कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ४८ )
बोधसागर
पुनि परमात्म प्रकाश बखाना । तामें जाय करे असनाना ॥ करि असनान लिंगतन छोडा । दिव्य देह अबिकारी जोडा ॥ ज्ञानानंद ब्रह्म तन पाई । निज स्वामी के द्वारे जाई ॥ आदरयुत प्रभुके ढिग आवै । हरिगुण विविधि मांतिसे गावै ॥ प्रभु दायामाया ते छूटा । कठिन दुःखते प्रभुपद जूटा ॥ ब्रह्मानंद मगन मन होई । यद्यपि ऐसो समरथ सोई ॥ रचे अमित ब्रह्मांड जो चाहे । पालपोषिके पुनि तिहि ढाहे ॥ तदपि ब्रह्म सुख ऐसो लहई । और दिशा नहीं तो चितबहई ॥ याहूमें व्यौरा बहु तेरा । कथा कछुक लिखिये तिनकेरा ॥ व्यौरा वेद कहे यहि भाये । जो कोई सुक्त स्वरूप समाये ॥ सागरमें जस बुंद समाना । पै वह बुंद आपको जाना ॥ बढ़ुरि कहै श्रुति ऐसो लेखो । ऐसी मुक्ति जीवको देखो ॥ पुष्पमाल जैसे हरि केलो । अथवा जैसे भूषन हेरो ॥ यहिविधिजिवहरि अंगमें जूटा । जिहि औसर मायाते छूटा ॥
इतिमुक्त
अथ परलोकमें पुण्यात्मा और परमात्माको वर्णन दोहा-कथा कहौ परलोककी, जब जिव त्यागे प्रान । मुरछा मृतके गत भये, पुनि तिहि जक्त फुरान ॥
चौपाई
जीवकी जब मूरछा गत होई । इंद्रिन सहित आप तन जोई ॥ पिछली स्मृतिहि दियो बिसराई । जन्म धरंत आपको पाई ॥ बाल युवा बृद्धादिक माना । जाति पांति कुलमें लपटाना ॥ भ्रम करिके जित जगको देखा । जैसे कछु स्वपनेको लेखा ॥ जाग्रत स्वप्न भेद नहीं कोई । स्वप्नहुमें स्वपनांतर होई ॥ भ्रमही करि पितु माता जाना । मिथ्या भास गहे अज्ञाना ॥
आगमनिगमबोध
( ४९ )
मृतक होय जीव जिहि बारा । देह अन्त बाहक तब धारा ॥ बहुरि बासना प्रेरि लै आवै । अधि भौतिक देही दिखलावै ॥ अधि भौतिक देहि जब पाया । दुखसुखको कारन यह आया ॥ हृदय कमल अंगुष्ठ प्रमाना । जीव अकाश जौ नाम बखाना ॥ ताहि कमलमें भर्मत रहई । लोक अनन्त दृष्टिमें गहई ॥ तहैं कोटिन ब्रह्मांड निहारी । हृदय कमल निज माह विचारी ॥ तीन प्रकार पुण्य जन राशी । मूरख पुनि धानां अभ्याशी ॥ तृतिये सर्व शिरो सुनि ज्ञानी । भिन्न २ गति निर्णय ठानी ॥ धानां भ्यासीकी यह बाता । तन तजि इष्ट देव दिग जाता ॥ अपने इष्ट देव पुर जाई । नाना विधि सुख भोग कराई ॥ नहिं मूरख नहिं ज्ञानी जोई । सुखसे निज तन त्यागे सोई ॥ बहुरि जन्म जगमें सो पाई । पुनि सो आतम लाभ लहाई ॥ अब ज्ञानीकी कथा बखानी । तजत देह सब सुखकी खानी ॥ मुक्ति विदेह तासुको ठीका । जिनके हृदय ज्ञानको ठीका ॥ पापीको अब मरण बतावो । महा दुःख ताके उर छावो ॥ जिनको अज्ञानिनको सङ्ग । उत्तम बुद्धि होय जिहि भंगा ॥ पापी चार कर्म जो करही । श्रुति विरुद्ध मग माह बिचरही ॥ तजै देह जब ऐसे लोगा । तिनको घेर शूल सौ सोगा ॥ विषय बुद्धि जासु लपटानी । दुसह दुःख पावै सो प्रानी ॥ हो पदार्थसे तिनहि वियोगा । रुंधित कंठ स्मृत सुख भोगा ॥ नैन तासु दोउ तब फटि जाही । कांति विरूप अंग हो ताही ॥ अंग उपांग टूटै तिहि बारी । प्रान निकसिगहि मारग नारी ॥ होय पदार्थ वियोग दुखारी । अस अनुमान करे दुख भारी ॥ अग्नि कुंडमें डारे जैसे । दुःसह पावै दुखजिव जैसे ॥ सर्व द्रव्य तिहि भ्रमयुत भासा । नभ पृथ्वी पृथ्वी आकाशा ॥
( ५० )
बोधसागर
परम कष्ट पावै तिहि काला । नभते जनु कोइ महिमें डाला ॥ पाथर में धरि मनहु पिसाना । जिमि तून भोडरमें भरमाना ॥ अंध कूपमें जैसे गेरा । मानहु कोल्हूमें धरि पेरा ॥ रथते गिरे जीव जिमि नीचे । रस्सी ज्यों गलडारिके खींचे ॥ दुःख अनंत परकार बखानो । कह लो ताकी निर्णय ठानो ॥ मूर्छित होय गहै जडताई । ताके कर्म जुरहि सब आई ॥ जिमि किशान बीजनको बोवे । समय पाय ताको फल होवे ॥ प्रान अपान कला दोउ टूटे । विषय वियोग महा दुख जूटे ॥ मृत्यु समय जब जिव सुरछाना । गगन लीन हो पौन अरु प्राना ॥ ताहि प्रानमें चेतन ताई । चेतनता बासना गहाई ॥ सहित बासना चेतन प्राना । गगन रूप है गगन समाना ॥ यथा गंधको पौन गहाई । ताहि सहित नभ स्थित कराई ॥ तिमि चेतन बासन सहिते । जाय अकाश माह सो थीते ॥ तिहि अनुसार बहुरि जगफुरता । तब कालते सो तिहि जुरता ॥ दोय प्रकारके जीव दुखानी । पापी अरु पुण्यातम प्रानी ॥ पुनि तिनमें कर तीन विधाना । एक महा पापी करि जाना ॥ द्वितिय मध्य तृतिये लघु होई । तीन प्रकार पुण्य जन सोई ॥ एक महा पुण्यातम लोई । पुनि मध्यम लघुको मतिजोई ॥ प्रथम महा पापी दुख हेरे । धन पखान सो ताको टेरे ॥ जड समान सुरछामें रहई । वर्ष सहस्र न चेतन गहई ॥ ताहु सुरछामें दुख भूरी । बहुरि ताहि चेतनता फूरी ॥ जब ताके तनमें सुधि आवै । आको देह सहित लखि पावै ॥ तब सो जायके नरकमें परता । अमित काल तामें दुख भरता ॥ नाना भांति परम दुख पाई । बहुरि नरकते बाहर आई ॥ देह अनंत धरे पशु केरा । बहुरि सो मानुष को तन हेरा ॥
आगमनिगमबोध
( ५१ )
जब धारे सो मानुष देहा । महा नीच दारिद्री गेहा ॥ सोऊ तन धरि दुःखबहु भोगा । कबहु न सुख पावैसो लोगा ॥ अब मध्यपापी गति वरणो । जाहि समय होतोको मरणो ॥ जडीभूत हो वृक्ष समाना । उर अंतर दुख दौंदह काना ॥ कछुक काल पीछे सुधि आवै । अर्क माह निज वासा पावै ॥ नर्क भोगि पुनि पशुतन धारी । फिर नरदेह केरि अधिकारी ॥ अब सुन लछु पापीकी वाता । मूर्छित हो पुनि चेतन गाता ॥ नर्क भोगि पुनि पशु कलेवर । ताहि भोगिफिरमानुषतनधर ॥ अब पुण्यातमको कह मर्मा । जिनके जक्त मोह भल कर्मा ॥ महा पुण्यजन जब मरिजावै । स्वर्गसे तब विमान चलि आवै ॥ तिहि विमानपर ताहि चढाई । आदर सहित वाहि ले जाई ॥ जाहि देवताको सो ध्यावै । तासु लोक निज भौन बनावै ॥ अपने इष्टदेव ढिग जाई । सबहि भांतितिहिमुखसरसाई ॥ भोगि स्वर्ग आवै नर देशा । काहू फलमें करै प्रवेशा ॥ तिहि फलको पुरुष जो खाई । वीर्य द्वार तिहि उदर समाई ॥ जननी जठरते बाहर होई । उत्तम कुल धनवंता सोई ॥ जौं वासना रहित हो येही । तो सौं धरे संत गृह देही ॥ सहित वासना सुख सरसाया । रहित वासना भक्ति अमाया ॥ अब मध्यम धर्मी गति सुनिये । प्रेरित पुण्यस्वर्ग ग्रह गुनिये ॥ अब लछु पुन्यातप गति कहई । मृत्यु पीछे अस चेतन गहई ॥ सगे बंधु मम क्रिया कराही । ताते पितर लोक हम जाही ॥ पितरलोक सुख लहि महि आवै । जैसा कर्म देहै तस पावै ॥ पापी सुये दुःख चहुँ पास । महा कठिनमारगतिहिभासा ॥ जिहि मारग ताको लेजाई । कंटक लगे चरन में ताही ॥ तपै तेज रबि तापै भारी । ताते ताको तन जर छारी ॥
( ५२ )
बोधसागर
जो कोई पुण्यातम लोई । छायाको अनुभव तिहि होई ॥ सुन्दर सर वापी विधि नाना । चहुँदिश बने सोहावनथाना ॥ सुखद पंथसे तेहि लेजाही । पापीको सब बुःख दरशाही ॥ धर्मरायके ढिग जब जावै । चित्रगुप्त तब लेख लगावै ॥ चित्रगुप्त क्रम कागज खोले । सबके पुण्य पापको बोले ॥ चित्रगुप्त जस न्याव चुकावै । तैसे जीव दुःख सुख पावै ॥ बडे पूण्यते स्वर्ग बसेरा । जगमें सब सुकर्म जिन केरा ॥ जहां तहां शोभित बन बागा । भांति २ के दुम तहाँ लागा ॥ इन्द्रके नन्दन बनकी शोभा । जाहि देखि मुनिवरमनलोभा ॥ देव अंगना केर छवि भारी । महा मोहनी रूप सँवारी ॥ स्वर्ग गुन सुख कथे बहुता । लहे जीव निज पुण्य प्रसूता ॥
दोहा-जैसे स्वर्गमें सुख घने, तिभि दुःखनर्कअनंत ।
होय जहां यमयातना, बहुविधि वेद वदंत ॥
इति
अथ प्रलयवर्णन-चौपाई
तैतालिस लाख बीस हजारा । चहुँ युग आयु यकठै धारा ॥ ताको सहस गुना पुनि करिये । एक ब्योस ब्रह्माको धरिये ॥ जैसी दिन तैसी है राती । जागे ब्रह्मा रैन सिराती ॥ दिनमें करै जगतको काजा । रैनमें निद्राको सुख साजा ॥ रैनमें सबही जगत नशाना । चन्द्र सूर्य लम्बादिक नाना ॥ केते ऋषि मुनि सहितविधाता । जीये और सकल विनसाता ॥ बहुरि वेद ऐसो अनुमाना । ब्रह्मा सहित सकल विनशाना ॥ दूजा ब्रह्मा पुनि तन धारी । कारय सकल करे संसारी ॥ जन्मको सूतक बहु नहि टूटै । एक मेरे दूजा पुनि जूटै ॥ न्यायशास्त्रअरुसांख्य बखाना । सकलकृतमतिदिकालसिराना ॥
आगमनिगमबोध
( ५३ )
पुनि वेदान्त सो मता गहीते । कृतम जाल कबहूँ नहि वीते ॥ एक मरे दूजा पुनि होई । कारय जक्त सनातन सोई ॥ दोय प्रकारकि परलय होई । खण्ड प्रलय महा पल्य सोई ॥ खण्डप्रलय पुनि द्वैविधि कीनो । ऐसो ताको लेखा चीन्हो ॥ नाम चतुरमुख कल्प कहीजै । चौदह मन्वंतर तामें कीजै ॥ एक मन्वंतर जब बित जावै । तब जगमें जल प्रलय आवै ॥ पृथ्वी जड चेतन संहारा । सकल नसाहि ताहि जलधारा ॥ एक मन्वन्तरकी थित भाखा । तीस करोर पञ्चासी लाखा ॥ मध्यमें दोय मन्वंतर केरे । संधी नाम तासुको टेरे ॥ सत्रह लक्ष सहस्र अठाइस । तासन्धीको लेख लगाइस ॥ इतने काल जक्त नहि रहई । बरते शून्य वेद अस कहई ॥ बाल भोग लघु परलय जाना । महा प्रलय निश भोजन माना ॥ जब जो महाप्रलय तिहि आवै । मरा जो निश्चय देह सो पावै ॥ होय सकल जब धर्मकी हानी । पाप पयोधि बुडै नर प्रानी ॥ कतहु न दीख अचार बिचारा । मन मत पन्थ जक्त जिव धारा ॥
छन्दोटक
सुत मानत मातु न तात जही । गुरु सेवन देवन दान कही ॥ कलि कौतुक घोर कठोर महा । सुखदुःखितको हरिनाम कहा ॥ कपटी लपटी नर नारि गना । नहि मानत सन्त महन्त जना ॥ तपसी लपसी जग खात फिरे । सुंडिका धनिका बनिकार भिरे ॥ द्विज चिन्ह उनेउ न वेद किया । भगवाँ यक भेष अलेख प्रिया ॥ बहु यंत्रन मन्त्रन दर्व हरी । बिन राम रमे किमि काम सरी ॥ बिरती बिन सिद्ध जती फिरते । नहि ज्ञान है चित बिना थिरते ॥ कलिकाल कराल दुकाल मरी । नर पीडक सो दुख द्रंद भरी ॥ तजि रूपवती युवती भरता । नहि गारि लहो परनारि रता ॥
( ५४ )
बोधसागर
तिय सुन्दर पीय विहायगता । अरधंगन सङ्ग अनंग मता ॥ कर पाप अनंत भनंत कहा । परिताप संतापन लोग दहा ॥ श्रुतिपन्थ बिहायकुपन्थ चले । तजि अमृतछाकसो खाकडले ॥ गृह सम्पति दंपति हीन भये । दरवेश अलेखको भेष भये ॥ नहिं साध विषय क्रमसाधतये । विन सार लखे यमद्वार गये ॥ मदनातुर युत्य फिरै युवती । किमि भोग नरा नरही कुवती ॥ तिय ठाट भये जब घाट नरा । न अधार कहू विभिचार भरा ॥ उठिगे श्रुति धर्मनके बकता । मनमानता जो जेहि सो छकता ॥ बरणाश्रम धर्मके मर्म नहीं । सब शंकर भे न सुकर्म कहीं ॥ समता बिगता ममता गरको । जिव रोग वो शोकनमें ढरको ॥ अघ औगुन सौगुन जीव लदा । मन वांछित बोध न वेद वदा ॥
चौपाई
यहि विधि जक्त धर्म बिनसावै । तब हयश्रीव प्रगट हो आवै ॥ शिर तुरंग देही नर जाको । धावै सकल घरा परि पाको ॥ पौन प्रसंग अङ्ग तिहि पाई । जीवकि बुद्धि शुद्ध है जाई ॥ लघु प्रलय जब धर्मकि हानी । महाप्रलय अब कहो बखानी ॥ चीन्ह अनेक भयावन होई । औबा मरी भरी दुखजोई ॥ पश्चिम दिशिते रवि उगि आवै । द्वितीया दक्षिणमें प्रकटावै ॥ उत्तर पूरव सूर्य देखे । दशाहु दिशा दश रवि यह लेखे ॥ एक सूर्य प्रथमै ते रहऊ । बडवा अग्नि ते सोई कहेऊ ॥ बडवानल अरु ग्यारह सूर। द्वादश सूर्य तेजते पूरा ॥ शिव पुनि तीसर नैन उधारा । शेषके मुखते अग्नि प्रचारा ॥ महा तेज पृथ्वीमें भरेऊ । थावर जङ्गम सब कछु जरेऊ ॥ पौन प्रचंड अण्ड भरि पेखे । परवत उडहि तूलके लेखे ॥ गिरि सुमेरु आदिक गिर नाना । सूखे पत्र सो गगन उडाना ॥
आगमनिगमबोध
( ५५ )
सात सिंधु तिहि काल छुभाही । जलकी वृद्धि एक है जाही ॥ पुष्कर मेघ कीन पुनि कोपा । जलसे सकल भूमिको तोपा ॥ मुसल धार पानी बरसाई । मोटा धार पुनि वृक्ष कि नाई ॥ बहुरि नदीकी धारा जैसे । नभसे पानी वरवै ऐसे ॥ ये तो जल दिशा उर्ध चढता । पहुँचे ब्रह्मलोक परजंता ॥ इन्द्र कुबेर आदिक दिगपाला । भोगिके ब्रह्म लोकको चाला ॥ यहि बिधि सकल जलामय होई । जीव जंतु कहुँ रहै न कोई ॥ पृथ्वी गलि जलमें मिलि जाई । तिहि औसर भैरों प्रकटाई ॥ पृथ्वीते आकाश लों देही । महा भयानक रुद्र है येही ॥ तिहु दृग मानहु सूर्य है तीनी । ऐसो तेज मयी कहि दीनी ॥ तिही भैरोंकी श्वासा चाले । पानीके ऊपर सो डाले ॥ पौन प्रचंड नासिका बाटा । ताते होय बारिको घाटा ॥ ताकी श्वासा जल जब सोखे । रहे रुद्र पुनि आपै चोखे ॥ दशहु दिशा शून्य है जाई । रविशशि अग्न्यादिक बिनशाई ॥ गुन अरु तत्त्व न कबहुँ प्रकाशा । सर्व शून्य वतैं चहुँ पासा ॥ भैरों तनते निजु तन धारी । प्रकटे महा भैरवी नारी ॥ महा भयावन मूरत जाकी । सप्त सिन्धुकर कंगन ताकी ॥ मानुष छाया देखो जैसे । भैरों तनते प्रकटै जैसे ॥ इन्द्र कुबेर वरुण यम काला । तिनके मुंडको पहिरे माला ॥ नृत्त करे सो तहैं तिहि बारा । अट्ट अट्ट करि शब्द उचारा ॥ भैरों और भैरवी दोई । नृत्त करे तब शून्यमें सोई ॥ बहुरि लय भैरवी है जाई । भैरोंके तन माह समाई ॥ अब कछु शेष रहा नहीं खेला । तब भैरों रहि गयो अकेला ॥ दोहा-धरतीसे आकाशलों, भैरोंकी जो देह । सर्व शून्य करि दशदिशा घटन लगी तब येह ॥
( ५६ )
बोधसागर
प्रथमें पर्वत सम भई, बहुरि वृक्षके भाय । पुनि अंगुष्ठ पुनिरेनसम, पुनि सो गई लोपाय ॥ सर्व शून्य दशहू दिशा, पिसा सकल संसार । दृश्य कतहुँ कछु नालहा, रहा अलख करतार ॥ ब्रह्माते ले जीव सब, जहाँ लगि कीट पतंग । मुक्ति विदेह महाप्रलय, रचना पावै वेद प्रसंग ॥ सब जिव मुक्ति विदेह लह, रचना जब पुनि होय । आतम सत्ता ब्रह्मने जक्त, फुरै पुनि सोय ॥
इति श्रीवेदधर्म वर्णन
अथ न्यायधर्म वर्णन
दोहा-कर्ता पुरुष है देव जहाँ, गुरु संन्यासी जान । न्याय शास्त्र सब मम कथा, धर्म ग्रंथ परमान ॥ अथ उत्पत्ति कथा वर्णन
सोरठा-न्याय शास्त्र परमान, नित्यानित्यको बाद बहु । जग सबही प्रकटान, सूक्ष्म तत्त्वसे जानिये ॥ प्रलय बहुरि जब होय, सूक्ष्म परमाणू रहै । ताते थूल गहोय, दूनों तिगुनो चौगुण ॥ परमेश्वर करतार, आदि अंत नहीं तासुको । गहे आप औतार, देते सोई चहुँ वेदको ॥ नर्क स्वर्ग आनित, जीवको सो शुभ ज्ञान । सो प्रभुसबको हितकहे सो तासुगुन आठ बिधि ॥
चौपाई
प्रथमहि ज्ञान प्रयत्न है दूजे । तीजे इच्छा संख्या चौथे ॥ पंचम पुनि परमान गनीजै । परथक्त्वा षष्ठमें भनीजै ॥ पुनि संयोग विभाग कहाये । ये ईश्वर गुन आठ गनाये ॥
आगमनिगमबोध
( ५७ )
जेती वस्तु जगतमें उपजाया । सोलह पदार्थते सबकी काया॥ तिनको भेद जो भलिविधिजाना । सोई पावै पद निर्वाना ॥ तीनों गुण ईश्वरके अंशा । तिनको ताही रूप प्रशंसा ॥
इति
अथ आदि सन्यासी दत्तात्रेयजीकी कथा—चौपाई
अत्री मुनि अनसूया नारी । नारि पुरुष कीनो तप भारी ॥ तीन देव तब हरिषित भेऊ । ब्रह्मा विष्णु शम्भु जिहि कहेऊ ॥ ताकै भौन गौन तिहि कीने । आदर मान तिन्हैं ऋषि दीने ॥ अनसुइया पुनि कीन रसोई । तीनों देव जिवावत होई ॥ भे प्रसन्न तब तीनों देवा । मांगो बर पूरण तब सेवा ॥ तब अनसुइया वचन उचारे । तुम समान हौ पुत्र हमारे ॥ दीन सोई बर मांग्यो जोई । पुनि मारग निज लीनो ओई ॥ अनुसुइया जैसो वर पाया । तीन पुत्र भे ताके जाया ॥ तिहुते तीन अंश परकाशा । दत्त चन्द्रमा अरु दुर्वासा ॥ दत्त विष्णु औतार कहाये । ब्रह्मा अंशते चन्द्र उपाये ॥ शिव औतार कहे दुर्वासा । धर्म चला जग तिनकी आशा ॥ दत्तसे दीगांबर संन्यासी । अवधूता मारग जो भाषी ॥ ब्रह्मा अंशते चन्द्र उपाये । सो निज भौन अकाश बनाये ॥ डुरवासा ते दंडी भेऊ । दंडी आदि ताहिको कहेऊ ॥ दत्तात्रेय के चौबिस चेले । धर्म कर्म संन्यास गहेले ॥
इति
अथ द्वितीय सन्यासी शंकराचार्यकी कथा—चौपाई
वरने भव्य न्यास बर बानी । जब कलि होय वेद मतहानी ॥ जैन बुद्ध मत अधिक पसारा । वेद धर्म निंदहि निरधारा ॥ जैन बुद्ध विधि गह नर लोई । वेद धर्म मानै नहि कोई ॥
( ५८ )
बोधसागर
तिहि औसर शिव परम सनेही । वेद धर्म थापै करि देही ॥ जैसो आगम व्यास बखाने । जैन बुद्ध मत महि अधिकाने ॥ वेद धर्म तब भयो मलीना । बिरला कोई आदर दीना ॥ बिकमादितके समयमें कहेऊ । शंकर शंकराचार्य भैऊ ॥ दक्षिण देश द्विजकुल औतारा । वेद धर्मको पालन हारा ॥ चहुँदिश जाय विजय दिग कीना । कथि निजज्ञान नीति जगलीना ॥ वेद धर्म मरयाद धराया । बाढ़ी सन्मुख तासु पराया ॥ स्मृती धर्म कीन परचारा । धर्म स्मार्त नामसो धारा ॥ जैन बोधको जीत्यौ सोई । राजा शंकरकी वश होई ॥ तिहि औसर भूपाल छुभाया । केते जैनी सरित डुबाया ॥ मंडन मिश्र ब्रह्मा औतारा । धर्म मिमांसा जग विस्तारा ॥ शंकर जब तापर जय पाई । ताकी नारि ताहि ससुहार्ई ॥ मंडन मिश्र गये जब हारी । कामशास्त्र कथ ताकी नारी ॥ शंकराचार्य बाल ब्रह्मचारी । काम शास्त्र विद्या नहि धारी ॥ तिहि औसर अस कारण भयऊ । नृप अमरूक देह तजि गैऊ ॥ योगके बलते शंकराचार्य । नृपतन प्रवेश कियौ निजुकार्य ॥ काम कला सीखे षट् मासा । नृपतनमें कर भोग विलासा ॥ काम शास्त्रको ग्रन्थ बनाई । सो अमरूकशतक कहलाई ॥ नृप तन तजि मंडन पहुँ आये । तासु नारि पर तब जय पाये ॥ मंडनमिश्र भे शंकर चेला । ताको धर्म गह्यौ तिहि बेला ॥
इति
अथ पूर्व आचार्यनके नाम-चौपाई
जहां तो आदि संप्रदा चाली । पीढी पीढी कथौ निराली ॥ प्रथम विष्णु दूजे शिव होई । पुनि तृतीय वसिष्ठ मुनि जोई ॥
आगमनिगमबोध
( ५९ )
पुनि संगत वशिष्ठ सुत भैऊ । ताके बहुरि पराशर कहेऊ ॥ छठयें व्यासदेव गुरखानी । सतयें मुनि मुखदेव बखानी ॥ अष्टम गोडाचार्य कहोई । पुनि गोविंद पुनि शंकर होई ॥
इति
अथ शंकराचार्यजीके शिष्यके नाम
दोहा-प्रथमस्वरूपाचार्य कहा, पृथ्वीधरा चारय टेर । पद्माचारय तीसरे, तोटकाचारय फेर ॥
इति
अथ दशनाम संन्यासीको वर्णन
दोहा-स्वरूपचार्यके शिष्य है, तीरथ आश्रम जान । पद्माचारयके दोय पुनि, वन आरण्य बखान ॥ तोटकाचारयके पर्वतो, सागर गिरि शिष्यतीन । पृथुराचार्यके सरस्वती, भारति पुरी प्रवीन ॥
इति
अथ शंकरी अथवास्मार्त संप्रदाय वर्णन--चौपाई
अब शंकरी संप्रदा भाषों । चार भेद पुनि तामें राखों ॥ पूरव पश्चिम उत्तर दक्षिण । चारों दिशा चार मठकोगिन ॥ अथ पूर्वदिशा वाचा
गोबर्धन मठ भोगंबार संप्रदा वन अरण्य पद पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ देवता पद्माचार्य चैतन्य ब्रह्मचारी तीर्थ महोदधि विमला देवी ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद कठ केन उपनिषद अकार मात्रा प्रज्ञान ब्रह्म महावाक्य ॥
इति
अथ पश्चिमदिशा वार्ता
पश्चिम दिशा शारदा मठ कीटंबार संप्रदातीर्थ द्वारिका क्षेत्र सिद्धेश्वर देवता भद्रकाली देवी स्वरूपाय नन्दा ब्रह्मचारी तीर्थ
( ६० )
बोधसागर
गोमती सामवेद उपनिषद ब्राह्मणकेनतत्त्वमसिमहावाक्यओंकार मात्रा तीर्थ आश्रम द्वै पद ॥
इति
अथ उत्तर दिशा वार्ता
उत्तर दिशा जोशीमठ आनंदबार संप्रदा पद तीन गिरि पर्वत सागर क्षेत्र बद्रिकाश्रम नारायणदेवतापुण्यागिरीदेवीत्रोटकाचार्य नंदा ब्रह्मचारी तीर्थ अलकनंदा ब्राह्मण ब्रह्माअथर्वणवेद मांडूक्य उपनिषद आ मात्रा अहं आत्मा ब्रह्मा महावाक्य ॥
इति
अथ दक्षिणदिशा वार्ता
दक्षिण दिशा शृंगेरी मठ भूरीबार संप्रदा सरस्वती भारतीपुरी पदानि क्षेत्र रामेश्वर आदि वाराह देवता कामाक्षीदेवीशृंगीऋषि पृथ्वीधराचार्य तुंगभद्रा तीर्थ यजुर्वेद बृहदारण्यउपनिषदब्राह्मण इच्छावश है अहं ब्रह्मास्मि महावाक्य अर्थमात्रा ॥
इति
अथ संन्यासआचार वर्णन
दोहा—सकल कर्मको छोड़िके, जो लेवै संन्यास ।
स्वर्ग आदिक सब सुख घने, रहै न कोई आस ॥
चौपाई
सुत बित नारि ईषणा तीनी । तजि संन्यास धर्मनिजलीनी ॥
यज्ञहु वेदपाठ नहिं भाषा । संग्रह सदा उपनिषद राखा ॥
करहि कमंडल हाथमें दंडा । फिरै स्वच्छंद पृथ्वी नौ खंडा ॥
कछु सुख साजन यकठे धरहीं । काहूसे विवाद नहिं करहीं ॥
आगमनिगमबोध
( ६१ )
सदा शौच असनान जो कीना । संध्या बदले आत्म लैलीना ॥ जब कबहूँ चित चंचल होई । पढ़ै उपनिषदको तब सोई ॥ औषद सम भोजनको भोगा । चाहे नहिं कछु सुख संयोगा ॥ शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । सदा सैन पृथ्वीपर सोई ॥ धरतीपर धरि भोजन करही । चार मास वर्षा न बिचरही ॥ फिरै अकेले संग न कोई । भिक्षा भोजन गहै न ओई ॥ सोलह त्रास अहार प्रमाना । लेय हाथपर भिक्षा दाना ॥ जाके घर भिक्षाको जाही । मुखसे तहैं कछु माँगै नाही ॥ जेती बारमें गऊ दुहाई । गृही द्वार तबलों ठहराई ॥ जहैं माँगन को कारण पावै । तहां प्रणवको शब्द उठावै ॥ तीन बार कर शब्द उठाना । जाते गृही सुनै निज काना ॥ तीन भौन कै पांच कि साता । येते घरलों भीखको जाता ॥ जौ भिक्षा संयोग न लहई । तौ संन्यासी भूखा रहई ॥ भिक्षा ले पुनि बनहि सिधारे । मता श्रेष्ठ संन्यास उचारे ॥ पहिले वेदपाठ करि लीजै । तब पीछे संन्यास कहीजै ॥ वेदकि विधिते बोध न जबलों । धर्म मर्म जाने कह तबलों ॥ ऐसी विधिते भोजन करही । मोट देहि जिहि नजर न परही ॥ सदा काल आतम लौलीना । सकल भर्म भयतजि तिनदीना ॥ प्रथमे सब सुख भोग भरीजै । सब इंद्रिनको तृप्त करीजै ॥ तब पीछे लीजै संन्यासा । रहै न काहू वस्तुकि आसा ॥ शीतकालको गुदरी एका । राखे सो निज सहित विवेका ॥ यह मध्यम संन्यास प्रमाना । अब उत्तमको करें बखाना ॥ नम्र दिगम्बर बाना होई । शीत उष्ण दुखसुखसह सोई ॥ सहदुख सुखदुखसुखनहिंमाना । ऐसे निज मनमें अनुमाना ॥ ज्ञान अग्निमें तन हम दाहा । अब याकी कछु रही न चाहा ॥
( ६२ )
बोधसागर
यह विचार निज मनमें धारे । भूतक संन्यासीको नहीं जारे ॥ जीतेहि निज तन जिन दाही । सुये दग्ध पुनि उचित न वाही ॥
दोहा-जो मध्यम संन्यासते, उत्तम विधि गहि लेय ।
परमहंस ताको कहै, नम्र दिगंबर तेय ॥
काहूको परनामसो, करै न शीश झुकाय ।
सेवासे नहीं कछु सुखी, निरादरते नहीं दुख पाय ॥
मधूमास भोजन दोउ, तजि दीजै निरधार ।
धातु वस्तु सुद्रादि सब, नहीं कर परसनहार ॥
चौपाई
भोजन पाकते राखै काजू । तजे इतर सुख स्वाद समाजू ॥
पक भोजन तजि और न लेही । गृही जो पाक भोग नहीं देही ॥
ताहि गृहीको पापी जाना । देत नहीं जो भोजन दाना ॥
संन्यासीकी तप बड याही । कछु काहूसे मांग जो नाही ॥
दुण्डी संन्यासी जो होई । दंड हाथमें धारे सोई ॥
दंड बाँसकी लकड़ी भाषा । सात गाठि पुनि तामें राखा ॥
सरस्वति आश्रम तीरथ तीनी । दंड ग्रहण अधिकारी कीनी ॥
ब्राह्मण बिना न दंडी होई । द्विज गृहते अहार गह सोई ॥
चारों मठके जो ब्रह्मचारी । सोछ विप्र कुलते तनुधारी ॥
उत्तम मध्य कनिष्ठ संन्यासा । भिन्न २ करि वेद प्रकाशा ॥
शिव अरु विष्णुभाव नहि दूजे । पंचम देव संन्यासी पूजे ॥
शिव नरसिंहगणगतिरविदेवी । इन पाँचोंकी स्मृत देवी ॥
सिंहासन धरि पूजा करही । इष्ट आपनो बीचमें धरही ॥
अधिक नेम जिहि देवसे लावै । बीच सिंहासन तिहि बैठावै ॥
चौपाई
शिव शक्तीको धर्म जो धरही । चन्द्राकारतिलकलिलारमेकरही ॥
योगा संन्यासी ब्रह्मचारी । भगवां भेष तिलक सो धारी ॥
आगमनिगमबोध
( ६३ )
अथ मीमांसाधर्म वर्णन
दोहा—देव अलख करतार जहँ, गुरु दरवेष कहाय । शास्त्र मीमांसा धर्म कह, कर्मफल जिव पाय ॥
चौपाई
व्यास शिष्य जैमिनि ऋषिराया । धर्म मिमांसा सो ठहराया ॥ ताके शिष्य न करी सहाई । धर्म मिमांसा जग फैलाई ॥ शिष्यनको अस नाम उचारी । भट्ट कुमार अरु मिश्र सुरारी ॥ बहुरि प्रभाकर कुरकहि टेरे । भे प्रसिद्ध जगमाह बडेरे ॥ जैमिनि शिष्य बुद्धिगुणधारा । भली भांति निज धर्म प्रचारा ॥ धर्म मिमांसा जो कोई गहई । ताके नाम मिमांसक अहई ॥ एसो धर्म सो कीन उचारा । ईश्वर नहिं जग सिरजनहारा ॥ जो कुछ दुख सुख जगमें होई । जीव कर्मको कारण सोई ॥ जैसो कर्म करे जो कोई । तैसो उदय ताहि को होई ॥ ईश्वर नहिं कछु करे करावै । नर स्वच्छंद जस कर तस पावै ॥ सृष्टि अनादिनिध करि जानो । सदा स्वभाविक ऐसेहि मानो ॥ परमागुनते जग उत्तपाता । ज्ञान कर्म दोउमुक्तिको दाता ॥ वेदान्ती जस करे बखाना । तीन वेद ईश्वर गुण माना ॥ मीमांसक नहिं माने सोई । तीन वेद मानुष तन होई ॥ कर्म सुकर्म करे जो कोई नर । होय सो ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ॥ कर्मैते जिव सब पद पावै । कर्महि ऊँच नीच गति जावै ॥ जेतो देखो कर्म पसारा । कर्मको खेल खिला जग सारा ॥ ब्रह्म कर्म करहि विधि नाना । देव अराधन सुख व्रत दाना ॥ होय यज्ञ तिनके बहुतेरे । साधन करि करि देवन टेरे ॥
इति मीमांसा धर्म
( ६४ )
बोधसागर
अथ शिवधर्म वर्णन
दोहा—देव रुद्र योगी गुरु, योग मुक्ति चित धार । पातञ्जल यह शास्त्र है, कथे धर्म व्यौहार ॥
इति
अथ शेष अवतार कथा वर्णन—चौपाई
करे एक ऋषि संध्या तरपन । ताके अंजुल प्रकटै धरि तन ॥ अंजुलते कलि बाहर परेऊ । नाम तासु पातांजल धरेऊ ॥ पातांजल है शेष औतारा । सो जग मल शोधन हितकारा ॥ शास्त्र चिकित्सा कीन प्रकाशा । देह रोगमल ताते नाशा ॥ शब्द अशुद्ध उचारा मल हंता । पाणिनिकरनिकाभाज्य करंता ॥ तिमि वक्षित अंतह मल शोधू । योग सूत्र करि जीव प्रबोधू ॥ प्रथमहि चित्तकि वृत्ति निरोधन । कथे समाधि अरुताको साधन ॥ वैराग आदिक विधि विधाना । कथे तहां साधन विधि नाना ॥ तेसे चित्त वक्षित जो साधी । नाहित कीनो योग समाधी ॥ यम नियमों आसन प्रतिहारा । प्राणायाम धारण धारा ॥ ध्यान समाधि आठ यह भाषी । द्वितिये पदमें सबसों राषी ॥ तृतियें पदमें योग विभूती । वरनो सकल जो सिद्ध प्रसूती ॥ बहुरि चतुर्थहि चरणके माही । मोक्ष योग फल बनें ताही ॥
इति
अथ नव नाथोंके नाम
दोहा—गोरखनाथ मछंद्रो, सुरतिनाथ मङ्गल नाथ । चर पट चम्बा प्राणनाथ, घध्यू गोपीनाथ ॥
इति
अथ गोरखनाथजीकी कथा चौपाई
नवो नाथ सिद्धौ चौरासी । गोरख श्रेष्ठ सर्व गुण रासी ॥
आगमनिगमबोध
( ६५ )
मुद्रा सकल ताहिने कीनो । ऐसो योग माहि चित दीनो ॥ दोहा-मुद्रा सन्मुख स्वेष्टि भूचरि चाचरि जान । शामभवी उन्मीलनी, पुनि अगोचरी मान ॥ आत्म भावनी बडुरि कह; पूर्ण बोधिनगाय । सर्व साक्षिनी आदि दै, मुद्राते जित लाय ॥
चौपाई
ऐसो योगी भया समाधी । आठों भांति योग भलसाधी ॥ राज योग हठ योग बखानो । त्राहठ अरु कुण्डली प्रमानो ॥ योग लंबिका तारक साधा । योग मीमांसकसांख्य समाधा ॥ आठों योग भली विधि कीना । ऐसो योगी परम प्रवीना ॥ वज्र कीन पुनि अपनी अङ्गा । करि चौरासी कल्प सुटङ्गा ॥ ऐसी वज्र शरीर बनाई । कबहुँ मरे न जरे न जाई ॥ सारी मांस देह गलि गिरेऊ । हाड गूद जमि एकै भयऊ ॥ हाड गूद जब एकमें पागा । हीरा सम तनु चमकन लागा ॥ योगको रस भल गोरख लीना । सत्य कबीर प्रशंसा कीना ॥ केते गोरखनाथ के चेले । सिद्ध भये गहि ज्ञान दुहेले ॥ गोरख यती जक्त गुन गाये । योग युक्ति जगमें फैलाये ॥ शिवजी आदि अचार्य येहा । योग समाधि आदि गुनगेहा ॥ पुनि नौनाथ सिद्ध चौरासी । योग धर्म जग माह प्रकासी ॥ शिवगोरख सम और न योगी । ब्रह्मानन्द योग रस भोगी ॥
अथ चौरासी सिद्धनके नाम
दोहा-भङ्कर सङ्कर संघरो, जङ्कर ऋम होय । दूरम कनी फाहनीफा, लडुरूपा सङ्कर रोय ॥ लङ्करहनीरतन कह, पूरन बिवालक बर्न । जलकाखिघडसुरतिसिध, निरतिसिधकेवलकर्न ॥
( ६६ )
बोधसागर
समरथ असरन गौन गुल, चतुर वैन राय ऐन । केवल करन औघड दरवत, ईस्वरभरथरी भूतवैन ॥ कनका शंस् अक्षर दैन, पलका निधि शिवराम । पिपल्का गिरधर सालस, कसक गैलस नाम ॥ मगनधार मुक्तीसरो, चलन नाचत सूर ऐन । गिरवर जोति लगन कहो, जोति मनसिध सैन ॥ विमल जोति शीतल जलो, अघडधान्य पतिप्रान । तोल संयोग अकाल निर, बहुरि भोलसर जान ॥ राजकुमार बखानिये, विष्णुपति कृष्णकुमार । शंकर योग ब्रह्म योग है, मीरहुसेन बिचार ॥ मीर जअलीक धारिजो, पुनि कालिंदर नैन । फिर नालिन्दर नैन है, सरस्वती गुरुधन सैन ॥ गुफाबासी कल नासी, कलके संगी होय । यक रंगी केवल क्रमी, पुनि कम नासी जोय ॥ कलक विनाशी मूल मंत्री, योग तन्त्री परमान । जंग गहिर दीपक रंगी, आपो रूपी जान ॥ फिर अकलेस प्रतापी, बीरम योगी नाम । खल समोगल भोगी कहो, इन्द्रयोगी गुण ग्राम ॥ पुनि केदार योगी गनो, कीन धर्मकी वृद्ध । मुनि विचित्र रहमी योगी, ये चौरासी सिद्ध ॥
अथ षट् यतियोंके नाम
दोहा--गोरख नाथो दत्तजी, पुनि लक्ष्मण हनुमन्त । भैरो भीषम जानिये, ये षट् यती वदन्त ॥
इति
आगमनिगमबोध
( ६७ )
अथ बारह पंथ वर्णन
दोहा—आइ कुनकाई प्रथम, तुसलाई कपिलान । तृतीये सप्तनाथ पंथ है, चौथ धर्म नाथ जान । वैराग्य नाथके भरथरी, षष्ठम गङ्गा नाथ । रामचन्द्र सप्तम कहै, अष्टम लक्ष्मण नाथ । फिर नटेश्वरी नवम है, पिंगल दशम कहाय । पुनि धजपंथ इग्यारहे, बारहे कानी फाय ।
इति
अथ अष्टांगयोगवर्णन
दोहा—जमनियमोआसनकहो, प्राणायाम अगाध । प्रत्याहारो ध्यान कह, पुनि धारण समाध ॥
अथ यमकी दश शाखा वर्णन
दोहा—युक्ति सहित सब कर्मकर, ताको यमबतलाय । जाते साधन सुगमहो, सकल कलुषता जाय ॥
चौपाई
प्रथम अहिंसा जीव बताई । नर पशु आदि एक समताई ॥ मनसा बाचा कर्म या तीनों । काहूको कछु दुःख नहिं दीनों ॥ द्वितीये बोले साची बानी । मिथ्यावाक्यते धर्मकी हानी ॥ तृतीये पर धनको मति हरना । चौथे परतिय संग न करना ॥ पञ्चम दायो हृदय महार् । दुखी दरिद्री करो सहाई ॥ छठये अर्चा ताहि बखानी । बुधिते धर्म कीजिये प्रानी ॥ अहंकार मद मान न धरिये । औरहि कबहु तुच्छ मति करिये ॥ सप्तम क्षमा ताहि को जाना । लाभालाभ न सुखदुख माना ॥ अष्टम धौत धर्म भल साजी । जो कछु लाभ ताहिमें राजी ॥ नवमें अल्प अहार करीजै । दशमें शोच भली विधि कीजै ॥
इति