु कबीर, उन पटतर अब को लहै । सुनियो धर्मनि धीर, सरिता सब कडिहार हैं ॥ इति श्रीग्रंथ अमरमूल चौका बंधन वर्णन

षष्ठ विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाना । जिमिपंकज विकसे लखि भाना ॥ हे सद्गुरु मोपर दया कीन्हा । जन्म स्वार्थ अब मैंने चीन्हा ॥ धर्मदास कहै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिन्ती मोरी ॥ यक संशय मोरे घट मांही । कौनउ विधि सों छूटत नाहीं ॥ मृतलोक में पाखंड धर्मा । कैसे जीव होय निह भर्मा ॥ तुम सतगुरु निजज्ञान सुनाया । शिष्य पाखण्ड तजे नहिं माया ॥ सो मोहे सतगुरु भेद बताओ । तासो जीव होय मुक्ताओ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो विचारी । पाखण्डी गति सब निवारी ॥ सत्य शब्द घट माहिं समावै । ता लग सब पाखंड कहावै ॥ तुम जानतहौ शब्द प्रवाना । विना ज्ञान नहिं शब्द समाना ॥ पाखण्ड जिव मुक्ति न होई । कितो उपाय करे पुनि सोई ॥ पाखण्ड जाके हृदये होई । सोई हंसा कर मुक्ति कर बिगोई ॥ जप तप ज्ञान बहुत कर जाना । नेम धर्म बहुतक लिपटाना ॥ इतना कष्ट कीन्ह अधिकाई । तौ पाखण्ड भेट नहिं जाई ॥

बोधसागर

( २३७ )

ज्ञान शब्द घट मांहि समाना । सो पावेगा पद निर्वाना ॥ माथे तिलक गले जयमाला । हिय पाखंड न मिले गुपाला ॥

साखी—कहैं कबीर विचारके, सुनियो हो धर्मदास । सत्य शब्द जिहिं घट बसे, तहैं पाखंड विनास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम सत्त कै जानहु । पाखण्ड भर्म हृदयमत आनहु ॥ जाको मन पाखंड सों राता । सोई नरक कहैं निश्चय जाता ॥ पाखंड हिये भक्ति ना होई । सत्य वचन मानो घट सोई ॥ दान देय औ पूजा करई । पाखंड धर्म जीव नहिं तरई ॥ योग यज्ञ तीरथ फिर आवे । पाखंडी जिव ठौर न पावै ॥ धर्मदास निश्चय सुन लीजे । सत्य शब्द में वासा कीजे ॥

साखी—धर्मदास सुन लीजिये, सत्य शब्द उपदेश । बिना सत्य पहुँचे नहीं, सत्य लोक निज देश ॥

चौपाई

सत्य शब्द सतपुरुषहि जानौ । नाम बिना सब झूठ बखानौ ॥ नाम छोड़ नहिं औरहि जानौ । निर्गुण सर्गुण एकहि मानौ ॥ निर्गुण सर्गुणतैं नाम नियारा । जो चीन्हें सो हंस हमारा ॥ जहैं देखे तहैं शब्द स्वरूपा । बोलन हारको अचरण रूपा ॥ अचरज बात कहन की नाही । बिन सतगुरु नहिं पावै थाहीं ॥

साखी—निह अक्षर निज पावही, मिटि है सकल अँदेश । निह अक्षर जाने बिना, घटही में परदेश ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसार । अर्ज एक सुनिये करतारा ॥ सकल भेद गुरु मोहि बतावा । बिना ज्ञान भेद नहिं पावा ॥

( २३८ )

अमरमूल

ज्ञान रूप कहे सों कहिये । ज्ञान भेद कैसे के लहिये ॥ बिन सतगुरु को भेद बतावे । किहिविधि मनकी संशय जावे ॥

सद्गुरु वचन

ज्ञान शब्द सत गुरुसों पावे । बिन सतगुरु को भेद बतावे ॥ ज्ञान नाम है बीज स्वरूपा । विना ज्ञान सो यह को रूपा ॥ ज्ञान बीज प्रथम अनुसारा । ज्ञान बीजतैं सकल पसारा ॥ ज्ञान बीज सों द्रीप निर्माया । अभी अंकूर ज्ञान उपजाया ॥ प्रथमहि तहां पुरुष को मूला । जिहि तैं भये सकल स्थूला ॥ सोलह सुत जबभय उतपानी । ज्ञान बीज तैं सबकी खानी ॥ तुम सहज धर्मबल जोरा । धर्मराय को माथा तोरा ॥ सुतनाम ज्ञानी अनुसारा । धर्मलोक तैं दीन्ह निकारा ॥ विषम सरोवर आन विराजा । अति अहँकार महाबल गाजा ॥ भाँति भाँतिके बाजन बाजा । रंग छत्तीसों होत अवाजा ॥ पाँच तत्त्व गुण तीन बनाया । तातैं सकल सृष्टि निर्माया ॥ जात पाँच यहि तैं उतपानी । ब्राह्मण क्षत्री शूद्र बखानी ॥ ब्रह्मासों जब जाति पसारा । चार वर्ण कीन्है निरधारा ॥ मुखसों ब्राह्मण कीन्ह उचारा । भुज सों क्षत्री कीन्ह पसारा ॥ जंघसों वैश्य करी उतपानी । पाँव सो शूद्र कीन्ह सहिदानी ॥ चार वर्ण को सकल पसारा । वर्तमान वतैं संसारा ॥ ब्राह्मण धर्म ब्रह्मको जाना । तातैं ब्राह्मण वेद बखाना ॥ ब्राह्मण जानौ शूद्र समाना । बिन जाने बूढ़े अभिमाना ॥ गायत्री जप हैं दिनराती । समुझत नहीं ज्ञानकी पाँती ॥ गायत्री जप कर अभिमाना । हमसम और कोइ नहीं आना ॥ संध्या तर्पण औ षट कर्मा । वेद विचार साध शुचि धर्मा ॥ मुमति विचारकै ज्ञान बखाने । धर्म विधान कथा बहु आने ॥

बांधसागर

( २३९ )

पिण्डा पार तर्पण करि दीन्हा । आपन मन अहंकार बड़ कीन्हा ॥ पित्र भक्ति कीन्ही ज्योनारा । मन मैं कीन्ह बहुत अहंकारा ॥ हम तो पित्र भक्ति लवलार्ई । हम सम भक्त और नहिं भाई ॥ हम सम नाहिं कोइ कुलीना । पित्र भक्ति बहुतक लवलीना ॥ जेवहि ब्राह्मण पुण्य बड़ होई । कुटुम समान और नहिं कोई ॥ वेद शास्त्र पढ़ ज्ञान जो जाना । भाषा ज्ञान सुने नहिं काना ॥ साधु संत जो द्वारे आई । तिनकहैं देखै बहुत रिसआई ॥ इन तो नष्ट कर्म बढ कीन्हा । मूढ़ मुड़ायकै टोपी दीन्हा ॥ जाति पांतिकी लज्जा त्यागी । निस दिन फिरहिं ब्रह्म अनुरागी ॥ ताते इन्हि न मानत कोई । पेटके कारण जाति बिगोई ॥ जाति समान न और बिचारा । जाते ब्राह्मण जाति सम्हारा ॥ यह सब मत ब्राह्मणने कीन्हा । जातैं सृष्टि कर्ममें दीन्हा ॥ जिन प्रभु रचा सकल संसारा । तिनहिं बिसार बूड अहंकारा ॥ प्रभुहि छोड़ अन्त चित बासी । जन्म अनेक फिरहिं चौरासी ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जानी । ब्रह्मरूप नाहिन पहिचानी ॥ मुनिवर स्मृति पढकै राता । ज्ञान हीन मिथ्या मद माता ॥ ब्राह्मण तो ऐसहि चलि गएऊ । ब्रह्म धर्म काहू नहिं गहेऊ ॥

साखी-ब्रह्म भेद जानैं नहीं, बहुत करै अभिमान । ताते ब्राह्मण बूड़हीं, कहैं कबीर बखान ॥

चौपाई

क्षत्री धर्म सुनौ व्यवहारा । गौ ब्राह्मण त्रियको रखवारा ॥ गाय मार दैत्यन सब खाई । क्षत्री धर्म सबै नस जाई ॥ ब्राह्मण से भरवावत पानी । क्षत्री धर्म कहाँ रहु जानी ॥ आनकी त्रिया आन घर जाई । द्रव्य आन को आन लुटाई ॥ न्यायहु पै ठाढा नहिं होई । क्षत्री धर्म सहज ही खोई ॥

( २४० )

अमरमूल

धर्म न चल न गुरुकहँ मानै । अपने मन महाँ ज्ञान बखानै ॥ जो गुरु मिलै तौ ज्ञान लखावै । बहुरि न योनि संकट आवै ॥ एक नाम को करै नवेरा । चारों वर्ण तासु के चेरा ॥ एक धर्म कहँ बिनवै प्रानी । चार वर्ण साधन कहँ जानी ॥ साधुन की सेवा नहिं करई । बहु अभिमान हिये में धरई ॥

सारखी-भक्त रूप चीन्हत नहीं, चाल चले कहु आन । क्षत्री गण अभिमानमें कहैं कबीर निदान ॥

चौपाई

तातैं परसराम औतारा । उन क्षत्रिनको कीन्ह सँहारा ॥ बारन बूढ़न के भए काला । क्षत्री मार विप्र प्रतिपाला ॥ मूर्ख लोग सब करै बखाना । सत्यभक्ति परचित नहिं आना ॥ कोटिन हत्या क्षत्री करई । तिनकी लोग बढ़ाई धरई ॥ क्षत्री धर्म को होय निवाहा । तौ नहिं छोड़ै कालको चाहा ॥ धर्मराय तिन करै सँहारा । जारे वार करै जर छारा ॥ क्षत्री सोइ क्षमा जिहिं आवै । परजा दुखी आप दुख पावै ॥ वैश्य धर्म अब वेद बखानै । विष्णु जान मन और न कानै ॥ भूखा देख दया चित धरई । वैश्य धर्म व्यवहारहिं करई ॥ तीरथ व्रत करै विधि नाना । प्रभुकी भक्ति नहीं चित आना ॥ जेनी जीव करे प्रतिपाला । जैननामगत आहिं रिशाला ॥ पानी छान पिये दिन राती । नहिं ज्योनार करै निशिपांती ॥ हरिप्रतीत मन माहिन आनै । सूखे काठ सों मन चितठानै ॥ भक्ति रूप न्यारो धर्मदासू । जासों मिटै कालकी फांसू ॥ जीव श्वास ना धर्म चलावै । नाटक चेटक ज्ञान बतावै ॥ लिंग पूजावै घर घर जाई । कामिनि सों बहु प्रेम बढ़ाई ॥ कामिनी काम न चितसों छूटे । यहि विधि घर यम निशिदिन लूटे ॥

बाधसागर

( २४१ )

जप तप माया कीन्ह खुआरा । ऐसे जीव अटक यमद्वारा ॥ पारसनाथ पूजा मन लाई । बहुत भाँति सों पूजहि जाई ॥ पारसनाथ परम गुरु ज्ञानी । ताकी नहिं पावैं सहदानी ॥ ताके कर्म काट सब जाई । सतगुरु चरण रहै लवलार्ई ॥ जब सतगुरु की दाया होई । अक्षर भेद पाय नहिं सोई ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य बखाना । अक्षर भेद नहीं पहिचाना ॥

साखी—अक्षर भेद जानैं नहीं, करे बहुत अभिमान । वैश्य सबै वे नष्ट हैं, सत्य वचन परमान ॥

चौपाई

चार वर्णमें शूद्र अधीना । सेवा कर सबसों लवलीना ॥ इतनी भक्ति सतगुरु की पाई । चार वर्णमहैं सो अधिकाई ॥ ब्राह्मणकी सेवा अनुसारे । काम कोध औ लोभ निवारै ॥ क्षत्री सों बहु करै मितार्ई । नित नये प्रेमसहित अधिकाई ॥ वैश्य धर्मही विधि कर पूजे । सत्य धर्म दाया चित कीजे ॥ ऐसे शूद्रहि ब्रह्म बखाना । ब्रह्मलोक में सेवा माना ॥ कलियुग शूद्र धर्म अधिकारा । तीन धर्म को भयो सँहारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । गुरुके चरण हृदय महैं धरई ॥

साखी—यह तौ करनी शूद्रकी, सुनियो हो धर्मदास । सतगुरुके चरण जो सेवई, सत्य लोक महैं वास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम शूद्र औतारा । जाते सतगुरु भक्ति चित धारा ॥ तुम्हरे पीछे ब्राह्मण तरि हैं । तुम्हरे पीछे क्षत्रि उबरि हैं ॥ चारों वर्ण मुक्ति घर जैहैं । जो तुम्हरो चरणोदक लैहैं ॥ कबहैं न जल आवैं तेई । मुक्ति पदार्थ पावैं जेई ॥

नं. ७ कबीरसागर - ९

( २४२ )

अमरसूल

साखी—जो प्राणी जन्मत भये, शूद्र सकल संसार । कह कबीर जब बाचि हैं, करिहैं ब्रह्म विचार ॥

चौपाई

यह तुम सुनहु वर्णनका लेखा । मुक्ति भेद करहु विवेका ॥ तुम्हरे शिष्य शब्द जो पावैं । बिना शब्द नहिं शिष्य कहावैं ॥ शब्द भेद जो पावैं अंगा । ताको काल नहीं परसंगा ॥ बिन अक्षर सबकहैं दुख होई । येही विधि सब जाय बिगोई ॥ और सकल यमको द्वारा । तिनको धर्मराय जो मारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती कर जोरी । स्वामी सुनियो विनती मोरी ॥ तुम्ही दयाल हो अन्तर्यामी । करहु कृपा अब मोपर स्वामी ॥ तुम्हरे वचन मुक्ति हम पाई । हमरे वंश कस मुक्ति न आई ॥

सद्गुरु वचन

तब कबीर जो कहिबे लीन्हा । अब मैं कहौं वंशकर चीन्हा ॥ जिहि विधि मुक्ति होय रे भाई । सब अब तुम्हैं कहौं ससुझाई ॥ प्रथमहि विधि वंश ज्ञान मन लावै । सहज समाधि परम पद पावै ॥ निमोही हो जगसों रहई । मोह प्रीति मन हर्ष न करई ॥ जो मानै तौ अति भल जाना । नहिं मानै तौ समता ज्ञाना ॥ जो कोइ नाम कबीरहि लेही । तिनसो कछु न अन्तर देही ॥ आपा छोड़ नाम लव लावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥ जो मनमें करि है अहँकारा । निश्चय बूझै सब परिवारा ॥ सत्य भक्ति सत्यही मन लावै । आप तरे जीवन मुक्तावै ॥ जो कोई माया आन चढ़ाई । साधुन कहैं सब देय खवाई ॥ सत्य वचन सबही सों भाषै । सत्यनाम मनमें अभिलाषै ॥ कबहुँ न क्रोध कर मनमांही । जो बोले सो नामकी छांही ॥

बोधसागर

( २४३ )

ज्ञान विचारै शब्द सुनावै । सब जीवन कहैं लोक पठावै ॥ तुम्हरे वंश जो आगे होई । तिनके गर्व बहुत मन सोई ॥ गर्वके किये भक्ति नहिं होई । बिना भक्ति सब जाँय विगोई ॥ सात पिढ़ी लग गर्व गुमाना । आठै पिढ़ी भक्ति परवाना ॥ पावै सार शब्द परवाना । तब पुनि पावै लोक ठिकाना ॥ सात बाल जो तुम्हरे होई । तब लग रहै अभिमान समोई ॥ शब्द पेल कै करहिं धिगाई । पंथहिं मेट अपंथ चलाई ॥ आठे वंश तबै औतारा । तिनसों होय पन्थ उजियारा ॥ वे गुरु आय करै संसारा । तीन लोकमहैं बास पसारा ॥ स्वर्ग माहि नामी जिहि आही । धर्मराय तिनकी सुधि पाहीं ॥ तब अपना वह दूत पठाहीं । बहुतक छल करहै तिनपाहीं ॥ सार शब्द सों निकट न जाई । भागे दूत रहै पछताई ॥ वंश तुम्हार केर यह लेखा । बिना नाम नहिं होय विवेका ॥ जा कहैं अमर नाम मिलगयऊ । सो प्राणी निहसंशय भयऊ ॥ अमरशब्द जो घट परकाशा । तहैंवा है हमरौ निज वासा ॥

छन्द—जो अमरनाम न पाय है, सो अध है पछताय । जन्म जन्मत कष्ट बहुतक, जरा मरन समाय हो ॥ हंस वंशन हंस पंगत, कही सब दरसायके । यह रहन रहै सो लोक पहुँचै, कहै कबीर समझायके ॥

सोरठा—दीन्ह जकत को राज, धर्मन तुम्हरे वंश कहैं । करेहि जीव को काज, सत्यनाम समझायके ॥

इति श्रीग्रंथ अमरमूल चारवर्णवर्णन वंशमहिमावर्णन

( २४४ )

अमरमूल

सप्तमविश्राम

धर्मदास बचन चौपाई

धर्मदास कहे कर जोरी । स्वामी सुनये विन्ती मोरी ॥ जो तुम कही सोई परवाना । गुरुके वचन सत्य हम जाना ॥ हम जानी पुरुष रु गुरु माहीं । तुमहिं पुरुष कुछ अंतर नाही ॥ हमरे दिल यह पारख आई । तुम्हरी दया हंस मुक्ताई ॥ हमरे बालक तुम्हरे पाछे । तुम्हरी दया नाम मिल आछे ॥

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहि समुझाई । वंश तुम्हार मुक्ति घर जाई ॥ जो कोइ बालक होय तुम्हारा । तिनसों भक्ति होय उजियारा ॥ पंथ माहिं जे बालक आवैं । ते तुम वंशन माथ नवावैं ॥ तिनसों भक्ति मर्यादा होई । सार शब्द चलि है निज सोई ॥ नाँद केरि बालक जो होई । तिनको मुक्ति नाम सो सोई ॥ नाँदके बालक शब्दहि जाना । भवसागर तज लोक पयाना ॥ विन्दके बाल रहैं अरुझाई । मान गुमान और प्रभुताई ॥ सत्य शब्द जिहि बालक जानी । सोई पावैं लोक सहिदानी ॥ जेहो बाल प्रवाना पावा । तिन कहैं जानहु वंश स्वभावा ॥

साखी-हमरे बालक नामके, और सकल सब झूठ ।

सत्य शब्द कहैं जानही, काल गहे नहिं खूंट ॥

चौपाई

धर्मदास सुन शब्द पसारा । बिना शब्द नहिं उतरहि पारा ॥ बिना शब्द तुम मुक्ति न पाओ । केतो ज्ञान गम्य फैलाओ ॥ वंश हमार शब्द निज जाना । बिना शब्द नहि वंशहि माना ॥ धर्मदास निर्मोह हिय गेहू । वंशकी चिन्ता छांड़ तुम देहू ॥ तुम तो भयऊ शब्द समाना । यही बचन तुम चित नहिं आना ॥

बोधसागर

( २४६ )

तुमहि कही अस बस्तु गुसाईं । मैं बूझों यह संशय जाईं ॥ तुम्हरी दया आज जो पाऊं । तौ सब बालक लोक पठाऊं ॥

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहि समुझाईं । बिना नाम नहीं लोक पठाईं ॥ नाँद बिन्दकै बालक दोईं । बिना नाम कोई मुक्ति न होईं ॥ के तौ पढ़ै गुणै औ गावै । बिना नाम भव भटका खावै ॥ हमरे माया मोह न होईं । सब संसार सत्य कर सोईं ॥ धर्मदास तुम बड़े हो ज्ञानी । यह संशय कस मन मँहै आनी ॥ गुरु को भार सबन कर होईं । तुम मनमें पछताव न कोई ॥ तारन तरन सत्य हम सोईं । बिन सतगुरु बूझा सब कोई ॥ सतगुरु तौ सब सृष्टि उबारा । तुम बालक अब कौन है भारा ॥ तुम जिन चिन्तामन मँहै करहूँ । सद्गुरु नाम हृदय मँहै धरहूँ ॥ एक काल आवे जब भाईं । सबै सृष्टि यह लोक सिधाईं ॥ जहाँ लग जीव जन्तु सब कहिये । तहाँ लग सब सद्गुरु मँहै लहिये ॥ सबै भार सद्गुरुके काँधे । पार लगावहि यम नहीं बाँधे ॥ यमका अमल छूट जब जाईं । सद्गुरु शरण जीव जब आईं ॥

साखी—कहे कबीर बिचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।

अमरमूल जो जान है, ताको सब परकाश ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनवै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिनती मोरी ॥ तुम्हरे कहे जगत तर जाईं । कौन मतासों लोक सिधाईं ॥ ज्ञान दिव्य जो घट नहीं होईं । सोइ कवन बिधि लोकसमोईं ॥ तब मैं जानो ज्ञान तुम्हारा । सकल सृष्टिको होय उबारा ॥

( २४६ )

अमरमूल

कहै कबीर तबै समुझाई । यह संशय तुम कवन कराई ॥ तुम तो आपन हंस उबारो । जीवन शोच कहा निर्धारी ॥ सतगुरु लीन्ह जगतको भारा । तेई करि है सृष्टि उबारा ॥ जापर गुरु चितवैं चितलाई । ताकर हंस बिगोय न जाई ॥ जब यह सृष्टि कीन्ह परकाशा । हंस अनंत सतलोक निवासा ॥ अबहुँ अनंत लोक कहैं जाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥ तुमको संशय कछु न भाई । आपन हंस करौ मुक्तार्ई ॥

साखी—सतगुरु तारनहार हैं, कहैं कबीर बिचार । तुम क्या शंका करत हो, आपन करौ उबार ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास विनवै कर जोरी । बिनती साहिब सुनिये मोरी ॥ तुम शिर आहि जत्तको भारा । सब जीवन को करौ उबारा ॥ हमको नाहिं गुरुवाई दीजे । आपन भार आप शिर लीजे ॥

सद्गुरु वचन

तब सतगुरु अस वचन उचारा । तुम कहैं दीन्ह जत्तको भारा ॥ तुम्हरे मुहर चले संसारा । अक्षर अक्षर करै पुकारा ॥ तुम्हरे कहे खोज जो करई । अक्षर पाय हंस निस्तरई ॥ जो नहिं मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहैं यमके द्वारा ॥ धर्मदास बिनती अनुसारि । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ तुम तो सत्य लोकके वासी । किहिं कारन आये अविनासी ॥ मृत्यु लोक मैं कवनै काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥ तहैंवां कवन काज पगुधारा । सो मोहिं स्वामी कहौ बिचारा ॥ तुम साहब सत पुरुष कहाए । मृत्यु लोक में काहे आए ॥

बोधसागर

( २४७ )

सद्गुरु वचन

तब साहिब बोले बिहसाई । अब यह ज्ञान सुनौ मन लाई॥ जब नहिं हते शून्य बे शून्या । तब नहिं हते पाप औ पुन्या॥ तब नहिं धरती गगन अकाशा । मेरे मन्दर नाहीं कैलाशा ॥ तब नहिं चन्द्र सूर्य औतारा । तब नहिं शेष सकलविस्तारा॥ तब नहिं इन्द्र कुबेर समोई । वायु वरुण तहैंवां नहिं कोई ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहिं कालकी छाहीं॥ तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि भवानी गौरि गणेशा॥ आदि पुरुष तब हते अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥ आप पुरुष अस कीन्हौ साजा । शब्दहि माहि लोक उपराजा॥ प्रथमहि शब्द सुरत अनुसारा । तेहि पीछे सब द्रौप सवौरा ॥ तेहि पीछे पुन मूल बनावा । तेहि पीछे सोहं उपजावा ॥ ता पीछे अचिन्त जो कीन्हा । ते पीछे अक्षर रच लीन्हा ॥ ता पीछे कूर्महि निर्मयऊ । ताहि भार पृथ्वीको दयऊ ॥ तब जल रंग सूरत इस भाखा । सप्त पातालके नीचे राखा ॥ जिह्वितै भयो जलको विस्तारा । सकल सृष्टि कौ भयो पसारा॥ तिहि तैं तेज तत्त्व अनुसार । जेहिं गुण तैं काल औतारा ॥ पांच तत्त्वतैं सब निर्मावा । तीनों गुण तिहि माहि समावा॥ तीनों गुण स्वरूपके धामा । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर नामा ॥ रज गुण तैं ब्रह्मा उत्पानी । सतगुरु भाव विष्णु कर जानी॥ तमगुण शिव संहार पसारा । इतने भयो सकल संसारा ॥ तेजके गुणहि काल उत्पानी । तासों भये जीव दुखदानी ॥ तातैं पुरुष दया चित आई । हंसन कारण मोहिं पठाई ॥ यातैं मृत्यु लोकहि आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥ तुम जीवनकैं बन्द बुझाये । सुमरन सत्य नाम समुझाये ॥

( २४८ )

अमरमूल

तुम्हरे हाथ सृष्टि तरजाई । सार शब्द हम तुम्हें लखाई ॥ या कारण संसारहिं आये । नाम पान सों हंस बचाये ॥ जो तुम कहौ कहा अस कीन्हा । आज्ञा मान पुरुषकी लीना ॥ पुरुष शब्द ते जीव उबारा । तुम कहैं कवन बात कर भारा ॥ यह चरित्र कछु कहा न जाई । अचरज खेल पुरुष निर्माई ॥ आपहि पुरुष आपही काला । आपहि काल कीन्ह बे हाला ॥ आपहि सकल सृष्टि निर्माई । आपहि न्याय करै सब कोई ॥ आपहि कर्म कुकर्म बखानै । आपहि आपन आप पहिचानै ॥ यही ज्ञान धर्मन सुन लेहू । इत उन चित जप मत देहू ॥ जिमि बालक मंदिरहिं सवोंरा । आपहि भेट आपहि हारा ॥ माता सों तब रुदन कराई । मंदिर अब मम देहु बनाई ॥ एही खेल बिधाता कीन्हा । यही मता कोई बिरिले चीन्हा ॥ धर्मदास तुम सत्यहिं मानौ । हमरौ बचन झूठ जिन जानौ ॥ यह चरित्र मैं तुम्हें सुनावा । लीला पुरुष केर समुझावा ॥ आपहि पुरुष आपहि नारी । आपहि काम विषय अधिकारी ॥ आपहि सृष्टि कीन्ह उतपानी । आपहि कर्म धर्म लपटानी ॥ कर्म भर्म आपहि उपजाई । आपहि स्तुति कीन्ह बड़ाई ॥ आपहि निंदक आपहि ज्ञानी । आपहि धर्म अधर्म बखानी ॥ आपहि अपनी स्तुति करई । आपहि मूर्ख चतुरता धरई ॥ आप कुलीन आपहि अकुलीना । आप धनाढ्य आपही दीना ॥ सतकुल आपहि असत बनाया । आपहि सत्य असत्य समाया ॥ यह तौ भेद पाय है सोई । सतगुरु मिले जाहि कहिं होई ॥ येही भेद धर्मनि लेव जानी । निर्मल जलगंगा सम मानी ॥ यहै ज्ञान मैं तुम्हें सुनावा । बिरला जन बूझै यह भावा ॥ यही बात गुप्त तुम राखहु । हमरी बात अंत जिन भाखहु ॥

बोधसागर

( २४९ )

जो कोई शब्दका खोजी होई । ता कहँ भेद बतावहु सोई ॥ इक मन इक चिन जाकर होई । ना कह ज्ञान न भापहु सोई ॥ दुतिया मन जाही कर भाई । तासों राखो भेद छिपाई ॥ जो गुरु सों कोई अन्तर राखा । धर्मराय सुगदर सोइ चाखा ॥

साखी-गुरुकी महिमा अगम है, अकह कही नहिं जाय ।

गुरु पद रज हियमें धरै, सत्यलोक कहँ जाय ॥

चौपाई

सत्यलोक सतगुरुकौ बासा । ब्रह्म कीन्ह गुरु मांहि निवासा ॥ गुरुके चरण रहै लवलार्ई । ताकी महिमा वर्णि न जाई ॥ गुरु औ शब्द एक कर जाना । ताकी त्रास धर्म भय माना ॥ जो कोई यह भेद न जानै । धर्मराय ता कहँ सन्मानै ॥ आतम ज्ञान जाहि कहँ होई । ताकौ काल न चापै कोई ॥ ऐसी धरण धरौ धर्मदासू । भवसागर तैं होउ उदासू ॥ सकल पसारा शून्य समाना । शून्यहि माहीं शब्द बखाना ॥ शून्य शिखरकी डोरी पावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनौ गुसाई । आतम ज्ञान गम्य नहिं पाई ॥ आतम ज्ञान मोहि समुझाऊ । जासों सकल हंस मुक्ताऊ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास यह मता अपारा । ताकर जो मैं कहौ विचारा ॥ तब साहिब दया चितलाई । आतम ज्ञान तुम्हैं समुझाई ॥ गम्य अगम्य ज्ञान जब पावे । आतम ज्ञान तब घटहि समावे ॥ सत्य शब्द जब रहै समाई । सबही ठाम लोक है भाई ॥ शत्रु मित्र एकहि कर जाना । सांच झूठ एकहि कर माना ॥ सांच झूठ दोनों मिट गयऊ । दिव्य ज्ञान जाके घट भयऊ ॥

( २५० )

अमरमूल

आपहि गुरु आपही शिष्या । आपहि पाय आपही दिरुखा ॥ आपहि आप लगावे लेखा । आपहि न्यापे अगम अलेखा ॥ आपहि स्वर्ग नर्क भर्मावै । आप ज्ञानि हिय मुक्ति समावै ॥ आपहि दाता आपहि भुक्ता । आपहि अकृत आपही कृत्ता ॥ आपहि जन्म मरण उपजावै । आप मृत्यु है लोग रुवावै ॥ आपहि जिन्दा जग उपजावा । आपहि आशा तृष्णा लावा ॥ आपहि आप धर्म है काला । दोहू दीन ज्ञान तब चाला ॥ आपहि कुलअरु आपहि जाती । आपहि मूरत, आपहि पाती ॥ आपहि डाल आपही बेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥

सार्वी-कहैं कबीर विचारके, आपहि सकल पसार । आप आप महँ रम रहै, आपहि सत्य अधार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहैं सुनौ गुसाई । यहै भेद तुम मोहि सुनाई ॥ ऐसा शब्द जो मोहि सुनावा । जन्म मरणकी त्रास मिटावा ॥ एक वचन मैं बूझौ साई । सोइ शब्द तुम मोहि सुनाई ॥ तुम जो कहेऊ ब्रह्म समाना । जीवरूप किमि होय अज्ञाना ॥ कबहुँ अज्ञान रूप है बतैं । ज्ञानी होय ज्ञान पुनि कतैं ॥ कबहुँ कहै यह ब्रह्म समाना । कहूँ राजा कहूँ भिक्षुक जाना ॥ कबहुँ जीव स्वभाव उपजावै । कबहुँ ब्रह्महो सबहि बुझावै ॥ ब्रह्म एक काहै अस कीन्हौ । साहिब मोहि बतावहु चीन्हौ ॥ कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह सब भेद कहौ तुम पासू ॥

सद्गुरु वचन

ब्रह्म रूप है बीज समाना । पारब्रह्म अंकुर प्रमाना ॥ ताही माहि पत्र दोय कीन्हा । एक शक्ति एके सब चीन्हा ॥ डार पात तब प्रकृति समाना । मूलवृक्ष ईश्वर सम जाना ॥

बोधसागर

( २५१ )

ता मई पांच डार निर्मावा । आकाशादि तेज उपजावा ॥ प्रथमहि वायु रूप जो कीन्हा । वायुके मध्य तेज धर दीन्हा ॥ तेजके मध्य नीर निर्माया । जैसे बीजसे वृक्ष जमाया ॥ ऐसे उत्पति सबकी होई । धोकामें सब गये बिगोई ॥ सद्गुरु जा कहँ दाया कीन्हा । सकल भेद ते पावैं चीन्हा ॥ तत्त्व मांहि निहतत्त्व लखावै । हृद मांहि अनहृद कहँ पावै ॥ अनर्थ मेटके अर्थ बतावै । लघु दीरघ पूरा समझावै ॥ पूर्णज्ञान जाही घट होई । सतगुरु भेदको पावै सोई ॥ ब्रह्मज्ञान बिन मुक्ति न होई । कैसे संत कहावै सोई ॥ जाकी महिमा कही न जाई । ज्ञान गम्य तैं शब्दहि पाई ॥ शब्द सार निर्मोलक पावैं । सो हंसा सतलोक सिधावैं ॥

सारखी-सो पहुँचे सतलोक कहँ, काल मर्म नहि जान । ते हंसा अवरन भये, सत्यपुरुषके ध्यान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहै सुनौ गुसाई । आप अपन पर सब बिसराई ॥ सतगुरु जापै दाया कीन्हा । तिन पायोनिजबिजको चीन्हा ॥ सूक्ष्म रूप परश जन आवै । लघुता विलै दीर्घ पद पावै ॥ लघुता मति प्रभु आवस कैसे । समझ परै घट कहिये तैसे ॥

सद्गुरु वचन

कहँ कबीर सुन सुकृती बानी । यह घट समझ लेहु सहिदानी ॥ सूक्ष्म रूप शब्द कर आही । सतगुरुमिलहिं लखावहिंताही ॥ सूरत नित जब शब्द समाना । अहंकार मन केर बिलाना ॥ दीन भाव गति तबही आई । सब घट आतम एक समाई ॥ पूर्ण ज्ञान जाहि घट होई । तब यह भेद पाय है सोई ॥ ज्ञानी महिमा एही जाना । सब घट आतम एक समाना ॥ सो हंसा सतलोक सिधावे । दुबिधा भाव सबै बिसरावे ॥