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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ३४ )

बोधसागर

तब रामानन्द बचन सुनाई । शूद्रके कान न लागौ भाई ॥ रामानन्द न दिक्षा दीने । तब कबीर अस उद्यम कीने ॥ वीच पंथमें पौढे जाई । जिहि मारग रामानन्द आई ॥ पिछला पहर राति जब आवै । रामानन्द असनानको जावै ॥ चले जात मारगमें जबहीं । लगा खराऊँ ठोकर तबहीं ॥ तब पुकारिके रोवन लागे । रामानंद खड़े भे आगे ॥ बालक देखि दया उर आई । रामानंद कहे समुझाई ॥ मतिरोवो मति करो पुकारा । राम नाम किन कहु मेरे बारा ॥ तब कबीर सो शिक्षा पाई । गुरु शिष्यको भाव बनाई ॥ रामराम धुनि रटनि लगाया । रामानंदसे बचन सुनाया ॥

सत्यकबीर बचन

गुरुजी समुझि गहो मोरे बाहीं । औरनसो चेला हम नाहीं ॥ जो बालक घुनघुनवा खेले सो बालक हम नाही । चौदह सो चौरासी चेले तिनमध्ये हम नाहीं ॥ हम तो लेते सत्तको सौदा पाखंड पूजवै हम नाहीं । बांह गहो तो गहिके पकरो फेर छूटि ना जाहीं ॥ हाड चाम मेरे नहिं कोई जुलहा जाति हमनाहीं । तुमरी नावमें केवट नाहीं लहरि उठै बिकरारा ॥ गुरु समेत शिष्य जब बूड़े कौन उतारो पारा । जौं तुमरे कछु उद्यम नाही भीख मांगि किन खाहू ॥ मूरि सजीवन जानत नाहीं भूलि न बांधो काहू । सूखे काठमें ज्यों घुन लागे लोहे लागी काई ॥ बिन पगतीत गुरु जो कीजै तो काल घसीटे जाई ॥ कहे कबीर सुनौ रामानंद यह सिखलेव हमारी । निरखि परखिके चेला कीजै तागुरुकी बलिहारी ॥

आगमनिगमबोध

( ३५ )

चौपाई

रामानन्द गये असनाना । तब कबीर गृह कियौ पयाना ॥ भोरहि कण्ठी तिलक लगाये । नग्रलोग सब देखन आये ॥ पूछे किमि यह भेष बनाये । तब कबीर यह उत्तर सुनाये ॥ रामानन्दको गुरु हम धारा । ताते ऐसे भेष सँवारा ॥ रामानन्द खबर जब पाई । तब कबीरको टेरि बोलाई ॥ रामानन्द गुरु परदा धारा । सत्य कबीर से बचन उचारा ॥ रे जोलहा ते कहसि न मोही । कब मैं दीक्षा दीनों तोही ॥ गुरुजी राम कृष्ण तुम मेरे । रैन पन्थ प्रकटै कयों तोरे ॥ तुम तब रामनाम मोहि दीना । मैं निज जन्मसुफलकरिलीना ॥ कहै गुरु यह बालक रहेऊ । ठोकर लगा राम तिहि कहेऊ ॥ गुरुजी हंमही रहै सो बाला । राम राम सुनि भयेनिहाला ॥ कह गुरु तू वैश्य कि शूद्रा । वह तो इता बाल बुधि भोरा ॥ तिहि छिनबालरूप दिखलाओ । तब गुरु रामानंद पतियायो ॥ पै जोलहा ब्रह्मवादि कराही । अन्तर ओट सोदियौ बहाई ॥ कहै साधु गुरुसे समुझाई । कबीरहिजुलहानकहिये गुसाई ॥ अनंतानंद कहै परचाये । कबीर सो ब्रह्मरूपधरि आये ॥ दीजै दरशन इनको स्वामी । ये आहि ब्रह्मसोअन्तर्यामी ॥ तबहु न दर्शन दीन गुसाई । तब हम सन्मुख ठाढभे जाई ॥

साखी-गुफामाह गोपहुँचहौं, पूछे को तुम आहु ।

मैं कबीर सेवक अहौं, अजहुँ नहिं पतियाहु ॥

चौपाई

रामानंद कहाव गुरु मेरा । सत् कबीर मैं सेवक तोरा ॥ गुरु सोई जो शिष्य चितावै । शिष्य सोई गुरुसेवा लावै ॥ कहौ गुरु गुरुज्ञान विचारी । को है पुरुष कौन है नारी ॥

( ३६ )

बोधसागर

कौन पुरुषको सुमिरो नामा । कहौ कहाँ अबिचलनिजुधामा ॥ कहौ ध्यान कीजै किहि केरा । तन छूटे कह होय बसेरा ॥ रामानंद कहै सुनु पूता । गुरुसुख ज्ञान रहो संयुक्ता ॥ आपै पुरुष आप है नारी । कहो ज्ञान चित्तराख संभारी ॥ सुमिरहु दशरथ सुत श्रीरामा । अवधपुरी अविचलनिजधामा ॥ श्याम स्वरूप ध्यानमन धारो । तन छूटे बैकुण्ठ सिधारो ॥ कहै कबीर सुनो गुरुदेवा । यह समुझाय कहो मोहिभेवा ॥ रामचन्द्र त्रेतामें भयऊ । काहुहुखाय काहु सुख दयऊ ॥ लोभमोह जुत वन वन डोला । तत्त्वप्रकृत संगतितिहि बोला ॥ जौन बाटते रघुपति आये । सूत कौशल्याको कहलाये ॥ जब त्रेता तब राम भुवारा । कौन पुरुषको सकलपसारा ॥

सारखी-अहो गुरु समुझाइये, कोहै सिरजन हार ।

रामचन्द्र गुरु बंदेउ, कौन नाम आधार ॥

चौपाई.

कहत निगम अस करे विचारा । पूर्व अवर्न जन्मसो न्यारा ॥ तात मात बंधु सो नहिं ताही । ना वह आवै ना वह जाही ॥ श्याम श्वेत नहिं कहिये ताही । इन्द्रासन बैकुण्ठ न जाही ॥ तीन लोक सब परलय होई । निजु धाम कहो कहाँ है सोई ॥ स्वर्ग लोक तुम राखी आशा । फिरि फिरि होय गर्भमें वासा ॥

सारखी-स्वर्गनरक न्यारा, सो मोहि देहु चिह्नाय ।

कहवाते जीव आयेऊ, कहोगुरु समुझाय ॥

चौपाई

सुनहु कबीर कहो सो गहहु । करिये योग अमर है रहहु ॥ आसन साधहु बांधहु मूला । अष्टकमलदल निरखहु फूला ॥

आगमनियमबोध

( ३७ )

चन्द सूर गहि कीजै मेला । मन पौना शुभ निधर खेला ॥ चढ़ि अकाश अमृत रसपीवो । तब कबीर तुम युग युग जीवो ॥

साखी-स्वर्ग नरकते न्यारा, ज्योतिपुरुष निर्वाण ।

तहवाँसे जीव आइया, कहो गुरु सहिदान ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो हो स्वामी । तुम हो उत्तगुरु अन्तरजामी ॥ योगके किये अमर जो होई । तौ पुनि योगी मरे न कोई ॥ का भो साथे आसन मूला । जौं नहिं मेटे संशय झूला ॥ का भो अष्टकमलके पेखे । जौं नहिं आप रूप निजु देखे ॥ का भो चन्द सूरके मेला । जौं नहिं शब्दसुरति गहि खेला ॥ का भो सुष्मनि जाय समाये । जौं नाहीं अक्षर लखि पाये ॥ क्याअकाश चढ़ि अमृत पीये । जौं नहिं नाम अभी चित दीये ॥ ज्योति स्वरूपी पुरुष बतायहु । ज्योति काल तीनों पुरुषायहु ॥ यहिजिव नाहिं ज्योतिसे आवा । परम ज्योतिसे अंश उपावा ॥ जो जिव ज्योति पुरुषते होई । नौ काहे जिव जाय विगोई ॥ ज्योति निरंजन काल अन्याई । सिद्धि तपी सब धीरधरिखाई ॥

साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुर नर मुनि सब झार ।

ज्योति निरंजन सब कहे, खायो बारंबार ॥

चौपाई

जाहि कहत हो पुरुष निर्वाण । वही आहि तौ काल देवाना ॥

साखी-योग यज्ञ जपतीरथ, यह सब यमके जाल ।

कहै कबीर सतनामबिन, कबहु न छोड़ै काल ॥

पाँच तीन जहवां नहिं, नहीं प्रकृत प्रवेश ।

रविशशिपानीपौननहिं, तहँको कहो सँदेश ॥

( ३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहै गुरु तुम शिष्य भये मोरे । यह सब बुद्धिको दीनेहु तेरे ॥ कहै कबीर सब तुम परतापा । हमरे तुमहि माया अरु बापा ॥ तब गुरु हमपर भये दयाला । निजकरदियौ सुमिरिनी माला ॥ कहै गुरु सुन साधु कबीरा । तुम तो सेवक हो मतिधीरा ॥ सर्वांनंद विप्र यक आये । तिन पुनि गुरुते गोष्ठि कराये ॥ ताहि जीत गुरु शिष्य करावा । तब गुरु हम कह तिलककरावा ॥ सब पर श्रेष्ठ हमें गुरु कीना । हम पुनि सबते रहै अधीना ॥

साखी-गुरुके सब शिष्य मोहिको, बोलैं गुरुसमान ।

हम गुरु साधु अधीन हैं, भाषै निर्भय ज्ञान ॥

शब्द

लख कोई विरलापद निर्बान । बिन रसना सूर धरै ध्यान ॥ तामें दरसे पुरुष पुरान । कर्म छोड़ि सब भर्म नसान ॥ डुरमति छोड़ि कमल धरु ध्यान । तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निसान । रामानन्द गुरु करै बखान ॥ दास कबीरको निरमल ज्ञान ।

इति

मेरो नाम कबीरा हो जगत गुरु जाहिरा । तीन लोकमें मागा मेरा त्रिकुटी है अस्थान ॥ पानीपौन समेरसमाना इस विधि रच्यौ जहाना । गगन मन्दिरमें वासा मेरा मंजनि है अस्थाना ॥ ब्रह्मबीज हमहीसे आया हमरै सकल जहाना । अनहद लहर गगन गढ उपजै बाजै सोहं तारा ॥ गुप्त भेद वाहीसे कहिये जो निज होय हमारा । भवबंधनसे लेहु छोड़ाई निरमल करो शरीरा ॥

आगमनिगमबोध

( ३९ )

सुर नर सुनि कोई भेद न पावै पावै संतगंभीरा ॥ वेद कदापि पार नहिं पावै ऐसे मतिके धीरा । कहै कबीर सुनो रामानन्द दोनों दीनके पीरा ॥

चौपाई

रामानन्द कबीर कहानी । जक्तमाह बहु विधि विहरानी ॥ कछु मैं सूक्ष्म लिख्यौ बनाई । कीरति जासु जक्तमें छाई ॥ सत् कबीरको चरित अनेका । सो कछु इहां लिखौ नहिं एका ॥ केते परचा गुरुहि देखाई । तब ताके हिय निश्चय आई ॥ मैं घनघोर गुष्ठि गुरु पाही । अगम ज्ञान सुनि बोले ताही ॥

रामानंद वचन

दोहा-मैं जाना तुम जोलहा, मोहि पडा बड घोष । मूल दिशा मोहि देव कबीर, जीवत आवै संतोष ॥ करता तुम हो साधू हो, सत्य कबीर है देव । तनमन तुमको अपिहों, करह दीक्षा मोहि देव ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

सारखी-काल करन्ते आज कर, आज करंते अब । औसर बीता जात है; व्यौहार करोगे कब ॥ काल करंते काल है, मोहि भरोसा नाहिं । यह तनं काचा कुम्भ है, विनशि जाय छनमाहिं ॥ घडी पलकको सुधि नहीं, करो कालको साज । काल अचानक मारि है, ज्यों तीतरको बाज ॥

चौपाई

योगी गोरख नाथ प्रतापी । तासुतेज पृथ्वी पर व्यापी ॥ काशी नग्रमें सो पग परही । रामानन्दसे चर्चा करही ॥ चरचामैं गोरख जय पावै । कंठी तोरे तिलक छुडावै ॥

( ४० )

बोधसागर

सत्य कबीर शिष्य जब भयऊ । यह वृत्तांत तब सो सुनि लयऊ ॥ गोरखनाथके डरके मारे । बैरागी नहीं वेष सँवारे ॥ तब कबीर आज्ञा अनुसार । वैष्णव सकल स्वरूप सँवारा ॥ सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ । काशीनथ शीघ्र चलि आयौ ॥ रामानन्दको खबरि पठाई । चर्चा करो मेरे सँग आई ॥ रामानन्दकी पहिली पौरी । सत्य कबीर बैठे तिहि ठौरी ॥ कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ॥ प्रथम करो चर्चा सँग मेरे । पीछे मेरे गुरुको टेरे ॥ बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि बचन उचारी ॥

सत्यकबीर वचन--शब्द

कबके भये वैरागी कबीरजी कबके भये वैरागी । नाथजी हम जवसे भये वैरागी मेरी आदि अन्त सुधिलागी ॥ धुधूकार आदिको मेला नहीं गुरु नहीं चेला । जबका तो हम योग उपासा तबका फिरों अकेला ॥ धरती नहीं जदकी टोपी दीना ब्रह्मा नहीं जदका टीका । शिवशंकरसो योगी नहीं जदका झोली शिवका ॥ द्रापरकी हम करी फावडी त्रेताको हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई कलियुग फिरौ नौखण्डा ॥ गुरुके वचन साधुकी संगत अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनोहो गोरख जब हम तत्त्व लखाया ॥ जो बूझे सो बावरा क्या उमर हमारी । असंख्य युग परलय गई तबके ब्रह्मचारी ॥ कोटि निरंजन हो गये परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं सोहं ब्रह्मचारी ॥ दश कोटि ब्रह्मा भये नौ कोटि कन्हैया ।

आगमनिगमबोध

( ४१ )

सात कोटि शंभू भये मोरी एक पलैया ॥ कोटिन नारद होगये महम्मदसे चारी । देवतनकी गिनती नहीं है क्या सृष्टि विचारी ॥ नहीं बूढ़ा नहीं बालक नहीं भाट भिखारी । कहै कबीर सुन गोरख यह उमर हमारी ॥ अविध्व अविगतसे चलि आये कोई भेद सरम नहीं पाया । ना मेरो जन्म न गर्भवसेरा बालक है देखलाया ॥ काशीनथ जङ्गल विचडेरा तहाँ जोलाहे पाया । माता पिता मोरे कछु नाहीं न मेरो गृहदासी ॥ जुलाहाको सुत आनिकहाया जगत करत है हाँसी । धड नहीं मेरे गगन कछु नाहीं सूझै अगम अपारा ॥ सत्य स्वरूपी नाम साहेबको सौहै नाम हमारा । अधरद्दीप नहीं गगन गुफामें तहँनिजु वस्तु हमारा ॥ ज्योतिषरूपी अलख निरञ्जन सो जपै नाम हमारा । हाड चाम लोहू नहीं मोरे हौ सतनाम उपासी ॥ तारन तरन अभै पददाता कहै कबीर अविनाशी ।

गोरखवचन

कौन छुरा कौन पानी गुरु मूँडै कौन बानी ॥

सत्यकबीर वचन

शब्द छुरा निरञ्जन पानी गुरु मूँडै निरबानबानी ।

गोरखवचन

कौन दर कौन दरवेश कौन गुरुने मूँडै केश ॥

कौन पुरुको सुमिरी नांव मांगो भिक्षा भांडो गांव ॥

सत्यकबीर वचन

मन दर पौन दरवेश गुरु गोविंदने मूँडै केश ॥

अलख पुरुषको सुमिरो नांव मांगो भिक्षा तारो गांव ॥

( ४२ )

बोधसागर

गोरख वचन—चौपाई

कौन तुमारी उत्पत्ति कीनी । किसने तुमको माला दीनी ॥ कौन गुरु दीनो उपदेश । उतारो माला करो आदेश ॥

कबीर वचन

आदि पुरुषने उत्पत्ति कीनी । सिरजन हारने माला दीनी ॥ गुरु गोविंद दीनो उपदेश । न उतारों माला नाकरों आदेश ॥

गोरख वचन

क्या लै उठो क्या लै बैठो रहो कौनकी छाया । कौन माह निरञ्जन पेखे कैसे त्यागी माया ॥

कबीर वचन

एकले उठ एकले बैठे रहै एककी छाया ॥ एकै माह निरञ्जन पेखा सहजे त्यागी माया ॥

गोरख वचन

कौन तुमारी डिब्बी बोलिये कौन तुमारा चावल ॥ कौनसो तुममें सिद्ध बोलिये कौनसो तुमरो रावल ॥

कबीर वचन

काया हमारी डिब्बी बोलिये कर्म हमारे चावल ॥ एक हमसे सिद्ध बोलिये और सकल है रावल ॥

गोरख वचन

कौन तुमारी गुदरी बोलिये कौन तुमारा धागा ॥ कौन तुमारी टोपी बोलिये काहेते मन लगा ॥

कबीर वचन

काया हमारी गुदरी बोलिये पौन हमारा धागा ॥ गगन हमारी टोपी बोलिये अलख पुरु मन लगा ॥

आगमनिगमबोध

( ४३ )

गोरखवचन

कौन तुमारी तिलक बोलिये कौन तुमारा छापा ॥ कौन तुमारी जाति बोलिये कहा तुमारी आसा ॥

कबीरवचन

तत्त्व हमारी तिलक बोलिये राम नाम है छापा ॥ वैष्णव हमारी जाति बोलिये शब्द मंडलमें आसा ॥

गोरखवचन

शब्द कहाँसे आया कहो शब्दको विचार ॥ नहीं तो तिलक माला धरो उतार ॥

कबीरवचन

शब्दै धरती शब्दै अकाश । शब्दै पांच तत्त्वके बास ॥ कहैं कबीर हम शब्द सनेही । शब्द न बिनसै बिनसै देही ॥

गोरखवचन

अंडान मंडान चार खुरो द्वै कान ॥ जान तो जान नातो झोली माला उरे आन ॥

कबीरवचन

अण्डान धरती मंडान आकाश चारों खूट चारोंखूरी चंद्रसूर्यद्वै कान ना जानो मात्रा तो गुरु रामानंदकी आन ॥ शेर्ली सिंगी और खटपटी । फिर बोलो तोरों कनपटी ॥

गोरखवचन

आसन बांधो बासन बांधो अरु बांधो नौद्वारा ॥ तोहि बांधों तेरे गुरुको बांधों निकसे कौने द्वारा ॥

कबीरवचन

आसन मुक्ता वासन मुक्ता मुक्ता है नौ द्वारा ॥ मैं मुक्ता मेरो गुरुभी मुक्ता निकसै दशमें द्वारा ॥

( ४४ )

बोधसागर

चौपाई

गोरखनाथ कबीर समाजा । विविध ज्ञान विज्ञान विराजा ॥ चर्चा पर्चा बहुविधि ठानो । विदित जत्तमें लोगन जानो ॥ इहांसो कथा लिखो नहिं कोई । अन्त बाद जिहि औसर होई ॥ गोरख नर्म भये तिहि बारा । विनयसहित निजबचनउचारा ॥

गोरखबचन

नवो नाथ चौरासी सिद्ध, इनको अनहद ज्ञान । अविचल घर कबीरको, यह गति विरलाजान ॥ झोरी झण्डा कूबरी, शेली टोपी साथ । दाय़ा भई कबीर की, चढ़ाई गोरखनाथ ॥

धर्मदास बचन

दोहा-बाजा बाजा रहितका, परा नगरमें शोर । सतगुरु खसम कबीर है, नजर न आवै और ॥

नानकशाह बचन

शब्द-वाह वाह कबीर गुरु पूरा है । पूरे गुरुनकी मैं बलि जैहौं जाको सकल जहूरा है ॥ अधर दुलैच परै है गुरुनके शिव ब्रह्मा जह शूला है ॥ श्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके बाजत अनहद तूरा है ॥ पूर्ण कबीर सकल घट दरशै हरदम हाल जहूरा है ॥ नाम कबीर जपै बडभागी नानक चरणको धूरा है ॥

सत्य कबीरबचन नानकशाहप्रति

शब्द-वाह वाह लडके जीतारहु । मंड़येकी रोटी बथुयेकी भाजी ठंडा पानी पीतारहु ॥ प्रेमकि मुई सुरतिको धागा ज्ञानगूदरी सीतारहु ॥

आगमनिगमबोध

( ४५ )

यहि लडकेकी बड बड अँखियां नितप्रति दरशन करतारहु ॥ कहैं कबीर सुनो भाई लडके रामरसिक रस पीतारहु ॥

मल्लुकदास वचन

शब्द-जपो रे भाई साहिब नाम कबीर ॥

एक समय गुरुवंशी बजाई कार्लिंदीके तीर ।

सुरनरसुनि सब चकित भये हैं अरु यमुनाजीको नीर ॥

काशी तजि गुरु मगहर आये दोऊदीनके पीर ।

कोइ गाड़ै कोइ अभ्रजलावै नेक न धरते धीर ॥

चार दागते सतगुरु न्यारा अजर अमरो शरीर ।

जगन्नाथको मंदिर थापे हटि गये सायर नीर ॥

आसा रोपि ससुद्ध हटाये ऐसे गुरु गँभीर ।

दास मल्लुक श्लोक कहत हैं खोजहु खसम कबीर ॥

दाबूराम वचन

साखी-अधर चाल कबीरकी, मोसे कही न जाय ।

दाढ़ कूदै मिरग ज्यों, पर धरनि पर आय ॥

हिन्दूको सतगुरु सही, सुसलमानको पीर ।

दाढ़ दोनों दीनमें, अदली नाम कबीर ॥

हिन्दू अपनी हृद चले, सुसलमान हृद माह ।

दाढ़ चाल कबीरकी, दोऊ दीनमें नाह ॥

दाढ़ बैठे जहाजपर, जो दरियाके तीर ।

जलकी जेती माछरी, रटै कबीर कबीर ॥

नाभाञ्च वचन

दोहा-वानी अरबो खरबो, ग्रन्था कोटि हजार ।

करता पुरुष कबीर, रहै नामे विचार ॥

नं. १० बोधसागर - ८

( ४६ )

बोधसागर

गरीबदास वचन

सारखी-गरीबपंजा दस्त, कबीरकासिरपर धारो हंस । जम किंकर चपै नहीं, अथर जात है वंश ॥

श्रीमहादेव उवाच

श्लोक-यः सुखसागरो दाता बीजज्ञानं तथैव च । आद्यन्तरहितो लोके यः कबीर इहोच्यते ॥ कलांशेन गतो भूम्यां विलासा सत्य संज्ञकः । दीनोद्धारतिदक्षः कबीरसंज्ञः इहोच्यते ॥ कर्ताकोन्यायकारी च व्यक्ताव्यक्तःसनातनः । रमते सत्यलोके यः स कबीर इहोच्यते ॥

पारवतीजीने पूछा कि कबीर किसको कहते हैं ? उनके उत्तरमें शिवजीने कबीर साहिबकी स्तुतिमें सौ एक श्लोक कहे हैं उस ग्रन्थको कबीर एकोत्तर कहते हैं जो सामवेद और पाताल खण्डमें हैं उसमेंसे यह तीन श्लोक लिखे हैं ।

इति

अथ वैष्णव आचार वर्णन-चौपाई

सहित बिचार आचार घनरे । उज्वल क्रिया तासुकी हेरे ॥ नित दातन मज्जन तन करही । शौच क्रिया भली भाँतिसे धरही ॥ मांस मद्य आदिक हैं जेते । जानि अभक्ष न संग्रह तेते ॥ जप तप ध्यान धुन्दधते धारे । ठाकुरकी पूजा विस्तारे ॥ मूरति होय कि मानस ध्याना । उभय भाँति हरि सेवा ठाना ॥

अथ मूर्तिपूजा आठ प्रकार वर्णन

दोहा-मनोमयी परतक्ष कही, चित्र बखानो काठ । माटी धात ध्यानमय, प्रतिमा पूजा आठ ॥

आगमनिगमबोध

( ४७ )

चौपाई

प्रथमहि पानी विद्या जानो । विनविद्या किमिहरि पहिचानो॥ द्वितिये पुष्पको अर्थ कहीजै । एक देवकी टेक कहीजै ॥ तृतिये चावल अर्थ सुनाओ । भोग अशुचिपरधान्यन खाओ॥ चौथे चन्दनते इमि जानी । काम क्रोधकी कीजै हानी ॥ कीना डाह द्वेष सब जोई । उरते दूर बहाओ सोई ॥ पंचम धूप अर्थ इमि कहिये । प्रीति देव गरमीते गहिये ॥ छठये दीपको अर्थ बताओ । बुद्धिदीप निजहृदय जगाओ ॥

अथ मुक्तिस्वरूप वर्णन—चौपाई

जीवते ब्रह्म होय जो कोई । मुक्तनाम भाषे श्रुति सोई ॥ चार भांतिकी मुक्ति प्रमाना । सालोको सामीप बखाना ॥ सारूपो सायुज्य कहीजै । ऐसो तिनको अर्थ गहीजै ॥ सालोकहिं प्रभु लोक निवासा । सामीपा हरिके ढिग वासा ॥ सारूपा प्रभु रूप हो भाषा । सायुज्यौ हरिमें मिल दासा ॥ जस वासना दास उर होई । तैसी मुक्ती पावै सोई ॥ जब उपासना पूर्ण भैऊ । जीवनमुक्त ताहि तब कहेऊ ॥ परम धामको जब सो जावै । हरिपारषद तासु ढिग आवै ॥ जब हरिधामको चालन लागे । थूल देहको तब सो त्यागे ॥ लिंगदेह तब धारण करई । पांचो तत्त्व देह परिहरई ॥ जब भूलोकते आगे चाला । पृथ्वी तत्त्व देह तब डाला ॥ बहुरि देह पानी की धारा । तब जसतत्त्व लंघिहो पारा ॥ बहुरि अग्निदेही गह सोई । पार अग्नि घेरा तब होई ॥ फेर वायुकी देहको धारी । पौन घेर बाहर पग धारी ॥ इमि तन त्यागत गहनव्रीना । सकल घेर बाहर पग दीना ॥ चलि ब्रह्मांड पार जब कीता । मायापार भो त्रिगुणातीता ॥

( ४८ )

बोधसागर

पुनि परमात्म प्रकाश बखाना । तामें जाय करे असनाना ॥ करि असनान लिंगतन छोडा । दिव्य देह अबिकारी जोडा ॥ ज्ञानानंद ब्रह्म तन पाई । निज स्वामी के द्वारे जाई ॥ आदरयुत प्रभुके ढिग आवै । हरिगुण विविधि मांतिसे गावै ॥ प्रभु दायामाया ते छूटा । कठिन दुःखते प्रभुपद जूटा ॥ ब्रह्मानंद मगन मन होई । यद्यपि ऐसो समरथ सोई ॥ रचे अमित ब्रह्मांड जो चाहे । पालपोषिके पुनि तिहि ढाहे ॥ तदपि ब्रह्म सुख ऐसो लहई । और दिशा नहीं तो चितबहई ॥ याहूमें व्यौरा बहु तेरा । कथा कछुक लिखिये तिनकेरा ॥ व्यौरा वेद कहे यहि भाये । जो कोई सुक्त स्वरूप समाये ॥ सागरमें जस बुंद समाना । पै वह बुंद आपको जाना ॥ बढ़ुरि कहै श्रुति ऐसो लेखो । ऐसी मुक्ति जीवको देखो ॥ पुष्पमाल जैसे हरि केलो । अथवा जैसे भूषन हेरो ॥ यहिविधिजिवहरि अंगमें जूटा । जिहि औसर मायाते छूटा ॥

इतिमुक्त

अथ परलोकमें पुण्यात्मा और परमात्माको वर्णन दोहा-कथा कहौ परलोककी, जब जिव त्यागे प्रान । मुरछा मृतके गत भये, पुनि तिहि जक्त फुरान ॥

चौपाई

जीवकी जब मूरछा गत होई । इंद्रिन सहित आप तन जोई ॥ पिछली स्मृतिहि दियो बिसराई । जन्म धरंत आपको पाई ॥ बाल युवा बृद्धादिक माना । जाति पांति कुलमें लपटाना ॥ भ्रम करिके जित जगको देखा । जैसे कछु स्वपनेको लेखा ॥ जाग्रत स्वप्न भेद नहीं कोई । स्वप्नहुमें स्वपनांतर होई ॥ भ्रमही करि पितु माता जाना । मिथ्या भास गहे अज्ञाना ॥

आगमनिगमबोध

( ४९ )

मृतक होय जीव जिहि बारा । देह अन्त बाहक तब धारा ॥ बहुरि बासना प्रेरि लै आवै । अधि भौतिक देही दिखलावै ॥ अधि भौतिक देहि जब पाया । दुखसुखको कारन यह आया ॥ हृदय कमल अंगुष्ठ प्रमाना । जीव अकाश जौ नाम बखाना ॥ ताहि कमलमें भर्मत रहई । लोक अनन्त दृष्टिमें गहई ॥ तहैं कोटिन ब्रह्मांड निहारी । हृदय कमल निज माह विचारी ॥ तीन प्रकार पुण्य जन राशी । मूरख पुनि धानां अभ्याशी ॥ तृतिये सर्व शिरो सुनि ज्ञानी । भिन्न २ गति निर्णय ठानी ॥ धानां भ्यासीकी यह बाता । तन तजि इष्ट देव दिग जाता ॥ अपने इष्ट देव पुर जाई । नाना विधि सुख भोग कराई ॥ नहिं मूरख नहिं ज्ञानी जोई । सुखसे निज तन त्यागे सोई ॥ बहुरि जन्म जगमें सो पाई । पुनि सो आतम लाभ लहाई ॥ अब ज्ञानीकी कथा बखानी । तजत देह सब सुखकी खानी ॥ मुक्ति विदेह तासुको ठीका । जिनके हृदय ज्ञानको ठीका ॥ पापीको अब मरण बतावो । महा दुःख ताके उर छावो ॥ जिनको अज्ञानिनको सङ्ग । उत्तम बुद्धि होय जिहि भंगा ॥ पापी चार कर्म जो करही । श्रुति विरुद्ध मग माह बिचरही ॥ तजै देह जब ऐसे लोगा । तिनको घेर शूल सौ सोगा ॥ विषय बुद्धि जासु लपटानी । दुसह दुःख पावै सो प्रानी ॥ हो पदार्थसे तिनहि वियोगा । रुंधित कंठ स्मृत सुख भोगा ॥ नैन तासु दोउ तब फटि जाही । कांति विरूप अंग हो ताही ॥ अंग उपांग टूटै तिहि बारी । प्रान निकसिगहि मारग नारी ॥ होय पदार्थ वियोग दुखारी । अस अनुमान करे दुख भारी ॥ अग्नि कुंडमें डारे जैसे । दुःसह पावै दुखजिव जैसे ॥ सर्व द्रव्य तिहि भ्रमयुत भासा । नभ पृथ्वी पृथ्वी आकाशा ॥

( ५० )

बोधसागर

परम कष्ट पावै तिहि काला । नभते जनु कोइ महिमें डाला ॥ पाथर में धरि मनहु पिसाना । जिमि तून भोडरमें भरमाना ॥ अंध कूपमें जैसे गेरा । मानहु कोल्हूमें धरि पेरा ॥ रथते गिरे जीव जिमि नीचे । रस्सी ज्यों गलडारिके खींचे ॥ दुःख अनंत परकार बखानो । कह लो ताकी निर्णय ठानो ॥ मूर्छित होय गहै जडताई । ताके कर्म जुरहि सब आई ॥ जिमि किशान बीजनको बोवे । समय पाय ताको फल होवे ॥ प्रान अपान कला दोउ टूटे । विषय वियोग महा दुख जूटे ॥ मृत्यु समय जब जिव सुरछाना । गगन लीन हो पौन अरु प्राना ॥ ताहि प्रानमें चेतन ताई । चेतनता बासना गहाई ॥ सहित बासना चेतन प्राना । गगन रूप है गगन समाना ॥ यथा गंधको पौन गहाई । ताहि सहित नभ स्थित कराई ॥ तिमि चेतन बासन सहिते । जाय अकाश माह सो थीते ॥ तिहि अनुसार बहुरि जगफुरता । तब कालते सो तिहि जुरता ॥ दोय प्रकारके जीव दुखानी । पापी अरु पुण्यातम प्रानी ॥ पुनि तिनमें कर तीन विधाना । एक महा पापी करि जाना ॥ द्वितिय मध्य तृतिये लघु होई । तीन प्रकार पुण्य जन सोई ॥ एक महा पुण्यातम लोई । पुनि मध्यम लघुको मतिजोई ॥ प्रथम महा पापी दुख हेरे । धन पखान सो ताको टेरे ॥ जड समान सुरछामें रहई । वर्ष सहस्र न चेतन गहई ॥ ताहु सुरछामें दुख भूरी । बहुरि ताहि चेतनता फूरी ॥ जब ताके तनमें सुधि आवै । आको देह सहित लखि पावै ॥ तब सो जायके नरकमें परता । अमित काल तामें दुख भरता ॥ नाना भांति परम दुख पाई । बहुरि नरकते बाहर आई ॥ देह अनंत धरे पशु केरा । बहुरि सो मानुष को तन हेरा ॥

आगमनिगमबोध

( ५१ )

जब धारे सो मानुष देहा । महा नीच दारिद्री गेहा ॥ सोऊ तन धरि दुःखबहु भोगा । कबहु न सुख पावैसो लोगा ॥ अब मध्यपापी गति वरणो । जाहि समय होतोको मरणो ॥ जडीभूत हो वृक्ष समाना । उर अंतर दुख दौंदह काना ॥ कछुक काल पीछे सुधि आवै । अर्क माह निज वासा पावै ॥ नर्क भोगि पुनि पशुतन धारी । फिर नरदेह केरि अधिकारी ॥ अब सुन लछु पापीकी वाता । मूर्छित हो पुनि चेतन गाता ॥ नर्क भोगि पुनि पशु कलेवर । ताहि भोगिफिरमानुषतनधर ॥ अब पुण्यातमको कह मर्मा । जिनके जक्त मोह भल कर्मा ॥ महा पुण्यजन जब मरिजावै । स्वर्गसे तब विमान चलि आवै ॥ तिहि विमानपर ताहि चढाई । आदर सहित वाहि ले जाई ॥ जाहि देवताको सो ध्यावै । तासु लोक निज भौन बनावै ॥ अपने इष्टदेव ढिग जाई । सबहि भांतितिहिमुखसरसाई ॥ भोगि स्वर्ग आवै नर देशा । काहू फलमें करै प्रवेशा ॥ तिहि फलको पुरुष जो खाई । वीर्य द्वार तिहि उदर समाई ॥ जननी जठरते बाहर होई । उत्तम कुल धनवंता सोई ॥ जौं वासना रहित हो येही । तो सौं धरे संत गृह देही ॥ सहित वासना सुख सरसाया । रहित वासना भक्ति अमाया ॥ अब मध्यम धर्मी गति सुनिये । प्रेरित पुण्यस्वर्ग ग्रह गुनिये ॥ अब लछु पुन्यातप गति कहई । मृत्यु पीछे अस चेतन गहई ॥ सगे बंधु मम क्रिया कराही । ताते पितर लोक हम जाही ॥ पितरलोक सुख लहि महि आवै । जैसा कर्म देहै तस पावै ॥ पापी सुये दुःख चहुँ पास । महा कठिनमारगतिहिभासा ॥ जिहि मारग ताको लेजाई । कंटक लगे चरन में ताही ॥ तपै तेज रबि तापै भारी । ताते ताको तन जर छारी ॥

( ५२ )

बोधसागर

जो कोई पुण्यातम लोई । छायाको अनुभव तिहि होई ॥ सुन्दर सर वापी विधि नाना । चहुँदिश बने सोहावनथाना ॥ सुखद पंथसे तेहि लेजाही । पापीको सब बुःख दरशाही ॥ धर्मरायके ढिग जब जावै । चित्रगुप्त तब लेख लगावै ॥ चित्रगुप्त क्रम कागज खोले । सबके पुण्य पापको बोले ॥ चित्रगुप्त जस न्याव चुकावै । तैसे जीव दुःख सुख पावै ॥ बडे पूण्यते स्वर्ग बसेरा । जगमें सब सुकर्म जिन केरा ॥ जहां तहां शोभित बन बागा । भांति २ के दुम तहाँ लागा ॥ इन्द्रके नन्दन बनकी शोभा । जाहि देखि मुनिवरमनलोभा ॥ देव अंगना केर छवि भारी । महा मोहनी रूप सँवारी ॥ स्वर्ग गुन सुख कथे बहुता । लहे जीव निज पुण्य प्रसूता ॥

दोहा-जैसे स्वर्गमें सुख घने, तिभि दुःखनर्कअनंत ।

होय जहां यमयातना, बहुविधि वेद वदंत ॥

इति

अथ प्रलयवर्णन-चौपाई

तैतालिस लाख बीस हजारा । चहुँ युग आयु यकठै धारा ॥ ताको सहस गुना पुनि करिये । एक ब्योस ब्रह्माको धरिये ॥ जैसी दिन तैसी है राती । जागे ब्रह्मा रैन सिराती ॥ दिनमें करै जगतको काजा । रैनमें निद्राको सुख साजा ॥ रैनमें सबही जगत नशाना । चन्द्र सूर्य लम्बादिक नाना ॥ केते ऋषि मुनि सहितविधाता । जीये और सकल विनसाता ॥ बहुरि वेद ऐसो अनुमाना । ब्रह्मा सहित सकल विनशाना ॥ दूजा ब्रह्मा पुनि तन धारी । कारय सकल करे संसारी ॥ जन्मको सूतक बहु नहि टूटै । एक मेरे दूजा पुनि जूटै ॥ न्यायशास्त्रअरुसांख्य बखाना । सकलकृतमतिदिकालसिराना ॥

आगमनिगमबोध

( ५३ )

पुनि वेदान्त सो मता गहीते । कृतम जाल कबहूँ नहि वीते ॥ एक मरे दूजा पुनि होई । कारय जक्त सनातन सोई ॥ दोय प्रकारकि परलय होई । खण्ड प्रलय महा पल्य सोई ॥ खण्डप्रलय पुनि द्वैविधि कीनो । ऐसो ताको लेखा चीन्हो ॥ नाम चतुरमुख कल्प कहीजै । चौदह मन्वंतर तामें कीजै ॥ एक मन्वंतर जब बित जावै । तब जगमें जल प्रलय आवै ॥ पृथ्वी जड चेतन संहारा । सकल नसाहि ताहि जलधारा ॥ एक मन्वन्तरकी थित भाखा । तीस करोर पञ्चासी लाखा ॥ मध्यमें दोय मन्वंतर केरे । संधी नाम तासुको टेरे ॥ सत्रह लक्ष सहस्र अठाइस । तासन्धीको लेख लगाइस ॥ इतने काल जक्त नहि रहई । बरते शून्य वेद अस कहई ॥ बाल भोग लघु परलय जाना । महा प्रलय निश भोजन माना ॥ जब जो महाप्रलय तिहि आवै । मरा जो निश्चय देह सो पावै ॥ होय सकल जब धर्मकी हानी । पाप पयोधि बुडै नर प्रानी ॥ कतहु न दीख अचार बिचारा । मन मत पन्थ जक्त जिव धारा ॥

छन्दोटक

सुत मानत मातु न तात जही । गुरु सेवन देवन दान कही ॥ कलि कौतुक घोर कठोर महा । सुखदुःखितको हरिनाम कहा ॥ कपटी लपटी नर नारि गना । नहि मानत सन्त महन्त जना ॥ तपसी लपसी जग खात फिरे । सुंडिका धनिका बनिकार भिरे ॥ द्विज चिन्ह उनेउ न वेद किया । भगवाँ यक भेष अलेख प्रिया ॥ बहु यंत्रन मन्त्रन दर्व हरी । बिन राम रमे किमि काम सरी ॥ बिरती बिन सिद्ध जती फिरते । नहि ज्ञान है चित बिना थिरते ॥ कलिकाल कराल दुकाल मरी । नर पीडक सो दुख द्रंद भरी ॥ तजि रूपवती युवती भरता । नहि गारि लहो परनारि रता ॥