कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
द्वितीय लम्बक १९९
द्वितीय लम्बक १९९ इसी कारण आँखों से ये आँसू तुम्हारा कल्याण न देखकर शरीर में प्राणों के समान निकल रहे हैं' ॥५७॥ राजा अंगारवती की बात सुनकर उससे बोला—"यदि तुम्हें मुझ पर स्नेह है तो तुम मेरी एक बात मानो ॥५८॥ वह यह कि जब अंगारकासुर सोकर उठे तब तुम उस अपने पिता के सामने खूब रोओ तब वह अवश्य ही तुम्हारे रोने का कारण पूछेगा ॥५९॥ तब तुम उससे कहना मुझे यह दुःख हो रहा है कि यदि तुम्हें कोई मार डाले तो मेरी क्या गति होगी ? यही दुःख मेरे रोने का कारण है' ॥६०॥ तुम्हारे ऐसा करने पर मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा। राजा से यह सुनकर अंगारवती ने उसी प्रकार करना स्वीकार कर लिया ॥६१॥ अंगारवती ने पिता के भय से राजा को पास ही कहीं छिपा दिया और स्वयं सोये हुए पिता के निकट चली गई ॥६२॥ वह दैत्य जब जागा तब कन्या रोने लगी। तब दैत्य ने पूछा—'बेटी ! क्यों रो रही हो ? तब अंगारवती ने कहा—'पिता ! यदि तुम्हे कोई मार डाले तो मेरी क्या गति होगी। इसी वेदना से मैं रो रही हूँ। उसके ऐसा कहने पर वह दैत्य हँसकर कहने लगा—॥६३ ६४॥ 'बेटी मुझे कौन मारेगा। मेरा सारा शरीर वज्र से बना है। केवल बाईं हथेली में एक छिद्र (दुर्बलता) है उसकी रक्षा धनुष से हो जाती है। इस प्रकार दैत्य ने पुत्री को धीरज बँधाया और यह सब पास ही छिपे हुए राजा ने सुन लिया ॥६५ ६६॥ तदनन्तर कुछ ही समय बाद वह दानव उठा और स्नान करके शिवजी की पूजा-स्तुति करने लगा ॥६७॥ राजा ने भी उस समय प्रकट होकर दानव को युद्ध के लिए ललकारा ॥६८॥ मौन मुद्रा में बैठा हुआ वह दैत्य बायें हाथ को ऊपर उठाकर 'जरा ठहरो' इस प्रकार राजा से संकेत करने लगा। राजा बाण-विद्या में सिद्धहस्त तो था ही उसी समय उसने एक बाण दैत्य के मर्मस्थान (बाईं हथेली) पर मारा। वह दैत्य मर्मस्थान पर आघात होने के कारण भीषण चीत्कार के साथ प्राणों को त्यागता हुआ बोला—॥६९-७१॥ 'मुझ प्यासे को जिसने मारा है, वह यदि प्रतिवर्ष पानी से मेरा तर्पण न करेगा तो उसके पाँच मन्त्री मर जायेंगे' ॥७२॥ २२
१७० कथासरित्सागर
१७० कथासरित्सागर इत्युक्त्वा पञ्चतां प्राप स दैत्यः सोऽपि तत्सुताम्। तामङ्गारवतीं राजा गृहीत्वान्धमयीं ययौ ॥७३॥ परिणीतवतस्तस्य तत्र तां दैत्यकन्यकाम्। जातौ द्वौ तनयौ चण्डमहासेनस्य भूपतेः ॥७४॥ एको गोपालको नाम द्वितीयः पालकस्तथा। तयोरिन्द्रोत्सव आसी जातयोरकरोन्नृपः ॥७५॥ ततस्तं नृपतिं स्वप्ने तुष्टो वक्ति स्म वासवः। प्राप्स्यस्यन यसपुत्रीं मत्प्रसादात्सुतामिति ॥७६॥ ततः कालेन जातास्य राज्ञः कन्या तु तन्मया। अपूर्वा निर्मिता धात्रा चन्द्रस्येवापरा तनुः ॥७७॥ कामदेवावतारोऽस्याः पुत्रो विद्याधराधिपः। भविष्यतीति तत्कालमुदभूद् भारती दिवः ॥७८॥ दत्ता मे वासवेनैषा तुष्टेनेति स भूपतिः। नाम्ना वासवदत्तां तां तनयामकरोत्तदा ॥७९॥ सा च तस्य पितुर्गृहे प्रदेया सम्प्रति स्थिता। प्राङ् मन्थादूर्णवस्येव कमला कुक्षिकोटरे ॥८०॥ एवम्बिधप्रभावश्चण्डमहासेनभूपतिः स किल। देव ! न शक्यो जेतुं यथा तथा दुर्गवेश्मस्थः ॥८१॥ किं च स राजन्वाञ्छति दातुं तुभ्यं सदृशं तनयां ताम्। प्रार्थ्यते तु स राजा निजपक्ष महोदय मानी ॥८२॥ सा चावश्यं मन्ये वासवदत्ता त्वयैव परिणेया। स सपदि वासवदत्ताहृतहृदयो वत्सराजोऽभूत् ॥८३॥ इति महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके तृतीयस्तरङ्गः। चतुर्थस्तरङ्गः अत्रान्तरे स वत्सेशप्रवृत्तस्तदब्रवीत्। गत्वा प्रतिपदश्चण्डमहासेनाय भूपते ॥१॥
द्वितीय लम्बक १७१
द्वितीय लम्बक १७१ इस प्रकार कहते हुए अंगारकासुर ने प्राण छोड़ दिये और राजा भी उसकी पुत्री अंगारवती को लेकर उज्जैन चला गया ॥७३॥ उज्जैन में जाकर उस अंगारवती से विवाह करने पर चंडमहासेन राजा के दो पुत्र उत्पन्न हुए, एक गोपालक और दूसरा पालक ! राजा ने दोनों का जन्मोत्सव खूब धूमधाम के साथ मनाया ॥७४-७५॥ एक बार सोये हुए राजा को स्वप्न में इन्द्र ने कहा—'राजन् ! तुम मेरी कृपा से अपूर्व सुन्दरी कन्या प्राप्त करोगे' ॥७६॥ इस प्रकार इन्द्र की कृपा से राजा को नवीन चन्द्रमा के समान सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। उसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि इस कन्या के गर्भ से कामदेव का अवतार होगा जो सब विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥७७-७८॥ राजा ने प्रसन्न होकर उस कन्या का नाम इसीलिए वासवदत्ता रखा कि उसे वह वासव अर्थात् इन्द्र के प्रसाद से प्राप्त हुई थी ॥७९॥ वह कन्या इस समय राजा के भवन में उसी प्रकार निवास कर रही है जिस प्रकार मन्थन से पहले समुद्र-गर्भ में लक्ष्मी निवास करती थी ॥८० ॥ यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज ! वह उज्जैन का महाराजा चंडमहासेन इस प्रकार सुदृढ़ दुर्ग में स्थित महाबलवान् है। वह सहज में ही नहीं जीता जा सकता। साथ ही राजन् ! वह स्वयं ही तुम्हें कन्या देना चाहता है, किन्तु अत्यन्त आत्माभिमानी होने के कारण अपने पक्ष को ऊँचा रखना भी चाहता है ॥८१-८२॥ इसलिए उस वासवदत्ता से तुम्हें अवश्य ही विवाह करना चाहिए। राजा उदयन मन्त्री यौगन्धरायण की बातें सुनकर वासवदत्ता के प्रति अत्यन्त आकृष्ट होकर आत्मविस्मृत-सा हो गया ॥८३॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः) इसी बीच कच्छराज के भेजे हुए दूत ने उसका प्रतिसन्देश चंडमहासेन के पास पहुँचा दिया ॥१॥
सोऽपि चण्डमहासेनस्तच्छ्रुत्वैव व्यचिन्तयत्। स तावदिह नायाति मानी वत्सेश्वरो भृशम् ॥२॥ कन्या हि तत्र न प्रेष्या भवेदेव हि लाघवम्। तस्मात् वल्लभं तं युक्त्या नृपमानायाम्यहम् ॥३॥ इति सञ्चिन्त्य सम्मन्त्र्य स राजा मन्त्रिभिः सह। अकारयत्स्वसंवृत्तं महान्तं यन्त्रहस्तिनम् ॥४॥ तं चान्तर्वीरपुरुषं कृत्वा छन्नैरधिष्ठितम्। विन्ध्याटव्यां स निदधे राजा यन्त्रमयं गजम् ॥५॥ तत्र तं चारपुरुषाः पश्यन्ति स्म विदूरतः। गजवन्धरसासक्तवत्सराजोपजीविनः ॥६॥ ते च त्वरितमागत्य वत्सराजं व्यजिज्ञपन्। देव ! दृष्टो गजोऽस्माभिरेको विन्ध्यवने भ्रमन् ॥७॥ अस्मिन्नियति भूलोके नैव योऽन्यत्र दृश्यते। वर्ष्मणा व्याप्तगगनो विन्ध्याद्रिरिव जङ्गमः ॥८॥ तत्तच्चारवचः श्रुत्वा वत्सराजो जहर्ष सः। तेभ्यः सुवर्णलक्षं च प्रददौ पारितोषिकम् ॥९॥ तं चेद् गजेन्द्रं प्राप्स्यामि प्रतिमल्लं नडागिरेः। ततश्चण्डमहासेनो वश्यो भवति मे ध्रुवम् ॥१०॥ लतां वासवदत्तां तां स स्वयं मे प्रयच्छति। इति सञ्चिन्त्यसन्न्योज्य राजा सामन्तयष्टिधाम् ॥११॥ प्रातश्च मन्त्रिवचनं व्यङ्क्त्वा गजतृष्णया। पुरस्कृत्यैव तांश्चारान्ययौ विन्ध्याटवीं प्रति ॥१२॥ प्रस्थानलग्नमस्य फल कन्यालाभः सबन्धनम्। यद्बूचुर्गणकास्तस्य तरम नैव व्यवारयत् ॥१३॥ प्राप्य विन्ध्याटवीं तस्य गजस्य लोभमोहिताः। वत्सराजः स सैन्यानि दूरादेव न्यवारयत् ॥१४॥ चारमात्रसहायस्तु वीणां घोषवतीं दधत्। निजव्यसनविस्तीर्णां तां विवेश महाटवीम् ॥१५॥ विन्ध्यस्य दक्षिणे पार्श्वे दूराच्चारैः प्रदर्शितम्। गजं मत्तगजाभासं तं ददर्श स भूपतिः ॥१६॥
द्वितीय लम्बक १७३
द्वितीय लम्बक १७३ उदयन के सन्देश को सुनकर चंडमहासेन ने सोचा—कि वह आत्माभिमानी वत्सराज उदयन यहाँ आना नहीं चाहता। मैं भी कन्या को उसके यहाँ नहीं भेज सकता। इसमें मेरी लघुता होगी। इसीलिए चतुराई से कैद कर ही उसे यहाँ बुलाता हूँ—ऐसा सोचकर चंड महासेन ने मन्त्रियों से मन्त्रणा करके अपने हाथी नडागिरि के समान ही एक यन्त्रमय हाथी बनवाया। उसके पेट में योग्य योद्धाओं को छिपाकर उसे विन्ध्याचल के घोर जंगल में रखवा दिया॥२—५॥ राजा उदयन के शिकारी भृत्यों ने जंगल में घूमते हुए उस यन्त्र-हस्ती को दूर से देखा और राजा उदयन से निवेदन किया—'महाराज हमने विन्ध्यारण्य में घूमता हुआ एक महान् हाथी देखा है। ऐसा हाथी इस विशाल भूमण्डल में नहीं देखा गया। लम्बे-चौड़े एवं विशाल- काय वह जंगम विन्ध्य पर्वत के समान आकाश में व्याप्त हो रहा है'। शिकारी गुप्तचरों की बात सुनकर राजा उदयन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें सुवर्ण-मुद्राओं के पुरस्कार देकर विदा किया॥६—९॥ और सोचा कि मैं नडागिरि के समान उस हाथी को यदि प्राप्त कर लूँगा तो चंडमहासेन अवश्य मेरे वश में आयेगा और स्वयं ही मुझे वासवदत्ता को प्रदान करेगा। इस प्रकार सोचते हुए राजा ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की॥१०-११॥ प्रातःकाल उठकर मन्त्रियों की बात न मानकर राजा उदयन ने हाथी के लोभ में उन शिकारी गुप्तचरों को आगे करके जंगल में प्रस्थान किया। उसके ज्योतिषियों ने उसकी मृगया यात्रा का फल बताया था कि कन्या-लाभ तो होगा किन्तु बन्धन (कैद) के साथ। इस बात पर भी उसने ध्यान नहीं दिया॥१२-१३॥ विन्ध्यारण्य में पहुँचकर राजा उदयन ने सेनाओं को दूर ही रोक दिया कि उनकी भीषण ध्वनि से हाथी भड़ककर कहीं भाग न जाय केवल शिकारी गुप्तचरों को साथ लेकर राजा घोषवती वीणा को बजाता हुआ और अपने बचपन की बात स्मरण करता हुआ घोर जंगल में प्रवेश कर गया॥१४ १५॥ गुप्तचरों द्वारा दूर से दिखाये हुए तथा विन्ध्यवन की दाहिनी ओर घूमते हुए उस कल्पित हाथी को राजा ने देखा॥१६॥
१७४ कथासरित्सागर
१७४ कथासरित्सागर
एकाकी वादयन्वीणां चिन्तयन् बन्धनानि सः। मधुरध्वनि गायंश्च शनैरुपजगाम तम् ॥१७॥ गान्धर्वदत्तचित्तत्वात्सन्ध्याध्वान्तवशाच्च सः। न तं वनगजं राजा मायागजमलक्षयत् ॥१८॥ सोऽपि हस्ती समुत्संतो गीतरसादिव। उपेत्योपेत्य विचलन् दूरमाकृष्टवान्नृपम् ॥१९॥ ततोऽकस्माच्च निर्गत्य तस्माच्चर्ममयाद् गजात्। वत्सेश्वरं सं सन्नद्धा पुरुषाः पर्यवारयन् ॥२०॥ तान्दृष्ट्वा नृपतिः कोपादाकृष्टच्छुरिकोऽथ सः। अप्रस्थान् योधयन्नन्यैरेत्य पश्चाद्वगृह्यत ॥२१॥ सङ्केतमिलितैश्चान्यैर्योधास्तैः सैनिकैः सह। निन्युर्वत्सेश्वरं चण्डमहासेनान्तिकं च तम् ॥२२॥ सोऽपि चण्डमहासेनो निर्गत्याग्रे कृतादरः। वत्सेशेन समं तेन विवेशोज्जयिनीं पुरीम् ॥२३॥ स तत्र ददृशे पौरैरवमानकलङ्कितः । छतीव लोचनानन्दो वत्सराजो नवागतः ॥२४॥ ततोऽस्य गुणरागेण वधमाशङ्क्य तत्र ते। पौराः सम्भूय सन्नादचक्रुर्मरणनिश्चयम् ॥२५॥ न मे वत्सेश्वरो वध्यो मयेष इति तान् ब्रुवन्। सांत्व्य चण्डमहासेनः पौरान् क्षोभादवारयत् ॥२६॥ ततो वासवदत्तां तां सुतां तत्रैव भूपतिः। वत्सराजाय गान्धर्वविद्याहेतोः समर्पयत् ॥२७॥ उवाच चैनं गान्धर्वं स्वसुतां शिक्षय प्रभो। ततः प्राप्स्यसि कल्याणं मा विषादं वृथा कृथा इति ॥२८॥ तस्य दृष्ट्वा तु तां कन्यां यन्मगजस्य भाननम्। मया स्नेहात्तमभवन्न यथा मन्युमेशतः ॥२९॥ तस्यानु चागुनमनी सह तं प्रतिजग्मतुः। हिया सद्युनिवृत्ते मनस्तु न व्यरुध्यत ॥३०॥ अथ वासवदत्तां तां गापयन्गद्गतेक्षणः। तथ गान्धर्वतायापी वत्सगज उवाच सः ॥३१॥
द्वितीय लम्बक
द्वितीय लम्बक १७५ अकेले वीणा बजाता हुआ और मधुर स्वर में गाता हुआ साथ ही अपने बन्धन की बात को भी सोचता हुआ वह राजा धीरे-धीरे हाथी के समीप चला गया॥१७॥ गीत की ओर तन्मय होने और सन्ध्याकालीन अन्धकार के घने होने के कारण राजा उस काष्ठ के रूप में निर्मित माया-गज को वास्तविक रूप में न पहचान सका॥१८॥ वह हाथी भी मानों गीतरस में मग्न होकर लम्बे-लम्बे कानों को हिलाता हुआ राजा के समीप आता हुआ-सा धीरे-धीरे उस दूर एकान्त में ले गया। एकान्त में पहुँचते ही उस यान्त्रिक हाथी के उदर से निकलकर पहले से तैयार कुछ वीर सिपाहियों ने राजा को घेर लिया॥१९-२०॥ उन्हें देखकर क्रुद्ध राजा ने कमर से छुरी खींचकर बगल सिपाहियों से जूझना प्रारम्भ किया। इतने में ही संकेत पाकर पीछे छिपे हुए अन्य सैनिक भी जंगल से निकल आये और पीछे से आक्रमण करके बलपूर्वक राजा उदयन को बन्दी बनाकर चण्डमहासेन के पास ले गये॥२१-२२॥ चण्डमहासेन भी वत्सराज को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने आगे बढ़कर उसका
१७६ | कथासरित्सागर
१७६ | कथासरित्सागर अङ्के घोषवती तस्य कण्ठे गीतद्युतिस्तथा। पुरो वासवदत्ता च तस्यै चेतोविनोदिनी ॥३२॥ सा च वासवदत्तास्य परिचर्यापराऽभवत्। लक्ष्मीरिव तदेकाग्रा वक्षस्याप्यनपायिनी ॥३३॥ अत्रान्तरे च कौशाम्ब्यां वत्सराजानुगे जने। आवृत्तं तं प्रभुं बुद्ध्वा बद्धं राष्ट्रं प्रचुक्षुभे ॥३४॥ उज्जयिन्यामवस्कन्दं¹ दातुमैच्छंस्तमन्ततः। वत्सेश्वरानुरागेण क्रुद्धा प्रकृतयस्तथा ॥३५॥ नैव चण्डमहासेनो वत्साध्यो महान्हि सः। न चैव वत्सराजस्य शरीरं कुशलं भवेत् ॥३६॥ तस्मान्न युक्तोऽवस्कन्दो बुद्धिसाध्यमिदं पुनः। इति प्रकृतयः क्षोभान्न्यवार्यन्त रुमण्वता ॥३७॥ ततोऽनुरक्तमालोक्य राष्ट्रमव्यभिचारि तत्। रुमण्वदादीनाहूय स्म धीरो यौगन्धरायणः ॥३८॥ इहैव सर्वैर्यूष्माभिः स्थातव्यं सर्वतोद्यतैः। रक्षणीयमिदं राष्ट्रं कालो नायमथ विक्रमः ॥३९॥ वसन्तकद्वितीयश्च गत्वाहं प्रज्ञया स्वया। वत्सेशं मोचयित्वा तामानेष्यामि न संशयः ॥४०॥ जलाहतो विषादेन विद्युतामिव द्युतिः। आपदि स्फुरति प्रज्ञा यस्य धीरः स एव हि ॥४१॥ प्राकारभञ्जनान् योगांस्तथा निगडभञ्जनान्। अदर्शनप्रयोगांश्च जानन्नहमृप्ययोगिनः ॥४२॥ इत्युक्त्वा प्रकृतीः कृत्वा हस्तन्यस्ता रुमण्वतः। यौगन्धरायणः प्रायात्कौशाम्ब्याः सवसन्तकः ॥४३॥ प्रविवेश च तेनैव सह विन्ध्यमहाटवीम्। स्वप्रज्ञामिव सत्ताढ्यां स्वनीतिमिव दुर्गमाम् ॥४४॥ तत्र वत्सेशमित्रस्य विन्ध्यप्राग्भारवासिनः। गृहं पुलिन्दकाख्यस्य पुलिन्दाधिपतेरगात् ॥४५॥ तं सज्जं स्थापयित्वा च यथा वचनाभिप्सितं। वत्सराजस्य रक्षार्थं भूरिसैन्यसमन्वितम् ॥४६॥ १ आक्रमणमिति भावः।
तृतीय लम्बक १७७
तृतीय लम्बक १७७ संगीत-शाला में राजा उदयन के मनोविनोद के लिए गोद में घोषवती वीणा कंठ में संगीत का स्वर और आँखों के सामने वासवदत्ता-यह सामग्री थी ॥३२॥ उस कैदी राजा की सुस्थिरा लक्ष्मी के समान शिष्या वासवदत्ता राजा की सेवा-शुश्रूषा में तन्मय रहने लगी ॥३३॥ इसी बीच उधर शिकार से लौटे हुए सैनिकों तथा गुप्तचरों द्वारा वत्सराज उदयन का कैद होना सुनकर राजा के प्रेम से सारा वत्स राष्ट्र क्षुब्ध हो गया और उज्जयिनी पर आक्रमण की तैयारियाँ होने लगीं ॥३४-३५॥ जनता को क्षुब्ध देखकर मन्त्री रूमण्वान् ने इस प्रकार उसे शान्त किया कि चंडमहासेन युद्ध के द्वारा वश में नहीं किया जा सकता। वह महाबलवान् है। और इस प्रकार आक्रमण करने से वत्सराज की भी खैर न होगी। उसका वध कर दिया जायगा। इसलिए यह कार्य युद्ध से नहीं प्रत्युत बुद्धि से सिद्ध करने योग्य है ॥३६-३७॥ राष्ट्र में राजानुरक्त प्रजा का क्षोभ देखकर परम बुद्धिमान् प्रधान मन्त्री यौगन्धरायण ने रुमण्वान् आदि मन्त्रियों तथा राज्याधिकारियों से कहा-॥३८॥ 'तुम सबको सर्वदा तैयार रहना चाहिए और इस राजाहीन राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए। समय आने पर युद्ध के लिए भी तैयार रहना चाहिए और मैं नर्म-सचिव वसन्तक के साथ अपने बुद्धि-बल से वत्सराज को छुड़ा लाता हूँ इसमें सन्देह नहीं ॥३९-४०॥ अधिक वात-संघर्ष से जैसे अधिक बिजली उत्पन्न होती है, उसी प्रकार भीषण और गम्भीर संकट के समय जिसकी बुद्धि का स्फुरण होता है वही धीर है ॥४१॥ प्राकारों के ध्वंस करने के योग (उपाय) बेड़ियाँ काटने के योग और अदृश्य हो जाने के योग (उपाय) भी मैं जानता हूँ। ऐसा कहकर और प्रजा को मन्त्री रूमण्वान् के हाथ सौंपकर यौगन्धरायण कौशाम्बी से वसन्तक के साथ निकल गया ॥४२-४३॥ साथ ही वसन्तक के साथ अपनी बुद्धि के समान सत्त्वयुक्त तथा अपनी नीति के समान दुर्गम विन्ध्य महावन में वह गया१ ॥४४॥ वहीं विन्ध्य-सीमा पर निवास करनेवाले पुलिन्द (जंगली) जाति के राजा वत्सराज के मित्र पुलिन्दक से मिलकर यौगन्धरायण ने उसे प्रबल और बड़ी सेना के साथ तैयार रहने के लिए कहा जिससे वत्सराज को लेकर लौटते समय यदि पीछे से आक्रमण हो तो पहली युद्धभूमि यही बन ॥४५-४६॥ १. जंगल के पक्ष में सत्त्व का अर्थ प्राणी है, यौगन्धरायण के पक्ष में मनोबल है। जिस प्रकार यौगन्धरायण की नीति दुर्गम थी, उसी प्रकार वह जंगल कठिनाइयों से भरा अतएव दुर्गम था।—अनु. २३
१७८ कथासरित्सागर
१७८ कथासरित्सागर गत्वा वसन्तकसखस्ततो यौगन्धरायणः । उज्जयिन्यां महाकालश्मशानं प्राप स क्रमात् ॥४७॥ विवेश तच्च बेताल क्रव्यगन्धिभिरावृतम् । इतस्ततस्तमश्यामंसंस्थिताभूमैरिवापरः ॥४८॥ तत्रैनं दर्शनप्रीतो मित्रभावाय तत्क्षणम् । योगेश्वरसख्यो भूतवानभ्यर्थ्य ब्रह्मराक्षसः ॥४९॥ तेनोपदिष्ट्या युक्त्या सतो यौगन्धरायणः । स चकारारमनः सद्यो रूपस्य परिवर्त्तनम् ॥५०॥ बभूव क्षेम विकृतः कुब्जो वृद्धस्य तत्क्षणात् । उन्मत्तवेशः सस्वाटो हास्यसञ्जननः परम् ॥५१॥ तयैव युक्त्या स यदा सिरानद्धपृषूदरम् । चक वसन्तकस्यापि रूपं दन्तुरमुण्डुलम् ॥५२॥ ततो राजकुलद्वारमादौ प्राप्य ससस्तकम् । विवेशोज्जयिनीं तौ स साधुर्यौगन्धरायणः ॥५३॥ नृत्यन्गायश्च तत्रासौ बटुभिः परिवारितः । दृष्टः सकौतुकं सर्वैर्ययौ राजगृहं प्रति ॥५४॥ तत्र राजावरोधानां समासो कृतकौतुकः । अगाद् वासवदत्तायाः शनैः श्रवणगोचरम् ॥५५॥ सा तमानाययामास घटिनीं प्राप्य सत्वरम् । गायनवस्त्रास्तां मर्मेशसादरं हि नवं वयः ॥५६॥ स च तत्र गतो वृद्धः वत्सराजं ददर्श तम् । उन्मत्तवन्तो विगलद्बाप्पो यौगन्धरायणः ॥५७॥ चकार तस्य सञ्ज्ञां च वत्सराजाय सोऽपि तम् । प्रत्यभिज्ञातवान् राजा वयप्रच्छन्नमागतम् ॥५८॥ ततो वासवदत्तां च तन्पत्नीं प्रति चात्मनः । अदर्शनं यस्यित्वाद् व्यपायोगपरायणः ॥५९॥ गजा रक्ष्यो ह्यनेनेति मान्त्वं गर्व्वा गविग्नमयम् । बन्धिनि ग्प गतानेस्मादुन्मत्तं क्वाप्यमादिति ॥६०॥ १ अदृश्याञ्जनलेपेनेति भावः।
द्वितीय लम्बक १७९
द्वितीय लम्बक १७९ तदनन्तर यौगन्धरायण बसन्तक को साथ लिये हुए उज्जयिनी के महाकाल श्मशान में पहुँचा ॥४७॥ वह श्मशान मांस की दुर्गन्धिवाले और चिता-धूम के गुब्बारों के समान काले-काले वेतालों से भरा हुआ था॥४८॥ वहाँ श्मशान में पहुँचने पर विद्याबल के कारण उसे देखते ही प्रसन्न होकर योगेश्वर नाम का ब्रह्मराक्षस यौगन्धरायण का मित्र बन गया॥४९॥ उसी योगेश्वर की बताई हुई युक्ति के अनुसार यौगन्धरायण ने तुरन्त अपना रूप बदल लिया। रूप बदलते ही यौगन्धरायण उसी समय टेढ़े-मेढ़े शरीरवाला कुबड़ा और चिकनी खोपड़ीवाला बूढ़ा लगने लगा। उसका रूप अत्यन्त हास्यजनक हो गया ॥५०-५१॥ उसी युक्ति से उसने बसन्तक की बाहर निकली हुई तोंद (पेट) को चमड़े की डोरियों से बाँधकर बड़े-बड़े और निकले हुए दाँतोंवाला बुरा-सा मुँह बनाकर उसका वेष ही बदल दिया ॥५२॥ वेष बदलने के अनन्तर बसन्तक को राजभवन के द्वार पर पहले भेजकर यौगन्धरायण भी स्वयं उसी वेश में चला। नाचता-गाता और बच्चों से घिरा हुआ एवं नागरिकों के लिए तमाशा सा बना हुआ बसन्तक राजभवन में पहुँचा ॥५३-५४॥ महल में रानियों को तमाशा दिखलाता हुआ बसन्तक वासवदत्ता के कानों में भी पहुँचा ॥५५॥ वासवदत्ता ने सेविका को भेजकर तमाशा देखने के लिए उसे संगीत-शाला में बुलवाया क्योंकि नई अवस्था हास्य-विनोद की ओर अधिक आकृष्ट होती है॥५६॥ संगीत-शाला में जाकर पागल-वेष में आँसू बहाते हुए (राजा की दशा पर रोते हुए) यौगन्धरायण ने कैदी वत्सराज को देखा॥५७॥ और राजा से संकेत भी किया। राजा ने भी वेश बदलकर आये हुए यौगन्धरायण को पहचान लिया ॥५८॥ उधर कुबड़ा यौगन्धरायण अदृश्य होने की युक्ति से वासवदत्ता और उसकी सेविकाओं से अदृश्य हो गया। केवल लड़का राजा उत्सव ही उस देश गया। इस प्रकार उसके अदृश्य होने पर सभी सेविकाएँ आश्चर्य करने लगीं कि वह पागल कहाँ गया ?॥५९-६०॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा तं च दृष्ट्वाग्रे मत्वा योगबलं तत् । युक्त्या वासवदत्तां तां वत्सराजोऽब्रवीदिदम् ॥६१॥ गत्वा सरस्वतीपूजामादायागच्छ दारिके । तच्छ्रुत्वा सा तथेत्युक्त्वा सवयस्या विनिर्ययौ ॥६२॥ यथोचितमुपेत्याथ ददौ वत्सेश्वराय सः । यौगन्धरायणस्तस्मै योगाक्षियङ्मभ्यञ्जनान् ॥६३॥ अस्याम् वासवदत्ताया वीणातन्त्रीनियोजितान् । वशीकरणयोगांश्च राज्ञस्तं स समर्पयत् ॥६४॥ व्यजिज्ञपच्च तं राजन्निहायातो वसन्तकः । द्वारि स्थितोऽप्यरूपेण तं कुरुष्वान्तिके द्विजम् ॥६५॥ यदा वासवदत्तेयं तव विश्रम्भमेष्यति । तदा वक्ष्यामि यदहं तत्कुर्यास्तिष्ठ साम्प्रतम् ॥६६॥ इत्युक्त्वा निर्ययौ शीघ्रं ततो यौगन्धरायणः । अगाद् वासवदत्ता च पूजामादाय तत्क्षणात् ॥६७॥ सोऽथ तामवदद्राजा बहिर्द्वारि द्विजः स्थितः । सरस्वत्यर्चने सोऽस्मिन् दक्षिणार्थे प्रवेश्यताम् ॥६८॥ सथेति द्वारवेद्यास्तं सत्र वासवदत्तया । विरूपामाकृतिं बिभ्रदानाय्यत वसन्तकः ॥६९॥ स चानीतस्तमालोक्य वत्सेशमरुवन्मुचा । ततश्चाप्रतिभेदाय स राजा निजगाद तम् ॥७० ॥ हे ब्रह्मन् ! रोगधैरूप्य सर्वमेतदहं तव । निवारयामि मा रोदीस्तिष्ठहेह ममान्तिके ॥७१॥ महाम्प्रसावो वेवति स धोवाच वसन्तकः । सोऽथ तं विकृतं दृष्ट्वा राजा स्मितमुखोऽभवत् ॥७२॥ तच्चालोक्याशयं बुद्ध्या तस्य सोऽपि वसन्तकः । हसति स्माधिकोद्भूतविरूपाननवैकृतः ॥७३॥ तं हसन्तं तथा दृष्ट्वा क्रीडनीयकसन्निभम् । तत्र वासवदत्तापि जहासा च तुतोष च ॥७४॥ यत सा नर्मणा बाला तं पप्रच्छ वसन्तकम् । किं विप्रान विजानासि भो ब्रह्मन् ! कथ्यतामिति ॥७५॥
द्वितीय लम्बक १८१
द्वितीय लम्बक १८१ सेविकाओं की ऐसी बातें सुनकर और यौगन्धरायण को सामने देखकर राजा ने वासव- दत्ता से कहा—कन्ये तुम जाकर सरस्वती-पूजा का सामान लाओ। फलतः गुरु की आज्ञा से सहेलियों के साथ वासवदत्ता वहाँ से चली गई॥६१-६२॥ अब एकान्त देखकर छद्मवेषी यौगन्धरायण ने युक्तिपूर्वक राजा की बेड़ियाँ काट डालीं और वासवदत्ता तथा उसकी सहेलियों को वश में करने के लिए राजा को वशीकरण की औषधियां भी दे दीं॥६३-६४॥ और राजा से बोला—'हे महाराज ! वसन्तक भी छद्म-वेश धारण करके द्वार पर खड़ा है। उसे अपने पास बुलवाओ॥६५॥ जब वासवदत्ता का तुम पर पूरा विश्वास हो जायगा तब मैं तुम्हे जो कहूँगा वह करना अभी तुम मौन रहो' ॥६६॥ यौगन्धरायण राजा से इस प्रकार कहकर बाहर चला गया और उसी समय वासवदत्ता सरस्वती-पूजन की सामग्री लेकर आई। उसके आने पर राजा ने वासवदत्ता से कहा कि एक ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है। उसे पूजा की दक्षिणा देने के लिए बुलवा लो। वासवदत्ता ने राजा की आज्ञा से विकृत रूप धारण किये हुए उस ब्राह्मण को भीतर बुलवा लिया॥६७-६९॥ वसन्तक राजा उदयन के सामने आते ही रोने लगा उदयन भी भेद खुल जाने के भय से उससे कहने लगा ॥७०॥ हे ब्राह्मण रोग के कारण तुममें जो यह कुरूपता आ गई है उसे मैं अभी दूर कर देता हूँ। रोओ मत। मेरे पास रहो ॥७१॥ तब वसन्तक बोला—'देव ! यह आपकी महती कृपा है। राजा भी वसन्तक की विकृत आकृति को देखकर मुस्कराने लगा ॥७२॥ वसन्तक राजा को प्रसन्नता से मुस्कराते हुए अपने रूप को और भी बिगाड़कर हँसने लगा॥७३॥ पिशाच के समान उस वसन्तक को इस प्रकार विकृत रूप में हँसते हुए देखकर वासव- दत्ता भी हँसने लगी और प्रसन्न हुई ॥७४॥ तब वासवदत्ता ने अपने हास्य-विकार के भय से उससे पूछा कि 'हे ब्राह्मण! तुम कौन-सा विशेष ज्ञान रखते हो। बताओ तो सही ॥७५॥
१८२ कथासरित्सागर
१८२ कथासरित्सागर कथां कथयितुं देवि जानामीति स चावदत्। कथां कथय तर्ह्येकामिति सापि ततोऽब्रवीत् ॥७६॥ ततस्तां राजतनयां रञ्जयन् स वसन्तकः। हास्यवचित्रसरसामिमामकथयत्कथाम् ॥७७॥ लोहजङ्घकथा अस्तीह मथुरा नाम पुरी कंसारिजन्मभूः। तस्यां रूपनिकेतासीत् ख्याता वारविलासिनी ॥७८॥ तस्या मकरदंष्ट्राख्या माताभूद् वृद्धकुट्टनी। तद्गुणावृष्यमाणानां यूनां दृष्टि विपच्छटा ॥७९॥ पूजाकाले सुरकुलं स्वनियोगाय जातु सा। गता रूपणिका दूरादेकं पुंष्यमक्षत ॥८०॥ स दृष्टः सुभगस्तस्या विवेश हृदयं तथा। यथा मात्रा कृतास्तेऽस्मादुपदेशा विनिर्ययुः ॥८१॥ चेटिकामथ सावादीद् गच्छ मद्वचनादमुम्। पुंष्यं ब्रूहि मद्गेहं त्वयाद्यागम्यतामिति ॥८२॥ तथेति चेटिका सा च गत्वा तस्मै तदब्रवीत्। ततः स किञ्चिद् विमृशन् पुंष्यस्तामभाषत ॥८३॥ लोहजङ्घाभिधानोऽस्मि ब्राह्मणो नास्ति मे धनम्। तवाढ्यजनगम्यं हि कोऽहं रूपणिकागृहे ॥८४॥ न धनं वाञ्छ्यते त्वत्त स्वामिन्येत्युदिते तया। स लोहजङ्घस्तद्वाक्यं तथेति प्रत्यपद्यत ॥८५॥ ततश्चेटीमुगाद् मुक्त्वा तच्च सा गृहमूत्सुका। गत्वा रूपणिका हस्थौ तन्मार्ग न्यस्तलोचना ॥८६॥ क्षणाच्च लोहजङ्घोऽथ तस्या मन्दिरमाययौ। कुतोऽप्यमिति कुट्टन्या दृष्टो मकरदंष्ट्रया ॥८७॥ प्रापि रूपणिका दृष्ट्वा स्वयमुत्थाय सादरम्। कामवन्मन्तरं हृष्टा कण्ठे लग्ना निनाय तम् ॥८८॥ तत्र सा लोहजङ्घस्य नव्यं सौभाग्यसम्पदा। वणीरता गतौ भाग्यम्यक्त जगद्मयमयत् ॥८९॥
द्वितीय लम्बक १८५
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तब विदूषक वसन्तक बोला- 'मैं अच्छी-अच्छी कहानियाँ कहना जानता हूँ। तब वासवदत्ता ने कहा- 'अच्छा एक अच्छी-सी कहानी सुनाओ तो' ॥७६॥ तब वह वसन्तक राजपुत्री वासवदत्ता का मनोरंजन करता हुआ हास्य के पुट से सरस एवं एक विचित्र कहानी सुनाते हुए कहने लगा ॥७७॥
लोहजंघ की कथा
इस देश में भगवान् कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा नाम की एक नगरी है। उसमें रूपनिका नाम की एक वेश्या रहती थी ॥७८॥ उसकी माता मकरदंष्ट्रा नाम की बूढ़ी कुट्टनी थी। वह मानो रूपनिका के रूप और गुणों पर आकृष्ट कामुकों की आँखों के लिए विष के समान थी ॥७९॥ एक बार किसी देवता के पूजन के लिए रूपनिका किसी मन्दिर में गई और उसने दूर से ही किसी एक युवा पुरुष को देखा ॥८०॥ रूपनिका को देखते ही वह युवक उसके हृदय में गड़-सा गया और कुट्टनी माता के सभी उपदेश उसके हृदय से दूर हो गये। उनका स्थान मानो उस पुरुष ने ले लिया। रूपनिका ने अपनी सेविका से कहा- 'तुम उस पुरुष के पास जाकर कहो कि आज वह मेरे घर पर आवे' ॥८१-८२॥ सेविका ने इस प्रकार स्वामिनी का सन्देश उस पुरुष से कह दिया। वेश्या का सन्देश सुनने पर और कुछ सोचकर वह युवक बोला- ॥८३॥ 'मैं लोहजंघ नामक ब्राह्मण हूँ। मेरे पास धन नहीं है। इसलिए धनिकों के जाने योग्य रूपनिका के घर में मेरी क्या योग्यता है' ॥८४॥ सेविका ने कहा- मेरी मालकिन तुमसे धन नहीं चाहती। सेविका का यह उत्तर सुनकर लोहजंघ ने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया ॥८५॥ सेविका से यह समाचार सुनकर, उत्सुकतापूर्वक घर आकर उसके आने की राह देखती हुई रूपनिका खिड़की में बैठ गई ॥८६॥ कुछ समय के अनन्तर पूर्वनिश्चयानुसार लोहजंघ उसके घर आ गया और वेश्या की माता मकरदंष्ट्रा कुट्टनी को आश्चर्य हुआ कि यह कहाँ से आया ॥८७॥ रूपनिका भी उसका आगमन देखकर प्रसन्न हुई और उठकर उसका स्वागत करती हुई शयनगृह में ले जाकर आनन्दमग्न हो गई। लोहजंघ के सहवास से उसे ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जिसे पाकर उसने अपना जन्म सफल समझा ॥८८-८९॥
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर सतस्तया निभृतान्यपुरुषासङ्गया सह। यथासुखं स रात्रैव तस्यौ तन्मन्दिरे युवा ॥९०॥ तद्दृष्ट्वा शिक्षिताशेषवेपयोपिर्जगाद ताम्। माता मकरदंष्ट्रा सा क्षिप्ता रूपणिकां रहः ॥९१॥ किमयं निर्धनं पुत्रि! सभ्यत पुरुषस्त्वया। धनं स्पृहयन्ति सुजना गणिका न तु निर्धनम् ॥९२॥ क्वानुरागः क्व वेश्यात्वमिति तं विस्मृतं कथम्। सन्ध्येव रागिणी वेश्या न स्थिरं पुत्रि! दीप्यते ॥९३॥ मटीव कृत्रिमं प्रेम गणिकार्थाय दर्शयेत्। तदेनं निर्धनं मुञ्च मा कृथा नाशमात्मनः ॥९४॥ इति मातुर्वचः श्रुत्वा रुषा रूपणिकाब्रवीत्। मैवं वादीर्मम ह्येष प्राणेभ्योऽप्यधिकः प्रियः ॥९५॥ धनमस्ति च मे भूरि किमन्येन करोम्यहम्। तदम्ब! मन्न वन्तव्या भूयोऽप्येवमहं त्वया ॥९६॥ सङ्क्रुद्धा मोहजङ्घस्य निर्वासनविधौ कृथा। तस्यौ मकरदंष्ट्रा सा तस्योपायं विचिन्वती ॥९७॥ अथ मार्गगतं कञ्चित्तीक्ष्णकोशं ददर्श सा। राजपुत्रं परिवृतं पुरुष्यैः शस्त्रपाणिभिः ॥९८॥ उपगम्य द्रुतं तं च नीत्वैकान्ते जगाद सा। निर्धनेन ममैकेन कामुकनावृतं गृहम् ॥९९॥ तन्ममागच्छ तन्नाशं तथा च कुरु यन सः। गृहान्मम निवर्तेत मदीयां च सुतां भज ॥१००॥ तथेति राजपुत्रोऽथ प्रविवेश स तद्गृहम्। तस्मिन्क्षणे रूपणिका तस्यौ देवकुले च सा ॥१०१॥ सोऽहञ्कश्च तत्कालं बहिः क्वापि स्थितोऽभवत्। क्षणान्तरे स निशङ्कस्तमेव समुपाययौ ॥१०२॥ तत्क्षणं राजपुत्रस्य तस्य भृत्यः प्रधाव्य सः। पृष्ठं पादप्रहाराद्यैः सर्वेष्वङ्गेष्वताडयत् ॥१०३॥ ततस्तैरेव चामेष्यपूर्वं क्षिप्तः स सातके। मोहजङ्घः कथमपि प्रपलायितवांस्ततः ॥१०४॥
द्वितीय लम्बक १८५
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द्वितीय लम्बक १८५ तदनन्तर अन्य पुरुषों के साथ समागम को छोड़कर एकमात्र उसी के साथ प्रेम करनेवाली रूपणिका के साथ वह भी उसी घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा। कन्या की यह रीति देखकर नगर की समस्त वेश्याओं की शिक्षिका मकरदंष्ट्रा न अत्यन्त दुःखी होकर एकबार एकान्त में अपनी कन्या रूपणिका से कहा—'बेटी तुम इस दरिद्र से क्या प्रेम कर रही हो। अच्छे व्यक्ति मुर्दे को भी छू लेते हैं, पर वेश्या निर्धन को भी नहीं छू सकती। कहाँ सच्चा प्रेम और कहाँ वेश्या-वृत्ति क्या तुम वेश्याओं के इस सिद्धान्त को भी भूल गई। बेटी ! स्नेह करनेवाली वेश्या सन्ध्या के समान अधिक देर तक नहीं चमक सकती। वेश्या को तो केवल धन के लिए अभिनेत्री के समान प्रेम दिखलाना चाहिए। इसलिए तुम इस दरिद्र ब्राह्मण को छोड़ो अपना विनाश न करो। माता के उपदेश को सुनकर रूपणिका क्रोध से बोली—'माता ! तुम ऐसा न कहो। यह मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारा है धन तो मेरे पास बहुत है अधिक धन लेकर मैं क्या करूँगी। इसलिए हे माता ! तुम फिर मुझे ऐसा कभी न कहना ॥१९०-१९६॥ यह सुनकर रूपणिका की माता मकरदंष्ट्रा मन-ही-मन जल गई और लोहजंघ को घर से निकालने का षड्यन्त्र सोचने लगी ॥१९७॥ कुछ समय के अनन्तर कुट्टनी ने राह म जाते हुए किसी धनहीन राजपुत्र को देखा जो शस्त्र धारी सिपाहियों से घिरा हुआ जा रहा था ॥१९८॥ उसे देखकर कुट्टनी दौड़कर उसके पास आ गई और एकान्त म ले जाकर कहने लगी— 'मेरे घर पर एक दरिद्र कामी व्यक्ति ने अधिकार जमा रखा है इसलिए तुम मेरे घर पर आओ और ऐसा उपाय करो कि वह मेरे घर से निकल जाय। इस काय के पुरस्कार-स्वरूप तुम मेरी पुत्री का उपभोग करो ॥१९९-१ ॥ राजपुत्र ने कुट्टनी की बात स्वीकार कर ली और उसने रूपणिका के गृह में प्रवेश किया उसी समय रूपणिका किसी देवमन्दिर म दर्शन के लिए चली गई थी ॥१ १॥ लोहजंघ भी दैवयोग से उस समय कहीं बाहर गया हुआ था। फलतः लोहजंघ आकर निःशंक भाव से सदा के अनुसार वेश्या के घर म घुसा ॥१ २॥ उसके घर म घुसते ही राजपुत्र के सिपाहियों ने उसे दौड़ाकर लात-घूसों से खूब मारा ॥१ ३॥ मार खाकर मरे हुए लोहजंघ को पकड़कर सिपाहियों ने किसी गंदे गड्ढे (संडास) में फेंक दिया। लोहजंघ फिर उससे किसी प्रकार निकल भागा ॥१ ४॥ २४
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर अथागता रूपशिखा सबुद्धवा शोकविह्वला। सामूशोदयाय स ययौ राजपुत्रो यथागतम्॥१०५॥ लोहजङ्घोऽपि कुट्टन्या प्रसह्य स खलीकृतः। गन्तु प्रवृत्त तीर्थे प्राणांस्त्यक्तु वियोगवान्॥१०६॥ गच्छन्नटव्यां सन्तप्त कुट्टनीमयुना हृदि। रवेश्च ग्रीष्मतापेन च्छायामभिललाप स॥१०७॥ तरुमप्राप्नुवन्सोऽथ रुभ हस्तिकलेबरम्। अथानेन प्रविश्यान्तर्निर्मास जम्बुक कृतम्॥१०८॥ घर्मविक्षेपे तद्रान्तः परिश्रान्त प्रविश्य सः। लोहजङ्घो ययौ निद्रो प्रविद्यद् वातशीतले॥१०९॥ अथाकस्मात्समुत्थाय क्षणेनैव समन्ततः। मेघः प्रवृवृते तत्र धारासारेण वर्षितुम्॥११०॥ तन निर्विवर प्राप सङ्कोच हस्तिचर्म तत्। क्षणाच्च तेन मार्गेण जलोघो भृशमामयौ॥१११॥ तनापहृत्य गङ्गायामक्षेपि गजचर्म तत्। सज्जलोभेन नीत्वा च समुद्रान्तन्यषीयत॥११२॥ तत्र दृष्ट्वा च तत्तन्म निपत्यामिषशङ्कया। हृत्वार्णवे पारमनयत्पक्षी गरुडवंशजः॥११३॥ तत्र चञ्च्वा विदार्यैतत् गजचम विलोक्य च। अन्तस्थं मानुषं पक्षी पलाय्य स छतो ययौ॥११४॥ ततश्च घर्मेणस्तस्मात्पक्षिसरम्भबोधितः। तच्चञ्चुरचितद्वाराल्लोहजङ्घो विनिर्ययौ॥११५॥ दृष्ट्वा समुद्रपारस्थमात्मानं च सविस्मयः। अनिद्रस्वप्नमिव तत्स समग्रममन्यत॥११६॥ अथ द्वौ राक्षसौ तत्र घोरौ भीतौ ददर्श सः। तौ चापि राक्षसौ दूराच्छङ्कितौ तमपश्यताम्॥११७॥ रामात्परामवं श्रुत्वा त तथैव च मानुषम्। दृष्ट्वा तीर्णाम्बुधि भूयस्तो भय हृदि घत्रतुः॥११८॥ समन्त्र्य च तयोर्मध्यावेको गत्वा तथैव तम्। बिभीषणाय प्रभवे यथावृष्ट न्यवेदयत्॥११९॥ दुष्टरामप्रभावः सख्लोऽपि राजा विभीषणः। मानुषागमनाद् भीतो राक्षसं समभाषत॥१२०॥ गच्छ मद्वचनात् भद्र प्रीत्या च ब्रूहि मानुषम्। मागग्यतां गृहेऽस्माकं प्रसा क्रियतामिति॥१२१॥
द्वितीय लम्बक १८७
द्वितीय लम्बक १८७ इस बीच देव-दर्शन करने आई हुई रूपनिका सारा वृत्तान्त देख-सुन अत्यन्त शोक- सन्तप्त हुई और वह राजपुत्र भी यह सब कांड करके जिधर जा रहा था उधर ही चला गया॥११५॥ कुट्टनी पर बढ़े हुए क्रोध से जलता हुआ लोहजंघ भी किसी तीर्थ में प्राण-त्याग करने की इच्छा से किसी ओर चला गया ॥११६॥ लोहजंघ का हृदय कुट्टनी के इस कुकृत्य से जल रहा था ऊपर से पड़ती हुई गर्मी की कड़ी धूप से उसका शरीर भी जल रहा था। वह कहीं ठंडी छाया की खोज में था उस निर्जन भूमि में कहीं वृक्ष तो नहीं दिखाई पड़ा किन्तु एक हाथी की खाली लाश कहीं पड़ी हुई उसे दिखाई दी जिसे शृगालों ने भीतर से खाकर खोखला कर दिया था और दोनों ओर खुली रहने से हवा के आवागमन से वह ठंडी भी थी। लोहजंघ पैरों की ओर से उसमें घुस गया और शीतल वायु के झोंकों से उसी में पड़े हुए लोहजंघ को नींद आ गई॥११७-११९॥ इसी बीच सहसा आकाश में बादल उमड़ आये और चारों ओर मूसलाधार वर्षा के कारण नदी-सी बह चली और हाथी की लाश सिकुड़ गई ॥१२०॥ कुछ समय में ही पानी के प्रवाह में वह लाश बह चली और सडकते-खिसकते गंगाजी में जा गिरी। वह वहाँ से भी बहकर समुद्र में गिर गई॥१२१॥ समुद्र में डूबती-उतराती हुई उस लाश को मांसपूर्ण समझकर गरुड़वंश का एक पक्षी¹ चोंच से पकड़कर उसे समुद्र के उस पार किसी टापू पर ले गया ॥१२२॥ टापू के किनारे उस पक्षी ने चोंच से उसे फाड़कर देखा तो वह खोखला हाथी का चमड़ा था और उसके भीतर जीवित मनुष्य को देखकर वह पक्षी उसे वहीं छोड़कर उड़ गया॥१२४॥ लोहजंघ भी पक्षी की चोंच से किये हुए छेद के द्वारा बाहर निकलकर चारों ओर देखा और उस घटना को बिना नींद का स्वप्न उसने समझा। इतने में ही उसने समुद्र-तट पर घूमते हुए तथा विस्मय से डरे हुए दो भयानक राक्षसों को देखा ॥१२५-१२६॥ रामचन्द्र द्वारा भरी हुई लंका की दुर्दशा का स्मरण करके फिर से आये हुए एक मनुष्य को देखकर उन्हें भय हुआ। डरे हुए राक्षसों ने लंका में किसी मनुष्य के आने का समाचार वहाँ के राजा विभीषण से जा कहा। विभीषण रामचन्द्र के प्रभाव को देख चुका था। अतः वह भी मनुष्य के आगमन से भयभीत होकर गुप्तचर राक्षस से बोला—'तुम समुद्र के तटपर जाकर मेरी ओर से उस मनुष्य से कहो कि आओ हमारे घर पर पधारने की कृपा करो' ॥१२७-१२९॥ १ अरेबियन नाइट्स में सिदबाद जहाजी की कहानी में तीन फकीर और बगदाद की तवचियों की कथा के प्रसंग में तीसरे फकीर की कहानी, इससे मिलती-जुलती है उसमे इस पक्षी की चर्चा है। —अनु
तथेत्यागत्य तत्स्मै स्वप्रभुप्रार्थनावचः। कथितो लोहजङ्घाय घस्रसं स च राक्षसः ॥१२२॥ सोऽप्यङ्गीकृत्य तद्विप्रो लोहजङ्घः प्रशान्तधीः। तेनैव सद्वितीयेन सह लङ्कां ततोऽगमत् ॥१२३॥ तस्यां च दृष्टसौवर्णतत्तत्प्रासादविस्मितः। प्रविश्य राजभवनं रा ददर्श विभीषणम् ॥१२४॥ सोऽपि पप्रच्छ राजा तं कृतातिथ्यः कृताशिषम्। ब्रह्मन्! कथमिमां भूमिमनुप्राप्तो भवानिति ॥१२५॥ ततः स धूर्तोऽवादीत्तं लोहजङ्घो विभीषणम्। विप्रोऽहं लोहजङ्घाख्यो मथुरायां कृतस्थितिः ॥१२६॥ सोऽहं दारिद्र्यसन्तप्तस्तत्र नारायणायत। निराहारः स्थितोऽकार्षं गत्वा द्वकुलं तपः ॥१२७॥ विभीषणान्तिकं गच्छ मद्भक्तः स हि ते धनम्। दास्यतीत्यादिशत् स्वप्ने ततो मां भगवान्हरिः ॥१२८॥ क्वाहं विभीषणः क्वेति मयोक्ते स पुनः प्रभुः। समादिक्षद्ध्रुवाद्यैव तं द्रक्ष्यसि विभीषणम् ॥१२९॥ इत्युक्तः प्रभुना सद्यः प्रबुद्धोऽहमिक्षाम्बुधः। पारेऽञ्चस्थितमारभाममपश्यं तद्विं नापरम् ॥१३०॥ इत्युक्तो लोहजङ्घेन लङ्कामालोक्य दुर्गमाम्। सत्यं दिव्यप्रभावोऽयमिति मेने विभीषणः ॥१३१॥ तिष्ठ दास्यामि ते वित्तमित्युक्त्वा ब्राह्मणं च तम्। मत्वा च रक्षसां हस्ते तमप्रच्छ्य नृघातिनाम् ॥१३२॥ तमस्यारत्नर्भमुत्साख्याद् गिरेः सम्प्रेष्य राक्षसान्। मानाययत्पक्षिपोतं गरुडान्वयसम्भवम् ॥१३३॥ स चास्मै लोहजङ्घाय मथुरायां गमिष्यते। तत्कालमेव प्रददौ वशीकाराय वाहनम् ॥१३४॥ लोहजङ्घोऽपि लङ्कायां वाह्यप्रशिष्टहस्तम्। कञ्चित्काल विशश्राम स विभीषणसत्कृतः ॥१३५॥ एकदा तं च पप्रच्छ राक्षसेन्द्रं सकौतुकः। लङ्कायां काष्ठमप्येषा कथं सर्वैव भूरिति ॥१३६॥