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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

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बोधसागर

पाँच अंग विज्ञानके, सत्यबंचन निःशंक । सुखदुःख सम परमार्थी, लह विवेकें निकलंक ॥ औरन औगुन देखि कह, औगुन अपने आहि । अपने औगुन देखिये, जगत ब्रह्म दरसाहि ॥ औरनमें औगुन लखे, निज औगुन नहि जान । अंधकार उरमें वसे, युत जड़ता अज्ञान ॥ जो कछु कहना चाहिये, चौड़े कहो बजाय । पीछे दोष न भाषिये, अमृत बचन सुनाय ॥ हृदय तराजू तौलके, तब सुख बाहर कीन । मधुरी बानी बोलके, परमारथ चित दीन ॥ यंत्र मंत्र सब त्यागिये, अन्यदेव मति ध्याय । जो साधू ऐसा करे, सोई मुक्ति पद पाय ॥ चौदह विद्या सीखकै, पूरण पण्डित होइ । मूक बने सब त्यागिके, वन्दनीय है सोइ ॥

कबीर भानुप्रकाश अन्तर्गत साधु लक्षण समाप्त

अथ विमल लक्षण वर्णन

प्रथम संसार भली प्रकारसे चलाना, पश्चात् परमार्थका विचार ग्रहण करना । विवेकियोंको सदा ध्यान रखना चाहिये कि, संसार छोड़ परमार्थका ढोंग करना अथवा परमार्थको छोड़कर केवल संसारमें ही निमग्न रहना मूर्खता और दुःखका कारण है, इस हेतु विवेककी चरितार्थता इसीमें है कि, संसार और परमार्थ दोनों मर्यादापूर्वक चलाये जाव ।

संसार छोड़ परमार्थ करने लगे तो खानेको अन्न मिलेगा नहीं, फिर भूखे मरनेवालोंसे परमार्थ क्या हो सकेगा ? अंतमें संसारयात्राके लिये नाना प्रकारके उचित अनुचित व्यवहारोंमें

धर्मबोध

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फँसाना होगा । और इसप्रकार फसे हुए पुरुषका फिर परमार्थमें लगना दुस्तर है ।

इसी प्रकारसे परमार्थको छोड़कर केवल संसारमें ही मग्न होनेसे पारलौकिक ज्ञानताके कारण अन्तमें नाना प्रकारके दुखों सहित बारम्बार गर्भकी कठिन यन्त्रणाको सहना होगा । स्वामीके कामको छोड़कर घरमें बैठनेवालेको स्वामीकी ओरसे नाना-प्रकारकी कठोरवाणी और उलाहनाके सहित लोगोंकी निन्दा उठानी पड़ती है। उसी प्रकारके पारलौकिक ( सद्गुरुकी आज्ञा ) धर्म ( परमार्थको ) छोड़कर संसारमें ही मग्न रहनेवालेकी मुक्ति और सुख छूट जावेगा और कठिन यमका दण्ड सहना पड़ेगा । प्रवृत्तिमें रहनेपर भी ज्ञानद्वारा आसक्ति शक्तिरहित निलैष रहता है वही उत्तम है, क्योंकि वह सदा परमपदपर स्थित सारासारके विचारमें संलग्न रहता है ।

प्रवृत्तिमें कुशल पुरुष निवृत्ति मार्गको सहजमें ही पूरा कर सकता है; परन्तु प्रवृत्तिमें जो कुशल नहीं है उसको परमार्थमें भी कदापि सफलता नहीं होती । शंकराचार्यादि महात्मागण जो बाल्यावस्थासे ही त्यागी थे उन्हें भी अन्तमें प्रवृत्तिके अनुभवको प्राप्त करनेका यत्न करना पड़ा ।

विशेषकर उपदेशकों और धर्म गुरुओं और आचार्य आदि गुरुकोटिके पुरुषोंको तो अवश्य उभयप्रकारसे दक्ष और अनुभवों होना चाहिये ।

इसी हेतुसे उचित है कि, शान्तिसे विचारपूर्वक धर्म और नीतिके अनुसार संसार और परमार्थ दोनोंको ही चलाना चाहिये; ऐसा न करनेसे अनन्त दुःखोंका भागी होना पड़ेगा ।

बो० सा० ९/

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बोधसागर

जीवोंका स्वभाव अनुकरण करनेका है तो जो मनुष्य शरीरमें आकर भ्रममें भटकता उसको क्या कहना ?

सारखी-जियत न तरे सुये का तरिहो, जियते जो न तरे ।

गही प्रतीति कीन जिन जासों, नर ताहैं मरे ॥

-बीजक ।

मरे पीछेके बनावका विचार भी जीवित अवस्थामें ही कर लेना मनुष्यका कर्तव्य है ।

लोकमें प्रत्यक्ष दीख पड़ता है कि, जो सदा जागृत रहता है वह सुखी रहता है और गाफिल दुःख उठाता है । इस कारणसे संसार और परमार्थ उभयमें जो चैतन्य है वही सुखी और सर्वको समाधान करनेको योग्य है ।

दोहा-धन्य धन्य तारण तरण, जिन परखा संसार ।

तेई बन्दी छोर हैं, तारण तरण उबार ॥

सारशब्द निर्णय ।

जो जीवित अवस्था सर्व प्रकारसे शक्ति सम्पन्न होनेमें पारखको प्राप्त नहीं होता है वह कालके कठिन आक्रमणके समय क्या कर सकता है, उस समय तो कालके अधीन होकर चौरासीके ही मार्गमें जाना होगा । इस हेतुसे जहाँतक शीघ्रता हो सके पूर्वज महात्मा लोगोंका और सतगुरुके बताये मार्गका बारम्बार विचार कर पारखको प्राप्त कर सत्यपदको प्राप्त होना चाहिये । क्योंकि जीव अनुसरण शील है एकको देखकर दूसरा मार्ग ग्रहण करता है ।

गुणवान्, बुद्धिमान्, विद्वान् और सदाचारी लोगोंकी संगति करके उनके सद्गुणोंका ग्रहण करना और अवगुणोंका त्याग करना चाहिये । इस प्रकारसे जो सर्वके गुणकी परीक्षा कर ग्रहण

धर्मबोध

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योग्यको ग्रहण करता है और त्यागने योग्यको त्यागता है; किसीके मनको दुखाता नहीं है, और मनुष्यमात्रके ज्ञान और चित्तकी परीक्षा करता है वही उत्तम पुरुष है, उसीको मनुष्य कहलाना शोभा देता है। सर्व मनुष्योंमें उसकी सामान्य बुद्धि होती है, सर्व प्राणियोंपर एकभावसे दया रखता है, उनके ज्ञानकी तारतम्यतासे उनके द्वारा दुखसुखको प्राप्त हुआ भी सदा उनको दया दृष्टिसे देखकर अनेक प्रकारसे उन्हें अज्ञानके धीसे निकालकर पारख राज्यमें प्राप्त करानेकी शुभ इच्छाको धारण किये रहता है।

बलिहारी तेहि पुरुषकी, परचित परखनहार ॥

-बीजकसा० १३२

इसी प्रकारसे विमल लक्षणका अनन्त स्वरूप है, सदाचारी पारखी जब इन लक्षणोंकी ओर झुकता है तब उसे स्वयम् प्रकाश प्राप्त होता है और नित्य नवीन सुलक्षणको जानता जाता है।

अथ मूर्खलक्षण वर्णन

मूर्ख दो प्रकारके होते हैं—१ मूर्ख, २ पठितमूर्ख इन दोनों प्रकार के मूर्खोंके लक्षण विचित्रप्रकारके कौतूहलसे पूर्ण हैं, इन्हीं लक्षणों द्वारा मनुष्यप्राणी लौकिक और पारलौकिक दुःखोंको प्राप्त होते हैं—इसी कारणसे उनको जानना उन्हें परखना, उनसे अलग रहनेका प्रयत्न करना और इन लक्षणोंकर युक्त प्राणियोंकी सदा उपेक्षा करनेके हेतु दोनोंके लक्षणोंको भिन्न २ लिखता हूँ।

जो प्रपंची है, जिसको आत्मज्ञान नहीं है, जो अज्ञानी है, उसे मूर्ख कहते हैं—यद्यपि ऐसे मूर्खोंके लक्षणका विस्तार बहुत है तथापि यहाँ संक्षेपसे लिखा जाता है।

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बोधसागर

अथ मूर्खलक्षण

जिसके उदरसे जन्म लिया ऐसी माताके साथ विरोध करे, और स्त्रीको प्यार करे, सर्व परिवारोंको छोड़ दे, केवल स्त्रीके वश होकर रहे, अपने अन्तर गुप्त बातको उससे कहे उसे मूर्ख जानना । परस्त्रीके साथ प्रेम करे, श्वसुरके घरमें वास करे, नीचकी कन्यासे विवाह करे वह मूर्ख है ।

बलवानके साथ गर्व करे, मनमें ममता रखे, बल बिना सत्ता दिखावे, आत्मस्तुति करे, देशमें रहके दुःख भोगे और बाप दादेकी बड़ाई हाँके उसे मूर्ख कहते हैं । बिना कारणके हँसे, अत्यन्त अविवेकी ( अर्थात् अवसर बिना बोले हँसे ) और बहुतांका शत्रु हो उसे मूर्ख जानो ।

अपने सम्बन्धियों और परिवारके रहते हुए उनकी उपेक्षाकर परायोंसे मित्रता करे, रात दिन पराया छिद्र हूँदता रहे वह मूर्ख है ।

जहाँ बहुतलोग बैठे हों उनके बीचमें जाकर सोना और परदेशमें जाकर बहुत खाना-ऐसा मूर्ख बिना दूसरा कौन कर सकता है ।

मान अपमानकी जिसे समझ न हो, जिसका मन सदा व्यसनके वशमें पड़ा हो उसे मूर्ख जानना ।

परायेकी आशासेपरिश्रम करना छोड़कर जो निरुद्यम होकर आनन्द माने वह मूर्ख है ।

मूर्ख घरमें बड़े विवेकी बनते हैं, बहुत बोलकर अपने परिवार और स्त्रियोंमें बकता बनते हैं परन्तु सभामें शम्माति हैं, भयभीत होकर मुखसे बोल नहीं निकाल सकते ।

धर्मबोध

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बुद्धोंके निकट ज्ञानीपना प्रकट करे, सात्त्विक और सरल हृदयके जीवोंसे छल करे, अपनेसे श्रेष्ठके साथ स्नेह करने जावे, और किसीका उपदेश माने नहीं उसे मूर्ख मानना ।

एकदम विषयी और निर्लज्ज होकर मर्यादासे बाहर कार्य करता फिरे, रोगी होने पर भी औषध न ग्रहण करे, पथ्य सेवन न करे, जो कुछ सन्मुख आवे उसे त्याग करे नहीं उसे मूर्ख जानो ।

अकेले परदेश जावे, परिचय बिना साथ करे और एकदम जाने बूझे बिना किसी बडे नगर ( शहर ) में जावे यह लक्षण मूर्खमें ही होते हैं ।

जहाँ अपमान होता हो वहाँ बारम्बार जावे, जिसको मान अपमानका कुछ विचार नहीं वह मूर्ख है ।

अपने नौकरके धनी होजानेपर उसकी सेवामें रहे और जहाँ मन लगे नहीं वहाँ रहे वह मूर्ख है ।

मूर्ख बिना विचारे तनिक अपराधपर भी दंड देते हैं, सहज सहज बातोंमें कृपणता दिखलाते हैं ।

देव पितृको नहीं मानता, शक्ति बिना बड़ी बड़ी बातें करना और सदा मूर्खसे अपशब्द बोलना मूर्खका काम है ।

घरमें अपनी बड़ी बहादुरी प्रकट करे और बाहर गरीब बन फिरे उसे मूर्ख जानना ।

नीचकी मित्रता, परस्त्रीके साथ एकान्तमें संभाषण और मार्ग चलते खाना मूर्ख लक्षण है ।

किये उपकारको माने नहीं, उपकारको भी अपकार माने, अपना थोडा किया बहुत बतावे ऐसे कृतघ्नको बुद्धिमान् मूर्ख कहते हैं ।

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बोधसागर

तामसी, आलसी; मनसे कुटिल और अधीर मूर्ख होता है। विद्या वैभव, धन, पुरुषार्थ, बल और मान बिना मिथ्या अभिमान करनेवाला मूर्ख होता है।

लुच्चाई, लफंगई, लबारपना, कुकर्म, कुटिलता, बेगरजीपना और मलिनता मूर्खका लक्षण है।

दांत, आँख, हाथ, वस्त्र और पग सर्वकाल मैला रखे सो मूर्ख और ऊँचे चढ़कर वस्त्र पहिरे, बाहर चौतरेपर बहुत बैठकर प्रायः नंगे शरीर रहे सो मूर्ख है।

वैधृति, व्यतिपात और कितने कुमुहूतोंको अपशकुनकी बात गिने सो मूर्ख है।

कोधसे, अभिमानसे और कुबुद्धि से अपना आप ही घात करे ऐसा अव्यवस्थित चित्तवाला मूर्ख है।

अपने सुहृदके साथ खेदके साथ व्यवहार कर, सुख और शांतिका शब्द भी न बोले और नीच जनोंकी स्तुति करे वह मूर्ख है।

अपनेको सर्वप्रकारसे पूर्ण माने, शरणगतको धिक्कारे और लक्ष्मीका भरोसा करे वह मूर्ख है।

पुत्र, कलत्र, और स्त्री अर्थात् सांसारिक विषय वासनाको ही मुख्य मानकर उसीमें मुग्ध होकर जो परमात्माको भूल जावे उसे मूर्ख जानना चाहिये।

“करनी पार उतरनी” “जस करनी तस भरनी”।

दोहा—कबीर कमाई आपनी, कदी न निष्फल जाय।

सात समुद्र आड़ा पड़े, मिले अगाऊ धाय ॥

—अंगकी साखी।

जो इस भावको नहीं समझता है वह मूर्ख है, पुरुषोंकी अपेक्षा जो स्त्रियोंको विशेष मान दे वह मूर्ख है।

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जो दुर्जनके साथ भाषण करे, मर्यादाको त्यागकर और आँख मूँदकर मार्ग चले वह मूर्ख है ।

पितर, गुरु, देव, माता, पिता, आता, गुरुभाई, बड़ी बहिन चाची, गुरुपत्नी, गुरुबहिन और स्वामी आदि गुरुजनोंका द्रोह करे वह मूर्ख है ।

गंभीरताको छोड़कर बोले, आदर बिना बोले, बिना पूछे बोले, निन्द्य वस्तुको अंगीकार करे, मार्ग छोड़कर चले और कुकम्भी मित्र करे वह मूर्ख है ।

दूसरेको दुखी देखकर हँसे, सुख माने और दूसरेको सुखी देखकर दुख माने, ईर्षा और वैरसे हृदयको जलावे और गई वस्तुका शोक करे वह मूर्ख है ।

अपनी प्रतिष्ठाकी रक्षा करना जाने नहीं, सदा हँसी ठट्टठा करे और हँसी ठट्टठा करके भी लड़ उठे उसे मूर्ख जानना ।

अपनेसे पूरा हो सके नहीं ऐसी शर्त करे, बिना कामके ही बड़बड़ करे, बोलनेकी रीति जाने नहीं उसे मूर्ख जानना ।

वस्त्र शस्त्र बिना ऊँचे स्थल पर जा बैठे और अपने गोत्रका विश्वास घात करे वह मूर्ख है ।

चोरको अपनी पहचान बतलाये, दृष्टि पड़ी हुई वस्तु मांगे क्रोधमें अपना अहित करे वह मूर्ख है ।

नीच लोगोंकी संगति करे, घमंडके साथ बात करे, बायें हाथसे पानी पीये वह मूर्ख है ।

समर्थके साथ मत्सरता करे, अलम्ब्य वस्तुकी आशा करे और अपनेही घरमें चोरी करे वह मूर्ख है ।

परमात्मा बिना मनुष्यपर विश्वास लावे और निरर्थक अपनी आयु नष्ट करे वह मूर्ख है ।

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बोधसागर

“संसार दुःखसे भरा है” ऐसा जानने पर भी देवोंको गाली दें और मित्रोंको भला बुरा कहे वह मूर्ख है ।

अरूप अन्यायके लिये भी क्षमा न करे, सदा बरछीके नोक पर भी रहे और विश्वासघात करे उसे मूर्ख जानो ।

समर्थके साथ विरोध करे, जनमंडली जिसको देखकर क्रोधित हो, घडीमें भला घडीमें बुरा हो उसे मूर्ख जानो ।

पुराने सेवकोंको छुडाकर नया सेवक रखे और जिसकी सभा नायक विना हो वह मूर्ख है ।

अर्नीतिसे धन प्राप्त करे, न्यायनीति और धर्मको छोड दे तथा साथके आदमियोंको त्याग दे वह मूर्ख है ।

अपना पैसा दूसरेके पास रखे, दूसरेका अपने पास रखे, नीचलोगोंके साथ व्यवहार करे वह मूर्ख है ।

अतीतका अंत दूढे, कुग्राममें जाकर वास करे और हमेशा चिन्तामें रहे सो मूर्ख है ।

दो जन बात करते हों वहाँ जाकर बैठे और दोनों हाथसे शिर खुजलावे वह मूर्ख है ।

पानीमें थूके, पगसे पग खुजलावे, नीच मनुष्यकी सेवा करे वह मूर्ख है ।

स्त्री और बालकको मुँह चढावे अर्थात् निडर करे, परस्त्रीके साथ कलह करे, बहुत कालकी मर्यादाको हलकी करे, गुंगे जीवको कारण विना मारे और मूर्खसे मैत्री करे वह मूर्ख है ।

दोकी लड़ाई झगडेको खड़ा होकर देखे और झूठी बातको सच्ची और सच्चीको झूठी माने वह मूर्ख है ।

लक्ष्मी मिलनेपर पहली पहचान भूल जावे और पूज्य वर्गोंपर दुष्कृत चलावे वह मूर्ख है ।

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अपने स्वार्थ तक नम्रता दिखलावे, स्वार्थ निकले पीछे बेपरवाह होजावे और उपकार करनेवाला कार्य न करे वह मूर्ख है ।

जो अक्षर छोड़कर पढ़े, पुस्तककी ओर दृष्टि न रखे और अपनेको बहुत बुद्धिमान् प्रकट करे वह मूर्ख है ।

स्वयम् कभी पुस्तक पाठ करे नहीं, दूसरोंको पाठ करने दे नहीं और पुस्तकोंको बांधकर रखे वह महामूर्ख है ।

इस प्रकारसे संक्षेपमें मूर्खोंका लक्षण वर्णन किया, अपनी हितकी कामना करनेवाला पुरुष इनका विचार कर सदा ही इन दुर्गुणोंसे बचनेका प्रयत्न करे, जिससे मूर्खोंकी पंक्तिसे निकलकर उत्तमोंकी गिनतीमें आवे ।

अथ पठित मूर्खका लक्षण वर्णन

पीछे मूर्खका लक्षण वर्णन कर आये, अब उनका लक्षण वर्णन कहूँगा कि, जो बुद्धिमान् और पढ़-लिखकर भी मूर्ख हैं । अर्थात् विद्वान् होनेपर भी जिनमें मूर्खता होती है उन्हें पठितमूर्ख, कहते हैं ।

बहुत शास्त्र और ग्रन्थोंका पठन पाठन और श्रवण किया हो, ब्रह्मज्ञानकी वार्ता करे, परन्तु झूठी आशा और मिथ्या अभिमानका त्याग न करे ऐसे विद्वान्को तोतेके ज्ञानसमान अज्ञानी मूर्ख जानना ।

मुक्त पुरुषोंके चरित्रको बारम्बार मुखसे कहता है परन्तु उनके सदाचारका अनुकरण करता नहीं और स्वधर्मके साधनोंको तुच्छ दृष्टिसे देखता है तथा औरोंको उनके आचरणसे हटाता हो उसे पढ़ा हुआ मूर्ख समझना ।

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बोधसागर

अपने ज्ञातापनके अभिमानसे सर्वमें दोष लगाता है, प्राणी मात्रमें छिद्रान्वेषण किया करता है, उसके शिष्य अथवा अधीनस्थ मनुष्य उसकी आज्ञासे बाहर चलनेवाले हों, जिसके बोलनेसे दूसरोंका दिल दुखाता हो, ऐसे पंडितको पठितमूर्ख समझो ।

सम्पूर्ण पुस्तक बांचे बिना ग्रन्थको तथा ग्रन्थकारको दूषण देना, ग्रन्थके गुणको भी अवगुण ही समझना, थोडे अवगुणको देखकर संपूर्ण अवगुण किसीमें कल्पना करलेना पठितमूर्खोंके अतिरिक्त दूसरे किससे हो सकता है ?

सदाचार और सल्लक्षणोंसे हास्य मानकर, सदाचारी और सल्लक्षण युक्त पुरुषोंकी निन्दा करता है, सदा उनको नीचा-दिसानेकी चिन्तामें लगा रहता है, वह जो कुछ नीति अथवा न्याय अपने दोषोंको छिपानेके लिये करता है सब छल छिद्रसे भरे होते हैं ।

मैं ज्ञानी हूँ, सर्वज्ञाता हूँ ऐसा मिथ्याभिमान रखकर प्रत्येक कार्योंमें हाथ डाल देता है परन्तु कार्य्य सिद्ध न होनेपर मिथ्या क्रोधके वश हो जाता है । लोगोंके अधिकारका विचार किये बिना उनसे बोलनेका साहस करता है और बचन जो बोलता है वह भी कठोर ।

बहुश्रुतपनके कारण वक्ताका सभामें अपमान करता है और मिथ्या बकवाद करता है ।

जिस बातके लिये दूसरोंको दूषित कहता वही बात अपनेमें होते हुए भी उसे जान नहीं सकता ।

अभ्यास द्वारा सर्व विद्या प्राप्त कर लेता है परन्तु उसके द्वारा जगतका कुछ उपकार नहीं कर सकता, किसीका उससे माधान नहीं होता ।

धर्मबोध

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जिस प्रकार हार्थी स्पर्श विषयमें लुब्ध होकर और भवैरा गन्धमें लुब्ध होकर बन्धनको प्राप्त होता है उसी प्रकार पठित-मूर्ख संसारमें फँसता है।

वह स्त्रियोंमें लुब्ध होता है, उन्हींका संग करता है, उन्हींका अपनी वाणी द्वारा निरूपण करता है और नीच काममें प्रवृत्त रहता है।

जिससे उसके मानकी हानि होती रहती है उसीको दृढ़ रखता है, और अपनेको शरीर समझता हुआ सदा उसीके लालन पालनमें लगा रहता है।

सद्गुरु परमात्माकी स्तुतिको छोड़कर सत्य धर्म ग्रन्थोंका लिखना और रचना छोड़कर सांसारिक मनुष्योंकी प्रशंसा करता है उनकी मिथ्या बड़ाई करता है, उनके विषयमें प्रशंसा करता है, उनके विषयमें कविता बनाता है, जिससे कुछ सांसारिक लाभ हो उसीकी बड़ाई करता है, जो दृष्टिगोचर होता है उसीको सत्य जानता है ऐसा जो विद्वान हो वह मूर्ख ही कहलाने योग्य है।

स्त्रियोंके अवयवका वर्णन करता है, शृङ्गार रसकी कवितामें अपना समय बिताता है, नाटकादिके हावभावके वर्णन करनेमें अपनी लेखनीको घिसता है वह ईश्वरको भूल जाता है।

वैभवको प्राप्त हो सर्व प्राणीमात्रको तुच्छ समझता है और स्वयम् नास्तिक बनता है।

व्युत्पन्न, वैरागी, ब्रह्मज्ञानी, संन्यासी, साधु, महंत आदि उच्च उपाधिको धारण करनेपर भी प्राकृत जनोंको व्यापार धन्धाके भविष्य कहनेका काम उठाता है वह महामूर्ख है और उसे दम्भी विषयाभिलाषी पठितमूर्खके पदको प्राप्त हुआ जानना।

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बोधसागर

जो किसीकी भी पूरी बातको सुने बिना उसके गुणदोषमें छिद्र ढूँढने लगता है और दूसरेकी उन्नति देख नहीं सकता है ऐसे दूषित विद्वान्को पठितमूर्ख कहते हैं।

भक्तिके साधन, वैराग्य और भजन बिना भक्त और शाम-दमादि साधन बिना ब्रह्मज्ञानी, और सत्यासत्यकी परीक्षा बिना अपनेको केवल मुखसे ही भक्त, ब्रह्मज्ञानी और पारखी कहलानेकी कामनावाले पठित पुरुषोंको मूर्ख कहा जाता है।

स्वधर्मके नित्य नैमित्तिक कर्मोंमें श्रद्धाहीन, ऊंचकुलमें भी जन्म धारण कर नीच कर्मोंमें प्रवृत्त होनेवाला विद्वान् मूर्ख है, उसका आदर करनेवाला यदि नीच पुरुष भी हो तो उसकी मिथ्या प्रशंसा करता है और पीठ पीछे उसकी निन्दा करता है जैसे पठितमूर्ख जानो।

“मुखपर एक और पीठ पीछे दूसरा” ऐसी जिसकी आदत हो, बोलनेकी बात अलग और करनेकी अलग हो, संसारमें अत्यन्त प्रवृत्ति करने पर भी परमार्थको धिक्कारे और अपने वचनको सिद्ध करनेके लिये अपने ज्ञातव्यका आश्रय ले। सांची बातको किनारे छोड़कर लोगोंकी रुचिके अनुसार बात करे, ऐसे अपने जीवनको पराधीन और मृतक करनेवाले विद्वान् को पठितमूर्ख जानना।

जो लोगोंको दिखलानेके लिये दम्भ किया करता है, अकर्तव्यको कर्तव्य मानकर उसमें प्रवृत्त होता है, मनमें सीधा और योग्य-मार्गको जानते हुए भी लोभ (लालच) से, अथवा मान-बड़ाईकी इच्छा, या किसी भी परके पक्षपातसे सत्य त्याग करके टेढ़े रस्ते चलता है उसे पारखी महामूर्ख और ज्ञानियोंकी सभासे बाहर समझते हैं, यदि वह उच्च आसन पर भी बैठा हो तो क्या ?

धर्मबोध

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रातदिन उत्तम उत्तम ग्रन्थोंका श्रवण करते हुये भी अपना अवगुण त्याग नहीं करता है, अपना हित आप समझता नहीं है, तत्त्वनिरूपणके श्रवण मननको जहाँ उत्तम मनुष्य बैठते हों उनकी मसखरी करता हो, वह मिथ्याज्ञानी कदापि अपना हित नहीं कर सकता ।

अपना शिष्य अनधिकारी होकर अपमान करने लगे तब भी उसकी आशा न छोड़े, ग्रन्थोंको सुनते, या विचारते अथवा किसीके मुखसे उपदेश द्वारा अपने कर्तव्यकी स्वामी ( कसर ) कुछ मालूम हो तो कोषित होकर गडबड़ करने लगे तो यदि वह लोगोंमें बहुत बुद्धिमान् भी प्रसिद्ध हो तो भी उसे महामूर्ख जानना ।

वैभवमें मग्न होकर सतगुरुकी उपेक्षा करे और अपनी गुरुपरम्पराको याद करे उसे भी मूर्ख जानना; यद्यपि वह वैभवप्रतापसे जगतमें बुद्धिमान् कहलाता हो ।

जो ज्ञानकी बात कहकर धन जमा करता है, कृपणके समान धन भोगता है, धनके लिये ही परमार्थकी बात करता है, स्वयम् तो कर सकता नहीं और दूसरोंको वही बातें सिखाता और ब्रह्मज्ञानका उपयोग अनधिकारी विषयलम्पट लोगोंके समक्ष करता हो, ऐसा महंत, गोस्वामी और साधु संत भक्ति-मार्गको भ्रष्टकर पक्षपात द्वारा वैर विरोध बढ़ानेवाला है ।

परिवार त्यागकर साधु वेष धारण कर लेनेवालोंको संसार तो छूट ही गया और इधर परमार्थका भी साधन नहीं हो सका ऐसा जो धर्मर्ममार्गदाको भ्रष्ट करनेवाला हो वह धर्मविरोधी मूर्ख कहलाता है ।

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बोधसागर

जिस धर्मका स्वांग बनाया हो, उस धर्मके ऊपर पड़ते हुए विधर्मियोंके आक्रमणकी उपेक्षा कर जो स्वमान मर्यादाकी मरम्मतमें लगा रहे उस धर्मविध्वंसी मिथ्या स्वांगधारीको मूर्ख समझना चाहिये ।

स्वधर्मकी जिन बातों और कर्मोंसे हाँसी होती हो, उन कर्मों और बातोंमें प्रकृत होकर, स्वधर्मके सिद्धान्तको न जाननेवाले, अथवा उसकी निन्दाकरनेवाले धर्म दूषियोंसे जो मेल मिलाप बढ़ावे वह धर्मघाती मूर्ख है ।

इस प्रकार संसारमें भले कहलाते हुए भी मूर्खताके ही वनमें भटकनेवालोंका संक्षेपसे वर्णन किया । सज्जन जन इसे विचारें और आत्मसुधारके मार्गको पक्षपात रहित होकर ग्रहण करें ।

इति श्रीधर्मबोध प्रथम भाग समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (कमालबोध)

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खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई-४

नं. १० बोधसागर

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

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श्री कमालबोध ग्रन्थ

बोधसागरे-

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