कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १० )
मुहम्मदबोध
चार मोकाम किताब है चारी । पंचये नाम अर्चित सँवारी ॥ तहँते आइ रूह बारह हजारी । तहाँ अर्चित गुप्त व्योहारी ॥ साखी-पीर औलिया था किया, यह सब उरले तीर ॥ समरथ का घर दूर है, तिनको खोजो पीर ॥
❁ मारफत
चौपाई
औवलमोकाम नासूत ठेकाना । दुजामोकाममलकूतजोजाना ॥ सेउम मोकाम जबरूत ठेकाना । चहारूममोकामलाहूतजोजाना ॥ पंचये मोकामहाहूत अस्थाना । छठे मोकाम सोहं जो माना ॥ हफतुम मोकाम बानी अस्थाना । अठये मोकाम अंकूर ठेकाना ॥ नवये मुकाम आहूत निशानी । दसये मोकाम पुरुषरजधानी ॥
बेतुक
औवल शरी अत् १ । तरीकत् २ । हकीकत् ३ । मारफत् ४ । मरोवत् ५ । ध्यान दोरहिअत् ६ । जुलफकार चन्द्र गेटा ७ । हुकुमसुरतद ८ । देयना कासो यही अत् ९ । सचपावेसमरथकाय १० । अंकार ओंकार कलिमा नवी सजुपावै देखा हद् बैहद्
मुहम्मद वर्चन
तुम कब्बीर भेद अधिकाये । खुद समरथकी खबरि जो ल्याये ॥ अब तुमको हम बूझैं अत् । सो कहिये खुद अहदी संत् ॥ को तुम आहु केहांते आये । क्यों तुम अपने बर्ण छिपाये ॥ सात सुरति समरथ निरमाई । यह अस्थान रहो की जाई ॥ यती मारफत कहु दुरवेशा । हम मानैं तुमरो उपदेशा ॥ सात सुरति केहि माहि समाई । जिव बोधे सो कह चलिजाई ॥ समरथ गम तुमु साँच कबीरा । समरथ भेद कहो मति धीरा ॥
- इस विषय में लिखे हुये मुकामों का वर्णन पुस्तकके अन्तमें देखो ।
बोधसागर
(११)
साखी-मेरे शंका बाढिया, थाके वेद कुरान ॥ वाहिद कैसे पाइये, समरथको मक्कान ॥
सत्यकबीर बचन
सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । जो खुद आदि अस्थान है भाई ॥ जो जो हुकुम समरथ फरमाई । सो सो हुकुम हम आनि चलाई ॥ सुर नर मुनिको टेरि सुनाये । तुमको बहुत बार समुझाये ॥ तुमपर मोह अक्षरने डारा । तेहि कारण आये संसारा ॥ सोलह असंख जुग जबै सिराई । सोलह असंख उतपति मिटि जाई ॥ सात सुरति तब लोकहि जाई । जिव बोधो तेहि माह समाई ॥ सात सुन्य तजि ते अस्थाना । ते सब मिटे होय घमसाना ॥ वेद कतेवकि छोडो आशा । वेदकतेव अक्षर प्रकाशा ॥ तीन बार तुम जगमें आये । फिर फिर अक्षरने भरमाये ॥ अक्षर चीन्हिके छोडो भाई । तीन अंश अक्षर निरमाई ॥ ब्रह्मकि सृष्टि आपको कीना । जीव वृष्टि तीरथ व्रत दीना ॥ माया वृष्टि ईश्वरी जानो । सबमें आतम एक समानो ॥ साखी-खोजो खुद समरथको, जिन किया सब फरमान ॥ पीर मुहम्मद तहाँ चलो, सोई अमर अस्थान ॥
मुहम्मद बचन
पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कछु नहिं चलै तुम्हारी जोरा ॥ अक्षर हुकमको मेटनहारा । चार वेद जिन कीन पसारा ॥
कबीर बचन
मुनिये सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कबीरा ॥ मेटो अक्षरको बिस्तारा । मेटो निरंजन सकल पसारा ॥ मेटो अंचितकी रजधानी । मेटो ब्रह्मा वेद निशानी ॥ चौदह जमको बांधि नचावों । मृत अंधा मगहर ले आवों ॥
(१२)
मुहम्मद बोध
धर्मरायते झगर पसारा । निरंजन बांधि रसातल डारा ॥ वेद कतेबको अमल मिटावों । घर घर सार शब्द फैलावों ॥ समर्थ हुकम चले सब माही । व्यापै सत्य असत्य उठिजाही ॥
मुहम्मद वचन
पीर मुहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहीं जानी ॥ सुनाकान नहीं आखिन देखा । बिन देखे को करे विवेखा ॥ जो नहीं देखो अपने नैना । कैसे मानो गुरुको वैना ॥ जो तुम खुद अहदी है आये । हुकम हजूर फरमानले आये ॥ जौन राहसे तुम चलिआवो । सोई राह मोकहैं बतलावो ॥ हँसनको अस्थान चिन्हावो । समर्थको मोहिलोक देखावो ॥ साखी-हँसनको अस्थान लखि, तब मानो परमान् ॥
जो समर्थको हुकम है, सो मेरे परवान् ॥
कबीर वचन
सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । साहेब तुमको देऊँ बताई ॥ चले सैल को दोनो पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥
मोकाम १
भूमिते छत्तिस सहस ऊँचाई । मानसरोवर तहाँ कहाई ॥ तहाँ नासूत आहि मोकामा । नबी कबीर पहुँच तेहि धामा ॥ तहाँ दाऊद पर्यंवर होई । जम्बूर किताब पठे तहाँ सोई ॥ तहाँ सलामालेक सोई कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥
मोकाम
तहवाँते पुनि कीन पयाना । चौविस सहस वैकुंठ प्रमाना ॥ तहवाँ पहुँच बैठे ऋषि बासा । देव सबै बैठे तेहि पास ॥ वह वैकुंठ विष्णु अस्थाना । मलकूत मोकाम मूसाको जाना ॥ मूसा पैगम्बर पढ़ै किताबा । उसका नाम तौरैत किताबा ॥ सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥
बोधसागर
( १३ )
मोकाम ३
वैकुण्ठ ते आगे लायो डोरी । सुमेरते सुन्य अठारह कोरी ॥ येतो अथर सुन्य अस्थाना । जबरूत मोकाम ईसाको जाना ॥ ईसा पैगम्बर पढै किताबा । उसका नाम इंजील किताबा ॥ सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्ता बोस उनहु उठि लीना ॥ तहँवा बैठि विस्वंबर राई । वही पीर तो वही खुदाई ॥ उहँते अथर सून्य है भाई । ताकी शोभा कही न जाई ॥
मोकाम ४
महाशून्यको लागी डोरी । ग्यारह पलैंग तहाँ ते सोरी ॥ लाहूत मोकाम कहावै सोई । जो देखे बहुते सुख होई ॥ मुस्तफा पैगंबर बैठे तहाँ । फुरकान किताब पढत थे जहाँ ॥ सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्ताबोस उनहु उठि लीना ॥ दखत हो मुहम्मद अस्थाना । तुम बेचून कहो यही ठेकाना ॥ वारो फिरिशते सलामालेक कीना । तब हम आगेका पग दीना ॥
मोकाम ५
तहँते चले अचित ठेकाना । एक असंख्य सुन्य परमाना ॥ हाहूत मोकामको वही ठेकाना । आगे हैं सोहं बंधाना ॥
मोकाम ६
तीन असंख्य शून्य परमानी । बाहूत मोकाम सो कहो बखानी ॥ नबी कबीर चले तेहि आगे । मूल सुरति बैठे अनुरागे ॥
मोकाम ७
पांच असंख्य सुन्न विचआही । सात मोकाम कहत है ताही ॥
मोकाम ८
इच्छा सुरतिके पहुँचे द्रीपा । चार असंख्य है लोक समीपा ॥ ताको नाम राहूत मोकामा । नबी कबीर पहुँचे तेहि ठामा ॥
( १४ )
मुहम्मदबोध
मोकाम ९
तहाँते सहज द्रौप परमाना । दोय असंख तहाँते जाना ॥ ताहि मोकाम नाम आहूता । सोभा ताकी देख बहूता ॥
मोकाम १०
साखी-पहुँचे जायके लोक जहाँ, सन्त असंख दस लाख ॥ सो मोकाम जाहूतका, दस मोकाम यह भाख ॥
चौपाई
सलामा लेक तहाँ हम कीना । दस्ताबोस उनहु उठिलीना ॥ तहाँते अमरलोकको छोरा । नबी कवीर पहुँच तेहि ठौरा ॥ अमरलोकके हंस सब आये । तिनकी सोभा कही न जाये ॥ भरि भरि अंक मिले तहाँ आये । देखि मुहम्मद रहे खुलाये ॥ सब मिलि हंस गये पुनि तहाँवा । साहेब तखत पै बैठे जहाँवा ॥ जगर मगर छतर उजियारा । आम धनी का कहो बिहारा ॥ असंख भानु पुरुष उजियारा । अमरलोकको कहो विस्तारा ॥ सकल हंस तहाँ दरशन पाई । तिनकी सोभा बरनि न जाई ॥ तहाँवा जाय बंदगी कीना । नबी भये जो बहुत अधीना ॥
मुहम्मदवचन
चूक हमार बकस कर दीजै । जो तुम कहो सोई हम कीजै ॥
पुरुषवचन
कहु मुक्तामनि बेगि तुम आये । दूसर कौन सँग ले आये ॥
मुक्तामनि वचन
तब हम बचन पुरुषसे कीना । दोउ कर जोर बंदगी कीना ॥ तुम जो राज निरञ्जन दीना । तापर हुकुम अक्षरको कीना ॥ दोऊ अंश दोऊ दीन चलाये । तामें मृष्टि पकड़ि खुलाये ॥ तामैं एक सो हम ले आये । सो तो तुम्हरे कदम दिखाये ॥
बोधसागर
( १५ )
नबी मुहम्मद बन्दगी कीना । हशन पाय भये लौलीना ॥ तहाँते फिर मृत्युलोक चलि आये । निजमान कहे पानहु पाये ॥ तुम आपना कौल भरि देहो । पीछे पान जीवको पैहो ॥ साखी-शब्द भरोसे नामके, दिया नवीको पान । तब हम सांचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥
कबीरवचन--चौपाई
तुम अपने फरमान चलाई । खुद को भेद तुम धरो छिपाई ॥ जो यह भेद तुम प्रकट करिहौ । तौ तुम कौल के बाहर परिहौ ॥ चारो कलमा प्रकट भाखो । पचवाँ कलमा गुप्त जो राखो ॥ पचवाँ कलमा इल्म फकीरी । जाके पढे कुम्भ हो दूरी ॥ हम काशीको जात हैं भाई । तबलो तुम अपने कौल बजाई ॥ तुम पर दाय़ा समर्थ केरी । पाँचों कलमा दिलमें फेरी ॥ साखी-हम काशी को जात हैं, तुम मक्के अस्थान ॥ हम रामानन्द गुरु करें, तुम देओ जगत फरमान ॥ फरमान जगतको दीजिये, उलटी अदल चलाय ॥ तुम कलमाका हुक्म ले, निर्भय निशान बजाय ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदास संवादे मुहम्मद
बोध वर्णनोनाम नवमस्तरंगः
अथ ग्रन्थसागर
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यद्यपि साधारणतः देखनेमें यह ग्रंथ भी मुसलमानी धर्म के प्रवर्तक मुहम्मदको कबीर साहिबके बोध देनेका देख पड़ता है तथापि इसका भी अर्थ आध्यात्मिक है क्यों कि, मुहम्मद साहब के जीवन चरित्र में लिखा है कि इनके माता पिता
( १६ )
मुहम्मद बोध
दोनोंही ईश्वरबिमुख मूर्तिपूजक थे उन्हींसे उनकी उत्पत्ति हुई थी । इसका आशय यह है कि, प्रकृतिपुरुष जब संसारमुख होते हैं तब ही अन्तःकरण विशिष्ट होकर चैतन्य जीव नाम धारी होता है । अर्थात् मुहम्मदसे आशय है अन्तःकरण विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीवसे ॥
फिर मुहम्मद साहबके उत्पन्न होते ही उनकी माताकी मृत्यु होगयी थी और पिता तो प्रथमही मर चुका था इस कारण उनके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी फूफूने उनका पोषण पालन किया था उसीने अपने गोद में उन्हे लिया था इसका आशय यह है कि, जब जीव अन्तःकरण विशिष्ट होता है तब पुरुष प्रकृतिका तो अभाव होजाता है अर्थात् स्वरूप विस्मृति होती है और देहकी प्राप्ति होती है और देहही द्वारा अन्तःकरण बड़ा होता है ।
आगे चल कर मुहम्मदसाहबने चौदह विवाह किये हैं सो जीवका चौदह इन्द्रियों के साथ अहंभाव करना है ।
आगे चल कर चालीस वर्षकी अवस्थामें मुहम्मद साहबको पैगम्बरी मिली है सो जब यह जीव पाँच ज्ञानेन्द्री, पाँच कर्मेन्द्री पच्चीस प्रकृति और पंचप्राणका विचार करके उससे आपको अलग जानने लगता है तब यह मोक्षअधिकारी होता है यही पैगम्बरी मिलना है ।
पैगम्बरी मिलने पर मुहम्मद साहबने जिहाद करके काफिरों को मारना आरम्भ किया था । और काफिरोंके उत्पन्न करने पर मक्का छोड़कर मदीनाको गये थे । सो जब यह जीव अधिकारी होकर विषयमुख इन्द्रियों को साहिव मुख होनेके लिये उनका निरोध करता है तब इन्द्रियाँ बहुत उत्पात मचाती हैं तब जीव प्रवृत्तिरूप मक्कानगरको छोड़कर निवृत्तिरूप मदीनामें जाता है ।
बोध सागर
(१७)
अर्थात् प्रवृत्तिसे उदासीन होकर निवृत्ति को धारण करता है। और आसुरी सम्पत्ति रूप काफिरों को दैवी सम्पत्ति रूप फौज की सहायतासे मारता है।
इससे भी आगे बढ़कर मुहम्मद साहब मेआराज को जाते हैं। इस मेआराजके विषयमें अनेक मत भेद हैं। जिनका वर्णन स्वामी प्रमानन्दजीने कबीरमन्शूरमें बहुत उत्तम रीतिसे किया है पाठकोंके जाननेके लिये उर्दू कबीर मन्शूरसे अनुवाद करके यहाँ लिखताहूँ। स्वामी प्रमानन्दजीने प्रमाणके लिये मुसलमानी किताबोंके अरबी प्रमाण दिये हैं किन्तु उन प्रमाणोंका हिन्दी पाठकों को कुछ उपयोग न होनेसे केवल उनका आशय दिखा दिया है।
मुहम्मद साहबके हमेआराजका वर्णन
मुहम्मद साहबके मेआराजके विषयमें मुसलमानोंका भिन्न २ मत है। जो उनके हदीस और किताबोंसे प्रगट है।
तारीख मुहम्मदी में लिखा है कि, जब मुहम्मद साहबको पैगम्बरी करते बारह वर्ष बीत गये अर्थात् उनकी बावन वर्षकी अवस्था हुई तब एक रातको-जिबराईल और मेकाईल जो फिरिस्तों के मुखियों में से हैं मुहम्मद साहब के पास आये और उनका साना (कलेजा) चीर कर उसमें से सब पाप और बुरे संकल्पों को धोकर शुद्ध कर दिया और जब उनका हृदय (अंतःकरण) शुद्ध होगया तब उन्हें एक ऐसे जानवर पर जिसका शिर तो मनुष्योंका था और नीचेका धड विच्छी के समान था सवार कराकर खुदाके पास लेगये जिबराईल ने तो रिकाब और मेकाईलने उसका बाग पकड़ा। इस प्रकारसे वह रवाना हुए। चलते २ वे सबसे पहले बैतअकसा अर्थात् बड़े हैकल अर्थात् एक बड़े भारी वृत्तके निकट पहुँचे। वहाँ बहुतसे फिरिश्ते
(१८)
मुहम्मद बोध
मुहम्मद साहबको प्रणाम करनेको आये जहाँ वह बुराक बाँधकर जब भीतर गये तब वहाँ सब पैगम्बरोंकी आत्मा को देखा। फिरा एक सीढ़ी आकाशसे उतरी अरबी भाषामें जिसे मेसआराज कहते हैं फिर मुहम्मद साहब बुराकपर सवार होकर उस सीढ़ी के मार्ग से ऊपर को चढ़े। जब प्रथम आकाश पर पहुँचे तब वहाँका द्वार जिबराईल ने खुलवाया और सब भीतर गये। भीतर पहुँचने पर देखा कि, हजरत आदम बै हुए हैं और उनके बाई ओर नरकका द्वार खुला हुआ है और दहिनी ओर स्वर्गका। नरककी ओर देख कर हजरत आदम रोते हैं और स्वर्ग की ओर देखकर हँसते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक आकाश पर होते हुए जिबराईल मुहम्मद साहब को जब सदरह के द्वार पर ले गये तब वहाँसे जिबराईल पीछे हो लिये। आगे चल कर एक सुनहले पर्व के निकट पहुँच कर जिबराईल ने कहा कि इससे आगे हम नहीं जा सकते आप स्वयम् जाइये। फिर वहाँ से मुहम्मद साहब ने अकेले सत्तर मंजिल पार किया। सत्तर पर्व पार होकर बुराक भी ठहर गया और वहाँ से एक पक्षी जिसे जफ जफ कहते हैं आया और उस पर चढ़ कर मुहम्मद साहब खुदाके पास गये और वहाँ उन्हों ने खुदा से बहुत कुछ वार्तालाप किया और अपने धर्मके सब नियम उनको वहाँहीसे मिले जिसको लेकर वह लौट कर अपने स्थान पर चले आये। इस स्थान पर लिखा है कि यह सब बातें इतनी जलदी हुई थीं कि, मुहम्मद साहेब के बुराक पर सवार होकर जाते समय एक कटोराको धक्का लगा था जो पानी से भरा हुआ था। सो धक्का लगतेही वह टेढ़ा हो गया था। मुहम्मद साहेब इतनी जल्दी लौटकर आये कि उस कटोरे का पानी अभीतक गिरने नहीं पाया था और
बोधसागर
( ११ )
उसको उन्होंने आकर सीधा करके शेष पानी को गिरने से बचाया । किन्तु ऊपरोक्त सत्तर पदों जिनको मुहम्मद साहबने अकेलेही पार किया था उनमें से एक २ की दूरी इतनी थी कि, पाँचसौ वर्ष तक वेग पूर्वक चलने से पूरा होता था ऐसे सत्तर पदों को मुहम्मद साहब ने पार किया । और इधर लौट कर आने पर क्षण मात्रा से अधिक समय नहीं लगा । मुसलमानी धर्मते इसी वृत्तान्त को मुहम्मद साहबका मेआराज होना कहते हैं । इसी विषयमें मुसलमानी धर्मके बडे २ पण्डितोंमें बहुत मतभेद है । कोई तो कहता है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न देखा था, कोई कहता है केवल संकरूप से वहाँ पहुँचे थे, कोई कहता है केवल प्रथम भूमिका (बैतुलअकसा) तक गये थे, कोई कहता है कि, अन्तरहृष्टिसे मुहम्मदसाहेब वहाँ पहुँचे, कोई कहता है केवल जिबराईलको देखा खुदाको नहीं देखा, कोई कहता है पाँच-भौतिक शरीर सहितही मुहम्मद साहेब आसमानपर गये और इसी प्रत्यक्षकी हृष्टिसे खुदाको देखा । विस्तार भयसे अधिक मतभेदका लिखना छोड़कर यथार्थ आशयकी ओर झुकता हूँ ।
पैगम्बरी मिलनेके बारहवें वर्षके पश्चात् मुहम्मदसाहबको मेआराज हुआ था उसका आशय है कि, जब मुमुक्षु श्रवण मनन निदिध्यासन द्वारा बारह महावाक्यका विचार कर लेता है तब यह मोक्ष का अधिकारी होता है । और ५२ वर्षसे आशय है ५२ अक्षरसे सो जब यह ५२ अक्षर के वृत्त से बाहर होता है अर्थात् शब्द जालसे निकलता है तब इसको सच्चे सद्गुरु की शरणकी प्राप्ति होती है । जहाँ शुद्ध बुद्धि रूप जिबराईल जो शुद्ध सतोषुण से प्राप्त होती है और शुद्ध संतोष रूप में कार्दल जो रजोगुण की शुद्धता से मिलता है इसके साथ
( २० )
मुहम्मदबोध
होता है । और तमोगुण की शुद्धता से उत्पन्न हुए शौर्य ( धीरता ) रूप बुराकपर सवार होकर गुरुकी शिक्षा द्वारा यह ज्ञान की भूमिकाओंको पूर्ण करता हुआ यथार्थ पद को प्राप्त होता है । और यथार्थ पदको प्राप्त होकर जीवन मुक्त अवस्था से अन्य जीवों को उपदेश देकर काल जालसे छुडाता है ।
इस मुहम्मद बोध ग्रन्थ के यथार्थ आशय को पारखी आत्मविद गुरु अधिकार प्रति अनेक रूपकों में समझाते हैं और इसको आध्यात्मिकही अर्थ से ग्रहण करने के लिये दश मुकामी रेखताका भी प्रमाण है । सो यहाँ दशमुकामी रेखता लिख देता हूँ ।
दशमुकामी रेखता
चला जब लोकको शाक सब त्यागिया हंसको रूप सतगुरु बनायी । भृगु ज्यों कीटको पलटि भृङ्गै किया आप समरङ्ग दै ले उड़ायी । छोडि नासूत मलकूतको पहुंचिया विष्णुकी ठाकुरी दीख जायी । इन्द्र कुबेर जहाँ रंभको नृत्य है देव तेतीस कोटि रहायी ॥ १ ॥ छोडि वैकुंठको हंस आगे चला शून्यमें ज्योति जगमग गायी । ज्योति परकाशमें निरखि निस्तत्त्वको आप निर्भय हुआ भय मिटायी । अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुति करै तिनहूँ देव को हैं पिताई । भगवान तिनके परे श्वेत मूरति धरे भागको आन तिनको रहायी ॥ २ ॥ चार मुकाम पर खंड सोरह कहै अंडको छोर ह्यां ते रहायी । अंडके परे स्थान अचित को निरखिया हंस जब उहाँ जायी । सहस औ द्वादशै रुह है सङ्गमें करत कछोल अनहद बजायी तासुके बदनकी कौन महिमा कहौं भासती देह अति नूर छायी ॥ ३ ॥ महल कंचन बने मणिक तामें जडे बैठ तहै कलश अखंड छोजै । अचितके
बाधसागर
( २१ )
परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहँवा विराजै । नूरका महल और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द्व भाजै । करत कल्लोल बहु भाँतिसे संग यक हंस सोहंगके समाजै ॥ ४ ॥ हंस जब जात षट् चक्रको वेधिके सातमुखकाममें नजर फेरा । सोहंगके परे सुरति इच्छा कहीं सहसवामन जहँ हंस हेरा । रूपकी राशिते रूप उनको बना नहीं उपमा इन्दु जौनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै शब्दको टेकि चढ़ि देखि मुखकाम अंकूर केरा ॥ ५ ॥ शून्यके बीचमें विमल वैकुण्ठ जहाँ सहज अस्थान है गैव केरा । नवो मुखकाम यह हंस जब पहुँचिया पलक विलंब ह्राँ कियो डेरा । तहाँसे डोरि मकरतार ज्यों लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दै दरेरा ॥ भये आनन्दसे फंद सब छोडिया पहुँचिया जहाँ सत्य- लोक मेरा ॥ ६ ॥ हंसिनी हंस सब गाय बजायकै साजिकै कलश वहि लेन आये । युगन युग बीछुरे मिले तुम आहकै प्रेम करि अङ्गसो अँग लाये । पुरुषने दर्श जब दीन्हिया हंसको तपनी बहु जनमकी तब नशाये । पलटिकै रूप जब एकसे कीन्हिया मनहुँ तब भानु षोडश उगाये ॥ ७ ॥ पुहुपके द्वीप पीयूष भोजन करै शब्दकी देह जब हंस पायी पुहुपके सेहरा हंस औ हंसिनी सच्चिदानन्द शिर छत्रछायी । दिपैं बहु दामिनी दमक बहु भाँति की जहाँ घन शब्दको घमंड लायी । लगे जहाँ वरषने गरज घन घोरिकै उठत तहँ शब्द धुनि अति सोहायी ॥ ८ ॥ सुन सोह हंस तहँ यूथके यूथ है एकही नूर यक रङ्ग रागै । करत विहार मन भामिनी मुक्तिमें कर्म औ भर्म सब दूरि भागै । रङ्ग और भूप कोइ परखि आवै नहीं करत कल्लोल बहु भाँति पागे । काम औ क्रोध मद लोभ अभिमान सब छोड़ि पाखण्ड सत शब्द लागे ॥ ९ ॥ पुरुषके वदनकी कौन महिमा कहौँ
( २२ )
मुहम्मदबोध
जगत्में ऊपमाय कछु नाहिं पायी । चन्द्र औ सूर गण ज्योति लगै नहीं एकही नक्ख परकाश भाई । पान परवान जिन बंशका पाइया पहुँचिया पुरुषके लोक जायी । कहैं कब्बीर यहि भांति सो पाइहौ सत्य की राह सो प्रकट गायी ॥ १० ॥
देह नासूत स्वरे मलकूत और जीव जवरूतको रुह बखानै ॥ अरबी में लाहूत कहै जेहि निराकार मानिके मंजिल ठानै ॥ आगे हाहूत लाहूत है बाहूत खुद खाविन्द जाहूत जानै ॥ सोई श्री राम पन्नाइ सबै जग नाहि पन्नाह यह अता गानै ॥
इस प्रकारसे सत्यके खोजियोंको तो ऐसे ग्रन्थोंका आध्या- त्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है । और स्थूल अर्थ तो स्थूल बुद्धिवाले पक्षपातियोंके लिये ही छोड देना उचित है ।
इति
==
काफिरबोध (दशम तरंग)
बोधसागर
( २३ )
पृष्ठ ( ६८२ ) की टिप्पणीमें सूचित किये हुए बड़ा मुकामोंका वर्णन
प्रथम नासूत का वर्णन
नासूत मुकाम सुमेह पर्वतके उत्तर ओर पृथ्वीसे छतीस सहल योजन ऊँचा है और यहाँपर दयाअंश रहता है और यह मायाका स्थान है—महामाया इस जगह अपने तेज सहित निवास करती है। और जब कबीर साहब और मुहम्मद साहब उस स्थानपर पहुँचे तब वहाँ हजरत दाऊदको बैठे तथा ज़बूर नामक पुस्तकको पढ़ते पाया। वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने अस्तलामअलैक कहा—तब हजरत दाऊद अलैकमस्तलाम कहकर उठ खड़े हुए—और उनके हाथोंको चूमकर बड़ी आबमगत किया—तब कबीर साहब मुहम्मद साहबको उस स्थानकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले।
दूसरे मलकूत का वृत्तान्त
दूसरा स्थान मलकूत है—और यह स्थान नासूत से चौबीस सहल योजन ऊँचाई पर है—और पृथ्वीसे साठ सहल योजन की ऊँचाईपर है। और इस स्थानको दूसरे शब्दोंमें बँकुण्ड कहते हैं, और यह बँकुण्ड विष्णुका स्थान है—और इसी स्थानपर पाप पुण्यका लेखा लगता है—और इस विष्णुकी सभामें ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादिक समस्त देवतागण उपस्थित रहते हैं—इस विष्णुहीका नाम धर्मराय है—और आपको आज्ञासे नरक तथा बँकुण्ड और योनिका फिरना आदि सब कुछ होता है—और इसी स्थानसे विष्णु महाराजका परि-क्षण समस्त पृथ्वी और आकाशादिमें हुआ करता है। चित्रगुप्तजी विष्णु के मंत्री सबके पाप पुण्यका लेखा तथा हिसाब रखते हैं। जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस मलकूत पर पहुँचे—तो वहाँ मूसाको बैठे तीरते पढ़ता पाया—कबीर साहबने वहाँ पहुँचकरभी सलाम अलैक किया—मूसा सलाम का उत्तर देकर उठे, और उनका हाथ चूमकर बड़ी आबमगतकी तब कबीर साहबने मुहम्मद साहबको इस स्थान के समस्त गुण बतला तथा वहाँके वृत्तान्तसे विन करारकर आगे चले।
तीसरे जबरुतका वृत्तान्त
तीसरा जबरुत है—इस जबरुत स्थानको कबीर साहबने साँसरी दीप कहा है—और यह निर्गुण ब्रह्म अलख निरंजनका स्थान है जो तीनों लोकका कर्ता धर्ता है और यह स्थान बँकुण्डसे अठारह करोड़ योजन ऊपर को ऊँचा है—यह बड़ा सुन्दर स्थान है—यहाँपर चार करोड़ ज्योतिका प्रकाश है—और इस सभामें चारों फिरिस्ते उपस्थित रहते हैं—अर्थात् जिबरा ईल-इस-रापिल इज़राईल—और मेकाईल। इन्हीं चारोंको ब्रह्मा विष्णु शिव गौर यम इत्यादिके नामसे पुकारते हैं। समस्त आज्ञाएँ इसी स्थानसे प्रचलित हुआ करती हैं—और चारों फिरिस्ते इन्हींके आज्ञाकारी हैं। वेब तथा पुस्तकें सबके प्रचार कर्ता यहाँ हैं और आपही के आज्ञाकारी तथा अधीन सब हैं। आद्या तथा निरञ्जन इसी राजधानीमें बैठकर तीनों लोकका राज्य करते हैं जब कबीर साहब रसूल अल्लाहको साथ लेकर पहुँचे तो देखा कि हजरत ईसा वहाँ बैठे हुए इञ्जील पढ़ रहे हैं। वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने आसलामअलैक कहा और हजरत ईसा सलामका उत्तर देकर उठ खड़े हुए और उनके हाथको चूम लिया—तब कबीर साहब मुहम्मद साहबको उन स्थानोंके गुणका विवरण बतलाकर आगे चले।
( २४ )
मुहम्मदबोध
चौथे लाहूतका वृत्तान्त
चौथा लाहूत है जबलूत और लाहूतके बीचमें ग्यारह पालंगका अन्तर है, और एक पालंग आठ करोड़ योजनाका है । यह लाहूत स्थान अक्षरका है यहाँ अक्षर और योगमाया रहते हैं वह बड़ा सुन्दर स्थान है । जब कबीर साहब और मोहम्मद साहब इस स्थानपर पहुँचे तब कबीर साहबने मोहम्मद साहबसे कहा कि हे मुहम्मद ! देखो यह तुम्हारा स्थान है—और यहाँही वह अक्षर पुरुष जिसको तुम बेचून बेधेरा खुदा कहते हो रहता है और उस स्थानके गुण दिखलाकर आगेको चले ।
पाँचवे हाहूतका वृत्तान्त
पाँचवाँ हाहूत है—यह हाहूत स्थान एक असंख्य योजना शून्यके ऊपर है—अर्थात् लाहूत और हाहूतके बीचमें एक असंख्य योजना शून्य और अंधकार है—यह हाहूत स्थान अचिन्त पुरुषका है—यहाँ अचिन्त पुरुष सपत्नीक रहता है—और यह स्थान बड़ा ही मनोहर है—अचिन्तके सामने तीन सौ अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं—और यह निःशंक तथा निर्द्वंद्व रहता है कबीर साहब इस स्थान और अचिन्त पुरुषका सब विवरण मुहम्मद से कह करके आगेको चले ।
छठवाँ बाहूतका वृत्तान्त
यह बाहूत छठा स्थान है । और बाहूत और हाहूतके बीचमें तीन असंख्य योजना शून्य और अंधेरा है और हाहूतसे बाहूत तीन असंख्य योजनाको उंचाईपर है—यह अत्यन्त मनोहर स्थान है इस स्थानमें सोहँ पुरुष रहता है—और सोहँ पुरुषको अधीगिनीका नाम ओहँ है—यह सोहँ पुरुष अपनी शक्ति ओहँ सहित सिंहासनपर अधिकृत है—और उस स्थानमें सदैव सोहँका शब्द सुनाई दिया करता है । जब कबीर साहब मुहम्मदको लेकर इस स्थानपर पहुँचे तो वहाँके समस्त गुणोंका विवरण उन्होंने उनसे किया और फिर आगे चले ।
सातवें साहूतका वृत्तान्त
यह साहूत बाहूतसे पाँच असंख्य योजना ऊँचा है, और बाहूत और साहूतके बीचमें पाँच असंख्य योजना शून्य और अत्यन्त अंधकार है । यह इच्छाका स्थान है । इस स्थान की सुन्दरतम तथा यहाँकी सुखसामग्रीका भी विशेष विवरण है कबीर साहब मुहम्मद साहबको दिखलाकर आगे चले ।
आठवें राहूतका वृत्तान्त
राहूत साहूतके ऊपर चार असंख्य योजना ऊँचा है । साहूत तथा राहूतके बीचमें चार असंख्य योजना शून्य और अत्यन्त अंधकार है और इस राहूत स्थानमें अंकुर पुरुष अपनी शक्ति सहित रहता है—यह अत्यन्त सुन्दर तथा मनोहर स्थान है । जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको लेकर इस स्थानमें पहुँचे तो उसके सब गुण दिखलाकर आगे चले ।
बोधसागर
( २५ )
नवमं जाह्नतका वृत्तान्त
यह जाह्नतके ऊपर दो असंख्य योजना ऊँचा है। और बीचमें मूग्य तथा अंधकार है—इस स्थानमें सहज पुरुष रहता है—और सत्यपुरुषका सबसे बड़ा पुत्र यही कहलाता है। यह नवीं स्थान सबसे सुन्दर और आनन्द पूर्ण कहलाता है। कबीर साहबने मुहम्मद साहबको वह स्थान दिखलाय और इसका विवरण करके फिर आगेको चले।
दशमं जाह्नतका वृत्तान्त
जाह्नत और जाह्नतके बीचमें दश असंख्य लाख योजनाका अन्तर है अर्थात् स्थान जाह्नत जाह्नतके ऊपर दश असंख्य लाख योजना ऊँचा है और यही स्थान सत्यपुरुषका है इसकी सुन्दरताका विवरण किया नहीं जा सकता है इसी स्थानसे कबीर साहब सत्यपुरुषको आशा लेकर पृथ्वीपर आया करते हैं और इसी स्थानके रसूल पाक है और इसी सत्य पुरुषके सत्यलोकमें जब हंस पहुंचते हैं तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है और उन हंसका आवागमन फिर कभी नहीं होता। वे हंस सत्यपुरुषको स्तुति किया करते हैं और वे सत्यपुरुषके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं : सत्यलोकके आधीन अठासी सहस्र हीय है और सब हीयोंमें सत्यपुरुष हंस आनन्द करते हैं उनके भोजन तथा चरित्राविका विवरण नहीं हो सकता है।
सत्यकबीराय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
व्यासस्तरंगः
श्री ग्रन्थ काफिर बोध
मंगलाचरण-सोरठा
बन्दौ श्री सत्य कबीर, कुफर नशावन जगत गुरु ॥
पावों सत मति धरि, दूटे कुफर जंगल सब ॥
ग्रान्धारम्भः
कौन सो काफिर कौन मुदारि । दोऊ शब्दका करो विचार ॥ गुस्सा काफिर मंनी मुदारि । दोऊ शब्दका यही विचार ॥ हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ बैठे सरवरके तीर ॥ चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ॥ नंगे पायन पृथ्वी फिरे । हाट न लूटे बाट न पैं ॥ हमतो(बाबा)किसीका कछुन बिगारै । दर्द मन्ददिल दया सबारै ॥ दुनिया लोक सो उलटी करै । सत्यनाम सदा उच्चरै ॥ सिक्का देखि न कहिये फकीर । फकीर न कूटे पुरानी लकीर ॥ काफिर सो कुफराना करै । अलह खुदाय सो नाहीं डरै ॥ करै न बन्दगी फिरे दिवाना । गरभ बांधि फिरे गैवाना ॥ बोल कुबोल सेवै विसरावै । खून खराफातको दूरि बहावै ॥ दिल में चोर कमर में कत्ती । लोगन के घर भाजे रत्ती ॥ अलह के नामे बाँटे खाना । सो कहिये सांचे मुसलमाना ॥ मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥ खडी ना छेडे पडी न खाय । सो मुसलमान विहिश्तको जाय ॥
१ कोष । २ अभिमान । ३ व्यभिचार । ४ जारी ।
बोधसागर
(२७)
कलमा पढै न आवै बिहिस्त । हिरदे रहे पाप की दृष्टि ॥ हिन्दु मुसलमां खुदाके बन्दै । हमतो योगी (किसीका) नराखे छन्दै । देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम आधार ॥ टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दाबै हाथ न गढै ॥ तहाँ न अग्नि पवन का डर । ऐसा अलखपुरुष (जिन्दपीर) का घर चूना पत्थर बनाइया दादा आदम की करनी ॥ हमतो रहै अलेख पुरुष जिन्दा पीर की शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलमा करे विचार । मक्खी किया बड़ा अहँकार ॥ मक्खी तो गाये भखे । मक्खी तो सूअर भखे ॥ मक्खी तो हलाल भखे । मक्खी तो मुर्दार भखे मक्खी जाय बिगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह परवाना ॥ कोरा कलमा बहुतेरा बोले ॥ खैर मिहर का खीसा न खोले ॥ मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहिचाना । दर्दमन्द डुरवेश बखाना ॥ रहमत है मुरशिद पीरको । जहमत सूम महसूदको ॥ नेश्वयपरिचे निवाज गुजारे । श्रवणनेत्रको बर निहारै ॥ मुहम्मद मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढै ॥ किधर किधर की राह बतावे । बिन गुरु पीर राह ना पावे ॥
साखी—हाजी गजी दोऊ गुरुचैला खोज । दश दर्वाजा ॥
अलख पुरुष कहै माथ नवाओ, इस विधि करै निमाजा ॥
सभै साचे काजी, सांचे सांचे मुलना वेद कुरान ॥
कहै कबीर आबसो सब आलम उपजाना ॥ हिन्दू कहिये की मुसल माना ॥ राम रहीम बसे एक थाना । मनको जाने सोई मोलाना ॥ दरको जाने सोई दरवेश । हमतो बाबा नेकबदी सो न्यारा ॥ दुनिया मति कोइ लावे दोष । हम तो कहि हैं अकेले दस्त ॥
(२८)
काफिरबोध
ताका साहेब मक्का वस्त । मकवन्तका साहेब अकिल मन्द ॥ अकिलमन्द अकिल सोजाना । मन सुरीद दोस्ती दाना ॥ सहर गदाई कौन यार । सिर खुरदनी कौन यार ॥ बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशाही कौन यार ॥ काया यार सिर खुदनी । दिल यार मार मांहीं ॥ जीव यार बन्दी खाने । मन यार तख्त बादशाही ॥ मनलाल दिललाललालपोतदा । रहमसा ही हमसाहपोतदार ॥
इति कबीर साहब का वचन उचार विचार
अथ खान मुहम्मद अली पादशाहका प्रबोध ।
कलिक कीमोक लिस रसमें की चसमें । खदयर संयम करदम । ओजूद राह चकित करदम ।
औवल-अक्के पीर है । मन सुरीद है । तन शहीद है असल गदाई है । तकबुर दुशमन है गुस्सा हराम है । नफस शैतान है । चोरी लानती है । जुवारी पलीदी है । अदब आदि है । आदब कम असल है । राह पीर है । बैराह बेपीर है । सांह- विहिश्त है झूठ दोजख है । मोमदिल पाक है । संगदि नापाक है । हिर्स हैवान है बेहिर्स बली है ॥
लाह लुई दरकत है । अचेत गुलाम है । असलजादेको सलाम है । कृतहीन जर्दरू है । दाना जोहरी है । असलकी दोस्ती है । दाना शायर है । बूझ महबूब है । बन्दगी कबूल है । अल्लाह नूर है । आलम हद है । साहिब बेहद है । यकीन मुसलमान है । शील रोजा है । शर्म सुन्नत है । ईमान मुसलमान है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है नासबूरी मकारी है । दरोग दन्द है ।
इति समझौता
बोधसागर
( २९ )
अथ बन्द
प्रथमबोलिये मूल बन्द । दुजे बोलिये कमर बन्द । तीजे बोलिये लंगोट बन्द । पाँचवे बोलिये दानिश बन्द । छठे बोलिये शब्द बन्द । सातवाँ बोलिये सहस बन्द । आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म काहू विरले पाया ॥ मक्केहिर्से मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौबल वीर सुसलमान कहाया ॥ सुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दू के छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं सुसलमान । दादा आदम ने गाया । बडे बडे पीरन को फरमाया । खुदाने अली पादशाह को चिताया । हिम्मते बन्दा मददे खुदाया । दुआ फकीरा रहम अछाह । कदम दवैशाँ रह बलाय । दादा आदम मामा होआ । मक्के मदीने में चढा तावा । पहिली रोटी फकीर को रवा । ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा होवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजी ने कह्यो । कहै कवीर पीर को जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण वानी ।
इति श्री काफिरबोध प्रथम मंजिल समाप्त
फिरिशतोंका ब्यान
१ औवल फिरिशता बसर है । जैसे खुदाकी मूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बरसकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने सह फिरिशता सब । जीवधारीके संग लगा दिया है जो हरएकको बतलाता है कि, देख कर चलो ठोकर मत खाओ ॥
२ दूसरा फिरिशता समंअ ( कान ) है उसके द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह ( बुरा ) मरगूब ( भला ) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।
१ नेत्रेन्द्रो, कर्णन्द्रो ।