कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(६२)
कवीरपंथी—
नर भये भक्तिहीन, सो भये यम के अधीन, अटके भवसिंध तिन, नहीं पार पाई ॥ जो नरगुरुशरण आय, लीन्हो तिनको बचाय, कालजाल सों छुडाय, अमर घर पठाई ॥ निरंजन निरकार, ब्रह्मा विष्णु शिव विचार, आदिशक्ति मायाजार, नहीं पार पाई॥ निगम वेद कर पुकार, तेहू नहीं पाये पार, गुरु कवीर शरन अपार, सुमिरत अघ जाई ॥
अथ नामाजीकृत छ'प्यय ॥
अनन्त कोट निज भक्त हैं, तामें एक करोर बिचारी । ताहू में ते चुनलिये, लाखलख नेजा धारी ॥ तामें समरथ एक सहस सहस में सौ अधिकारी ॥ पचास भक्त प्रसिद्ध, पचीस परम उजागर । द्वादश भक्त प्रधान, षट रस गुन के आगर ॥ चतुर नाम गोविन्द वपु, उभय भक्त तारन तरन । तामें मुख्य कवीर हैं, ता पद रज नाभा शरन ॥१॥ गिरा गंग अनुहार, चाल सनकादिक जैसे । ज्ञान मुनि शुक्रदेव, ध्यान शिव शंकर तैसे॥ जती ज्यों गोख सती, हरिचन्द बखानो । प्रतिज्ञा प्रह्लाद, सांख्यमें कपिले जानो ॥ हेम जेम शीतल सदा, परकाशी दिवाकर मानो । कवीर सदा गंभीर हैं, निज अविनाशी जानो॥ कर कलजुग ऊपर कट करी सो संत फौज नींकाचढ़ी ।
नाम महानिज मंत्र नामहि सेवा पूजा । जपतप तीरथ नाम नाम विनु और न दूजा ॥ नाम प्रीति नाम बैर नाम कहि नामी बोले ॥ नाम अजामिल साख नाम बन्धनते खोले ॥ नाम अधिक रघुनाथ ते, रामनिकट हनुमत कह्यो । कवीर कृपाते
१ यद्यपि आजकलके छपे हुवे जितने नामाजीकृत मन्त्रमाल हैं उनमें “कवीर कानि राखी नहीं वरण क,अम षट दर्शनी” के सिवाय इस प्रकार बाणी नहीं मिलती है तथापि कवीरपंथियोंके यहां इसी रूपमें बहुत दिनोंसे प्रचलित है, और प्रायः कवीरपंथी इसे नित्य पाठमें गाया करते हैं । इस लिये यहां दिया गया है । ‘श्रीयुगलानन्द बिहारी’
शब्दावली
(६३)
परमतत्त्व पदुमनाभ, परिचय लह्यो ॥ ३ ॥ नौ करोर प्रह्लाद अष्टध्रुव लक्षमन हनुमाना । मोरध्वज हरिचन्द, सातले संत- स्याना ॥ रुक्मांगद अम्बरीष पंच, निज पहुँचे दासा । दौय अर्जुन गंगदेव, दौय वृजमंडल वासा ॥ तैतीस कोट तिहु जुगमें हरि सेवत निरभय भयो । कलियुग नाम कवीर हैं, अनन्त कोट जिवले निस्तन्यो ॥ ४ ॥
छप्पय (भक्तमालका)
कबीर कानि राखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥ भक्ति विखुरख जो धर्म सब, अधर्म करि गायो । जोग जग्य व्रतदान, भजन विनु तुच्छ दिखायो ॥ हिंदू तुरुक प्रमान, रमैनी शब्दे साखी । पक्षपात नहीं करी, सबनके हितकी भाखी ॥ आरुठ दशा होय जगतमें, मुख देखी नाहि न भनी । कबीरकानराखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥५॥ राखी नहीं जगतकी, भाखी सत्य कबीर । देदे शब्द निराटका, तोरे भ्रम जंजीर ॥ बानी अरबो खरब है, ग्रन्थां कोटि हजार । करता पुरुष कबीर है, नाभा किया विचार ॥ ६ ॥
इति छप्पय
(सूचना—यहांतक तो नाभाजीके नामसे है जिसमेंसे केवल एक छप्पय “कबीर कानि राखी नहीं” वाला शुद्धभी है और भक्तमालमें पाया भी जाता है । शेष छन्दोभंग आदि अशुद्धि- योंसे ऐसा पूर्ण है कि, इसे इस रूपमें नाभाजीकी कविता कहना महा अन्याय होगा । यह तो यह इन्हीं छप्पयोंके आगे एक दोहा है—
जनक विदेही नानका, ऊधो स्याम शरीर । वालमीक तुलसी भये, शुक्रदेव भये कवीर ॥
नोट—३२ पेजमें, नाभाजीकृत छप्पय में ‘अधिकारी’ के आगे एक चरण ग्रन्थ पात है.
( ६४ )
कवीरपंथी-
विचार-पाठक ! इन छप्पयोंसे देखिये जिनमें कवीर साहब-को किन किनकी ऊपमा दी गयी है । अस्तु उन्हें रहने दीजिये वे तो उपमा मात्र हैं, अंतिम साखी को देखिये-इसमें कवीर साहबको शुक्रदेवका अवतार बतलाया गया है, अब विचारिये कवीर साहबका यह वचन—"अमर लोकसे हम चलि आये, आये जगत मझौराहो" कहाँ-यह बात । तिसपरभी ऐसीही बातोंसे भरी पुस्तकको लोगोंने "सद्गुरु कवीर साहब कृत" छापकर पब्लिकको धोकामें डाला है और कवीर साहबके नाम पर धब्बा लगाया है । इस विषयमें विशेष किसीको जानना हो तो वह, कवीर चन्द्रोदयमें छपे "निष्कलंकमें कलंक" नामक लेखको पढकर खातरी कर सकते हैं ! यहाँ विशेष लिखनेका अवकाश नहीं हैं । और मैंने इसमें इन वाणियोंको कवीरपंथियों-को सचेत करनेके लिये रक्खा है ॥ ]
॥ स्तोत्र अष्टक ॥
( मंगल रूप अनूपम् पूरण )
मंगल रूप अनूपम् पूरण, नाम कवीर सो आप उदारा । मो पर दृष्टिदया करि हेरहु, हौ अति बालक दास तुम्हारा ॥ काम अपार महा बल भारत, देखतही मम चित्त डरावे । कीजे कृपा उर अन्तर्यामिसु, संकटसे बहु जीव दुखावे ॥ १ ॥ लोभ महा मद क्रोध उपावत, होत अधीर बहु चितमेरो । मोह गया ममता रजनीवत, बारम्बार रहे नित घेरो ॥ एक उपाय यही बचवे अब, होहु दयाल दया करि हेरो । कहा कहौं कछु आपछिपेन्हि, हौ प्रभुनाथ अनाथन केरो ॥ २ ॥ मो कहैं तात तुही पितु मातु सु, और उपाय नहीं कछु मोहीं । जो सुत मातु पिता ढिगआवत,
शब्दावली
( ६५ )
तौ वहि मातुलु दृष्टिन जोई । तौपुनि लोटत पोटत अंग में, तब लेत उठाय दया करि ओही । हे गुरु देव कवीर कृपाल त्यों, है इक आश शरनागत तोही ॥ ३ ॥ दासको संकट देखि दया- निधि, हो करुणा करि आतुर धायो । इन्दुमती जब टेरे कियो प्रभु, जाय तहाँ वहि पीर भिटायो । बांधत सेत सहाय कियो प्रभु, रामहु केर उपाय बनायो । कौन सु संकट मोहि गरीबको, जो तुमसे नहिं जात छुडायो ॥ ४ ॥ जाय पुरी पुरुषोत्तम के प्रभु, देकर दण्ड ससुद्र हटायो । विघ्नको अभिमान महाप्रभु, तोडनको बहुरूप दिखायो । अभय दीन पडचो चरणों जब, चारिउ जात सो एक मिलायो । दास जहाँ जहाँ कोऊ टेरत, ताकहँ होहु तुम वेगि सहायो ॥ ५ ॥ मो कह काहि विभारत समर्थ, दीन दयाल कवीर उदारा । आनन्द आप अजीत गुसाईं सु, मोहमया सबते प्रभु पारा ॥ साक्षि सरूप अन्नपम शोभित, पारवरूप अकार तुम्हारा । मैं अति दीन अधीन दुखी बहु, मेटहु मोर अघोर अंधारा ॥ ६ ॥ यह वर मांगहुँ देहु दया करि, अन्तर्यामीसु ज्ञान परकासा । बोध सरूप सदा निरनय गुरु, मममें तुम होहु उजासा ॥ वेद कुरान पुरान जु गावहिं, पार न पावहिं होहिं उदासा । जापर मौज करौ तुम साहब, सो पुनि हंस मिले तुम पासा ॥ ७ ॥ ये गुरु अष्टक पाठ करे नर, आप सुने अरु ध्यान धरेंगे । होय शरधा अति प्रेमउ पावत, मारग चाल सुचाल चलेंगे ॥ ते नर पावहिं सुक्ति पदार्थ, पाखंड रूप विकार तजैंगे । होहिं सुखी लहि आनन्दको पद, सो भवसागर पार तरैंगे ॥ ८ ॥
कविता--
अजर अखण्ड रूप मरम परकाशी देखों, सुरसे उजासी देखों
कवीरपंथी शब्दावली ३
(६६)
कबीरपंथी—
अतिहीं सुहायो है । ब्रह्म जगत भरम मेंटे, झाई सन्धि काल नाशे, संशय सब चूर करि धूरसे उड़ायो है ॥ वेदहु प्रमाण और वाणीहुके मत जेते, औरहु सिद्धान्त सो तो सर्वहुँ दिखायो है । सर्वहुको जाने सो तो सर्वहुसे न्यारे रहे, सोई गुरु “रूप निज” पारख लखायो है ॥ ९ ॥
साखी—
वारों तनमन धन सबै, पद परखावनहार । जुग अनन्त जो पचिमरै, विन गुरु नहि निस्तार ॥ १ ॥ बन्दनीय गुरु परखको, बारबार कर जोरि । दया करन संशय हरन, संतरूप प्रभु तोरि ॥ २ ॥ बन्दीछोर दयाल प्रभु, विघ्न विनाशक नाम । अशरण शरण बन्दों चरण, सब विधि मंगलधाम ॥३॥ साहब दीन दयाल गुरु, तुम पर और न कोय । शरण आय जमसो बचे, आवा गमन न होय ॥४॥ विनय करौं कर जोरिकै, सुनु गुरु कृपानिधान । सन्तनका सुख दीजिये, दया गरीबीदान ॥५॥ दया गरीबी बन्दगी, जो गुण होय शरीर । अंग व्याधि व्यापे नहीं, सतगुरु मिलहिँ कवीर ॥ ६ ॥ कविर मिले धर्मदासको, लिखि परवाना दीन । आदि अन्तकी वार्ता, शब्दहिँ मैं कहि लीन्ह ॥ ७ ॥ शब्दे मारे गिरपडे, शब्दे छाडे राज । जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सरिया काज ॥ ८ ॥ शब्द विना सुरति आंधरी, कहो कहो कहाँको जाय । द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥ ९ ॥
छन्द—
धर्मदास विनय करि, विहंसि गुरु पद कंज गहे । हो प्रभु होहु दयाल, दास चित अतिहिँ दहे ॥ आदिनाम सरूप शोभा, प्रगट भाष सुनाइये । काल दारुण अति भयंकर, कीट भुंग बनाइये ॥ १ ॥ आदि नाम निअच्छर, अखिलपति कारनू ।
शब्दावली
(६७)
सो प्रगटे गुरु रूप, सो हंस उबारन् ॥ सतगुरु चरण सरोज, जे जन मन ध्यावहीं । जरा मरण दुख नाशि, अचल चर पावहीं ॥ २ ॥
दया श्रुको ।
अथ संज्ञापाठ ।
गुरुस्तुति (बुद्धान पुत्री)
दोहा-नमो नमो गुरु देवजु, साधु स्वरूपी देव । आदि अंत गुण कालके, जाननहारे भेव ॥ १ ॥
सोरठा-मेटेउ कालको जाल, ताते गुरु तुव नाम यह । बन्दी- छोर दयाल, अशरण शरण उदार अति ॥ २ ॥
गुरुशतक सार नाम ॥ बोपाई ।
दीनबंधु करुणामयसागर । हंस उधारण तारण आगर ॥ दीना- नाथ शरण सुख दाई । अभय तासु पद गुरुसम राई ॥ बन्दीछोर बिरद अति तासु । हंसरूप परगट जगजासु ॥ अधमउधारण- तारणस्वामी । परवरदिगार मालिक अनुगामी ॥ काल जालके मेटनहारे । बिरद लाज राखन पति प्यारे ॥ धीरज दया तत्व संयुक्ता । राम भूमिका बासक युक्ता ॥ चिंता रहित अर्चित गोसाई । परमरूप परकाशक साई ॥ अखिल ब्रह्मांडके जानन- हारे । कर्ता नाम प्रगट विस्तारे ॥ निष्कामी माया परचंडा । ताको नासक पूरण ब्रह्मांडा ॥ मंगल रूप गोसाई आपू । जगत विदित पूरण परितापू ॥ साहेब निर्भय पद दातारा । कर्ता पुरुष सबनके पारा ॥ महा मोह दलनाशक स्वामी । हंसन नाह अपार अगामी ॥ आनंद सिंधु अहंतातीता । रामरूपमें परम पुनीता ॥ सत्य यथार्थ अतिप्रिय साधू । मन मायाको मेटेउ व्याधू ॥ पूजनीय अनुमान विनासिक । सत्यसुकृत प्रकाश प्रकाशिक ॥
(६८)
कवीरपंथी—
नाम सुनिंद्र सबन सुखदाई । बारम्बार कहों गोहराई ॥ सत्य- सिंधुप्रभुदीनदयाला । नाशक अनुमय सहज कृपाला ॥ आपु जीविनिःकर्मनिधाना । शब्दीअजर अकाल समजाना ॥ साधुरूप पूर्ण परमाना । गरीब निवाज गहहु गुरुज्ञाना ॥ झाई शब्द परखावनहारे । तारण तरण बिगत सम्भारे ॥ मन अनुमान गुमान विनाशक । मोद प्रत्यक्ष दाननिजदासक ॥ वेदकुरान बुझाय यथारथ । मन क्रम वचन साधुमें स्वारथ । इतिसतनाम- गुरुगनिआई । सबवृत्तांतगुरुमुखजो बुझाई ॥ साधुगुरु कवीर गोसाई । बन्दीछोर नाम जपु गाई ॥ ३ ॥
बोहा—
गुरुके अमृत वचन सुनि, शिष्य श्रवण मन देह ॥ झाईसंधि औ काल गुण, तुरित मिटे नहिं लेह ॥ ४ ॥
छन्द—
तुम होहु जाहि दयाल सकलोजाल ताकर नासि हो ॥ तुम बिना न मिटि है काल सुकृतपालपरखप्रकाशि हो ॥ का करो मैं अस्तुतिआजसतगुरु कियो बहुत उपकार हो ॥ तुम बन्दीछोर कवीर साहेब मेटिया भव भार हो ॥ सब करों निछावर तो परम गुरु तन मन धन सबसेह हो ॥ मम सुरति राखो चरणमें यह नाशमान है देह हो ॥ परख पदको पाय साहेब मेटि गयोसब भास हो ॥ ब्रह्मजगत अनेक बानी रही न काहूकी आस हो ॥ ५ ॥
सोरठा—
शरण ! शरण ! गुरुराय, बहुत सुखी मोको कियो ॥ पूरन बंदत पाय, सब अपराध छिमा करो ॥ ६ ॥
बोहा—
मैं नालायक प्रश्न कियो, तुम समुझायउ मोहि ॥ मोसे बोलत ना बन्यो, छिमा करो प्रभु सोहि ॥ ७ ॥
शब्दावली
(६९)
छन्द-समुद्भि देखु चित त्यागि, नास्ति सुखजो अनित्य पाग, गुरु चरणन करु संगति, संत साधुकी ॥ हो मिस्कीन, राखु निश्चय याकीन, तू तो जमापद बाकी खर्च काहे आबादकी ॥ मनमनसा दोऊ लौडि निकारिडारो, मारो हंकारतृष्णाकुबुद्धि कुबादकी ॥ रूप हंस धार, ठहरि कीजिये विचार, यार बफादार दीनानाथ, दीनबंधु गुरु साधुकी ॥ ८ ॥
॥ शब्द अष्टपदी ॥
प्रभुजी तुम विन कौन छुडावे ॥
महा कठिन यमजाल फाँस है तासों कौन बचावे ॥ १ ॥ नाना फाँस फँसाय जीवको, अपने रूप छिपावे ॥ पंच कोश है परगट ग्रासे, तेहिको कौन लखावे ॥ २ ॥ आपुहि एक अनेक कहावे, त्रिविधि रूप बनावे ॥ सन्निपात होय दुष्ट नष्ट सो, परलय अंत दिखावे ॥ ३ ॥ विषय विकार जगत अरुझावे, जहाँ तहाँ भटकावे ॥ योग ध्यान विगुर्चन भारी, ताहि सुरति अटकावे ॥ ४ ॥ आस नाम नौका बैठावे, भवकी धार बहावे ॥ तत्त्वमसी कहि ताहि डुबावे, अंत कोइ नहीं पावे ॥ ५ ॥ चारि मुक्ति जोइन चौरासी, तेहि मिलि हेतु बढावे ॥ नेम धर्म पूजा औ संजम, बहुविधि लागि लगावे ॥ ६ ॥ भेष अलेख करे को पावे, जीवहिं चैन न आवे ॥ चार वेद षट अष्टदशों लों, शून्यहि शून्य समावे ॥ ७ ॥ काल चक्र बसि उत्पत्ति परलय, जीव दुसह दुख पावे ॥ साहेब दया कीन्ह परखाये, रामरहस गुण गावे ॥ ८ ॥ ९ ॥
दोहा ।
सुख साहेब सुखरूप जो, हरन कालके पीर ॥ जो जन आवे शरणमें; परखि लगायउ तीर ॥ १० ॥ करुणार्णव कृपाल गुरु, सुखनिधान दुखभूर ॥ बन्दीछोर अशरण शरण, परख प्रकाश निजमूर ॥ ११ ॥ जीवनके दुख मेटिया, परखाये सब जाल ॥ ताते गुरु तुव नाम
(७०)
कबीरपंथी—
यह, बन्दीछोर दयाल ॥ १२ ॥ अशरण शरण नाम तुव, बरणत हैं सब संत ॥ ताते गुरु न विसारिये, परखायो जीव आंत ॥ १३ ॥ जो गुरु बसे बनारसी, शिष्य समुन्दर तीर ॥ बिसराये बिसरै नहीं, जो गुण होय शरीर ॥ १४ ॥ गुरु उपमा क्या दीजिये, पटतर नहीं कोय ॥ पलक पलक कई बंदगी, छिन छिन निरखों सोय ॥ १५ ॥ जो तू चाहे मुझको, छोड़ सकलकी आस ॥ मुझही ऐसा है रहो, सब सुख तेरे पास ॥ १६ ॥ साहेब दीनदयाल गुरु, सो पर और न कोय ॥ शरण आय यमसे बचे, आवा-गवन न होय ॥ १७ ॥ दयाकरन अवगुण हरण, तारण तरण उदार ॥ अशरण शरण बन्दों चरण, तुम विन नहीं निस्तार ॥ १८ ॥ देखि अधमता आपनी, परवश यमके हाथ ॥ त्रसित गहेऊँ साहेब शरण, भवभय हारि सनाथ ॥ १९ ॥ प्रभु सब लायक पारखी, हौं भौंमक अज्ञान ॥ लोह कनक पारस करे, साहेब शरण समान ॥ २० ॥ बन्दों चरण सब दुख हरण, प्रभु प्रसाद दुख धूरि ॥ दयाकरी सब दुख हरी, संसृति झूल भौ दूरि ॥ २१ ॥ बहे बहाये जात थे, भव सागरके माहिं ॥ दयाकरी परखाय सब, झरणाये गहिं बाहिं ॥ २२ ॥ संतत अभय गुरुकी शरण, सदा परख परकास ॥ शमन सबै भव जाल तम, रामरहस सुखबास ॥ २३ ॥ सर्वोपरि गुरुके चरण, जो हारी भव खेद ॥ परम उदार सागर दया, थाह न पावे वेद ॥ २४ ॥ चारि वेद जग विदित हैं, ब्रह्मा कीन्ह प्रकास ॥ चारि रूपसो जानिये, चारि अवस्था भास ॥ २५ ॥ भास मिटावे जीवको, काटे यमके फंद ॥ साहेब दीनदयाल गुरु, संशय खंडे द्वंद ॥ २६ ॥
शब्दावली
(७१)
छन्द.
साहेव स्वतः प्रकाश पारख, त्रास नहीं यम दंडके ॥ वास शरण बिलास तजि, सब आस पिंड ब्रह्मांडके ॥ गांस फांस मिटाय दास, हुलास ज्ञान अखंडके ॥ नहीं नाश ते इतिहास सुनि, सो आदि अंत प्रचंडके ॥ यम हंत एक अनंत, तेहिके फांस बहु वर्णतके ॥ बहु जंत गाई हरंत, कूप पंतत बहुते गनंतके ॥ सब दास होई रहंत, दुष्ट पंत चीन्ह न कंतके ॥ आदि अंत जे मुनहि संत, नहीं धावहि सो बेअंतके ॥ जीव हाल कीन्ह बेहाल, काल कराल सुनि अवजालके ॥ उरसाल अनेकन्हि भाल, सो बाचाल कवितन गालके ॥ तेहि टाल डाल प्रचंड होहु, निहाल नाल कृपालके ॥ लहू परख माला माल भेटि, भव जाल शरण दयालके ॥ यह बुदबुदा जो शरीर, नीर न थीर झूठाहीरके ॥ परपंच बहु ततबीर, तेहिके बीर उबरे हीरके ॥ तजु ललनि कीर फकीर, जेहि डर नहीं वजीर अमीरके ॥ गुरु पीर हरे भवभीर, अभय गंभीर शरण कबीरके ॥ नारदादि शुकादि लै, ब्रह्मादि सब जेहि गावहीं ॥ गाइ धाइ हेराइ, बारम्बार मन पछतावहीं ॥ जस जस जतन छूटन करहीं, भव बूड़े थाह न पावहीं ॥ सोई धार कठिन अंधार, ते गहि पार पारख लावहीं ॥ २७ ॥
दोहा —
संतत सुख है परखमें, साधन जतन बिनास । भूलि भटकि मति जाहु जिय, विविध कर्मके फांस ॥
अर्जनामा अष्टक -
हौं सेवक अज्ञान मोपर दया दृष्टि निहारिये ॥ बाल जानि कृपालु मोको सुरतिमें नहीं टारिये ॥ हौं निपट बुद्धि मलीन जगत आधीन मै ताते भयो ॥ जो होय तुव पद लीन सोई विपिन मन काहे न रह्यो ॥ १ ॥ यह जगत जाल कराल मोह
(७२)
कवीरपंथी—
विशाल मोहि अछो लग्यो ॥ यह कनक कामिनि नाल देखि बैराग सब चित्तसे भग्यो ॥ नहिं काम हैं धन धाम सब बेकाम सपनासो दिखे ॥ पर चित छाडत नाहिं आसा काह भये बहु पढ लिखे ॥२॥ अब करत दास पुकार बारम्बार गुरु सुन लीजिये ॥ तुम सकल राग छुडाय हठ वैराग मोको दीजिये ॥ तुव नाम पतित उधार मोते न पार कोइ दीन है ॥ अब बन्यो है जुग यार तुव आधार ताते कीन्ह है ॥३॥ बाने की लाज तुम्हारी परख विहारि सुख साहेब धनी ॥ मैं पतित हौं लाचार दास तुम्हार गुरु साहेब गनी ॥ अब दास पूरण कीन्ह बिनती सुनहु दीन उधारणा ॥ मैं परच्यो हौं जग जंजाल माहीं मोहिं साहब तारणा ॥४॥
अष्टक—
सुख साहेब सुखरूप सुखघन दुसह दुख निवारणं ॥ पारखके प्रकाश कर्ता दीन जीव तारणं ॥ १ ॥ यह ब्रह्म जगको शोक सकलो धोक धर्म बिडारणं ॥ महा मोह कराल नाशक सकल भव भय हारणं ॥ २ ॥ यह वेद शास्त्र पुराण एक अनेक जालहि खंडनं ॥ झाईं संधि औ काल भासिक दया धीरज मंडनं ॥३॥ एक जीवको अनुमान सब तोफान जग तामें फँसो ॥ सोई गाँस फाँस छुडाय निज पद पाय पारख हठ ठसो ॥ ४ ॥ नहिं कल्पना अनुमान सो परमाण अब को कहि सके ॥ न प्रत्यक्ष पारख छोड़िके यह वेद नाहक मरि बके ॥ ५ ॥ सुधि लेहु आप कृपाल तब सब जाल जीवन छूटिहै ॥ निज दास होय हुलास तबहीं भास सकलो टूटिहै ॥ ६ ॥ मैं चरण सेवक दीन तुम परवीण दायी कीन्ह हो ॥ मैं हीन छीन मलीन प्रभुजी बाँह गहिकी लीन्ह हो ॥ ७ ॥ बाँह गहेकी लाज पूरन शरन तुमको आज है ॥ नहिं औरसे कहु काज गुरुपद सकल सुखको साज है ॥ ८ ॥
शब्दावली
(७३)
अष्टक-भो दयाल जगत पाल कालजाल खंडनं ॥ पाप ताप दहनहार दिव्य ज्ञान मंडनं ॥ भवअपार कर्णधार पाकनाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मेनमामि पाद पंकजं ॥ १ ॥ सत्प्रकाश चिदाभास नाम रूप अक्षकं ॥ जगत ब्रह्म आत्म सर्व साक्षी आदि लक्षकं ॥ दयाधीर युक्तयोग विशुद्ध नाम अंकजं ॥ चरण शरण हि मे नमामि पाद पंकजं ॥ २ ॥ हंसभूप परमरूप भुक्ति मुक्ति दायकं ॥ दक्ष मक्ष रक्ष प्रभु सर्व संत नायकं ॥ परीक्ष अक्ष निर्मलं विशुद्ध नाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ३ ॥ बिरह कलोल ब्रह्म गोल तत्त्वमसि छेदिकं ॥ वेद विद्यातीत त्वं चतुर स्थान भेदिकं ॥ त्वयंअक्षि साधु पक्षि शुद्धनाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ४ ॥ परख भान संत ध्यान षड पुटी विनाशिकं ॥ आदि अंत मध्य नाना नेति भास भासिकं ॥ कृपासिधु शील इन्दु विशुद्ध नाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ५ ॥ विश्व चित्र तासु मित्र तत्पवित्र शासनं ॥ शुचि पवित्र त्वं विचित्र सार शब्द भाषनं ॥ करुणामय कवीर औ विशुद्धनाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ६ ॥ जोगजीत भौ अजीत न्याय नीति कारणं ॥ ऋद्धि सिद्धि निद्धि दाता बिरद हस्त धारणं ॥ सुखाधि दीनपालकं विशुद्धनाम अंकजं ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ७ ॥ बुद्धि अंध ज्ञान मंद हीन छंद स्वष्टकं ॥ पूरन दास भाषिते सु पाकनाम अष्टकं ॥ त्वंप्रसादसुगमसर्व विशुद्ध नाम अंकजम् ॥ चरण शरण देहि मे नमामि पाद पंकजं ॥ ८ ॥
अष्टक-
मंगलरूप अनुपमपूरन नाम कवीर सो आप उदारा ॥ मोपर हृष्टि दयाकरि हरेहु हौ अति बालक दास तुम्हारा ॥ काम अपार महाबल भारथ देखतके मम चित्त डेरावे ॥ कीजे कृपा उर
(७४)
कवीरपंथी-
अंतरजामि सु संकटसे बहु जीव दुखावे ॥ १ ॥ लोभ महामद क्रोध उपावत होत अधीर बहु चित मेरो ॥ मोह महा ममता रजनीवत बारम्बार रहे नित घेरो ॥ एक उपाय अहै बचवे अब होहु दयाल दयाकरि हेरो ॥ काह कहूँ कछु आप छिप्यो कहँ हो प्रभु नाथ अनाथन केरो ॥ मो कह तात तुही पितु मात सु और उपाय नहीं कछु मोही ॥ जो सुत मातुपिता ढिग आवत तो वह मातु सो दृष्टि न जोई ॥ तो पुनि लोटतपोटत अंगनलेत उठाय दयाकरि वोही ॥ त्यों गुरुदेव कवीर कृपाल सु है एक आश शरणगति तोही ॥३॥ दासको संकट देखि दयानिधि है करूणाकर आतुर धायो ॥ इन्द्रमती जब टेरे कियो प्रभु जाय तहाँ वह पीर मिटायो ॥ बांधत सेतु सहाय कियो प्रभु रामहु केर उपाय बनायो ॥ कौन सो संकट मोहि गरीबको जो तुमसे नहिं जात छुड़ायो ॥४॥ जाय पुरी पुरुषोत्तमके प्रभु देकर दंड समुद्र हटायो ॥ विप्रनके अभिमान महाप्रभु तोरनको बहु रूप दिखायो ॥ वे भये दीन परे चरणों तब चारिहुँ जाति सो एक मिलायो ॥ दास जहाँ जहाँ जो कछु टेरत ताकर होहु तुम बेगि सहायो ॥५॥ मो कह काहे बिसारत साम्प्रथ दीनदयाल कवीर उदारा ॥ आनंदरूप अजीत गोसाईं सु मोहमया सबसे प्रभु पारा ॥ साक्षिस्वरूप अनूपम शोभित पारस्वरूप अकार तुम्हारा ॥ हैं अति दीन अधीन दुखी बहु मेटहु मोर अघोर अँधारा ॥६॥ यह बर माँगहु देहु दयाकरि अंतरजामि सुज्ञान प्रकासा ॥ बोध स्वरूप सदा निर्णय गुरु सो मनमें तुम होहु उजासा ॥ वेद पुराण कुराण जो गावहिं पार न पावहिं होहिं उदासा ॥ जापर मौज करो तुम साहेब सो पुनि हंस मिले तुम पास ॥७॥ ये गुरु अष्टक पाठ करे नर आप सुने अरु ध्यान धरेंगे ॥ है सरधा अति प्रेमहुं पावत मार्ग चाल सुचाल चलेंगे ॥ ते नर पावहिं मुक्ति पदारथ
शब्दावली
(७५)
पाखंडरूप विकार तजेंगे ॥ होय सुखी लहि आनंदको पद सो भवसागर पार लगेंगे ॥ ८ ॥ ३२ ॥
घनाक्षरः—
अजर अखंडरूपि, परम प्रकाशी देखो, सूर्यसे उजासी लेखो अतिहि सोहायो है ॥ ब्रह्म जग भर्म मिटि, झाईं संधि काल नाशी, संशय सब चूर करी, धूरसी उड़ायो है ॥ वेदहु प्रमाण और बानीनके मत जेते, औरहु सिद्धांत सोतो, सर्व ले देखायो है ॥ सबहु जाने सोतो, सर्वहुसे न्यारो रहे सोईं गुरुरूप निज, पारख लखायो है ॥ ३३ ॥
दोहा-बारों तन मन धन सबै, पद परखावनहार ।
युग अनंत जो पचि मरे, बिन गुरु नहि निरुत्तार ॥ ३४ ॥
श्लोक—ध्यातं सतगुरुभेतरूपममलं श्वेतांबरं शोभितं ॥ कौणैः कुण्डल भेत्तगुप्तमुकुटं हीरामणिर्मंडितं ॥ नाना माल मुक्तादि शोभित गला पद्मासने संस्थितं ॥ दयाब्धि धीर सुप्रसन्न वदनं सतगुरु तन्त्रमाप्ति ॥ ३५ ॥ द्वै पदं द्वै भुजं प्रसन्न वदनं द्वै नेत्रं दयालं ॥ सेली कंठमाल ऊर्ध्व तिलकं श्वेतांबरी मेखला ॥ चक्रांकित शिर टोप रत्न खचितं द्वै पंच तारा धरे ॥ वंदे सतगुरु योगदण्ड सहितं कवीरं करुणामयम् ॥ ३६ ॥
दोहा-बंदनीये गुरु परखको, बारबार कर जोर ।
दयाकरण संशय हरण, संतरूप प्रभु तोर ॥ ३७ ॥
बंदीछोर कृपालु प्रभु, विघ्न विनाशक नाम ।
बंदे सन्मुख पारखी, शीस भेंट धरु हाथ ॥ ३८ ॥
अशरण शरण बंदों चरण, सब विधि मंगल धाम ।
बचन उचारो बंदगी, सत्य प्रेमके साथ ॥ ३९ ॥
(सब सेवक तथा साधु मिलके महंतोंकी बंदगी करनेके पश्चात् सब मिलके महंतोंकी आरती करना)
आरती शब्द ॥ आरती हो गुरु आरती हो ॥ आरती गरीब निवाज, साहेब आरती हो ॥ टेक ॥ ज्ञान आधार विवेककी बाती,
(७६)
कबीरपंथी—
सुरती ज्योति जहँ जाग ॥१॥ आरती कहूँ सतगुरु साहेबकी, जहाँ सब सन्त समाज ॥२॥ अरस परस बहु आनंद भयो, टूटि गये सब यमके जाल ॥३॥ साहेब कबीर संतन कृपासे भयो परखपरकाश ॥४॥
उपरान्त सब शब्द तथा सेवक खड़े होकर सत्गुरुकी प्रार्थना स्तुति करना। बोहा—
दास जानि निज आपना, विनती सुनिये मोर । विनवतहौं कर जोरिके, गुरु शरणागत तोर ॥१॥ काम क्रोध मद लोभमें, निज मैं रहौं भुलाय । दीन दास प्रभु जानिके, लीजे बन्दि छुड़ाय ॥२॥ मम दृष्टि महा मलिन है, खानि बानिके बीच । दया करी गुरु बोधिये, मोहि अधम अति नीच ॥३॥ काल जाल बहु फेरमें, परचो मैं निपट गँवार । शरण आयकी लाज है, माहिब लेहु उबार ॥४॥ मन बच कर्म सु साधुसे, टूटे ना मम नेह । बन्दीछोर यह दीजिये, वरदान सदा अच्छेह ॥५॥ साहेबके दारबारमें, कमी काहुकी नाहिं । बन्दा मौज पावे नहीं, चूक चाकरी माँहि ॥६॥
गुरु स्तुति । छन्द ।
गुरु दुखित तुम विनु रटहु द्वारा, प्रगट दरशन दीजिये ॥ गुरु स्वामी या सुनु विनती मोरी, बलि जाउं बिलम्ब न कीजिये ॥ गुरु नैन भरी रहत हेरों, निमिष नेह न छांड़िये ॥ गुरु बांह दीजे बन्दिछोरसो, अबकी बंद छुड़ाइये ॥ विविध विधि तन भयेउ व्याकुल, बिन देखे अब ना रहौं ॥ तपत तनमें उठत ज्वाला, कठिन दुख कैसे सहौं ॥ गुण अवगुण अपराध छिमा करि, अब न पतित विसारिये ॥ यह विनती धर्मदास जनकी, सत्य पुरुष अब मानिये ॥ ७ ॥
श्लोक—न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ॥
गुरुज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरुहे नमः ॥ ८ ॥
इति बृहदानुपरी संज्ञानुमिरन ।
इति श्री कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य भारत पथिक स्वामी श्रीयोगलानन्द विहारी निमित्त कबीरपंथी शब्दावली अन्तर्गत संज्ञानुमिरन समाप्त सूक्तम् ॥
सत्यसुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुण्य सुनोन्द्र करुणामय कवीर सुरति योग सन्तायन धनो धर्मदास की दया सर्व सन्त महन्तोंकी दया ।
कवीरपंथी शब्दावली ।
दूसरा खण्ड-स्तोत्र दर्शन ।
—*— जय सन्त्यावन्दन स्तुति ।
(कवीरमान् प्रकाशसे छन्द शिखरणी ।)
कबीरं भांन भाकर निकर ज्ञानं विधि मयम् । परस्थाने थीरं जगत गुरु पीरं निधिनयम् ॥ महातेजो राशं वदन वदनाशं नृप नृपा । प्रतापं तापं ता दनुज दल दापं तव कृपा ॥ १ ॥
तरंतं तारंतं लहत जन सारं वसुमति । महत्त्वं पारंतं अकथित अनन्तं पशुपतिं ॥ सुराधीशाधीशं हिय तिमिरि पीसं जगजगे । भवं भावं भङ्गे रतिर करुणामयं पगपगे ॥ २ ॥
जंनं कंजं रंजं दरस भ्रम भंजं सतहितं । निहारं हारं हा तिमिर हर पारं गत छितं ॥ सती सूतं सातं बिलग बिलगातं दिनकरा । यती भोगं भागं गत विगत भागं किकरा ॥ ३ ॥
प्रजा पीडा ब्रीडा धन तिमिर कीडा महिमहा । हतं सुद्रा निद्रा शम दम न क्षुद्रा गति महा ॥ सतो संगं रंगं बसतव प्रसंग भसकरा । उमंगं अंगं एक समय अनंगं बसकरा ॥ ४ ॥
नमस्कारं कारं क्रमर क्रम कारं कककृते । बंबं बंदे बंदे भनत भवं फन्दे बब बृते ॥ रमं रामं रम्यम् रटत रर कल्याण करनम् । परणम्यं तौ पीछे परं परमीछे त्रय वर्णम् ॥ ५ ॥ इति शिखरणी छन्द ।
(७८)
कवीरपंथी—
अथ कबीर मानु वियोग सर्वैया ।
सतनाम ब्रतीवर संत सती, दिन अन्त भयो भगवन्त पयाना । युगनैन महासुख दैन दुरे, धरि धीर धरो पद पंकज ध्याना ॥ हृद इन्द्रिन दोनते मौन गहो, थिर आसन हो अनुसासत माना । यह संधि सचेत सतो गुणते, सतधार हिये सतरूप समाना ॥१॥
तुमरो जन तू चकई चकवा, गहि शोक वलंभ वियोग भयेते । सजनी रजनी डुर जीव डरै, हरिके हरिके हरिके अथयेते ॥ वृषभाल कराल सुखेन फिरे, भय भूरि भई प्रभु दूर गये ते । वन वारिज सन्त यकन्त गहे, सकुचे मिलि हेरि जो घेरि लियेते ॥२॥
सम सम्पति सौच करी रकरी, दम कम्पत भये जब तूट करी है । गुण ज्ञान थने बन बाग बने, फल फूल भरे तरु तौर धरी है ॥ घन घोर निशा मति भर्म कियो, शुभ धर्म लिये दुर्बुद्धि भरी है । जग जीवहि आलस निन्द गही, सबही कहैं लागि मसान मरी है ॥ ३ ॥
कोइ शीलवती युवती जगमें, जिन पीठपिछार पिया व्रत पाला । जिहि धर्म अडोल अदाग सदा, गिरिनिश्चल सो न सुमेरु सो हाला । निजु पीय सो पीय पतिव्रतके, जगमें सब और नपुंसक माला । जिमि पीठ दिखाई चले जनको, इमि आई तु दीठ दिखाव दयाला ॥ ४ ॥
पल नैन ढका जब पावत है, तब डंसत है यह नागिन कारी । हग झंपन होय सचेत रहौ, सुचि सन्त स्थान समाधि सम्हारी ॥ पलके पल गाफिल पावत ज्यों, यह डंक तुरन्त तेही पल मारी । शुभकर्म किया सब त्रष्ट करे, भवसागर माहिं डुबावन हारी ॥५॥
यदि कजल गेह न उज्ज्वलता, विनु दाग बचे कोई नाम सनेही । जेहि ओर कवीर कृपाल दुरे, तिहि काल निहाल भये
शब्दावली
(७९)
कछु तेही ॥ तम त्रासक ध्यान धरो उधरो, सुधरे सुधि बुद्धि दया दग जेही । गुरु देव बिना निशि नाश नहीं, विश्वास करो एक युक्ति है एही ॥ ६ ॥
यह नींद सही है महा ठगनी, छनमें धन जोवन वृन्द बुहारी । गहि गोड जती नहि छोड मती, छलि साधुकी सम्पति लूटन हारी । सजि कण्ठको वेष न देखि परे, इमि आई है ओढ़िके कामरि कारी । यह है न नहीं कमरी पसरी, गठरी धनकी बांधि सँवारी ॥ ७ ॥
हरि नाम चरित्र पवित्र महा, सुत्तामणिके वन देत दवारी । घन घोर घरे नहि सूरि परै, धरि वज्र कपाट सुज्ञानकी द्वारी ॥ रिधि सिद्धि जहां लगि लाभ कहै, इन सर्व गहे ठगनी छल कारी । नहि कूछ रहा इन छूछ कियो, यहि कान भये ऋषिराज भिखारी ॥ ८ ॥
मनते भुख भ्रूख अहार गहे, व अहार ते नींद सो कालकी फांसी । यम दण्ड प्रचण्ड यही है यही, करसो सतखण्ड सो ज्ञान की रासी ॥ नहि शुद्ध स्वरूप लखे हरिके, धरि अन्ध कियो धर्मरायकी दासी । यदि जाल फँसायके काल हते, सब जीव बने भवसागर वासी ॥ ९ ॥
नहिं चेत रहा दुख देत महा, हरि हेत कहा दुर्बुद्धि बड़ी है । पिय आगु खड़े नहिं चीन्हि पड़े, दग सन्मुख कन्धकी सन्ध पडी है ॥ तजि राम हरामके काम लगे, चुहडी फुहडी जब आन अडी है । सुमती हरिगै कुमती भरिगै, यम सेल हिये बिच ठेलि गडी है ॥ १० ॥
मन रौन जो भौनते गौन कियो, तमसी तमसी तमसी तम ठोने । अति प्राण अधार अधार बिना, विलपात अधीर धराधर कोने ॥ यहि बैरिन पैरिन संग लिये, पहुँची विरहा विष बेलको पोने । सुख साच बिहाय अकाज भयो, नियरानि सुभाग सुभागि निधोने ॥ ११ ॥
(८०)
कबीरपंथी—
उह डोलत संग पिछार सखे, ढिल अंग लखी गठरी गहि भाजी । डुशियार हो संत सुजान सुनो, पलही भरमें वह मारत बाजी ॥ गठि कण्ठ लिये फँसरी करमें, सिद्ध साधुनके गल डारत पाजी । सत धर्म नशाय खँसाय लियो, तब नेक डुबावनको सज साजी १२
जबलों तन प्यार न प्यार पिया, तन आस तजे पिय खास सही है । नहिं मैं तब तू जब मैं नहिं तू, रह एक विवेककी टेक सही है ॥ जहाँ राम न दूसर काम तहाँ, रवि रैन यकत्र न होत कही है । जब प्रीति गही तहिये गहिरी, कुल कानि कहाँ सुलतान वही है ॥ १३ ॥
जिमि चुम्बक लोहसे मोह करे, जलहीन भई जस मीन दुखारी । अलि अम्बुज प्रीति न बीति कभी, पपिहा लपिहा सुख स्वातिकी बारी । जिमि चन्द चकोर यकोर लखे, सिख दीपक रंग पतंग निहारी । यहि राह न नाहसे नेह लगी, नहिं आशिक है वह फाँसिक यारी ॥ १४ ॥
दगपूरति नींद हराम भई, धनि लेत उसासहि बारहिं बारा । तन पीत भयो कृश गात भयो तस बात भयो लघु भोजन धारा ॥ अधरा पट सूख तृषा हियमें, नहिं जो पिय रूप पियूष निहारा ॥ गुन गान सदा हिय ध्यान धरे, बिरहिनके यह दश चिह्न उचारा १५
पथ देव अकाश नहीं जन है, असमान लियो निज पाग उतारी । पसराय दियो सगरे दुगरे, गुरु खाट निहारत पांव दे डारी ॥ बिखराय सबै मणि माणिकको, विरती बलि बैठि यती व्रत धारी । दिन भूषण ध्यान धरे सुनिहा, दुख दूखन पूषन पेखन टारी ॥ १६ ॥
कहुँ चोर चकोर रु चन्द बधू, विगसात अनन्द उलूक लही है । कहुँ बादुर बीर बहादुर भय, दुख दायक जंतु अनंत मही
शब्दावली
(८१)
है ॥ कहुँ जोत खद्योत उद्योत भई, मनमें अपने अभिमान गही है । निसि डाट कहे मम तेज लखो, रविते हमरो कछु घाट नहीं है ॥ १७ ॥
सखि काह करो पिय दूरि गये, हिय पूरि गये विरहानल कैसे । मन भावन जासु विदेश गये, धूक जीवन है तिनको जग तैसे ॥ प्रभु वेगि कृपाकरिके सुधि लो, तुम दीनदयाल कहावत जैसे । पतिया पहुँचाव बसीट मेरी, अरु बाँचि गुनावहु पिया ढिग ऐसे ॥ १८ ॥
विनय पत्रिका ।
दनुजा मनुजा महाराज महा, सुर संत सती सिरताज कहाओ । जन दीनबन्धु हो सिन्धु दया, हृदय थलको मलको श्रुति गाओ ॥ सब मूल सोई नहि तूल (तुल्य) कोई, गुण-सागर नागर कौन थाहाओ । हमरी करनी सुधि ना करनी, दुःख द्रन्द विदार दिदार दिखाओ ॥ १९ ॥
सुरती इतो प्रति ॥
मम पायक शोक सहायक तू, सुरती कुरती पिय पाहँ पधारो । करजोरिके पा गाहियो प्रभु को, कहियो तेहि कोटि प्रणाम हमारो । जब कंत दुरंत संदेश सुनो, निज प्राण निछावर ताछन कारो । इमि ले अर्जी कर दूति चली, वरजी विरहा वर ध्यान को धारो ॥ २० ॥
पिछलो रातका विरह । दोहा-
यहि निश्चय के नखत गण, अपने अपने ढंग । भय भ्रम हटै न दुख मिटै, होय न तिमिर विभंग ॥ १ ॥ करुणामय करुणु निरखि, हरखि चितोनन ओर । सुखपावे मुख देखि हरि, होय विरह निसि भोर ॥ २ ॥ आवन आवन कहिगये, अजहुँ न आये लाल । धावन फिरा न पिउ फिरे, भामिनि हाल विहाल ॥ ३ ॥