कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५७० * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ आहवनीय अग्नि है। वह तीसरी मात्रा ही इस सामका तीसरा चरण है। प्रणवके उच्चारणकी समाप्ति होनेपर उसकी चौथी मात्राके रूपमें जो नादात्मक अर्धमात्रा सुनायी देती है, उसीके अन्तर्गत सोमलोक नामक लोक, ॐकार वाच्य परब्रह्म देवता, अथर्व-मन्त्रोंसहित अथर्ववेद ही वेद, संवर्तकनामक अग्नि, मरुन्नामक देवताओंका गण तथा विराट् छन्द है। इस चतुर्थ मात्राविशिष्ट ॐकारके एक ही ऋषि हैं—ब्रह्माजी। यह चौथी मात्रा तुरीया ब्रह्म-स्वरूपा होनेके कारण परम प्रकाशमयी है। यही सामका चतुर्थ पाद है* ॥ १ ॥ अनुष्टुप्-मन्त्रका प्रथम चरण आठ अक्षरोंका है। शेष तीन चरण भी आठ-आठ अक्षरोंके ही हैं। इस प्रकार कुल बत्तीस अक्षर होते हैं। निश्चय ही अनुष्टुप्-वृत्ति बत्तीस अक्षरोंकी होती है। अनुष्टुप्से ही इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। अनुष्टुप्के द्वारा ही सबका उपसहार होता है। उस अनुष्टुप्-मन्त्रके पाँच अङ्ग हैं। इसके चार चरण ही चार अङ्ग हैं तथा प्रणवको साथ लेकर सम्पूर्ण मन्त्र पाँचवाँ अङ्ग होता है। हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, अस्त्राय फट्—इनमें शरीरके पाँच अङ्गोंका उल्लेख है। ऊपर अनुष्टुप्-मन्त्रके भी पाँच अङ्ग बताये गये हैं, अतः मन्त्रके प्रथम अङ्गका हृदय- रूप प्रथम अङ्गसे संयोग कराना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे अङ्गका दूसरे मस्तकरूप अङ्गसे, तीसरे अङ्गका तीसरे शिखारूप अङ्गसे, चतुर्थ अङ्गका चौथे उभय बाहुमूलरूप अङ्गसे और पञ्चम अङ्गका पाँचवें मस्तकरूप अङ्गसे सम्बन्ध होता है।† निश्चय ही ये सम्पूर्ण लोक एक दूसरेसे सम्बद्ध हैं, इसलिये उक्त अङ्ग भी परस्पर सम्बद्ध होते हैं। ॐ यह अक्षर ही यह सम्पूर्ण जगत् है। इसलिये अनुष्टुप्- मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके दोनों ओर—पहले और पीछे ॐकारका सम्पुट लगाना चाहिये। ब्रह्मवादी महात्मा उक्त मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके न्यासका उपदेश करते हैं* ॥ २ ॥ निश्चय ही ‘उग्रम्’ इस पदको उस प्रसिद्ध अनुष्टुप्- मन्त्रका प्रथम स्थान जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। ‘वीरम्’ यह पद द्वितीय स्थान है। ‘महाविष्णुम्’ पद तृतीय स्थान है। ‘ज्वलन्तम्’ पद चतुर्थ स्थान है। ‘सर्वतोमुखम्’ पद पञ्चम स्थान है। ‘नृसिंहम्’ पद छठा स्थान है। ‘भीषणम्’ पद सातवाँ स्थान है। ‘भद्रम्’ पद आठवाँ स्थान है। ‘मृत्युमृत्युम्’ पद नवाँ स्थान है। ‘नमामि’ पद दसवाँ स्थान है। ‘अहम्’ पद ग्यारहवाँ स्थान है। इस प्रकार जानना चाहिये। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। निश्चय ही यह अनुष्टुप्वृत्ति ग्यारह पदोंकी है। इस अनुष्टुप्- मन्त्रके द्वारा ही इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। तथा अनुष्टुप्के द्वारा ही सबका उपसहार होता है। इसलिये सब कुछ अनुष्टुप्-मन्त्रका ही विस्तार है—यों जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है॥ ३ ॥ कहते हैं, देवताओंने प्रजापतिसे पूछा—‘‘भगवान् नृसिंहके लिये ‘उग्रम्’ यह विशेषण क्यों दिया जाता है ? उन्हें उग्र क्यों कहा जाता है ?’’ तब वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले—‘‘क्योंकि भगवान् नृसिंह अपनी महिमासे सम्पूर्ण लोको, समस्त देवों, सभी आत्माओं तथा सभी भूतोंको ऊपर उठाये रखते हैं, निरन्तर उनकी सृष्टि करते हैं, नाना
- इस प्रकरणका सारांश यह है कि प्रणवकी चार मात्राएँ हैं— अ उ म् और अर्धमात्रा । क्रमशः इनके चार लोक हैं— पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक और सोमलोक । चार ही वेद हैं—ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व । चार ही देवता हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा ॐकारवाच्य परब्रह्म । चार ही छन्द हैं—गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती तथा विराट् । चार ही अग्नियाँ हैं—गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय और संवर्तक । ये सब मिलकर प्रणवरूप हैं, इस विश्वरूप प्रणवमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित उपास्यदेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करनी चाहिये । † यहाँ अङ्गन्यासका विधान किया गया है। इसके अनुसार न्यासका क्रम इस प्रकार होगा—‘ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुम्’ हृदयाय नम—यों कहकर दाहिने हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे । फिर ‘ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्’ शिरसे स्वाहा— यों कहकर उक्त अङ्गुलियोंसे ही मस्तकका स्पर्श करे । तत्पश्चात् ‘नृसिंहं भीषणं भद्रं’ शिखायै वषट्—इसका उच्चारण करके पूर्ववत् शिखाका स्पर्श करे । तदनन्तर ‘मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्’ कवचाय हुम्—इसका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अङ्गुलियोंसे दायें कंधेका एक साथ ही स्पर्श करे । फिर प्रणवसहित पूरे मन्त्रके साथ ‘अस्त्राय फट्’ कहकर दाहिने हाथको मस्तकके ऊपर बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये ।
- अनुष्टुप्-मन्त्रमें कुल बत्तीस अक्षर हैं, उनमेंसे प्रत्येक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके शिखासे लेकर पैरतकके बत्तीस अङ्गोंमें क्रमश न्यास करना चाहिये । यथा—‘ॐ उँ ॐ नम. शिखायाम्’, ‘ॐ ग्रँ ॐ नम दक्षिणानेत्रे’ इत्यादि ।
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और यथावत् लिप्यन्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
उपनिषद् २ ] $\quad\quad\quad\quad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\quad\quad\quad\quad$ ५७१
[बायाँ स्तम्भ]
प्रकारसे उनकी सृष्टिका विस्तार तथा संहार करते हैं, उन सबको अपने ही भीतर बसाते—लीन कर लेते हैं, दूसरोंसे इस जगत्पर उद्वह (अनुग्रह) करवाते हैं तथा स्वयं भी इसपर अनुग्रह करते हैं, इसलिये 'उग्र' कहलाते हैं। इस विषयमें ऋग्वेदका मन्त्र भी है, जिसका भाव इस प्रकार है—'श्रुतियाँ जिनकी स्तुतिमें संलग्न हैं, उन उपास्यदेव परमात्माका स्तवन करो। वे गर्तमें—हृदयरूपी गुफामें स्थित हैं (अथवा व्यूहरूप महाचक्र ही यहाँ गर्त है, उसमें स्थित हैं)। नवतारुण्यसे सुशोभित हैं। मृग अर्थात् सिंहके रूपमें प्रकट होकर भी भक्तजनोंके लिये भयङ्कर नहीं हैं। सदा सबपर अनुग्रह करनेके लिये सर्वत्र सबके निकट पहुँचनेवाले हैं तथा उग्र हैं—साधु पुरुषोंपर अनुग्रह और दुष्टजनोंका निग्रह करनेवाले हैं। हे नृसिंहदेव ! आपकी स्तुति की जाती है, इससे संतुष्ट होकर आप स्तवन करनेवाले मुझ भक्तको सुखी बनाइये। आपकी भयङ्कर सेना हमें छोड़कर अन्यत्र आक्रमण करे।' अर्थात् दुष्टोंका संहार और भक्तोंकी रक्षा करे। इस मन्त्रमें भगवान् नृसिंहका 'उग्र' के नामसे स्तवन किया गया है, इसलिये वे 'उग्र' कहे जाते हैं।” देवताओंने पूछा—"प्रजापते ! अब यह बताइये, भगवान्- के लिये 'वीरम्' यह विशेषण क्यों दिया जाता है—वे 'वीर' क्यों कहे जाते हैं ?" इसपर प्रजापति उत्तर देते हैं— “क्योंकि अपनी महिमासे वे सब लोको, सब देवों, सब आत्माओं और सम्पूर्ण भूतोंके साथ विविध प्रकारसे क्रीड़ा करते, सबको विश्राम देते, निरन्तर सृष्टि और पालन करते, उपसंहार करते और अपने अदर लीन करते हैं, अतः 'वीर' कहे जाते हैं। ऋग्वेदका वचन है—भगवान् शूरवीर हैं, कर्मठ हैं, भक्तोंपर अनुग्रह करनेमे पूर्णतः दक्ष हैं, सोमयागमें पत्थर हाथमें लिये रहनेवाले 'अध्वर्यु' आदिके रूपमें भगवान् नृसिंह ही हैं। ये ही देवकाम हैं—देवताओंको उत्पन्न करनेके अभिलाषी हैं।” (प्रश्न) अब यह बतायें—भगवान् 'महाविष्णुम्' क्यों कहे जाते हैं ? (उत्तर) वे अपनी ही महिमासे सब लोकोंको, सब देवताओंको, समस्त आत्माओंको तथा सब भूतोंको व्याप्त करके स्थित हैं। जैसे चिकनाई मास-पिण्डमें व्याप्त रहती है, उसी प्रकार वे शरीरके अवयवोंमे सर्वत्र व्यापक हैं। उन्हींमें यह विश्व लीन होता है। उन्हींमें यह सर्वथा ओतप्रोत एवं सम्बद्ध है। वे इसमें निरन्तर व्याप्त रहते हैं। इससे निरन्तर सम्बन्ध रखकर ही वे व्याप्त और
[दायाँ स्तम्भ]
व्यापक होते हैं। ऋग्वेदमें कहा है—'जिनसे बढ़कर दूसरा कोई उत्पन्न ही नहीं हुआ, जो सर्वव्यापी होनेके कारण सम्पूर्ण विश्वमें समानरूपसे आविष्ट (व्याप्त) हैं, जो प्रजाके पालक हैं और प्रजाके द्वारा जिनकी उपासना होती रहती है, वे भगवान् नृसिंह षोडशकला-विशिष्ट होकर त्रिविध ज्योतियोंमें व्याप्त रहते हैं।' इसीलिये वे 'महाविष्णु' कहलाते हैं। (प्रश्न) अब यह बतायें—भगवान्के लिये 'ज्वलन्तम्' इस विशेषणका प्रयोग क्यों किया जाता है ? (उत्तर) वे अपनी ही महिमासे सब लोकोंको, सब देवताओंको, सब आत्माओंको और सम्पूर्ण भूतोंको अपने तेजसे प्रकाशित करते तथा स्वयं भी प्रज्वलित एव प्रकाशित होते हैं। सब लोक उन भगवान्के ही प्रकाशमे प्रकाशित होते और दूसरोंको भी प्रकाशित करते हैं। ऋग्वेदका वचन है—'वे ही सविता (प्रकाशक) और प्रसबिता (उत्पादक) हैं। वे स्वयं दीप्तिमान् हैं। दूसरोंको उद्दीप्त करते और स्वयं भी उद्दीप्त होते हैं। स्वयं प्रज्वलित होते हुए दूसरोंको प्रज्वलित करते हैं। तपते हुए तपाते हैं तथा संताप देते हैं। स्वयं कान्तिमान् होकर दूसरोंको भी कान्तिमान् बनाते हैं। स्वयं शोभायमान होकर दूसरोंको भी सुशोभित करते हैं तथा परम कल्याणस्वरूप हैं।' इसीलिये उनके लिये 'ज्वलन्तम्' विशेषण- का प्रयोग किया गया है। (प्रश्न) अब यह बतायें—भगवान्को 'सर्वतोमुखम्' क्यों कहा जाता है ? (उत्तर) वे अपनी ही महिमासे सब लोकों, सब देवताओं, सब आत्माओं और सम्पूर्ण भूतोंको, स्वयं इन्द्रियरहित होते हुए भी, सब ओरसे देखते हैं, सब ओरसे सुनते हैं, सब ओरसे जाते हैं, सब ओरसे ग्रहण करते हैं। सर्वत्रगामी होते हुए सब स्थानोंमें विद्यमान रहते हैं। ऋग्वेदमें कहा है—'जो सबसे पहले अकेले था, जो स्वय इस जगत्के रूपमें प्रकट हो गये, जिनसे इस विश्वकी उत्पत्ति हुई है, जो सम्पूर्ण भुवनके पालक हैं, प्रलयकालमें समस्त भुवन जिनमें विलीन होता है, उन सर्वतोमुख (सब ओर मुखोंवाले) भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ।' इस श्रुतिमें उनका 'सर्वतोमुख' नाम प्रयुक्त हुआ है, इसीलिये उन्हें 'सर्वतोमुख' कहते हैं। (प्रश्न) अब यह बतानेकी कृपा करें कि भगवान्को 'नृसिंहम्' क्यों कहा गया है ? (उत्तर) सम्पूर्ण प्राणियोंमें नर (मनुष्य) अधिक पराक्रमी तथा सबसे श्रेष्ठ है। इसी प्रकार सिंह भी सबसे अधिक शक्तिशाली और सबसे अधिक
५७२ * नृसिंहपूर्वतपनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ श्रेष्ठ है, इसलिये परमेश्वर नर और सिंह दोनोंका सयुक्त रूप धारण करके प्रकट हुए। निश्चय ही उनका यह स्वरूप जगत्का कल्याण करनेके लिये ही है। यह स्वरूप सनातन एव अविनाशी है। ऋचा कहती है—'भगवान् विष्णु मृग अर्थात् सिंहरूपमे स्थित होकर उपासकोंद्वारा स्तुत होते हैं। विभिन्न उपासक स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं। स्तुतिका उद्देश्य है—नाना प्रकारकी शक्ति प्राप्त करना। भगवान् सिंहरूपमें प्रकट होकर भी भक्तजनोंके लिये भयङ्कर नहीं हैं। वे पृथिवीपर भी विचरते हैं और पर्वतपर भी स्थित होते हैं। अथवा वे कहाँ नहीं हैं—सभी रूपोंमें हैं, स्तुति करनेवालोंकी वाणीमे भी हैं। ये वे ही भगवान् हैं, जिनके तीन बड़े-बड़े डगोंमें सम्पूर्ण विश्व (तीनों लोक) समा जाते हैं। अथवा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीन रूपोंमें लीला करते हैं।' इन्हीं सब कारणोंसे इन्हें नृसिंह कहते हैं। (प्रश्न) अब यह बतायें कि भगवान्के लिये 'भीषणम्' विशेषणका प्रयोग क्यों किया जाता है? (उत्तर) इनके भीषण रूपको देखकर सब लोक, समस्त देवता और सम्पूर्ण भूत प्राणी भयसे घबराकर भागने लगते हैं, किंतु ये स्वयं किसीसे भी भयभीत नहीं होते। इनके विषयमें ऋचा कहती है—'इनके भयसे ही वायु चलती है, इनके भयसे ही सूर्य ठीक समयसे उदित होता है, इन्द्र, अग्नि और पाँचवीं मृत्यु—ये सब भी इनके भयसे ही अपने-अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये दौड़ लगाते रहते हैं।' इसीलिये इनको 'भीषण' कहा जाता है। (प्रश्न) अब यह बताना चाहिये कि भगवान्को 'भद्रम्' क्यों कहा गया है? (उत्तर) इसलिये कि भगवान् स्वयं भद्र (कल्याण)-स्वरूप होकर सदा सबको भद्र (कल्याण) प्रदान करते हैं। वे कान्तिमान् होकर दूसरोंको कान्तिमान् बनाते और स्वयं शोभासम्पन्न होकर दूसरोंको भी सुशोभित करते हैं तथा साक्षात् कल्याणमय हैं। ऋग्वेद भी कहता है—'देवताओ ! यजन (भगवान्का आराधन) करते हुए हमलोग अपने कानोंसे भद्र (कल्याण) का श्रवण करें। नेत्रोंसे भद्र (कल्याण) का ही दर्शन करें। अपने सुदृढ अङ्गों तथा त्रिविध शरीरोंद्वारा भगवान्का स्तवन करते हुए हमलोग ऐसी आयुका उपभोग करें, जो हमारे उपास्य- देव भगवान्के काम आ सके।' इस श्रुतिमे भगवान्का नाम 'भद्र' आया है। इसलिये उनको 'भद्र' कहते हैं।' (प्रश्न) अब यह बताना चाहिये कि भगवान्के लिये 'मृत्युमृत्युम्' यह विशेषण क्यों प्रयुक्त हुआ है? (उत्तर) इसलिये कि वे स्मरण करते ही अपनी ही महिमाद्वारा अपने भक्तोंकी मृत्यु और अपमृत्यु—अकालमृत्युको भी मार डालते हैं। ऋचा भी कहती है—'जो आत्मा (अपना स्वरूप) और बल प्रदान करनेवाले हैं, सम्पूर्ण देवता जिनके अनुशासनका नतमस्तक होकर पालन करते हैं, जिनकी छाया—जिनका आश्रय अमृतरूप है, जो मृत्युके लिये भी मृत्युरूप हैं, ऐसे एक देवता—भगवान् नृसिंहकी हम हविष्यद्वारा—अपनी ही भेट अर्पण करके उपासना करते हैं।' इस श्रुतिके अनुसार भगवान्का नाम मृत्युमृत्यु भी है, इसीलिये उन्हें 'मृत्युमृत्यु' कहा जाता है। (प्रश्न) अब यह बताना चाहिये कि मन्त्रराज आनुष्टुभमें 'नमामि' इस पदका प्रयोग क्यों किया जाता है? (उत्तर) इसलिये कि जिन्हें सम्पूर्ण देवता, मुमुक्षु तथा ब्रह्मवादी (मुक्त पुरुष) भी नमस्कार करते हैं, उन्हें नमस्कार करना उचित ही है। ऋचा भी कहती है—'वे ब्रह्मा और वेदोंका भी पालन करनेवाले हैं, उन्हींको लक्ष्य करके ब्रह्मा स्तुतिके उपयुक्त मन्त्रोका पाठ करके भगवान्को नमस्कार करते हैं, उन्हींमें इन्द्र, वरुण, मित्र तथा अर्यमा आदि देवताओेने अपना आश्रय बनाया है। इसीलिये उनके प्रति 'नमामि' (नमस्कार करता हूँ) यो कहा जाता है। (प्रश्न) अब यह बतानेकी कृपा करें कि उक्त मन्त्र- मे 'अहम्' इस पदका प्रयोग क्यो किया जाता है? (उत्तर) इसलिये कि श्रुति कहती है—'मैं इस मूर्त और अमूर्त जगत्- से प्रथम उत्पन्न होनेवाला चेतन आत्मा हूँ। देवताओं- से भी पहले मेरी स्थिति है। मैं अमृतका केन्द्र हूँ। हे देव! जो मुझे धारण या स्वीकार करते हैं अथवा जो मुझे अपना आश्रय प्रदान करते हैं, उन्हीं आपने मेरा रक्षण भी किया है। मैं अन्न हूँ। मैं अन्नके भक्षण करनेवालेको भी खा जाता हूँ। मै सम्पूर्ण विश्वको सूर्यकी ज्योतिकी भाँति अपने तेजसे तिरस्कृत कर सकता हूँ।' जो इस प्रकार जानता है, वही यथार्थ उपासक है। यह महोपनिषद् है।
उपनिषद् ४ ] : महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७३ तृतीय उपनिषद् मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति तथा बीज कहते हैं, देवताओंने जिज्ञासापूर्वक प्रजापतिसे कहा- भगवन् ! भगवान् नृसिंहके मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति और बीज क्या हैं, यह हमे बताइये।' तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-भगवान् नृसिंहकी शक्तिभूता जो यह माया है, निश्चय वही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करती है, इस सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करती है तथा इस सम्पूर्ण जगत्का सहार करती है। अतः इस मायाको ही शक्ति जाने। जो इस मायारूप शक्तिको जानता है, वह पापसे तर जाता है, वह मृत्युसे पार हो जाता है, वह ससारसे भी तर जाता है तथा वह अमृतत्वको भी प्राप्त कर लेता है। इस लोकमें वह महती समृद्धि प्राप्त करता है। ब्रह्मवादी विचार करते हैं कि यह माया शक्ति ह्रस्व है या दीर्घ है अथवा प्लुत है ? यदि ह्रस्व है तो इसे इस रूपमे जाननेसे यह सम्पूर्ण पापोंको दग्ध कर देती है और उपासक अमृतत्वको प्राप्त होता है। यदि दीर्घ है तो इसे इस रूपमें जाननेसे साधक महान् ऐश्वर्यको प्राप्त होता है और अमृतत्व को भी प्राप्त कर लेता है। यदि यह प्लुत है तो इसे इस रूपमे जाननेसे मनुष्य ज्ञानवान् होता है और अमृतत्वको भी प्राप्त हो जाता है। इस विषयमें ऋषिने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है-'हे मायाशक्तिरूप बिन्दुयुक्त स्वर ! मैं सरलभावका इच्छुक तथा ससार-सिन्धुसे तरनेके लिये प्रयत्नशील होकर साधनके लिये उपयोगी दीर्घ आयु प्राप्त करनेके उद्देश्यसे भगवान् विष्णुकी शक्ति श्रीदेवीकी, श्रीलक्ष्मीजीकी ( जो नृसिंहदेवकी शक्ति हैं), शङ्करजीकी शक्ति पर्वतराजपुत्री अम्बिकाकी, ब्रह्माजीकी शक्ति सरस्वतीदेवीकी, षष्ठीदेवी (स्कन्दशक्ति)- की, इन्द्रसेना नामसे प्रसिद्ध इन्द्रशक्तिकी तथा ब्रह्मप्राप्तिकी कारणभूता एव साकाररूपमें प्रकट हुई विद्या-शक्तिकी शरण लेता हूँ। आप उपर्युक्त शक्तियोंकी तथा मुझ उपासककी रक्षा करें।' निश्चय ही सम्पूर्ण भूतोंका यह आकाश ही परम आधार है। ये सम्पूर्ण भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होनेपर आकाशसे ही जीवन धारण करते है तथा मृत्यु होनेपर आकाशमें ही लीन हो जाते हैं, इसलिये आकाशको ही बीज- सबका मूल कारण जाने। इस विषयमें ऋषि (मन्त्र) ने यह दृष्टान्त रक्खा है-'विशुद्ध परम धाममे अथवा बुद्धिमे रहनेवाले जो स्वयम्प्रकाश पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्ष- निवासी वसु हैं, घरोंमे उपस्थित होनेवाले अतिथि हैं, यज्ञकी वेदीपर स्थापित होनेवाले अग्निदेव तथा उनमें आहुति डालने- वाले होता भी वे ही हैं, समस्त मनुष्योंमें अर्थात् भूलोकमें, उससे श्रेष्ठ स्वर्गलोकमे तथा सर्वश्रेष्ठ सत्यलोकमें भी उन्हीं- का निवास है। वे ही आकाशमें रहनेवाले हैं। जल, पृथ्वी, सत्कर्म तथा पर्वतोंमें प्रकट होनेवाले भी वे ही हैं, वे ही सबसे महान् परम सत्य हैं।' जो इस प्रकार जानता है, वह भी पूर्वोक्त फलका भागी होता है। यह महोपनिषद् है। चतुर्थ उपनिषद् मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्र, प्रणव वाच्यरूप भगवान् नृसिंहदेवके चार पाद, स्तुतिके मन्त्र उन प्रसिद्ध देवताओंने प्रजापति ब्रह्माजीसे जिज्ञासापूर्वक कहा-'भगवन् ! नृसिंहदेवके मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्रोंका हमारे लिये वर्णन कीजिये।' यह सुनकर वे सुप्रसिद्ध प्रजापति बोले-प्रणव (ॐकार), गायत्री, यजुलैक्ष्मी तथा नृसिंहगायत्री-ये इस मन्त्रराजके अङ्गभूत मन्त्र हैं। इन सबको जानना चाहिये। जो जानता है, वह (लौकिक लाभके साथ ही) अमृतत्वको भी प्राप्त करता है ॥ १॥ 'ॐ' यह अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है। यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् इस परमात्मस्वरूप ॐकारकी ही उपव्याख्या-महिमाका विस्तार है । भूत, वर्तमान और भविष्य-इन तीनों कालोंसे सम्बन्ध रखनेवाला सब कुछ ॐकार ही है। तथा उपर्युक्त तीनों कालोंसे अतीत जो कोई दूसरा तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है। निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है। ये परमात्मा (भगवान् नृसिंहदेव) ब्रह्म हैं। उन सर्वात्मा श्रीनृसिंहदेवके चार पाद हैं। उनके
५७४ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ४ समग्ररूपका तत्त्व समझानेके लिये श्रुतिने यहाँ चार पादोंकी कल्पना की है। जाग्रत्-अवस्था तथा उसके द्वारा उपलक्षित यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् ही जिनका स्थान—शरीर है, अर्थात् जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहे हैं; जिनका ज्ञान इस बाह्य जगत्मे फैला हुआ है अथवा जो बाह्य (स्थूल) जगत्को ही अपनी प्रज्ञाका विषय बनाते हैं; भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य—ये सात लोक ही जिनके अङ्ग हैं; पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि करण ही जिनके मुख हैं, जो स्थूल जगत्के भोक्ता (अनुभव और पालन करनेवाले) हैं तथा जो विश्व शरीरमे स्थित नर (अन्तर्यामी पुरुष) होनेके कारण 'वैश्वानर' नाम धारण करते हैं, वे सर्वरूप 'वैश्वानर' ही पूर्णतम परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके प्रथम पाद हैं। (चार व्यूहोंमें ये ही बलभद्र- स्वरूप हैं।) स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत् ही जिनका स्थान (शरीर) है, जिनका ज्ञान बाह्य जगत्की अपेक्षा आन्तरिक अर्थात् सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है, जो पूर्वोक्त सात अङ्गों और उन्नीस मुखोंवाले हैं, जो सूक्ष्म जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव और पालन करनेवाले हैं, वे तैजस पुरुष (प्रकाशके स्वामी सूत्रात्मा—हिरण्यगर्भ) उन पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके द्वितीय पाद हैं। (चतुर्व्यूहोंमें ये ही प्रद्युम्नरूप हैं।) जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति- अवस्था है। ऐसी सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्की प्रलयावस्था (जब कि सारा विश्व अपने कारणमें विलीन हो जाता है) जिनका स्थान (शरीर) है, अर्थात् समष्टि कारण-तत्त्वमें जिनकी स्थिति है, जो एक रूपमें ही स्थित हैं अर्थात् जिनकी अभी नाना रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं हुई है, घनीभूत विज्ञान ही जिनका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय ही हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिनका मुख है तथा जो एकमात्र अपने स्वरूपभूत आनन्दके ही उपभोक्ता हैं, जिनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं, वे प्राज्ञ पुरुष ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके तृतीय पाद हैं। (चतुर्व्यूहोंमें इन्हीं को अनिरुद्ध कहा गया है।) १ विषय-ग्रहणमे द्वारभूत होनेके कारण इनको मुख कहा गया है। इस प्रकार तीनों पादोंके रूपमें उपवर्णित ये परमात्मा सबके ईश्वर हैं। ये सर्वज्ञ हैं। ये अन्तर्यामी हैं। ये सम्पूर्ण विश्वके कारण हैं। तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, (स्थिति) और प्रलयके स्थान भी ये ही हैं। जो न सूक्ष्मको जानता है न स्थूलको जानता है, और न दोनोंको ही जानता है, जिसे जाननेवाला और न जानने- वाला—कुछ भी नहीं कहा जा सकता और जो न प्रज्ञानका ही घनीभूत रूप है, जो देखा नहीं जा सकता, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता और न पकड़नेमें ही आ सकता है; जिसका कोई लक्षण अथवा चिह्न—आकार भी नहीं है; जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता और न बतलानेमें ही आ सकता है; एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति—अनुभूति ही जिसका सार अथवा स्वरूप है तथा जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है—ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व उन पूर्णब्रह्म परमात्मा नृसिंहदेवका चतुर्थ पाद है। यों ज्ञानी महात्मा मानते हैं। इस प्रकार चार पादोंमें जिनका वर्णन किया गया है, वे ही प्रणववाच्य परमात्मा भगवान् नृसिंहदेव हैं और वे ही जानने- योग्य हैं (उन्हींकी महिमाका इस उपनिषद्में वर्णन है) ॥ २ ॥ अब सावित्रीका परिचय देते हैं। (यद्यपि मन्त्रराजके पदोंमें 'सवितृ'-वाचक शब्दका उपादान नहीं हुआ है, तथापि तिमिरविनाशक सूर्यकी भाँति वह उपासकोंके अन्तस्तमको दूर करनेवाला है—यह प्रदर्शित करनेके लिये ही 'सावित्री' को अङ्ग-मन्त्र माना गया है।) यह सावित्री-मन्त्र गायत्री-छन्द- विशिष्ट यजुर्मन्त्रके रूपमें निरूपित हुआ है। उसके द्वारा ही यह सब कुछ व्याप्त है। आठ अक्षरोंका मन्त्र होनेसे ही उसको गायत्री कहा गया है। मन्त्र इस प्रकार है—'घृणि सूर्य आदित्यः।' 'घृणिः' ये दो अक्षर हैं। 'सूर्यः' ये तीन अक्षर हैं। * तथा 'आदित्यः' ये तीन अक्षर हैं। यह सावित्र-मन्त्रका आठ अक्षरोंवाला पद है, इसको आरम्भमें श्रीबीज (श्रीं) से विभूषित किया जाता है। जो इस प्रकार इस मन्त्रको जानता है, वह लक्ष्मीके द्वारा अभिषिक्त होता है। यही बात ऋचा- द्वारा कही गयी है—'ऋग्वेदकी ऋचाएँ अविनाशी परम- व्योमरूप स्वप्रकाश परमात्मामे प्रतिष्ठित हैं, जहाँ कि सम्पूर्ण
- यद्यपि इसमें दो ही अक्षर सस्वर हैं, तथापि वैदिक छन्दोंके लिये स्वीकृत व्यूहके नियमानुसार 'सूर्य' के स्थानमें 'सूरिय' पाठ मानकर गणना करनेसे तीन अक्षर होते हैं। गायत्री-मन्त्रमें भी 'वरेण्यम्' के स्थानमें 'वरेणियम्' मानकर गणना करनेसे ही चौबीस अक्षर पूरे होते हैं।
उपनिषद् ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७५ देवता भलीभाँति निवास करते हैं। जो उपासक उन स्वप्रकाश परमात्माको नहीं जानता, वह ऋचाओंके स्वाध्यायसे क्या कर लेगा ? तथा जो उन परमात्माको जानते हैं, वे ही ये उपासक उनके परमधाममें सुखपूर्वक निवास करते हैं।' इसी प्रकार जो सावित्र-मन्त्रको जानता है, उसको ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। ॐ भूर्लक्ष्मीर्भुवर्लक्ष्मी स्वर्लक्ष्मी कालकर्णी तन्नो महा- लक्ष्मीः प्रचोदयात् । 'जो सच्चिदानन्दमयी देवी भूर्लोककी लक्ष्मी-शोभा, भुवर्लोककी लक्ष्मी तथा स्वर्लोककी लक्ष्मी हैं, जो कालकर्णी नामसे विख्यात हैं, वे भगवती महालक्ष्मी हमें सत्कमोंके लिये प्रेरणा देती रहें।' निश्चय ही यह महालक्ष्मीकी यजुर्वेदोक्त गायत्री है, जो चौबीस अक्षरोंकी है। यह सब—जो कुछ यह प्रतीत हो रहा है, निःसन्देह गायत्री ही है। इसलिये जो इस यजुर्वेदसम्बन्धिनी महालक्ष्मी गायत्रीको जानता है, वह बड़ी भारी सम्पत्तिको प्राप्त होता है। ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नः सिंहः प्रचोदयात् । 'ॐश्रीनृसिंहदेवकी प्राप्तिके लिये हम उपासना करते हैं, वज्रके समान नखोंवाले उन भगवान्के लिये ही उनके स्वरूपका हम चिन्तन करते हैं, वे भगवान् नरसिंह हमे प्रेरणा दें।' यही नृसिंहगायत्री है, जो देवताओं और वेदोंका भी आदि कारण है। जो इस प्रकार जानता है, वह आदि- कारणभूत भगवान्से संयुक्त होता है ॥ ३ ॥ देवताओंने प्रजापतिसे फिर पूछा—'भगवन् ! किन मन्त्रोंसे स्तुति करनेपर भगवान् नृसिंहदेव प्रसन्न होते और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं, यह हमें बतलायें।' यह सुनकर उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा- ॐ उं ॐ यो ह वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च ब्रह्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ ॐ ग्रं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च विष्णुर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २ ॥ ॐ वीं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च महेश्वरो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३ ॥ ॐ रं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च पुरुषो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४ ॥ ॐ मं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्चेश्वरो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ५ ॥ ॐ हां ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या सरस्वती भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ६ ॥ ॐ विं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या श्रीर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ७ ॥ ॐ ष्णु ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या गौरी भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ८ ॥ ॐ ज्व ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या प्रकृति- र्भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९ ॥ ॐ ल ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या विद्या भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १० ॥ ॐ त ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्चोङ्कारो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ११ ॥ ॐ स ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्याश्चतस्रोऽर्ध- मात्रा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १२ ॥ ॐ वं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये च वेदाः साङ्गाः सशाखा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ १३ ॥ ॐ तों ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये पञ्चाग्नयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ १४ ॥ ॐ मु ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या सप्तव्याहृतयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ १५ ॥ ॐ खं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये चाष्टौ लोक- पाला भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १६ ॥ ॐ नृं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये चाष्टौ वसवो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १७ ॥ ॐ सिं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये च रुद्रा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १८ ॥ ॐ हूं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये च आदित्या भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १९ ॥ ॐ मी ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये चाष्टौ ग्रहा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २० ॥ ॐ पं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यानि पञ्च महा- भूतानि भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २१ ॥ ॐ णं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च कालो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २२ ॥ ॐ भ ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च मनुर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २३ ॥
५७६ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ४ ॐ द्रूं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च मृत्युर्भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २४ ॥ ॐ मूं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च यमो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २५ ॥ ॐ त्युं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्चान्तको भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २६ ॥ ॐ मृं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च प्राणो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २७ ॥ ॐ त्युं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च सूर्यो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २८ ॥ ॐ नं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च सोमो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २९ ॥ ॐ मा ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च विराट् पुरुषो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३० ॥ ॐ म्य ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च जीवो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३१ ॥ ॐ हुं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च सर्वं भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३२ ॥ 'ॐ (उ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि ब्रह्मा एव भू भुवःस्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हीं को हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ग्र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विष्णु एव भू-भुवःस्वः - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (वीं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि महेश्वर तथा भू-भुव. और स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेन हैं, जो कि पुरुष एव भू-भुव स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (म) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि ईश्वर एव भू-भुव.- स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (हा) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सरस्वती एव भू-भुव स्व - त्रिभुवनरूप है, उन्हें ही हमारा वारंवार नमस्कार है। ॐ (विं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि श्री एव भू-भुव- स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ष्णु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि गौरी एव भू भुव स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ज्व) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव है, जो कि प्रकृति एव भू.- भुवः स्वः-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ल) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विद्या एव भूः-भुवः स्वः-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा वारवार नमस्कार है। ॐ (त) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि ॐकार एव भू. भुव' स्व.- त्रिभुवनरूप है, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (स) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि चार अर्धमात्रा एव भूः-भुव.- स्व'- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (वं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि अङ्ग, शाखा और इतिहाससहित वेद एव भू.- भुव स्व - त्रिभुवनरूप है, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (तों) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि पाँच अग्नियों एव भूः-भुवःस्वः - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (मु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सात महाव्याहृतियाँ एव भू'-भुव, स्वः- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ख) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि आठ लोकपाल एव भू'-भुवः स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (तृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव है, जो कि आठ वसु एव भूः-भुवः- स्वः- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (सिं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव है, जो कि ग्यारह रुद्र एव भू'-भुवः-स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा वारवार नमस्कार है। ॐ (ह) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि बारह आदित्य एव भू.-भुव. स्व-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा वारवार नमस्कार है। ॐ (र्भी) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि आठ ग्रह एव भूः-भुव.- स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ष) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि पञ्च महाभूत एव भू'-भुव. स्वः- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ण) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि काल एव भूः-भुव स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (भ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान्
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उपनिषद् ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७७ नृसिंहदेव हैं, जो कि मनु एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (द्र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि मृत्यु एवं भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (मृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि यम एवं भूः भुव.-स्व'— त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (त्युं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि अन्तक एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (मृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि प्राण एव भूः- भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (त्यु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सूर्य एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (न) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सोम एवं भूः-भुवः-स्व.-—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (ग) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विराट् पुरुष एव भूः-भुवः- स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (म्य) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि जीव एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हे, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (ह) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सर्वरूप एव भूः- भुव स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है॥ १-३२॥ ये (मन्त्रराजके ३२ अक्षरोंके अनुसार) बत्तीस मन्त्र हैं। इन मन्त्रोंको बताकर प्रजापतिने उन देवताओंसे कहा— 'देवगण ! तुमलोग इन मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान्का स्तवन करो। इससे भगवान् नृसिंहदेव प्रसन्न होते और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं। इसलिये जो इन मन्त्रोंद्वारा नित्य भगवान् नरसिंहदेवकी स्तुति करता है, वह उनका प्रत्यक्ष दर्शन पाता है तथा उनके विश्वरूपको देख लेता है। साथ ही वह अमृतत्वको भी प्राप्त होता है। जो इस प्रकार जानता है, उसे भी वही फल मिलता है। यह महोपनिषद् है॥ ४॥
पञ्चम उपनिषद् आनुष्टुभ मन्त्रराजके सुदर्शन नामक महाचक्रका वर्णन, मन्त्रराजके जपका फल
कहते हैं, देवताओंने श्रद्धापूर्वक प्रजापतिसे कहा— "भगवन् ! श्रीमन्नृसिंहदेवके आनुष्टुभ मन्त्रराजका जो 'महाचक्र' नामक चक्र है, उसका हमसे वर्णन कीजिये। यह चक्र सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा मोक्षका द्वार है—इस प्रकार योगीजन वर्णन करते हैं।" यह सुनकर वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले—निश्चय ही यह सुदर्शन नामक महाचक्र छः अक्षरोंका है, इसीलिये यह छः अरोंसे युक्त होता है—छः दलोंवाला चक्र बनता है। छः ही ऋतुएँ होती हैं, ऋतुओंसे ही इसके अरोंकी समानता की जाती है। अर्थात् इसके छः दलोंमें छः ऋतुओंकी भावना करनी चाहिये। इसके मध्यमें नाभि होती है। नाभिमे ही ये अरे प्रतिष्ठित होते हैं। फिर यह सारा चक्र मायारूप नेमिसे आवेष्टित होता है। माया आत्माका स्पर्श नहीं करती, इसलिये वह षड्दल चक्र बाहरकी ओरसे ही मायाद्वारा आवेष्टित होता है। इसके बाद आठ अरोंसे युक्त अष्टदल चक्र बनता है। आठ अक्षरोंकी ही एक पादवाली गायत्री होती है; गायत्रीके अक्षरोंसे ही इस चक्रके अरोंकी तुलना की जाती है। (इसके आठ दलोंमे गायत्रीके एक पादकी भावना करे।) यह भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। निश्चय ही यह माया प्रत्येक क्षेत्रको व्याप्त किये रहती है। इसके बाद द्वादश अरोंसे युक्त द्वादशदलका चक्र होता है। बारह अक्षरोंका ही जगती छन्द (का एक पाद) होता है। जगतीकी अक्षर संख्यासे ही यह चक्र संतुलित होता है। (इसके द्वादश दलोंमें जगतीके एक पादकी भावना करे।) यह भी बाहरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। तदनन्तर षोडशारचक्र है, जो सोलह दलोंसे सम्पन्न होता है। निश्चय ही पुरुष सोलह कलाओंसे युक्त है। पुरुष (परमात्मा) ही यह सब कुछ है। अतः षोडशार चक्रके अरोंको पुरुषकी कलाओंकी उपमा दी जाती है। (इसके षोडश दलोंमें पुरुषकी— अन्तर्यामी परमात्माकी सोलह कलाओंकी भावना करे।) यह भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। तत्पश्चात् बत्तीस अरोंसे युक्त अर्थात् बत्तीस दलोंवाला चक्र है। बत्तीस अक्षरों- का ही अनुष्टुप् छन्द होता है। अनुष्टुप्के अक्षरोंसे ही इसके उ० अं० ७३—
५७८ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ५
अरोंकी तुलना होती है। (इसके बत्तीस दलोंमें अनुष्टुप्की भावना करे।) यह चक्र भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित है। अरोंसे ही यह पूर्णतः आवृद्ध है । वेद ही इसके अरे हैं। पत्तोंसे ही यह सब ओर घूमता है। छन्द ही इसके पत्ते हैं ॥ १ ॥
यह बत्तीस दलोंसे सम्पन्न महाचक्र ही सुदर्शन नामसे विख्यात है। इसके मध्यभागमें स्थित जो नाभिस्थान है, उसमें नृसिंह देवता-सम्बन्धी अविनाशी तारक-मन्त्रका न्यास करे। वह तारक-मन्त्र एक अक्षरका-ॐ है। छः पत्रोंमें छः अक्षरोंवाले 'सहस्रार हुं फट्' इस सुदर्शन मन्त्रका न्यास होता है। आठ दलोंमें आठ अक्षरोंवाले 'ॐ नमो नारायणाय' इस नारायण-मन्त्रका न्यास होता है। बारह दलोंमें द्वादशाक्षर वासुदेव मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) का न्यास किया जाता है। सोलह दलोंमें वर्णमालाके आदि सोलह अक्षर, जो बिन्दुयुक्त सोलह स्वर-वर्णोंके रूपमें हैं, रक्खे जाते हैं। बत्तीस दलोंमें बत्तीस अक्षरोंके नृसिंह-देवतासम्बन्धी मन्त्रराज आनुष्टुभका न्यास किया जाता है । ( एक एक दलमें मूल मन्त्रके एक एक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके रक्खा जाता है।) यही यह सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध महाचक्र है, जो सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, मोक्षका द्वार, ऋक्, यजुः और सामवेदस्वरूप तथा ब्रह्ममय एवं अमृतमय है । उसके पूर्वभागमें आठ वसुगण रहते हैं । दक्षिणभागमें ग्यारह रुद्र, पश्चिमभागमें बारह आदित्य, उत्तरभागमें विश्वेदेव, नाभिमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजी एवं पार्श्वभागमें सूर्य और चन्द्रमा हैं।
यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है- 'अविनाशी परम आकाशस्वरूप भगवान् नृसिंहमें (तथा उनके इस सुदर्शन महाचक्रमें) ही ऋक् आदि सम्पूर्ण वेद प्रतिष्ठित हैं। उनमें ही सम्पूर्ण देवता निवास करते हैं। जो उन परमात्मा नृसिंह- देव तथा उनके महाचक्रको नहीं जानता, वह ऋग्वेद पढ़कर क्या करेगा ? उसका वेदाध्ययन व्यर्थ है। और जो उन भगवान् नृसिंहदेव तथा उनके सुदर्शन महाचक्रको जानते हैं, वे ही उपासक भगवान्में उत्तम स्थितिको प्राप्त करते हैं।' इस सुदर्शन नामक महाचक्रको जो बालक अथवा युवा होकर भी जान लेता है, वह महान् बन जाता है, वह सबका गुरु है। वह सब मन्त्रोंका उपदेशक हो जाता है। मन्त्रराज अनुष्टुप्से होम करे । अनुष्टुप्-मन्त्रसे ही पूजन करे। यह सुदर्शन महा- चक्र राक्षसजनित भयका नाश करनेवाला है, मृत्युसे तारने- वाला है। इसे यन्त्ररूपसे गुरुद्वारा प्राप्त करके कण्ठमें, बाँह में अथवा शिखामें बाँध ले । इस मन्त्रके उपदेशक गुरुको सात द्वीपोंवाली समूची पृथ्वी भी दक्षिणारूपमें दे दी जाय तो उसके लिये यह पर्याप्त नहीं है। अर्थात् उस मन्त्रकी महिमाके समक्ष सम्पूर्ण पृथ्वीका दान भी तुच्छ है । अतएव श्रद्धा और शक्तिके अनुसार जो कुछ भी हो सके, थोड़ी बहुत भूमि दान करनी चाहिये, वही दक्षिणा होती है ॥ २ ॥
उन प्रसिद्ध देवताओंने पुनः प्रजापतिसे श्रद्धापूर्वक पूछा- 'भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज नारसिंहका क्या फल है, यह हमें बताइये ।'
यह सुनकर उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-जो इस नारसिंह मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह मानो अग्निमें तपाया जाकर शुद्ध हो जाता है। वह वायुपूत होता है। वह सूर्य और चन्द्रमाद्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। वह सत्यपूत होता है; वह लोकपूत होता है, वह ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा समस्त वेदोंद्वारा पवित्र कर दिया जाता है।
सारांश यह कि वह सबके द्वारा सर्वथा पवित्र कर दिया जाता है ॥ ३ ॥
जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह मृत्युको पार कर जाता है। वह पापसे तर जाता है। वह ब्रह्महत्याको पार कर जाता है। वह भ्रूणहत्यासे तर जाता है। वह वीरहत्यासे तर जाता है। वह सबकी हत्यासे तर जाता है। वह जन्म-मृत्युरूप संसारको पार कर जाता है। वह सबको पार कर जाता है। वह सबको पार कर जाता है ॥४॥
जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह अग्निकी गतिको रोक देता है, वह वायुकी गतिको रोक देता है, वह सूर्यकी गतिको रोक देता है, वह चन्द्रमाकी गतिको रोक देता है, वह जलके प्रवाह को रोक देता है, वह सम्पूर्ण देवताओंको स्तब्ध कर देता है, वह सम्पूर्ण ग्रहोंकी गतिको रोक देता है तथा वह विषका भी स्तम्भन कर देता है॥५॥
जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह देवताओंका आकर्षण कर लेता है। वह यक्षोंको भी अपने पास खींच लेता है। वह नागोंका आकर्षण कर लेता है। वह ग्रहोंको अपने समीप आकृष्ट कर लेता है। वह मनुष्योंको भी आकृष्ट कर लेता है। वह सबको आकृष्ट कर लेता है। वह सबको आकृष्ट कर लेता है ॥ ६ ॥
जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह भूलोकको जीत लेता है, वह भुवर्लोकको जीत लेता है, वह स्वर्गलोकको जीत लेता है, वह महर्लोकको जीत लेता है, वह जनलोकको जीत लेता है, वह तपोलोकको जीत लेता है, वह सत्यलोकको जीत लेता है, वह सब लोकोंको जीत लेता है, वह सब लोकोंको जीत लेता है ॥ ७ ॥
जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका
उपनिषद् ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७९
नित्य जप करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञद्वारा यजन कर लेना है, वह उक्थ्य यागद्वारा यजन कर लेता है, वह 'षोडशी' से यजन कर लेता है, वह वाजपेयद्वारा यजन कर लेता है । वह अतिरात्रद्वारा यजन कर लेता है । वह आप्तोर्यामद्वारा यजन कर लेना है। वह अश्वमेघद्वारा यजन कर लेता है। वह सम्पूर्ण क्रतुओंकेद्वारा यजन कर लेता है। वह सम्पूर्ण क्रतुओंकेद्वारा यजन कर लेता है ॥ ८ ॥
जो भगवान् नृसिंहदेवके इस मन्त्रराज आनुष्टुभका नित्य जप करता है, वह मानो ऋग्वेदका स्वाध्याय करता है। वह यजुर्वेदका स्वाध्याय करता है। वह सामवेदका स्वाध्याय करता है। वह अथर्ववेदका स्वाध्याय करता है। वह उसीके आङ्गिरस भागका स्वाध्याय करता है। वह शाखाओंका स्वाध्याय करता है। वह पुराणोंका स्वाध्याय करता है। वह कल्पों (यज्ञविधिको बतलानेवाले शास्त्रों) का स्वाध्याय करता है। वह गाथाओंका अध्ययन करता है। वह नाराशंसी नामक आख्यानोंका अध्ययन करता है। वह प्रणवका अध्ययन करता है। जो प्रणवका अध्ययन करता है, वह सबका अध्ययन करता है। वह सबका अध्ययन करता है ॥ ९ ॥
जिनका उपनयन-संस्कार नहीं हुआ है, ऐसे जो सौ बालक हैं, वे एक उपनयन-संस्कारसम्पन्न ब्रह्मचारीके तुल्य हैं। जो सौ ब्रह्मचारी हैं, वे एक श्रोत्रिय (वेदपाठी) गृहस्थके तुल्य हैं। जो सौ गृहस्थ हैं, वे एक वानप्रस्थके तुल्य हैं, जो सौ वानप्रस्थ हैं, वे एक सन्यासीके तुल्य हैं। जो सौ सन्यासी हैं, वे एक रुद्र-जापक (रुद्र-मन्त्र अथवा रुद्राष्टाध्यायीका पाठ करनेवाले साधक) के तुल्य हैं। जो सौ रुद्र-जापक हैं, वे एक अथर्वाङ्गिरस् एव अथर्वशिखा नामक उपनिषद्का स्वाध्याय करनेवालेके तुल्य हैं तथा जो सौ अथर्ववेदीय उपनिषदोंके स्वाध्यायकर्ता हैं, वे मन्त्रराज नारसिंहका जप करनेवाले एक साधकके तुल्य हैं। मन्त्रराज-का जप करनेवाले उपासकको वह परम धाम निश्चय ही प्राप्त होता है, जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहती, जहाँ चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होता, जहाँ तारे नहीं चमकते, जहाँ आग नहीं जलाती, जहाँ मृत्यु नहीं प्रवेश कर पाती, जहाँ दुःखका कोई प्रभाव नहीं होता, जो सदा आनन्दमय, परमानन्दपूर्ण, शान्त, शाश्वत, सदा कल्याणमय, ब्रह्मादि देवताओंकेद्वारा वन्दनीय तथा योगियोंका भी परम ध्येयरूप परमपद है और जहाँ जाकर योगी (परमात्मामें लगे हुए पुरुष) इस संसारमें नहीं लौटते।
इसके सम्बन्धमें ऐसी ही बात ऋग्वेदकी ऋचाद्वारा भी बतायी गयी है—
‘जो आकाशमें तेजोमय सूर्यमण्डलकी भाँति, परमव्योममें चिन्मय प्रकाशद्वारा सब ओर व्याप्त है, भगवान् विष्णुके उस परमधामको विद्वान् उपासक सदा ही देखते हैं। साधनामे सदा जाग्रत् रहनेवाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँचकर उस परमधामको और भी उद्दीप्त किये रहते हैं, जिसे विष्णुका परम पद कहते हैं।' वह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है। वह यह परम पद निष्काम उपासकको प्राप्त होता है। जो इस प्रकार जानता है, वह उक्त फलका भागी होता है। यह महा-उपनिषद् है ॥ १० ॥
॥ अथर्ववेदीय नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीनृिं'होत्तर पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड 'ॐ' नामसे परमात्म-तत्त्वका तथा उसके चार पादोंका वर्णन, चौथे पादके चार भेद
कहते हैं, एक बार देवताओंने प्रजापति ब्रह्माजीसे कहा—'भगवन् ! जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन प्रणव- रूप परमात्माके तत्त्वका हमसे स्पष्ट वर्णन कीजिये ।' इसपर ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया— 'ॐ' यह अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है । यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् उस परमात्मस्वरूप ॐकारकी ही उपव्याख्या—महिमाका विस्तार है । अतीत, वर्तमान और अनागत—इन तीनों कालोंमें होनेवाला यह सारा जगत् ॐ- कार ही है । तथा जो उपर्युक्त तीनों कालोंसे अतीत एवं जगत्से भिन्न कोई तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है । निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है । यह आत्मा भी ब्रह्म है । इस आत्माकी 'ओम्' इस नामसे अभिहित ब्रह्मके साथ एकता करके तथा ब्रह्मकी आत्माके साथ 'ॐ'कारके वाच्यार्थ- रूपसे एकता करके, वह एकमात्र (अद्वितीय), जरारहित, मृत्युरहित, अमृतस्वरूप, निर्भय, चिन्मय तत्त्व 'ओम्' है— इस प्रकार अनुभव करे । उस परमात्मस्वरूप ॐकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन शरीरोंवाले इस सम्पूर्ण दृश्य- प्रपञ्चका आरोप करके, अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य हैं, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म एव कारण-जगत्की कल्पना हुई है—विवेकद्वारा इस प्रकार अनुभव करके यह निश्चय करे कि यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है । तथा तन्मय (परमात्ममय) होनेके कारण अवश्य यह तत्स्वरूप (परमात्मारूप) ही है, इस दृढ निश्चयके द्वारा जगत्को 'ओम्' के वाच्यार्थभूत परमात्मामे विलीन कर डाले । साथ ही उस त्रिविध शरीरवाले आत्माका 'यह त्रिविध शरीररूप उपाधिसे युक्त परब्रह्म ही है' इस प्रकार चिन्तन करे । स्थूल (विराट् जगत्स्वरूप) एव स्थूल जगत्का भोक्ता, साथ ही-साथ सूक्ष्म (सूक्ष्म जगत्स्वरूप) एव सूक्ष्म जगत्का भोक्ता होनेके कारण तथा उसी प्रकार एकमात्र आनन्दस्वरूप एव आनन्दमात्रका उपभोक्ता और साथ ही इन सबसे विलक्षण होनेके कारण वह आत्मा (परमात्मा) चार पादोंवाला है । जाग्रत्-अवस्था तथा इसके द्वारा उपलक्षित यह सम्पूर्ण जगत् ही जिनका स्थान अर्थात् शरीर है, जो सम्पूर्ण विश्वमे व्याप्त हो रहे हैं; जिनका ज्ञान इस स्थूल (बाह्य) जगत्में सब ओर फैला हुआ है; भूः, भुवः, स्वः आदि सात लोक ही जिनके सात अङ्ग हैं; पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि करण ही जिनके मुख हैं, जो स्थूल जगत्के भोक्ता हैं,
खण्ड १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५८१ [ बायाँ स्तम्भ ] धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ जिनके स्वरूप हैं अथवा स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है तथा जो विश्व-शरीरमें स्थित नर होनेके कारण 'वैश्वानर' कहलाते हैं, वे सर्वरूप वैश्वानर ही पूर्णतम परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके प्रथम पाद हैं। (चार व्यूहोंमें इन्हींको बलभद्ररूप माना गया है।) स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत् ही जिनका स्थान (शरीर) है, जिनका ज्ञान बाह्य जगत्की अपेक्षा आन्तरिक अर्थात् सूक्ष्म जगत्मे व्याप्त है, जो पूर्वोक्त सात अङ्गों और उन्नीस मुखोंवाले तथा सूक्ष्म जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव और पालन करनेवाले हैं, वे पूर्ववत् चार स्वरूपोंवाले तैजस (प्रकाशके स्वामी) सूत्रात्मा—हिरण्यगर्भ उन पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके द्वितीय पाद हैं। (चार व्यूहोंमें इन्हींको प्रद्युम्न कहा गया है।) जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति- अवस्था है। ऐसी सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्की प्रलयावस्था (जब कि सम्पूर्ण विश्व अपने कारणमें विलीन हो जाता है) जिनका स्थान (शरीर) है, अर्थात् समष्टि कारण-तत्त्वमें जिनकी स्थिति है, जो एकरूपमे ही स्थित हैं—जिनकी अभी नाना रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं हुई है; घनीभूत विज्ञान ही जिनका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय ही हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिनका मुख है, ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है * तथा जो एकमात्र अपने स्वरूपभूत आनन्दके ही उपभोक्ता हैं, जिनके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं, वे प्राज्ञ नामसे प्रसिद्ध ईश्वर ही पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके तृतीय पाद हैं। (चार व्यूहोंमें ये ही 'अनिरुद्ध' नामसे प्रसिद्ध है।) इस प्रकार तीनों पादोंके रूपमें वर्णित ये परमात्मा सबके ईश्वर हैं। ये सर्वज्ञ हैं। ये अन्तर्यामी ह। ये सम्पूर्ण विश्वके कारण हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान भी ये ही हैं। जाग्रत् आदि तीनों ही अवस्थाओंमे लक्षित होनेवाला यह जगत् भी वास्तवमे सुषुप्तरूप ही है, क्योंकि इनसे मोहित हुए मनुष्योंको कभी किसी भी वस्तुका तात्त्विक ज्ञान नहीं
- 'ओत' आदिका स्वरूप आगे बताया जायगा। [ दायाँ स्तम्भ ] होता। इसी प्रकार यह त्रिविध जगत् स्वप्नवत् भी है; क्योंकि यहाँ वस्तुका प्रायः विपरीत ही ज्ञान होता है। इतना ही नहीं, कुछ-का-कुछ प्रतीत होनेके कारण यहाँ सब कुछ मायामात्र ही है। परमात्मा इससे विलक्षण हैं, क्योंकि ये परमात्मा एकमात्र चिन्मय रसरूप हैं। उक्त तीनों पादोंके अतिरिक्त जो चौथा पाद है, वह ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार भेदोंके कारण चार रूपवाला है। उपर्युक्त चारों पाद तुरीय ही कहलाते हैं; क्योंकि प्रत्येक रूपका तुरीयमे ही पर्यवसान (लय) होता है। इस तुरीय पादमें भी जो ओत, अनुज्ञातृ और अनुज्ञारूप तीन भेद हैं, इन तीनोंको भी पूर्ववत् सुषुप्ति एव स्वप्नके समान तथा मायामात्र ही समझना चाहिये, क्योंकि पारमार्थिक तुरीयरूप जो निर्विकल्प एव निर्विशेष परमात्मा हैं, वे एकमात्र चिन्मय रसरूप ही हैं*।
- इस प्रसङ्गका सारांश यों समझना चाहिये—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-कालमें अनुभव किया जानेवाला जो कुछ भी प्राकृत प्रपञ्च या सुख है, वह सब कार्य है और तुरीय उसका कारण है। कारणमें ही कार्यकी कल्पना होती है, अतः कारण ही सत्य है। कारणके भी साक्षी हैं सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा। वे कहीं सत्- रूपसे, कहीं चित्-रूपसे, कहीं आनन्दरूपसे और कहीं सत् आदि समस्त रूपोंसे कारणमें व्याप्त हैं। इस प्रकार कारणमें परमात्माकी व्यापकताका चिन्तन करना ओतयोग कहलाता है। व्याप्त वस्तु- की सत्ता व्यापकके ही अधीन होती है, इस न्यायसे परमात्माके द्वारा व्याप्त कारण-तत्त्वकी स्वतः कोई सत्ता आदि नहीं है। वह परमात्माके अधीन सत्ताका ही प्रकाशक होनेके कारण परमात्मामें ही आरोपित या कल्पित है। इस प्रकारके चिन्तनका नाम अनुज्ञातृ- योग है। अध्यस्त, आरोपित या कल्पित वस्तु अपने अधिष्ठानसे पृथक् अस्तित्व नहीं रखती, वह अधिष्ठानस्वरूप ही समझी जाती है। अतः परमात्मामें आरोपित कारण-तत्त्व भी उनसे पृथक् नहीं, परमात्मरूप ही हैं। इस प्रकारका चिन्तन अनुज्ञायोग कहा गया है। ये तीनों योग कारण-ज्ञानकी अपेक्षा रखते हैं, अतः कारणमें ही इनका अन्तर्भाव है। इसीलिये इनके पृथक् अस्तित्वको सुषुप्त, स्वप्न एव मायामात्र बताया गया है। इन योगोंद्वारा कारणका लय या सहार होता है। लयके आधार हैं तुरीय परमात्मा, अतः इन सबको तुरीयपादरूप बताना उचित ही है। परमात्मा ही 'अविकल्प' नामसे निर्दिष्ट पारमार्थिक तुरीय हैं। 'अथातआदेश ' आदिके द्वारा श्रुति उन्हींके स्वरूपकी ओर संकेत करती है।
५८२ - श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् - [ खण्ड २
अनन्तर श्रुतिका यह आदेश (उपदेश) है—'जो न स्थूलको जानता है, न सूक्ष्मको जानता है और न दोनोंको ही जानता है, जो न तो जाननेवाला है, न नहीं जाननेवाला है और न प्रज्ञानका ही घनीभूत रूप है जिसे देखा नहीं जा सकता, व्यवहारमे नहीं लाया जा सकता, जो पकड़नेमें नहीं आ सकता, जिसका कोई लक्षण-चिह्न अथवा आकार भी नहीं है; जो चिन्तन करनेमे नही आ सकता जिसे किसी विशिष्ट रूपसे बताया नहीं जा सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति (अनुभूति) ही जिसका सार अथवा स्वरूप है एवं जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है—ऐसा सर्वथा कल्याणमय, परम शान्त अद्वितीय तत्त्व ही उन पूर्णब्रह्म परमात्मा नृसिंहदेवका चतुर्थ पाद है—यों ज्ञानी महात्मा मानते हैं।' इस प्रकार चार पादोंमे जिनका वर्णन किया गया है, वे भगवान् नृसिंहदेव ही सबके आत्मा हैं, वे ही जाननेयोग्य हैं। वे कारणात्मा ईश्वर (अथवा त्रिभुवनका ग्रासन करनेवाले इन्द्र आदि) को भी अपना ग्रास बना लेते—अपनेमे लीन कर लेते हैं। वे तुरीयके भी तुरीय हैं। (अतः परमात्माको ही जानने और पानेका प्रयत्न करना चाहिये) ॥ १॥
द्वितीय खण्ड
परमात्माके चार पादोंकी ओंकारकी मात्राओंके साथ एकता, मन्त्रराज आनुष्टुभके
द्वारा तुरीय परमात्माका ज्ञान
निश्चय ही उन 'तुरीय नामसे प्रसिद्ध इन चार पादोंवाले
परमात्माको ओङ्कारकी मात्राओ तथा समस्त ॐकारके साथ
एकीकृत करे। अर्थात् ॐकारको परमात्मा तथा उसकी चार
मात्राओंको परमात्माके चार पाद मानकर उसी रूपमे उनकी
भावना करे। वे परमात्मा जाग्रत्कालमे स्वप्न और सुषुप्तिसे
रहित हैं, स्वप्नकालमे जाग्रत् और सुषुप्तिसे रहित हैं, सुषुप्तिमे
जाग्रत् तथा स्वप्नसे रहित हैं, और तुरीयावस्थामें जाग्रत्, स्वप्न
एव सुषुप्ति—तीनोंसे रहित हैं। प्रत्येक अवस्थामें पृथक् पृथक्
रहते हुए भी वे सभी अवस्थाओंसे संयुक्त हैं। कहीं भी उनका
व्यभिचार (अभाव) नहीं है। इस प्रकार वे नित्य, अनन्त,
सत्यस्वरूप तथा एकरस हैं। नेत्रके द्रष्टा हैं, श्रोत्र-इन्द्रियके
द्रष्टा हैं। ये दोनों भी उपलक्षणमात्र हैं, वे घ्राणेन्द्रिय, रसना
और त्वचाके भी द्रष्टा हैं। वाक् आदि कर्मेन्द्रियोंके द्रष्टा,
मनके द्रष्टा, बुद्धिके द्रष्टा, प्राणके द्रष्टा, तम अर्थात् अहङ्कारके
द्रष्टा हैं, कहाँतक गिनायें, वे सबके द्रष्टा हैं। इसीलिये वे
सबसे भिन्न और सबसे विलक्षण हैं। द्रष्टा दृश्यसे भिन्न होता
ही है। 'द्रष्टा' कहनेसे कोई यह न समझ ले कि वे राग
अथवा द्वेषपूर्वक इन सबको देखते हैं, नहीं-नहीं, वे साक्षी
हैं—पक्षपातरहित हैं। वे नेत्रके साक्षी हैं, श्रवणेन्द्रियके साक्षी
हैं, घ्राणेन्द्रिय, रसना और त्वचाके भी साक्षी हैं। वाक् आदि
कर्मेन्द्रियोंके साक्षी, मनके साक्षी, बुद्धिके साक्षी, प्राणके साक्षी
हैं, तमके साक्षी—नहीं-नहीं, सबके साक्षी हैं। इसीलिये वे
निर्विकार हैं, महाचैतन्यस्वरूप—आत्माके भी आत्मा हैं।
इन पुत्र-वित्तादि तथा नेत्र-श्रोत्रादि सबसे बढ़कर प्रियतम है
और इस प्रकार आनन्दके घनीभूत विग्रह हैं। इस समस्त
प्रपञ्चके पूर्वसे ही वे भलीभाँति प्रकाशित हो रहे हैं। अतः
एकरस ही है। जरा आदि अवस्थाएँ अथवा विकार उनका
स्पर्श भी नहीं कर सकते। और तो और, मृत्यु भी उनसे
दूर रहती है। वे अमृत एवं अभय ब्रह्म ही है। फिर भी
अपनी मायाशक्तिसे चार पादवाले बने हुए हैं।
जाग्रत्-अवस्था तथा उनके द्वारा उपलक्षित यह स्थूल
जगत् जिनका स्थान (शरीर) है, जिनके स्थूल, सूक्ष्म, कारण
और साक्षी—ये चार स्वरूप हैं, वे विश्वरूप वैश्वानर पूर्ण-
तम परमात्माके प्रथम पाद है। और वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती
एवं परा, अथवा बीज, बिन्दु, नाद और शक्ति—इन
चार रूपोंवाला अकार ॐकारकी पहली मात्रा है। यह अकार
ही वैश्वानर है। क्योंकि यह अकार भी स्थूल (वैखरी),
सूक्ष्म (मध्यमा), बीज (पश्यन्ती) और साक्षी (परा)—
इन चार स्वरूपोंसे परिलक्षित होनेके कारण वैश्वानरकी भाँति
चार रूपवाला ही है। इसके सिवा आप्ति (व्याप्ति) रूप
गुणके होनेसे भी दोनोंमें समानता है—वैश्वानर जाग्रत्कालीन
समस्त जगत्में व्यापक है तथा अकार भी वाणीमात्रमें व्यापक
है। (श्रुति भी कहती है, 'अकारो वै सर्वा वाक्'—निस्सन्देह
अकार सम्पूर्ण वाणी है।) यही नहीं, बोलते समय सबसे पहले
अकारका ही उच्चारण प्राप्त होता है—हृदयदेशसे ऊपरको
उठी हुई वायु कण्ठमें पहले ध्वनित होती है, अतः प्रथम
कण्ठस्थानीय अकारकी ही ध्वनि निकलती है। उधर सृष्टिकालमें
सर्वप्रथम विराट्स्वरूप वैश्वानरकी ही उपलब्धि होती है, अतः
खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मन्वा धीरो न शोचति * ५८३ 'प्राप्ति'रूप गुणकी दृष्टिमे भी दोनोंमे समानता है। इसी प्रकार आदिमान् होनेके कारण भी दोनोंमें समानता है—अकार सम्पूर्ण वर्णोंमे आदि (प्रथम) हे और वैश्वानर भी विराट् रूपमे सबमे पहले प्रकट हुआ है। इन सब समानताओंके कारण तथा ऊपर बताये अनुसार स्थूलरूप, सूक्ष्मरूप, कारण- रूप और साक्षीरूप होनेसे भी दोनोंमे अभिन्नता है। जो इस प्रकार जानता है, वह अवश्य ही जगत्के सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त कर लेता है और सबरा आदि (सर्वप्रधान) बन जाता है। स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत् ही जिनका स्थान (शरीर) है तथा जो पूर्ववत् चार स्वरूपोंवाले हैं, वे पूर्णतम परमात्माके द्वितीय पादरूप तैजस हिरण्यगर्भ और ओंकारकी द्वितीय मात्राके रूपमे उपलब्ध होनेवाला पूर्ववत् चार रूपोंसे युक्त उकार—ये एक ही हैं। उकार ही तैजस हे। उकारके जो स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षी—ये चार रूप हैं, इनके द्वारा अवश्य ही उकार भी तैजस पुरुष- की भाँति चार स्वरूपोंवाला है। अतः इस समानताके कारण दोनों परस्पर अभिन्न हैं। इसके सिवा ओंकारकी दूसरी मात्रा जो उकार है, वह पहली मात्रा अकारकी अपेक्षा उत्कृष्ट (ऊपर उठा हुआ अथवा श्रेष्ठ) है तथा उभयरूप है—अ और मके बीचमें होनेके कारण दोनोंके साथ इसका घनिष्ठ सम्बन्ध है, अतः दोनोंके भावसे युक्त है। इसी प्रकार द्वितीय पादरूप तैजस हिरण्यगर्भ प्रथम पादस्वरूप वैश्वानरसे उत्कृष्ट है तथा वैश्वानर और प्राज्ञ दोनोंके मध्यवर्ती होनेसे वह उभय- सम्बन्धी भी है। अतः इस समानताके कारण भी उकार ही तैजस है। इतना ही नहीं, पूर्ववत् स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षीरूप होनेके कारण भी दोनों परस्पर समान और अभिन्न हैं। जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही ज्ञानकी परम्परा- को समुन्नत करता है तथा सबमें समान भाववाला होता है। सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्की प्रलयावस्था ही जिसका स्थान है अर्थात् समष्टि कारणतत्त्वमें जिसकी स्थिति है, जो ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प— इन चार रूपोंवाला है, वह प्राज्ञ ईश्वर, जो परमात्माके तृतीय पादरूपमें बताया गया है, ॐकारकी तीसरी मात्राके रूपमें उपलब्ध होनेवाला पूर्वोक्त चार रूपोंसे युक्त मकार ही है। निश्चय ही यह मकार अपने स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षी— इन स्वरूपोंसे चार रूपवाला है और प्राज्ञ भी चार रूपोंवाला है। अतः अत्यधिक समानताके कारण मकार ही प्राज्ञ है। इसके सिवा, मिति और अपीति अर्थात् माप करने और विलीन करनेके कारण भी मकार और प्राज्ञ परस्पर समानता रखते हैं। 'अ' और 'उ के उच्चारणके बाद 'म'का उच्चारण होता है, अतः वे दोनों उसके द्वारा माप लिये जाते हैं, तथा 'ओम्' कहते समय 'म् के उच्चारणके साथ मुख बंद हो जाता है, अतः 'अ' और 'उ' उसीमे विलीन हो जाते हैं। इसी प्रकार वैश्वानर और तैजस भी प्राज्ञद्वारा माप लिये जाते हैं, क्योंकि जाग्रत् और स्वप्नके अन्तमे सुषुप्ति-अवस्था आती है तथा सुषुप्तिमें जाग्रत् और स्वप्नका लय हो जाता है। अतः क्रमशः जाग्रत् और स्वप्नके अधिष्ठाता वैश्वानर और तैजस भी प्राज्ञमें विलीन हो जाते हैं। इन समानताओंके कारण तथा इसके अतिरिक्त पूर्ववत् स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षीरूप होनेसे भी दोनों परस्पर समान एव अभिन्न हैं। जो इस प्रकार जानता है, वह अवश्य ही इस सम्पूर्ण कारण-जगत्को माप लेता अर्थात् भलीभाँति जान लेता है तथा सबरो अपनेमें विलीन कर लेता है। प्रत्येक मात्राको प्रतिमात्राके रूपमे परिणत कर दे। 'अ', 'उ', 'म्'—ये मात्राएँ हैं। अकारका उकारमे लय होता है, उकार उसकी प्रतिमात्रा है और मकार उकारकी प्रतिमात्रा है। तथा मकारकी प्रतिमात्रा प्रणव हे, क्योंकि प्रणवमे ही सबका लय होता है। अतः अकार आदि मात्राओंके अपनी-अपनी प्रतिमात्रामे लय होने- की भावना करे। (इसी प्रकार वैश्वानरके तैजस हिरण्यगर्भमें और उनके प्राज्ञ ईश्वरमे लय होनेकी भावना करनी चाहिये।) इन वैश्वानर आदि तीन पादोंके अतिरिक्त जो परमात्माके चतुर्थ पादके रूपमें उपवर्णित तुरीय परमेश्वर हैं, वे कारणात्मा ईश्वरको भी अपना ग्रास बना लेते हैं—अपनेमें विलीन कर लेते हैं। वे स्वराट् ह—अपनी ही शक्तिसे शक्तिमान् सम्राट् हे, स्वयं ही सर्वसमर्थ ईश्वर है तथा अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले परमात्मा हैं। उनके भी चार स्वरूप हैं—ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प। अवश्य ही ये परमात्मा 'ओत' हैं—सर्वत्र व्यापक हैं, ठीक उसी तरह, जैसे सहार-कालमें कालाग्नि और सूर्य अपनी प्रचण्ड ज्वालाओं और प्रखर रश्मियोंसे इस सम्पूर्ण जगत्को बाहर-भीतरसे व्याप्त कर लेते हैं। ये परमात्मा अनुज्ञाता भी हैं। इस सम्पूर्ण जगत्के लिये अपने-आपको दे डालते हैं—सबको अपना स्वरूप ही बना लेतें है, ठीक वैसे ही, जैसे सूर्यदेव अन्धकारको अपना स्वरूप बना लेते हैं, उसे अपने प्रकाशमें विलीन करके प्रकाशरूपता प्रदान करते हैं। इसी प्रकार ये परमात्मा अनुज्ञैकरस हैं—एकमात्र ज्ञानके रससे परिपूर्ण हैं, अज्ञानका नाश करके चिन्मय स्वरूपसे ही स्थित हैं, ठीक उसी तरह, जैसे जलानेयोग्य काष्ठ आदिको जलाकर अग्नि केवल तेजोमय
५८४ - श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् - [खण्ड २
स्वरूपसे स्थित हो जाती है। साथ ही ये परमात्मा अविकल्प भी हैं—भेद और संशयसे रहित हैं, क्योंकि ये मन और वाणीके विषय नहीं हैं, चित्स्वरूप हैं। अतः ये चार रूपवाले ओंकार ही हैं। अवश्य ही यह ओंकार ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन अपने ही स्वरूपोंसे चार रूपों- वाला है, अतः तुरीय पादकी भाँति यह ओंकार भी परमात्मा ही है। क्योंकि यह सब कुछ नाम-रूपमय ही है। अर्थात् नाम वाचक है और रूप वाच्य। यदि वाच्यके चार भेद हैं तो वाचकके भी हो सकते हैं; क्योंकि उनमें भेद नहीं है। अतः जैसे परमात्माके ओत आदि चार स्वरूप हैं, वैसे ही ओंकारके भी हैं। इसलिये तुरीय, चित्स्वरूप, ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्परूप होनेके कारण ओंकार और परमात्मा दोनों परस्पर अभिन्न हैं। जैसे वैश्वानर आदिका तुरीयमें लय होता है, उसी प्रकार ओत आदिका अविकल्पमें लय होता है; अतः यह सब कुछ अविकल्परूप ही है। उसमें किसी प्रकारका कोई भी भेद नहीं है।
पाद है। जो इस प्रकार जानता है, वह आत्मा ही आत्माके द्वारा परमात्मामें पूर्णतः प्रवेश कर जाता है। यह उपासक वीर होता है, संसारमें कहीं भी उसका पराभव नहीं होता। (तुरीय परमात्माको जाननेके लिये उपर्युक्त रूपसे चिन्तन करना तो एक उपाय है ही, दूसरा भी उपाय है, उसे बताते हैं—) अथवा नृसिंहसम्बन्धी मन्त्रराज आनुष्टुभसे तुरीयको जाने। निश्चय ही यह परमात्माके स्वरूपको प्रकाशित कर देता है; क्योंकि यह सबका सहार करनेमें समर्थ (उग्र) है, परिभवको सहन न कर सकनेवाला (वीर) है, महान् प्रभु है, सर्वत्र व्यापक (विष्णु) है*। सदा उज्ज्वल- प्रकाशमय है, अविद्या और उसके कार्यसे रहित है, अपने आत्मीय जनोंका अज्ञानमय बन्धन दूर कर देता है, सर्वदा द्वैतसे शून्य है, आनन्दस्वरूप है, सबका अधिष्ठान और सन्मात्रस्वरूप है। अविद्या, तम और मोह (मल, आवरण और विक्षेप) को सर्वथा नष्ट कर डालनेवाला है तथा 'अहम्' (मै) का एकमात्र लक्ष्यार्थ सबका आत्मा है।
चतुर्थ पादके विषयमें श्रुतिका यह उपदेश है—'मात्रा- रहित ओंकार अर्थात् परमात्माके नामात्मक ओंकारका मात्रा- रहित—बोलनेमें न आ सकनेवाला निराकार स्वरूप ही (मन- वाणीका अविषय होनेके कारण) व्यवहारमे न आ सकनेवाला, प्रपञ्चसे अतीत, कल्याणमय एव अद्वितीय परमात्माका चतुर्थ
इसलिये इस मन्त्रराजको तथा इसके वाच्यार्यरूप भगवान् नृसिंहको ही सबका आत्मा एव परब्रह्म जानकर निरन्तर उनका चिन्तन करता रहे। इस प्रकार जानने तथा इसीके अनुसार उपासना करनेवाला यह पुरुष वीर एव मनुष्योंमें सिंहरूप—श्रेष्ठ होता है।
- यहाँ 'सर्वसहारसमर्थ 'आदि पदोंद्वारा मन्त्रराज आनुष्टुभकी ही व्याख्या की गयी है। आरम्भसे लेकर 'प्रभुर्व्याप्त' तक 'उग्रं वीरं महाविष्णुम्' इन तीन पदोंकी व्याख्या हो गयी है, जो स्पष्ट है। 'सदोज्ज्वल' इन पदके द्वारा 'ज्वलन्तम्' पदकी व्याख्या हुई है। यह भी स्पष्ट ही हे। 'अविद्याकार्यहीन' इसके द्वारा 'सर्वतोमुखम्' का भाव व्यक्त किया गया है। 'सर्वतोमुखम्' पद ज्ञानस्वरूपताको लक्ष्य कराता है, अत उसने द्वारा अविद्या एव उसके कार्यका निराकरण होना उचित हो है। 'स्वात्मबन्धहर' पदमें 'नृसिंहम्' पदका भाव है। 'नृसिंहम्' में दो पद हैं—'नृ' और 'सिंहम्'। गत्यर्थक 'नृ' धातुसे 'नृ' शब्द बनता है, अत 'नृ' का अर्थ है—ज्ञानस्वरूप तथा त्रिविध परिच्छेदशून्य आत्मा। 'सिंहम्' पदके दो भाग हैं—सिं+ हम्। 'षिञ् बन्धने' इस धातुमे 'सिं' बना है, अत उसका अर्थ हुआ बन्धनकारक अज्ञान। 'हृ' का अर्थ है—सहार करनेवाला। इस प्रकार 'नृसिंहम्' पदका अर्थ हुआ आत्माको बन्धनमें डालनेवाले अज्ञानका सहारका इसी भावसे 'स्वात्मबन्धहर' कहा गया है। 'भीषणम्' पदका अर्थ है डरानेवाला। डर या भय वहीं है, जहाँ द्वैत है। भगवान् नृसिंह और उनका मन्त्रराज द्वैतको भयभीत करनेवाला है, अत उनके पास द्वैत या भ्रम फटकने नहीं पाता। इसी भावको ध्यानमें रखकर 'सर्वदा द्वैतरहित' कहा गया है। 'सर्वाधिष्ठानसन्मात्र' पदसे 'मृत्युमृत्युम्' पदका भाव व्यक्त किया गया है। मृत्युमें ही सबका लय होता है, अत वही सबका अधिष्ठान है। भगवान् मृत्युके भी मृत्यु हैं, अत वे तथा उनके मन्त्र ही सर्वाधिष्ठान हो सकते हैं। 'नमामि' का अर्थ इस प्रकार है—न=नहीं है, 'मा' का =प्रमात्मक ज्ञानस्वरूप परमानन्दमय तुरीय पदका, म=हिंसाकारक अविद्या, तम और मोह जिसमें, वह, इसीको लक्ष्यमें रखकर 'निरस्ताविधातमोमोह' कहा गया है। कहा भी है—'मीति हिंसाकर नाम तमोऽज्ञानादिलक्षणम्।' 'अहम्' पदका तो स्पष्ट उल्लेख हुआ ही है।
खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५८५ तृतीय खण्ड अनुष्टुप् मन्त्रराजके पादोंके अलग-अलग जप तथा ध्यानकी विधि निश्चय ही उस प्रणवकी जो पहली मात्रा अकार है, वह अनुष्टुप् मन्त्रराजके प्रथम पादके दोनों ओर लगायी जाती है*। इसी प्रकार प्रणवकी दूसरी मात्रा 'उ' अनुष्टुप्-मन्त्रके द्वितीय पादके आदि-अन्तमें लगनी है (यथा—उंज्वलन्तं सर्वतोमुखम् उम्। इस द्वितीय पादरूप मन्त्रका जप करते हुए हिरण्यगर्भका ध्यान करना चाहिये)। इसी तरह प्रणवकी तीसरी मात्रा 'म' अनुष्टुप्-मन्त्रके तृतीय पादके आगे-पीछे लगती है (यथा— मं नृसिंहं भीषणं भद्रम् मम्। इसके जपके साथ-साथ प्राज्ञ ईश्वरका ध्यान होना चाहिये)। चौथी मात्रा ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्परूपा है, उसके द्वारा उक्त चार रूपों- वाले तुरीय पादका अनुसन्धान (ध्यान) करके अनुष्टुप्- मन्त्रके चतुर्थ पादमे भी उक्त तुरीय पादका ही चिन्तन करे। फिर पूर्वोक्त तुरीया (चौथी) मात्रासे तुरीय पादका अनुसन्धान करते हुए तुरीय-तुरीयस्वरूप जो परमात्मा हैं, उनके द्वारा निरन्तर ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण जगत्को ग्रस ले अर्थात् सबको परमात्मामें ही विलीन कर दे†। अवश्य ही उस प्रकरणप्राप्त प्रणवकी जो पहली मात्रा है, वह अकार है, वह पृथिवी है, वह ऋक्सम्बन्धी मन्त्रोंके साथ ऋग्वेद है। वह ब्रह्मा देवता है, वसु नामक देवताओंका गण है, गायत्री छन्द है, गार्हपत्य अग्नि है। इस प्रकार वह मात्रा विराट् पुरुष वैश्वानरका प्रतिपादन करनेवाली तथा परमात्मा- का प्रथम पाद है। केवल प्रथम पाद ही नहीं, सभी पादोंमें वह मात्रा रहती है; क्योंकि पहले बताये अनुसार उसके स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षी—चार स्वरूप हैं। (अतः स्थूलरूपसे वह प्रथम पादमें, सूक्ष्मरूपसे द्वितीय पादमें, बीज- रूपसे तृतीय पादमें और साक्षीरूपसे चतुर्थ पादमें रहती है।) प्रणवकी दूसरी मात्रा उकार है; वह अन्तरिक्ष-लोक है। वह यजुः-मन्त्रोंके साथ यजुर्वेद है, विष्णु देवता है, रुद्र नामक देवताओंका गण है, त्रिष्टुप् छन्द है, दक्षिणाग्नि है। वह मात्रा तैजस हिरण्यगर्भका बोध करानेवाली तथा परमात्माका द्वितीय पाद है। द्वितीय पाद होते हुए भी वह सभी पादोंमें रहती है, क्योंकि उसके स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षी—चार स्वरूप हैं। प्रणवकी तीसरी मात्रा मकार है, वह द्युलोक है, वह साम-मन्त्रोंसहित सामवेद है, रुद्र देवता है, आदित्य नामक देवताओंका गण है, जगती छन्द है, आहवनीय अग्नि है। वह प्राज्ञ-ईश्वरका बोध करानेवाली तीसरी मात्रा परमात्माका तृतीय पाद है। साथ ही वह अन्य सभी पादोंमें भी रहती है; क्योंकि उसके स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षी—ये चार स्वरूप हैं। प्रणवके अन्तमें जो उसकी चौथी मात्रा—अर्धमात्रा है, वह ओंकार (बिन्दु) है, वह सोमलोक है, वह अथर्व- मन्त्रोंसहित अथर्ववेद है, संवर्तक-अग्नि देवता है, मरुत् नामक देवताओंका गण है, विराट् छन्द है, एक ऋषि अग्नि है। वह मात्रा बिन्दु आदि रूपसे तुरीय परमात्माका बोधक होनेसे भास्वती (प्रकाशमयी) मानी गयी है। वही पूर्णब्रह्म परमात्माका तथा मन्त्रराज अनुष्टुपका भी चतुर्थ पाद है तथा वह अन्य सब पादोंमें भी है, क्योंकि उसके स्थूल, सूक्ष्म, बीज और साक्षी—ये चार स्वरूप हैं।
- इस प्रकार जो मन्त्र बनता है, उसका उच्चारण करके वैश्वानर या विराट् पुरुषका ध्यान करना चाहिये। अकार और विराट् दोनोंको 'चतुरात्मा' बताया गया है, अतः यहाँ बीज, विन्दु, नाद और शक्तिसे युक्त अकारको ही अनुष्टुप्-मन्त्रके प्रथम पादके आदि- अन्तमें लगाना चाहिये, यों करनेपर मन्त्रका उच्चारण इस प्रकार होगा—'अं उग्रं वीरं महाविष्णुम् अम्'। † इस प्रसङ्गका भाव यह है कि 'अम्' इस चार रूपोंवाले अकारसे चार रूपोंवाले विराट् पुरुषकी एकताका अनुभव करके उनके द्वारा विराट्का ध्यान करे, फिर अनुष्टुप्-मन्त्रके प्रथम पादसे भी विराट्का ही सम्बन्ध मानकर उसके द्वारा भी उन्हींका स्थूलरूपसे चिन्तन करे। फिर 'अम्' का उच्चारण कर अकाररूपमें ही विराट्का चिन्तन करके 'उम्' का उच्चारण करते हुए हिरण्यगर्भका ध्यान करे। तत्पश्चात् 'अ' को 'उ' में विलीन करते हुए भावनाद्वारा ही विराट्का हिरण्यगर्भमें लय करे। फिर अनुष्टुप्-मन्त्रके द्वितीय पाद तथा उकारसे भी हिरण्यगर्भकी ही भावना करते हुए मकारके द्वारा अव्याकृतका चिन्तन करके उसमें हिरण्यगर्भका लय करे। तदनन्तर अनुष्टुप्के तृतीय पाद और मकारसे भी अव्याकृतका ही चिन्तन करते हुए नादपर्यन्त उच्चारित ओत, अनुज्ञातृ आदि रूपवाले प्रणवद्वारा तत्स्वरूप तुरीयका चिन्तन करके उसीमे अव्याकृतका लय करे। फिर अनुष्टुप्के चतुर्थ पादसे भी तुरीयका ही चिन्तन करके पुन बिन्दु, नाद आदिसे युक्त प्रणवद्वारा उन तुरीय-तुरीयस्वरूप परमात्माका ही चिन्तन करते हुए सबका उन्हींमें लय करके उनके स्वरूपमें स्थित हो जाय। उ० सं० ७४—
५८६ * श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ३ इस प्रकार व्यष्टि और समष्टिकी ( ओंकारकी एक-एक अपनेको नित्य शुद्ध-बुद्ध, अमृतस्वरूप मानकर अपनी मात्रा और अनुष्टुप्-मन्त्रके एक-एक पाद और परमात्माके बुद्धिकी वृत्तियोंका परमात्मामे हवन करके अर्थात् अपने एक-एक पादकी ) एकताका चिन्तन करके मात्राओ प्रति- अन्त'करणको परमात्मामें ही लगाकर बाहर-भीतरसे शुद्ध हो मात्राके रूपमे परिणत करे । अर्थात् अकार और विराट् पवित्र देशमे पवित्र आसनपर सुखपूर्वक बैठे और (न्यास, पुरुषको उकार और हिरण्यगर्भमे लीन करे और उकार शुद्धि, रक्षोघ्न-मन्त्रोंके पाठ, दिग्बन्धन, कवचपाठ, गणपति एव हिरण्यगर्भको मकार एव ईश्वरमे विलीन करे । फिर स्मरण एवं रक्षा आदिके द्वारा) सब प्रकारके विघ्नोंका निवारण उनको भी अर्धमात्रा एव तुरीयमे विलीन करके क्रमश. श्रोत, करके प्राणायामपूर्वक ध्यानमे इन परमात्माके तत्त्वका अनुभव अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्पका चिन्तन तथा पूर्व-पूर्वका करे । फिर परमात्मामे ही इस सम्पूर्ण प्रपञ्चकी स्थिति देखते उत्तरोत्तरमे लय करते हुए अन्तमे सबको अविकल्परूप हुए प्राणाग्निहोत्र और प्रपञ्च यागकी रीतिसे प्राण और प्रपञ्चसे परमेब्रह्ममे ही लीन कर दे और निर्विशेष परमेश्वरका चिन्तन अपना सम्बन्ध हटा ले और सर्वस्वरूप, आधारयुक्त- करते हुए उन्हींमे स्थित हो जाय । १ श्रीविद्यारण्य मुनिने इस प्रसङ्गकी टीकामें सक्षेपसे प्राणाग्निहोत्रकी रीति इस प्रकार कही है। 'ॐ हीं' इस बीज मन्त्रका उच्चारण करते हुए चिदानन्दस्वरूप आराध्यदेवका ध्यान करे और फिर 'क्ष' से उल्टे चलकर 'अ' तककी वर्णमालाका ( क्ष हं सं .....इत्यादि रूपमे ) उच्चारण करते हुए उन्हींके स्वरूपभूत सर्वजगतमय शरीरका ( जो स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षीरूपमे चार प्रकारका है ) चिन्तन करे और ऐसी भावना करे कि यह चतुर्विध शरीर सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मामे प्रकट हुआ है, अत यह सच्चिदानन्दमय ही है । फिर 'सोऽहम्', 'हस' इन मन्त्रोंके जलद्वारा जीवात्मा और परमात्माकी परस्पर एकताकी भावना करे। इस प्रकार एकात्म-चिन्तनरूप अग्निमें ही 'स्वाहा' का उच्चारण करके उक्त चारों शरीरोंका होम ( लय ) कर दे। २ प्रपञ्च-याग भी इसी प्रकार करना होता है। 'ॐ हीं' इन मन्त्रका उच्चारण करके सचिदानन्दस्वरूप परमात्माका चिन्तन करते हुए 'अ' से लेकर 'क्ष' तककी वर्णमालाको अनुलोम-क्रमसे (अ आं इत्यादि रूपमे ) उच्चारण करे । फिर समस्त प्रपञ्चको सच्चिदानन्दमय परमेश्वरसे उत्पन्न हुआ देखकर उसमे भी सच्चिदानन्दमय होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् 'हस, सोऽहम्' इस प्रकार प्राणाग्निहोत्रकी अपेक्षा उल्टे क्रमसे जप तथा साथ-ही-साथ परमात्मा और जीवकी एकताका चिन्तन करते हुए उस चिन्तनमय अग्निमें 'स्वाहा' का उच्चारण करके समस्त प्रपञ्च होम दे-विलीन कर दे। ३ यह 'युक्त' का अर्थ है । इसके द्वारा सकलीकरण नामक न्यासकी ओर सकेत किया गया है। पहले इस उत्तरतापनीयके प्रथम खण्डमे बताये अनुसार इम आत्माका (ॐ इस नामके द्वारा प्रतिपादित होनेवाले ब्रह्मके साथ एकता करके तथा ब्रह्मकी आत्माके साथ ओंकारके वाच्यार्थरूपने एकता करके वह एकमात्र जरारहित, मृत्युरहित, अमृतस्वरूप, निर्भय, निश्चय तत्त्व ॐ है- इस प्रकार अनुभव करे । तत्पश्चात् उन परमात्मस्वरूप ओंकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण-इन तीन शरीरोवाले सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका आरोप करके अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य है, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म एव कारण-जगत्की कल्पना हुई है ऐसा विवेकद्वारा अनुभव करके यह निश्चय करे कि यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा ही है, क्योकि तन्मय ( परमात्ममय ) होनेके कारण अवश्य यह तत्स्वरूप (परमात्मस्वरूप) ही है। और इस दृढ निश्चयके द्वारा इस जीवको ॐके वाच्यार्थभूत परमात्मामें विलीन कर डाले। इसके बाद चतुर्विध शरीरको सृष्टिके लिये निम्नाङ्कित प्रकारसे सकलीकरण करे। 'ओम्' का उच्चारण अनेक प्रकारसे होता है-एक तो केवल मकारपर्यन्त उच्चारण होता है, दूसरा बिन्दु-पर्यन्त, तीसरा नाद-पर्यन्त और चौथा शक्ति-पर्यन्त होता है। फिर उच्चारण बद हो जानेपर उसकी 'शान्त' सज्ञा होती है । सकलीकरणकी क्रिया आरम्भ करते समय पहले 'ओम्' का उपर्युक्त रीतिसे शान्तपर्यन्त उच्चारण करके 'शान्त्यतीत- कलात्मने साक्षिणे नमः' इस मन्त्रसे व्यापक-न्यास करते हुए 'साक्षी' का चिन्तन करे। फिर शक्ति-पर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'शान्तिकलाशक्तिपरावाद्यात्मने सामान्यदेहाय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए लन्तर्मुख, सत्वस्वरूप, महाज्ञानरूप सामान्य देहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका नादपर्यन्त उच्चारण करके 'विद्याकलानादपश्यन्तीवागात्मने कारणदेहाय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए प्रलय सुषुप्ति एव ईक्षणावस्थाने स्थित किञ्चित् बहिर्मुख सत्त्वरूप कारणदेहका चिन्तन करे। फिर प्रणवका बिन्दु-पर्यन्त उच्चारण करके 'प्रतिष्ठाकला- बिन्दुमध्यमावागात्मने सूक्ष्मदेहाय नम' इस मन्त्रने व्यापक करते हुए सूक्ष्मभूत, अन्त करण, प्राण तथा इन्द्रियोके सघानरूप सूक्ष्मशरीरका चिन्तन करे । फिर प्रणवका मकारपर्यन्त उच्चारण करके 'निवृत्तिकलाजीववैखरीवागात्मने स्थूलशरीराय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए पञ्चीकृत भूत एव उसके कार्यरूप स्थूलशरीरका चिन्तन ..... । ४ यहाँ 'आधार' शब्द पीठ तथा उसमे भी आधारभूत स्थान आदिका बोधक है । उपर्युक्त प्रकारसे उत्पन्न हुआ यह चतुर्विध
खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५८७ अमृतमय, चतुरात्मा, सर्वमय एवं चतुरौंत्मा होकर महान् चतुःसप्तात्मा, चतुरात्मा तथा मूलाधारस्थित अग्नि-मण्डलमें पीठके ऊपर परिवरिसहित इस प्रणवरूप परमात्माका, जो अग्निरूप हैं, सम्यक् प्रकारसे चिन्तन करे। देह भगवान्का सपरिकर पीठ अर्थात् आसन तथा मूर्ति है—इस प्रकारकी भावना करनेके लिय 'आधार' शब्दके द्वारा परिकरसहित पीठन्यासकी तथा 'अमृतमय' कहकर मूर्तिन्यासका सूचना दी गयी है। सच्चिदानन्द-पूर्णत्वरूपिणी जो इच्छा, ज्ञान, क्रिया, स्वातन्त्र्य एवं मनू-स्वरूपिणी भगवान्की पराशक्ति है, वही मूर्ति है। इस अमृतमयी मूर्तिकी भावनामे परिपूर्ण होना हा 'अमृतमय' होना है। पीठ आदिकी कल्पनाका प्रकार यों बताया गया है—'ॐ चतुरशीतिकोटिप्राणिनात्यात्मने ब्रह्मवनाय नम' इस मन्त्रसे व्यापक करते हुए केश, रोम आदिको एक 'वन' के रूपमें भावनाद्वारा देखे। 'ॐ पञ्चभूतानामशेषमन्त्रेभ्य प्राकारेभ्यो नम' इसमे व्यापक करते हुए पञ्चीकृत पञ्चभूत एवं नाम-रूपात्मक सात धातुओंको सात प्राकारों (परकोटों) के रूपम कल्पिन करे। 'ॐ नवच्छिद्रात्मम्यो नवद्वारेभ्यो नम' इसमे व्यापक करने हुए प्रत्येक प्राकार (घेरे) मे नौ-नौ गोपुरों (द्वारों) के रूपमें शरीरके नौ छिद्रोंको ही मान ले। इसी प्रकार स्थूलशरीरको स्थान मानकर सूक्ष्मशरीरको महाराजराजेश्वर आत्माका परिचारक माने। फिर निम्नाङ्कितरूपमे 'प्रवित्र' को राजराजेश्वरद्वार, सकाम- निष्काम वृत्तियोंको द्वारदेवता, काम-वैराग्यको द्वारपाल, श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियोंको राज-परिचारक, मनको गजदूत आदिके रूपमें मानकर 'ॐ संविद्रूपेभ्यो राजराजेश्वरद्वारेभ्यो नम', 'सकामाकामवृत्तिभ्यो द्वारदेवताभ्यो नम', 'कामवैराग्याभ्या द्वारपालाभ्यां नम', 'दिगन्थाद्यात्मक- श्रोत्रादीन्द्रियरूपेभ्यो राजपरिचारकेभ्यो नम', 'यन्त्रात्मकाय मनसे राजदूतय नम', 'ब्रह्मरूपिण्यै सर्वकार्यनिश्चयकर्यै बुद्धयै नम', 'रुद्र- रूपाय सर्वकार्याभिमानकर्त्रेऽहङ्काराय नम', 'विष्णुरूपाय सर्वकार्यानुसन्धानकर्त्रे चित्ताय नम', 'सर्वेश्वररूपाय सर्वाधिकारिणे प्राणाय नम'— इस प्रकार न्यास, जप अथवा भावना करने सूक्ष्मशरीरको भगवान्का सेवाका उपकरण बनाकर 'गुणत्रयात्मने प्रासादाय नम' इस मन्त्रमे त्रिगुणमय प्रासाद (महल) की कल्पना करे। फिर विन्दुपर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'परमात्मनामनाय नम' इस मन्त्रमे उसका अपने हृदयके भीतर न्यास करे। साथ ही यह भावना करे कि यह भगवान्के विराजनेके लिये सुन्दर आसन है। तत्पश्चात् पहले बनाये हुए किञ्चिदवशिष्ट संत्त्वरूप कारण-शरीरको गुणोंकी साम्यावस्थारूप पीठके रूपमें कल्पित करे। फिर शक्तिपर्यन्त प्रणवका उच्चारण करके 'परमात्ममूर्तये नम.' इस मन्त्रके द्वारा हृदयमे लेकर मस्तकपर्यन्त व्यापक न्यास करते हुए पूर्वोक्त मच्चिदानन्दरूप, अन्तर्मुख सामान्य- शरीरमय ब्रह्मको ही भगवान्की मूर्तिके रूपमें चिन्तन करे। वह मूर्ति ज्ञानपराशक्तिरूपा है। उसके चार हाथ हैं—जो शङ्ख, चक्र, गदा और ज्ञानकी मुद्रामे शोभा पा रहे हैं। सब प्रकारके अलङ्कार उसका शोभा बढा रहे हैं। वह मूर्ति आत्मानन्दानुभवके समुद्रमें गोते लगा रहा है। १ अ, उ, म् तथा ॐ—ये क्रमशः स्थूल देह, सूक्ष्मदेह, कारणदेह तथा सामान्य देह हैं, इन चारोंका जो आत्मरूपसे चिन्तन करता है, वही चतुरात्मा है। २ 'सर्वमय' के 'सर्व' शब्दसे सर्वात्मक विराट् आदि चारों पादोंका प्रतिपादन होना है, इन सर्वात्मक पादोंका न्यास करनेसे साधक सर्वमय होता है। न्यासका क्रम इन प्रकार है—'ऐश्वर्यशक्त्यात्मने द्युलोकाय नम' इससे दाहिने हाथका अँगुलियोंद्वारा मस्तकका स्पर्श करे। इसी प्रकार 'ज्ञानशक्त्यात्मने सूर्याय नम' इससे नेत्रका, 'महारशक्त्यात्मनेऽग्नये नम' इससे मुखका, 'क्रियाशक्त्यात्मने वायवे नम' इसमे नासिकाका, 'सर्वाश्रयवृत्तत्यात्मने आकाशाय नम' इसमे हृदयका, 'इच्छाशक्त्यात्मने प्रजापतये नम' इससे गुह्यप्रदेश (उपस्थ एव गुदा)- कान्तथा 'सवाधारशक्त्यात्मने पृथिव्यै नम' इसमे चरणोंका स्पर्श करे। यह महाङ्गन्यास है। पादन्यासका ध्यान और मन्त्र आगे बतायेंगे। इसके बाद उन्नीस मुखोंमें भी न्यास किया जाता है। पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार—ये उन्नीस मुख हैं। प्राण-न्यासके मन्त्र इस प्रकार हैं—'प्रणयनशक्त्यात्मने प्राणाय नम', 'अपनयनशक्त्यात्मने अपानाय नम', 'व्यानयनशक्त्यात्मने व्यानाय नम', 'उन्नयनशक्त्यात्मने उदानाय नम' तथा 'समनयनशक्त्यात्मने समानाय नम'। इन्द्रियादिन्यासके मन्त्र इस प्रकार हैं—'अनुसन्धान- शक्त्यात्मने नम', 'निश्चयशक्त्यात्मने नम', 'अहङ्कारशक्त्यात्मने नम', 'सङ्कल्पशक्त्यात्मने नम', 'श्रवणशक्त्यात्मने नम', 'स्पर्शनशक्त्यात्मने नम', 'दर्शनशक्त्यात्मने नम', 'रसनशक्त्यात्मने नम', 'घ्राणशक्त्यात्मने नम', 'वचनशक्त्यात्मने नम', 'आदानशक्त्यात्मने नम', 'गमनशक्त्यात्मने नम', विसर्गशक्त्यात्मने नम', 'आनन्दशक्त्यात्मने नम'। इन मन्त्रोंद्वारा क्रमश चित्त, बुद्धि, अहङ्कार, मन, श्रवण, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका, वाक्, हाथ, पैर, लिङ्ग और गुदा आदिमें उन-उनकी शक्तियोंके रूपम भगवान्का हा निवास है—ऐसी भावना करे। इसके बाद निम्नाङ्कित पाँच मन्त्रोंको पढ़ते हुए व्यापकन्यासपूर्वक चार पादोंका ध्यान करे— ॐ उग्र वीर महाविष्णु जागरितव्यानाय स्थूलप्रज्ञाय सप्ताङ्गायैकोनविंशतिमुखाय स्थूलभुजे चतुरात्मन विश्वाय वैश्वानराय पृथिव्युग्वेद- ब्रह्मधनुगायत्रागार्हपत्याकारात्मने स्थूलसूक्ष्मदीप्तसाक्षात्मने प्रथमपादाय नम ॥ १ ॥