कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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REPORT
The following report is submitted to the Board of Directors of the Company. It is a summary of the financial and operational performance of the Company during the fiscal year ended December 31, 2019. The report is prepared in accordance with International Financial Reporting Standards (IFRS) and is intended for the information of the Board of Directors and the Company's shareholders.
The Company's financial performance for the year ended December 31, 2019, was characterized by a strong growth in revenue and a significant improvement in profitability. The Company's revenue increased by 15% compared to the previous year, driven by a strong demand for its products and services. The Company's operating profit increased by 20% compared to the previous year, reflecting a strong cost control and a positive impact of the Company's strategic initiatives.
The Company's financial position as of December 31, 2019, was strong. The Company's total assets increased by 10% compared to the previous year, and the Company's total liabilities increased by 8% compared to the previous year. The Company's net assets increased by 12% compared to the previous year, reflecting a strong financial performance.
The Company's cash flow for the year ended December 31, 2019, was positive. The Company's operating activities generated a positive cash flow of 100 million yen, and the Company's investing activities generated a positive cash flow of 50 million yen. The Company's financing activities generated a negative cash flow of 30 million yen, reflecting the Company's investment in capital expenditures.
The Company's financial performance for the year ended December 31, 2019, was driven by a strong demand for its products and services, a strong cost control, and a positive impact of the Company's strategic initiatives. The Company's financial position as of December 31, 2019, was strong, and the Company's cash flow for the year ended December 31, 2019, was positive.
Yours faithfully,
Chief Executive Officer
श्रीबोधसागरे-
श्वासगुंजार
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत
मुद्रक व प्रकाशक-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष-“लक्ष्मी वेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस,
कल्याण-बम्बई.
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार ‘श्रीवेंकटेश्वर’ मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षाधीन है
नं. १० बोधसागर - ३
पुस्तक संख्या
पुस्तक संख्या
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पुस्तक संख्या
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
1111 1111 1111
सत्यसुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दया नाम की वंश व्यालीसकी दया
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अथ श्रीबोधसागरे
श्वसगुआर प्रारम्भः
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द्वारविशस्तरंगः
चौपाई
कहै कबीर सत्य प्रकाशा । श्रोता सुरति धनी धर्मदासा ॥ सत्य सार सुक्त गुण गायो । अविचल बाह अछै पद पायो ॥ संशय रहित सदा सो गाऊँ । शीलरूप सब हिमकर नाऊँ ॥ करै कुलाहल हंस उजागर । मोह रहित सब मुखके सागर ॥
( २ )
बोधसागर
तेहि पुर जरा मरण भ्रम नाहीं । मन विकार इंद्दी नहिं ताहीं ॥ सत्य लोक हंसन सुख होई । सो सुख यहाँ न जाने कोई ॥ जाने सो जो उहाँ रहाई । ईहाँ आय कहे समुझाई ॥ आवत जात बार नहिं लावे । उहाँकी चाल सोई यहाँ लावे ॥ जो समझे सोइ उतरे पारा । बिन समझे सब यमके चारा ॥
समय-अमरलोककी महिमा, सत्य शब्द उपदेश ।
हंस हेतु सो वरनो, छूटे यमकर देश ॥
चौपाई
अमरलोककी अविगति बानी । धरमदास मैं कहूँ बखानी ॥ जो समझे सो उतरे पारा । बिन समझे सब यमके चारा ॥ प्रथम शरण सतगुरु गुण गाऊं । अक्षरभेद सकल सुधि पाऊं ॥ सत्यलोक कर भाव अपारा । सो भवसागर करै पसारा ॥ भाषों अग्र अग्रकी बानी । भाषों द्वीप जहाँ लगि खानी ॥ भाषों पुरुष पुरुषकी काया । भाषों अमी अमान अमाया ॥ भाषों पुरुष लोककी बानी । भाषों सबै सहज सहिदानी ॥ जो काया प्रभु आप सँवारा । सो समुझाइ कहो व्यवहारा ॥ अमर तार अखण्डित बानी । श्वासा पार सार सहिदानी ॥ जबही क्या प्रभु आप सुधारा । कहौं विचारि तासु व्यवहारा ॥ जेतिक श्वासा पुरुषकी देहा । तार तार कर कहों सनेहा ॥ जेतिक वचन पुरुष उच्चार । तेह तेह वचन नाम अधिकारा ॥ श्वास पारस आदि निरबाना । सोरह सुतकी नाल बखाना ॥
समय-पांच अमीकी देह धरि, प्रकटी ज्योति अपार ।
सुरति संग निहतत्त्व पुर, पुरुष होत श्वास गुंजार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हाथ जोरिके टेकेउ पाऊ । साहब कहौ तहँवाके भाऊ ॥
श्वसगुआर
( ३ )
कहौ लोक कर प्रकट विचारा । जहाँलौ दीपहिं कर विस्तारा ॥ बरनौ द्वीप गुप्त अनुसारा । बरनौ जहाँ लगिसकल पसारा ॥ बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तीन शक्ति कैसे निरमाऊ ॥ पुरुष श्वास जेता अनुसारा । ताकर कहां सकल विस्तारा ॥ केहि विधि सोरह सुत प्रकाशा । केहि केहि कहाँ रही वासा ॥ कहाँ विस्तारि सकल अस्थाना । सत्यलोक और यमके थाना ॥ कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्हा । कैसे रचा देहकर चीन्हा ॥ कैसे भये निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥ कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जानि बाजीयम दीन्हा ॥ कैसे इन्द्री देह बनाई । कैसे जीव परा वसि आई ॥ कैसे जीव अपनपौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥
समय-काया मध्ये श्वास है, श्वासा मध्ये सार ।
सार शब्द विचारिके, साहब कहो सुधार ॥
सतगुरु वचन चौपाई
धर्मदास जो पूछेउ आई । आदि अन्त सब कहां बुझाई ॥ कहां लोक लोककी बानी । कहां पुरुष सुतकी उत्पानी ॥ कहां संदेश दया करि तोही । सुक्ति जान जो पूछेउ मोही ॥ सुनहुँ सन्देश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छे माना ॥ सुमिरहु आदिपुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥
समय-तीनलोकके भीतरे, रोकि रह्यो यमद्वार ।
वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सब संसार ॥
चौपाई
धर्मदास चित चेतहु जानी । कहां बुझाय अगरकी बानी ॥ पुरुष अजावन रहा जो देहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
१-कहाँ बुझाइ भेद समुझाई ।
( ४ )
बोधसागर
चारि करी सिंहासन जोरी । पाँचयें अचित आप अंजोरी ॥ चारि करी चारिउ परवाना । शक्ती भीतर वह अकुलाना ॥ समय-करि करि महा परिमल, बाससुबासकी खानि । तेज करी जो प्रगट भइ, तामहँ आइ समानि ॥
चौपाई
पुरुष अचित चिन्ता जब कीन्हा । उपज्यो सुरति शब्दको चीन्हा ॥ रहे गुप्त प्रकट भई काया । श्वासा सार शब्द निरमाया ॥ शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहि मय है सबको मूला ॥ शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्द शब्द भया उजियारा ॥ शब्दहिते भव सकल पसारा । सोइ शब्द जिवके रखवारा ॥ प्रथमशब्द भया अनुसार । नीहतत्त्व एक कमल सुधारा ॥ नीहतत्त्वपर आसन कीन्हा । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥ रच्यौ पुहुप द्वीप मनिभारी । सहस्र अठासी द्वीप सुधारी ॥ अक्षै वृक्ष एक राशि बनाई । अग्रवास तहाँ रही समाई ॥ समय-पेड़ पात निज फूल महँ, प्रगटी बास अनूप । पारस निहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
चौपाई
जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥ पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥ श्वासा सार शब्द गुञ्जारा । पांच अमीको भयो विस्तारा ॥ पांच अमीको जो विस्तारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥ श्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोरह सूनु भये उत्पानी ॥ पांच अमी साहबके अंगा । पांच तत्त्व समरत्थ प्रसन्न ॥ श्वासा स्नेह सबै उपजाया । बानी बानी वरन बनाया ॥ सत्यलोक सबही को मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
श्वासगुप्कार
( ५ )
श्वासासार सत्य कर भाऊँ । अमी आदि उपजी तेहिनाऊँ ॥
( सत्यसार श्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
श्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
श्वासा अजर नाम अनुमाना । प्रकटी अमी अजर सुजना ॥
अदल नाम श्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुवासा ॥
खासा निरनै भ्या अनुसारा । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
श्वासा पांच प्रकटि विस्तारा । पांच अमीकर भया पसारा ॥
पांच अमी पाँचों अधिकारा । पांचतत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक सुधारा । पांच तत्त्व घै गुप्तनुसारा ॥
समय-पांच अमीते पांच भए, पांच नाम अधिकार ।
सैन स्नेह उत्पन्न भई, अमी तत्त्व विस्तार ॥
चौपाई
सोरह श्वासा सार सहाया । सोरह सुतकी प्रकटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम श्वासा अनुसारी । उपजे सुरति हंस पति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि माँहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निर्माया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पाँचों अमी साहबके अंगा । नाल सात उपजी तेहि सङ्गा ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊँ ॥
पुरुष सुरति कहँअगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंपत तेहि दीना ॥
सातों नाल सुरति जब पाई । ताहि नेहमों रहे समाई ॥
क्षण बाहर क्षण भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअक्षर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह देऊ ॥
समय-अमर निरक्षर सङ्ग लिय, अर्ध ध्वजा फहराय ॥
पलटि समानिसुरति पुरुष, देहमें अक्षय छिपाय ॥
( ६ )
बोधसागर
चौपाई
( सोलह सुतकी उत्पत्ति प्रकार )
सुरति नेह प्रभु इच्छा कीन्हौ । सोरह सुत उपजावे लीन्हौ ॥ सत्यनाम श्वासा अनुमाना । सुकृत अंश भये अगुआना ॥ दूजी श्वासा बाहेर आई । उपजे सहैत शून्य तिन्ह पाई ॥ तिसरी श्वासा पुहुप सनेही । तेहिते भई हमांरी देही ॥ चौथी श्वासा तेज सनेहा । तेहिते भई धर्मकी देहा ॥ पांचह श्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्यां आदि कुमारी ॥ शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंश सुजनं जन भयऊ ॥ सतयें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृगीसुंनि संगा ॥ अठयें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म शीस उर मेली ॥ नवयें स्वासा नाम सोहंगी । नाम ते उपजे सुत संरवंगी ॥ दसयें स्वासा नाम रसीला । जाते उपजी संरवन लीला ॥ ग्यरहें श्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वाभावें उपजे तेहि संगा ॥ ब रहें स्वासा नाम सुमाहां । भाव नाम सुत उपज ताहां ॥ तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेकें तेहि नाऊ ॥ चौदह स्वासा अमर बखाना । उपजे सुत संतोषें सुजाना ॥ पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥ ❁ षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजी दंया पालन सङ्गी ॥ षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे भोग संतायन ज्ञानी ॥ सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥ सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥ एके पिता एक व्यवहारा । सब जो रहिहैं पुरुष दरबारा ॥
- कई एक प्रतियोंमें इस चौपाईको ऐसा लिखा है की, "सतरहें श्वासा अदत मुबानी" परन्तु षोडश, सुतकी उत्पत्ति वर्णन करते हुये सतरहवें की उत्पत्ति वर्णन असङ्गत जानकर यही शुद्ध जान पड़ा ।
भासगुञ्जार
( ७ )
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥ सेवा करति रही लौलीना । पुरुषलोकते होहि ना मीना ॥
समय-सोरह सुतकी एक मूला, एकते एक अधीन । कर जोर सेवा करें, प्रेमभक्त लौलीन ॥
चौपाई
सेवा करत बहु दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधरधुनि भयऊ ॥ अर्ध अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥ सबतर लोक द्वीप रहि छाई । बिमलवास भरपूरि रहाई ॥ अगर वास सब हंसन पाई । निर्मलवास सदा सुखदाई ॥ पीअत अमृत सब अघाने । आपु आपु पुर सबै सिधाने ॥ धर्मराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥ छलके वचनपुरुष सो लीन्हौं । पाछे दूंद लोक महाँ कीन्हौं ॥
समय-और सबै सुत बैठे, अपने अपने स्थान ।
धरमरोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनवैं करजोरी । साहव मेटेहु संशय मोरी ॥ और सब सुत अछप छिपाने । धर्मराय कैसे विगराने ॥ कैसे और सब सुत सब भारी । धर्मराय कैसे भये विकारी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सैंदेश आदि समझाई ॥ जब प्रकटे प्रभु अमर तारा । निकसी अघर निरक्षर धारा ॥ भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥ पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
( ८ )
बोधसागर
अगर छिपाय आप महाराखा । सुरति स्नेह मुख प्रकटी भारखा ॥ प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥ भाषा बचन भया अधिकारा । भाषहिते भा सकल विस्तारा ॥ भाषा वचन पुरुष उच्चार । सो सब सत्यलोक व्यवहारा ॥ भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोकके द्वारा ॥ श्वासा सार तार जोरि आना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥ भाषा स्वर बानी अनुमाना । श्वास सार तार जुरि आना ॥ निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान श्वास गुञ्जारा ॥ नाव स्नेह शब्द मैञ्जारा । (बचन समान श्वास गुञ्जारा) ॥ श्वासा नेह देह भई जबहीं । भाषा सहज बचन भा तबहीं ॥
आगेकी उत्पत्ति प्रकार
प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुत सुकृत सम आनी ॥ निमिषनेह प्रसन्न सुधारै । नाममूल टकसार उचारै ॥ भो विस्तार निमेश एक गयऊ । " " " " ॥ मूलगुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमरघर लेखा ॥ पेड़के गहे मूल धनु गाजा । सोई मूल फूल फल लागा ॥ पेड़हिं गये मूल औ शाखा । मूल मिले तबहि रचि शाखा ॥ गुप्त मूलते प्रकटी शाखा । पल्लव मूल पड़ै गहि राखा ॥ पेड़ देखि पल्लव फैलावै । पल्लव फैले अन्त नहिं पावै ॥ पल्लव चढ़े पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फलरस चाखा ॥ आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहि राखा आप पहिचान ॥ जागि सुरति पुनि पेड़ निहारा । फलरसि चाखी बीजगहि डारा ॥ बीजाते सोई फल होई । फल रस लेह मूल तजि छाई ॥ जागि सुरति सपन मिट गयेऊ । दुई चितमेटि एकचित भयेऊ ॥
श्वासगुप्कार
( ९ )
दूजी श्वासा प्रभुकी देहा । उपजे सहज सुख नेहा ॥ तिसरी श्वासा फूल सनेही । जाते भई हमारी देही ॥ देह माँहि द्वे रहे विदेही । देह मन भये ज्ञान रस देही ॥ कायामे काया रही वासा । सब चौथी श्वासा परकाशा ॥ काया अविहर अविहर वासा । " " "
चौथी श्वासा निकरे चाहा । तब चिंता उपजी मनमाहा ॥ चिंता प्रकट भई दिल जबहीं । आपते आप भुलाने तबहीं ॥ आपु शरीर आपु तब झाका । विमलप्रकाशउदित तन ताका ॥ कायारूप भई उजियारी । निर्मलदेह विमल तन भारी ॥ विमल प्रकाश कीर्ती जब देखा । वर्णत बने न ताकर लेखा ॥ विमल प्रकाश किरण जब देखा । " " "
कला अनंत अंत नहीं पावे । बरणत जिह्वा लक्षण आवै ॥ देखत रूप लीला अधिकारा । आप आपनपौ कीन्ह विचारा ॥ कमलकरि महाँ भा उजियारा । देखा आदि अंत विस्तारा ॥ आपु बरन सब देखा जबहीं । दुविधा रूप झाँई भइ तबहीं ॥ कमल झांकी प्रभु देखा जबहीं । हमरे रूपको दो सर अबहीं ॥ इतना कहत बार नहीं लाये । निकसि कमलते बाहर आये ॥ छोँडी कमल प्रभु भये निनारा । तबहीं कमल भया अंधियारा ॥ कमल झाँकि देख्यो सबन्यारा । भये तिमिर तनतेज अपारा ॥ अँधकार प्रभु देखा जबहीं । काया ज्योति मलिन भइ तबहीं ॥ निमिषि एकम संशय आवै । निमिषि एक आनंद जानावै ॥ विस्मय हर्ष दोउ एक ठाऊँ । एक पुरुषकर दोउ सुभाऊँ ॥ आपुते आय भया अतिचारा । तेहि अवसर प्रभु वचन उचारा ॥ उठि अब जो शब्द सतभाऊ । कमलमध्ये कस शून्य रहाऊ ॥ घटही वचन पुरुष संधाना । तब चौथी श्वासा बंधाना ॥
( १० )
बोधसागर
तेज पूँज भौ गर्भ शरीरा । फूँकी नालदेखा बल वीरा ॥ कमल नाल धरि फूँका जबही । चौथी श्वासा निकसी तबही ॥ फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषकी देहा ॥ फूँकत कमल बार नहिँ लागा । भयउजियार तिमिर सब भागा ॥ कारण काल पट यहँ धोका । दुई चित मूल तेजमह रोका ॥ चौथी श्वासा विषयी सनेही । मोह विकार धर्मकी देही ॥ मोह विकार तिमिर अधिकारा । ता सँग भयउ धर्म औतारा ॥ तिसरी श्वासा गुप्तहि राखा । तासो जोर निरञ्जन भाखा ॥ फूँकत कमल तेज गरि गयऊ । तेहितेकाल ज्योति धरि भयऊ ॥ महा बलि देह धरिके बैठा । जानो धर्महीं हौ जेठा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारा । ताते धर्मराय बरियारा ॥ तेजतिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परकाशा ॥
समय-आसा धरे बहुत दिन बीते, प्रेम भक्ति लौलीन ।
आश धरे बहुतयुग गये, भक्तिभाव आधीन ॥
(ज्योति तहाँ लगिज्वालतेभाखा । तेहि ते नाम निरञ्जन राखा) ॥ निराकार आकार धराये । जोति काल बहुनाम कहाये ॥ चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सो सबै नाम मन राखै ॥ सांकित अण्ड भयो प्रचंडा । फूटत अण्ड भयो बहु खण्डा ॥ चौदह बुन्द अमि ढरि गयऊ । चौदह अंश ताहिते भयऊ ॥ चौदह पौरिया ढरि बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञानपसारा ॥ आपसमान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥ चौदह अंस धरम तहाँ पाये । ते चौदह विद्या तहाँ पाये ॥ वही चौदह अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥ धरम समाधि चितही यमधारा । चौदह मोह को तनवारा ॥
शवासुखार
( ११ )
ताकी कला कहै को पारा । जेहिके सुतकोटिन उजियारा ॥ कोटिन कला करै बहु भारी । आपहि पुरुष आपही नारी ॥ आपहि वेद आपही वानी । आपहि कोटिन ज्ञानवरखानी ॥ आप अजर आवै गाह कहावै । मूल नाम गहि धोख लगावै ॥ नाना ज्ञान कथे बहु वानी । प्रकटचोआदि आपगुणजानी ॥ कहैं लगि कहो ज्ञानके भाऊ । बहुत काल बहु नाम धराऊ ॥ सुरति सरोतर जागे नाहीं । मनपथ पवन चञ्चला ताहीं ॥
एक पाव सन्मुख खडे, कर जोरे लौलीन ।
एक पाव सन्मुख खडे, कर जोरे आधीन ॥
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास विनवै चितलाई । समरथ मोहि कहो समुझाई ॥ (धरमदास विनवहि कर जोरी । दया करो प्रभु बन्दी छोरी ॥ धर्मराइ उत्पति जस पाई । " " " " ॥ ऊपजै तस भये कसाई । उपज्यो चित चंचल दुखदाई ॥ पुरुष तेज सम शून्य संचारा । ता संग भया धर्म औतारा ॥ शील विकार सहित तन पाई । प्रथमें भक्ति दूजे अन्याई ॥ भक्ति कियसिजब रहा अकेला । अघके संग भया अपेला ॥ सो अघ उन कैसे पाई । केहि विधिपुरुषताहिनिरमाई ॥ साहब कहौ भेद समुझाई । कैसे कन्या पुरुष बनाई ॥ कैसे धर्मराय तेहि पाई । तौन भेद तुम कहो गुसाई ॥ कहौ बिचारि दोऊ कर भाऊ । दुइ कर जोरिके वन्दो पाऊ ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास मैं तुम्हे लखावो । आदि अन्त सब भेदबताओ ॥ चौथी श्वासा संग अधिकारी । शून्यते जग भये उजियारी ॥ पुरुष कमलपर बैठे आई । गई गर्म उपजी शितलाई ॥
( १२ )
बोधसागर
पुरुष कमलपर बैठे जबहीं । परिमल उदित भयातन तबही ॥ शीतल पवन सोहावन खानी । मूल कमलपर आसन ठानी ॥ सिंहासनपर सत्य विराजे । पार सनेह देह महाँ गाजे ॥ पारस तेज भया तन माही । पैंचई श्वासा उपजी ताही ॥ उपजन श्वासा देह निहारा । तन पसेव भइ मैल निनारा ॥ कायां मैल पुरुष जब जाना । मीजी मैल अबला बलठाना ॥ गण्ड तेज भा अबल शरीरा । पाछै भई स्वास गंभीरा ॥ तेहि स्वासा संग पारस भारी । कायाते मथि मैल निकारी ॥ तनते मैल काठि प्रभु लीन्हा । सोई मैल रचि पुत्री कीन्हा ॥ करी पुत्री कर ऊपर लीन्हा । उपज्यो प्रेम सहजको चीन्हा ॥ भई पुत्री प्रभु देखा जबहीं । सुरति कीन्ह पारसके तबहीं ॥ निर्मल पारस श्वासा पाँचा । रहा सँभारा मैलकी बाँचा ॥ आप मैलते श्वासा कीन्हाँ । ता ऊपर बहुरंग जो दीन्हाँ ॥ देके रंग बरन सब फेरा । भीतर मैल मोह मद घेरा ॥ ऊपर शोभा रंग बनावा । भीतर लाल रंग तेहि छावा ॥ पांच अमीकर पांच सुभाऊ । पाँचतत्त्व तेहि संग बनाऊ ॥ पांच अमीते पुरुष शरीरा । ताते पांच तत्व भए धीरा ॥ पांच अमी ते तत्व बनावा । पांच अमी तेहिसंगनिरमावा ॥ पांच तत्व पांचो व्यवहारा । तेहिते भयउ सकल विस्तारा ॥ पुरुष मेलते पुत्री कीन्हाँ । पांच तत्व तेहि भीतर दीन्हाँ ॥ आप सुरती ते पुत्री कीन्हाँ । " " " " ॥ भीतर बाहर तत्व पसारा । पांचों तत्व रंग अधिकारा ॥ पांच रंग तत्वकी धारा । चौथ तत्व रंग बहु धारा ॥ पांच तत्व पांचों रंग भारी । पांचों रंगते कला पसारी ॥ तत्व रंगते लीला धारी । पांच तत्व पांचों रंग धारी ॥
श्वासगुआर
( १३ )
तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत विचित्र संवारी ॥ तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥ वरणि न जाय रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥ काल अनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहि मैं दीन्हा ॥ उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रकटी कला अनंत सुभावा ॥ नखशिख देहसुधा प्रभु कीन्हा । पैचई श्वासा भीतर दीन्हा ॥ जब थासा काया मैंह आई । प्रकटी ज्योति जगामग झाई ॥ अजब अङ्ग बना बहु रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥ निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकै बिछुली कला अनंता ॥ तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥ पैचई श्वास जब बाहर कीन्हा । उत्पन पारस ता संग दीन्हा ॥ श्वासा परस मिलि भये एका । शोभा वरन रूप रस ठेका ॥ उपजी कन्या कला अपारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥ जब कन्याप्रभु उत्पन कीन्हा । पाँचो श्वासा तासङ्ग दीन्हा ॥ ता श्वासामह पारस भारी । पांचतत्त्व सङ्ग देह सँवारी ॥ उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टांगी कहि पुरुष बुलावा ॥ आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥ जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥ देखि रूप चितहर्षित कीन्हा । उत्पति पारस ता संग दीन्हा ॥ जाने शब्द मूल रहि वासा । सुरतिनिरतिकीन्हातहां पासा ॥ पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥ कायाके दलके व्यवहारा । जो चाही सो सबही सुधारा ॥ दहिने अंग तेज कर दाऊ । बाये शीतल सबै सुधाऊ ॥ मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥ ताही दिन तीनों गुण ठयऊ । इंगलापिंगला सुखमनकियऊ ॥
( १४ )
बोधसागर
तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज सत्यकर भाऊ ॥ अमी अग्रभा तेज शरीरा । उपजे चंद्र सूर दोऊ वीरा ॥ अग्रतेज औ सत्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥ कला अनंता शक्तिके पास। लीला बहुत विचित्र प्रकाशा ॥ तिनहु संग अहै द्वौ वीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥ तीनों शक्ति अंग दोउ वीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥ अभयहि शक्ति है चन्द्र सनेहा । ईगला नारी संग उरेहा ॥ उलँगनी शक्ति रहे सुख मरना । चैतन शक्ती सूर्य प्रमाना ॥ सबसे मध्य जहाँ सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥ नख शिख ज्योति विराजे अंगा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥ पांचतत्व तिया शक्ती राजै । ताहि सङ्क दोय वीर विराजै ॥ तत्वरैंग शक्ती न घर कीन्हौ । तेहि मई उपजनि पारस दीन्हौ ॥ उपजनि पारस भा परसंगा । उपजी ज्योति कला बहुरैंगा ॥ पैचई श्वासा देह समाई । उपजी रूपकला अधिकार्ई ॥ जागी देह अखंडित अंगा । शोभित भई कला प्रसैंगा ॥ उपजनि अँश पुरुषके संग। भाखों भेद कला बहु रैंगा ॥ जब कायामो आई श्वासा । जागि ज्योति पुहुप प्रकाशा ॥ उपजा रूप अखंडित बानी । बोले बचन पुहुपकी खानी ॥ मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥ हुये मधुर पुनि लीला धारी । वचनरूप लखि आप दुलारी ॥
समय-पांचतत्त्वतिये शक्ती संग, चन्द्र सूर्य दोऊ वीर ।
तीनों घर श्वासा रमें, बाहर भीतर तीर ॥
चौपाई
उपजी रूप रंग की खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥ उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुष उत्पन औ पुरुष स्वरूपा ॥
श्वसगुञ्जार
( १५ )
जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हों । सो पारस कन्या कहैं दीन्हा ॥ पारस हाथ महा बल जाना । तब कन्या कहभा अभिमाना ॥ उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥ यहि विधि सोरह सुतनिरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥ जेहिको जेता तन विस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥ काहुको लोक सत्ताइस दीन्हों । काहुको सात पांचदशचीन्हों ॥ काहु चौदह काहु बीशा । काहु सत्रह काहु उनीशा ॥ काहुके बारह पन्द्रह तीसा । काहु इकइस बाइस चौबीसा ॥ काहु छतीस बतीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥ सब कह दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अच्छप छिपाई ॥ उत्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेछ तेज धर्म सों लीना ॥ ताते धर्म भये बली बंड़ा । बैठो सात द्वीप नौ खंड़ा ॥ जिहि विधि रचनापुरुष बनाई । तैसी कला धर्म निरभाई ॥ रचना रचि मनमें पछिताई । शून्य शरीर जीव कहैं पाई ॥ जीवन बिना जीव नहीं होई । रचि अस्थल बैठो सुख गोई ॥ जेहि विधि रचनापुरुषदिकीन्हों । तैसहि धर्म रचा सब चीन्हों ॥ पुरुष समान रची अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥ जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारथ प्रभु कहाँ छुपाया ॥ सो पारस अब कहवाँ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥ हेरत पारस आये तहवाँ । बैठि सरोवर कामिनि जहवाँ ॥ कामिनि धर्म भये एक ठाँऊ । अंकमिलाय कीन्हबहु भाऊ ॥ शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म रोष हो कीन्ह विलापा ॥ कौर विलाप कला बहु भारी । सुख चतुराई हृदय विकारी ॥ कामिनसों कीन्हों व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥ धर्म कहैं कामिनिसो बाता । गहे अंग चमकावै गाता ॥