कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(९३०)
कबीरपंथी—
पूजा तिन जहंढाया ॥ टेक ॥ अंड न पिंड प्रान नहिं देहा । काटि काटि जिव केतिक एहा ॥ बकरी मुर्गी कीन उछेहा । आगिल जनम उन अवर लेहा ॥ कहहिं कवीर सुनो जन लोई । भुतवाके पुजले भुतवे होई ॥ १०६ ॥
शब्द ४९४—भैवर उड़े बग बैठे आया । रैन गयी दिवसो चलि जाया ॥ हल हल कांपे बाला जीव । ना जानो का करिहै पीव ॥ कांचे बासन टिकै न पानी । उडिगौ हंस काया कुंभिलानी ॥ काग उडावत भुजा पिरानी । कह कवीर यह कथा सिरानी ॥ १०६ ॥
शब्द ४९५—खसम विनु तेलिके बैल भयो । बैठत नाहिं साधुकी संगति, नाधे जनम गयो ॥ टेक ॥ बहिबहि मरै पंचे निज स्वारथ, जमके दंड सहो । धन द्वारा सुत राज काज हित, माथे भार गहो ॥ खसमहिं छाडि विषय रंग माते, पापके बीज बयो । झूठ मुकुति नर आशु जीवनकी, प्रेतको जूठ खयो ॥ लख चौरासी जीव जोइनमें शायर जात बहो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, स्वानकी पूछ गहो ॥ १०७ ॥
शब्द ४९६—अब हम भैल बहिर जल मीना । पूरब जनम तप कामद कीना ॥ टे० ॥ तब मैं अच्छलों बन बैरागी । तजलों कुटुम्ब राम रट लागी ॥ तजलों काशी मैं मति भोरी । प्राननाथ कटु को गति मोरी ॥ हम चलि गेलौ तुम्हरी सरना । कतहुँ न देखलौ हरिजिको चरना ॥ हमहिं कुसेवक कि तुमहिं अयाना । दुइ महाँ दोष काहि भगवाना ॥ हम चलि गेल तुम्हारे पास । दास कवीर भल कैल निराशा ॥ १०८ ॥
शब्द ४९७—लोग बोले दुरि गये कवीर । या मति कोइ जाने धीर ॥ टेक ॥ दशरथ सुत तिहुँ लोकहिं जाना । राम नामको मरनमें आना ॥ जेहि जिय जान परा जस लेखा । रजुको कहै
शब्दावली
(९३१)
उरगको पेखा ॥ जदपि फल उत्तम गुन जाना । हरिहिं छोडि मन मुकुति अनुमाना ॥ हरि अधार जस मीनहिं नीरा । और जतन कछु कहै कवीरा ॥ १०९ ॥
शब्द ४९८—अपनो करम न भेटो जाई । करमक लिखा मिटै धौ कैसे, जो जुग कोटि सिराई ॥ टेक ॥ गुरु वसिष्ठ मिलि लगनसो धाई, सूरज मंत्र इक दीन्हा । जो सीता रघुनाथ ब्याही, पल इक संजु न कीन्हा ॥ नारद सुनिको वदन छिपायो, कीन्हों कपिको रूपा । शिशुपालहुकी भुजा उपारी, आपन बौध सुरूपा ॥ तीन लोकके करता कहिये, बाल बधो बरियाई । एक समय ऐसी बनि आई, उनहुं औसर पाई ॥ पारवताको बांझ न कहिये, ईश न कहिय भिखारी । कह कवीर करताकी बातें, करमकी बात नियारी ॥ ११० ॥
शब्द ४९९—है कोइ गुरुज्ञानी जगत महं, उलटि वेद को बूझे । पानीमें पावक जरे अन्धे आंखी सूझे ॥ टे० ॥ गइया तो नाहरको खायी, हरना खायो चीता । कागा लंगरे फादिके, बटेरन बाजै जीता ॥ सूसा तो मंजारहि खायो, सियारे खायो स्वाना । आदि को ऊ देश जाने, तासो बैसै बाना ॥ एकहि दादुर सो खायो, पांचों जे भुवंगा । कहै कवीर पुकारिके, है दोऊ यक संगा ॥ १११ ॥
शब्द ५००—झगरा इक बढो जिय जान । जो निरुवारे सो निरबान ॥ टेक ॥ ब्रह्म बडा कि, जहँ ते आया । बेद बडा कि, जिन उपजाया ॥ ई मन बडा कि, जिहिं मन आना । राम बडा कि, रामहिं जाना ॥ भरमि भरमि कविरा, फिरै उदास । तीरथ बडा कि, तिर थक दास ॥ ११२ ॥
शब्द ५०१—झूठे जनि पतियावहु हो, सुनु संत सुजाना । घटहीमें ठग पूर है, मत खोवहु अजाना ॥ टेक ॥ झूठेका मंडान है,
(९३२)
कवीरपंथी—
धरती अशमाना। दसहुं दिशा जाके फन्द है, जिव घरे आना॥ जोग जग तप संजमा, तीरथ बरत दाना। नौधा वेद कितेब है, झूठेका बाना॥ काहूके बचनहिं फुरे, काहू करमाती। मान बड़ाई लेरहै, हिन्दू तुरुक दुइ जाती ॥ बात कथे अशमानकी, मुद्दत नियरानी। बहुत खुदी दिल राखते, बूढ़े विनु पानी॥ कहै कवीर कासों कहौं, सकलो जिव अन्धा। सांचे सो भागे फिरे, झूठेसो बन्धा ॥ ११३ ॥
शब्द ५०२—सार शब्दसे बाँचि है, मानहु इतवारा हो ॥ टेका॥ आदि पुरुष इक वृक्ष है, निरंजन डारा हो। त्रिदेवा साखा भये, पत्ता संसारा हो॥ ब्रह्मा वेद सही कियो, शिव जोग पसारा हो। विष्णु माया उतपति किया, डर ले बेवहारा हो ॥ तीन लोक दशहुं दिश, जम रोकिन द्वारा हो। कीर होय सब जीयरा, लीन्हे विषको चारा हो॥ जोति सरूपी हाकिमा, जिन अमल पसारा हो। करमकी बंसी लायके, पकरो जग सारा हो ॥ अमल मिटाऊ तासुका, पठवौं भव पारा हो। कह कवीर निरभय करों, परखो टकसारा हो ॥ ११४ ॥
शब्द ५०३—संतो ऐसी भूल जग मांहीं। जाते जीव मिथ्यामें जाहीं ॥ टे० ॥ पहिले भूले ब्रह्म अखंडित, झाई आपुहि मानी। झाई मानत इच्छा कीन्हा, इच्छातें अभिमानी॥ अभिमानी करता होय बैठे, नाना पंथ चलाया। वोही भूलमें सब जग भूले, भूलक मरम न पाया॥ लख चौरासी भूलते कहिये, भूलहिं जग विटमाया। जो है सनातन सोई भूला, अब सोइ भूलहिं खाया ॥ भूल मिटै गुरु मिलै पारखी, पारख देइ लखाई। कहहिं कवीर भूलकी औषध, पारख सबकी भाई ॥ ११५ ॥
इति बीजकका शब्द ॥ ११५ ॥
शब्दावली
(१३३)
श्रेदवाणी ।
शब्द ५०४—कर नैनों दीदार महलमें प्यारा है ॥ ८० ॥ काम कोथ मद लोभ बिसारो, शील संतोष छिमा सत धारो । मद मांस मिथ्या तजि डारो, हो ज्ञान चोड़े असवार भरम से न्यारा है ॥ १ ॥ धोती नेती बस्ती पाओ, आसन पदम जुगतसे लाओ । कुम्भक कर रेचक करवाओ, पहिले मूल सुधार कारज हो सारा है ॥ २ ॥ मूल कँवल दल चतुर बखानो, कलिंग जाप लाल रंग मानो । देव गनेश तहैं रोपा थानो, रिध सिध चँवर दुलारा है ॥ ३ ॥ स्वाद चक्र षट्दल विस्तारो, ब्रह्म सावित्री रूप निहारो । उलटि नागिनी का सिर मारो, तहाँ शब्द ओंकारा है ॥ ४ ॥ नाभी अष्ट कमल दल साजा, सेत सिंहासन विष्णु बिराजा । हरिग जाप तासु मुख गाजा, लछमी शिव आधार है ॥ ५ ॥ द्वादश कमल हृदयके माहीं, जंग गौर शिव ध्यान लगाई । सोहैं शब्द तहाँ धुन छाई, गन करै जैजैकारा है ॥ ६ ॥ दो दल कमल कंठके माहीं, तेही मध बसे अविद्या बाई । हरि हर ब्रह्मा चँवर दुराई, जहैं श्रींग नाम उचारा है ॥ ७ ॥ तापर कंज कमल है भाई, बग भौराँ दुइ रूप लखाई । निज मन करत तहाँ ठकुराई, सो नैनन पिछवारा है ॥ ८ ॥ कमलन भेद किया निर्वारा, यह सब रचना पिंड मँझारा । सतसँग कर सतगुरु शिर धारा, वह सत नाम उचारा है ॥ ९ ॥ आँख कान मुख बन्द कराओ, अनहद हिंगा शब्द सुनाओ । दोनो तिल इक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है ॥ १० ॥ चंद सूर एक घर लाओ, सुषमन सेती ध्यान लगाओ । तिरबेनीके संधि समाओ, भोर उतर चल पारा है ॥ ११ ॥ घंटा शंख सुनो धुन दोई, सहस्र कमल दल जगमग होई । तामध करता निरखो सोई, बंकनाल धस पारा है ॥ १२ ॥ डाकिनी बहु किलकारे,
कवीरपंथी शब्दावली ३० अ
(९३४)
कवीरपंथी-
जम किंकर धर्म दूत हकारे। सत्तनाम सुन भागे सारें, जब सतगुरु नाम उचारा है ॥ १३ ॥ गगन मँडल बिच उर्धमुख कुइया, गुरुमुख साधू भर भर पीया । निगुरे प्यास मरे बिन कीया, जाके हिये अँधियारा है ॥ १४ ॥ त्रिकुटी महलमें विद्या सारा, धनहर गरजे बजे नगारा । लाल बरन सूरज उजियारा, चतुर कमल मंझार शब्द ओंकारा है ॥ १५ ॥ साथ सोईं जिन यह गढ लीन्हा, नौ दरवाजे परगट चीन्हा । दसवाँ खोल जाय जिन दीन्हा, जहाँ कुलुफ रहा मारा है ॥ १६ ॥ आगे सेत सुन्न है भाई, मानसरोवर पैठि अन्हाई । हंसन मिलि हंसा होई जाई, मिलै जो अमी अहारा है ॥ १७ ॥ किंगरी सारंग बजे सितारा, अच्छर ब्रह्म सुन्न दरबारा । द्वादस भानु हंस उँजियारा, षट दल कमल मँझार शब्द रंकारा है ॥ १८ ॥ महा सुन्न सिंध विषमी घाटी, बिन सतगुरु पावै नहि बाटी । व्याघर सिंह सरप बहु काटी, तहँ सहज अचित पसारा है ॥ १९ ॥ अष्ट दल कमल पारब्रह्म भाई, दहिने द्वादश अचित रहाई । बायें दस दल सहज समाई, यो कमलन निरवारा है ॥ २० ॥ पाँच ब्रह्म पांचों अँड बीनो, पाँच ब्रह्म निःअच्छर चीन्हों। चार मुकाम गुप्त तहँ कीन्हो, जा मध बंदीवान पुरुष दरबारा है ॥ २१ ॥ दो पर्वतके संध निहारो भँवर गुफातें संत पुकारो । हंसा करते केल अपारो, तहाँ गुरन दर्बारा है ॥ २२ ॥ सहस अठासी दीप रचाये, हीरे पत्रे महल जड़ाये। सुरली बजत अखंड सदाये, तहँ सोहँ झनकारा है ॥ २३ ॥ सोहँ हृद तजी जब भाई, सत्तलोककी हृद पुनि आई। उठत सुगंध महा अधिकार्ई, जाको वार न पारा है ॥ २४ ॥ षोडस भानु हंसको रूपा, बीना सत धुन बजे अनूपा । हंसा करत चैवर शिर भूपा, सत्त पुरुष दर्बारा है ॥ २५ ॥ कोटिन भानु उदय जो होई, एते ही पुनि चंद्र
शब्दावली
(१३५)
लखोई। पुरुष रोम सम एक न होई, ऐसा पुरुष दिदारा है॥२६॥ आगे अलख लोक है भाई, ऐसा अलख पुरुषकी तहँ ठकुराई। अरबन सूर रोम सम नाहीं, ऐसा अलख निहारा है ॥ २७ ॥ तापर अगम महल इक साजा अगम पुरुष ताहिको राजा। खरबन सूर रोम इक लाजा, ऐसा अगम अपारा है ॥ २८ ॥ तापर अकह लोक है भाई, पुरुष अना मय तहां रहाई। जो पहुँचा जानेगा वाही, कहन सुनन ते न्यारा है॥२९॥ काया भेद किया निरुवारा, यह सब रचना पिंड मँझारा। माया अविगत जाल पसारा, सो कारीगर भारा है॥३०॥ आदि माया कीन्ही चतुराई, झूठी बाजी पिंड दिखाई। अवगत रचन रची अँड माहीं, ताका प्रतिबिंब डारा है ॥ ३१ ॥ शब्द बिहंगम चाल हमारी, कहैं कवीर सतगुरु दइ तारी। खुले कपाट शब्द झनकारी, पिंड अंडके पार सो देश हमारा है ॥ ३२ ॥
शब्द ५०५-कर नैनो दीदार यह पिंडसे न्यारा है। तू हिरदे सोच विचार यह अंड मँझारा है ॥ टेक ॥ चोरी ज़ारी निदा चारो, मिथ्या तज सतगुरु शिर धारो। सतसँग कर सत नाम उचारो, तब सनमुख लहो दिदारा है ॥ १ ॥ जे जन ऐसी करी कमाई, तिनकी फैल जग रोशनाई। अष्ट प्रमान जगह सुख पाई, तिन देखा अंड मँझारा है ॥ २ ॥ सोई अंडको अवगत राई, अमर कोट अकह नकल बनाई। शुद्ध ब्रह्म पद तहँ ठहराई, सो नाम अनामी धारा है ॥ ३ ॥ सातवीं सुत्र अंडके माहीं, झिल- मिलाहटकी नकल बनाई। महा काल तहँ आन रहाई, सो अगम पुरुष उच्चारो है ॥ ४ ॥ छठवीं सुत्र जो अंड मँझारा, अगम महलकी नकल सुधारा। निरगुन काल तहाँ पग धारा, सो अलख पुरुष कहु न्यारा है ॥ ५ ॥ पंचम सुत्र जो अंडके माहीं, सत्त-
(९३६)
कवीरपंथी—
लोककी नकल बनाई। माया सहित निरंजन राई, सो सत्त पुरुष दीदारा है ॥६॥ चौथी सुत्र अंडके माहीं, पद निरबानकी नकल बनाई। अविगत कला है सतगुरु आई। सो सोहं पद सारा है ॥७॥ तीजी सुत्रका सुनो बडाई, एक सुत्रके दोय बनाई। ऊपर महासुत्र अधिकाई, नीचे सुत्र पसारा है ॥८॥ सतवीं सुत्र महाकाल रहाई, तासु कला महासुत्र समाई। पारब्रह्म कर थाप्यो ताही, सो निःअच्छर सारा है ॥९॥ छठवीं सुत्र जो निरगुन राई, तासु कला या सुत्र समाई। अच्छर ब्रह्म कहैं पुनि ताही, सोई शब्द रंकारा है ॥१०॥ पंचम सुत्र निरंजन राई, तासु कला दूजी सुन छाई। पुरुष प्रकिरती पदवी पाई, शुद्ध सरगुन बचन पसारा है ॥११॥ पुरुष प्रकृति दूजी सुन माहीं, तासु कला परथम सुन आई। जोत निरंजन नाम धराई, सरगुन स्थूल पसारा है ॥१२॥ परथम सुत्र जो जोत रहाई, ताकी कला अविद्या बाई। पुत्रन सँग पुत्री उपजाई, यह सिंध बेराट पसारा है ॥१३॥ सतवें अकाश उतर पुनि आई, ब्रह्मा विष्णु समाधि जगाई। पुत्रन सँग पुत्री परनाई, यह शृंग नाम उचारा है ॥१४॥ छठे अकाश शिव अवगति भौरा, जंग गौर रिधि करती चौरा। गिरि कैलाश गन करते सोरा, तहैं सोहं शिर मौरा है ॥१५॥ पंचम अकाशमें विष्णु बिराजे, लछमी सहित सिंहासन गाजे। हिरिंग बेकुंठ भगत समाजे, जिन भक्तन कारज सारा है ॥१६॥ चौथे अकाश ब्रह्मा बिस्तारा, सावित्री सँग करत बिहारा। ब्रह्म रिधि ओं पद सारा, यह जग सिरजनहारा है ॥१७॥ तीजे अकाश रहे धर्म राई, नरक स्वर्ग जिन लीन्ह बनाई। करमन फल जीवन भुगताई, ऐसा अदल पसारा है ॥१८॥ दूजे अकाश में इन्द्र रहाई, देव सुनी बासा तहैं पाई। रंभा करती निरत सदाई,
शब्दावली
(९३७)
कलिंग शब्द उच्चारो है ॥ १९ ॥ प्रथम अकाश मृत्यु है लोका, मरण जनम का नित जहँ घोखा । सो हंसा पहुँचे सत लोका, जिन सतगुरु नाम उच्चारो है ॥ २० ॥ चौदह तबक किया निरवारा, अब नीचेका कहों सुनो विचारा, सात तबक में छः रखवारा । भिन भिन सुनो पसारा है ॥ २१ ॥ शेष धौल बाराह कहाई, मीन कच्छ औ कुरम रहाई । सो छः रहे सातके माहीं, यह पाताल पसारा है ॥ २२ ॥
गजल कव्वाली आरम्भ । *
कव्वाली १—मेरी नैया पडी भवसागरमें, सतगुरु इसे पार लगा देना । ये आधि औ व्याधि सतावही इनसे प्रभु मोहिँ बचा लेना ॥ मैं शिष्य तो आपका कहलाया, नहिँ करम धरम कुछ बनि आया । करुणा निधान कीजे दया, दिलसे मेरा दोष हटा देना ॥ पापी हूँ पतित मलीन हूँ मैं, सब भांति लाचार औ दीन हूँ मैं । साहब बस तेरे आधीन हूँ मैं, तारो अब चाहे जुवा देना ॥ बिनतीपे मेरी ध्यान घरो, संकटको मेरे अब बेग हरो । मेरे शुद्ध अचार विचार करो, मेरी बिगडी समयको बना देना ॥ सतज्ञान प्रदान मुझे करदो, बल बुद्धी दै निरभय करदो । मेरे पापोंको परलय करदो, मुझे कदमोंमें अपने बुला लेना ॥ दुख हरन तुम्हारा नाम भि है, भगवानको आपसे काम भि है, । जहाँ क्लेश तहाँ आराम भि है, इनसे परे मोक्ष दिला देना ॥ १ ॥
कव्वाली २—दीन दयाल दया करके मुझे चरण की शरण बुला
- यहाँसे लेकर अगले चार गजल कव्वाली इन्दौर कबीर मंदिरके सेवक भगवान प्रसादका बनाया है ।
(९३८)
कवीरपंथी-
लेना। खट खट झंझट इस दुनियाकी, बिलकुलही मेरी छुड़ा देना॥ मुझे कर्म कुलालने है घेरा, चोरासी योनिनमें गेरा। अब मिला है नरतनमें डेरा, इससे प्रभु पार लगा देना॥ शुद्ध अंतःकरण होवे मेरा, नित उठ मैं ध्यान घरहं तेरा। हे नाथ यही चाहता चेरा, मुझे ऐसीही बुद्धी सदा देना ॥ चित चंचल निश्चल हो जावे, गुरु जिससे पूजा पाठ कुछ बन आवे। सब विषय भोगसे अलगावे, मेरे मनको शुद्ध बना देना॥ मेरे कार्य्य न कोई पापके हो, नित भजन कीरतन आपके हो। मेरे नाश दुख त्रिप तापके हो, मेरा आवागमन मिटा देना॥ मुझे अहंकार एक आपका हो, भगवान कहें नजर आपका हो। मेरा सुमिरन अजपा जापका हो, मुझे अपनेमें आप मिला लेना ॥ २ ॥
कव्वाली ३-मेरी विनय सुनो करूना निधान, मुझे चरणोंका दास बना लेना। मैं फंसा मोह पापमें आन, कर कृपा जरा सुलझा देना॥ कर कृपा आपने दी काया, शुभ कार्य्य करनेको फरमाया। नहीं मुझसे कुछ भी बन आया, इस दोषको मेरे भुला देना॥ निशि दिन मैं कहूंगा भजन तेरा, ये वादा है बेशक मेरा। यहाँ आतेही मोहने घेरा, जिससे दुःख पड़ा सदा सहना॥ हूँ महामूर्ख अवगुनकी खान, विषयोंसे लीन पापी महान। कर दया दृष्टि दो भक्ति दान, मेरे मनका मैल छुड़ा देना॥ तुम्हें नेति२ कहें चारों वेद, नहीं ऋषी सुनी कोई पाता भेद। ये सुनके मुझे है बड़ा खेद, मेरे संशयको नाथ मिटा देना॥ व्याकुल हो टेरता तुम्हें भगवान, होकर दयाल दो दरस आन। मुझे दीन दुखी मति हीन जान, कहि चितसे न अपने भुला देना ॥ ३ ॥ अरे मान मान मन मूठ मान, मुझे भजन प्रभूका करने देना।
शब्दावली
(१३९)
क्यों करे रात दिन परेशान, जरा भवसे सुझे तरने देना ॥ पड़ तेरे संग अती दुख पाया, तूने जहाँ तहाँ सुझे भटकाया । अब हुई कुछ उस प्रभूकी दाय़ा, सुझे ध्यान उसीका धरने देना । है चित चंचल बड़ा बेइमान, पल २ में रचे नित नयी तोफ़ान । नहीं धरन देत मोहि नेक ध्यान, उसको भा सुझे हरने देना ॥ लिया अंतःकरणको मैंने जान, जहाँ वसेहो तुम सब आनआन । है बुद्धी बिचारी अभी नदान, जरा विवेकमें इसे परने देना ॥ मेरेही बल बने पहलवान, मेराही बुरा चाहते हैवान । अभी तोड़ दूंगा मैं सबका मान, नहीं कार्य्य मेरा सरने देना ॥ भगवान दास गुरु ज्ञान पाप, ये खुदी करन लगते सहाय । विन भगती सदा जीव गोते खाय, सुझे चरन गुरुके पड़ने देना ॥ ४ ॥
इति गजल कव्वाली ।
अथ सुआ बत्तीसी प्रारम्भः ॥
(मय्या भगवती दासके बह्मबिलाससे)
दोहा-नमस्कार जिन देवको, करों दुइ कर जोर । सुवा बत्तीसी सुरस मैं, कहुँ अरिन दल मोर ॥ १ ॥ आतम सुआ सु गुरु बचन, पढत रहै दिन रैन । करत काम अघरीतिके, यह अचरज लख नैन ॥ २ ॥ सुगुरु पढावे प्रेमसो, यह पढत मन लाय । घटके पट जो ना खुले, सबहिँ अकारथ जाय ॥ ३ ॥ (साखी-गुरु विचारा क्या करे, शिष्यहिमें है चूक । शब्द बान बेधे नहीं, बाँ बजावे फूँक ॥ गुरु विचारा क्या करे, कहै न खुले कपाट । स्वान चौक बैठायके, फिरि फिरि ऐपन चाट ॥)
बीजक ॥
(९४०)
कबीरपंथी-
चौपाई-सुवा पढायो सुगुरु बनाय । करम बनहिं जिन जइयो भाय ॥ भूले चूके कबहुं जो जाहु । लोभ नलनिपै दगा न खाहु ॥ ४ ॥ दुर्जन मोह दगाके काज । बांधी नलनी तर धर नाज ॥ तुम मति बैठहु सुवा अजान । नाज विषय सुख लहिं तिहिं थान ॥ ५ ॥ जो बैठहु तो पकड़ि न रहियो । जो पकड़ो तो दिठ मति गहियो ॥ जो दिठ गहो तो उलटि न जइयो । जो उलटो तो तजि भगि जइयो ॥ ६ ॥ यहि विधि सुवा पढायो नित । सुवटा पठिके भयो बिचित्त ॥ पढत रहै निशि दिन यह बैन । सुनत लहै सब प्रानी चैन ॥ ७ ॥ इक दिन सुवटे आई मने । गुरु संगति तजि भजिगे बने ॥ बनमें लोभ नलनि अति बनी । दुर्जन मोह दगाको तनी ॥ ८ ॥ ता तरु विषय भोग अन धरे । सुवटे जान्यो ये सुख खरे ॥ उतरे विषय सुखनिके काज । बैठि नलनिपै बिलसै राज ॥ ९ ॥ बैठो लोभ नलनिपै जबै । विषय स्वाद रस लटके तबै ॥ लटकत तरे उलटिगे भाव । तर मूंडी ऊपरभै पाँव ॥ १० ॥ नलनि दिठ पकरे पुनि रहै । सुखते बचन दीनता कहै ॥ कोउ न बनमें छुडावनहार । नलनी पकरहिं करहिं पुकार ॥ ११ ॥ पढन रहै गुरुके सब बैन । जे जे हितकर सिखवये ऐन ॥ सुवटा बनमें उड़ि जनि जाहु । जाहु तो भूलि खता मति खाहु ॥ १२ ॥ नलनीके मति जइयो तीर । जाहु तो तहाँ न बैठो कीर ॥ जो बैठो तो दिठ मति गहो । जो दिठ गहो तो पकरि मत रहो ॥ १३ ॥ जो पकरो तो चुगा न खेहो । जो खाओ तो उलटि न जैहो ॥ जो उलटो तो तजि भगि जैहो । इतनी सीख हृदयमें लहिहो ॥ १४ ॥ ऐसे बचन पढत पुनि रहै । लोभ नलनि तजि भजौ न चहै ॥ आयो दुर्जन दुर्मति रूप । पकड़ि लयो
शब्दावली
(१४१)
सुवटा सुन्दर भूप ॥ १५ ॥ डारे दुखके जाल मंझार । सो दुख कहत न आवे पार ॥ भूख प्यास बहु संकट सहे । परबस परे महा दुख लहे ॥ १६ ॥ सुवटाकी सुधि बुधि सब गयी । यह तो बात और कछु भयी ॥ आय परे दुख सागर माहिं । अब इतते कितको भगि जाहिं ॥ १७ ॥ केतो काल गयो इह ठौर । सुवटे जियमें ठानी और ॥ यह दुख जाल कटे किहि भांति । ऐसी मनमें उषजी खांति ॥ १८ ॥ रात दिना प्रभु सुमिरन करे । पाप जाल काटन चित धरे ॥ कम कम कर काटचो अघ जाल । सुमिरन फल भयो दीनदयाल ॥ १९ ॥ अब इतते जो भजिके जाऊँ । तो नलनी पर बैठे न खाऊँ ॥ पायो दाव भजो ततकाल । तजि दुर्जन दुर्गति जंजाल ॥ २० ॥ आये उडत बहर बन माहिं । बैठे नर भव दुमकी छाहिं ॥ तित इक साधु महा सुनिराय । धर्म देश ना देत सुभाय ॥ २१ ॥ यह संसार कर्म बन रूप । ता माहिं चेतन सुवा अनूप ॥ पढत रहे गुरु बचन विशाल । तौहु न अपनी करे संभाल ॥ २२ ॥ लोभ नलनि पर बैठे जाय । विषय स्वाद रस लटके आय ॥ पकरहिं दुर्जन दुर्गति परे । तामें दुख बहुत जिय भरे ॥ २३ ॥ सो दुख कहत न आवे पार । जानत जिन वर ज्ञान मंझार ॥ सुनते सुवटा चौकयो आप । यहि तो मोहिं परचो सब पाप ॥ २४ ॥ ये दुख तो सब मैंही सहे । जो सुनिवरने मुखते कहे ॥ सुवटा सोचे हिये मंझार । ये गुरु सांचे तारनहार ॥ २५ ॥ मैं शठ फिरचो करम बन माहिं । ऐसे गुरु कहि पाये नाहिं ॥ अब मो पुन्य उदय कछु भयो । सांचे गुरुके दरशन लयो ॥ २६ ॥ गुरुकी गुन स्तुति बारम्बार । सुमिरे सुवटा हिये मंझार ॥ सुमिरन आप पाप भजि गयो । घटके पट खुलि सम्यक्
(९४२)
कबीरपंथी—
थयो ॥२७॥ समकित होत लखि सब बात । यह मैं यह पर द्रव्य विख्यात ॥ चेतनके गुन निज माँहि धरे । पुद्गल रागादिक परिहरे ॥२८॥ आप मगन अपने गुन माँहि । जनम मरन भय जियकी नाहिं ॥ सिंह समान निहारत हिये । कर्म कलंक सबहीं तजि दिये ॥२९॥ ध्यावत आप माँहि जगदीश । दुहुँ पद एक विराजत ईश ॥ यहि विधि सुवटा ध्यावत ध्यान । दिन दिन प्रति प्रगटत कल्याण ॥३०॥ अनुक्रम शिव पद जिवको भयो । सुख अनन्त विलसत नित नयो ॥ सत संगति सबको सुख देय । जो कछु हियमें ज्ञान धरेय ॥३१॥ केवलि पद आतम अनुभूत । घट घट राजत ज्ञान संजूत ॥ सुख अनंत विलसे जिय सोय । जाके निज पद परगट होय ॥३२॥ सुआ बतीसी सुनहु सुजान । निज पद प्रगटत परम निधान ॥ सुख अनंत विलसहु ध्रुव नित । भय्याकी विनती धर चित्त ॥३३॥ सम्भव सत्रह त्रेपन माँहि । आश्विन पहिले पच्छ कहाहिं ॥ दसमी दशा दिशा परगास । गुरु संगति ते शिव सुख भास ॥३४॥
इति श्री आत्मनिष्ठ परमार्थीबंध कबीराश्रमाचार्य्य स्वामी श्रीयोगलानन्द विहारी द्वारा संग्रहीत कबीरपंथी शब्दावली छः खण्डका प्रथम भाग समाप्त ॥ शुभम् ॥
सत्यनाम ।
शब्दार्थ चिन्तामणि कोष का उपक्रम ॥
सद्गुरु कबीर साहबकी सर्ववाणी अध्यात्मतत्त्वके उपदेशोंसे भरों पड़ी है । अध्यात्मतत्त्वके सच्चे जिज्ञासुओंके लिये, यदि वह सच्चा अधिकारी है, तो उसे, आधी साखीमें ही सार मिल जाता है, जैसा सद्गुरुने कहा है—
आधी साखी सिर खड़े, जो निरुवारी जाय ।
क्या पंडित क्या पोथिया, रात दिवस मिलि गाय ॥
शब्दावली
(९४३)
किन्तु वर्तमान कालमें अधिकांशोंके कभी और साधारण लोगोंकी वृत्ति बहिरमुख होनेके कारण तथा श्रद्धा मस्तिके अभावसे, साधारण वाणियोंमें भी लोगोंको सन्देह रहा करता है और उसके ही समझने उनकी बुद्धि असमर्थ होती है। तब गूढ़ वाणियोंमें वह बहिरमुख वृत्तिकेसे परवेश कर सकता है। इतना होने पर भी साम्प्रदायिक पक्षपातके कारण अथवा रिवाजके कारण, लोगोंकी प्रवृत्ति वाणियों के संग्रह करने और कभी कभी जमाव आदिके अवसर पर वाणियोंको बाँचने गाने और बचन विलास-(सत्संग) की आवश्यकता तो पड़ती ही है। अथवा जो लोग श्रद्धापूर्वक कुछ जानने और पानेकी अभिलाषासे वाणियोंका पाठ करते हैं उन्हें भी अर्थ करने और समझने में बड़ी कठिनाइयां उपस्थित होती हैं। क्योंकि कबीर साहबकी वाणीमें अनन्त ऐसे सांकेतिक शब्द भरे पड़े हैं जिनको धेरी विना जानना अत्यन्त कठिन है। यथार्थ बात तो यह है कि संसारकी किसी भी वाणीका अर्थ उस वाणीके यथार्थ रहस्य ज्ञाताके विना समझाये समझमें आना अत्यन्त दुस्तर है तथापि मनुष्य मनन शील प्राणी हैं, सबको अपनी बुद्धिद्वारा समझनेकी अभिलाषा रहा। करता है। इन्हीं सब बातोंका विचार कर जब मैंने प्रथम बार सन्वत् १९५४ वि. में लखनौ में भूल बोजक छपवाया था तब “गुडार्थ चिन्तामणि कोष” के नामसे सांकेतिक शब्दोंके स्पष्टीकरणका कोष दे दिया था। अब इस शब्दावलीमें भी अनन्त शब्द ऐसे आये हैं जिनको समझने के लिये इस कोषको यहाँ देनेकी आवश्यकता थी, इसलिये यह कोष यहाँ दे दिया है। यद्यपि मेरा विचार था कि, इस कोषको नये सिरसे पुनरावर अकरादि अनुक्रम से नियम पूर्वक ठीक करकेही दोबारा प्रकाशित किया जाय किन्तु कितने अनिवार्यकार्यों तथा छापनेवाले प्रेसकी शीघ्र प्रथको पूर्ण करनेकी आतुरताके कारण से वैसा नहीं कर सका, इसलिये पहली छपी हुई प्रति ज्यों की त्यों दे दिया है। एक प्रकारसे यह भावीही थी, जैसे शब्दावली अदूरी रही है वैसे, कोषकी अदूरी रही है। सद्गुरुकी दया दृष्टि होगी तो कबीरधर्मदर्शन ग्रन्थ मालाकी किसी भाषिकामें यह कोष संशोधित और वद्धित रूपमें प्रकाशित किया जायगा, तबतक पाठकोंको इसीसे संतोष मानना चाहिये।
सर्व सत्यके जिज्ञासुओंका परमार्थी मित्र- कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य, आत्मनिष्ठ-ध्यौयुगलानन्द विहारी, कबीराश्रम पों० खरसिया स्टेशन, जि० बिलासपुर सी. पों.
अथ गृढार्थं चिंतामणि कोष
कवीराश्रमाचार्यं परमार्थो वैद्य
भारत पथिक स्वामी
श्रीयुगलानन्दविहारी विरचित ॥
द्विविध शब्द ।
| गुरु | शिष्य | ब्रह्म | माया | ईश्वर | जगत् |
|---|---|---|---|---|---|
| चैतन | जड | सुख | दुःख | पुण्य | पाप |
| स्वर्ग | नरक | गुण | दोष | देवता | राक्षस |
| दयाल | काल | कारण | कार्यं | निमित्त | उपादान |
| रक्षक | भक्षक | दक्षिण | वाम | शुद्ध | मलिन |
| मुख्य | गौण | विशेष | सामान्य | समष्टि | व्यष्टि |
| विशेष | आवरण | स्थिर | चञ्चल | निराकार | साकार |
| सुगन्ध | दुर्गन्ध | अपरा | परा | वक्ता | श्रोता |
| दैवी | आसुरी | आधि | व्याधि | निर्गुण | सगुण |
| जीव | जीव | स्वामी | सेवक | पिता | पुत्र |
| पुरुष | स्त्री | नर | नारी | पुरुष | प्रकृति |
| जन्म | मरण | दिन | रात्रि | प्रकाश | अन्धकार |
| एक | अनन्त | चतुर | मूर्ख | राग | द्वेष |
| स्तुति | निन्दा | जीव | शिव | काम | क्रोध |
परस्पर विरुद्ध तथा भय संयुक्त द्विविध पदार्थ ॥
| विद्या | वाद | तप | क्षय | द्व्य | राजा, चोर |
|---|---|---|---|---|---|
| भोग | रोग | काया | काल | साधन | इन्द्री |
| योग | विषय | स्वर्गवासी | अवधि | मंत्र | यन्त्र |
| यन्त्र | तंत्र | तंत्र | सिद्ध | सिद्ध | माया |
| माया | ज्ञान | सज्जन | दुर्जन | मित्र | शत्रु |
| मिलना | विछुरना | आना | जाना | पंडित स्तुति | निन्दा |
| मूर्ख | मार | गृद्ध | समाधान | कुल | अति नारि |
| कर्म | अकर्म | उपासना | विशेष | ज्ञान | अज्ञान |
गुढार्थचिन्तामणिकोष ।
(१४५)
| सत्यवादी | पाखण्ड | आस्तिक | नास्तिक, | शुक्ल | कृष्ण |
|---|---|---|---|---|---|
| मित्र | शत्रु | महावाक्य | अवांतर | ||
| त्राक्य. | प्रकाश | अन्धकार | |||
| निर्विकल्प | सविकल्प | निरंजन | अद्या | शीत | उष्ण |
| सूक्ष्म | स्थूल | जंगम | स्यावर | ||
| खुदा | बन्दा | कादिर | कुदरत | ||
| आदम | हून्वा | खास | आम | इनसान | हैवान |
॥ त्रैयविधि ॥
ओंकार मात्रा | अ | उ | म | | ---|---|---|---|---|--- | | क्षर | अक्षर | निः अक्षर | | | हिरण्यगर्भ | ईश्वर | विराट | | | विश्व | तैजस | प्राज्ञ | देव | | ब्रह्मा | विष्णु | महेश | | | विबेक | वैराग्य | गुरुभक्ति | गुण | | रजोगुण | सतोगुण | तमोगुण | शरीर | | स्थूल | सूक्ष्म | कारण | | | नाम | रूप | गुण | काल | | भूत | वर्तमान | भविष्य | क्रिया | | उत्पत्ति | पालन | नाश | अर्थ | | स्वार्थ | परमार्थ | निरर्थ | अवस्था | | जाग्रत | स्वप्न | सुषुप्ति | वेदकांड | | कर्म | उपासना | ज्ञान | | | कर्म | धर्म | मति | महावाक्य | ॥ (सा. वे.) | तत् | त्व | असि | ॥ (ऋग्वेद) | | अहं | ब्रह्म | अस्मि | ॥ (यजुर्वेद) | | अयं | आत्मा | ब्रह्म | ॥ (अथर्वणवेद) | | प्रज्ञान | आनंद | ब्रह्म | नाडी | | इंगला | पिंगला | सुषुम्णा | | | यमुना | गंगा | सरस्वती | प्राणायाम | | रेचक | पूरक | कुम्भक | दोष | | वायु | पित्त | कफ | लोक | | मृत्युलोक | स्वर्ग | पाताल | प्रारब्ध | | इच्छा | अनिच्छा | स्वइच्छा | लक्षण (दोष) | | अव्याप्ति | अतिव्याप्ति | असंभव | गुरु | | माता | पिता | आचार्य्य | वादादि | | वाद | जल्प | वितंडा | वायु | | शीतल | मंद | सुगंध | ताप | | आध्यात्मिक | आधिभौतिक | आधि दैविक |
( ९४६ )
गूढार्थचिन्तामणिकोष ।
| कर्म | संचित | प्रारब्ध | क्रियमाण |
|---|---|---|---|
| श्रोता | मुक्त | मुमुक्षु | विषयी |
| मनुष्य | ज्ञानी | विषयी | पामर |
| अवस्था (शरीर) | बाल | युवा | बूढ़ |
| लिंग | स्त्री | पुरुष | नपुंसक |
| सम्बन्ध | संयोग | समवाय | तादात्म्य |
| त्रिपुटी | ज्ञाता | ज्ञान | ज्ञेय- |
| ध्याता | ध्यान | ध्येय | |
| द्रष्टा | दर्शन | दृश्य | |
| कर्ता | क्रिया | कर्म | |
| नाद | विद | कला | |
| अध्यात्म | अधिभूत | अधिदैव | |
| ज्ञानप्रतिबन्धक | गंशय | असंभावना | विपरीतभावना |
| ज्ञानसाधक | ज्ञान | वैराग | उपशम |
| हेतु | स्वरूप | फल | |
| अस्ति | भांती | प्रिय | |
| कारणवाद | आरंभ | परिणाम | विवर्त |
| सृष्टि | पारमार्थिक | व्यावहारिक | प्रातिभासिक |
| आनन्द | ब्रह्मानन्द | विषयानन्द | वासनानन्द |
| आत्मा | ज्ञानात्मा | महानात्मा | शांतात्मा |
| भेद आत्माका | मिथ्यात्मा | गौणआत्मा | मुख्यआत्मा |
| अन्तःकरण दोष , | मल | विश्लेष | आवरण |
| वेध | तिलक | माला | लंगोट |
॥ चतुरविधि ॥
| १ देदता | ब्रह्मा | विष्णु | रुद्र | ओंकार |
|---|---|---|---|---|
| २ अवस्था | जाग्रत | स्वप्न | सुषुप्ति | तुरीया |
| शरीर | नासूत | मलकृत | जवरुत | लाहूत |
| अभिमानी (व्याप्ति) | स्थूल | सूक्ष्म | कारण | महाकारण |
| ” (समष्टि) | विश्व | तैजस | प्राज्ञ | प्रत्यक्ष |
| आकाश | विराट् | हिरण्यगर्भ | ईश्वर | ब्रह्म |
| चैतन्यअवस्था | घटाकाश | जलाकाश, | मेषाकाश | महाकाश |
| वेद | कूटस्थ | जीव | ईश्वर | ब्रह्म |
| किताब | श्रुद्वेद | यजुर्वेद | सामवेद | अथर्ववेद |
| अपवेद | जंबूर | तौरित | वायबुल | कुरान |
| अनुबन्ध | आयुर्वेद | धनुर्वेद | गांधर्व | स्थापत्य |
| साधन | अधिकारी | विषय | प्रयोजन | संबन्ध |
| विवेक | वैराग | षटसंपत्ति | मुमुक्षता |
गूढार्थचिन्तामणिकोष ।
(१४७)
प्रथम बिबेक विराम पुनि, अस्मादि षट् सम्पत्ति ।
कही चतुर्षु मनुष्यता, ये सब साधनसत्ति ॥ १२ ॥
| साधन (अंतरंग) | श्रवण | मनन | निदिध्यासन | साक्षात्कार |
|---|---|---|---|---|
| भक्त | आर्त | विज्ञासु | अर्थावों | ज्ञानी |
| पुरुषार्थ | अर्थ | धर्म | काम | मोक्ष |
| आश्रम | ब्रह्मचर्य | गाहृत्स्य | वानप्रस्थ | संन्यास |
| वर्ण | ब्राह्मण | क्षत्री | वैश्य | शूद्र |
| शेष | संन्यास | मुगल | पठान | |
| मोक्षद्वारपाल | शम | संतोष | विचार | सत्संग |
मोक्ष द्वारपालकचतुर, शम संतोष विचार ।
चौथो सत्संगति घरम, महापूज्य निर्धार ॥
| संन्यास | कुटिचर | वहृदक | हंस | परमहंस |
|---|---|---|---|---|
| भूमिका | क्षिप्रा | अनागत | सूलिश्रुता | सुलीनता |
| अन्तःकरण | मन | बुद्धि | चित्त | अहंकार |
| खानि | जरायुज | अण्डज | उद्भिज्ज | स्वेदज |
| चित्तनिरोध- | अध्यात्म- | साधूसंग, | वासनात्याग, | प्राणायाम, |
| उपाय. | विद्या. | |||
| स्पर्श | शीत | उष्ण | कोमल | कठिन |
| युग | सतयुग | त्रेता | द्वापर | कलियुग |
| गरीर अवस्था | बाल | किशोर | युवा | बृद्ध |
| वैना | नाटा | मञ्जोला | लम्बा | |
| वाणी भेद | परा | पश्यन्तो | मध्यमा | वैखरी |
| शब्द भेद | काल | संधि | झाड़ | सार |
| अर्थ | शब्दार्थ | भावार्य | व्यंग्यार्थ | धन्यार्थ |
| सेना चतुरंगिणी | हाथी | रथ | पैदल | घोडा |
| नीति मार्ग | साम | दान | दण्ड | भेद |
| रिपु | काम | क्रोध | लोभ | मोह |
| मुक्ति | सालोक | सामीप्य | सारुप्य | सायुज्य |
| मनुष्य लक्षण | दया | शील | विचार | शीर्य |
| सनकादिक | सनक | सनन्दन | सन्तकुमार | सनातन |
| यार ४ | अबुबक् | उमर | उसामन | अली |
| मार्ग (हिन्दूधर्म) | कर्म | उपाशना | योग | ज्ञान |
| मार्ग (मुसलमानी) | शरीयत | तरीकत | मारफत | हकीकत |
| आधार चक्र अक्षर | च | ष | श | ह |
| स्त्री भेद | पश्चिनी | चित्रनी | शंखनी | हस्तिनी |
| पुरुष भेद | शशा | भुगा | घोडा | खर |
| उत्तम | मध्यम | लघु | निकुट्ट |
(९४८)
गूढार्थोचिततामणिकोष ।
| ज्ञान परीक्षा | निरालम्ब | निःश्रेम | निर्वासनिक | निर्विकार |
|---|---|---|---|---|
| विचार परीक्षा | निर्माहि | निर्वेध | निहिंसक | निर्वाण |
| विवेक परीक्षा | सावधान | सर्वगी | सारग्राही | संतोषी |
| परम संतोष परीक्षा | अयाचक | अमानी | अपक्षीक | स्थिर |
| सहज परीक्षा | निष्प्रपंच | निःतरंग | निलिप्त | निष्कर्म |
| निर्वर परीक्षा | सुहृदता | मुबुदार्ई | शीतलताई | सुमति |
| गून्य परीक्षा | शोलवंत | मुबुद्धि | सत्यवादो | ध्यानसमाधि |
| सन्ध्या | प्रातः | मध्याह्नि | सांज्ञ | मध्यरात्री |
| दिशा | पूर्व | पश्चिम | उत्तर | दक्षिण |
| विष्णु आयुध | पांच | चक्र | गदा | पद्म |
| संमप्रदा | श्रीसम्प्रदा | शिवसम्प्रदा | ब्रह्मसम्प्रदा | सनकादिक |
| आचार्य | रामानुज | विष्णुस्वामी, | माधवानंद, | निम्बाकैस्वामी |
| पृथ्वीके खण्ड | एशिया | अफरिका | योरप | अमेरिका |
शंकराचार्य निर्मित मठ १ गोवर्धन मठ पूर्व जगन्नाथपुरीमें ॥ २ शारदा मठ पश्चिम द्वारकामें ॥
३ जोशी मठ उत्तर बद्रिकाश्रममें ॥ शृंगेरी मठ दक्षिण रामेश्वर ४ ॥
विवेकियों के जाननेयोग्य ॥ १ हेय ॥ २ ज्ञेय ३ आप्य ॥ ४ पात्र्य ॥
कबीरसाहबके ४ नाम ॥ सतमुक्त सत्यगुणमें ९ मुनिन्द्र जेतोमें ॥ कृष्णामय द्वारपरमें कबीर कलियुगमें ॥
चारगुरु ४ । १ धर्मदास सा. २ चतुर्भुज ३ वकजी ४ सहतेजी ।
॥ पदार्थ पंचविधि ॥
॥ हंस देहके तत्व आदिक वर्णन ॥
तत्व सांच धीरता, दया, शील, विचार,
ई पांचो हूं तत्व सो, संगी हंसा केर ।
साधु गुरुभत गहन मन, कल्पित सूष्टि हेर ॥
अब प्रकृति पञ्चोसको, कहौ मुनहु परसंग ।
पांच पांचते पांचई, जेहि बिधि बाढो अंग ॥
प्रकृति (साँचकी) निर्णयता, निर्विन्दता, प्रकाशता, थोरता, क्षमता ॥
प्रकृति (दैव्यकी) मिथ्या त्यागन, सत्यग्रहण, निःसंदेहता, हंता नाशन, अवलता ॥
प्रकृति (दयाकी) अद्रोहता, समता, मैत्री, अभयता, अभेदता ॥
प्रकृति (शीलकी) सहनशीलता (तितिक्षा) प्रियवचन बोलना, बुद्धिकी शांतता, परख प्रत्यक्ष प्रकट सुखमें निलेपता, (दुःख सुखमें समबुद्धि रख आनन्दमें रहना,) ॥
प्रकृति विचारकी —अस्ति नास्ति पदका विलगाना, (विवेक) यथार्थ ग्रहण व्यवहार शुद्ध सतो-गुणी बाल रखना, परख या टकसार (सर्वका पारख करना तथा बिना पारख ग्रहण नहीं करना) ॥ वेद
गूढार्थचिन्तामणिकोष ।
(१४९)
कुरान आदिसे लेकर सर्व महात्माओं विद्वानोंकी वाणीका यथाशक्ति अभ्यास करके बोध प्राप्त करना और उसके आशयको समझना ॥
इहि पांचोंको पंचधा, भेद प्रकृति पञ्चौस ।
हँहू हेहूकी तत्त्व प्रकृति, बूझो दिस्वाबीस ॥
अहंकारके पांच मुख—१ प्रथम मुख विषय, कर्म काण्डका प्रकाशक ॥ २ तैजस, योग, काण्डका प्रकाशक ॥ ३ प्राज्ञ उपासना कांडका प्रकाशक ४ प्रत्यक्ष अत्याज्ञान काण्डका प्रकाशक ॥ ५
॥ अद्वैत विज्ञानका प्रकाशक ॥
| तन्मात्रा | शब्द, | स्पर्श. | स्पर्शः | रस, | गंध. |
|---|---|---|---|---|---|
| तत्त्व | आकाश, | वायु | अग्नि, | जल, | पृथ्वी. |
| ज्ञान इन्द्री | श्रवण, | त्वचा, | नेत्र, | जिह्वा | नासा. |
| कर्म इन्द्री | वाक्, | पाणि (हस्त) | पाद पायु, | गुदा. | उपस्थ. |
| वायु स्थूल | व्यान, | समान, | उदान, | प्राण, | अपान. |
| वायु सूक्ष्म | धनञ्जय, | किंकरा, | कूर्म, | नाग, | देवदत्त. |
| वाणी (अवस्था) | शून्य, | परा, | पश्यन्ती, | मध्यमा, | वैचारी. |
| आकाशकी प्रकृती १ | शिराकाश | कंठाकाश, | हृदयाकाश, | उदराकाश | कटयाकाश |
|---|---|---|---|---|---|
| सूक्ष्मप्रकृति ,, लोभ | काम | क्रोध | मोह, | भय, | |
| वायुकी ,, फैलना, | बलकरना, | उठना, | चलना, | संकोचन. | |
| अग्निकी ,, निद्रा | प्यास, | भूख, | क्रांति, | अलस्य. | |
| जलकी ,, लार, | स्वेद, | मूत्र, | वीर्य, | रक्त. | |
| ,, | मज्जा, | रक्त, | मूत्र, | मल. | |
| रक्त | विद्रू | कफ, | मेद, | मूत्र. | |
| ,, पृथ्वीकी-रोम, | त्वचा, | नाडी, | मांस, | अस्थि, | |
| ,, | नाडी, | मांस, | त्वचा, | अस्थि, | |
| शरीर-कैवल्य | महाकारण | कारण | सूक्ष्म | स्थूल, | |
| कोश-अन्नमय, | प्राणमय, | मनोमय | विज्ञानमय, | आनन्दमय, | |
| भक्त-आर्त, | जिज्ञासू | अर्थार्थी, | विज्ञान, | निर्वासि, | |
| कर्म-नित्य, | नैमित्तिक, | काम्य, | प्रायश्चित्त, | निषिद्ध, | |
| क्लेश-अविद्या, | अस्मिता, | राग, | द्वेष, | अभिनिवेश, |
दृष्टांत ५— (जगतके मिथ्यापने विषय वेदान्तानुसार) ॥ १ शक्तिविषय रजत, २ रज्जुविषय, सर्प ३ स्थाणु विषय पुष्प, ४ गगन विषय नीलता, ५ मरीचिका विषय जल ॥
नियम—शौच, संतोष. तप स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान ॥
प्रलय—नित्य नैमित्तिक, दिनप्रलय, महाप्रलय, आत्यंतिकप्रलय,
भेद ५—जीव ईश्वरका भेद, जीव जीवका भेद, जीव जडका भेद, ईश जडका भेद, जड जडका भेद, भ्रम—भेद भ्रम, कर्तृत्वभ्रम, संग भ्रम, विकार भ्रम, सत्यत्वभ्रम ।