भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(६६१)

पूजे पषान ॥ कोई गिरही कोई फिरै उदास । कोइ नग्र त्वचा गुफामें वास ॥ कोई डंड कमंडल धूमपान । कोई उरध तपस्या गोड तान ॥ कोई दूधारी पवन आस । कोई अग्नि जराचे चहुँ पास ॥ कोई छत्र धारी धज निशान । कोइ सुरासन मुख खेत ठान ॥ कोई पीर औलिया करै मिजाद । कोई षट् दरसनमें करै बाद ॥ कोइ उदय अस्त दहना वल देय । कोई चारि मास जल सैन लेय ॥ कोई बहुत भेष धरि करै स्वांग । कोई साधे धतूरा पोस्त भांग ॥ कोई उरध कपाली आसन राधि । कोई निशि वासरकी निद्रा साधि ॥ कोई रिद्धि सिद्धि करामाति जान । कोई जोगी सुद्रा पहिरै कान ॥ कोई अलह कहै कोई कहे राम । हिन्दू तुर्क दोय धर नाम ॥ सकल ब्रह्म समान एक । कहैं कवीर लीला अनेक ॥

वसंत २५-ऐसे सबै मद माते कोई न जाग । संगहि चार घर मूसन लाग ॥ टेक ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पंडि पुरान ॥ तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते अह भेव ॥ माते ऊधो औ अकरूर । हनुमत माते लिये लंगूर ॥ शिव माते हरि चरन सवे । कलि माते नामा जय देव ॥ जैनी माते करम बाद । जंगम माते घंट नाद ॥ सुल्या माते देदे बांग । राम विमुख सब भूले सांग ॥ राजा माते भरि भंडार । रानी माती करि सिंगार ॥ दानी माते दे दे दान । प्रजा माती विषया पान ॥ ब्रह्म रटत है चारों वेद । रावन गइयो घरके भेद ॥ या मनुवाको अध्यक्षम काम । ताते कहै कवीर भजु सत्त नाम ॥

वसंत २६-नारि नाहि संतो हरि तुम्हार । बिना मूल जैहो जनम हार ॥ टेक ॥ हरिश्र्वंद समान नहि दानी आन । निज रानी सहित पुत्र विकान ॥ विन विचार चित लियो है मानि । हरिचंद भरो डोम घर पानि ॥ पांडव कहिये सब सौ जोर । तिनका पाँव

(६६२)

कवीरपंथी—

नरकमें बोर ॥ राजा बलि करनी जो कीन्ह । बावन रूप छली बाहु लीन्ह ॥ रावन भयो चहुँ खलके राल । तिनको काल कियो पैमाल ॥ मथुरा कंस सिर छत्र ढार । कृष्ण किस्ना काल धरि चोटी मार ॥ यही भांति सब गये है बीति । काहु न मानी शब्दकी रीति ॥ कहैं कवीर यह हरि विचार । शिव विरंचि सब खायो झार ॥

वसंत २७—इस घरमें बाबा बाढी रारि । नित उठि लगै चपल नारि ॥ टेक ॥ एक बडी जाके पांच हाथ । पांचनके पचीस साथ ॥ पचीस बतावे और और । और बतावे कई ठौर ॥ इक अन्तर बैठि अन्त लेय । इक झक झोरि झोटा देय ॥ अपनों अपनों चाहैं भोग । कहैं कैसेके यह सधै जोग ॥ नियरे रहन न पाऊँ दूरि । चहुँ दिशि बाबरि रही पूरि ॥ लाख अहेरी एक जीव । ताते पुकारे पीव पीव ॥ घर बांधु नहिं मांछु भीख । बहुत दिननको लागी सीख ॥ अबकी जो कहुँ होय बचाव । कहैं कवीर परै पूरा दाव ॥ २७ ॥

वसंत २८—मोपै मोह मृग मारचो न जाय । मेरी बुद्धि वारीमें वसो खाय ॥ टेक ॥ मेरी बुद्धि वारीमें मुकती मैन । मोहि देखत चरि गयो केन केन ॥ रहन न पावे फूल पात । सौंचत हारी पटक हाथ ॥ सुरति निरतिके लिये है वान । ग्यान धनुष सधै सधान ॥ अब मारूं तो ताकि ताकि । होय विदेह तहां गयो विलाप ॥ सुर नर मुनि सब थकै हारि । मोह मृग नहीं सके मारि ॥ कहैं कवीर हम दियो टारि । गुरुकै शब्दकी करी बारि ॥

वसंत २९—मोहि ऐसे बनिज सो नहिं काज । जामें घटत मूल नित बढत व्याज ॥ टेक ॥ नायक एक बनिजरे पांच । बैल पचीस वाके संग साथ ॥ नौ वहिया दस गौनि आहि । कस निवेहे तरि लागी ताहि ॥ सात सूत लै बनिज कीन । कर्म टहलुवा संग लान ॥ चारि जगातो माड़ी रारि । ताते नायक चाल्यो हारि ॥ खरच

शब्दावली

(६६३)

खुटान बनिज टूट । चहुँ दिशि टांडो गयो फूट ॥ कहै कवीर विष यह बनि बादि । पड़ि गोनिको देय लादि ॥

वसंत ३०—ऐसो नगर निरंजन बसो न जाय । जहाँ धरम राये मांगै धराय ॥ टेक ॥ काया पुर पटन दसूँ हुवार । ऊँची कुलफ दिठ लगे के वाँहू ॥ पांच जना नहि माने कोय । सुसै चोर घर बेग सोये ॥ तत वदरे आये प्रचंड । घर मोदीको कियो है वंघ ॥ भाजि चले पाँचूँ घरधान । ले मोदी गुदरी दीवान ॥ सहली घाट अरु झीनी बाट । द्ररग जगाती रोके घाट ॥ डांड लगेका पूछे मोहि । पूछे जावों कहा देव तोहि ॥ सब अनाथ मैं कहूँ काय । कहौ कौन विगुचे इहां आये ॥ मैं तो बहूँ चरन धीर । सुखसागर होय मिले कबीर ॥

वसंत ३१—ऐसो संगवास मोहि वस्यो न जाय । जहाँ आप स्वारथी पांचू भाय ॥ टेक ॥ अटपट कुनबा बारह बाट । फिरि फिरि जल पीवै दसो घाट ॥ नैन नासिका जीभ्या कान । इद्री स्वाद चाहे आन आन ॥ काम क्रोध को कठिन जार । भवसागर सुझे वार न पार ॥ चहुँ दिसि पसरचो माया फांसि । जहाँ मन बंधे करम बास ॥ दुख सुख व्यापे दोनो भांति । काया नगरमें परिहै भांति ॥ कहैं कवीर कहा कथिये ज्ञान । दो तलवारको एकहि म्यान ॥

वसंत ३२—मेरो हार हिरानौ मैं लजांव । सांस दुराचर्नी पीव डरांव ॥ टेक ॥ हार गयो मेरो राम धाग । बिच बिच मानिक लाल लाग ॥ तरन पियाला परम जोति । अंतर अंतर लगे है मोति ॥ पांच सखी मिलिहैं सुजान । चलि जइये तीर वेनी नहान ॥ नहाय धोय सिर तिलक दीन्ह । ना जानो हार मेरी कौन लीन्ह ॥

(६६४)

कवीरपंथी—

हार हरचो जिन विमल कीन्ह । ले पारोस निहार दीन्ह ॥ तीन लोककी जाने पीर । सब देव सिरोमनि कहै कवीर ॥

वसंत ३३--जिन पतित उधारै सो संभारि । आदि अन्त राखे सुरारि ॥ टेक ॥ यक गनिका होती नगर माहिं । जाको राम कहनकी सुधि नाहिं ॥ खरचे दाम सुवा लियौ मोल । तुम पढौ परबते राम बोल ॥ एक अजा मिल पंडित असाच । सो तो गनिकाके संग रहगे रांच ॥ राम नारायण पुत्र साखि । सो तो जमद्वन्तनसे लियो राखि ॥ एक बधिक हते कोटिन जीव । जिन सपनेहु नहिं भज्यो पीव ॥ हरिके चरण लखि मारचो बान । सो बधिक चढ़ि गयो विमान ॥ पतित उधारण विरदा तोर । सरन आय लज्जा राख मोर ॥ कहै कवीर देवा न देव । सुर नर मुनि जाके लह्यो न भेव ॥

वसंत ३४--नाहि छाडो बाबा राम नाम । मोहि और पठनसों कौन काम ॥ टेक ॥ प्रह्लाद पधारे पठन शाल । संग सखा लिये बहुत बाल ॥ कहा पढावे पांडे आल जाल । मेरी पाटीमें लिखिदे श्रीगोपाल ॥ कहे पंडित तुम सुनौ राय । तेरो पुत्र चलत है अपने दाय ॥ मैं मारूं डारै बुझान । ये तो नेक न मानै मेरी कान ॥ संडेमरके कह्यो जाय । प्रह्लाद बंधायो बेगि आय ॥ राम कहनकी छाड बान । अबही छुड़ाऊँ मेरो कहा मान ॥ कहा डरावे पांडे बार बार । जिन जल थल गिरिको कियो प्रहार ॥ मार डार भावे देह जारि । राजाराम तजूं मेरे गुरुहिं गारि ॥ काहि खडग कोप्यो रिसाय । तोरे राखन हारो मोहि बताय ॥ कहैं प्रह्लाद कछु शंका नाहिं । मोमें तोमें सकल माहिं ॥ खडग खम्भमें रहो पूरि । मेरो राखन हारो नाहिं दूरि ॥ खम्भ फारि प्रगटे सुरारि । हिरनाकुस मान्यो नख विडारि ॥ आदि पुरुष देवानदेव । धारच्या

शब्दावली

(६६५)

भक्त हेत नरसिंह भेव ॥ कहै कवीर हरि भगती प्यार । प्रहलाद उबान्यो अनेक वार ॥

वसंत ३५--बाजि बाजि रे मधुर वा मधुरि तान । तेरो तान मेरो बसो ग्रान ॥ टेक ॥ प्रथम सहनाई बाजे नाद । मिटि गये मनके विषै वाद ॥ ह्रम ह्रम खुली सुखकी खान । जन्म सुफल कियो अपनो जानि ॥ दूजे घंटा बाजे घोर । तिमीर नासि भयो दिवस भोर ॥ सुकृत वैन भयो थकित गात । बिसरे मनको पाँच सात ॥ तीजे संख ध्वनी पडचो कान । गति पलटी मति भई आन ॥ जन्म जन्मके पाप फंद । नास भये सब दुख द्रन्द्व ॥ चौथे नाद जो बाजे झांजि । कसमल मनके डारे मांजि ॥ अहंकारको काटचो सीस । चित्त चंचल गति घटत दीस ॥ पाँचवें तंती सुर सोहाय । राग अखंडित गीत गाय ॥ लगे सुहावन होय आनंद । जम जालिमके कटै फन्द ॥ छठवें बाजे मंजीरा ताल । जरा मरनका मिटै साल ॥ पाँच सखिनके भयो चैन । सरवन सुनत सुख पीवके बैन ॥ सतवें बाजे सरस बीन । तन हारचो मन भयो लीन ॥ निगम निरंतर धरचो ध्यान । सुधि विसरी बुधि भई विज्ञान ॥ आठवें तूर मोहि बहुत प्यार । तू मति मोते होय न्यार ॥ साधु संत तेरा ध्यान लेहिं । तेरे सुनत पीव दरश देहिं ॥ नवमें बाजे करनाली भेरि । अगम अगोचर निरखि हेरि ॥ जागत जागत रैन जाय । हेरत हेरत दिन विहाय ॥ बड भागी सुनै दसूं नाद । जिहि सुनि भागै सकल वाद ॥ मेघ नादमें रहै समाय । सुरति निरन्तर अग्र जाय ॥ यकादस बाजे नौबत घोर । गगन बंब बहु उठै सोर ॥ शब्द सुरति तहां करि विचार । पैठि गये गहि मकर तार ॥ द्वादस मध्ये भयो प्रगास । मन मनसाको भयो नास ॥ बाजे अनंत नहि अंत ओर । सेत पुहुप अरु सेत भौर ॥ देख्यो

(६६६)

कवीरपंथी-

दीप अमान ठौर । थकत भयो मन मिटि दौर ॥ जहो सुघर सुरन बाजे रबाब । जोग जीत तहाँ खेले फाग ॥ अघर दीप अरु अघर वास । सत पुरुष सोहै प्रगास ॥ तहाँ हंस पहुँचे जो कोय । जरा मरनसो रहित होय ॥ अघृत फल तहाँ सदा भोग । मिटि गये क्षुधा तृषा सोग ॥ कहैं कवीर गुरु दीयो लखाय । अच्छ फल रह्यो छाय ॥

वसंत ३६-वसंत आरति करि सुजान । भौ सागर नहि होय हानि ॥ टेक ॥ गुरु मुख साजो अमी पान । चौदह पवन आरति प्रमान ॥ अनहद बाजे घंटा ताल । भवसागर छूटे जंजाल ॥ आरति करि खेलो वसंत । जम जालिमको छूटे दंत ॥ अघर जोति दीपक निशान । गगन बंब गरजे सुजान ॥ घट माहिं उपजो ज्ञान ध्यान । पूरन ब्रह्म सब माहिं जान ॥ कहैं कवीर गुरु मिले खेलि । दुर्गदानीको दीन्ह पेलि ॥

वसंत ३७-तकि मारचो सतगुरु सुजान । मेरे हिरदे लागो शब्द बान ॥ दसहुँ दिसा मन करत दौर । चित न चले मन रहौ ठौर ॥ चल न सके मन पांव एक । मेरे कठिन करेजे भयो छेक ॥ ऊपर घाव न दीसे कोय । नख सिख व्यापे साले मोय ॥ को जाने मेरे तनकी पीर । सो जाने जेहि लागो तीर ॥ पलव्यो तन मन पलव्यो अंग । पांच पचीसक लीन्हे संग ॥ उलट समाने आपु माहि । कहैं कवीर बलि जाऊँ ताहि ॥

वसंत ३८-चल भौरा खेलहि बसंत । पुढुष बास महके अनंत ॥ बन मोरे भये हरियर झार । पियरे पियरे पात सार ॥ बेल नबेली आस पास । जुग मरनको भयो नास ॥ निस चंदा परकास कीन्ह । बासर मूरज गवन लीन्ह ॥ अब न मिली गत भये विनास । विकस कँवल देखो प्रकास ॥ संपुट खोल भौरा उद्धान । गई

शब्दावली

(६६७)

रजनी जब भये विहान ॥ रुन झुन भौरा लाये सोर । पुहुप वास महँ करे घोर ॥ निसि वासर नहि चंदा सूर । पुरुष रूप अविगत है पूर ॥ सर्व सार रस भिन्न अंग । जम कंटकके छूटे संग ॥ सुख सागर निरभयको धाम । पुहुप अखंडित सत्त नाम ॥ कहें कवीर ऐसे खेले साथ । पुरुष दरस पावे अगाध ॥

वसंत ३९--चल चलरे भौरा कँवल पास । तेरी भौरी डोले अति उदास ॥ दिना चारको सुरंग फूल । ताहि देख भौरा रहो भूल ॥ सब फूलनको लियो भोग । सुख न भयो तन बाढे रोग ॥ जित देखो तित बन पलास । मोहि कतहुँ न दीसे जीवको वास ॥ बनसपती जब लागी आग । अब भौरा कहाँ जैहो भाग ॥ पोहप पुराने गयो सूख । भौराको लागी अधिक भूख ॥ उड़ न सके बल गयो टूट । भौरी रोवे सीस कूट ॥ जब मैं बरज्यों बार बार । तोहे बन दूँब्यों डार डार ॥ कहें कवीर यह मनको भाव । सत्त शब्द बिन जमको दाव ॥

वसंत ४०--कहाँ जइये ग्रह लागो रंग । चित न चले मन भयो अपंग ॥ जहाँ जाय तहाँ जल पखान । पूरि रहो प्रभु सबहिं समान ॥ बेद स्मृति सब देखो जोय । उहाँ जाय सो इहाँ न होय ॥ एक दिन मनमें भये उमंग । घसि चोवा चन्दन चरजे अंग ॥ पूजन चली सब ठाहिं ठाहिं । ब्रह्म बतावे गुरु आप माँहि ॥ अंजन मंजन तजु विकार । अरसठ तीरथ एक द्वार ॥ काहेको नर अन्ते जाय । घटहीमें तीरथ काहे न न्हाय ॥ सतगुरु मैं बलिहारी तोर । सकल कर्म भर्म मेटो मोर ॥ कहें कवीर सुन रामानंद । गुरुको शब्द काटे कोट फंद ॥

वसंत ४१--नगर निरंजन बसो जाय । धरमराय मांगे बेध राय ॥ काया पुर पाटन दस दुवार । कूँजी कुलफ दिठ लागे किवार ॥

( ६६८ )

कवीरपंथी—

पांच जना नहि माने काहु । मूसे चोर घर बांधो साहु ॥ तलबदार आये परचंड । परमोधी पर कीन्है डंड ॥ भाग चले पांचों परधान । ले मोदी गुजरे दीवान ॥ आगे अगम है विषम घाट । दुर्गदानी जगाती रोके घाट ॥ दान देहु का पूछो मोहि । रीते जाव की देऊँ तोहि ॥ सबे अनाथ मैं कहों काहि । को कोन बिगूचे इहाँ आहि ॥ सब सुख चाहो धरो धीर । सुखसागर जब मिलो कवीर ॥

वसंत ४२—कोई सन्त विवेकी मनही जान । उरझ रहो सकलो जहान ॥ मन पंछी उडि गयो अकाश । जल थल माँही सकल बास ॥ मन उरझाय रहो है छाया । कोई न चीन्ह मन सबहीं खाया ॥ मनहि पाप औ मनही पुत्र । मन सिरजा देखो तीन गुत्र ॥ मनहि धाम जो रचा बनाय । मन जन्मो नौ बार आय ॥ मनके व्रत सुर सकल देव । मनहीकी सब करत सेव ॥ मनहि मध्य औ आदि अन्त । मन सिरजो लीला अनंत ॥ ब्रह्म फूट मन भयो अंस । तीन लोक मन कियो विध्वंस ॥ कहैं कवीर जो मनही जान । सत्य शब्द गहि पद निरवान ॥

वसंत ४३—मोहि ऐसे बनिज सो नाही काज । घटत मूर दिन बढ़त ब्याज ॥ नायक एक बनजारे पांच । बैल पचीसक संग साथ ॥ नौ वहियाँ दस गोन लाद । कसन बहतर लागे तास ॥ पाप पुन दोय बनिज कीन्ह । कर्म पयादे संग लीन्ह ॥ तीन जगातीसे मांडी रार । तासों नायक गयो है हार ॥ पूंजी खुटायल बनिज टूट । चहुँ दिस टांडा गयो फूट ॥ कहैं कवीर ऐसो बनिज बाद । परि है गौन को देई लाद ॥

वसंत ४४—सतगुरु खेले नित बसंत । मुक्त पदारथ मिले हो कंत ॥ धरती रथ चढ़ देखो देस । घर घर देखो नृप नरेस ॥ जोजन चार पेंतुरे फेर । बांध मवासी घरमें घेर ॥ अघर निअच्छर

शब्दावली

(६६९)

गहो ढाल । भाग चले रन छोड़ काल॥ सूर सुध घट गहो कमान । चंद चिता गहि मारो वान॥ साथ संगत मिल करहु जोर । तब गढ छोडे चतुर चोर ॥ ऐसी विध जो लडे सूर । तब काल मवासी होय दूर॥ अधर निअच्छर गहो डोर । जो निज मानो बचन मोर॥ धरती तुरे होय असवार । कहें कवीर भी उतरो पार॥

वसंत ४५-देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत मूल ॥ प्रगट निरंजन घटही मान । ताहि छोड पूजत पषान ॥ जल पीवै पाषान धोय । आदि अंत पाखान होय॥ गगन सीस पाताल पांय । सो कस ठाकुर संपुट समाय ॥ अलख निरंजन आवे न जाय । सो कस दिये तुम्हारो खाय ॥ बार बार हम कहा पुकार । शब्द न माने करत रार ॥ कहें कवीर नर कियो ना खोज । भटक मुये जैसे बनके रोज ॥

वसंत ४६-नहिं नहिं रे संतो हरि तुम्हार । एक मूल बिना जेहो जन्म हार ॥ हरि चंद समान कहु कौन दानि । पुत्र सहित जिन बैचि रानि॥ करनी कीन्ही मनहि जानि । आप नीच घर भरचो पानि॥ राजा बलि भल करनी कीन्ह । बावन रूप हरि छल जो लीन्ह॥ ता कहंदीन्ह पताल बास । देखो देखो रे संतो हरि विश्वास॥ राय युधिष्ठिर भक्त जोर । ताहुके पांव नरकमें बोर॥ कहें कवीर सुन हरिके दास । ऐसे मूरख चाहे बैकुण्ठ बास ॥

वसंत ४७-होत ब्याह सतगुरुके द्वार । जहां बरषत शब्द अखंड धार॥ बाहर द्वादश खंभ गाड़ । प्रेम प्रीतको मंडप मांड॥ ज्ञान तत्त्व लेकर चढाव । श्वेत मुकुट माथे बंधाव॥ जगमग जोत जहां अति अपार । सुघर पुढुप जहां अति सुवास॥ कहें कवीर रहु सुमत धीर । ऐसे ब्याह रचे सतगुर कवीर ॥

(६७०)

कवीरपंथी—

वसंत ४८—जप जप रे जियरा सुकृत सोर । काहे न गहो निज शब्द डोर ॥ जहां सुकृत तहां अग्र बास । रवि शशि धरनिन बहे बतास ॥ गगन नगर जिन बरसे नीर । सुरत निरत ले रोपो धीर ॥ षट् दर्शन मिल कथहीं बेद । सिध साधक सब अपने भेद ॥ सुर नर मुनी कोइ गम्म न कीन्ह । औंट मुवे बिन जलके मीन ॥ इकइस खण्ड पृथ्वीको भाव । गन गन्धर्व बीते याही ठांव ॥ कहैं कवीर रहु अति अधीन । सत शब्द गुरु कहि जो दीन्ह ॥

वसंत ४९—ब्रह्ममंड धाम रस एक जान । जामैं सप्त सिंधु औ चार खान ॥ चर अचर जीव जुग बेद देव । सुर असुर नाग सब करत सेव ॥ बाग वृच्छ सलिता अन्नप । फल फूल पात शोभा सरूप ॥ बहे सूर सूरनर सकट साल । रवि चंद बंद है अमल ताल ॥ रिध सिध सरबत्र ऐन । गुरु ज्ञान ध्यान धन मर्म चैन ॥ सरग नरक घर धरन धाम । पाप पुन नहीं चलन काम ॥ पांचों गुरु मंत्री प्रवीन । भोग नार पचीस कीन ॥ इनके अनंद सुख भौ सुभाय । पूर रहो मोहि प्रगट काय ॥ पांच तत्त्व गुन तीन साज । मन राजा जहां करत राज ॥ ब्रह्म अखंड है सबते न्यार । वेद पुरान न पावे पार ॥ निहतत्त्व अच्छर शब्द सार । किंचक लखे सो उतरे पार ॥ नहिं आवे नहिं धरत देह । कहैं कवीर वह है विदेह ॥

वसंत ५०—मोह मिरग मारो न जाय । यह तन बारीमें बसो आय ॥ बारीमें उपजे मुक्त बेल । देखत चुन गये केल केल ॥ बचत नहीं फल फूल पात । सींचन हारो पटकै हात ॥ सुरत निरतके साजो बान । ज्ञान ध्यान साजो कमान ॥ जो कोइ मारे ताक ताक । होत विदेह बिलाय जात ॥ सुर नर मुनि कोई सके न मार । गन गंधर्व सब रहे हार ॥ कहैं कवीर हम दीयो टार । सत्य शब्दके रोपी बार ॥

शब्दावली

(६७१)

वसंत ५१—सबही मद माते कोइ न जाग । संगहिं चोर घर सूसन लाग ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पढी पुरान ॥ तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते करि हमेव ॥ मुलना माते पढी मुसाफ । काजी माते दे निसाफ ॥ संसारी माते माया घार । राजा माते कर हंकार ॥ माते सुखदेव ऊधो अकूर । हनुमत माते ले लंगूर ॥ सिव माते हरि चरन सेव । कलि माते नामा जय देव ॥ सत सत कहै सुप्रित वेद । ऐसे रावन मारे घरके भेद ॥ चंचल मनको अधम काम । कहैं कवीर भजो राम नाम ॥

वसंत ५२—जहाँ बारा मास बसंत होय । परमारथ बूझे बिरला कोय ॥ बरषे अगिन अखंड धार । जहाँ विजुली चमके अति अपार ॥ ससि भान बिना जहाँ प्रकास । हरियर भौवन अठारा भास ॥ बिन पानी आद्र कहै लोय । पवन गये सब मिलन घोय ॥ बिन तरवर फूले अकाश । शिव बिरंचि तहाँ लेय बास ॥ सनकादिक भूले भँवर होय । लख चौरासी जिव गये बिगोय ॥ जो तोहि सतगुरु सत लखाव । कहीं न छूटे करनी भाव ॥ अमर लोक फल देखो आय । कहैं कवीर जाने सो पाय ॥ १६ ॥

वसंत ५३—सतनाम तत्त्व तीन लोक सार । लवलीन भये सो उतरे पार ॥ एक जोगी जुगवे जटाधार । एक अंग भभूत धारे अपार ॥ एक मौनी सुखमौन लीन्ह । भ्रमत फिरे जुग जुगन छीन ॥ एक आराधे सकती सीव । एक पर दादे दे रटत जीव ॥ एक कुलदेवीको जपत जाप । ऐसे त्रिभुवन पति भूले आप ॥ एक अन्न छांडके पीवे दूध । हरि न मिले बिन हृदै सूध ॥ कहैं कवीर चित चेतो अंध । नातो परिहो जमके फंद ॥

वसंत ५४—सतगुरु कँवल है सुख निधान । जहाँ मोरे लागा अछै ध्यान ॥ सोहंग तार अखण्ड डोर । बानी मुक्तापरगट

(६७२)

कवीरपंथी—

सोर ॥ पानी पावै आद अनाद । ग्रह सिंगी सब गयो है बाद ॥ जलुवा मलुवा दुनियां चोर । ये सब परे हैं कालके डोर ॥ दावन कुता दूत लबार । ध्यान छाडि बकते अपार ॥ अदल नाम चूरा मन ध्यान । ध्यान छाप बिन इच्छान ॥ साहब कवीर कहें बसंत । ध्यान छाप बिन खेह पडंत ॥

बसंत ५५—सत सुकृत खेले रितु बसंत । करो अनंद दुख मेटो संत ॥ जीवन सांच भल तबहीं होय । गुरुगम भेद लख पावे कोय ॥ लख चौरासीको कटे फंद । अमर करो मन छाडो दंद ॥ सोई सोहागिन पियहिं चीन्ह । द्विष्ट मांहि रहे अति अधीन ॥ दरशन शोभा रहे समाय । नहिं बिछुरे लिये संग जाय ॥ परष जान जब नाम लीन्ह । रतन पदारथ लेव भीन ॥ कहें कवीर यह खरच थार । अजर अमर घर रहो निनार ॥

बसंत ५६—सतगुरु खेले ऋतु बसंत । परम पुरुष जहां साथ संत ॥ तीन लोकते भिन्न साज । सुनिये अनहद बाजे बाज ॥ कोट सूर्य जहां उगे अपार । बिरला जन कोई पावे पार ॥ कोट सरस्वति करहिं राग । कोट इंद्र सुन गावन लाग ॥ कोट कृष्ण कर जोरे हाथ । कोट विष्णु जहां नावे माथ ॥ कोट ब्रह्मा जहां पढे पुरान । कोट शंभु जहां धरे ध्यान ॥ अखंड जोत जहां बरे अथाह । बिरला साधू पावे थाह ॥ नाना बिध जहां करहिं केल । ते वह लोके रहे मेल ॥ प्रथम बसंत एक राग कीन्ह । सतगुरु शब्द उधार लीन्ह ॥ गन गंधर्व मुनि गने न जाय । तहां प्रभु आप बिराजे आय ॥ कहें कवीर ऐसो मत हमार । पतित उधारन नाम सार ॥

बसंत ५७—चल हंसा सुख सागर घाट । तेरी हंसनी बैठी चितवे बाट ॥ सार शब्दमें जाय देख । अति सुंदर तहां अति विशेष ॥

शब्दावली

(६७३)

तहवां अमृत मोती होय । हंसा भोजन करे सोय ॥ अमृत नीर जो पिये अघाय । जन्म जन्मकी तिरषा जाय ॥ आवागमनसे होय निश्चित । शब्द मांहि खेले बसंत ॥ जहाँ अनहद बाजा अति सुहाय । सदा बसंत जहँ अच्छे छाय ॥ षोडश सूरजके प्रमान । हंस एक उजियार जान ॥ श्वेत दीप जगमग प्रकास । पुहुप बसंतकी महके बास ॥ स्वेत सिगासन छत्र स्वेत । स्वेत वृक्ष तर हंस स्वेत ॥ केहि बिध हंस वा घर जाय । सार शब्दमें जाय समाय ॥ शब्द चाल चले शब्द मांह । ले पहुँचे धर्मदास बांह ॥ शब्द बिना नहिं पावे वाट । शब्द चूक परे औघट वाट ॥ चूके शब्द जम पकर लेह । फिर नर हमको दोष देह ॥ अपनी चूक जो समुझे नाहिं । ते नर अंथ बिगोय जाहिं ॥ चेतहु तो नर खोज लेहु । ना तो फिर फिर धरहु देहु ॥ सत शब्दकी कर प्रतीत । भौजलते चलो निहचे जीत ॥ जो कोह चाल नर चूक जाय । पंच अमीमें ध्यान लगाय ॥ सांची सुरत जो संग लेय । सागरमो पहुँचाय देय ॥ ऐसी रहन जो हंस होय । सुखसागर देखै सोय ॥ अमृत भोजन करे अहार । काया धर मैं कहाँ बिचार ॥ देखे दीपन दीपन हंस । तब नरको सब जाय संस ॥ सागर सुंदर अति गंभीर । सतसुकृत सो निर्मल शरीर ॥ हंस हंस झरे पुहुप अनंत । कहँ कवीर तहाँ करो बसंत ॥

वसंत ५८-सुखसागर जियरा कर अस्नान । जहाँ सुर नर सुनि नहिं पावैं ध्यान । बिन जल जहँवा उठे हिलोर । बिन पर-बत जहाँ कुहके मोर ॥ बिन सिंगी जहाँ सुनिये नाद । सत संगत पावे बड़े भाग ॥ बिनकर बाजा सुनिये ताल । परम परवावज अति रसाल ॥ बिन वग नटुवा नाचे नाच । बूझो संतो शब्द साच ॥

कबीरपंथी शब्दावली २२

(६७४)

कबीररंथी--

बिन नैनन देखो अति निनार । संतो ऐसो मत हमार ॥ जोत बरे बिन बाती तेल । काह कहों कछु अगम खेल ॥ सुन रामा- नंद गुरु प्रसाद । निरंतर भावे सुख स्वाद ॥ आशा मेटके गहो ओट । साहेब कबीर दिल नाही खोट ॥

वसंत ५९—ऐसो दुरलभ जात है सरीर । भजु अर्चित जेहलागो तीर ॥ गये बेनु बलि गये कंस । दुरजोधनके बुझो बंस ॥ पिरथु गये पृथवीके राव । त्रिविक्रम गये रहे न कांव ॥ छौ चकवे मंडलीके झार । अजहूं हो नल देखु विचार ॥ हनुमत कस्यप जनक बालि । ये सब छेकल जमके द्वारि ॥ गोपीचंद भल कीन्ह जोग । रावन मारेउ करत भोग ॥ जात देख नर सबहि जान । कहैं कबीर भजु सतनाम ॥

वसंत ६०—को कौन बिगूचे स्वामी मोर । ऐसे गर्भ प्रहारी नाम तीर ॥ हरिचंद समान नहि दानी आनि । पुत्र सहित जिन बेचे रानि ॥ उन अपने मन लियो जान । अधम डोम घर भरो पान ॥ बलि बेनु विधना अजे चंद । लंक दहन रावको अंत ॥ सहज भुजा बन रहे ताहि । गये कौरव दल दुंद माहि ॥ कौरव पांडव करन द्रोन । सतुवा में के भये लोन ॥ जरासिंध ससि- पाल मार । कंस नृपतिको दाप झार ॥ अबके दुबहिंयां करत रार । केते नृपति गये हाथ झार ॥ कहैं कबीर भुमियां करोर । को को न गये कर मोर मोर ॥ हमरे कहलको ना पतियार । आप बूढ़े नर सलिल धार ॥ अंध कहे अंधा पतियाय । जस बेस्वाके लगन धराय ॥ सातो कहिये ऐसे अबूझ । खसम ठाठ दिग नाही सूझ ॥ आपन आपन चाहै मान । झूठा पूजहिं सांच जान ॥ झूठा कबहुँ न करिहैं काज ही बरजों तू सुनु निलाज ॥ छांडो पाखंड मानु बात । ना तो परिहो जमके

शब्दावली

(६७५)

घात ॥ कहें कवीर नल कियो न खोज । भटक मुवै जस बनके रोज ।

बसंत ६१-खेलत बसंत मानो विरह संग । भौसागर वह नाना-तरंग ॥ कोइ जोग कर कोइ जह्व दान । कोइ नेम धरम पूजा पखान ॥ कोइ दंड कमंडल धुअपान । कोई उर्थ तपस्या गोड़-तान ॥ कोइ दानी होय फिरे उदास । कोइ अगिन जरावे चहुँ-पास ॥ कोई उर्थ कपाली कर आराध । कोइ निसबासर रहे निद्रासाध ॥ कोइ रिद्धि सिद्धिके मंतर जान । कोइ जोगी सुद्रा पहिर कान ॥ कोइ भेष धरी धर करहि स्वांग । कोइ सोधे धतुरा पोस्त भांग ॥ कोइ पीर औलिया करे निमाज । कोइ षटदर्शन में करत बाद ॥ कोइ छत्रधरी धर धजा निसान । कोई सनमुख सूरा खेतजान ॥ कोई उदे अस्त लो दहिन देत । कोई चार मास जल सेन लेत ॥ कोई अलह कहे कोइ कहत राम । हिंदू तुरक मिल धरहीं नाम ॥ कोई कहे ब्रह्म समाना एक । कहें कवीर लीला अनेक ॥

बसंत ६२-मन माया खेलत बसंत । सुर नर मुनि जाको लहे न अंत ॥ काम क्रोध मन मिलहि अंग । लोभ मोह साजेसुगंध ॥ पिचकारी तृष्णा तरंग ॥ मनसा सीचे सकल रंग ॥ जोगी भीजे जोगध्यान । पंडित भीजे पढ पुरान ॥ सुरआदिक भीजे असुर झार । ब्रह्मादिक भीजे मनहिं हार ॥ मगन माया कोई बरे भाग । निस बासर गुरु सरन लाग ॥ अब नाही भाजनके छोर । कहें कवीर भीजे सोर बोर ॥

बसंत ६३-रसना पढि लेहु श्री बसन्त । पुनि जाइ परिहौ जमके अंत ॥ जो मेरु दंडपर डंक दीन्ह । सो अष्ट कमल परजारि लीन्ह ॥ तहं ब्रह्म अग्नि कीन्हो प्रकास । जहं अरध

( ६७६ )

कवीरपंथी—

उरध बहे बतास ॥ तहं नौ नारी परिमल गांव । मिलि सखि पांच तहं देखन धाव ॥ जहं अनहद बाजा रहल पूर । तहं पुरुष बहतार खेलै धूर ॥ ते माया देखि रहलि भूलि । जस वनरूपति बन रहल फूल ॥ कह कवीर यह हरिके दास । फगुआ मांगै बैकुंठ बास ॥

वसंत ६४—आयउ मेहतर मिलन तोहि । रिनु वसंत पहिरा-वहु मोहि । लम्बी पुरिया पाई झीन । सूत पुराना खूंदी तोनि ॥ सर लागे तीन सौ साठ । कसनी बहतार लागे गांठ ॥ खुर खुर खुर चालै नारि । बैठी जोलाहा पलथी मारि ॥ ऊपर नचनी नचि करै कोड़ । करिगह मां दुइ चलही गोड़ ॥ पांच पचीसौ दशौ द्वार । सखी पांच तहं रची धमार ॥ रंग बिरंगी पहिरै चीर । हरिके चरन धरि गाव कवीर ॥

वसंत ६५—बुठिया हँसि कह मैं नितहीं बारि । मोहि अस तरूनी कहु कौन नारि ॥ दांत गयल मोर पान खात । केस गयल मोर गँग नहात ॥ नयन गेल मोर काजल देत । बैस गेल पर पुरुष लेत ॥ जान पुरुषवा मोर अहार । अनजाने का कहं सिंगार ॥ कह कवीर बुठिया आनन्द गाय । पूत भरतारहि बैठि खाय ॥ ६५ ॥

वसंत ६६—बूझहु पण्डित कौनि नारि । कोहु न ब्याहल रहलि कुमारि ॥ सब देवन मिलि हरिहीं दीन । तेहि चारियु जुग हरि संग लीन ॥ प्रथमहिं पञ्चिनि रूप आय । है सांपिन जग खेद खाय ॥ ईश्वर युवति वै बार नाह । अति तेज तिया है रेंनि ताह ॥ कह कवीर सब जग पियारि । अपने बल कबै रहलि मारि ॥

वसंत ६७—माइ मोर मनसा अति सुजान । धन्धा कुटि कुटि करत विहान ॥ बडे भोर उठि आंगन बाहु । बडी खांच लै गोबर काहु ॥ बासी भात मनुष लै खाय । बड़ चैला लै पानी जाय ॥

सम्वादवली

(६७७)

अपने सैयां बांधी पाट । लै रे बेचौं ह्राटे हाट ॥ कह कवीर ये हरिके काज । जोइयाके दिगरे कौन है लाज ॥

वसंत ६८-घरहौमें बागुल बाठी रागि । अंग उठि उठि लागे चपल नारि ॥ वह बडी जाके पांच हाथ । तेहि पहुँचनके पञ्चीस साथ ॥ पञ्चीस बतावैं और और । वे और बतावे कई ठौर ॥ सो अन्तर मध्ये अन्त लेह । झूक झोरी झेला जिव देह ॥ सब आपन आपन चाहें भोग । कहु कैसे पारि है कुशल जोग ॥ विवेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमासा देखै सोइ ॥ मुख फारि हसैं सब राव रंक । तेहि धरन न पावै एक अंक ॥ नियरै बतावे खोजै दूरि । चहुँदिसि बागुलि रहल पूरि ॥ है लच्छ अहेरी एक जीव । ताते पुकारै पीव पीव ॥ अबकी बारि जो होइ चुकाव । कह कवीर ताकी पूरी दाव ॥

वसंत ६९-कर पल्लवके बल खेले नारि । पंडित होय सो लेह विचारि ॥ कपडा न पहिरे रहै उधारि । निरजीव सो धन अति पियारि ॥ उलटी पलटी बाजे तार । काहुहि मारै काहु उबार ॥ कह कवीर दासनके दास । काहुहि मुख दे काहु निरास ॥

वसंत ७०-सिव काशी कैसी भई तुम्हार । अजहुँ हा सिव देखु विचार ॥ चोवा चन्दन अगर पान । घर घर स्मृति होय पुरान ॥ बहु विधि भवनन लागैं भोग । अस नगर कोलाहल करते लोग ॥ बहु विधि परजा निरभय तोर । तेहि कारन चित्त है ठीठ मोर ॥ हमरे बालकको यहै ज्ञान । तोहरा को समुझावे आन ॥ जग जो जेहि सों मन रहल लाय । सो जिवके मरे कहु कहाँ समाय ॥ तहं जो कछु जाकर होइ अकाज । है ताहि दोष नहिं साहेब लाज ॥ हर हौषैत हो तब कहल भेव । जहं हमही हैं तहं दूसर केव ॥ दिना चार मन धरहू धीर । जस देखो तस कहहु कवीर ॥

(६७८)

कबीरपंथी—

होरी प्रारम्भ ।

होरी १—जिनको सत्संगति प्यारी । अहो खेलेत वसंत सुख-कारी ॥ टेक ॥ कथा अतर सरधा कस्तूरी, जतसत केशरलीनी ॥ भाव भक्तिकी गुलाल बनायी, भरि भरि सतगुरु दीनी ॥ ज्ञान भक्ति वैराग दयानिधि, मेलि अरगजा कीनो ॥ सील स्वातिको बन्यो कुमकुमा, ख्याल बन्यो रंग भीनो ॥ अनभय अचल भयो अभि अंतर, थकत भयो सब गाता ॥ भयो ज्ञान देह सुधि विसरी, सुनी खेलकी बाता ॥ ऐसो सतगुरु ज्ञान बतावे, जो कोइ शरनै आवे ॥ कहै कबीर ऐसो संत विवेकी, क्यों न परम पद पावे ॥

होरी २—काया नगर मंझार, संत खेले होरी । गावत राग सरस सुर सोहे, अति आनन्द भयोरी ॥ टेक ॥ चंदन सील सुगन्ध-अरगजा केसरि करनी गहरी ॥ अगर अगम सुगम करि लिन्हों, अभि डर अंतर धारी ॥ प्रीति फुलेल गुलाल ज्ञान करि, लेऊ जुगति भरि भोरी ॥ चोवा चित चेतन प्रकासा, आवत वास घनेरी ॥ त्रिकुटि महलमें बाजा बाजे, जग मग जोति उजैरी ॥ सहज रंग रंछि रह्यो सकल तन, छूटत नाहिं करोरी ॥ अनहद बाजा बजे मधुर धुनि, विन करताल तंबूरी ॥ बिन रसना जहाँ राग छतीसों, होत महों निधि पूरी ॥ सुन्न महल यक रंग मजलिस, कबहुँ टरत न टारी ॥ कहै कबीर समझि लेहो संतो, निरगुन कह्यो सदारी ॥

होरी ३—तुम होय निःशंक खेलो सम्हारी । मोह महा बल फंद रचो है, पकडत माया रसरी डारि ॥ टेक ॥ पाप पुन्य दोऊ मिलि खेलैं, कुबुद्धि सखा सब लिये लारि ॥ विसरावत सबहीनकी सुधि बुद्धि, काम क्रोधको गुलाल डारि ॥ डिम्भ कपट मुदंग

शब्दावली

(६७९)

डफ वीना, करम भरम बाजे करतार । अधर्म धर्म गावे राग रागिनी, मोह लियो सगरो संसार ॥ आसा मनसा संग सहेली, बडी अपरबल तीनऊँ नारी । वास लिये धावत जित तित ते, सुर नर मुनि डारे पछारि ॥ त्रिविधि तापकी कठिन ठगौरी, अपनी अपनी करत रारि । नाचत मन संग लिये इंद्रीयन, उपजावत अति विषय विकार ॥ आये विवेक ज्ञान संग लिये, सत शब्द गावे धमारि । शील संतोष भरि प्रेम पिचकारी, मदन मस्त को दियो बिगारि ॥ पांच पचीस खेले निरभय होय, हिल मिलिकै ये नौ सारी । रटना लगि सबै ये गावे, प्रेम आनंद होय मंगल चारी ॥ मिलि सतगुरु जहां होरी खेलेँ, आवागवन को दुख निवारि । कहैं कवीर छोड़ि भवसागर, बहुरि न आवे या संसार ॥

होरी ४—मन राजा खेलन चले रंग होरी हो । काया नगर मंझार राम रंग होरी हो ॥ टेक ॥ पांच पचीस मिलि खेलहि रंग होरी हो ॥ मन राजा सरदार राम रंग होरी हो ॥ इंगला पिंगला सुषुमना रंग होरी हो ॥ तिरवेनीके घाट राम रंग होरी हो ॥ ग्यान गली ठाढे भये रंग होरी हो ॥ सुरति निरति दोउ लार राम रंग होरी हो ॥ सील छमा छिडकत फिरे रंग होरी हो ॥ बाढचो रंग अपार राम रंग होरी हो ॥ मेर डंड छाजे चढों रंग होरी हो ॥ डडता प्रेम गुलाल राम रंग होरी हो ॥ अनहद बाजा बाजई बाजहि रंग होरी हो ॥ निरति करें सब नारि राम रंग होरी हो ॥ दास कवीर जहां खेलहि रंग होरी हो ॥ अविनासीके संग राम रंग होरी हो ॥

होरी ५—ऐसे खेलत फाग सबे नारी । जाके हाथ लकुटिया मुख गारी ॥ टेक ॥ यह यहते निकसी वन सुन्दर । भांति भांति पहरे सारी ॥ अबीर गुलाल लिये भरि झोरी । मिलन चली

(६८०)

कवीरपंथी-

पियाकी प्यारी ॥ अपने अपने झुंडन मिलिकै । गावत ब्रिघ तरुन बारी ॥ पहुँची जाय जहां हरि मन्दिर । बर बैठे मूरति धारी ॥ एकनि चंदन केसरि छिडकै । एकनि मुट्टी भरि भरि डारी ॥ एक सन्मुख ठाढी कर जोडै । एकनि हाथ चँवर ढारी ॥ को चितवै को बोलै कासों । निजीव रूप कहुँ कारी ॥ निहुरि निहुरि सब पांव पडत हैं । यह देखो अचरज भारी ॥ सब सहेली बहुरि चली घर । कोई न संग रही प्यारी ॥ आपु नहीं भुले नर नारी । प्रान पियाकी गति न्यारी ॥ यह सब भरम छाडिदे वारी । अब जिन जन्म जुवा हारी ॥ कहैं कवीर अपनपौ चीन्हो । सुखसागरमें सुखकारी ॥

होरी ६-जग होरी मच रही है भारी । तुम संतो खेलौ संसारी ॥ टेक ॥ जड़ चैतन दोऊ रूप बनाये एक कनक दूजी नारी ॥ पांच पचीस संग लियै अबला हँसि हँसि मिलि गावै गारी ॥ डिम्भ कपट लिये करमें डफ हूँबड हूँबडकी तारी ॥ त्रिगुन ताल तबला बाजे आसा तूछना गति न्यारी ॥ पाप पुन्य दोऊ भरि पिचकारी छूटत है बारंबारी ॥ सन्मुख होय करि जो वह खेले, ताके छीट लगी कारी । चोवा चंदन अबीर अरगजा माथकी गार भरी ॥ षट दर्शन पाखण्ड छीयानवे पकडि किये सब वेगारी ॥ कुमति गुलाल डारि मुख मीडै काम कला पुटरी मारी ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया भजि रही सब संसारी ॥ चतुरा फगुवा देदे छुटे मूरखको लागे प्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू निर्गुन ग्यान गली न्यारी ॥

होरी ७-ऐसे खेले संत सदा होरी । जहां दुंद उपाधि नहीं कोरी ॥ टेक ॥ ताल मूल सुर साधि बाट घर । पश्चिम दिशा चढ़ि गहि डोरी ॥ खुले कपाट सहज घर पावों । सुंदर रूप सुरति