भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

शवासुखार

( ११ )

ताकी कला कहै को पारा । जेहिके सुतकोटिन उजियारा ॥ कोटिन कला करै बहु भारी । आपहि पुरुष आपही नारी ॥ आपहि वेद आपही वानी । आपहि कोटिन ज्ञानवरखानी ॥ आप अजर आवै गाह कहावै । मूल नाम गहि धोख लगावै ॥ नाना ज्ञान कथे बहु वानी । प्रकटचोआदि आपगुणजानी ॥ कहैं लगि कहो ज्ञानके भाऊ । बहुत काल बहु नाम धराऊ ॥ सुरति सरोतर जागे नाहीं । मनपथ पवन चञ्चला ताहीं ॥

एक पाव सन्मुख खडे, कर जोरे लौलीन ।

एक पाव सन्मुख खडे, कर जोरे आधीन ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास विनवै चितलाई । समरथ मोहि कहो समुझाई ॥ (धरमदास विनवहि कर जोरी । दया करो प्रभु बन्दी छोरी ॥ धर्मराइ उत्पति जस पाई । " " " " ॥ ऊपजै तस भये कसाई । उपज्यो चित चंचल दुखदाई ॥ पुरुष तेज सम शून्य संचारा । ता संग भया धर्म औतारा ॥ शील विकार सहित तन पाई । प्रथमें भक्ति दूजे अन्याई ॥ भक्ति कियसिजब रहा अकेला । अघके संग भया अपेला ॥ सो अघ उन कैसे पाई । केहि विधिपुरुषताहिनिरमाई ॥ साहब कहौ भेद समुझाई । कैसे कन्या पुरुष बनाई ॥ कैसे धर्मराय तेहि पाई । तौन भेद तुम कहो गुसाई ॥ कहौ बिचारि दोऊ कर भाऊ । दुइ कर जोरिके वन्दो पाऊ ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास मैं तुम्हे लखावो । आदि अन्त सब भेदबताओ ॥ चौथी श्वासा संग अधिकारी । शून्यते जग भये उजियारी ॥ पुरुष कमलपर बैठे आई । गई गर्म उपजी शितलाई ॥

( १२ )

बोधसागर

पुरुष कमलपर बैठे जबहीं । परिमल उदित भयातन तबही ॥ शीतल पवन सोहावन खानी । मूल कमलपर आसन ठानी ॥ सिंहासनपर सत्य विराजे । पार सनेह देह महाँ गाजे ॥ पारस तेज भया तन माही । पैंचई श्वासा उपजी ताही ॥ उपजन श्वासा देह निहारा । तन पसेव भइ मैल निनारा ॥ कायां मैल पुरुष जब जाना । मीजी मैल अबला बलठाना ॥ गण्ड तेज भा अबल शरीरा । पाछै भई स्वास गंभीरा ॥ तेहि स्वासा संग पारस भारी । कायाते मथि मैल निकारी ॥ तनते मैल काठि प्रभु लीन्हा । सोई मैल रचि पुत्री कीन्हा ॥ करी पुत्री कर ऊपर लीन्हा । उपज्यो प्रेम सहजको चीन्हा ॥ भई पुत्री प्रभु देखा जबहीं । सुरति कीन्ह पारसके तबहीं ॥ निर्मल पारस श्वासा पाँचा । रहा सँभारा मैलकी बाँचा ॥ आप मैलते श्वासा कीन्हाँ । ता ऊपर बहुरंग जो दीन्हाँ ॥ देके रंग बरन सब फेरा । भीतर मैल मोह मद घेरा ॥ ऊपर शोभा रंग बनावा । भीतर लाल रंग तेहि छावा ॥ पांच अमीकर पांच सुभाऊ । पाँचतत्त्व तेहि संग बनाऊ ॥ पांच अमीते पुरुष शरीरा । ताते पांच तत्व भए धीरा ॥ पांच अमी ते तत्व बनावा । पांच अमी तेहिसंगनिरमावा ॥ पांच तत्व पांचो व्यवहारा । तेहिते भयउ सकल विस्तारा ॥ पुरुष मेलते पुत्री कीन्हाँ । पांच तत्व तेहि भीतर दीन्हाँ ॥ आप सुरती ते पुत्री कीन्हाँ । " " " " ॥ भीतर बाहर तत्व पसारा । पांचों तत्व रंग अधिकारा ॥ पांच रंग तत्वकी धारा । चौथ तत्व रंग बहु धारा ॥ पांच तत्व पांचों रंग भारी । पांचों रंगते कला पसारी ॥ तत्व रंगते लीला धारी । पांच तत्व पांचों रंग धारी ॥

श्वासगुआर

( १३ )

तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत विचित्र संवारी ॥ तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥ वरणि न जाय रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥ काल अनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहि मैं दीन्हा ॥ उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रकटी कला अनंत सुभावा ॥ नखशिख देहसुधा प्रभु कीन्हा । पैचई श्वासा भीतर दीन्हा ॥ जब थासा काया मैंह आई । प्रकटी ज्योति जगामग झाई ॥ अजब अङ्ग बना बहु रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥ निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकै बिछुली कला अनंता ॥ तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥ पैचई श्वास जब बाहर कीन्हा । उत्पन पारस ता संग दीन्हा ॥ श्वासा परस मिलि भये एका । शोभा वरन रूप रस ठेका ॥ उपजी कन्या कला अपारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥ जब कन्याप्रभु उत्पन कीन्हा । पाँचो श्वासा तासङ्ग दीन्हा ॥ ता श्वासामह पारस भारी । पांचतत्त्व सङ्ग देह सँवारी ॥ उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टांगी कहि पुरुष बुलावा ॥ आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥ जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥ देखि रूप चितहर्षित कीन्हा । उत्पति पारस ता संग दीन्हा ॥ जाने शब्द मूल रहि वासा । सुरतिनिरतिकीन्हातहां पासा ॥ पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥ कायाके दलके व्यवहारा । जो चाही सो सबही सुधारा ॥ दहिने अंग तेज कर दाऊ । बाये शीतल सबै सुधाऊ ॥ मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥ ताही दिन तीनों गुण ठयऊ । इंगलापिंगला सुखमनकियऊ ॥

( १४ )

बोधसागर

तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज सत्यकर भाऊ ॥ अमी अग्रभा तेज शरीरा । उपजे चंद्र सूर दोऊ वीरा ॥ अग्रतेज औ सत्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥ कला अनंता शक्तिके पास। लीला बहुत विचित्र प्रकाशा ॥ तिनहु संग अहै द्वौ वीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥ तीनों शक्ति अंग दोउ वीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥ अभयहि शक्ति है चन्द्र सनेहा । ईगला नारी संग उरेहा ॥ उलँगनी शक्ति रहे सुख मरना । चैतन शक्ती सूर्य प्रमाना ॥ सबसे मध्य जहाँ सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥ नख शिख ज्योति विराजे अंगा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥ पांचतत्व तिया शक्ती राजै । ताहि सङ्क दोय वीर विराजै ॥ तत्वरैंग शक्ती न घर कीन्हौ । तेहि मई उपजनि पारस दीन्हौ ॥ उपजनि पारस भा परसंगा । उपजी ज्योति कला बहुरैंगा ॥ पैचई श्वासा देह समाई । उपजी रूपकला अधिकार्ई ॥ जागी देह अखंडित अंगा । शोभित भई कला प्रसैंगा ॥ उपजनि अँश पुरुषके संग। भाखों भेद कला बहु रैंगा ॥ जब कायामो आई श्वासा । जागि ज्योति पुहुप प्रकाशा ॥ उपजा रूप अखंडित बानी । बोले बचन पुहुपकी खानी ॥ मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥ हुये मधुर पुनि लीला धारी । वचनरूप लखि आप दुलारी ॥

समय-पांचतत्त्वतिये शक्ती संग, चन्द्र सूर्य दोऊ वीर ।

तीनों घर श्वासा रमें, बाहर भीतर तीर ॥

चौपाई

उपजी रूप रंग की खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥ उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुष उत्पन औ पुरुष स्वरूपा ॥

श्वसगुञ्जार

( १५ )

जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हों । सो पारस कन्या कहैं दीन्हा ॥ पारस हाथ महा बल जाना । तब कन्या कहभा अभिमाना ॥ उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥ यहि विधि सोरह सुतनिरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥ जेहिको जेता तन विस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥ काहुको लोक सत्ताइस दीन्हों । काहुको सात पांचदशचीन्हों ॥ काहु चौदह काहु बीशा । काहु सत्रह काहु उनीशा ॥ काहुके बारह पन्द्रह तीसा । काहु इकइस बाइस चौबीसा ॥ काहु छतीस बतीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥ सब कह दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अच्छप छिपाई ॥ उत्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेछ तेज धर्म सों लीना ॥ ताते धर्म भये बली बंड़ा । बैठो सात द्वीप नौ खंड़ा ॥ जिहि विधि रचनापुरुष बनाई । तैसी कला धर्म निरभाई ॥ रचना रचि मनमें पछिताई । शून्य शरीर जीव कहैं पाई ॥ जीवन बिना जीव नहीं होई । रचि अस्थल बैठो सुख गोई ॥ जेहि विधि रचनापुरुषदिकीन्हों । तैसहि धर्म रचा सब चीन्हों ॥ पुरुष समान रची अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥ जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारथ प्रभु कहाँ छुपाया ॥ सो पारस अब कहवाँ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥ हेरत पारस आये तहवाँ । बैठि सरोवर कामिनि जहवाँ ॥ कामिनि धर्म भये एक ठाँऊ । अंकमिलाय कीन्हबहु भाऊ ॥ शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म रोष हो कीन्ह विलापा ॥ कौर विलाप कला बहु भारी । सुख चतुराई हृदय विकारी ॥ कामिनसों कीन्हों व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥ धर्म कहैं कामिनिसो बाता । गहे अंग चमकावै गाता ॥

( १६ )

बोधसागर

कामिनि देह कामकी खानी । बोले मधुर विरहकी बानी ॥ उपजा मोह महा मद भारी । कामिनि कामकला अनुसारी ॥ देखि कला अनुसार भुलाना । व्याकुल भये रंग अभिमाना ॥ कामिनि देखि धर्म अकुलाना । उपजा रंग रोष अभिमाना ॥ धर्म कहे कामिनि सों बानी । तोंरे है पारस सहिदानी ॥ सो पारस अब तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥ सो पारस देहू मोरे हाथा । तुमहू रहो हमारे साथा ॥ धर्मराय जब कही कुवानी । तब कामिनि चितशंकाआनी ॥ कामिनि कहै धर्मसों बानी । काहे धर्म होउ अज्ञानी ॥ हम तुम एक पुरुषकर कीन्हों । तुमकहँदीन्हसोहमहुकोदीन्हों ॥ हम लहुरे तुम जेठे भाई । हमसों कहा करहु अधिकाई ॥

” ” ” । एकै नाल कुमारग वानी ॥ वहनिहिं भाइहि होत कुवानी । आगे चलिहै यहि सहिदानी ॥ जब कामिनि कही असबानी । धर्मराय चित दुविधा आनी ॥ कामिनि चलहु हमारे देशा । कहा करहु मानहु उपदेशा ॥ छल बल करि अपने पुरलावा । तहाँ आनिकै रारि बढ़ावा ॥ धर्मराय कामिनसों बोला । शोभा सुरति अमीरस डोला ॥ निरखि नैन कामिनिसों बोले । शक्ति अधीन बैन बहु खोले ॥ सोलह शशि कला शशि पूरी । तीनों शक्ति कर छूरी ॥ नैन निरखि मूर्ति होय झांके । तत्व निःतत्व आप तनताके ॥ विधि लैलाइवधिकविधि बोले । निरखत अंग २ तनु डोले ॥ अंतरगति विधिविधिहिमनायो । कुमति हाथपरसाजनिआयो ॥ विधि वर दीन्ह बुन्दचुक आई । चितमकार एक रच्यो उपाई ॥ यहि पुर एक अचंभो ठयऊ । पारसको सुप्रताप जनयऊ ॥ इच्छा रूप हर्ष चित जागी । श्वेत सरोवर वार न लागी ॥

शवासग्रन्थ

( १७ )

भूलयो धरम चितहि अकुलाना । ऐसो सरवर मैं नहि जाना ॥ अक्षयअयूनविधि पारसयामा । कहा अचम्भो आनितुलाना ॥ देखो तेहि पारसको चीन्हौं । जेहिते मानसरोवर कीन्हौं ॥ शूर मलीन उदय शशि जोना । बानी बरन अंग तुअलोना ॥ जादिन पुरुष रचा तुअदेहा । तादिन मोहिं तोहिं जुरासनेहा ॥ मोहिं कारण तोहिं पुरुष बनावा । तू कुलमोते अंग छिपावा ॥ तोहि कारण मैं रचना कीन्हौं । रचिकेखानितोहि चित दीन्हौं ॥ " " " मोहि कारण तोहिं रचना कीन्हौं ॥ देहनात हमरे घर नाहीं । हम तुम रहे एक घर माहीं ॥ उत्पति पारस तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥ देह सबै हम रचा बनाई । पारस दै तुम लेहु जियाई ॥ हम तुम खानि रची बहु बानी । जाते होय ना एकौ हानी ॥ जैसी रचना पुरुष प्रकाशा । तैसी रची लोक रहिवासा ॥ जीव सीव रचि खानि बनाई । जाते ज्योति ज्ञान फैलाई ॥ ( जीव रची सब खानि बनाई । जागे ज्योति ज्ञान फैलाई ) ॥ लाज सकुचि औ रची सगाई । बरण बिचारि छूत बिगराई ॥ ठांव ठांव रचि राखी आपा । माता पिता शोक संतापा ॥ भशुर भसुर औ भर्मित भाई । शिवशक्ती रचि पूजा लगाई ॥ " " " हंसन लाज भाव नात वैधाई ॥ रची अचार कपट विस्तारा । तीरथ व्रत प्रतिमा देवहारा ॥ " " " तीरथ व्रत औ नेम अचारा ॥ वेद कितेब धरि फंद सँवारी । रची दीनों वोय पर्वत भाँरी ॥ हुओ दीन हुए राह चलाई । झगर करै रहै अरुझाई ॥ एक एकते रारि बढ़ाई । मुक्तिपंथते रहै भुलाई ॥ दोउ दिन बाँधी मरजादा । रची बाद ममता औ स्वादा ॥

( १८ )

बोधसागर

एहि विधि रची सकल दुनियाई । लोभ मोह लालच बरिआई ॥ रचिकै खानि करिय रजधानी । राज पाठ सिंहासन ठानी ॥ तुम आद्या अरु हम अभिमानी । बारह खण्ड छह लोकके बानी ॥ ( तुम अंश हमही अविनाशी । बारह खण्ड छः लोकके बासी ) ॥ पाप पुण्य दोष रची अपारा । जाकहैं सेवै यह संसारा ॥ पाप पुण्य हठ फन्दा होई । जामहैं अरुझि रहै सब कोई ॥ योग ज्ञान व्रत संयम पूजा । सोलहमहीं और नहिं दूजा ॥ रची क्षुधा मायादि विकारा । पुरुष लोकको मूँदिये द्वारा ॥ रची क्रोध माया विकरारा । पुरुष लोकको सुँद्यो द्वारा ॥ पुरुषलोक इहई रचि लीजै । इकछत राज हमहि तुम कीजै ॥ तुमरे, संग है पारस सूर। जाते होय सकल विधि पूरा ॥ जेहि ते लोक पुरुष प्रकाश। सो पारस है तुमरे पास ॥ सो पारस अब हमको देहू। रंग हमारा सबै तुम लेहू ॥ कामिनी कहे वचन बुद्धि धीरा । उपजेहु कालरूप बलवीरा ॥ जो जो वचन कहेउ तुम भाई । सो हमरे चित्त एक न आई ॥ पुरुष लोक कस मुदा दुदयारा । लेउ आप अपने शिरभारा ॥ जो छल हमते कीन्हहु भाई । तैसो छल तुम्ह भुगतहु जाई ॥ पारस कामिनी धरा दुराई । हाथ मले शिर धुनी पछताई ॥ हाथ मिजि छिन छिन पछिताई । कहे कामिनि धर्महि समुझाई ॥ कामिनि कहै कुबुद्धि समझाई । हम तुम चलहुँ पुरुष पहुँ जाई ॥ बकसै पुरुष दयाकरि तोही । शीश नवायके लीन्हसि मोही ॥ विन दीयें बरिआई लेहौं । पुरुष लोक पुनि जाए न पैहौं ॥ कामिनि कहा वचन परवाना । धर्मरायके भयो अभिमाना ॥ कामिनि तोरि बुद्धि है थोरी । अबना जाऊ पुरुषशकी खोरी ॥ पुरुषलोक इहई रचि राखा । रच्यो बिचारि बुद्धि बलभाखा ॥

श्वासगुञ्जार

( १९ )

अब तौ पुरुषप्रास नहिं मोही । गहौं बांहको राखा तोही ॥ तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष मम कारण तोही ॥ (तैं कामिनि कठोर निर्मोही । ) " " " " " ॥ पहिले वचन विरहते बोली । लागी कठिन कामकी गोली ॥ काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥ कामिनि कहै धर्म सुनु बाता । चढि कालिमा तोहरे गाता ॥ इठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धर्मराय पकरी तब बाँही ॥ गही बांह कामिनिकी जबही । काम बाण घट व्यापे तबही ॥ धर्मरोष कामिनिपर कीन्हौं । गहिपगर्शासलीलतेहि लीन्हौं ॥ लीलत कामिनि शब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥ कामिनि पुरुष नामजब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंशही दीन्हौं ॥ योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥ पुरुष कोपि ताऊपर कीन्हा । कन्या उगलधर्मतब दीन्हौं ॥ (उगली कन्या बाहेर आई । ) " " " " " ॥ हाहाकार रोषके धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥ कामिनि कम्प देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥ मानसरोवर झलतै अंगा । गयउ पताल जहाँ जलरंगा ॥ परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥ एक परीक्षाते सरबर गयऊ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥ दूजो अंश भयो निरवाना । शिला सिंध पर्वत परमाना ॥ रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी वारे संचारा ॥ तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चत्रगुन भयऊ ॥ चौथा अंश कामिनिअनुमाना । जाते स्वर्ग नर्क परवाना ॥ अंशहि अंश अंशते मानी । एक प्रती चौगुना उत्पानी ॥ चार २ गुण गुणहि समाना । अंशते अंश चत्र परवाना ॥

( २० )

बोधसागर

पारस मानसरोवर माही । पारस बुद्धि आपही आहीं ॥ पारस कामी न बहुत डुरावे । सुर्त सनेह तहां फिर आवे ॥ पारस अंत नाहे ठहराई । बासरूप कामिनिसंग धाई ॥ कामिन कालपुरुष पद परसे । पारसनीर नेत्र मह दरसे ॥ नैन निरख मूरत अतुरागी । धर्म अंश कामिनितन लागी ॥ पारस अंश चितै नहीं डोले । बहुरि २ कामिनसों बोले ॥ पारस अंशघट रक्षा छपाई । निकसी कन्या बाहर आई ॥ जेहि कारणकामिनि हठ कीना । पारस संग छान सो लीना ॥ उत्पत्ति पारस धर्म तब पावा । कन्या रही ताहिके ठाँवा ॥ जब लगि कन्या भइ सियानी । तब लगि धर्म रची सब खानी ॥ खानि वानी रचि कीन पसारा । बेदवाद बहुमत विस्तारा ॥

दोहा-रचना रची लोककी, शांशि घर रहा समय ।

पुरुष नाम जानै नहीं, ताते लोक न जाय ॥

(रचा रची लोककी, नख सिख रहा समाइ ।)

पुरुष नाम जाने विना, सत्य लोक नहीं जाइ ॥)

चौपाई

पुरुष नाम ज्ञानी जो पावे । लोक दीप पलमौंहि ढहावे ॥ पुरुष नाम जानै नहीं भेदा । रचे खानि चौरासी फन्दा ॥

” ” ” (चित चंचलऔअन्धअभेदा) ॥

दुख सुख सबै रची बहुभांती । जरा मरण पूजा औ पाती ॥ रचि सब खानिबैठि अभिमानी । तब लगि पुत्री भई सयानी ॥ उपजा जोबन रसको भावा । तब कन्या कहँ विरह सतावा ॥ कामिनी कहे धर्मसो बानी । हमतो तुमरे हाथ विकानी ॥ सुर्त डोला एके पारस लीन्हा । मदन भुवङ्गमके वसि कीन्हा ॥ जोबन विरह महामद गाजे । विनु संयोग गर्भ नहीं छाजे ॥

श्वसगुञ्जार

( २१ )

मोह महाञ्जर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी॥ गर्भ किये मा करदी राजा । कामिनि सोह दुहु दिशवाजा ॥ मनसालहर उद मद मन भएउ । काम दहन धन आहुत दयेऊ ॥ उपजा मदन मोह औगाहा । पुत्री पितासों भयउ विवाहा ॥

साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।

नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥

चौपाई

बरबस धर्मराय हरलीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥ विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥ चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह यमहानी ॥ मनसा व्याह देव तिषगंधी । हंसना हंस भगत युगबंधी ॥ सुतें हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध वसाए आनी ॥ उपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पिताहितबभयाविवाहा ॥

(कन्या व्याकुल भई तेहि माहा ।) " " " "

धर्मराजको उपज्यो भावा । कामिनि हृदय हाथ बतलावा ॥ उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरण गहो तब जानी ॥ मनसा लहरि ताहि तेह दीन्हा । उपजी तीन लोककर चीन्हा ॥ कामिनि संग करे मुख भारी । उपजा तीनि लोक अधिकारी ॥ तीनहि शक्ति पुरुष संघ दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥

(पांच तत्त्व तीन गुण चीन्हा ।) " " " "

तीनउ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धर्मके संगा ॥

( पारस रहा ताके संगा ।) " " " "

तीनहुँ सुत उपजे अधिकाा । धर्मराय तब भया निरारा ॥

तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय ऊंच भये निरारा ॥

राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्यमहँ लीन्हा ॥

( २२ )

बोधसागर

कामिनि दर्श सदा लौ लावै । राज पाट सब कीर्ति बनावै ॥

“ ” ” ( । तीनों सुतको राज सिखावै ) ॥ राज नीति सुत चित्तिहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥ खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥ ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । ) ” ” ” ”

कामिनि पुरुष एकसंग रहऊ । सुतकी बात पुरुष सों कहऊ ॥ वहाँकी बात न सुतसों भाखे । करै दुलार सदासँग राखे ॥ इहि विधिबहुतदिवसचलिगयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥ धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज करत तब भयऊ ॥ मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥ माता कहै सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥ रचना सकल हमहीं होई । हमसो दूसरा और न कोई ॥ रचना सब मोहीते होई । दूसर जान परो नहि कोई ॥ हमही पिता हमही हैं माता । हमही तीनि लोककी दाता ॥ हमहीं छाँडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥ तीन लोक महाँ दूसर नाही । माता कपट करै मन माहीं ॥ तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाही ॥ आपु आपु कह सुत सब हूठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥ तब माता कहै बचन रिसाई । पिताको दर्श करहु तुम जाई ॥ माता कहै फूल लै धावहु । पिताके शीस परसिके आवहु ॥ पुढुप सामाधि वासले धाओ । पिताके शीस परसिके आओ ॥ चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥ खोजत बहुत दिवस चलिगयऊ । पिताको दर्श कतहुँ नहि भयऊ ॥ तीनों सुत सो दर्शन भयऊ । ” ” ” ” ॥ पिता निकट सुत दूरि सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥

शवासुखार

( २३ )

खोजि थाकि माता पई आए । काहु साँच काहु झूठ सुनाए ॥ ब्रह्महि भाषा झूठ संदेशा । सकुचि वचननहिं कहेवोमहेशा ॥ भाषा विष्णु सत्यकी रेखा । खोजि थाकि पिता नहिं देखा ॥ माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूठ झूठ तौ खानी ॥ शिव लजाय शिर नीचे राखा । साँच झूठ एको नहिं भाषा ॥ ताते करहु योग तप जाई । जटा बढाय विश्रुति रमाई ॥ ( तुम सुत करो योग तप जाई । शीश जटा तन भवम चढाई ) ॥ लेहु आमण्डल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवनी दीन्हा ॥

साखी—जप तप योग समै हठ, आगे ध्यान पसार ।

माना कह्यो क्रोध करि, चतुरमुख अन्ध अहार ॥

मातहि कीन्ह विष्णु पर दाय। मुखहि चूमके कण्ठ लगाया ॥ सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहु लोक करहु रजधानी ॥ शिव ब्रह्मा करिहैं तोर सेवा । गण गन्धर्व ऋषि मुनि देवा ॥ ब्रह्मा मोसों झूठ लगावा । तेहि कारण विधि झूठ कहावा ॥ ब्रह्मा वेद पढ़े बहु भांति । कुकरम कर दिवस औ राती ॥ ( विद्या वेद पढ़े बहु भांती । कुकरम करे दिवस औ राती ) ॥ एहि अवगुण गायत्री गार्ई । ब्रह्मा दोष शाप तिन पाई ॥ मृत्यु लोक गो धरे शरीरा । अघ भुगते चौरासी थीरा ॥ गोय होय नारी कल्यारी । अघनिचोए होए पातक भारी ॥ जहाँ लग पुहुप खान परकाशा । निरधिन ठारे तुम्हारो बासा ॥ झूठी बात वेद में निर्माई । च्यार वर्णमें बड़ी बड़ाई ॥ पहिले चारों वरन पुजावै । दक्षिणा कारण गरा कटावै ॥ गरा कटाए करावे पूजा । गायलै सभे ब्रह्मा नहीं दूजा ॥ लए मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भए सो काल कसाई ॥

( २४ )

बोधसागर

खाए अखज चले एडाई । जस मडवाको स्थान अघाई ॥ ब्राह्मणहुको झूठी आसा । हरि नहिं भजे न हरिके दासा ॥ कहके बिर ब्रह्मा करोए । उत्तम जन्म पाय जड खोए ॥ जूठी बात वेद निरमाई । चार वर्ण आश्रमहिं दृढ़ाई ॥ ऋषि अगसी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उतपानी ॥ जेते ऋषि तेते मतधारी । अस्तुति करि हसेब तुम्हारी ॥ ब्रह्मादिक सुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विष्णु तुम्हारी ॥ निशिदिन ध्यानपिताकोधरिहो । किंचित ध्यानजोतअनुसरिहो ॥

साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि । तीनलोकगुण विस्तरेऊ, निरञ्जन आदि भवानि ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊमिलि यह मत परकाशा ॥ यह सब खेल कामनी कीन्हा । निरञ्जन बास झून्यभी लीन्हा ॥ ज्योति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥ सेवहु विष्णु निरञ्जन ध्याना । हे सुत वचन निश्चय मम जाना ॥ ताते ज्ञान अगम फैलाहो । जाते तामस सिद्ध कहा हो ॥ सिद्ध न कामत होइहै भारी । ज्ञान अगम गुण होहि भिखारी ॥ अंश दहन तन तामस भारी । असुरभाव पशु वासु वतारी ॥ मतपा खंड ठगोरी टोना । षट् दर्शन पाखंड खिलोना ॥ यंत्र मन्त्र विखया अधिकारी । अन्तर ध्यान भक्त बुव धारी ॥ तव गुण सहस्र नाम ऊचरिहे । एक अंश चौसठ योगिन होइहे ॥ कर खपरलें मंगल गैहे । यह उपदेश महादेव देहे ॥ ( शंकर चिह्न इहै सो पैहैं । ) " " " " ॥ रजशुचि सतगुन दया समानी । असुरहतन भक्तन रजधानी ॥ आगम कहो संघ सुनि लिन्हेउ । जहां जसभावतहांतस कीन्हेउ ॥

शवासुआर

( २५ )

चारि खानि ब्रह्मे निरमाई । चामहि त्वचा लुब्ध लौ लाई ॥ शिवको वरन भेद नहीं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥ मात विष्णुपर दाया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥ (अनुभव दया विष्णु परकीन्हौ । )

पिताको दर्श विष्णु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥ माता पिता एक है गयऊ । विष्णु देखि चित हर्षित भयऊ ॥ माता पिता एक मिलि गयऊ । विष्णु समाय जोति महाँगयऊ ॥ तेहि पाछे जग सिरजे लेऊ । ताको वरण सविस्तर कहेऊ ॥ प्रथमें चारि खानि निरमाई । लक्ष चौरासी योनि बनाई ॥ चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीनिलोक सहिदानी ॥ चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाखण्ड सँवारा ॥ (चौदहभुवन करचो विस्तारा । )

लक्ष चौरासी योनी कीन्हौ । चारि खानि महाँ एकही चीन्हौ ॥ लक्ष चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जीव एकै साना ॥ रचना रची सखा बहु रंगा । सुर नर मुनि गणका मतरंगा ॥ कामदेवकी कला अंगंगा । पशु पक्षी सुर नर मुनि संगा ॥ कामकला सबही भरमावै । शिव शक्ती संग काम लगावै ॥ उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँशी ॥ कनक कामिनी फन्द बनावा । तेहि फन्दे सबही अरुझावा ॥ कनक कामिनी फंदा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥ नर बानर कीट पतंग सँवारी । सबके सँग करै रखवारी ॥ (नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥ पशु पक्षी जत कीट पतंगा । रक्षक भक्षक सबके सङ्गा ॥ शवासा सार होय गुआरी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥ पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढ़े साहु औ चौरा ॥

( २६ )

बोधसागर

चारिउ खानि होय गुञ्जारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥ देहदशा जस पुरुष सवारा । तैसी देह रची करतारा ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥

( अष्टधातु पिंजरा उपराजा ) ॥

पिंजरामें सुगना एक रहई । वाकी गति मञ्जारी लहई ॥ (यामध्य सुवना एक रहई । दावपरे मैजारी गहई ) ॥ सुगना पढ़ै दिवस औ राती । रक्षक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥ रक्षक भक्षक सङ्ग रहावै । सदा पढ़ावै घात लगावै ॥

) एक घातक एक सुआ पढ़ावै ॥

जस सुअना पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥ नख सिख रचाकाल फुलवारी । फूली वास कुबास सवारी ॥ कनक कामिनी काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥ कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ बखानि रहा विकशानी ॥ चारि खानि महाँ श्याम अमाना । काल कुटिल तेहि माहि समाना ॥ काल कलाकी खानि बनाई । शिव शक्ती महाँ रहा समाई ॥ (दया क्षमाकी खानि बनाई । नर नारि महाँ रहा समाई ) ॥ सुरनर मुनि सबही कह डहकै । चारिखानि सबके घट महकै ॥ चारिखानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन कोक सहिदानी ॥ तीन लोक श्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥ श्वासा संग काल अवतारा । विष अमृत दोनों संचारा ॥ श्वासा संगम काल औकाली । श्वास संग भये वनमाली ॥ प्रकृति पचीस सङ्ग जञाली । पञ्च पांचदश माल तमाली ॥ चन्द्र सूर श्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुष्मनि जोरा ॥

दोहा-श्वासा संग श्वासा, तेहिसे उपजा बरि आर ।

चन्द्रसूर्य हैं श्वासामध्ये, सकल विधिविस्तार ॥

श्वसगुञ्जार

( २७ )

शिव शक्ति सुखधाम है, जो चितज्ञानसमाय । सुखसागर अभिराम है, कालत्रासठरिजाय ॥

चौपाई

चन्द्र सूर जीवन सहिदानी । शक्ति शिवकी उपजे खानी ॥ (संयोग जड़ चित विदानी ) ॥

एक संग विष लहरी समानी । एक संग बसे अमृतकी खानी ॥ एक संग मन बसे अपारा । एक संग अमी जीव रखवारा ॥ एक संग काम क्रोध दुखभारी । लोभ मोह पाण्ड विकारी ॥ अहंकार लालच औ ममता । घिन्न औछतिलाज प्रतिहता ॥ एते एक वीरके साथी । माया मद जस मैगर हाथी ॥ एक संग शीतल शीलसुभेपी । इक संग छेमा सुबुधि विशेषी ॥ एक संग भक्ति रहे हितकारी । ज्ञान विवेक संतोष सुधारी ॥ दया दीनता निर्भय रमता । धीरज मतीसहज सुधि समता ॥ दुई घर दुवो राव कर वासा । इक घर राहु केतु प्रकाशा ॥ राहु अमावस सूर्यहि आसे । आसे केतु पूरणीमा चंद्रहीफाँसे ॥ दोउ करे यहि भांति बसेरा । खन बाहर खन भीतर डेरा ॥

( दोउ करे एक नगर बसेरा ) ॥

एकहि रथ दोऊ असवारा । बाहर भीतर मध्य दुवारा ॥ पांचों अविचल तुरे तुषवारा । ता ऊपर है जीव असवारा ॥ एक तुरे पियरे पट नेहा । एक नील रंग है देहा ॥ कुबेत एक लाल बहु रंगी । एस सजुज हरियारे अंगी ॥ एक श्याम सुशकी रंग भारी । पांचों एकते एक अधिकारी ॥ एक श्याम बदन रूपचारी । आप आप पांचों अधिकारी ॥ पांचों बसे एकही संग। एकही रथ मन जीव सुसंगा ॥ एक तब ले पांचों वासा । दाना घास पानीकी आसा ॥

( २८ )

बोधसागर

पांचों पांच घाट जल पीवै । दाना घास खाए सुख जीवै ॥ पांचों तुरै पहली पल धावै । छिनबाँधहि छिनछोरि कुदावै ॥ छिनबाहिर छिनभीतर आवहि । पांचों पांच ढुंड फिरि धावहि ॥ सुसरवर पार सो तवे ले आवै । सकल पराश तवे ले आवै ॥ इहि प्रकार जाही ओर आवहि । कोइ नियरे कोई दूर सिधावहि ॥ सुरंग तुरै जोजन भरि जावै । सुसकि योजन डेढ सिधावै ॥ हरियर दुह योजन पर जावै । योजन तीन पति पहुँचावै ॥ हंसा चारि योजन जो जावै । फिरिके दंडवत बेलै आवै ॥ (श्याम रंग आवै नाहिं जाई) ॥

यहि विधि पांचों आवै जाहीं । अपनि अपनि मंजिलके माहीं ॥ पांच तुरै रथ एक सुधारा । ताऊपर मन जीव असवारा ॥ जीव पराहै मनके हाथा । नाच नचावै राखै साथा ॥ पांचों तुरै होय असवारा । घेरे काल कलीके द्वारा ॥ यहि धोखा गहि जीव झुलाना । सत्य शब्दको भाव न जाना ॥ सत्य लोकके तुरै तुखारा । ताऊ पर सतगुरु असवारा ॥ हाहाकार करै चहुँ भाती । करै शिकार दिवस औ राती ॥ रथ ऊपर चढ़ि तुरो कुदावै । मारि जनावर ले घर आवै ॥ मारै बाण जान पर तानी । नख शिर वेधे धाव न जानी ॥ ताहि जानवरके शिर नाही । रुधिर मांस देह नहिं ताही ॥ देखत देहदृष्टि नहिं आवै । बिन देखे असमाने धावै ॥ ( बिन देखे असमानहि धावे । ता धोकेमें जिव डहकावे ) ॥ ऐसा देखो जनावर जोरा । बन औ नगर करै घनघोरा ॥ ऐसो विषम जनावर भारी । मारि पारधी लीन्ह संभारी ॥ मारि जनावर नगर बसावै । वाहि ओल देहे बिलमावै ॥ एक नगर दुह रहे नरेशा । भित्र २ दोनों कर देशा ॥

शवासुञ्जार

( २९ )

ताहि नगर दुइ महल बनाये । दुइ दरवानी तहाँ रह्याये ॥ महा विकार दोऊ दरवानी । दोऊ रायकी सेवा ठानी ॥ करै उत्तपन्न दोऊ रजधानी । धर्म धीर औ आदि भवानी ॥ जो कछु उत्पति शहरमें होई । सो सब बांटे लेहि नृप दोई ॥ बांटे खजाना धरै दुराई । लेखा खरच उठावहि राई ॥ लेखा जानि खरच उठाई । लेखा खरच उठावै आई ॥ एक हवेली दस दरवाजा । अहुठ हाथ गढभीतर राजा ॥ राजा प्रजा सबैहि रहवै । इकछत राज चले नहि पावै ॥ दोउ राहुके शहर बताऊँ । बाहर भीतर प्रकट दिखाऊँ ॥ एक घर बसे मोह नृप भारी । ताकी साज विषय अधिकारी ॥ दूसरे घर विवेक बलधारी । ताकी सात सबै हितकारी ॥ इकघर राजा एकघर रानी । विधि संयोग मिलावै आनी ॥ एकघर सूर एक घर चन्दा । एक तेज विष अमृत मन्दा ॥ इकघर शक्ती इकघर शीवा । इकघर मन एकघर जीवा ॥ इकघर पाप एकघर पुन्या । इकघर सांच एकघर शुन्या ॥ इकघर भक्षक बसे अपारा । इकघर रक्षक है रखवारा ॥ इक राजा कर रक्षक नाऊ । रक्षा करै सदा सब ठाऊ ॥ एक राजाकर भक्षक नाऊ । भक्षै सबै न छाड़ि काऊ ॥ दूनों नृपति एकपुर माहीं । एक रथ चढ़ै एक सङ्ग ताही ॥ प्रथमहि भक्षक होइ असवारा । तहाँ जाय जहाँ है करतारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । पैठि विषम जल माहि नहाई ॥ करि असनान तीर्थ परसै । झाई झलकि ज्योति तहाँ दरसै ॥ दुइ प्रतिमाको दर्शन पावै । आदि निरंजन ज्योतिदिखावै ॥ काली कालरूप विस्तारा । नाना रंग तरङ्ग अपारा ॥ देखि रूप मन हर्ष समावै । ज्यों पतङ्ग दीपक कहँ धावै ॥

नं. १० बोधसागर - ४

( ३० )

बोधसागर

देखत बहुत सुहावन ज्योती । नाना रङ्ग लागे बहु मोती ॥ जब परसै तब तेज अपारा । लागे आंच महा विष झारा ॥ सो विष लै भक्षक घर आवै । आनि जीव कहैं घोरि पियावै ॥ विषपिलाय जिव घात लगावै । रथते उत्तरि आपु घर आवै ॥ जब विष चढ़े आप बिसरावै । तब रथ चढ़िके रक्षक धावै ॥ रक्षक दूरि देश कहैं धावै । विषम सरोवर पार सिधावै ॥ विषम सरोवर तजि है पारा । जाइ जहाँ सतनाम पियारा ॥ अमर चोलना देखे जाई । चरण स्वरूप महाँ रहे समाई ॥ परसे सुरति नामकै पाया । मिटे जहर भइ निर्मलकाया ॥ दया तूरे चढ़ि उत्तरे पारा । परसे अमी तत्त्व विस्तारा ॥ अमी तत्त्व तूरे जब परसे । अग्र ज्योति अखंडित दुरसै ॥ वरषै अमृत अग्रही धारा । पिवे जीव विष होय निनारा ॥ सुख सागरमें सुधारस पीवै । लै अमृत फिरि घरहि सिधावै ॥ घरमें आइ रहा ठहराई । अग्र अमी धर राख छिपाई ॥ घरी आध घर माहि जुडावै । भक्षक जहर बहुरि लै आवै ॥ फेरि जहर जीवहि पहुँचावै । जीव सुख होइ अमी गँवावै ॥ जब भक्षक विष जीव पिआवै । फिर रक्षक अमृतकह धावै ॥ एहि विधि रक्षक भक्षक धावहि । एक विष एक अमृत लावहि ॥ विषम सरोवर भक्षक जाई । रक्षक सुख सागर पहुँचाई ॥ इहिविधि दोऊ करै रजधानी । इक दारुण इक शीतल बानी ॥ जादिनघर विधिने दुइकीन्हा । तादिन सोंपि खजाना दीन्हा ॥ दोइ नृपतिके दोइ स्वरूपा । राखै दाम चन्द सूर भूपा ॥ इकघर सूर्य एक घर चन्दा । इक दुख दारुण एक अनन्दा ॥ सकल समाज दोऊके हाथा । अविधि समानखजानासाथा ॥ भयर मता दोऊ घर भारी । श्वासा सार सुधारि सुधारी ॥