कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन
(११६)
अमरसिंह बोध
कबीर वचन
अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥ गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥ बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥ सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥ ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥
कबीर वचन
तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥ पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥ राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥ माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥ भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥
राजा बीरसिंह वचन
राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥ सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥ एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥
बोधसागर
(११७)
ब्राह्मणी वचन
छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥ गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥ हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥ करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥
कबीर वचन
सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥ कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन-बीपाई
साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥ कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥ कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥
कबीर वचन
एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥ छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥ यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥ राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥ नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥ लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥
ब्राह्मणी वचन
अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥
जगन्नाथ वचन
जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥ अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥
१ जगन्नाथपुरीको ।
(११८)
बीरसिंह बोध
ब्राह्मणी वचन
तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥ राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥ उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥ तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥
जगन्नाथ वचन
जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥ उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥
कबीर वचन
जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥ छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥ ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥
ब्राह्मणी वचन
हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥ जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥ जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥ जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥ जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥
कबीर वचन
छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥ अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥ जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥
बोधसागर
(११९)
कबीर वचन
जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥ वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥ मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥ सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥ चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥ ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥ पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥ अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥ तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥ छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥ अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥ धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥ धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥
राजावीरसिंह वचन
सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥ धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥
कबीर वचन-चौपाई
यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥ दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥ निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥ रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥ शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥ यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥
राजा वीरसिंह वचन
राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥
कबीर साहबका मगहरमें बिजुलीखाँके घर शरीर छोड़ना और राजा वीरसिंहका फौज लेकर बिजुलीखाँसे युद्धको जाना
(१२०)
बीरसिंह बोध
पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥ महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥
कबीर वचन
आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥ तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥
राजा बीरसिंह वचन
विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥ साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥
कबीर वचन
तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥ तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥ चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥ बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥ साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥ तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥ रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥ विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥ गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥
विजलीखाँ वचन
कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥
कबीर वचन
यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥ छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥ नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥ चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥ जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥
बोधसागर
(१२१)
सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥ हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥
कबीर बचन
पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥ डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥ चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥
राजा बीरसिंह बचन
अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥ विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥
कबीर बचन
आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥ खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥ कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥ ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥ भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥ नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥ आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥
विजलीखाँ बचन
हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥
कबीर बचन
विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥ पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥ तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥ छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥ रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥ हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥
पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन
(१२२)
बीरसिंह बोध
राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥ पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥ गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥ जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥ मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥ सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥ ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥ अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥ यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥ गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥ सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥ आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥ भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥ छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥ धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥ अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥ पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥ अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥ असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥ दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥ करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥ सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥ श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥
चौपाई
गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥ नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥
बोधसागर
(१२३)
धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥ ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥ सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥ शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥ पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥ चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥ नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥ तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥ घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥ तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥ राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥ एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥ राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥ बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥ तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥ भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥ चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥ चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥ यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥ हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥ दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥ जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥
साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥ ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥
(१२४)
बीरसिंह बोध
चौपाई
तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥ निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥ धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥ जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥ अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥ चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥ तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥ मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥
छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥
बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥
काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥
करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥
सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥
कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥
चौपाई
तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥
आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥
साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥
हरिहर वचन
हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥
दूत वचन
कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥
वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥
आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥
नाम माहात्म्य
बोधसागर
(१२५)
कबीर वचन
वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥
जीव वचन
विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥ नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥ तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥
ज्ञानी वचन
सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥ गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥
जीव वचन
जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥ जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥
कबीर वचन
साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥ अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥
चौपाई
पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥ कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥ देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥ देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥ ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥ मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥ तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥ कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥
(१२६)
बीरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥ विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥
पुरुष वचन
आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥ कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥
हंस वचन
मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥ हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥ जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥ साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥ साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥ अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥
साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥ तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥
चौपाई
जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥ सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥ निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥ नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥ जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥ पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥
छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥ पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥
बोधसागर
(१२७)
हंसन शिर क्षत्र राजे अमृत फल आनन्द घना ॥ रूप षोडश भानु हंसा कोटि शसिहिं अति बना ॥
सोरठा-धाम जो पाय अमोल, हंसा सुख तहैं विलसही ॥ द्वीपहिं द्वीप कलोल, जरा मरन भ्रम मेटिया ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे बीरसिंहबोधवर्णनो नाम तृतीयस्तरंगः ॥
ग्रन्थ बीरसिंहबोध समाप्त ।
इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ वीरसिंहबोध समाप्त
प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर द्वितीय भाग)
कबीरसागर चतुर्थ खण्डान्तर्गत
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)
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अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
नं. ५ कबीरसागर - १
संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५
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कबीरपंथके प्रधान आचार्य
A black and white portrait of a bearded man, identified as Shri Ugranam Sahab. He is seated, wearing a crown and traditional robes, and is holding a small object in his hands. The portrait is framed by a dark, textured border.
श्री १०८ पं० श्री उग्रनाम साहब
THE NEW YORK
THE NEW YORK
बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका
इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें- चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।
पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।
छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।
सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।
आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।
उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-
अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|---|---|
| धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर | ५ | राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना | ११ |
| धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देना | राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना | १२ | |
| सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देना | ॥ | मंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना | १५ |
| कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जाना | ६ | इति | |
| राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना | ७ | अथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका | |
| राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृता | ८ | धर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर | २१ |
| रानीका सद्गुरुके अधीन होना | ९ | गर्भोत्पत्ति वर्णन | २२ |
| कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझाना | ॥ | जगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना | २३ |
( ६ )
बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर | सदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना | ||
| गर्भसे मुक्त करना | २५ | कर गमन करना | ४९ |
| पिशुन कर्म वर्णन | २६ | राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना | |
| पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ- | और अधिकारी हूँताँका साथ जाना | ५० | |
| का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमें | सत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का | ||
| मगन होना | २९ | वातालाप | ५१ |
| सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे | कामिनीसे बातचीत | ५२ | |
| बागमें ठहरना, उसका हरा होजाना | हंस गुज्रन जनसे बातचीत | ५३ | |
| और राजाका खबर पाकर बाग देखने | सब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके | ||
| आना फिर कबीर साहबसे मिलना | ३२ | सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता | ५४ |
| सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल याद | ग्रन्थसार | ५६ | |
| दिलाना | ३४ | इति | |
| राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना | ३५ | अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका | |
| सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप- | सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर | ||
| देश देना | ३० | जीवोंको चितानेको आज्ञा देना | ६५ |
| राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना और | ज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे | ||
| सदगुरुका उत्तर देना | ३७ | भेट होना | ६६ |
| राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद- | गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना | ६७ | |
| गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका | गुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना | ६८ | |
| हट करना पीछे शरणमें आना | ३९ | श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु | |
| कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय | ४० | बनानेको आज्ञा देना | ७० |
| सत्यलोकके आनेका मार्ग | " | गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना | ७१ |
| आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों- | गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके | ||
| का पान लेना | ४३ | लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना | " |
| तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न | महादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें | ||
| २ लोककी प्राप्ति | ४४ | समझाना | ७२ |
| राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्ली | गुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और | ||
| करना | ४५ | गुरुका परवाना लेना | ७३ |
| सदगुरुका प्रसाद पाना | ४६ | गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना | ७४ |
| पान माहात्म्य | ४७ | गुरु और ब्रह्मासे जर्बा | " |
| काल ज्ञान | " | ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव | |
| सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगट | को बुलाना | ७७ | |
| करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली | ४८ |
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
( ७ )
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत | ७९ |
| गरुड़ और महादेवका बातलाप | ८१ |
| तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद | |
| पूछनेको जाना | ८३ |
| निर्गुण भेद वर्णन | ८६ |
| लौकिक ज्ञान वर्णन | ८७ |
| महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान | ८८ |
| गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये | |
| बालक लाना | ८९ |
| बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे | |
| विनती करना | ९० |
| तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ | |
| होना और गरुड़का बालकको जिलाने की | |
| प्रतिज्ञा करना | ९३ |
| गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये | |
| फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा | |
| करना | ९६ |
| गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना | |
| और तीनों देवका हार मानना | १०४ |
| गरुड़ बोधका संक्षेपसार | १०५ |
| इति | |
| अथ हनुमान बोधकी अनु- | |
| क्रमणिका | |
| धर्मदास साहबका प्रश्न | ११३ |
| हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका | |
| भाव (टीप्पणीमें) | ” |
| बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना | |
| हनुमानका अपनी बड़ाई करना और | |
| मुनीन्द्रजीका समझाना | ११५ |
| हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर | |
| बापना (रामनामकी बड़ाई) | ११६ |
| मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन | |
| कर देना | ११७ |
| हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई | |
| करना | ११९ |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना | |
| और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ | |
| की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी | |
| बात कहना | १२१ |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें | |
| लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास | |
| करनेकी बात कहना | १२३ |
| मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका | |
| घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका | |
| प्रगट होना | ” |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर | |
| लेनेको प्रार्थना करना | १२४ |
| मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर | |
| आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको | |
| सुनाना | ” |
| हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे | |
| प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग | |
| युक्ति का वर्णन करना | १२५ |
| साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन) | १२६ |
| हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां | |
| पहुँचनेकी युक्ति पूछना | १२७ |
| मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना | |
| समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना | ” |
| हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी | |
| युक्ति पूछना | ” |
| मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये | |
| सुरति निरति एक करनेकी युक्ति | |
| हनुमान को बताना | १२८ |
| हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना | १३१ |
| ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास | |
| प्रति | १३२ |
| सारविचार पचीसी | १३३ |
| इति |