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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानस्थितिबोध

( १०९ )

साखी—यह गुन ज्ञानस्थितिके, जीव जीव तन आव ॥ कहे कबीर धर्मदास सों, अर्ध ऊर्ध्व संभाय ॥

सम्पूर्ण स्मरण—चौपाई

भाषों जो प्रभु अमृत कीन्हैं । जेहि विधि अमृत सिरजेलीन्हैं॥ धर्मदास यह कहों बुझाई । जेहि विधि अमृत कीन्ह बनाई॥ आपहि आप अधर जो आवा । अमृत वही कर्म जो पावा ॥ कर्म जाय रीति जेहि बैठ। धर्म सहितसों कीन्हों पैठा ॥ सहज निरंजन भेद बतावा । भाषो भेद बरण सब पावा ॥ धर्मराय कूर्महिपर आए । कूर्मनाथ जहाँ अग्र रहाए ॥ मस्तक काटिय पेट विदारा । कूर्म दुखित भए शक्ति निसारा ॥ प्रकट समुद्र तभीसों भयऊ । जबही पेट विदारि लयेऊ ॥ अमृत धर्मराय कछु पावा । कछु गिरपरा समुद्र समावा ॥ अमृत विष्णु तबही जो लीन्हा । जबही मथन समुद्रहि कीन्हा ॥ अमृत तबहि निरंजन पावा । सोई अग्र सुकृतहि समावा ॥ धर्मशील काट्यो है तबही । विषम सरोवर उपजो जबही ॥ धर्मराय अमृत जो पावा । तेहि कारणसों अलख कहावा ॥ अग्र शीश कूर्मके पाई । ब्रह्मा विष्णु तबै उपजाई ॥ जीव जंतु पृथ्वी उपजावा । यह बल विष्णु राजसों पावा ॥ इंद्र जाय तब सेवा करहीं । भांति भांतिके सुख अनुसरहीं॥ तृप्त कीन्ह देवन सब अंगा । विष्णु दया कीन्ही परसंगा ॥

साखी—सूक्ष्म इंद्र दया करी, इंद्र साजि विस्तार ।

ब्रह्मा विष्णु महेश मिलि, कीन्हों सकल पसार ॥

चौपाई

धर्मदास जो बिनती लावा । गुरुड़ अमृत केहि कारण पावा ॥

सतगुरु वचन

पूर्व कथा अब कहों बखानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥

( ११० )

बोधसागर

नागहि लोक इंद्र जो गयऊ । सुधा हेतु कारज तेहि ठयऊ ॥ डारेउ नाग फाँसते तबहीं । कौन छुड़ावे याते अबहीं ॥ नागदेवके मात रहीया । गरुड मातसोंहीं छल करिया ॥ माथे लीन्ह गरुड़की जीती । छलसों भई दयाकी रीती ॥ गरुड़ मात कहि वचन सुनाई । दासी भाव कहां तुम पाई ॥ तब उठि माता वचन उचारा । सुनो पुत्र एक भेद हमारा ॥ नाग मात मोहि वचन हरावा । यातें दासी भाव रहावा ॥ पीतबरण शशि हम कहि सोई । श्याम बरण उन करो विलोई ॥ यह छल जानि परा नहीं मोही । सुनो तात समुझावों तोही ॥ कोपि गरुड तब गये पताला । नागलोक जहाँ विषकी ज्वाला ॥ देखत गरुड नाग सब भागे । मातासो छल कीन्ह अभागे ॥ माँगो सो हम तुम कह देही । हम कहैं त्रास देव जिन एही ॥ गरुड अहिन तब वचन उचारा । अमृतकुण्ड देव सब धारा ॥ नाग आइ तब कीन्ह निहोरी । गरुड इंद्रकी बंधन छोरी ॥ अमृत लेइ दर्शनको गयऊ । नाग गरुड पहुँचावत भयऊ ॥ गरुड मात नाग जब देखा । दासहि भाव तजब तुम रेखा ॥ अमृत पाइ गरुड बरियाना । तब छल इंद्र गरुसों ठाना ॥ गरुड महाबल सुख लहलीन्हां । बोई बंबूर अमृत किमि चीन्हां ॥ ज्यों मलयागिरि निकट रहावा । तास्वरूप काहू नहीं पावा ॥ कूर्म उदरसे सो चलि आवा । सुधा समुद्र मथे तब पावा ॥ गुरु द्रोहसों जन्म बिगोई । नाम पाइ अस्थिर नहीं होई ॥ चंचरीक चंचल है बहई । मलयागिरिकी सुगँध न लहई ॥ मलयागिरिको यहि प्रकाशू । विष नहीं बेधे वास सुबासू ॥

साखी—मलयागिरिके वाससे, सब दुम होइ सुवास ।

बासन कबहुँ बेधही, सदा रहत है पास ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १११ )

तबहि सुकृत बिनवे करजोरी । कृपासिंधु सुनि बिनती मोरी ॥ प्रथम तत्त्व प्रभु भाषव तुमहीं । सो सब बूझ पुरैगी हमहीं ॥ पाँच प्रगट गुप्त हैं पाचा । प्रगट समझि लीन्हें हम साँचा ॥ पाँच गुप्तको कहिये लेखा । पाँच प्रगट ये सब हम देखा ॥ पृथ्वि तेज जल पवन अकाशा । सो प्रभु मोहि कहो परकाशा ॥ जिहिं विधि ए प्रभु प्रगटे आई । सो प्रभु भाव कहेउ समझाई ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम जो कछु बूझा । सो सब भिन्न २ हम सूझा ॥ पृथ्वी रही गुप्तके नेहा । बहुरि प्रकट हुये शब्द सनेहा ॥ पृथ्वी अंग वैराटहि जानी । पाँव पताल शीस अनुमानी ॥ इच्छा सुरति शक्ति उपजाई । वैराट रूपमें जाय मिलाई ॥ अलख निरंजन यासों कहिये । यहीरूयाल अविगतको लहिये ॥ मन माया जब एके भयऊ । सकल सृष्टि उत्पन्नै लयऊ ॥

साखी-जब दोई एके भये, भयो लीन मन ठौर ।

नाभिकमल ब्रह्मा भए, सब रचनाको मौर ॥

चौपाई

धर्मदास अब कहों बखानी । तुम हिरदै कीजो बिलछानी ॥ पाँच तत्त्व जे गुप्त रहावा । सो सब भेद तोहि समझावा ॥ पाँचहि अमी पुरुषने कीन्हों । पाँच तत्त्व ताही सो चीन्हों ॥ अचल अमी जो अकाश बखानी । शब्द अमी वायु उत्पानी ॥ अजर अमी सो तेज पसारा । अकह अमी जलतत्त्व सम्हारा ॥ रंग अमी सो पृथ्वी भयऊ । रचना सब याही पय ठयऊ ॥ पाँचों अमृत तहँवा छाजै । पाँचतत्त्व तासों उपराजै ॥ पाँच तत्त्व सों देह सँवारी । तीनों गुण तामें अनुसारी ॥

( ११२ )

बोधसागर

देही गति काहू नहिं पावा । देह धरै यम काम सतावा ॥ आतमरूप रंग जिन जाना । प्रफुलित होय कमल विकसाना ॥ हर्षित भयउ बुन्द जो ठारा । परै अगाध सिंधु मझधारा ॥ परतहि बुंद रंग सब छाजा । जलतरंग जल रंग विराजा ॥

सारखी—यह गुण ज्ञानस्थितिहिके, जलतरंग उपजाइ ।

जलसों सब जग ऊपजो, जलधौं कहा समाइ ॥

चौपाई

नाम तत्त्वजल तत्त्वहि कीन्हा । अस्तुति जलहि रंगकर लीन्हा ॥ जल ऊपरहि कूर्म उपराजा । कूर्मपीठि वाराह विराजा ॥ पीठ वराह शेष जो रहई । शेषहि फनपर पृथ्वी धरई ॥ कूर्म सुरति पुरुषकी अहई । उनको अंश कूर्म इह लहई ॥ महापुरुष आसन जहाँ आई । स्वासा शब्द पुरुष उपजाई ॥ बहुरि तेज पुरुष परकाशा । सुरके घर हो तेज निवासा ॥ आनंद रूप लोचन जब कहे । तेज हर्षपर घट हो चहे ॥ हरष तेज सूर्य उतपानी । सो सब जगमें कीन्ह पयानी ॥ तेज अंग सूर्य कर रूपा । शीतलता शशिके रसरूपा ॥ या विधि दो अंश उतपानी । धर्मदास लीजो बिलछानी ॥ अंग सूर्य शशि लयो बनाई । तेज हर्ष गुण उभय बताई ॥

सारखी—कूर्म उदरसों प्रगट है, रहे जगतमें छाय ।

बिन सतगुरु नहिं पावही, कहे कबीर समझाय ॥

चौपाई

जो अज्ञान ज्ञान नहिं जाना । तासों भेद न कहब सुजाना ॥ बहे बाये मन थिर नहिं जेही । सार शब्द कहा करै सनेही ॥ स्वासासार पुरुष उपजाई । सुरहो थासहि समसर छाई ॥ समसर भेद जानि नहिं कोई । अग्र थास तेहि कहिए सोई ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ११३ )

वहे गुप्त यह प्रकट बताई । यामें फर्क न जानहु भाई ॥ समसर पवन है सकल सुगंधा । ता बिन जगत आय सब धंधा ॥ गंध विगंध रची यह देही । समसर पवन सुगंध सनेही ॥ समसर अंग अग्रको आहे । समसर गहे पुरुषको लाहै ॥ अग्ररंग बाँए उपराजा । उनसों होत रंगको साजा ॥ रंग रेख सब उनसों होई । मृतकर रंग डार उन खोई ॥ रंग बाँएसे हरियल कीन्ह । हरियल रंग जात सब लीन्ह ॥ जीव जन्तु औ कीट पतङ्गा । दुम औ बेली सबके सङ्ग ॥ घास पात जिव सकल बिहङ्ग । हरियल राखो सबके अङ्ग ॥

सारखी-यह नहिं होतो जगतमें, मरत सकल कुम्हलाय ।

ज्ञानहि अस्थित पुरुषकी, कहै कबीर समुझाय ॥

चौपाई

एहि वायु हरियर जो कही । हरियर वायु तुहांसों सही ॥ अकाशमंदिरमें कीन्ह निवासा । जेहि मंडलते उपजी खासा ॥ याविधि उपजन भौ सब ठौरा । संसारी भेद कहां कहु औरा ॥ कालफंद फाँसी बड़ डारी । तासों परै न वस्तु विचारी ॥ जब स्वासा साहँहि उठाई । मूल दीक्षा प्रथम कहाई ॥ जब बालकको दीक्षा दीजे । बीरा देकर अस्थित कीजे ॥ सार नाम तब देव लखाई । जरा मरण सुस्थित घरपाई ॥ जो निज करै नाममें बासा । जासो स्वासा नाम प्रकाशा ॥ बिना नाम कालकी फाँसी । दीक्षा मूल यही परकाशी ॥

सारखी-मूल दीक्षा संग इह, लेहु संत चित लाय ।

धन्य भाग्य वा हंसके, नाम संधि जो पाय ॥

बिना शब्द संधी बिना, काहु न पाई बास ।

संधि नाम हंसा गहै, करै काल नहिं त्रास ॥

( ११४ )

बोधसागर

सत्य सुकृतकी रहनि रहि, गंह अर्जमन नाम । कहै कबीर धर्मदाससों, सत्य शब्द परमान ॥ सत्य सुकृत लों मेंड़ है, ग्यान ध्यान धर धीर । शब्द अजानन है वही, सोई संत कबीर ॥ अजर अमर वह पुरुष है, सत्यनाम बैधि छोर । कहे कबीर धर्मदाससों, थाह शब्द शिरमोर ॥

चौपाई

अब मैं कहौ अकाश बिचारा । जिहिबिधि भयव तासु विस्तारा ॥ अकाश अंड मध्य जो रहेऊ । अकाश भेद बिरले जन रहेऊ ॥ अकाश अंग सो सब निर्मावा । शून्य मंदिरतें नाभी आवा ॥ पृथिव अकाश योग अब कीन्हौ । शब्द हेतु काहु बिरले चीन्हा ॥ तालमृदंग अकाशते होई । रहित शब्द पुनि सुनी समोई ॥ अकाशबीच असहोय गुजारा । बिना मृदंग शब्द झनकारा ॥ अकाश पेट अकाशहि चीन्हा । सुरति सुनी आकाशहि दीन्हा ॥

सखी—कहै कबीर अकाशगुण, बूझत बिरला कोय । लीलारंग अकाशका, सुनिनो सत्य बिलोय ॥

चौपाई

जो मंदिर अकाश नहि देखे । तबलगि शब्द रहत अनपेखे ॥ पाँच अकाश तबै लखिपाई । जबै मंत्र गायत्री आई ॥

सारखी—भेदाकाश गुण अधरहै, ज्यों लखि पावै कोइ ॥ नहिं अक्षर लखि आवही; पहुँचे निज सोइ ॥

मंत्र गायत्री

धर्मदास विनवे करजोरी । भाषों शब्द गायत्री डोरी ॥ भेद गायत्री बालकको दीजे । प्रेम सुफल बालकको कीजे ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ११५ )

यापर कीरत कैसे जाई । प्रकृति अंग मायाको भाई ॥ माया अंग अष्टांगी कीन्हौं । अष्टांगी गायत्री चीन्हौं ॥ यह शब्द हम कहो बुझाई । लीजो संतो शिरहिं चढ़ाई ॥ बारा योजन बुड़े जाइत्री । पल पल छूटे इहीठों गायत्री ॥ भ्रमनाको आगो यह टूटे । ब्रह्म कथौ हिरदय रस लूटे ॥ जार बार कालहिकर छीरा । करकर निर्मल अंग शरीरा ॥ बास अमरपुर शब्द संधाना । कहै कबीर काल पछिताना ॥

सम्पूर्ण

न्यास

रक्षा प्रथम न्यास जो करई । सुर गंधर्व न्याससों डरई ॥ कालजाल निज बंदन होई । निर्मल रहै काल कहैं खोई ॥ भूतहि प्रेत वीर वेताला । वायु बतास और सैताला ॥ साठ तीनसौ ऊखत कहिये । हगन्यास कर एक न रहिये ॥

साखी—यह गुन हग अन्यासके, कहै कबीर बखानि ॥ प्रथम रक्ष या कह पढे, बढ़ि हितचित्त पहिचानि ॥

चौपाई

दुष्टनको बंधन है येही । हंस मुक्त मन मुक्ति सनेही ॥ हगन्यास प्रथम जो पढ़ई । तब रक्षा मन शब्दहि दृढ़ई ॥ हगन्यास बालकको चाही । संशै अंश रहित हो ताही ॥ यही शब्द मैं कहों बखानी । यही भेद बिरले पहिचानी ॥

साखी—उत्तम मध्यम अधम जो, सबहि करै निर्वाह ॥ हगन्यासके यह गुण, कुशल क्षेम प्रवाह ॥

धर्मदान वचन

धर्मदास बिनती उठि कीन्हा । पुरुषहि भेदसकल हम चीन्हा ॥ निश दिन चरण चित्त तव धरहूँ । अन्य उपाय सबै परिहरहूँ ॥

( ११६ )

बोधसागर

येहि वचन प्रभु कहो बुझाई । जाते काल दंड दुख जाई ॥ इंडुमती कह काल सतावा । रहि सचेत शब्द लखि पावा ॥ सो मोहि भेद बतावहु स्वामी । करहु कृपा गुरु अन्तयार्मी ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भल पूछन कीन्हौ । सो अब भेद तोहिकहि दीन्हौ ॥ रानी काल कीन्ह जब त्रासा । तब हम शब्द कीन्ह परकाशा ॥ साधु संत सेवा चित धरहीं । भक्ति प्रेमबहु बिधि सों करहीं ॥ हमहिं छोड़ि नहि जाने दूजा । कुलकरनीकीं छोड़े पूजा ॥ तजि कुल करनि अमरपदपावा । येही सात नाम चित लावा ॥ तोसों शब्द विरहुली भाखी । तव कारण हिरदेमें राखी ॥ येही शब्द लेहु शिर मानी । मनसा वाचा निश्चय जानी ॥

विरहुली

आदि अन्त तब न हते विरहुली । भूमि अकाशहु न हते विरहुली ॥ तब विष नहि अवतार विरहुली । विषकीकयारितुमबाहिबिरहुली ॥ बिषका कीन्ह अहार विरहुली । सवा लक्ष पर्वत थे विरहुली ॥ तहाँ विषको अवतार विरहुली । गड़िगड़िशंकर बोह विरहुली ॥ पर्वति डारेउ पानि विरहुली । सोविष संतहि खाइ विरहुली ॥ विष माटि होय जाय विरहुली । मउरी संसय करिय विरहुली ॥ आफूयों हरतार विरहुली । सबसों शब्द निरंत विरहुली ॥ भागु विषपैठि पताल विरहुली । बनहि कंदविषविकल विरहुली ॥ पोस्त धतूरा भाँग विरहुली । गुरु वचन धरि बाँध विरहुली ॥ विष न संचरे अंग विरहुली । उदमदविष मदराज विरहुली ॥ यह विष बिरलैसम्हारबिरहुली । जब नहि स्वर्ग पताल विरहुली ॥ तबविष नहि अवतारबिरहुली । दूत भूत सब भगे विरहुली ॥ जहाँ बसे साधू संग विरहुली । भोगा कीयो तैं कहां विरहुली ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ११७ )

कहाँ ये डसवत आये बिरहुली । सास्वी नामकी चले बिरहुली ॥ सब दुख तुरत नशाये बिरहुली । नामकी कहाउतपाति बिरहुली॥ सबहि तुच्छ कह जाय बिरहुली । वचनादिके अकार बिरहुली ॥ मन विष दूर पराय बिरहुली । तनसों दूर है जाय बिरहुली ॥ शब्दमुनत विष जाय बिरहुली । हरि प्रकटै संसार बिरहुली ॥ साहिब कीयो संसार बिरहुली । दूत भूत सब हारि बिरहुली ॥ पहुँचे सत्य कबीर बिरहुली । भई यम जिय पीर बिरहुली ॥ इन तन विषन समाय बिरहुली । उत्तर रानी पाय बिरहुली ॥ उठिके आसन दीन्ह बिरहुली । विरहुली दुःख नशाय बिरहुली॥ वार वार शिरनाय बिरहुली । कबीर गुण गाय बिरहुली ॥

बिरहुली संपूर्ण

धर्मदास वचन

धर्मदास फिर विनती करहीं । सतगुरु चरण शीश पर धरहीं॥ अब प्रभु कहिए लोक सुरूपा । दीन दयाल कृपाल अन्नापा ॥

सदगुरु वचन

धर्मदास मैं कहाँ बुझाई । विना भेद लोके नहीं जाई ॥ अंधी सुरति शब्द बिन जानौ । लोक दीप कैसे पहिचानौ ॥ शब्द पाय जब सुस्थिर होई । थान मुकाम लखै पुनि सोई ॥ जो लखि पावै थान मुकामा । सुरति चले तब पावै नामा ॥ विना नाम नहीं ठौर ठिकाना । अंध सुरति हो रहे ठगाना ॥ सोहंगत सब छहौं बखानी । एक चित्त है गहे जु प्रानी ॥ पुहुप दीप सब दीप निवासा । छब्बिस दीप रचौ तेहि पासां ॥ कंचन दीप पाहु पर सोहै । रत्न अन्नाप कोटि रवि मोहै ॥ तहां पुरुष पर कीर्ति विराजै । उत्पति प्रलय तेहिपर छाजै ॥ लीलगर दीप पुरुषको वासा । जहां पहुँचे न कालकी त्रासा ॥

( ११८ )

बोधसागर

कालहि गमी वहाँ नहिं आवै । सहज पुरुष जहाँ बैठि रहावै ॥ विनती सहज कीन्ह कर जोरी । जीवन बंध वेगि प्रभु छोरी ॥ बीज शब्दमें सोहं वीरा । यह उत्पति गुरु कहै कबीरा ॥ यहाँ गमी कोऊ नहिं पावै । जहाँ लीलगर द्रौप रहावै ॥ तहाँ सुजन जन बैठे ज्ञानी । सत्य सुकृत दोई अगवानी ॥ अब मैं कहौं दीपकर लेखा । जाविधि रचिव रंग औ रेखा ॥ बीज शब्दमें सोहं बीरा । ये उत्पन्न सुन धरौं शरीरा ॥ जगमगज्योति सदा उजियारा । शब्दरूप काया कर प्यारा ॥ शब्दहि हेत वचन है वोटा । रत्न शिला चहुँ दिशि है कोटा ॥ लोक नाम है लोक अनन्दा । उडगन महाँ सोहत जस चन्दा ॥ आस पास कंचनकी बारी । हीरा लाल रत्न अवतारी ॥ कहा कहीं मंदिर कर रेखा । खम्भा कंचनके आहि विशेषा ॥ सिंहासन अति तहाँ विराजै । कंचन जडित लाल बहु छाजै ॥ लगै कोटि वहुँ दिश रूपा । चन्द्र प्रकाश ही जान स्वरूपा ॥ तेतिस कोटि सूर्यकी पांती । बीच बीच देखो अस क्रांती ॥ तापर सोहत अधर अटारी । हीरा मोती बहुत सँवारी ॥ ता ऊपर शोभित कस रेखा । कोटि रत्न दमकत जनु लेखा ॥ मोतिक चौक पूर जनु डारी । शोभित चौक कलित विस्तारी ॥ ता ऊपर जु रंग अस सोहै । मानहु रत्न मणी मय होवै ॥ जगर मगर सोहै उजियारी । उपमा बरण सके को प्यारी ॥ बहुत हि उपमा को कह दीजे । कोटिन भाग सूर्य शशि कीजे ॥ पालँगरूप काकहिके बखानी । हीरा रतन बीच बिच खानी ॥ सेजरूप शोभित शशि खानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥ चन्द्र सूर्य नाहीं वह तारा । नाहिं रत्न कञ्चन महि भारा ॥

साखी-ज्ञानस्थितिके यह गुण, पुरुष रूप उजियार । पलमें इच्छाते भए, लोक दीप विस्तार ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( ११९ )

चौपाई

तहाँ पुरुषने सेज विछाई । चन्द्र सूर्य जहाँ रहे लजाई ॥ तिलभर सिज्याको परवाना । सोहें सुरति अभयपद ज्ञाना ॥ तहवाँ पुरुष करहिँ आनन्दा । जिनसों अमी भए सब छन्दा ॥ तहाको बरन कहे को भाई । लक्ष जीवसों नाहिँ कहाई ॥ अमर चीर सोहें अस अंगा । सूर्यमणीसों अधिक सुरंगा ॥ यही व्रत हंसनको भाई । पुरुष रूपको कहै बनाई ॥ शोभा कहो दोऊ कर पानी । चन्द्र सूर्यकी ज्योति छिपानी ॥ सर्व वरणको कहो बुझाई । उभे सूर्य मानो उमगाई ॥ दंत सुरंग शोभित अति भारी । मानो मणि बत्तीस विचारी ॥ बालरूप का कहों बखानी । चन्द्र किरण मानो लपटानी ॥ इक २ चरित वरणि नहि जाई । मानहु सुकृत सत्य उमगाई ॥ अधर नासिका सोहत कैसा । उभय हंस बिहरत है जैसा ॥

साखी-बरणन सबका याहको, मोसों कहो न जाय । उपमा केहिको, दीजिये, पटतर नाहि दिखाय ॥ सूर्य होय समुद्र भर, भू अकाश भरि चंद । तबहु न पटतर पाइये, पुरुष वदन आनंद ॥ राई भर वह वस्तु है, अधराई अस्थूल । लहर लहर घटमेंकरै, वही पुरुष निजमूल ॥ इह गुण ज्ञानस्थितिहिके, कहे कबीर समुझाइ । पुरुष ध्यान जबही करै, सब दुख जाय पराइ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास तब बिनती ठाना । दीन्हों मोहि मुक्ति फलदाना ॥ साहेब कहिए मोहि बखानी । सत्ताइस दीप कहो बिलछानी ॥ दीपनको कहिये मोहि लेखा । जामे परचे शब्द विवेका ॥

( १२० )

बोधसागर

धर्मदास जो पूछिब आई । सो अब कथा कहो समुझाई ॥ पुहुप द्रौप जहाँ पुरुष रहाई । अलोप दीप तासों कहि भाई ॥ आस पास है छविबस दीपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥ तीन दीपनको नाम बखानों । धर्मदास मनमें बिलछानों ॥ अजर द्रौप पुरुषके पास । कुसुम दीप सतगुरु निवासा ॥ अमरदीप सुजन जन जाना । सुमन द्रौप अब कहौ बखाना ॥ सहस्र नेत्र द्रौप सुनि लीजे । अलोक द्रौप सुनिके चितदीजे ॥ कंचन दीप बखानों आई । कंचन दीप सुनो चितलाई ॥ सुरजन द्रौप कहौ सम्भारा । अजर द्रौप निर्मल उजियारा ॥ हेत द्रौप सुनियो चितलाई । लवंग द्रौप द्रौप अति छाई ॥ अबहि निरक्षर कहिये द्रौपा । कमल द्रौप तहाँ पुरुष समीपा ॥ अंबु द्रौप बहुत उजियारा । सुरति द्रौप अब कहौ पसारा ॥ भिरत द्रौप सोही जन जानै । निग्रह द्रौप करै पहिचानै ॥ श्वेतद्रौप समझो हो ज्ञानी । निश्चित द्रौपमें जाय समानी ॥ सुस्थिर द्रौप चित जो राखा । कीरति द्रौपकरे अभिलाषा ॥ अकृत द्रौप आहि उजियारा । अक्ष द्रौप मह शब्द पसारा ॥ द्रौपचंद्र मन कहौ अनन्दा । पतंग द्रौप उमगै रवि चन्दा ॥ कुरअ द्रौप धर्मनि लघु जानी । सताइस द्रौपके नाम बखानी ॥

साखी-इतने द्रौपक गुम हैं, कोइ न जानत नांव ।

कहैं कबीर धर्म दाससों, सोई ठांव लखाव ॥

चौपाई

धर्मदास तुम सबै बिचारा । सार शब्द नाहिं अनुसारा ॥ जब लगि सार शब्द नाहिं होई । तौ जिय केता जन्म बिगोई ॥ काम कपाल भोज बसु नारी । सो साधू जिन नाम सँभारी ॥

ज्ञानस्थितिबाध

( १२१ )

इकोत्तरसे पुरुष तर जाई । इहि विधि रहन गहे चितलाई॥ नारि पराई चित मन देही । जन्म सात कुछी कर लेही ॥ नारि पराई अंग छुवावै । कशमल लगै तत्त्व घटि जावै॥ लाख वर्ष रहैं भूतकी खानी । भुगते नर्क घोर सो प्रानी ॥ बिना शब्द जो भुगवहि नारी । तो सब परै कालकी वारी ॥ बिना शब्द निरञ्जन लीन्हौं । ताते पुरुष माथ पुनि छीन्हौं॥ नर्कहिकी कहा बात जु कहिये । सुर नर सबै काम वश रहिये॥ धर्मदास सुनि लीजे हमसों । उत्पति सकल कही हम तुमसों॥ राजा युग घिर पास मैं गहिऊं । बालकरूप तहां पुनि रहिऊं ॥ घरन कुमार तासकी रानी । प्रीतभाव बहु सेवा ठानी ॥ पुत्र भाव उन हमकह जाना । कपट भाव नहिं तजौं निदाना॥ ज्ञान पुण्य वे बहुतहि करहीं । राज गुमान गर्व अति धरहीं ॥ शब्द हमार नहीं उन चीन्हौं । कुंजर देह जायसों लीन्हौं ॥ कनक सिंह तिनके सुत कहिये । राज तिलक उनके शिर रहिये॥ भाग्यवन्त भयेऊ बड़ राजा । पिता पीड करही सब साजा ॥ बहुतक दिवस तहां चलियऊं । एक दिवस कौतुक अस भयऊं॥ आधी रात बीति गइ जबही । राजा स्वप्न दीन्ह पुनि तबही ॥ कुंजर देह धरै तब आवा । कनक सिंह कहैं स्वप्न जनावा ॥ अहो पुत्र सुनु बचन हमारा । यहि घर आय तू सिरजनहारा॥ आतारूप उन्है जिनि जानो । सतगुरु आप लेव परमानो ॥ जब तुम भक्ति करो चितलाई । कुंजर देह छूटि मम जाई ॥ चटपट परत राति नियरानी । मीन करत जो पानी पानी ॥ प्रात आइ पद शीश लगाऊँ । हम नहिं चीन्ह तुम्हारा भाऊँ॥ चूक परी हमसे गुरु साई । मरम तुम्हार चीन्ह नहिं पाई ॥ आतारूप हम तुम कह जाना । तुम तो ब्रह्म आहु निरवाना ॥

( १२२ )

बोधसागर

पिता हमार कुंजरहि भयऊ । आधी रात खबर मोहि दयऊ॥ क्षमा अपराध कीजिये स्वामी । कृपा सिंधु हो अंतरयामी ॥ साहब दया करौ अति भारी । सकल जीव हैं शरण तुम्हारी॥ दाया करि दीजै वर सोई । जाते आवागमन न होई ॥ जिहिमो होय मोर निस्तारी । सो प्रभु करिहों तब बलिहारी॥ तब हम उनपर दाया कीन्ह । संधिक नाम उनहि कह दीन्ह॥ विधिपर भक्त कीन्ह चितलाई । धनकर मनकर तनकर भाई ॥ सतरहसै रानी परवाना । कर्मनि काहु कहा नहि माना ॥ कइक उहागिल हती जो रानी । सोउठि चली शब्द पहिचानी॥ सकल रूप कर चली सिंगारा । भक्ति हेत कारन पग धारा ॥ लीलावती नाम तिहि केरा । सो हम जीवन कीन्ह उबेरा ॥ सोरह रानी सत्रहों राजा । पहुँचे लोकहि पुरुष समाजा ॥ सोई कथा कुंजर में आई । धर्मदास परखो चित लाई ॥

साखी--यह गुन ज्ञान स्थितिहिके, सेव शब्द निजसार । या विधि हंस करनी करै, उत्तै भवजल पार ॥

सजेको शब्द

साखी--अक्षय नामके सेजपर, हंसा पारस दीन्ह । कालमें यम लूटिके, हंस आपन कर लीन्ह ॥ अक्षय सुख सेज आदी बानी । जापर हंसा पारस आनी ॥

साखी--जो हंसा पारस परसि, कहे कवीर सत बोल । ताकहँ चोर डहके नहीं, युग २ आहि अमोल ॥ ते हंसागये अमर लोककहँ, अक्षय अंक हमपारसलीन्ह । कहै कवीर सतलोक बैठकर, जीमें चीन्होती दीन्ह ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

धर्मदास चित सेवा ठाने । दोइ कर जोरि चरण लपटाने ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२३ )

कठिन वेद साहेब तुम कहेऊ । जीवन मर्म न काहू लहेऊ ॥ ब्रह्मा विष्णु शंकर मिलि भाई । अलख निरंजन ध्यान लगाई॥ सुर नर मुनिकी कौन चलावै । पच्च २ मरै पार नहिं पावै ॥ तवन भेद साहेब मोहि दीन्हौ । हंस उबारि लोक कहैं लीन्हौ ॥ अब प्रभु मोही कृतारथ कीजै । लोक दिखाय दरस प्रभु दीजै॥ यही देहसों लोक दिखावो । हे दयाल मम तृषा बुझावो ॥ चित चकोर तब होइ अनंदा । दिखे अघाइ लोक सुठि चंदा ॥

साखी-धर्मदास विनती करै साहब सुनो चितलाय ।

जबही मम संतोष होई, पुरुष दर्श दिखाइ ॥

चौपाई

सद्गुरु वचन

तब साहेब कहि बचन प्रमाना । धर्मदास तुम मन पतियाना ॥ तुम जग पंथ चलावहु जाई । हमकह चिह्न पुरुषकह पाई ॥ हमहि पुरुष कहु अंतर नाही । सुरती छाया संग रहाही ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास न्यौछावर कीन्हौ । भये कृतारथ दर्शन दीन्हौ ॥ अब साहब मोहि लोक दिखाऊ। तुमहि छांड़ि दूजा नहि भाऊ॥ बिनदेखे सुस्थिर नहिं होई । कृपा करहु निज राखो गोई ॥ जैसे कृपण द्रव्यकी आसा । बिन पाए बहु होवै त्रासा ॥ दरस करत तन तपत बुझाई । जैसे रंक महानिधि पाई ॥ बिन देखे व्याकुलचित भारी । पुत्र मरे जिमि मात दुखारी ॥ दरश विना नाही चित लागा । हे प्रभु मोकहैं करहु सुभागा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास भाल कीन्ह विचारा । अब तुम बचन सुनौ टकसारा॥ काया अवधि पुरी जब आही । तब लेजाव पुरुषके पाही ॥

( १२४ )

बोधसागर

सुरति शब्द डोरी हट धरहू । छूटै देह तर्स तब करहू ॥ तब लगि पंथ चलावहु जाई । हटता मानि करौ गुरुवाई ॥ मिथ्या वचन तुमहिस्सों करिहे । यमकी डगरि जाय सो परिहे ॥

धर्मदास वचन

मूर्छित होइ चरण चित लागे । जल बिनमीनप्राण जिमित्यागे ॥ बिन देखे नहि होय अनन्दा । चिडिया व्याकुल है अतिफन्दा ॥ तुम साहेब अस बचन उचारा । कंप्पो जीव त्रास भवसारा ॥ हम दरशन विनु हैं अति चोरा । तुम प्रसाद हम पाइत बोरा ॥ अंतरध्यान भए प्रभु जवहीं । सात दिवस बीते पुनि तबहीं ॥ सात दिवस लग अन्न न पाया । कबीर कबीर ध्यान मन लाया ॥ सदगुरु दया करी चित लाई । कच्छ देशते तब चलि आई ॥ कच्छ देश जब कीन्ह पयाना । अलीदास धोबी पहिचाना ॥ नाम पान ता कहैं समुझाई । धर्मदास कह आन जगाई ॥ छोड़हु हठ चित शब्द विचारौ । पंथ चलावहु हंस उबारौ ॥ जीवन अपनी बाँह चलावो । दै परवान हंस सुत्तावो ॥ तुम सब हंसनको सरदारा । जीव उबारि जाय दरबारा ॥ देही सहित जान तुम चाहौ । देह धरै कैसे निर्बाही ॥ लोक बैठि तब करिहौ राजी । काग कालकी टोरहु बाजी ॥ अपनी संशय तुम मत धरहू । जीव उबारनकी सुधि करहू ॥

साखी—देह धरेका यह गुण, देहसहित नहि जाव ।

सुखसागर तबहींमिलै, सुरति शब्द लौलाव ॥

चौपाई

धर्मदास उठि बिनती कीन्हां । नामसंधि साहब मोहि दीन्हां ॥ लोक दीपकी सुनी बडाई । ताते दरश परश चित लाई ॥ जब लगि नाहीं देखौ नैना । तब लगि नहि पतियाहूँ बैना ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२५ )

अन्तर ध्यान बहुरि प्रभु भयञ्जः। धर्मदास विलखत मन भयञ्जः॥ रुदन करत फिरै विलखाता । कहैं ना देखे साहब गाता ॥ मोहि अपराधी कस प्रभु छांङ्गा । विरह ज्वाल जरही मन भांङ्गा॥ हौ अपराधि करम कर हीना । साहेब तरस परै नहिं चीन्हा ॥ बिन देखे नहिं जियत न आऊँ । गुरुचरणामृत बिन पछताऊँ ॥ अपना दास दास प्रभु कीन्हा । अग्रिम पदार्थ हम कह दीन्हा॥ अब साहेब मोहि दर्शन देहू । तुम बिन कासो करब सनेहू ॥ दिवस आठ अन्नहि बिन बीता । बिना कबीर जीव नहिं जीता ॥ या विधि बारह दिन हो गयहू । तब साहब फिर दर्शन दियहू ॥

साखी-सजिव भये निजीवते, अति अनन्द उर बाढ़ि ।

धर्मदास मन हर्ष भा, सुख अनन्द हिय गाढ़ि ॥

चौपाई

धर्मदास बिनती तब लाई । इतने दिवस दरस बिन जाई ॥ हम तो भ्रमर कमलके वासी । जल बिन मीन सुरतिज्यों प्यासी ॥

सद्गुरु वचन

तब साहब अस भाखब बैना । अब तुम देखो अपने नैना ॥ देखहु धर्म निरूप हमारा । हमही छांङ्ग और चित धारा ॥ हिरिणिरूप धरो प्रभु तबहीं । कोटिन भानु छिपाने जबहीं ॥ येहि रूप है आदि हमारा । हठ नियह जिन करब बिचारा ॥ जब तुम इतना कीन्हा उपासा । तब कह दरस पाइ हम पासा ॥

धर्मदास वचन

भये कृतार्थ दर्शन लीन्हा । धर्मदास न्यौछावर कीन्हा ॥ बहुरि दास उठि पायन परही । चरण टेक बिनती अनुसरही ॥ जबसे पावब नाम तुम्हारा । तबसे सुनब लोक व्यवहारा ॥ अब मनसौं अभिलाखा येही । सोक दिखावहु पुरुष विदेही ॥

( १२६ )

बोधसागर

मो कह लेहि चलौ प्रभु तहवां । सत्य लोक पूरुषही जहवां ॥ बिन परिचय नहिं मन पतियाई। विन दर्शन नहिं सुरति हद्दाई॥ तुम प्रसाद पाइब मैं भेदा । अब परसौ चित अमृत केदा ॥ सत्यलोक परसौ उजियारी । मैं अब बलि २ जाऊँ तिहारी॥

साखी—यम बंधन सब काटिकै, हंस लगावहु तीर । धन्य भाग्य वा हंसके, कहि नाम कबीर ॥

सदगुरु वचन चौपाई

तब साहब चित पाया आई । चलहुँ वेग मैं दर्श दिखाई ॥ प्रथमहि करौ नासिका बारी । फिर रक्षा मन है रखवारी ॥ पैठै नाहीं काल शरीरा । बहुरि कठिन होवे तब पीरा ॥ जब तुम करहु अग्र सनेहा । शब्द संधिसौं राखो नेहा ॥ उन मुन कर पवनहि अवराथौं। उलटे ते सुलटा करि साथौं ॥ सोहं सोहं होइ सवारा । छोड़हु देह चलो दरबारा ॥ चले जो हंस पवनके तेजा । पहुँचे निमिष मांह जहां सेजा ॥ पलैंग साठ राह हम कीन्हों । साहिब खैंचि पलकमों लीन्हों ॥ राह माह एक नाचहि दूता । शब्द बान मारेय अजगूता ॥ छिनमें साहब लैगये तहँवा । पुहुप दीप पूरुष रह जहँवा ॥ सुरजन पीप जाइ भे ठोढ़े । देखत दरस हरष अति बाढ़े ॥ धर्मदास सत बिनती कीन्हों । साहब सुरति घटहिमों चीन्हों ॥ लेकर सुररति चले पुनि तहां । हंस सुजन बैठे जहां ॥ करी प्रणाम दण्डवत कीन्हों । हंसन कुशल पूछि सब लीन्हों ॥ केहि बिधि तुम रक्षा मन आयहु । कौन शब्दसों अमृत पायहु ॥ यमको जोर पहुँचत है प्रचण्डा । कैसे कदि आये नव खण्डा ॥ कौन प्रसाद पाय तुम भाई । कौन वस्तु बल इहवां आई ॥ पिछली सुरति कछु तुम आनौं । रक्षा हंस आप कह जानौं ॥

ज्ञानस्थितिबोध

( १२७ )

धर्मदास तब वचन प्रकाशा । आये इह कबीरकी आशा ॥ नाम संधि उन मोहि हटाई । तिहि प्रसाद सेवा तुम पाई ॥ आरतीकर परवाना पावा । काल फाँस सबहीय नशावा ॥ सुरति निरति भूल गये जब ही । भवसागरमों ठाढे तब ही ॥ साखी-लोक वेद सब भूलिहू, भूला आपनु भाव । बलिहारी सतगुरुनकी, जो ल्याये इहि ठाव ॥

चौपाई

तबहि सुजन जन पूछी बाता । कहिब कहा है हमरे आता ॥ तुमरे दीप माँहि वे ठाढे । हम पूरन उनहीके बाढे ॥ तब सुरजन जन आये तहँवा । आइ कबीर बैठे हैं जहँवा ॥ चरण लगाइ अंकमहँ लीन्हों । भले गुसाईं दर्शन दीन्हों ॥ सिंहासन साहब बैठारी । सुरजन हंस विराजे भारी ॥ आज्ञा साहब दीन्ही जबही । धर्मदास ठाढे भये तब ही ॥ पुरुषहि तबहि वचन उचारा । सुकृत अंश लावो सठिहारा ॥ आरति साजि हंस सब आये । चलिए सुकृत पुरुष बुलाये ॥ तब सुकृत चित आये तहँवा । पुहुपदीप पुरुष रहि जहँवा ॥ पुहुपदीप नहिं बरनो जाई । जगमगज्योति सदा अधिकई ॥ दामिनि दमक होय अति भारी । कोटिन भानु जाय तहाँ वारी ॥ हंस जाय तहाँ करै अनन्दा । कालजाल व्यापै नहिं फन्दा ॥ पंख बेहु नभचर तहाँ फिरही । अगिन बेहुते दीपक जरही ॥ बिन करताल मुदंग जो बाजे । चित्र विचित्र बीन कर छाजे ॥ बीना सुर तहाँ शब्द पुकारा । बीना श्रवण सुनत झनकारा ॥ बिना नालके कमल अन्तूपा । तामध्ये है पुरुष स्वरूपा ॥ करतहि दरश हरष उर आनी । सतगुरुवचन सत्य कर मानी ॥

साखी-अति अनंद उर ऊपजो, बाजत अनहद तूर ।

हीरा लाल मणि जग मगै, अमृत शोभा भरपूर ॥

( १२८ )

बोधसागर

चौपाई

धर्मदास मन भये अनन्दा । जिमिरविदरश फूलि अरविदा॥ शोभा दरश हरष अति भाऊ । उभयसुरखगतिबरणि न जाऊ॥ तब सुरजन जन जाइ जनावा । साहेब धर्मदास यह आवा ॥ इच्छा अधिक करै दर्शनको । पुरुष चरण हियमो परसनको॥ ये दोइ रूप तुमहि उत्पानी । सद्वरु सुकृतै नाम बखानी ॥ तब ही पुरुष बचन फरमाया । सुरजन हंस जबै बुलवाया ॥ लेहु बेगि सुकृत तुम अंशा । पुरुष दरश करीब निःशंसा ॥ दंडवत अष्टांगहि कीन्हौ । धर्मदास आगे पग दीन्हौ ॥ पायर दीप ठाढ़ भै जब ही । अमृतकला देखत भै तब तब ही॥ पर धर्मदास हि सुरझाई । देखि रूप अब मति अधिकाई॥ कोटिन कला सूर्य औ चन्दा । हीरा रतन गिने को गन्दा ॥ जगमगज्योति अधिकतहाँराजे । चितवनदृष्टि डगत गुनराजे ॥ हग संपुट अंबुज सम आही । दरशहरशच्छबिहियहि अघाही॥ आनन्दरूप मूरछा आई । तब सुरजन तन कीन्ह उठाई ॥ सुचित चित्त होऊ धर्मदासा । आभारूप करि शब्द निवासा॥ उठिकर बाह निछावर करही । शीश नवाय चरण रज धरही ॥ दंड प्रणाम कीन्ह बहुभांती । सीप अघाइ पाइ जिमि स्वाती॥ तबहि पुरुष असआसन दीन्हौ । शब्द सहाय हमही तुम चीन्हौ॥ तब सुरजन जन बचन उचारा । सुकृत अंश कीन्ह दीदारा ॥ पुरुष दीन सिंहासन टारी । हंसहरम्मर बैठो झारी ॥ पुरुष तबहि यह वचन उचारा । केहिके अंग आहि दरबारा ॥ धर्मदास कैसे तुम आये । को वहियां जिनधरि पहुँचाये ॥ काहेके बल कालहि जीता । कौन शब्दसे राखब प्रीता ॥ तब सुकृत बिनती अनुसारी । साहब बचन प्रीति उर धारी ॥