कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(२८३)
सो अचवन करवाऊं केहांजू ॥ पांच पचीस पकर नौ नारी, सजनको गारी गवाऊं केहांजू ॥ तत्त्व तमोलिन सुधर सुमतिले, सजनको बिरियां खवाऊं केहांजू ॥ एकईस खंड महलके भीतर, निरभय पलंग बिछाऊं केहांजू ॥ शील संतो खवास हमारे, सजनके चरन दवाऊं केहांजू ॥ धर्मदास कहे साहब मोरे, मुक्ति मनोरथ पाऊं केहांजू ॥
शब्द अचवन ।
सेवक लिये प्रेम जलझारी, खरचा ब्रह्म ज्ञान । सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ भाव भक्तिसों बीरा लीजे संतन जीवन प्रान. महाप्रभु । अमी उगार दासको दीजे जिनको परम कल्यान ॥ सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ हृदयकमल बिच पलंग बिछाऊं पौढें पुरुषपुरान. महा० ॥ चरनकमलकी सेवा करिहों दासातन परमान । सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ सुरतके बिजना डोलाऊं मैं ठाडी । एक टक लागों ध्यान. महा० ॥ धर्मदास पर दायी कीजे पूरन पद निर्बान । सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥
शब्द विजना ।
मेरे सतगुरु आये द्वारको रसको बिजना । काहेके बैठक देउं सुरत रसको बिजना ॥ चंदन पिठिया गुरु बैठका रसको बिजना । नीरन चरन पखारों सुरत रसको बिजना ॥ भात रिंधों रस दूधमें रसको बिजना । धोय मूंगके दार सुरत रसको बिजना ॥ काहेके थार परोसों हो रसको बिजना । काह कटोरन दूध सुरत रसको बिजना ॥ सोनेके थार परोसों हो रसके बिजना । रूप कटोरियन
(२८४)
कवीरपंथी-
दूध सुरत रसको बिजना ॥ जेईलेव सतगुरु पाहुना रसको बिजना । मुखभर देहु अशीस सुरत रसको बिजना ॥ पाथरको का पूजनी रसको बिजना । मुख बोले ना खाय सुरत रसको बिजना ॥ सांचे पूजहु साधुको रसको बिजना । मुख बोले ओ खाय सुरत रसको बिजना ॥ खाय पाय मुख सेजमें रसको बिजना । करले शब्द शृंगार सुरत रसको बिजना ॥ पानन बिरियां खवाऊं हो रसको बिजना । दोउ कर चरन दबाय सुरत रसको बिजना ॥ बिजना बिजना सब कोई कहे रसको बिजना । बिजना लखे न कोय सुरत रसको बिजना ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों रसको बिजना । रहत अमरपुर छाय सुरत रसको बिजना ॥
भोगकी आरती ।
सुमरन भजन आरती पूजा, सनमुख करले सेव । सिर पर राखिये हो, सोई परम गुरुदेव ॥ अजपा जाप जपो बिन जिह्वा- मूलमंत्र आराधि । अस्थिर ध्यान अमर हृद अविचल, लागी सहज समाधि ॥ मानसरोवर मंजन करले, त्रिबेनीको घाट । अनहद धुन सुन पांचों मोहे, खुलगये ज्ञानकपाट ॥ बिन नदिया बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । शब्द सिंढी ऊपर ले राखो, घरही है निज द्वार ॥ चांद सूर निसि वासर नाहीं, नाहिंन विद्या बेद । साहब कवीर भये जहां गुरुमुख, बिरले पावहि भेद ॥
चौकाकी रमनी ।
प्रथमहिं मंदिर चौक पुराये । उत्तम आसन श्वेत बिछाये ॥ हंसा पग आसन पर दीन्हा । सतकवीर कही कह लीन्हा ॥ नाम प्रताप हंस पर छाजे । हंसहि भार रती नहिं लागे ॥ भार उतार आप सिर लीन्हा । हंस छुडाय कालसों लीन्हा ॥ साधसंत मिलि बैठे आई । बहु बिध भक्ति करे चितलाई ॥ पान सुपारी नारियर केरा । लौंग लायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो
शब्दावली
(२८५)
मिष्टाँना । सत सवासा उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परवाना । सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासों काल दगा मिट जाई ॥ धन्य संत जिन आरति साजा । दुख- दारिद्र वाके घरसे भागा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । ओहँ सोहँ शब्द प्रगासा ॥
साखी-चौका चन्दन कीजिये, मलयागिरको नाम ।
चारो कमल सुधारहू, मध्य ताहिको धाम ॥ १ ॥
उग्र ज्ञानका कहों संदेशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास मानो चितलाई । रहो ठीका पर उचट न जाई ॥ अजर लोकमें आरती कीन्हा । सो आरती हम तुमको दीन्हा ॥ जा घर आरती नाहिन साजी । ता घर धर्मरायके बाजी ॥ जा घर आरती करो बनाई । निरभै हंस लोकको जाई ॥ कोटिन ज्ञान कथे नर लोई । बिन आरती बांचे नहि कोई ॥ अजर जोत आरती परकाशा । दूत भूत जम मानै त्रासा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । हँसा पावे लोक निवासा ॥
साखी-कलस आरती दल शिला, नरियर पान मिष्ठान ।
पुंगी फलपुष्प लौंग लायची, शब्द भजन धुन ध्यान २॥
धर्मदास तुम पंथ उजागर । अरपो दल परसो सुखसागर ॥ चंदन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहां बैठे आई ॥ सतबारीकै फूल मँगावा । सो सतगुरुको आन चढावा ॥ धर्मदास उठ बिनती कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानलेउं सोई । तुम गुरुछोड और नहि कोई ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो परकाशा ॥
सा०-लौंग इलायची नारियर, आरती धरो लेसाय ।
कहें कबीर धर्मदास सों, काल दगा मिट जाय ॥ ३ ॥
(२८६)
कवीरपंथी-
धर्मदास तुम बीरा लेहू । जंबूद्वीपके जीवन देहू ॥ मैं का जानो पंथके आदी । जंबूद्वीप बसे बकबादी ॥ पढे वेद औ करे अचारा । वे नहि माने शब्द तुम्हारा ॥ जो नहि माने शब्द हमारा । सो चलि जैहै जमके द्वारा ॥ जो कोइ माने शब्द हमारा । सो चल अइहै लोक मंझारा ॥ अंतर कपट करे मन माहीं । ताको लोक पहुंच नहि जाहीं ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम करो परकाशा ॥
सा०—अंसरेख सुर सीखको, गुरु स्वांसा घर एक ।
तामो नरियर मोरहु, टूटे विघ्न अनेक ॥ ४ ॥
चौकाके पद ।
भक्ति सतगुरु आनी संतो, कोई बूझे पंडित ज्ञानी संतो ॥ पाहन फोर गंग एक निकसी, चहुँ दिस पानी पानी । वा पानी दोय पर्वत बूढे, दरिया लहर समानी ॥ उठ माखी तरवर पर बैठी, बोले अमृत बानी । वा माखीके मक्खा नाहीं, गर्भ रहा बिन पानी ॥ राई बरोबर वस्तु हमारा, अर्ध राई अस्थूला । लहर लहर वह घट बिच होवे, सोई पुरुष निज मूला ॥ नारी एक सकल जग जायो, ताते रहत अकेला । कहैं कवीर यह पद को बूझे, सो सतगुरुका चेला ॥ १ ॥
गुनका भेद न्यारा न्यारा, कोई जानेगा जाननहारा ॥ सोई सुन्दर जाके पियको, बरत है अज्ञाकारी होई ॥ और सकल सब श्वान कूकरी, सुंदर बदन ना होई ॥ सोई गजराज राजकुल मंडन, जाके मस्तक मोती ॥ और सकल सब भार लदनुवाँ, महिषासुरके गोती ॥ सोई भुजंग जाके मस्तक मनि, मनि उजियारे खेले ॥ और सकल सावनके केंचुवा, जगत पांउतर डोले ॥ सोई पर्वत
शब्दावली
(२८७)
सुमेर उजागर, अष्टौ धात निवासा ॥ और सकल पाखान बरोबर, टांकी अगिन प्रकाशा ॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी ॥ और सकल साहबका बाना, देखो तत्त्व विचारी ॥
साखी-जो रचना है लोकके, सो चौका विस्तार ।
की बैठे निज बिंदसुत, की पूरा कंडिहार ॥ २ ॥
चीन्हो रे नरलोई सतगुरु ।
जासों मिटे तेरो जनम जोयनी, आवागमन न होई ॥ गुरु जगतमें बहुत कहावै, मंत्र देत हैं काना ॥ उपजे बिनसे औसागरमें, भेद यरम नहि जाना ॥ बेद पुरान भागवत गीता, सब मिल रही डिठाई ॥ धन सोई जीवसुफल सोई प्रानी, निज पूरे गुरुपाई ॥ चौर औ साहु जगतमें व्यापे, जो लखपावै कोई ॥ सांचे मिलै तवै सुख उपजे, तनके तपन बुझाई ॥ सांचे एक जगतमें सतगुरु, भौतारन कंडिहारा ॥ कहैं कवीर सब जगके गुरुवा, मर मर ले औतारा ॥
साखी-द्वादश दल जहां रचिके, करहु प्रेम परकाश ।
मध्यक्षेत्र विस्तारहु, अंक नाम विश्वास ॥ ३ ॥
गगनमंडलका बासा संतो, जहां देखो अजब तमासा संतो ॥ गढ़ मेरो गगन सुरत मेरो चौका, चेतन चँवर डुरावै ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नारी, अनहद बेन बजावै ॥ अष्ट कमल दल पंखुरी बिराजे, उलटा ध्यान लगावै ॥ पांचपचीस एक घर लावौ, तब धुनकी सुध पावैं ॥ त्रिकुटी घाट अस्नान जो करले, रबि शशि सुषमन होई ॥ हंसा केल करत राजन संग, एक महलमें दोई ॥ विन बादल जहां बिछुली चमके, बिना सीपके मोती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरखहु निरमल ज्योती ॥
(२८८)
कवीरपंथी—
साखी-जापर बसे निह अक्षर, ताहि पवनके नाम ।
शब्द सुधारस खान है, हम तुम ताही धाम ॥ ४ ॥
अब हम अविगतसे चलिआये । काहू भेद भरम नहीं पाये ॥ ना हम जनमें गरभ बसेरा, बालक होय खिलाये ॥ काशी शहर जलहि बिच डेरा, तहाँ जुलाहा पाये ॥ हते विदेह देहधर आये, काया कवीर कहाये ॥ बस हेत हंसनके कारन, रामानंद समुझाये ॥ ना मोरे गगन धाम कछु नाहीं, दीसत अगम अपारा ॥ शब्द स्वरूपी नाम साहबका, सोई नाम हमारा ॥ ना हमरे घर मात पिता है, नाहीं हमरे दासी ॥ जात जोलाहा नाम धराये, जगत कराये हांसी ॥ ना मोरे हाड चाम ना लोहू, हौ सतनाम उपासी ॥ तारन तरन अभय पद दाता, कहैं कवीर अविनासी ॥ ५ ॥
होत अनंद अनंद भजनमें ।
बरषत शब्द अमीकी बादर, भीजत हैं कोई संत ॥ अग्रवास जहाँ तत्त्वकी नदियाँ, मानो अठारा गंग । कर अस्नान मगन है बैठे, बढ़त शब्दके रंग ॥ पियत सुधारस लेत नामरस, चुवत अग्रके बुंद । रोम रोम सब अमृत भीजे, पारस परसत अंग ॥ श्वासा सार रचे मोरे साहब, जहाँ न माया मोहंग । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, जपो सोहंग सोहंग ॥
साखी-रामनरायन जगत गुरु, करें बोध संसार ।
वचन प्रतापसे ऊबरे, भौजलमें कडिहार ॥ ६ ॥
दर्शन देहु कवीर अब मोहिं ।
अघ तम पुंज दहन रवि भासत, निरमल होत शरीर ॥ श्वेत कमल पुरयनपर चौका, कर्मके कागद चीर । सुमरन करके दल तहाँ धरिया, सीतल जल हल नीर ॥ हंस बोलाय पुरुष जब लीन्हा, दीन्हो अंमर चीर । अमृत भोजन हंसा पावे, शब्द दूधके खीर ॥
शब्दावली
( २८९ )
सेज्या पुष्प श्वेत सिंघासन, माथे छत्र मनि हीर । कहें कवीर सुनो भाई साधू, सुमरण करो अस्थीर ॥
साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अंस ।
मुक्तराज तुमको दिये , अटल बयालिस वंश ॥ ७ ॥
पदचोरी ।
शब्द सिंघासन पाटमें, तुम हंसा बैठो आये हो । कौन नाम मुक्तामनी, कौन नाम वे अंस । कौन नाम वे पुरुष हैं, कौन नाम वे हंस ॥ अजर नाम मुक्तामनि, उग्रनाम वे अंस । ज्ञानी नाम वे पुरुष हैं सुतं, नाम वे हंस ॥ मूलद्वीप निज द्वीप है, और सुनो हम पांह । बैठे हंस उबारही, सोहंगमके बांह ॥ जंबुद्वीपके हंसा भाई, पांजी बैठे आय । कहें कवीर धर्मदास सो, तुम लावहु बांह चढ़ाय ॥
साखी-हंसा छूटे बाज जों, कोट सिंघका जोर ।
सुमरन दीनदयालका, पहुँच गया निज ठौर ॥ १ ॥
नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन जरजाय हो ॥ पानीसे पैदा किया, नख सिख सीस बनाय । वह साहबको विसारिया, तेरो गाढो होत सहाय ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम । जब जम बैठे कंठमें तेरो, कोई न आवे काम ॥ मात पिता सुत बंधुवा, और दुलारी नार । यह सब हिलमिल बीछुरे, तेरी शोभा है दिन चार ॥ जैसे लागी औरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम कवीर न छाड़िये, भावे हार होयके जीत ॥
साखी-उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।
हंस चलासो जात हैं, काल रहा सिरकूट ॥ २ ॥
अबकी बेर उबारिये मेरी अर्जी दीनदयाल हो ॥ आई थी
कवीरपंथी शब्दावली १ ०
(२९०)
कवीरपंथी—
वही देशसे, भई परदेशी नार । वह मारगमें भूलिया, बिसर गई निज नाह ॥ जुगन जुगन भरमत फिरे, जमके हाथ बिकाय । करजोरि बिनती करो, माहि मिलके बिछुर मत जाव ॥ विषम नदी बिकराल है, वाहित करिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये सुर नर झार ॥ शब्द जहाज कवीरका, सतगुरु खेवनहार ॥ कोइ २ हंस उबारहीं, पलमें लेहिं गोहार ॥
साखी—चली जु पुतली नोनकी, थाह सिन्धुकी लैन । आपन गल पानी भई, उलट कहे को बैन ॥ ३ ॥
कौन मिलावै जोगिया, जोगिया विन रहो न जाय हो ॥ हों हरनीं पिय पारथी, मारा शब्दका बान । जाहि लगे सो जानिया, और दरद नहिं आन ॥ पिय कारन पियरी भई, लोग कहे तन रोग । जप तप लंघनमें करो, पिया मिलनके योग ॥ हुं तो प्यासी पीव की, रटों सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीविहों, ना तो (सहजे) त्यागों जीव ॥ कहैं कवीर सुन जोगिनी, तनही में मनही समाय । पिछली प्रीतके कारने, (जोगी) बहुरि मिलेंगे आय ॥
साखी—अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल ते होय ।
जेह सतगुरु बहियां मिले, हंस न जाय बिगोय ॥ ४ ॥
हंसा डुरमत छोड़ दे तूं तो, निर्मल होय घर आव हो ॥ दूधहि से दधि होत है दधि, मथ माखन होय । माखनसे घृत होत है, बहुर न छाँछ समोय ॥ ऊँखहिसे गुड़ होत है, गुड़से खाँड होइजाय । सतगुरु मिल मिसरी भये, बहुरि न ऊँख समाय ॥ खाँड जो बगरी रेतमें गजमुख, चुनी न जाय । जात बरण कुल खांय के, चींटी होय चुन खाय ॥ दाग जो लागा नीलका, नौ मन साबुन धोय । कोट यतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥ कहैं कवीर सुन केशवा, तेरी गत अगम अपार । बाप बिनोरा हो रहे, पूत भये चौतार ॥
शब्दावली
(२११)
साखी-बीरा पद जिन जानहु, पुरुष नाम निजमूल । जा दिन हंसा तन तजै, मेटै संशय शूल ॥ ६ ॥
शब्दसनेही हंसा तुम, जग तज होहु न्यारा हो ॥ सतशब्द निज डोर है, तुम हंसा गहो बनाय । सतबीरा निज नाम है, (तुम) चाखतही घर जाव ॥ बिना बीज को जामि है, बिन अंकुरको झाड़ । बिन डोडी फल लागिया, कोइ साधू करे बिचार ॥ अजर केर अंकुरा भये, अजर केर लागी डार । अजर फूल फल लागिया, (कोइ) साधू करे अहार ॥ मोहि अजर कर जानहु, अमर देऊं बताय । जेहि भांडे निज साँच है, (हम) तामो रहें समाय ॥ कहें कवीर धर्मदास सो, बेग जाहु संसार । सोहँगमके बाँह से, (तुम) हंस उतारो पार ॥
साखी-उत्तर घाटी उत्तरे, पांजी बैठे जाय ।
तहवां सुर्त समावै, पुरुषके परसे पाय ॥ ६ ॥
चौपड़ ।
चल सखी चौपड़ खेलिये, तन मनसे बाजी लाय हो ॥ चौपड़ खेलौं सुन्नमें, खेलौं दिन औ रात । चल हंसा घर आपने, जहां तेरी उतपात ॥ चौपड़ खेलौं पीवसे, बाजी लगावों जीव । जो हारों तो पीव की, जो जीतों तो पीव ॥ चार गली घर एक है, चार बरन एक सार । पासो ढारा प्रेमका, जीत चली सोई नार ॥ चौपड़िया के खेलमें, जुग नाहनेको दाव । नरु अकेली हो रही, छिन पल खावे घाव ॥ चौरासी घर भस्मके, पौमें अटकी आय । अबकी पौं जो ना परे तो, फिर चौरासी जाय ॥ पगरासे बाजी लगी, परे अठारा दाव । सार गँवाई हाथसे, सिर पर लागे घाव ॥ जात बरन कुल मेटिके, पाये भक्ति अटूट । कहें कवीर धर्मदा- ससों, कोई न पकड़े खूट ॥
(२९२)
कवीरपंथी—
साखी—मैं कवीर बिचलों नहीं, शब्द मोर समरन्थ ।
जाको लोक पठाइया, चढे शब्दके रथ ॥ ७ ॥
ज्ञान रतनकी आंखिया, तुम देखो जमके जाल हो ॥ जमके फंदा काटो हंसा, जग तज होहु न्यार । सतगुरु दर्शन देयँगे, तुम उतरो भौजल पार ॥ जो तुम हंसा निर्गुन चाहो, सर्गुन करो बिचार । निर्गुन सर्गुन छोड़िके, ( तुम ) दोउ तज होहु न्यार ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भँवर गुफाके घाट । सहस पंखुरीको कमल है, पश्चिम दिशाके बाट ॥ नौ खंड हेत बिसारो हंसा, शब्द सुरत चित धार । कहैं कवीर धर्मदाससों, तुम उतरो भौजल पार ॥
साखी—नाद संघाती कवीर हो, बिंदहि देहु न भार ।
जुग जुग हंस हिरम्मर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥
बीकाकी आरती ।
मंगलरूप आरती साजे, अभय निशान ज्ञान धुन गाजे ॥ टे० ॥ अक्षे वृक्षकी अमर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥ निसि बासर जहाँ सूर न चंदा । परम पुरुष जहाँ करत अनंदा ॥ तन मन धन जिन अर्पन कीन्हा । पुरुष पुरुष परमात्म चीन्हा ॥ जरा मरनकी संसे मेटो । सुरत संतायेन सतगुरु भेटो ॥ कहैं कवीर हिरंमर होई । निरख नाम निज चीन्हे सोई ॥
मंगल ।
बनजारिन बिनती करें सुन साजना । ( साधो ) नरियर लीन्हो हाथ संत सुन साजना ॥ बिना बीजको वृक्ष है सुन साजना । ( साधो ) बिन धरती अंकूर संत सुन साजना ॥ जाको मूल पताल है संत सुन साजना । ( साधो ) नरियर सीस अकाश संत सुन साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु सुन साजना । ( साधो ) जीव इकोतर हानि संत सुन साजना ॥ गुरुके शब्दले मोरहु सुन
शब्दावली
(२९३)
साजना । ( साधो ) खुले जमको कपाट संत सुन साजना ॥ सखियाँ पाँच सहेलरी सुन साजना । ( साधो ) नौ नारी विस्तार संत सुन साजना । कहैं कवीर बचेलसे सुन साजना ॥ रानी इंद्रमती सदाँर संत सुन साजना ॥
नारियलका शब्द ॥
मोरहु नरियर मोरहु हो, आपन अंस बचाय । बिना शब्द जिन मोरहु, जिव परले तरजाय ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामों एक हमार । आपन अंस बचायके, जमके अंस निनार ॥ जमको अमल मिटावहू, पवन बतीस बिलोय । नीर नेह निवारहू, चलो महातम खोय ॥ धरती रेख सुधारहू, पौरुष पवन अमान । बिना भेद जिन मोरहु, जीव एकोतर हान ॥ सोई पवन निज गहि रहो, नरियर वास समोय । तो नौ तत्व सुधारहू, काल निकट नहि होय ॥ धरती गुन गहि प्रगटहू, करो शब्द परकाश । साहब कवीर कर दीहल, दृढ मानो धर्मदास ॥
भोगका शब्द ।
सत पुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे हो ॥ कदली पत्र साजो पनवारा । सीतल शब्द जोत उजियारा ॥ नरियर मोरि खुरौरी कीन्हो । आद नाम अंतर घट चीन्हो ॥ सुघर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीत भावसे संत मंगाई ॥ लौंग लायची किसमिस मेवा । सुघर मधुर रस दाख घनेवा ॥ सुख- सागरको निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सतपुरुषको अर्पन कीन्हा ॥ शंख शब्द धुन बाजे बीना । सो पनवार दासको दीन्हा । जाते काल भयो आधीना ॥ पान पसाद जीव जो पावे । अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ऐसा भेद करो परकाश । सत्य शब्द मानो विश्वास ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदास । बीरानाम करो परकाश ॥
(२९४)
कबीरपंथी—
शब्द तिनूकाका ।
जमनियाके डार साहब तोड़ दीजे हो ॥
एक जमनियाकी चौदह डार, सार शब्द ले तोड़ दीजे हो ॥ सुरत हमारे अजब पियासै, प्रेम अमीरस घोर दीजे हो ॥ गुरु हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारथ अमोल दीजे हो ॥ यह संसार बिषैरस माते, भरम किंवरिया खोल दीजे हो ॥ धर्मदासकी अरज गोसाईं, जीवनको बंध छोर दीजे हो ॥
शब्द कंठीका ।
पायो निजनाम गलेको हरवा ॥
सतगुरु पटवा अजब लहरवा । छोटी मोटी डोलिया चार कहंरवा ॥ प्रेम प्रीतकी पहिर चुनरिया । निहुर नचो साहब दर- बरवा ॥ सतगुरु कूंची दर्ई महलमें । जब चाहो तब खोल केवरवा ॥ एही मेरो ब्याह यही मेरो गवना । कहैं कबीर बहुर नहिं अवना ॥ १ ॥
शब्द नामका ।
गुरु पईयां लागों नाम लखाय दीजो हो ॥
जुगन जुगनके सोये मनुवा । दे सत शब्द जगाय लीजेहो ॥ घट अँधियार कछू नहि सूझे । ज्ञानकी दृष्टि खुलाय दीजे हो ॥ विषकी लहर उठे घट भीतर । अमृत बुंद चुवाय दीजेहो ॥ गहरी नेदिया नाव पुरानी । खेयके पार लगाय दीजेहो ॥ धर्मदासकी अरज गोसाईं । जीवन बंध छोड़ाय दीजे हो ॥ २ ॥
शब्द दीहल प्रारम्भः ।
आमिन बिनती बिनवई, सुनहु हो बंदीछोर । भौसागर मोहिं तारहु, इतना मोर निहोर ॥ भौसागर अहैं भयावना, सूझे वार न पार । झंझर नाव पुरातमा, खेइ उतारो पार ॥ कोट कर्म छूटे नहीं, या जिव कीट समान । भुंगी होय गुरुतारहु, अधम उधारन मान ॥ आसन आदि पुरुषको, धर्मदासको दीन्ह । चार अंश
शब्दावली
(२९५)
चौका महि, तामो लोन्हो चीन्ह ॥ कहें कवीर सुन आमिनी, रहो हमारी आस । जीवन पार उतारिहौं, होइ चूरामन दास ॥ १ ॥
दीहल कालज्ञान ।
पांच घरी वायें चले, सोई दहिने होय । दस स्वासा सुख- मन चले, ताहि विचारो लोय ॥ आठ पहर जबही चले, पिंगला माहीं स्वास । तीन बरस काया रहे, ता पीछे होय नास । आठ दिना जबहीं चले, स्वासा रवि की ओर । दोय बरस काया रहे, प्राण जाय तन छोर ॥ सोरह दिन जबहीं चले, भान दाहिने होय । बरस दिना काया रहै, पीछे रहै न कोय ॥ बीस रैन औ बीस दिन, चले दाहिनो स्वास । षष्ट मास काया रहै, ता पीछे होय नास ॥ एक मास औ एक दिन, रविके पहरा होय । स्वास सरोधा सत्य है, नर जीवे दिन दोय ॥ नहि चंदा नहि सूर है, नहीं सुषुमना बास । सुख सेती स्वासा चले, पहरमें होय बिनास ॥ कहें कवीर विचारके, गहो शब्द टकसार । सत्य लोक हंसा चले, आवा गमन निवार ॥ २ ॥ निज अनंद घर महलमें, करो सदा सुखबास । सो वर चीन्हौं संतो, काटो जमके फांस ॥ निज उत्तम घर आपनो, सो तुम चीन्हत नाहि । बिन चीन्है कहाँ जैहो, यह बड़ अचरज आहि ॥ अबहुं कहो जो मानहु, उलखो वचन हमार । दुबधा डुरमत छोड़के, चीन्हो वस्तु सम्हार ॥ पांचतत्व निज मूल है, करता इनहीं मांहि । नख सिख तन निज ढारिया, सो कहुं अन्ते नाहि ॥ अनत होय तो को गढे, यह तन सुंदर रूप । सकल साज एक बुंदमें, ऐसा ख्याल अनूप ॥ अगिन पवन जल पृथवी, इनमें साहब जीव । पुहुप मध्य ज्यों बास है, दूध मध्य ज्यों घीव ॥ घरमें जल जलमें घर, बोलनहार संजोग । सांचे सांचे ढारिया सांचें सुख भोग ॥
(२९६)
कबीरपंथी—
तब जो हता सो अब है, फेर फार कछु नाहिं । बिन स्वरूपको साहब, सो कतहुं नहिं आहिं ॥ निगुण नाथ निरंजना, जिनके पिंड न प्रान । सो बर बरो सबन मिलि, कामिन रूप जहान ॥
गुरुमुख भई सगाई, सुमरन लागो नेह । तत्वको तेल चढ़ाय के, भूल गई गुन देह ॥ ज्ञानको मंडप छाइले, ध्यानको भराई ठाँव ।
बिन अक्षरको मंगल, बिन रसना गुण गाँव ॥ दूल्ह देव निरंजन, दृष्ट मुखसे चीन्ह । पृथी अकाशके बाहिरे, या विधि भाँवर दीन्ह ॥
भाँवर भई अनंद भये, अजहुं मिलना नाहिं । तन छूटे, गुरु दूटे तब वेगहि हैं बाँहिं ॥ ऐसी आशा अवधि बद, गये गुन राह बताय ।
नाम अधार सो रहगई, दुल्हिन अतिसुख पाय ॥ अवध पूजे जब आयके दुल्हिन, जोवैं बाट । तन छूटे वे ना मिले, कौन सहे अपघाट ॥
गोहरावे आवे नहीं, बिन देखेकी प्रीत । आप अपुन चीन्है बिना नहिं आवे, परतीत ॥ आशा भई निराशा, को आवे को जाय । भौजल नदिया भयावना, फिर फिर गोता खाय ॥
अगम अगाह अथाह है, थाह न पावे कोय ॥ सतगुरु थाह थहावे, जीवन मुक्ता होय ॥ जा कारण जग नाचिया, नाना भेष बनाय ॥
सो ना मिलौ ना मिलि हैं, नाहक गोता खाय ॥ बिन परचे जिन भूलियो, कहैं कबीर विचार । जिनको परचे अब भई, तिनके अटल दिदार ॥ ३ ॥
सुखसागर सुख विलसहू, छाँडो दुखकी आस अपने जिवन धन चीन्हहू, सब सुख तुम्हरे पास ॥
जुगल रूप जग भीतरे, कांता कामिनि नेह । अष्टधातको जुगल तन, एक प्रान दोय देह ॥ तन सूरत मन मूरत, साहब बोलन हार । नर नारी सुख बिलसो, करता सिरजन हार ॥
यह छबि आय सकल विधी, दुखका मूल बिसार । एक बुन्दते सिर-जिया, एकहि है करतार ॥ आपुहि तखत बनावै पानी पवन
शब्दावली
(२१७)
संयोग । अष्ट धातके महलमें क्रीडाकरे सुखभोग ॥ आपुहि राजा परजा, आपुहि रंक फकीर । आप सर्व गुन आगरे, आपुहि गुन गंभीर ॥ आपुहि जती सती है, आपुहि है दयापाल । आपुहि जोगी जंगम, आप कियो विस्तार ॥ आपुहि गावै बजावे, आपुहि तोरे ताल । आपुहि लखे अपन पौ, आप अपुनमें काल ॥ आपुहि करे करावै, लेय औरको नांव । आपुहि खलक ऊजरे, आप बसावे गांव । जुग असंखलो शंकर, धरे सुन्नमें ध्यान । उनहुँ न लखो अपुनपो, तू नर कयोँ वौरान ॥ ब्रह्मा विष्णु थकित भये, खोजत पार न पाय । औरन्हकी मति केतिक, नाहक गोता खाय ॥ शिव सनकादिक नारद, शारद शेष सुरेश । अस्तुति करत थकित भये, उनहुँ न कहा संदेश ॥ एके जपै निरंजन, निर्गुन और निरंकार । पाँच तत्वके बाहिरे, उनके भये अकार ॥ अलख अपार परम गुरु, अरु मूरत वे पिंड । औगह अगह अवीज है, जोत सरूप अखंड ॥ सुध बुध वा पहुँचे नहीं, महा कठिन ऊ पंथ । सुमिरन साखकी खबर नहीं, कथकथ मरे ग्रंथ ॥ हाथ माथ पग पिंड बिन, केतिक बडो वह कोड । किसबिध चेरी आगरी, किसबिध खसम निगोड ॥ कथकथ मुनिजन उडगये, जस भैवे अकाशे गिद्ध । चारा वाके भुई धरो, कहा उडे भये सिद्ध ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्ध, कोट अनंतन दास । उनहुँ न लखो अपुनपो, भरमत फिरत उदास ॥ कस्तूरी है कुंगरंग, चले पवनके बास । मृगमध्य नाभी बसे, मृग दूँडे वन घास । कहैं कवीर अब कहतहुँ, डार भर्मकी मोट, अपनो भलो जो चाहऊ, परखलेउ खर खोट ॥ ४ ॥ सुन्न सरोवर भीतरे, तीरथ एक अनुप । तेज पुंज जहां झलकई, प्रगटे जोत स्वरूप ॥ कदल कमलदल अंतरे, रजनी बासर नाहिं । अनहद घंटा बाजई, पाँच
(२९८)
कवीरपंथी-
सुत्रके माहिं ॥ कंचन कूट औटाइले, भिन कबहुँ नहिं होय । परमल बास पलासकी, काष्ठ कहे नहिं कोय ॥ काष्ठ माहिं पावक बसे, ज्यों तिल मद्धे तेल । जुक्ति बिना नहिं नीकसे, ऐसा अद्धुत खेल ॥ परम पुरुष संग दुलहिन, खेलै आतम सार । एक वरण एक अंक है, एक रूप अनुहार ॥ साहब कवीरके दीहल, सुनियो संत सुजान । समुझत सुख ऊपजे, नातो दुकख निदान ॥ ५ ॥ सुकृत फूल गुलाबके, सबघट रहो समाय । कहु कैसेके पाहये, गुरु बिन लखो न जाय ॥ तीन त्रिकुटीके ऊपरे, फुलै सोहंगम फूल । जहां न धर्मकी आसना बिन अझर निजमूल ॥ चार जोजनके ऊपरे, पुरुष विदेही पूर । जगरमगर वह नग्र है, बाजत अनहद तूर ॥ अपने ठीका हम खडे, सतगुरु दिया बताय । खिरकी खोल दिखाइया, राह गगनकी जाय ॥ कहैं कवीर धर्म- दास सों, प्रगट दीहल बताय । सो हंसा भल पावई, नहिं आवे नहिं जाय ॥ ६ ॥ अचरज देखो कामिनी, कहतेको पतियाय । अधर साहब हम देखिया, सतगुरु डंडिया फँदाय ॥ चंद सूर जहँवां नहीं, जहां न धरनि अकास । तीन पुरुष मोरे प्रीतम, केहि विधि करो निवास ॥ गुरु दर्शनके कारने, सरवस देउँ लुटाय । एक पलकके बीछुरे, अब मोहिं कहु न सोहाय ॥ गुरु दरसन हम पायल, छूटल कुल परिवार । अब जहँ पुर आपने, परख परख टकसार ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों, हिरदे करो बिचार । अरस परस करो कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ७ ॥ दरिया पार हिंडोरना, दीन्हो कंथ बताय । कोई एक नार सुलक्षनी, हरदम झूलै जाय ॥ अरध उरध दोय खंभ हैं, सुखमन लागी डोर । जेठी सुतं सम्हारले, रचले गगन मन मोर ॥ द्वादश केर हिंडोरना, झूलै पाँचों नार । मेघ घटा घन गरजई, पिय बिन जग अंधियार ॥
शब्दावली
(२९९)
अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥ कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें, बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी, आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन, तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई, सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय । सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय । हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी, जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥ सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब
(३००)
कवीरपंथी-
कवीर कहि दीहल, सुनियो हो धर्मदास । निर्गुन केर सुलच्छनी, निर्गुण कियो निवास ॥ १० ॥ आरती साजहु दुलहिन, आवहि कंथ सबेर । निर्गुण मंगल गावहु, अब जिन लावहु बेर ॥ तन रुइया कर बातियां, मन तिलको कर तेल । सुरत हाथ दियना धरो, निरत चली कर केल ॥ अच्छे पलंग जहाँ पचरंग, सो रे बिछावौ झार । सुषुमन सेज सँवारहु, सुकृत गढवा धार ॥ हँसिके प्रीतम आइया, बिहँसि के लीन्हो पाय । सुख देखत सुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाय ॥ ईगला लिये कर झारी, पिंगला पंखा गाँस । सतगुरु शब्द सहायक, पहुँच पियाके पास ॥ हियरा गहभर भेटिया, सुक पलोटे पांय । सुख देखत सुख ऊपजे, तनकी तपन बुझाय ॥ कहैं कवीर धर्मदाससो, सुनियो संत सुजान । पिया मिलो सुख बिलसो, जम जीतो मैदान ॥ ११ ॥ भौसागर मोर नइहर, निर्गुण सासुर मोर । आवत बटिया भुलानी, काल करे घन घोर ॥ आग लगे वह नइहर, धोख परे असगार । सास ननद झगरा करे, नित उठ माँडे रार ॥ अनचिन्ह ससुरे के लोगवा, नित उठ लावे दोस । पार परोसिन बैरिन, एक पियाके भरोस ॥ बालम मंदिर छवायेल, झलके अघर अकास । छिन छिन बदन निहारत, देखत बहुत हुलास ॥ प्रेम सुरत गहु कामिनि, जामों निर्गुन बास । परम अनंद सुफल भये, जम माने (जाके) त्रास ॥ बहुर न या जग आइहो, बहुर न धरिहो देह । साहब कवीर कहि दीहल, निरख परख कर लेह ॥ १२ ॥
मिलरहु सखी री तू मिलरहु, अपने पिया सुख जान । नइहर आपन कोई नहीं, जासों करो पहिचान ॥ मोरे जीवको भावतो, छाय रह्यो वही देस । मैं विरहिन निशदिन फिरों, कर जोगिनको भेस ॥ तात मात कोई संग नहीं, संग नहीं सग भाय । काम न
शब्दावली ।
(३०१)
काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी, तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥ कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय । कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥
दीहल आगन तान ।
पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस- कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥ गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥ स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे, हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव । चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥ जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर, उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार । जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया- वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल
( ३०२ )
कवीरपंथी—
टकसार ॥ बिन हंस हंस न पहुंचई, बीचाहिं परे भुलाय । काल कठिन भरमावई, कामिन परे उरझाय ॥ हंस हंस मिलि लेचले, जहां पुरुष रहिवास । साहब कवीर कहि दीहल, निर्गुन अथर निवास ॥ १५ ॥ सहतेजी चित् चेतहु, सुमिरो नाम अथार । हंसन पार उतारहु, परख २ टकसार ॥ भौसागर बड दारुन, विषके लहर फिराय । बिन सतगुरु नहिं बांचिहो, सबै काल धरखाय ॥ मोरहु नरियर मोरहु, आपन अंस विचार । काल कठिन दुर्गदानिया, काह करे झखमार ॥ सहतेजी चित् चेतहु, काल कठिन बल जोर । लगन साध परमोधहु, पला न पकडै चोर ॥ निर्गुन नाम निअक्षर, सुमिरत कर्म कटाय । साहब कवीर कहि दीहल, सहतेजी ससुझाय ॥ १६ ॥ चार कमल चित् चेतहु, जहां जीवको बास । जुग जुग पान सुधारहु, मेटो जमको त्रास ॥ कमल तत्त्वचित् चेतहु, जिव ना नसे तेह मांह । लगन सनेह बिचारहु, देउ हंसको बांह ॥ जाहि कमल बस जीयरा, ताहि लगन देव पान । प्रीतम जैसुन जगपती, हंस होय निरवान ॥ या बिधि भेद बिचारहु, निरखो तत्त्व निसान । तब छुटिहै भौसागरा, जिव कहं पहुंचे यान ॥ कमल तत्त्व नहिं दरसई, जिव धोखे पर जाय । परमोदिक भये दारुन, राखो काल झुलाय ॥ राये बंकेज बिचारहु, जीवन करहु सुधार । साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १७ ॥ राज बरन जुग बांधहु, भांवर सती सनेह । येही गमन करो दुलहिन, बहुर धरो जिन देह ॥ चंपा पहूम चमेलिया, लाये करेउ बनाय । तिलक लिलार सम्हारहु, जमकी दासी छुड़ाय ॥ हंस हंस जुग बांधहु, चौदह पवन लखाय । शब्द चित्त गहु दुलहिन, कोटिन कर्म कटाय ॥ जाहि पवन पर शशि बसे, चित्त गहि रहे चकोर ।