कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(७११)
काल धरी धरखाय ॥ पिंड न प्रान देह नहि सुंदर, विन रसना गुन गाय । ऋग यजु साम अथर्वण थाके, विन गुरु कौन लखाय ॥ जोजन तीन चले विन चरनो, करपलो परमान । सुर नर मुनि जाको मर्म न जाने, निरगुन चतुर सुजान ॥ तैंतीस कोटि देव नहि जाने, निरगुन भेद नियार । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, परख परख टकसार ॥
धमार २१—अहो करनाटक नागर होरी खेलैं हो हो ॥ हो भाई साधो हो खेलैं जो राय बंकेज ॥ टेक ॥ एक समय गज अस्थल आये, करनाटकके लोग । बिहँसि बिहँसि सब मंगल गावैं, बहुत करहिं सुख भोग ॥ राय बंकेज हंसनके राजा, गज अस्थल कडिहार । हंसन पार उतारहीं, परख परख टकसार ॥ हंस हंस युग बांधहीं, जम सों जीव छोडाय । सत्य शब्द दे लोक पठावैं, अभय निशान बजाय ॥ ज्ञान सुगंध धरो घट भीतर, कुबुधि अबीर उडाय । सुरति शब्द जीवनको दीन्हे, हंस लिये सुकताय ॥ भये लवलीन हंस सुकताहल, सतगुरु बांह चढाय । कहैं कवीर मुक्तिके दाता, तबहिं अभय पद पाय ॥
धमार २२—अहो भर्म भारी माया जग मोहे हो हो ॥ हो भाई साधो हो जेर कियो संसार ॥ टेक ॥ कटि केहरि गजगामिनि माया, संशय कियो सिंगार । रोक रही सब मोह नदी में, कोई न उतरे पार ॥ ब्रह्माके चित चोरी माया, शिवको लीन्ही साथ । बस कीन्ही बसुधाके ठाकुर, इंद्र नवावै माथ ॥ तैंतिस कोटि छले मुनि देवा, डारी बिरह गुलाल । बरन फेर अबरन होय नाचे, ऐसी अबला नार ॥ पंडित आंखिन अंजन दीन्हे, मूरखके सुख धूर । जती सती सब बांसन मारे, सुर नर मुनि किये चूर ॥ गोरख गोपीचंद भरथरी, आये खेलन फाग । शृंगीऋषि पाराशर
(७१२)
कवीरपंथी-
आये, छांड़ छांड़ बैराग ॥ सात द्रौप नौ खंड तिहुंपुर, सो सो फगुवा लीन्ह । साहब कवीरसों अरजी करत हैं, तुम मोहिं कछू न दीन्ह ॥ ६ ॥
धमार २३—अहो गुरुगम सों होरी खेलिय हो हो ॥ हो भाई साधो हो शब्द सुरति लौ लाय ॥ टेक ॥ कोई एक नाम निरंजन ध्यावे, कोई कहे निरधार । जोत सुरूपी अलख कहत है, राँचि रहौ संसार ॥ कोई दुर्गा शिवको जाने, कोई जाने भूत । कोई यंत्र मंत्रसों राचे, मूल विसारो सूत ॥ कोईक नवली कर्महिं साधे, पवना देह चढाय । बिंदहिं साध भगन होय फूले, सतगुरु शब्द न पाय ॥ अजपा सुन्न जपे सब कोई, छर अच्छर लग दौर । मारग भूल फिरे भटकाना, मन आवत नहिं ठौर ॥ कोई ओहं कोई सोहं ध्यावे, कोई एक नहिं ठहराय । घटमें ज्ञान कथे सब ज्ञानी, तन छूटे कहं जाय ॥ पूरन ब्रह्म कहे सब कोई, सो जग करे अहार । तन छूटे कहु मिले ब्रह्मको, जनम जु होत खुवार ॥ ऊर्ध तपे बन खण्ड जात है, खात वृच्छके पात । जोगी जंगम औ दरवेसा, भेष धरे संसात ॥ कथनी बकनी पार न पावे, सतगुरु शब्द अकाल । अच्छरमें निःअच्छर दरशे, सतगुरु होहिं दयाल ॥ युक्ति जान खेले जो कोई, शब्द डोर चढ जाय । अमर लोकमें पुरुष विदेही, सत कवीर लौ लाय ॥ ७ ॥
धमार २४—अहो कोई नाम रंगीला सतसंगी हो हो ॥ हो भाई साधो हो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेमसो गगन पखावज बाजे, बिन कर बाजे ताल । रुनक झुनक अनहद धुनि बाजे, उठत छतीसों राग ॥ अरुन बरुन गुलाल बहुरंग । बहुरूपी पांचौ राव । इन पांचौं विश्वास न लीन्ह, खेले त्रिकुटी भाव ॥ प्रेमके रंग सींचत रहै, अष्ट कमल परकास । ज्ञान गली छूटे पिचकारी,
शब्दावली
(७१३)
भँवर गुफा निज वास ॥ गगन मंडलमें होरी खेलैँ, तत्त्व मता गलतान । फगुवा नाम लिये बन आवै, पावै मुक्ति फलदान ॥ कहै कवीर ऐसी होरी खेलो, तीनों तापको मार । निगम ये जावो परमपद पावो, पूरन जन्म निवार ॥
धमार २५-अहो सतगुरु संग होरी खेलिये हो हो ॥ भाई साधो हो बहुर न ऐसो दाव ॥ टेक ॥ खेलत हंस बंस कर लीन्है, मित गये विषय विकार । भाव रचेउ रंग संग निज पायो, खुलगये दशाहु दुवार ॥ गगन गुलाल उड़ाव रैन दिन, भर पिचकारी शील । खेलत हंस परमपद पावै, बिमल हंसनकी भीर ॥ गगन मंडलमें हंसा खेलै, चढे सवाया नूर । खेलै हंस सोहंगम डोरी, वर पाये भरपूर ॥ सोरह सुतका एक तत्त्व है, जासों न्यारा बीज । कहै कवीर हम निश दिन खेलैँ, सतगुरु दीन्हा चीज ॥
धमार २६-अहो नित मंगल होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, नितही बसंत नित फाग ॥ दया धरमकी केशर घोरो, प्रेम प्रीति पिचकार । भाव भक्ति भर भर सतगुरु सो, सुफल जनम नर नार ॥ छमा अगर छिरक चित चन्दन, सुमिरन ध्यान धमार ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, उमँग उमँग रंग डार । चरनामृत प्रसाद चरन रज, अपने शीश चढाय । लोक लाज कुल कान तोरके, निरभय निशान बजाय ॥ कथा कीर्तन मगन महोत्सव, करे संतनकी भीर । कबहुँ न काज बिगरे नर तेरो, सतगुरु कहै कवीर ॥
धमार २७-मन रंगी राजा खेलै धमार ॥ काहूको पाताल पठावै, काहूको देत अकाश । काहूको बैकुंठ पठावै, फिर फिर नरकमें वास ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बांधे, माया रसरी डार । सुर नर मुनि सबहीको बांधे, कोइ न सके निरवार ॥ जोगी जती
(७१४)
कवीरपंथी—
तपी संन्यासी, दिगंबर दरबेस । सनक सनंदन सबही बांधे, काहु न पायो भेश ॥ तेंतिस कोटि देवता बांधे, माया रसरी डार । कहैं कवीर तेई जन बांचे, चीन्हा शब्द हमार ॥
शब्द चाचर ।
चाचर मची अब हो हो खेल जिन चाचर माहीं ॥ टेक ॥ चाचर खेलें दोय जने एक मन औ माया । पंथ चलन नहिं पावै बहु द्रन्द्व मचाय ॥ लोभ मोहकी पिचकारी मारो चतुरा ज्ञानी । सुर नर सुनि सबही छले जेते अभिमानी ॥ डफ कपटही बाजे सही बहु जग भरमाई । तृष्णा लागे खेलई सम्हरा नहीं कोई ॥ काम क्रोधकी अरगजा सब अंग लगीई । आशा तो चहुँ दिशि फिरे सब सुधि बुधि खोई ॥ नाना रंग बनायके नाचे मन माया । ठांव ठांव फंदा रचे कोई जान न पाया ॥ अंग अनेक दिखायके सबही जग खाया । मचे खेलके आंधरे काहु मरम न पाया ॥ षट् दरशन सब खेलहीं बहु भेष बनाई । मन रंगीके खेलमें सबही बिलमाई ॥ पंडित वेद पुरानको पढ पढ अरथावैं । शेष सहस मुख गावहीं कछु भेद न पावैं ॥ तीर्थ व्रत जग लागिया धावै चहुँ ओरा । देवी देवल देवता खेलैं सब ठौरा ॥ सुख संपतिके कारने अरुझा सब कोई । अंतकाल औसर परे कोई संग न होई ॥ पछा पछी सब खेलहा बहु भरम झुलाने । वार पारकी सुधि नहीं कथनी लपटाने ॥ जाके जो कछु मन बसे वह वाही माने । सत शब्द चीन्हें नहीं बहु झगरा ठाने ॥ सांचेको माने नहीं जिह्वाके लपटी । वादिनकी कछु सुधि नहीं जम मारे झपटी ॥ मन मायाके रंगमें सबही ये भूले । चौरासीके खेलमें सदा जोनी झूले ॥ सतगुरु शब्द पुकारिया खेलै जो कोई । भौसागरके भय नहीं फिर
शब्दावली
(७१५)
जन्म न होई ॥ कहैं कवीर विचारिके खेलो तुम साधो । न्यारा सबही खेलते जाको अवराधो ॥ १ ॥
सत्यनाम ।
अथ कहरा प्रारम्भः ।
**~
कहरा १-मतसुन मानिक मतसुनु मानिक मतसुनु मानिक सब धारैरे । मगन हुआ जब घर उठिचाला गुरुके चरण चित तुव धारैरे ॥ बगला पक उछारी मच्छी सो धिमरा कैसे पावैरे ॥ वंसी टूटि पड़ी पानीमें है कोई गांठ जुरावैरे ॥ तीन लोक धिमरा फिरि आया सिमरीके अन्त न पावैरे ॥ चारी चरण सिमरीके कहिये नो पंखुरी पखानारे ॥ नाका तोड़ि बैठ उर अंतर सतगुरु जुगति लखानारे ॥ दो मुख शब्द पडे टकसारा बूझै संत सुजानारे ॥ सुर नर मुनि और औलिया ब्रह्मा विष्णु महेसा रे ॥ कहै कवीर शब्द विन परखै पार न पाया सेसा रे ॥
कहरा २-अरे मन मिहरा करहु तयारी विलंब करे भल नाहि रे ॥ बेगहि सुरति करो तुम धुरकी दिन सब वीते जाहिरे ॥ पांच कोटि और नौ हैं नारे वे सब वेगि मुखैहैरे ॥ यह तन नदी झर हुइ जैहै मंछा हाथ न ऐहैं रे ॥ धीरज करी तुम डारौ वंशी इस विधि मंछा ऐहैरे ॥ नातर तो मगरा हरि खैहैं जीव अकारथ जैहैरे ॥ निरति सुरति करि धागा बांटो शब्द सुई पहिरावोरे ॥ अंतर कबहुं रहन न पावै ऐसा जाल बनावोरे ॥ शब्दकी डोरि तहां गहि राखो इस विधि जाल पसारोरे ॥ पांच पञ्चीसो सिमरी भमरी सोई वेगि धरि मारौरे ॥ ए मन मिहरा वेगि मथौ तुम पवन महर ले साथारे ॥ इक मत हुईकै चढोना उपर सिमरी आवै हाथारे ॥ वा सिमरीको लखै न कोई जहां मनसा जाई रे ॥
(७१६)
कबीरपंथी—
पिछले महरा जहाँ लग होते खोजत रहे भुलाईरे ॥ नौ दरवाजे हैं सिमरीके जे सबहि तुम रोकोरे ॥ पिछली प्रीति बिना कर जोरे दास पठावै छेकारे ॥ जिस सिमरीके रूप न रेखा नहि बरन नहि मेषारे ॥ जा खोजत सुरनर सुनि थूले कोई विरले पेखारे । झिलमिल नीर तिरवेनी संगम तहाँ ब्रह्मका बासारे ॥ कहै कबीर सुनो तुम साधो एक नामकी आशारे ॥
कहरा ३—नाम सुमिर मन नाम सुमिरि मन नाम सुमिर मन मेरारे ॥ आवत जात बहुत दुख पैहो धरि धरि तन बहु तेरारे ॥ बालापनके गुनह करम सब प्रगट कहौ सुनिहौरे ॥ सुखसे भेट भयी नहि कबहूँ बहु दुख दारुण कीयारे ॥ सरवन कथा सुनी नहि कबहूँ वचन सुचि मानारे ॥ नयना सुंदर रूप लुभाना यही करत मन माहिरे ॥ जीभ्या तेरी षड्दर राती है अंतर रस मानीरे ॥ नासा तेरी वासकी बासे विशेष विशेषारे ॥ सरवन तेरे रागके भीने अनहद शब्द न परेखारे ॥ कामी पड़े कामके वशमें छीतज दिन औ रातीरे ॥ एक घडीके सुखके काजै खोवे कुल और जातीरे ॥ संगी तुम्हरे गुता महरम लाजत नहि लबारारे ॥ राग बाग तन कस करि बांधो शब्द गहो हथियारारे ॥ गहि हथियार खेत मत छांडो रहियो खेत मंझारारे ॥ सूरा पनकी गति है न्यारी जाने संत कोई सुरारे ॥ पांच पचीस पकड़ि वश कीने जूझे गगन दुवारारे ॥ शूरा होयसो सम्मुख जूझै दरसै अलख अपारारे ॥ समष्टिको सतगुरु दर्शे परसे अपरम पारारे ॥ ऐसी रहन रहै कोइ हंसा आवै लोक हमारारे ॥ कहै कबीर नाम को कहरा परख शब्द टकसारारे ॥
कहरा ४—निहुरि नाच मन निहुरि नाचमें तेरी दुलहिनियारे ॥ निहुरे नाचे शब्द विचारै चित्र विचित्र रहिनियारे ॥ कुंवटा एक
शब्दावली
(७१७)
पांच पनिहरियाँ पनियां भरे पतलवारे ॥ बात सखीनसों चित गगरी सो चित सों गगरी न छूटे रे ॥ चित छुटे तो गगरी फूटे पनियां खिर गगरी फूटे रे ॥ पानीके प्यासे पीरेवा उर बैठि शब्दकी छहिरे रे ॥ आगि लगे तेरी मथुरा नगरीया कान्ह पियासे जैहैरे ॥ ज्ञान धनुईयां सुमति तीरले तृष्णासों विधि मारे रे ॥ कहै कवीर नामको कहरा महरम कोई विचारैरे ॥
कहरा ५-सूल छाँडि ते डारन लागा ते नर परम अभागारे ॥ सोइ सोइ सब रैन गँवाई भोर भये नहिं जागारे ॥ शब्द पुकारत जागत नाहीं जनम जनमके सुतारे ॥ बांधे गरे रहटकीसी घडिया आवत जात विगूतारे ॥ पूरब जाऊँ तो राम बखाना पश्चिम अल्लाह मकानारे ॥ दोनों दिन खोजि हम देखे सतनाम मन मानारे ॥ देवल जाऊँ तो पत्थर पूजा तीरथ जाऊँ तो पानीरे ॥ आसपास पकिमा दीनी पत्थर न बोला बानीरे ॥ ओछी बुद्धि अगोचर बानी सो गति विरले जानीरे ॥ गुरुका सबद बसे जिस घरमें सोई सतब्रह्म जानीरे ॥ तुरक मसीत देहरा हिन्दू दो बिच राम खुदाईरे ॥ तहां मसीत देहरा नाहिं जहां अगम ठकुराईरे ॥ विन गुरु ज्ञान भरोसा किसका सरनो किसके रहियेरे ॥ कहैं कवीर एक तरवर फूला उपजी अनहद बानीरे ॥
कहरा ६-पंछी एक चौँच विन पगका विन पंख उडि आवैरे ॥ अलष अलेष लषै तन मनमें जोरे तनक डुई जावैरे ॥ गगन मंडलमें उसका वासा अनहद नाद बजावैरे ॥ डुइकै बीच ब्रह्मका वासा सतगुरु होय लषावैरे ॥ मांको मारि बापको बांधे घरमें अगिन लगावैरे ॥ काम क्रोधका करै पियाला निरत सुरत ठहरावैरे ॥ सलिल न्हाई देखि जमुना कौं भंवर फाकौं धावैरे ॥ नाम कमलकौं समकरि राखै अठसठ चार मिलावैरे ॥ बंक
(७१८)
कबीरपंथी—
नालकों गहि कर पकरै सुषमन सिखर चढावैरे ॥ घरके घेरि घेरि घरही में उलटि उलटि परचावैरे ॥ अनहद बाजै मधुर धुनि गाजै आपा सब विसरावैरे ॥ परम हंस जहाँ केल करत हैं सत-गुरु सहज लषावैरे ॥ हुइ निहचंत चिंता सब तजिके सब अल-मस्त कहावैरे ॥ कहैं कबीर ज्ञान गुरगमसैं अटल हुआ लौला-वैरे ॥
कहरा ७—अगम अगोचर ऐसारे । मैं कहि बतलाऊँ कैसारे ॥ जो कहिये सो हइयै नाही है सो कहा न जाईरे ॥ सैना बैना कासौ कहिये गूँगेका गुठ भाईरे ॥ दिष्ट न आवै सुष्ट न आवै विनसैं होइ न न्यारारे ॥ ऐसा ग्यान कथौ गुर गरूए पंडित करौ विचारारे ॥ काजी हाथ कितेब न बाँचै पंडित वेद पुरानारे ॥ वह तो अक्षर लिखा न जावै मात्रा लगे न कानारे ॥ कोई धावै निराकारको कोई धावै अकारारे ॥ वह तो सत दोउन तैं न्यारा जाने जाननहारारे ॥ समझा होइ सो सबद विचारै अचरज है अनजानारे ॥ समझ न परै ग्यान मतहीना आवागमन समा-नारे ॥ रागी वाणी पठना गुनना बहु चतुराई भीनारे ॥ उतपत्त परलै कबहुँ न आवै सो सत विरले चीन्हारे ॥ जिन चीन्हा सो लोक समाने अमरलोक निज सूझैरे ॥ कहैं कबीर नामको कहिरा महिरा होइ सो बूझैरे ॥
कहरा ८—ऐसा मंदिल रचा विनानी सो गत विरले जानीरे॥ अष्टधातका किया गिलावा दरज अन्तूठी ठानीरे ॥ दोनों खंभ दसौ दरवाजा चौका सचौक पुरायारे ॥ पाँचो करी पचीसौ की रचना ऐस । महल बनायारे ॥ दस दिगपाल देहके माहीं जिनकी दस दस नारीरे ॥ निस दिन केल करे घट भी इच्छा सकलर विचारीरे ॥ नौके परै निरंतर शोभा तहां सरस इक छाजारे ॥
शब्दावली
(७१९)
द्विष्ट मुष्ट तँ अगम अगोचर ऐसा गढका राजारे ॥ कोट गियान सबद तहाँ उचरै सुनौ सत परवानीरे ॥ कहैं कवीर बद्र नहि चीन्है बादकी करावे ग्यानीरे ॥
कहरा ९-संसा मेटि लगे गुरचरनौ सतनाम मुख बोलौरे ॥ या तरवर एक बसे पखेरु आ चुगत जुगन लिये डोलैरे ॥ यह पंछी कोई मोहि बतावे जो घट माहीं बोलैरे ॥ याकी संधि लखै जन कोई कौन ठमहि बोलैरे ॥ आवै संझ उडि जाइ सवेरा गम न काहू देवैरे ॥ दरमत छाँड अनंद घर छावै पंछी बसेरा लेवैरे ॥ दूइ फल चाखि नषर वह आगै और नहि दस दीसारे ॥ कहै कवीर साध कोई जाने सतनामकी आशारे ॥
कहरा १०-सुनो संत इक निरगुन कहरा महरा होय सो बूझैरे ॥ तनसे न्यारा मनहुसे न्यारा देउ द्विष्ट होइ सूझैरे ॥ विन नैनन जहाँ सब कछु दीखै विन सरवन सुनै वानीरे । विना नाशिका वास सुवासा घट रस पावै ग्यानीरे ॥ विना जिभ्या जहाँ अमृत भोजन विन इंद्दी संजोगारे । पांच पचीस जहाँ हैं नाहिंनहीं संजोग बिजोगारे ॥ रूपरेख विन निरगुननामा सत गुरु लखावैरे । कहैं कवीर नामकी महिमा ग्यानी होय सो पावैरे ॥
कहरा ११-वा घरकौ कोई मोहि बतावो जा घरसैं ब्रह्म आयारे ॥ काया छाँडि चले जब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ मैं मेरी ममताके काजैं बारहिबार ठगायारे । समझ न परत ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ अब मेरी प्रीति नामसौं लागी उलटि निरंतर धायारे ॥ सहजै सुषुमनि पाउ पलौटे निज धनी अपनायारे ॥ नहीं जहाँ चंद्र नहीं जहाँ सुरा जहाँ जाइ मठ छायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि माहीं सहजै सहज समायारे ॥
(७२०)
कवीरपंथी-
कहरा १२-जोरा जोर रचा जुग ऊपर संतौ करौ विचारारे॥ एक ओर सुरनर मुनि ठाढे एक अकेली मायारे ॥ पाराखिको पानपटारी सिर ब्रह्मोको झाहीरे ॥ नाथ मछंदर पीठि दै भागे गोरख पैज सम्हारिरे ॥ नारद केरि निशान ठवाये हनमत हांक इकारिरे ॥ ऋषि से वनमें लूटे शंकर नेजा धारीरे ॥ वृन्दावनकी कुंज गलिनमें लूटे कुंज विहारीरे ॥ कहैं कवीर पाषरिया लूटे रइयत कौन विचारिरे ॥
कहरा १३-मन मतवारा नाम रस पीवै गगन मँडल गुन गावैरे । नाम सुधा रस भर भर पीवै सुषुमन सुरति मिलावैरे ॥ ग्यान सुराही भरे कलवरिया छकि २ मोहि छकावैरे । साध संत मिलि पीवन लागै अनहद धुनि मुनि पावैरे ॥ सतगुरु दया बहु कीनी घट घट अलख लखावैरे । दास कवीर कहरा गावै महरा होय सो पावैरे ॥
कहरा १४-चुनरी हमारी पियने सुधारी ओढेगी पिय की प्यारीरे । हूठ पैडकी बनी चुनरियां या चौपाट अपारीरे ॥ बिनहीं ताना बनी है चुनिरिया बहु विधि रूप सम्हारिरे । चांद सूरज दोऊ अबलां लगाये जगमग जोति उज्यारीरे ॥ पांच पचीस वाके पैबंद लागे ओढेगी री ज्ञनवारीरे । कहैं कवीर साधु भल सोई एक नाम व्रत धारीरे ॥
कहरा १५-गगन युफामें पैठि क्यों न देखो जहां पुरुष इक ऐसारे । दिष्ट न सुष्ट न अगम अगोचर जाने जो तैसारे ॥ तामैं हम सोई हम मांही पकरि देहुं क्या भैंसारे । सतगुर सबद परष जब आवै परषन कौं क्या पैसारे ॥ समझे सबद समझ घट आवै वह जैसेका तैसारे । कहैं कवीर सुनो तुम साधो है हम मैं हमहै सारे ॥
शब्दावली
(७२१)
कहरा १६-अबगत नगर बसौं भाई हंसा आवागवन मिटा-ईरे । काल अकाल जंजाल न व्यापै तिहि पुरवतन कराईरे ॥ उदै नहिं अस्त दिवस नहीं रजनी पाप पुत्र नहीं दोईरे । मोक्ष न सुकति जनम नहिं बंधन उपजे मरे न कोईरे ॥ ब्रह्म सहर जहां निर आलम है अलष पुरुष किंछु होईरे । कहैं कवीर अमरपुर वासा इह सुख जाने सोईरे ॥
कहरा १७-जिनके सुभाग भाग बड़ पियासौ सोईं नारि सुहागिनरे । जो तूं पियकी आज्ञा मानै कबहु न होत दुहागिनरे ॥ जो पिय मारे पाऊं न टारे सहई कठिन कसौटीरे । जो पिय मारे गहि झिझकारै पियके चरन पलोटेरे ॥ उलटि घटा अनहद घहरानी बाजत अनहद तूरारे । सरग उडि कागदकी गुडिया सुरत डोर कर पूरारे ॥ जो कबहुं छुटि जाई हाथसौं तो सब होत बिगारारे । उर अन्तर निरबान पुरुष है पुहुष दीप उजियारारे । ताहि लचै कोई संत विवेकी सुषमन सुरति लगावैरे । दास कवीरका निरगुन कहि रामहि रम होई सो पावैरे ॥
कहरा १८-पुरुष पुरातम वसै अपारा ताहीं सै नेह लगावौरे । पुदगल रूप दियो करतानै शील कंकन पहिरावौरे ॥ भाउ भगतका करौ चोलना ग्यान भूत रमावौरे । या घट भीतर ब्रह्म विचारौ खोज अगमका पावौरे । शील संतोष ग्यान धुनि लागी अधिक नेह नहीं छूटेरे । जो कहूं छूटि परै भै माहीं पकरि जम तब लूटेरे ॥ चांद सूरजकी बनी पलकिया चढ़ि चलो देश हमारारे । अमर लोक हंसनका वासा दरसै दूरस अपारारे ॥ अमृत फलका भोजन पावे हुइहै मगन दिवानारे । कहैं कवीर नामको कहिरा बूझे संत सुजानारे ॥
कहरा १९-तेरे तो कारन मेरे मन मोहन ढूँढा देश विदेशारे ।
(७२२)
कवीरपंथी-
सब फिरि आया कहुँ न पाया किनी तपसी की भेसारे ॥ तीरथ वरत बहु विधि कीना धूप शीत तन गारारे । तेरे कारने मेरे मन मोहन पांचो इंद्री जारारे ॥ सरवन सुनले विषकी बातें अब इम- रत चितधारारे । नाहीं विषकी वास सुहाती अब सत सबद सुवासारे ॥ नैन विषै रस माते फिरते अब निज रूप निहारारे । जिभ्या षट रससे लुभानी अब तो नाम रस पीयारे ॥ पांचो इन्द्री विषै रस मानी लाज कान नहीं कायारे ॥ त्रिपति भई सब पांच पचीसौ घरही बैठे आयारे ॥ गुर गम नाम अमीरस प्याया पियत परमपद पायारे । दास कवीर सुषमना वासी गगन पयाना दीयारे ॥
कहरा २०-धागा टूटा गगन विनसि गया हंसा कहाँ समाई रे । इह अचरज मोहि निसि दिन व्यापै कोई न कहै समझाईरे ॥ धर नाहीं घरन नाहीं धरावन हारा नाहीरे । इंगला पिंगला सुषमन नाहीं यह गुन कहाँ समाहीरे ॥ सबद अतीत रहै संग रमता यह गुन कहाँ समाईरे । टूटी जुरै जुरी फिरि टूटै जब तब होइ विनासारे । तबको साहिब अबको सब कहु काको बिसवासारे । सीषै सुनै कहै कहा होई जो नहि पढ़िँ समानारे । कहैं कवीर गगन नहि विनसै यौ धागा उन मानारे ॥
कहरा २१-सुनौ सियानी अकथ कहानी पिय अपनेका लेवो रे । जो धन तुमको पियने सौंपा सो धन बाद न पौवो रे ॥ गहि मारै और धरि झिझकारै कैसे सहो कसौटीरे ॥ जो मारौ तो पाउ न टारौ अबै सुरति लौ लाऊरे ॥ घरमै रहौ कै आँगन ठाढी सतसौ नेह न छांडौरे ॥ कागद गुडिया सरग उडानी सुरति डोरि मति डांडौरे ॥ जो कबहुँ छुटि जाइ हाथसौ तो सुख नींद न सोवौरे ॥ एक सतवंती पिय संग गवना रहत पियाके संगारे ॥
शब्दावली
(७२३)
एक सतवंती पिय संग जरई झरत न मोरै अंगा रे॥ पांच पचीस संगके रोवै वह सुख मंगल गावै रे॥ पूरवको सूरज पछिम दिस ऊगे सतिया सत न छाँडे रे॥ बूढी बैस सुहागन सोहै बालम हाथ न आवै रे॥ दास कवीर पढे यह कहिरा महिरम होइ सो पावै रे॥
कहरा विलरी २२-विलरी विलोह तंत मथ हंसा आगे करौ पयाना हो। झंड़ा रोपि गमन कर हंसा पावौ अगम निसाना हो॥ सूरजका द्वार उलटि गहु हंसा चंद लगन गहु बाटा हो। दुइ विलरी दुइ दिसा समनिया निरपै इक घाटा हो॥ इस विधि विलरी सधि चल हंसा सुरति कमलकी जोटा हो। बजर सीला जब उघरै हंसा निकसि जाइ सब षोटा हो॥ मध्य अकार धरमका आसन बाजन बजै अपारा हो। उठै धूम जहां तुरही बाजै नरसिंघा झनकारा हो॥ उठै तरंग जहां नौबत बाजै भांति भांतिके रागा हो। जहां बैठे हैं हंस वरन वरनके अति अनूप सब वागा हो॥ सात सुन्न पर सत्रह बाजा कँगुरा कँगुरा छाजा हो। जिहि सब करी पसारा चीन्ह चलौ हंसा राजा हो॥ आदि पुरुष जहाँ बैठे विदेही जगमग जोति अपारा हो। वामैं यह निज हंस उबारन धरि मन करहु विचारा हो॥ यही सबद तुम निज करि चीन्हौ उत्तरो भौजल पारा हो। कहैं कवीर त्रिवाचा पालौ सांचा सबद अपारा हो॥
कहरा विलरी २३-सब संतन मिलि सुरति विचारी सतसैं प्रीति लगाई हो। अमृत गहिके अमृत सुधारे डुरमति दूर विहाई हो॥ चित्त चौका संतोष बैठका प्रीतिकी पातुरि लावौ हो। ग्यानै गारि छान पट गाढ़े भावको भात बनावौ हो॥ प्रेमकी खांड परोसौ हितकै ततको तंत मथावौ हो। लौकौं लेवौ जुगतकौं जेवो सब संतन मिल पावौ हो॥ मानकी कपटी दीन दही कर जोरो संग छगावौ हो। निहनो नोन पीसकर लावौ तामैं तुरत मिलावौ हो॥
(७२४)
कवीरपंथी—
बिरहको बरा बनाइ जतन सौं पानी पूरन भिजावौं हो । हित करि हेत हिये हिरदेसौं नीको बरा जिमावौं हो ॥ वकनाल सूधा कर बौरी जिन इह बरा बनावौं हो । भाव कर भेटा शील कर सेमी पापर आवा लावो हो ॥ याही तंतसैं हंसा आवै पहुचै लोक हमारो हो । कहैं कवीर सुनो तुम साधो यह निज तंत समारो हो ॥
कहरा २४—अब नहीं तजौ भजौं नहीं कबहुँ जो था सो पहिचानैरे । करी करम भरम गति पाई भरम बिझका फूटा रे ॥ पाप पुत्रतैं रहौ निरंतर करनी संसै छूटा रे । थाके जतन गये छुटि बंधन विधि निषेध परिहरिया रे ॥ उत्तम मध्यम कासौं कहियै तत अखंडित भरिया रे । चंचल अचल चलाचल थाके सुषमनि सुरति समानी रे ॥ कहैं कवीर स्थिर पद दरसे मिटिगइ आवा जानीरे ॥
कहरा २५—ना मैं धर्मी ना मैं अधर्मी ना मैं कामी अकामीरे ॥ ना मैं श्रोता ना मैं वक्ता ना मैं सेवक स्वामीरे ॥ ना मैं गुपता ना मैं सुक्ता ना निरबंधी सरबंधीरे । ना हम काहुते न्यारे रहते ना काहुके संगीरे ॥ ना हम सुरग लोकको जाते ना हम नरक सिधारै रे ॥ सबै करम हमहीने कीने हम करमनतैं न्यारैरे ॥ इह विवेक कोई विरला बूझै जो सतगुरुको भेटैरे । मत कवीर काहुको थापै मत काहुको भेटैरे ॥
कहरा २६—दिष्ट परैसौं मायारे दिष्ट परै सो मायारे ॥ वह तो अचल अलेष एक है दिव्य दिष्टि मैं आयारे ॥ सतगुरु दियो लखाई आपमें है माही सत सोईरे । दूजो किरतम थापि लियौ है मुक्ति कहांते होईरे ॥ काया पराई त्रिगुन ततकी विनसि जाई छिन माहीरे । निरगुन ब्रह्म लखौ घट अंतर जो विनसनमें नाहीरे ॥ ऐसे सदा देहगति सबकी महरम कोई उचारैरे । आपही होइ न्यायी करि न्यारो इहि विधि माया विचारैरे ॥
शब्दावली
(७२५)
सहजै रहै समाइ सब रूपैना कहूं जाइ न आवैरे । धरे न ध्यान करे नहिं जप तप राम रहौम न गावैरे ॥ तीरथ वरत दोऊ फल त्यागे सुन्न दौरि नहीं धावैरे । यह संसै जब समझ परैगी पूजै काहि पूजावैरे ॥ जोग जुगतिसौं करम न छूटे जो पै आपा आपन सूझैरे ॥ कहैं कवीर ते जन गहये जे कोई समझै बूझैरे ॥
कहरा २७-मनषा जनम सुधारौ संतो धोखै कहा विगावोरे ॥ गुड गुडीका ख्याल छांडि देहु आतम तत लौ लावैरे । जब लग घटमें परचै नाहीं तब लग कछु न पावैरे ॥ नेम वरत और जप तप संजम यह करनी मति भूलौरे ॥ करम फन्द जुग जुग गल पहिरे फिरि फिरि जोनी झूलौरे ॥ ना कुछ नहाये ना कुछ धोये ना कछु घंट बजायैरे । ना कुछ नेती ना कुछ धोती ना कछु नाचे गायैरे ॥ से लीन सिंगी जटुआ न बटुआ आप स्वांग से न्यारारे । कहैं कवीर मुक्ति तब पावौ गहौ जु सबद हमारारे ॥
कहरा २८-वंझा एक सुपनमें सूती पूत जना अति लोनारे ॥ बहुतक दान दिये विपरनकौं बहु रूपा बहु सोनारे ॥ फिरि सुपनेमें सुपना देखा व्याहि पूत घर आनारे । आवत ही मरिगया पूत हूआ रोवन पीटन ठारीरे ॥ यह संसार सुपनसम देखा कहैं कवीर विचारीरे ॥
कहरा २९-अरे मन महरा करहु सिताबी बिलम किये भल नाहीरे । एक नवरिया पांच खिवटिया घरमराइको साहीपीरे ॥ पहिली धारा वेद कितेबा हिंदू तुरुक मिलि धाईरे । दूजी धारा काम किरोधा ओहीमें बहि जाईरे ॥ तीसरी धारा कर्मकी फांसी जाइ लगा संसारा रे । चौथी धारा नौ औतारा राम किसन गुनवारारे ॥ पचवीं धारा जोतिसरूपा हिंदू तुरुक मिलि धायारे ॥
(७२६)
कवीरपंथी—
घटवरिया मोहि जान न देसी घाटहीमें लेख चुकायारे ॥ कहैं कवीर मेरा साथ विवेकीषी धारासे रहा हुइ न्यारारे ॥
कहरा ३०—वा घरकी कोइ मोहि बतावौ जा घरसैं ब्रह्म आया रे ॥ काया छाँडि चले तब हंसा तब ब्रह्म कहाँ समायारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश न होते आदि न होती मायारे । रज वीरज दोनों नहीं होते तब ब्रह्म कहाँ रहायारे ॥ पवन पानी मिलि दही जमाया अग्निका जामन दीयारे । चंद सूरज दोनों करत षवासी घोर मथन घृत कीयारे ॥ मैं मेरी ममताके कारन बारहौं बार ठगायारे । अजहुँ समझि ग्यान मति हीना फिरि फिरि भटका खायारे ॥ सुरति सुहागिन चरन पलौटे धनी आपना पायारे ॥ जिनकी सुरति लगी सत सबदे उलटि निरंतर धायारे ॥ चांदौ सूरज दिवस नहीं रजनी जहाँ सुरति लौलायारे ॥ कहैं कवीर ग्यान धुनि उपजी सहजै सबद समायारे ॥
कहरा ३१—आपही आप इच्छना धारी इच्छा बेल पसारिरे ॥ आप अपारु इच्छा धारु बहु विधि रूप सम्हारीरे ॥ इच्छा माँहि बीज विस्तारा मूल पत्र ओ डालीरे । पेड और डाल फूल फल सबही वा माहीं है सारीरे ॥ चौंसठ चौक पूर जब करकै ले आपुन आप माहीरे । कहैं कवीर यह एकम एका और दूसरा नाहीरे ॥
कहरा ३२—अविगत अगम अपार अशेषा रूप वरन नहीं भेषारे दिष्ट न सुष्ट लषा नहीं जाई न काहुन पेषारे ॥ वाकी महिमा कहाँलौ वरनौ मो पै वरनि न जाईरे ॥ ऐसा अलष लषै नहिं कोई ना काहु दिया दिखाईरे ॥ अपरमपार अपार अखंडा घटमें रहा समाईरे ॥ जिन कछु खोज पिंडका कीया सेनहि सेन बताईरे ॥ ब्रह्मंड नौ षडपिंड माँहि पूरि रहा गुर पूराये ॥ कहैं कवीर गगन धुनि माहीं बाजत अनहद तुरारे ॥
शब्दावली
(७२७)
कहरा ३३-तन धरि सुषिया कोई न देखा जो देखा सो दुखियारे ॥ ऊगन आथनकी बात कहत हौ सबका किया विवे- षारे ॥ ब्रह्मा विष्णु महादेव दुखिया जिन यह राह चलाईरे ॥ सुखदेव आचारी दुखके कारन गरभहि माहि छपाईरे ॥ राजा दुषिया रानी दुषिया एक दुषी धनहीनारे ॥ जोगि दुखी और जंगम दुखिया कपटीको दुख दूनारे ॥ आशा तूष्णा सब घट व्यापै कोइ महल नहीं सूनारे ॥ घाट वाट तो सब जग दुखिया क्या गेही पटगीतारे ॥ कहे कवीर यह सब जग दुखिया कोई संत सुखी मन जीतारे ॥
कहरा ३४-सतगुरु आइ करी निज दाया अब हम आया चीन्हारे ॥ निज बुध रूप पिरापत नितही अचरज सहीछु कीन्हारे ॥ ना हम मनुष देवता नाहीं ना गेही वन पंड़ीरे ॥ ब्राह्मन छत्री वेसहू नाहीं ना हम सूदर डंडीरे ॥ ना हम जोगी ना हस जंगम ना हम तपी सन्यासी रे ॥ ना वैरागी ना ब्रह्मचारी ना हम जपी उदासीरे ॥ ना हम ज्ञानी चतुर न मूरख ना पंडित न पोथीरे ॥ ना हम शायर ना मरजीवा ना हम सीप न मोतीरे ॥ ना हम गगन सुन्न भी नाहीं ना हम तेज न पानीरे ॥ मन बुधि चित अहंकार भी नाहीं ना हम वेद न वानीरे ॥ ना हम अमर मरै नहिं कबहुँ हम कवीर ज्योंका त्योंहीरे ॥ व्यास कपिल और वामदेव ऋषि सबकी अनुभव यौहीरे ॥
कहरा ३५-ग्यान विचारन ग्यान विचारन ग्यान विचारन जोगीरे ॥ रहै उदास सबसे सबहुनमें सुषमनि सुरति संजोगीरे ॥ जैसे कमल रहै जल भीतर जलसे रहत निनारारे ॥ ऐसे साधु रहै जगमाहीं परम तत्व निखारारे ॥ जैसे धाइ बालको पोषै अपनो जानत नाहीरे । करम करै करता न कहावै यौ साधु जग
(७२८)
कबीरपंथी—
माँहोरे ॥ उदैं भयो तिमर सब खोया अंधकार सब नासारे । कहैं कबीर विचार अभै पद निहतत निजवासारे ॥
कहरा ३६—हम तो भरम विसारि डारिकै एक एक करि जानारे । दूजा कहै गहीकै दूजा जिन नाही पहिचानारे ॥ एकै पवन पावक औ पानी और पानी एकै जुत संसारारे ॥ एक खाख गढे बहु भांडे एकै सिरजन हारारे ॥ जैसा बढई काठे काटै अगिनि न काटै कोईरे ॥ ऐसे व्यापि रह्यो अभिअंतर धरैं सरूपा सोईरे ॥ माया मोहकरि जगत भुलाना अर्थ देखि पतियाना रे ॥ होइ निरशंक कछू नहीं व्यापै कहैं कबीर गियानारे ॥
गौरी प्रारम्भ ।
गौरी १—संतो मन चीन्हो रे भाई । मन चिन्है विना परलैतर जैहौ जीवको जमले जाई ॥ टे० ॥ मन चिन्है ते हंस हमारा । तजे खलककी आस ॥ छूटै पिंड काल नहि पावै । पावै मुक्ति निवास ॥ मूल लेखामैं जीव जो आवै । दुविधा दूर बहाइ ॥ पुरुष नामको सुमिरन करिकै । अगर डोरि चढ़ि जाइ ॥ निशि दिन सुरति करै साहिबसों । सबद हेत लिय बोले ॥ कहैं कबीर सुनो भाई संतो । सो जीव कबहुँ न डोले ॥
गौरी २—जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । तेरो नाम न कोईलैहै ॥ ॥टेका॥ सूखै ताल नीरकै निबडै सूखै कमल कुंमलैहै ॥ सूखै पुरइन सरकी शोभा । जित तित धूर उडैहै ॥ जब लग तेल दीप में बाती । दिष्ट पडे सब कोई ॥ निपटै तेल बीत गइ बाती । जग अंधियारा होई ॥ जा प्रीतमसो प्रीति करत हैं । ताहीको अंग डरिहै ॥ दूर करो मंदिरसों बाहिर । प्रेत भया धरिखैहै ॥
शब्दावली
(७२९)
दिन दोय चार नाम भजि लेहू । काल अचानक खेहै ॥ कहैं कवीर जगतका वासी । निकस पयाना देहै ॥
गौरी ३-मन रे जागत रहिये भाई । गाफल होय वस्तु मत खोवै ॥ चोर सुसे घर जाई ॥ टे० ॥ षड् चक्रकी कनक कोठरी वस्तु भाव है सोई ॥ ताला कुंजी कुलफ कर लागे उघड़त बार न होई ॥ पांच पहरवा सोय गया है वस्ती जगवा जागी ॥ जरा मरन व्यापै कछु नाहिं गगन मंडल लव लागी ॥ कर विचार मन ही मन उपजी ना कहूँ गया न आया ॥ कहै कवीर संशय जब छूटे नाम रतन धन पाया ॥
गौरी ४-डग मग छाड़ि दें मन बौरा ॥ अबतो जै बिन आवै लीन्हो हाथ सिधौरा ॥ टे० ॥ पहिर जंजीर पैठि रन भीतर जूझ मरे नहीं भागे ॥ जन्म मरनकी आशा छोड़ै सो पग धारे आगे ॥ होय निःशंक मग्न होय नाचो लोभ मोह भरम छाड़ो ॥ सूर कहाँ मरन सो डरपै सती न सांचौ मांडौ ॥ अग्नि जै सो सती न कहावे जूझ मरे नहीं सूर ॥ ब्रह्म अग्निमें यह तन होमैं सो पद पावे पूरा ॥ लोक लाज कुलकी मरजादा येही गलेमें फांसी ॥ आगे होय पग पीछे धरि हैं होय जगतमें हांसी ॥ ये संसार सकल जग मैला नाम भजे ते सूचा ॥ कहैं कवीर हरि भक्ति न छांडो गिरत परत चढ़ि उंचा ॥
गौरी ५-नट होय नाच रे मन मेरा जो रीझै साहिब तेरा ॥ टेक ॥ ज्ञानको ढोल बजाय रैन दिन शब्द सुने सब कोई ॥ राह केत गह जब कोपै जम घर बंधन होई ॥ द्वादश तिलक बनाये बांस चढ़ि जग तजि होय रहो न्यारा ॥ सहस्र कला होय नाचे मन मोरा रीझैगा साहेब प्यारा ॥ जो रीझै जगदीश जगतगुरु देगा दान बुलाई ॥ भरी सभामें चोला बकसे फाटि कबू नहिं
(७३०)
कवीरपंथी—
जाई ॥ जो तू कूदि जाये भवसागर कला बता दूँगा तेरी ॥ कहैं कवीर सत ब्रत साधो, नव निधि होय रहै चेरी ॥
गौरी ६—जगमें काहु न मन वश कीन्ह। भारत खंडमें भरतसे ग्यानी भ्रुग सुत मन हर लीन्ह। ॥ टे० ॥ भृंगी ऋषि सो वनमें रहते, विषय विकार न जाने ॥ पठई नारि भूप दसरथने, पकड़ि अजोध्या आने ॥ सूखे पत्र पवन भस्त्रि रहते पाराशरसे ज्ञानी ॥ भरमें रूप देखिकै गनिकाको काम कंदला वानी ॥ जमदग्निकी नारि रेनुका, गयी यमुना जल लेने ॥ भरमि देखि भूपको मन्दिर, थकित भये दो नेने ॥ सोई सुरपति जाके नारी सुचीसी, निश दिनही संग राखी ॥ गौतम घर काम निहोर वसि, निगम कहत है साखी ॥ पार्वतीसी पत्नी जाके, ताके मन क्यों डोले ॥ खलित भये छबि देखि मोहिनी, हाहा कह कह बोले ॥ येक ही नाल कमल हित ब्रह्मा, जग उपराज कहावैं ॥ कहैं कवीर एक मन जीते विना, जीव विसराम न पावे ॥
गौरी ७—मनसा बिन दौड़े न रहैरे । जो मैं राखों जग जुगति सो, छिन छिन मोहि दहैरे ॥ टे० ॥ यह गयंद पांचों मद माते, आँकुशको न सहैरे ॥ नाम सुने रंग राते नाही, विषकी वेल गहैरे ॥ समझत नाहि मूठ मारगको, उबट राह बहैरे ॥ अरध मास भादोंकी नदिया, वे मरजाद बहैरे ॥ सीखे सुने गावे बहु तेरे, कोई यक राह न रहैरे ॥ कहैं कवीर यह भगत दुहेली, विरला जन निबहैरे ॥
गौरी ८—मन तू थकत थकत थकि जाइ । विन थाके तेरा काज ना सरिहै, फिर पाछे पछिताई ॥ टे० ॥ जब लग तू सरजीव रहत है, तब लग परदा भाई ॥ टूटि जाये ओट तिनकाकी, जो मन शिखर दह जाई ॥ सकल तेज तजि होय नपुंसक, या मति