कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १०४ )
बोधसागर
अखण्ड फनिमनी तिलक है, अक्षय वृक्ष है सार। अमर महात्मा जानिकै, करैतिलकतत्त्वसार ॥ त्रिकुटी अग्रे मूल है, भुक्तुटीमध्यनिशान । ब्रह्मद्वीप अस्थूल है, अग्रतिलक निरवान ॥ अग्र तिलक शिर सोहै, बैसाखी अनुहार । शोभा अविचल नामकी, देखहुसुरति विचार ॥ जासु तिलक अस्थान है, तासु नाम अस्थीर । खंभ लिलाटै सोभही, तत्त्वतिलकगम्भीर ॥ संता अयनकी खानिहै, महिमा है निजुनाम । अक्षयनामतेहितिलकको, क्षयनहिं अक्षयविश्राम ॥ मध्यगुफा जहां सुरति है, ऊपर तिलकको धाम । अमर समाधि लगावै, अंग अंग अस्थान ॥ कंठी कंठ विराजै, उज्वल हंस अमान । मुख उज्वल चक्षु उज्वल, उज्वल दशा न होय ॥ जो उज्वल है भीतर, ऊपर उज्वल सोय । अंतर कपट मलीनता, ऊपर और न होय ॥ जौन भाव भीतर बसै, ऊपर बरतै सोय । ( भीतर और न देखिये, ऊपर और न होय ) ॥ जौन चाल संसारकी, तौन संतको नाहि । डीभि चालु करनी करे, संत कही नहिं ताहि ॥ साधु सती औ शूरमा, ज्ञानी औ गजदंत । एतौ निकसि न बहुरे, जो युगजायै अनंत ॥ साधु चाल जो जानिहै, साधु कहावैं सोय । बिन साधै साधू नहीं, साधु कहांति होय ॥
श्वसगुञ्जार
( १०५ )
साधु कहावन कठिन है, ज्यों खांडेकी धार । डगमग है तौ कटि परै, गहै तो उतरे पार ॥ साधू सोई जानिये, जो चले साधुकी चाल । परमारथ लागा रहै, बोले बचन रसाल ॥ संगति करिये साधुकी, हरै सकल तन व्याधि । नीची संगति असाधुकी, आठों पहर उपाधि ॥ निश वासर साधु मिलै, मिटै विषम तन पीर । तासु नेह नहिं छोंडिहौं, सदा सुफल तनथीर ॥ साधुनसों संगति करै, जागत सोवत हाल । तासु संगमै ऐ वरहों, ज्यों कर सदा रुमाल ॥ जाके हृदये सत्यहो, सोई सुकृतके साथ । साधु २ सोहावे ताहि, खोजि लेह नगमनीमाथ ॥ साधु न संकट सों परै अगमन हमही होय । दुर्जन मारि बहाइहैं, पला न पकरै कोय ॥ तन मन शीतल शब्दपर, बोलत बचन रसाल । कहै कबीर तेहि दासको, गांजि सकै ना काल ॥ ररा काग विष बोकरा, कूकर नाग मञ्जार । नाहर विषधर दूत, भूत वट औ पार ॥ सब कह बाधी कबीर, आन घाट बाटलै डार । बाट घाट बन औघट, मोहिं खसमकी आश ॥ मते चलौं कबीरके, कबहि न होय बिनाश । भागे यमदूत भूत यम, काल न तिनुका टूट ॥ हंस चले हैं लोक कहैं, काल रहा शिर कूट ॥ चौपाई
धर्मदास सुनो शब्द सन्देश । जाहि देहु ताहि मिटै अन्देशा ॥ जाके घट तुम्हरी सहिदानी । तहाँ प्रगट हम तुमहि समानी ॥
( १०६ )
बोधसागर
जो कोई लेह तुम्हारो नावा । ताके शिर मह मन्दिर छावा ॥ सन्त दसाधरि पन्थ चलावहु । छापा तिलक कंठी पहिरावहु ॥ वैरागी वैराग्य पढावहु । गृहि बासी रहनी समझायहु ॥ वैरागी उन मुनि घर करई । हर्ष शोक कछु चित नहिं धरई ॥ रूखा सूखा करै अहारा । निशदिनरविशशिस्मूरहि सुधारा ॥ विकशित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥ वैरागी आसन आरंभै । माला तिलक सुमिरिनि थंभै ॥ पश्चिम लहरि जो गावै जानी । अजपा जाप जपै सहिदानी ॥ रहिता रहै बहै नहिं कबही । सो वैरागी पावै हमही ॥ हमै पाय हमही अस होई । आवा गौन मिटावै सोई ॥ आवा गौन मिटावै काया । सदा अधीन रहै तत्त्व समाया ॥ काया धरि काया कह बोधै । आवा गौन रहित घर शोधै ॥ जीवत मरै मरै पुनि जीवै । उनमनि बसै महारस पीवै ॥ महा शून्य मां रहे समाई । मरै न जीवै आवै न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हममिलि रहे हमहि असहोई ॥ गृही होइकै रहै उदासा । शब्द कमाइ शब्द विश्वासा ॥ गृही दगा कोटि जो पाई । कहै कबीर भक्ति बतलाई ॥ गृही भाव भक्ती जो साथै । सन्त साधु सेवा आराधै ॥ घर तजि बाहर कबहि न जाई । गुरु नाम भक्ति करै लौलाई ॥ भक्ति करै निर्भय सहिदानी । गुरु औ साधु एककरि जानी ॥ जहाँ साधु तहाँ सतगुरु वासा । जहाँ सतगुरु तहाँ मुक्ति निवासा ॥ जहाँ मुक्ति तहाँ लोक उजागर । जहाँ लोक तहाँ रहै सुखसागर ॥ जहाँ सुख सागर तहाँ कबीरा । भक्ति मध्य बाहर औ तीरा ॥ जहाँ मध्य तहाँ पुरुष अमान । जहाँ बाहे तहाँ हंस सुजान ॥ जहाँ तीर तहाँ निर्मल धीर । जरा मरण नहिं न्यापै पीर ॥
शवासगुञ्जार
( १०७ )
जहां पीर तहां संशय धीर । संशय मध्य असंशय नीर ॥ जहां नीर तहां सुख संतोषा । जरा मरण नहीं ब्यापै धोखा ॥ जहां धोख तहां आवै धीर । जहां धीर तहां गहिर गम्भीर ॥ जहां गँभीर तहां थिर होई । जहां थिर तहां लहरि न सोई ॥ लहरि नाहिं तहां आपै होई । आपा मेटि होई रहै समोई ॥ ममता मोह लहरि तजि जोई । भाव भक्तिके मानुष गोई ॥ मनसा गहै होय निर्वाना । पावै सत्य सही अस्थाना ॥ नातरु फिरि आवै संसारा ।
संसार आइके भक्ति कमाई । भक्ति कमाइके भक्ति कहाई ॥ भक्ति कहाइके रहै उदासा । सतगुरु मिले सत्य विश्वासा ॥ सतगुरुते दूसरे गुरु नाही । आवा गौन रहित घर जाही ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । संशय बहुरि अङ्ग नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥
समय-साधु बडे परमारथी, घन ज्यों वरवै आय ।
तत बुझावै आनकी, आपनो आपन लाय ॥
जैसे वृक्ष न फल भखै, नदी न अँचवै नीर ।
त्यों परमारथ कारने, संतन धरो शरीर ॥
सन्त सराहिये ताहिको, जाके सतगुरु टेक ।
टेक निबाहै देह भरि, रहै शब्द मिलि एक ॥
सत्यशब्द हितमानिकै, सुमिरि सतगुरु धीर ।
धर्मदास तुव वंशके, एके गुरु कबीर ॥
चौपाई
सत्य सुकृत सुमिरै चित माही । टूटत वज्र राखि लेउ राही ॥
समय-सत्य सुकृतके बाल कह, जो चितवे कर दीठ ।
ताजन लगै चौहटै, गुनहगारके पीठ ॥
( १०८ )
बोधसागर
जिह्वा कहौ तो जग तरे, प्रकट कह्यो न जाय । गुप्त प्रवाना लेहु हो धर्मनि, राखो शीश चढाय॥ हँसा तुम मतडरपौ कालसों कर मेरि परतीत । सत्य लोक पहुँचाइहौं, चलिहों भवजल जीत ॥ इति ग्रंथ उदय टकसार, श्वास गुंजार सम्पूर्ण । जो देखा सो लिखा, मम दोष न दीजिए ॥
भूल चूक अक्षर लेव सुधारी ॥ समय नाम गोसाँई साहेब लक्ष्मणदासजीको कोटि कोटि दण्डवत् सब संतन महंतनको कोटि कोटि दण्डवत् । मोकाम गोरखपूर महछा काजीपूर छोटा लीखा भवानी बकस सब संतनके किंकर ॥ असल पुस्तकानुसार नकल किया ।
इति श्वासगुञ्जार संपूर्ण
श्रीबोधसागरे—
आगमनिगमबोध
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत
मुद्रक व प्रकाशक—
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष—“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस,
कल्याण-बम्बई.
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार ‘श्रीवेंकटेश्वर’ मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षाधीन है
A circular seal or logo with a gear-like outer border. Inside the circle, there is a central emblem that is difficult to discern due to the low resolution and blurriness of the image.
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सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
सर्वज्ञः
सर्वज्ञः
सत्यमुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कवीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, मुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दयानामकी दया, वंश व्यालीसकी दया
★
अथ श्रीबोधसागरे
आगमनिगमबोधप्रारंभः
★
त्रयस्त्रिशस्तरंगः
सारखी-वेद शास्त्रको मत अबै, अगम निगम प्रमाण । अब वर्णन सोई लिखो, पढो सकल दे ध्यान ॥
अथ ब्रह्म और जगत उत्पत्ति चौपाई
आदि ब्रह्म अब वर्णन करेऊ । अहंशब्दमें सो थित धरेऊ ॥ ताहि शब्दकरि चित फुरिआया । चित हृदता करि मन प्रकटाया ॥
( २ )
बोधसागर
मनते तन मात्रा भे पांचों । मन स्वरूप ब्रह्माको वांचों ॥ मन ब्रह्मा ब्रह्मा मन सोई । जस संकल्प करे तस होई ॥ रचे अविद्या शक्ति विधाता । जिहि अनात्ममें आत्मलखात ॥ ब्रह्मा सोइ अविद्या कारण । विद्या राचे ताहि निवारण ॥ उठे तरंग सिंधुमें जैसे । बहुरि समाय ताहि पुनि तैसे ॥ ब्रह्माते इमि जगत प्रकटाई । फेरि लीन तामें है जाई ॥ सत्य शुद्धमें मनको फुरना । सो कारण सब दुःखको जुरना ॥ उपै खपै बिधिते जिव कैसे । अग्निते चिनगारी लखि जैसे ॥ दुःख मूल बासना बिकारा । मनही कर्म रूप निज धारा ॥ मन अरु कर्म एकही आहीं । कमलसुगन्धभेद जिमि नाहीं ॥ मनमें जो संकल्प फुराई । सो अँकूर कर्म कहलाई ॥ कर्म कि पूर्व देह मन अहई । मनमय देह कर्मका गहई ॥ जो कछु सत्य असत्य गहोई । मनको कियो सत्य सब होई ॥
इति
अथ चारवर्णकी उत्पत्तिवर्णन—चौपाई
ब्रह्मा मुख ब्राह्मण प्रकटाये । ब्राह्मणको इमि अर्थ बताये ॥ प्रथम अक्षर पवित्रता थापू । द्वितीये अक्षर तेज प्रतापू ॥ द्वितीये बाहुते क्षत्रिय भयेऊ । अक्षर आदि पराक्रम गहेऊ ॥ द्वितीये अक्षर रक्षा कारी । तृतीये वैश्यको अर्थ उचारी ॥ प्रथम शब्द स पति गह सोई । दूजे अर्थ पालना होई ॥ चौथे चरणते शुद्ध उपाये । ताको ऐसे अर्थ बताये ॥ प्रथम शब्द तुच्छता बताई । द्वितीय दीनता अरु सेवकाई ॥ वेद पाठ षट्कर्म जनेऊ । तीन बरणके हेतु बनेऊ ॥ चहुँके संस्कार क्रम न्यारो । ब्राह्मण वर्णको भेद उचारो ॥ ब्राह्मणमें द्वै भेद है सांचो । पंच गौड अरु द्राविण पांचो ॥
आगनिगमबोध
( ३ )
पंच गौडको नाम बखानो । गौडकनौजियासारस्वतिमानो॥ उत्कल मैथिल पांचों गौडा । बहुरिबखानो पंच जो द्रविडा॥ द्राविड गुजराती अरु नागर । महाराष्ट्र तैलंग उजागर ॥ इनते बहुरि अनेकन भयऊ । न्यारे न्यारे नाम सो कहेऊ ॥ वैरागी दश ब्राह्मण जेई । वेदके धर्म ध्वजाधर येई ॥ क्षत्रीमें द्वै भाग प्रशंसी । एक सूर्य द्वितिये शशिवंशी ॥ वैश्यनमें बहु भांतिक भनिया । अग्रवाल आदिक बहु बनिया॥ शूद्र भेष भाषे विधि नाना । तिनको इहां न करौं बखाना ॥ ब्रह्मा चारों वरण बनाई । ताके मन पुनि चिंता आई ॥ बिन लेखक जगकाज न सरिहै । लेखक गणक कर्म को करिहै ॥ यहि विधि ब्रह्म जो करे विचारा । चित्रगुप्त प्रगटे तेहि वारा ॥
इति
अथ चित्रगुप्तजीकी उत्पत्ति कथा वर्णन—चौपाई
लीने कर लेखनि मसिदानी । प्रकटे चित्रगुप्त गुणखानी ॥ ब्रह्माकी अस्तुत उच्चारै । सोधुनिमुनि विधि पलकउधारै॥ ब्रह्माकी तब आज्ञा पाई । तपको चित्रगुप्त बन जाई ॥ वारह वर्ष कीन तप गाढे । पुनि भे ब्रह्मके सन्मुख ठाढे ॥ तब ब्रह्मा निज सभा लगाये । सुरनरमुनिभूपति चलिआये ॥ ऋषी सिसिरसा तहैं पशुधारा । निजकन्या वरहेतु विचारा ॥ कन्या चित्रगुप्त को न्याहा । महिपमन्वंतर पुनि अस चाहा ॥ भूप मन्वंतर सूरजको पोता । ताहि सभा तिहि औसर होता॥ सोऊ अपनी पुत्री देऊ । दोऊ तिय चित्रगुप्त वर गहेऊ॥ पुत्र यउपो दोनों नारी । एकते आठ एकते चारी ॥ माथुर गौड अरु कर्न भनीजै । बालमीक श्रीध्वजहि गनीजै ॥ सकसैना श्रीवास्तव ऐसे । श्रेष्ठाना श्रम सूक हैं तैसे ॥
( ४ )
बोधसागर
भटनागर कुल श्रेष्ठ कहाये । निगम नाम बारह बतलाये ॥ द्वादश चित्रगुप्तके जाये । कायथ लेखक गणक कहाये ॥ चित्रगुप्त धर्मरायके द्वारे । पुण्यपापको लेख उचारे ॥ तिमि ताके सुत पृथ्वी माही । राजद्वार पर लेखक राही ॥
इति
अथ चार आश्रमको वर्णन
दोहा-ब्रह्मचर्य गिरहस्थ पुनि, बानप्रस्थ संन्यास । भिन्न भिन्न इनके धर्म, मरम वेद परकाश ॥
इति
अथ चार वेदोंकी उत्पत्ति कथा वर्णन चौपाई
चौमुह वाक्य ब्रह्ममुख भैऊ । चारों वेद ताहिंते कियऊ ॥ असी सहस्र कमर्कांड प्रमाना । सोलह सहस्र उपाछा जाना ॥ चार हजार कहावै ज्ञाना । यह त्रिकोंडमत वेद बखाना ॥ चारों मम वाक्यको टीका । लक्ष श्लोक व्यास कृत टीका ॥ जेते शास्त्र पुराण कहाये । चारों वेद कि आस गहाये ॥ चारों वेद मूल सब केरा । महाबाक अब करो निबेरा ॥ प्रथमै जो ऋगवेद कहायो । पूरब मुख ब्रह्मा प्रकटायो ॥ ब्रह्मकी बानी भइ येही । प्रज्ञाना ब्रह्म कहि देही ॥ महाज्ञान कहिये प्रज्ञाना । ब्रह्म अर्थ परमेश्वर जाना ॥ यहि महा वाक्य रचे ऋगवेदा । क्रम उपाछा ज्ञान त्रिभेदा ॥ पूरब दिश ऋगकी अधिकाई । द्वितिये यजुर्वेद कहि भाई ॥ दक्षिण मुख ब्रह्मा निज खोले । अहं ब्रह्मा अस्मी सों बोले ॥ अहं अर्थ में ब्रह्म है ईश्वर । हौं अस्मी कह मैं हों ईश्वर ॥ यहि महाँ बाकते यजुर बनाये । दक्षिण देश अधिक फैलाये ॥ सामवेद तृतिये विख्याता । मुख पश्चिम ब्रह्माकी बाता ॥
आगनिगमबोध
( ५ )
महावाक्य ब्रह्माकी येही । तत्त्वमसी ताते कहि देही ॥ तत्त्व ईश्वर त्वं जीव कहाये । हौं पुनि स्मीको अर्थ बताये ॥ पश्चिम दिशतेहिअधिकपसारा । तीनों विधि ताको व्यवहारा ॥ चौथे वेद अथर्वण भाषी । उत्तर सुख ब्रह्माकी साषी ॥ तीनों वेदसे ताहि निकारा । तामें महावाक्य यह धारा ॥ अहं आत्मा ब्रह्म पुकारो । ताका ऐसो अर्थ विचारो ॥ अहं है मैं आत्मम है आपा । ब्रह्म नाम परमेश्वर थापा ॥ मेही हौं परमेश्वर आत्मम । उत्तरमें यहि वेद महात्मम ॥ चार युक्ति चहुँ वेदन माहीं । प्रथमें विधि जिहिकर्मकराही ॥ द्वितीये अर्थ बाद बतलाये । अस्तुति और कर्मफल गाये ॥ तृतिये मंत्र जो देव अराधू । चौथे नाम कथा शुचि साधू ॥ षट प्रकारकी विधि चहुँ वेदा । प्रथमें जग उत्पति निवेदा ॥ द्वितीये प्रलयको व्यौरा ठाना । तृतिये सुरसुनि चरितबखाना ॥ चौथे मन्वन्तर कथ दशचारो । पंचम सुरसुरपति व्यौहारो ॥ छठये धर्मशास्त्र विधिभाषा । तामें कथा भांति बहु राखा ॥ विद्या सकल जगत व्यौहारा । ज्ञान विधान अनेक प्रकारा ॥ ब्रह्मवाद भाषे विधि नाना । जाके पढे लाभ हो ज्ञाना ॥ चार वेद बुधि विद्या मूला । रचे शास्त्र षटतिहिअनुकूला ॥
इति
अथ षट् शास्त्रनको वर्णन चौपाई
अब षट्शास्त्रको वर्णन सुनिये । प्रथम न्याय ऋगवेदतेगुनिये ॥ गौतम न्याय कर्ताको करता । अस विचार ताके उर बरता ॥ सर्वे मई परमेश्वर जाना । एकते बहुरि अनेक बखाना ॥ उत्पति प्रलय कथा बखाने । नित्यानित्य बाद बहु ठाने ॥ द्वितियमीमांसाशास्त्रजोकहिया । यजुर्वेदते ताको गहिया ॥
( ६ )
बोधसागर
जैमिनि मीमांसक रचताही । शिष्य प्रसिद्ध भये बहु बाही ॥ परमेश्वरहि अकर्ता जाना । जक्त अनादि अनंत बखाना ॥ ज्ञान मुक्ति सब कर्मके द्वारा । कर्मके बशी भूत संसारा ॥ मुक्ति होय जिव ज्ञानके मर्मी । ब्रह्मा होय करन भल कर्मी ॥ तृतीय शास्त्र वेदांत बताये । सामवेदेते व्यास बनाये ॥ एक ब्रह्म द्वितीया कछु नाहीं । स्वप्न समान जक्त दरशाहीं ॥ ब्रह्ममें जबही माया डोले । ताको तब ईश्वर कहि बोले ॥ ईश्वर तीन भाग पुनि भयऊ । रज सम तमगुननामसोकहेऊ ॥ जेते जक्त माँह व्यौहारा । यही तीन सबके करतारा ॥ कर्म रहितसो ब्रह्म बखाना । कर्म स्वरूप तीन ये जाना ॥ मायायुक्त भये जब तीनों । तिहि कारण ईश्वर कहि दीनों ॥ ब्रह्म अविद्या युक्त जो होई । ताको जीव कहे सब कोई ॥ त्रिगुणब्रह्म अरु जग जिवसारे । सबही एक स्वरूप विचारे ॥ भिन्न अविद्या करिके माना । द्वै शक्ती तिहि माँह बखाना ॥ यक विशेष शक्ति कहलाये । द्वितीये अबरनशक्ति बताये ॥ शक्ति विशेषते जग उपजाये । अबरन शक्ती ज्ञान दुराये ॥ ज्ञानके उदय मुक्तिपद धरही । वेदांती यह निर्णय करही ॥ चौथे सांख्यशास्त्र मत गाढा । ताहि अथर्वण वेदते काढा ॥ रचे ताहिको कपिल मुनीशा । सोउ अकर्ता कथ जगदीशा ॥ सबही रचना प्रकृति कराये । जक्त अनादि सदा यहिभाये ॥ काहू बस्तूको नाश न होई । करता में करतूत समोई ॥ द्वैविधि भाषे पुरुष महातम । जीव आतमा अरु परमातम ॥ पुरुष प्रकृतको जब हो मेला । होय सकल रचनाको खेला ॥ पुरुष पंगुला परकृत अन्धी । दोहु बिनन्हि जगरचना बंधी ॥ प्रलय कालतिहु गुन समताई । रचनामें सतगुरु अधिकार्ई ॥
आगमनिगमबोध
( ७ )
पुरुषते महातत्त्व प्रकटार्ह । पुनि हंकार इन्द्रीतत्त्व गार्ह ॥ प्रलयको घौस बहुरि जब आवै । इन्द्री तत्त्व सब तहाँ समावै ॥ जिहि क्रमसे जो दियौ देखाई । तिहि क्रम २ सब जाहि लुपाई ॥ पंचम शास्त्र पतंजल कहेऊ । वेद अथर्वणसे सो गहेऊ ॥ ऋषि पातंजलि ताहि बनाई । वर्णन सारुयशास्त्र सम तार्ह ॥ योग युक्ति तिहि माँह बखाना । ज्ञान द्वारते युक्ति प्रमाना ॥ छठे शास्त्र वैशेषिक भाये । मुनि कणाद कर्ता कहलाये ॥ वेद अथर्वणते गहि लीना । यह षट्शास्त्रको वर्णन कीना ॥
इति श्री षट्शास्त्र
अथ चार उपवेद वर्णन
दोहा-आयुर्वेद धनुर्वेद पुनि, गन्धर्ववेद बखान ।
अथर्वेद ये चार हैं, तिनकी निर्णय ठान ॥
चौपाई
प्रथमे आयुर्वेद करतारा । ब्रह्मा प्रजापति अश्वनीकुमारा ॥ धन्वन्तरि आदिक रच ताही । कामशास्त्र वेदादिक जाही ॥ द्वितिये धनुर्वेदके करता । विश्वामित्र नाम सो धरता ॥ ब्रह्मा परजापति से जोई । विश्वामित्र सिखे गुन सोई ॥ सकल युक्ति शिष कीन प्रचारा । परजा पालन कै व्यौहारा ॥ शास्त्र प्रहारकि युक्ति है तामें । युद्धकरनकी बिधि वह वामें ॥ आयुध दोय प्रकारके मुक्ता । एक है मुक्त अरु द्वितिय अमुक्ता ॥ तृतिये मुक्तामुक्त कहाऊ । यंत्र मुक्त चौथेको नाऊ ॥ हाथसे जो चक्रादि चलाये । ताको नाम मुक्त बतलाये ॥ तरवार आदि अमुक्त बखाना । बरछी मुक्तामुक्त प्रमाना ॥ बहुरि तीर आदिक अरु गोली । यंत्र मुक्त तिनको कहि बोली ॥ मुक्त आयुधको अस्त्र कहीजै । अरु अमुक्तको शास्त्र भनीजै ॥
( ८ )
बोधसागर
सने चार प्रकार नाम धर । घोढचढरथचढगजचढपद्मचर॥ असगुन सगुन बहुत विधिभाषा । क्षत्री धर्म सकल तह राखा ॥ तृतिये गन्धर्व वेद बताये । ताहि भरथजीने प्रगटाये ॥ नाद नृत्य सुर ताल अनन्ता । विविधि भांतिसे ताहि बंदता ॥ युक्ति अनेकन देव अराधू । निरविकल्प पुनि कथे समाधू॥ चौथे अर्थवेद विधि कहिये । नाना युक्ते ताहिमें लहिये ॥ नीति शास्त्र अरु अश्चारुढा । शिल्प सूष आदिक मतिगुढा॥ धन उपाय बहु विधि तहलहिये । अर्थ वेद यहि कारण गहिये ॥ द्रव्य उपाजन रीति बनाई । अर्थ वेद पुनि अस अर्थाई ॥ कसेहु निपुण होय नर जोऊ । भाग बिना धन लहै न कोऊ ॥ ताते अन्त कथे बैरागा । सब चातुरी वृथा इमिलागा ॥ चहुँ उपवेदको यह सिद्धांता । सब तजि हो विरक्त बुधवन्ता ॥ वेद उपवेद कि विधिमें पागा । अन्त मुख्य वैराग अरुत्यागा॥
इति
अथ चार उपवेद षट् अंगवर्णन--चौपाई
शिक्षा कल्प व्याकरण वरनो । पुनि निरुक्तियोतिषचितधरनौ॥ पिंगल सहित कहैं षट् अङ्गा । विविधि भांति भाषे परसंगा॥ प्रथमें शिक्षा शास्त्रमें कहेऊ । नाना भांति कि युक्ती गहेऊ ॥ वेदके शब्द न माह बखाना । अक्षरनके अस्थानको ज्ञाना ॥ पाणिनीय है ताके करता । युक्ति चातुरी बहु तहँ धरता ॥ द्वितीये कल्पके सूत्रन माहीं । वेद कि विधिसो कहै तहाहीं ॥ कर्मके अनुष्ठान विधि गायन । पाणिनि पातंजलि कात्यायन ॥ तृतिये कथे व्याकरण जोई । वेदको शब्दबोध तिहि होई ॥ पाणिनीय आदिक बहु तेरे । कर्ता सोई व्याकरण केरे ॥ चौथे निरुक्त शास्त्रके माहीं । ऐसी निर्णय कीनो ताहीं ॥
आगमनिगमबोध
( ९ )
अपर सिद्धपद वेद जो होई। तासु अर्थ बोधक है सोई ॥ यास्क मुनीश्वर कथे बखानी। नाम निरूपन निर्णय ठानी ॥ आदित्य आदिक अरु बहुतेरे। रचित निरुक्त शास्त्र तिन केरे ॥ पंचम पिंगल कीन बखाना। पिंगलमुनिरचि छंद विधाना ॥ छटये ज्योतिष कालको ज्ञाना। आदित्यादिक गर्ग बखाना ॥
इति चार उपवेद
अथ अठारह पुराणोंके नाम-चौपाई
ब्रह्म बहुरि वयवर्त बखानो। बावन अरु ब्रह्मांड प्रमानो ॥ मार्कण्डेय भविष्य कहावै। नारद विष्णु पुराण बतावै ॥ गरुड बराह अरु पद्म गनीजै। भागवत मीन वो कूर्म कहीजै ॥ लिंगो वायु पुराण बताया। फिर अस्कंधो अग्नि कहाया ॥
इति
अथ शास्त्रके अठारह प्रस्थान वर्णन-चौपाई
शास्त्रके हैं प्रस्थान अठारा। या विधि तिनको नाम उचारा ॥ चार वेद उपवेद हैं चारी। वेदनके षट् अंग विचारी ॥ धर्मशास्त्र मीमांसा न्याई। चौथे पुनि पुराण बतलाई ॥ उप पुराण पौराण अनेका। अठारहेंकी नियम न एका ॥ स्मृती महाभारत रामायण। मंत्रशास्त्र नाना विधि गायन ॥ वाम तंत्र देवीके राखा। नारद पंचरात्र पुनि भाषा ॥ देव अराधन विधि बहु भनते। जक्त कार्य ताते भल गनते ॥
इति
अथ चारवेद को बाद वर्णन-चौपाई
प्रथम कहै ऋगवेद बखानी। निराकार परमेश्वर मानी ॥ निरलेपो सो अलख अगोचर। निरालंब सो जान ब्रह्मवर ॥ द्वितीय अथर्वण भाषत होई। निरालम्ब निलैप न कोई ॥
( १० )
बोधसागर
नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण कहेऊ । जो कोइ मरा मुक्त सो भैऊ ॥ जैसे पत्र वृक्ष ते टूटा । फेर न सो तरुवरमें जूटा ॥ ऐसो जीव मरा यकवारा । बहुरि नहीं ताते तन धारा ॥ तृतीय यजुर अस कहे बहोरी । इन दोनोंकी मतिभई भोरी ॥ सर्गुण ब्रह्म नरायण होई । क्षीर समुद्र शयन कर सोई ॥ दश अवतार सोई धरिलीनो । गोपीनके संग कीडा कीनो ॥ चौथेसाम कह पुनि मत अपना । यह सब जानो झूठ कल्पना ॥ नहीं सर्गुण नहीं निरगुण देवा । नहीं दृष्टि गोचरको भेवा ॥ सम्पूर्ण है ब्रह्म अखण्डा । तत्वमसी अद्वैतसे मण्डा ॥
इति
अथ षट्शास्त्रकी बादर्षणन—चौपाई
प्रथम मीमांसा शास्त्र आचारी । कर्म थापि निजु ज्ञान उचारी ॥ जो कछु लाभ जक्तसे कीना । सो सब जान कर्म आधीना ॥ कर्महि अधिष्ठान जिवकेरा । कर्मते करे जक्त में फेरा ॥ कर्म प्रवृत्त कर्म लय पावै । कर्महि दुखसुख जीव भुगावै ॥ भूत भग्य व्रत मानिक जोई । कर्म अधीन जान सब सोई ॥ अज हरि हर सनकादिक जेते । कर्म अधीन जान सब तेते ॥ कर्म अधीन ज्ञान अरु योगा । जो जस करे भोग तसभोगा ॥ कर्म स्वतंत्र सर्वे परगावै । जो जस करै सो तसफल पावै ॥ द्वितीय बाद वयशेष वदंता । कर्म नहीं जानिये सुतंता ॥ कर्मतो कालकि बसमें होई । काल पाय कर्मकरै न कोई ॥ जब कतहुँ परगात न होई । भोर कर्म तब करै न कोई ॥ जौ मध्यान न सन्द्या आवै । बिना काल को कर्म गहावै ॥ बाल कर्म ना हो तरुनाई । युवा कर्म नहीं शिशु करि पाई ॥ युवा कर्म करि सकै न बूढा । वृद्ध कर्म तरुनाई गूढा ॥
आगमनिगमबोध
( ११ )
ताते यह निश्चय करि मानो । कर्म कालकी वश में जानो ॥ कालहि ब्रह्म और नहिं कोई । काल पाय अज हरि हर होई ॥ काल पाय पुनि सो बिनसाही । उतपति प्रलयकाल वश आही ॥ कालहि ते सुख दुख लहंता । काल स्वतन्त्र कर्म परतन्ता ॥ जब चाहे क्रम कर नर लोई । काल किये ते कवहु न होई ॥ ताते काल सत्य करि मानी । कर्म असत्य वैशेषिक बानी ॥ तृतीय न्याय निज मत अर्थाई । काल है छीन छीन है जाई ॥ घटि बटि जाय कालकी बाते । काल कर्म नास्ती दोष ताते ॥ अस्ति एक परमात्म आही । तीन काल आवै अरु जाही ॥ निजु बश ईश्वर कालको धरई । जब जस चाहे तब तस करई ॥ ग्रीषम वर्षा काल बनावै । वर्षाको ग्रीषम दिखलावै ॥ चाहे रंक् रावकरि द्वारी । भूपतिको पुनि करे भिखारी ॥ सकल सूत्रधर ईश्वर ऐसे । नाचे जग कठपुतली जैसे ॥ ताते परमेश्वर है अस्ती । काल वो कर्म सुभाव है नास्ती ॥ चौथे पतञ्जलि कह यह लेखा । कहो कहां तुम ईश्वर देखा ॥ तुम नहिं जौ ईश्वर लखिपाई । तौ पुनि कैसे ताहि बताई ॥ कैसो ईश्वर होइ रे भाई । बिन देखे कह कहो बुझाई ॥ ईश्वर वहां सो कैसे जाना । बिनु अनुभव भाखे अनुमाना ॥ पीतर पाथर प्रथमा पूजो । अनुमानहिते मनमें सूजो ॥ यह सब झूठ भरमको फन्दा । आत्म शुद्ध सच्चिदानन्दा ॥ सो हम जोग मार्ग ते जाना । तुमको नहिं कहु अनुभवज्ञाना ॥ तुम प्रतिमा पूजो यहि लेखे । हम ब्रह्मांड पिंडमें देखे ॥ तुम हो झूठो हम हैं सांचे । ईश्वरकी अनभौ तुम काचे ॥ ताते योग सत्करि जानो । और सकल झूठा करि मानो ॥ पञ्चम सांख्यपती अस बोलो । तुम सब मिथ्या भ्रमयुत डोलो ॥