कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक ४१७
षष्ठ लम्बक ४१७ यहाँ आकर शिरःपीड़ा का बहाना करके द्वारपाल द्वारा नगाड़े पर घोषणा कराकर राजा ने नगर के सभी वैद्यों को बुलवाया ॥१४८॥ और, एक-एक वैद्य को अलग-अलग बुलवाकर पूछने लगा कि तुम्हारे कितने रोगी हैं और तुमने किसे-किसे कौन-कौन-सी दवा दी है? ॥१४९॥ उन वैद्यों ने भी एक-एक करके अपना-अपना विवरण राजा को सुनाया। उनमें से एक वैद्य ने क्रमशः अपनी बारी आने पर राजा से यह कहा ॥१५०॥ 'महाराज रोगी मातुलत्त नामक वैश्य को मैंने नागबला नाम की औषधि बताई थी आज दूसरा दिन है। यह सुनकर राजा ने मातुलत्त वैश्य को बुलवाकर कहा-'तुम्हारे लिए नागबला कौन लाया था? बताओ' ॥१५१-१५२॥ 'महाराज मेरा भृत्य (नौकर) लाया था। बनिये के ऐसा उत्तर देने पर राजा ने उस भृत्य को बुलवाकर कहा 'तू ने नागबला के लिए भूमि खोदते हुए जो मुहरों की राशि प्राप्त की है वह ब्राह्मण का धन है, उसे दे दे' ॥१५३-१५४॥ राजा के ऐसा कहने पर भयभीत नौकर ने उसी समय मुहरें लाकर वहीं रख दीं ॥१५५॥ तदनन्तर राजा ने अनुग्रह करते हुए ब्राह्मण को बुलवाकर, उस कंजूस ब्राह्मण के बाहरी प्राणों के समान चोरी होकर मिली हुई मुहरें उसे दे दीं ॥१५६॥ इस प्रकार राजा ने वृक्ष के नीचे से ले जाये गये धन को बुद्धिबल से ब्राह्मण को प्राप्त करा दिया, क्योंकि वहाँ उत्पन्न हुई ओषधि का वह जानता था ॥१५७॥ अतएव पुरुषार्थ के ऊपर सदा बुद्धि की प्रधानता रहती है। शुभ कार्यों में पौरुष क्या कर सकता है? ॥१५८॥ इसलिए हे प्राणेश्वर ! तुम भी बुद्धिबल से कुछ ऐसा करना जिससे कलिङ्गसेना का सोच दोष टाला जा सके ॥१५९॥ यह बात तो है कि उस कलिङ्गसेना पर दया और मधुर संगीतकला दोनों हैं और रात में तुमने ऐसा कुछ शब्द भी सुना है ॥१६०॥ उसका दोष मिलने पर उसका और हमारा कल्याण न होगा। राजा आगे विवाह न करेगा इसलिए अधर्म भी नहीं होगा ॥१६१॥ उधर बन्दिवाले यौगन्धरायण के पद सुनकर वत्सनरेश दोषदण्ड उत्तप्त होकर बोला-॥१६२॥
७६८ कथासरित्सागर
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कस्त्वया सदृशो नीतावन्यो देवाद् बृहस्पते। अमृतसेकोऽप्य रक्षन्मन्त्रो राज्यशासिनः॥१६३॥ सोऽहं कलिङ्गसेनाया जिज्ञासिष्ये गतिं सदा। बुद्ध्या शक्त्यापि चेत्युक्त्वा ततो योगेश्वरो ययौ॥१६४॥ तत्कालं सा च हर्म्याग्रं पर्यटन्तं स्वहर्म्यगा। कलिङ्गसेना वत्सशं दृष्ट्वा दृष्ट्वा स्म साम्यति॥१६५॥ तन्मनाः स्मरसन्तप्ता मृणालाङ्कुरहारिणी। सा श्रीखण्डाङ्गरागा च न लेभे निर्वृतिं क्वचित्॥१६६॥ अत्रान्तरे स सो पूर्वं दृष्ट्वा विद्याधराधिपः। तस्थौ मदनवेगाख्यो गाढानङ्गशरादितः॥१६७॥ सम्प्राप्तमे तपः कृत्वा वरे शम्भोर्निशाचरात्। सान्यासक्ताप्यवेक्षस्था सुतं प्राप्स्यस्य नामवत्॥१६८॥ यतस्तेनान्तरं लब्धुमसो विद्याधराधिपः। रजनीषु दिवि भ्राम्यन्नासीत्तन्मन्दिरोपरि॥१६९॥ संस्मृत्य तु तमादेशं तपस्तुष्टस्य धूर्जटेः। एकस्या निशि वत्सेशरुपं चक्रे स्वविद्यया॥१७०॥ तद्रूपश्च विवेशास्य मन्दिरं द्राग्यवन्तिनः। कालक्षेपाक्षमो गुप्तं मन्त्रिणां स इवागतः॥१७१॥ कलिङ्गसेनाप्युत्तस्थौ तं दृष्ट्वोत्कम्पविह्वला। न सोऽयमिति सा रात्रेर्वार्यमाणेव भूयणे॥१७२॥ ततो वत्सेशरूपेण क्रमाद् विश्वास्य तेन सा। भार्या मदनवेगेन गान्धर्वेविधिना कृता॥१७३॥ सत्कार्ल च प्रविष्टस्तद्दृष्ट्वा योगावलक्षितः। योगेश्वरो विषण्णोऽभूद् वत्सेशालोकनभ्रमात्॥१७४॥ योगन्धरायणाद्येषाद् गत्वोक्तवा तन्निवेशतं। युक्त्या कामव्यवस्थाया वत्सशं वीक्ष्य पार्श्वगम्॥१७५॥ बुञ्जे मन्त्रिवरोक्त्यैव रूपं सुप्तस्य भेदितुम्। कलिङ्गसेना प्रच्छन्नशायिनं सोऽन्यमत्युत॥१७६॥ गत्वा कलिङ्गसेनायाः सुप्तायाः शयनीयके। सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपे स्थितमैक्षत॥१७७॥
'नीति में बृहस्पति के सिवा तुम्हारे समान और कौन है। तुम्हारी सम्मति राज्य-रूपी वृक्ष के लिए अमृत-सिंचन के समान है' ॥१६३॥ अब मैं कलिङ्गसेना की गतिविधि का बुद्धि और शक्ति दोनों से ही जानने का प्रयत्न करूंगा। ऐसा कहकर योगेश्वर चला गया ॥१६४॥ उस समय अपने भवन में बैठी हुई कलिङ्गसेना राजमहल, उद्यान आदि में भ्रमण करते हुए वत्सराज को देख-देखकर तड़प रही थी ॥१६५॥ वत्सममय हृदयवाली कलिङ्गसेना मृणाल (कमलनाल) के अंगद (भुजा के आभूषण) से मनाहार लगा रही थी और चन्दन का लेप करने पर भी विरहाग्नि से शान्ति प्राप्त नहीं कर पा रही थी ॥१६६॥ इसी बीच मदनवेग नाम का वह विद्याधरों का राजा पहले से ही कलिङ्गसेना को देखकर कामबाणों की गम्भीर वेदना का अनुभव कर रहा था ॥१६७॥ उसकी प्राप्ति के लिए तप करके शिवजी से वर लाभ कर लेने पर भी दूसरे पर आसक्त और दूसरे वेश में गई हुई कलिङ्गसेना अब उसके लिए सहज में ही पान योग्य नहीं रह गई थी ॥१६८॥ इसीलिए अवसर की प्रतीक्षा में विद्याधरों का वह राजा रात्रियों में आकाश में विचरण करता हुआ एक बार कलिङ्गसेना के निवास भवन के ऊपर आया ॥१६९॥ और तपस्या से सन्तुष्ट शिवजी के उस आदेश का स्मरण करके एक बार रात के समय अपनी विद्या के बल से वत्सराज का रूप और वेष बनाकर द्वारपाल से प्रणाम किया जाता हुआ कलिङ्गसेना के मन्दिर में गया। मानों मन्त्रियों द्वारा किए गए कालक्षेप को सहन न करके राजा गुप्त रूप में स्वयं ही आ गया हो ॥१७०-१७१॥ उसे देखकर कामव्यथा से व्याकुल कलिङ्गसेना उठी। उसके उठने पर झनझनाते उसके आभूषण मानों यह कह रहे थे कि यह वह (वत्सराज) नहीं है ॥१७२॥ तदनन्तर वत्सराज का रूप धारण किए हुए उस विद्याधर ने धीरे-धीरे उसे विश्वास दिलाकर गान्धर्व विधान से अपनी पत्नी बना लिया ॥१७३॥ उसी समय अन्दर घुसा हुआ और अपनी विद्या के प्रभाव से अलक्षित योगेश्वर वत्सराज को देखकर भ्रम से चकित रह गया ॥१७४॥ और, वत्सराज को यौगन्धरायण के पास बैठा हुआ देखकर उनके आदेश से उसे यह सब वृत्तान्त कहने के लिए उसके पास गया ॥१७५॥ मन्त्री के कहने से कलिङ्गसेना के गुप्त प्रेमी का वास्तविक रूप देखने के लिए वह पुनः लौट आया ॥१७६॥ और सोई हुई कलिङ्गसेना के पास आकर उस पर सोये हुए मदनवेग के वास्तविक रूप को उसने देखा ॥१७७॥ ९७
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर छत्रध्वजाङ्कनिर्मूलिपादाब्जं दिव्यमानुषम्। स्वापान्तहिततद्विद्यावीतरूपविवर्तनम् ॥१७८॥ तत्र गत्वा यथादृष्टं निवेद्य परितोषवान्। योगेश्वरो जगादासौ हृष्टो यौगन्धरायणम् ॥१७९॥ न वेत्ति मानुषः किञ्चिद् वेत्सि त्वं नीतिचक्षुषा। तव मन्त्रेण दुसाध्यं सिद्धं कार्यमिदं प्रभो ॥१८०॥ किं वा व्योम विमार्केण किं तोयेन विना सरः। किं मन्त्रेण विना राज्यं किं सत्येन विना वच ॥१८१॥ इत्युक्तवन्तमामन्त्र्य प्रीतो योगेश्वरं ततः। प्रातर्वत्सेश्वरं द्रष्टुमगाद्यौगन्धरायणः ॥१८२॥ समुपेत्य यथावच्च कथा प्रस्तावतोऽब्रवीत्। नृपं कलिङ्गसेनार्थं पृष्टकार्यविनिश्चयम् ॥१८३॥ स्वच्छन्दवासी न ते राजन् पाणिस्पर्शमिहार्हति। एषा हि स्वेच्छया द्रष्टुं प्रसेनजितमागता ॥१८४॥ विरक्ता वीक्ष्य तं वृद्धं त्वां प्राप्ता रूपलोभतः। तवन्त्यपुरवासङ्गमपि स्वेच्छं करोत्यसौ ॥१८५॥ तच्छ्रुत्वा कुरुतन्व्येवं कथमेवं समाचरेत्। शक्तिः कस्य प्रवेष्टुं वा मदीयान्तपुरान्तरे ॥१८६॥ इति राज्ञोदितेऽभाणीद्धीमान्यौगन्धरायणः। अद्यैव दर्शयाम्यक्षप्रत्यक्षं निशि देव ते ॥१८७॥ दिव्यास्तामभिवाञ्छन्ति विद्याध्रा मानुषोऽत्र कः। दिव्यानां च गती रोद्धुं राजन्नेकेह शक्यते ॥१८८॥ तदेहि साक्षात्पश्येति वादिना तेन मन्त्रिणा। सह गन्तुं मतिं चक्रे तत्र रात्रौ स भूपतिः ॥१८९॥ पद्मावत्याः कृते राज्ञा न विवाहादपरति यत्। प्रोक्तं देवि प्रतिज्ञातं मया मिथ्यैतदद्य तत् ॥१९०॥ इत्यपाम्येत्य तां देवीमुक्त्वा यौगन्धरायणः। कलिङ्गसेना वृत्तान्तं हं तस्यै सर्वमुक्तवान् ॥१९१॥ स्वदीयविद्यानुष्ठानफलमेतन्ममेति सा। देवी वासवदत्तापि प्रणताभिननन्द तम् ॥१९२॥
षष्ठ लम्बक ७७१
षष्ठ लम्बक ७७१ उस दिव्य मनुष्य के छत्र और ध्वजा से चिह्नित तथा निष्पंक कोमल चरणकमल थे। सो जाने पर छिपी हुई विद्या के कारण उसका बदला हुआ रूप समाप्त हो गया और वह स्पष्टतया अपने वास्तविक रूप में दीख रहा था॥१७८॥ इस स्थिति को देखकर परम सन्तुष्ट योगेश्वर न जो कुछ देखा उसे मन्त्री यौगन्धरायण को बताते हुए उसने कहा—॥१७९॥ हे स्वामी ! मैं कुछ भी नहीं जानता तुम नीति की माँखा से सब कुछ जानते हो। तुम्हारे ही उपाय से यह दुःसाध्य कार्य भी सिद्ध हो गया ॥१८०॥ बिना सूर्य के आकाश क्या है और बिना जल के सरोवर क्या है ? बिना मन्त्री के राज्य क्या है और बिना सत्य के वचन क्या है ? ॥१८१॥ इस प्रकार कहते हुए योगेश्वर का विदा करके यौगन्धरायण प्रातःकाल ही वत्सराज से मिलने गया ॥१८२॥ उसके पास जाकर वार्तालाप के प्रसंग में अवसर पाकर राजा से कलिंगसेना-सम्बन्धी कार्य के लिए सम्मति पूछता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण कहने लगा ॥१८३॥ वह कलिंगसेना स्वैरिणी (स्वतन्त्र स्त्री) है। यह आपके हाथों से स्पर्श करने योग्य नहीं है। अपनी इच्छा से यह प्रसेनजित् राजा को देखने आई थी किन्तु उसे वृद्ध देखकर रूप के लोभ से तुम्हारे पास आ गयी। यह दूसरे पुरुष का संग भी अपनी इच्छा से करती है॥१८४-१८५॥ यौगन्धरायण से ऐसा सुनकर, 'एक अच्छे कुल की कन्या ऐसा कैसे कर सकती है और मेरे रनिवास में पर-पुरुष को घुसने की शक्ति कैसे हुई ? ॥१८६॥ राजा के इस प्रकार प्रश्न करने पर बुद्धिमान् यौगन्धरायण कहने लगा—'महाराज ! आज ही रात में आपको सब प्रत्यक्ष दिखा दूँगा' ॥१८७॥ जिस विद्याधर आदि देवता उसे चाहते हैं, तो मनुष्यों की क्या ही कथा है। और, राजन् ! दिव्य व्यक्तियों की गति को कौन रोक सकता है ? ॥१८८॥ अतः आइए और प्रत्यक्ष देखिए। ऐसा कहते हुए मन्त्री के साथ राजा ने रात्रि के समय कलिंगसेना के रनिवास में जाने की इच्छा प्रकट की॥१८९॥ 'पद्मावती के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्री का विवाह राजा से नहीं होगा यह जो मैंने तुमसे प्रतिज्ञा की थी उसे आज मैंने पूर्ण कर दिया' ॥१९०॥ यौगन्धरायण ने रानी वासवदत्ता के पास जाकर ऐसा कहा और कलिंगसेना का सारा वृत्तान्त उसे विस्तारपूर्वक सुना दिया ॥१९१॥ प्रणाम करती हुई वासवदत्ता ने भी 'तुम्हारी शिक्षा के अनुसार कार्य करने का यह परिणाम है'—ऐसा कहकर मन्त्री का अभिनन्दन किया ॥१९२॥
ततो निशीथे संसुप्ते जने वत्सेश्वरो ययौ। गृहं कलिङ्गसेनायाः स च यौगन्धरायणः ॥१९३॥ अदृष्टश्च प्रविष्टोऽत्र तस्या निद्राजुषोऽन्तिके। सुप्तं मदनवेगं तं स्वरूपस्थं ददर्श सः ॥१९४॥ हन्तुमिच्छति यावच्च स स साहसिको नृपः। तावत्स विद्यया विद्याधरोऽभूत्प्रतिबोधितः ॥१९५॥ प्रबुद्धश्च स निर्गत्य झगित्युदपतन्नभः। क्षणात्कलिङ्गसेनाऽपि सा प्रबुद्धाभवत्ततः ॥१९६॥ शून्यं शयनमालोक्य जगाद च कथं हि माम्। पूर्वं प्रबुध्य वत्सेशः सुप्तां मुक्त्वाव गच्छति ॥१९७॥ तदाकर्ण्य स वत्सेशमाह यौगन्धरायणः। एषा विश्वसितानेन शृणु त्वद्रूपधारिणा ॥१९८॥ सैष योगबलाज्ज्ञात्वा साक्षात्ते दर्शितो मया। किं तु दिव्यप्रभावत्वादसौ हन्तुं न शक्यते ॥१९९॥ इत्युक्त्वा स च राजा च सह तामुपजग्मतुः। कलिङ्गसेना साप्यात्तौ दृष्ट्वा तस्थौ कृतादरा ॥२००॥ अद्युनेव क्व गत्वा त्वं राजन् प्राप्तः समन्त्रिकः। इति ब्रुवाणामवदत्तां स यौगन्धरायणः ॥२०१॥ कलिङ्गसेने ! केनापि मायावत्सेशरूपिणी। संमोह्य परिणीतासि न त्वं मत्स्वामिनाधुना ॥२०२॥ तच्छ्रुत्वा सातिसम्भ्रान्ता विद्धेव हृदि पत्रिणा। कलिङ्गसेना नरपं जगादोदश्रुलोचना ॥२०३॥ गान्धर्वविधिनाहं ते परिणीतापि विस्मृता। किं स्विद्राजन् यथापूर्वं दुष्पन्तस्य शकुन्तला ॥२०४॥ इत्युक्तः स तया राजा तामुवाचामलाननः। सत्यं न परिणीतासि मयाद्यैवागतो ह्यहम् ॥२०५॥ इत्युक्तवन्तं नरपं मन्त्री यौगन्धरायणः। एहीत्युक्त्वा ततः स्वैरमनैषीद्राजमन्दिरम् ॥२०६॥
षष्ठ लम्बक ४७३
षष्ठ लम्बक ४७३ तदनन्तर रात में सभी मनुष्यों के सो जाने पर वत्सराज और यौगन्धरायण कलिङ्गसेना के निवास-भवन में गये। और असंकित रूप से सोए हुए मदनवेग के वास्तविक स्वरूप को उन्होंने देखा ॥१९३ १९४॥ जबतक राजा उस साहसी मदनवेग को मारने के लिए तलवार खींचता है, तबतक वह जगकर अपनी विद्या के प्रभाव से विद्याधर बन गया ॥१९५॥ और शीघ्र ही उठकर एवं भवन से बाहर निकलकर आकाश में उड़ गया। इतने में ही कलिङ्गसेना भी सहसा उठ गई ॥१९६॥ वह अपने पर्यङ्क को सूना देखकर बोली—'मुझे बिना जगाये ही स्वयं पहले जाकर आज वत्सराज क्यों चले गये ? ॥१९७॥ यह सुनकर यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा—'सुनो ! इस विद्याधर ने तुम्हारा रूप धारण करके इसे भ्रष्ट कर दिया है। यह मैंने योगबल से जानकर तुम्हें प्रत्यक्ष दिखा दिया किन्तु वह दिव्यशक्तिशाली है। तुम उसे मार नहीं सकते। ऐसा कहकर राजा और मन्त्री दोनों प्रत्यक्ष होकर कलिङ्गसेना के पास पहुँचे। कलिङ्गसेना भी उन्हें देखकर उनका समुचित सत्कार करती हुई उठकर खड़ी हुई ॥१९८-२ ॥ और कहने लगी 'राजन् ! अभी ही जाकर फिर आप मन्त्री के साथ कैसे पधारे !' ऐसा कहती हुई कलिङ्गसेना से मन्त्री यौगन्धरायण बोला—॥२ १॥ हे कलिङ्गसेना ! तुझे किसी शठ व्यक्ति ने वत्सराज का रूप धारण करके भ्रम में डालकर विवाहित कर लिया। तेरे इस स्वामी से तू विवाहित नहीं हुई है ॥२ २॥ यह सुनते ही मानों तीर से विदीर्ण हृदय अतएव अत्यन्त व्याकुल कलिङ्गसेना आँसू बहाती हुई वत्सराज से कहने लगी—॥२ ३॥ गान्धर्व विधि से विवाहितकर कल पर आपने मुझे वैसे ही भुला दिया जैसे दुष्यन्त ने शकुन्तला को भुला दिया था। यह क्या है ? ॥२ ४॥ कलिङ्गसेना के इस प्रकार कहने पर राजा ने नीचे मुँह किये हुए कहा—'सत्य है, मैंने तुझे विवाहित नहीं किया। मैं तो आज ही यहाँ आया हूँ' ॥२ ५॥ ऐसा कहते हुए राजा को मन्त्री यौगन्धरायण 'आइए' तथा कहकर राजभवन में ले गया ॥२ ६॥
७०४ कथासरित्सागर
७०४ कथासरित्सागर ततः समन्त्रिके राज्ञि गते सात्र विवेशगा । मृगीव यूथविभ्रष्टा परित्यक्तस्वबान्धवा ॥२०७॥ सम्भोगविस्त्रस्तपत्रमुक्ता वा गजपीडिता । पद्मिनीव परिक्षिप्तकवरीभ्रमरावलिः ॥२०८॥ विनष्टकन्यकाभावा निरुपायक्रमा सती । कलिङ्गसेना गगनं वीक्षमाणेदमब्रवीत् ॥२०९॥ वत्सेशरूपिणा येन परिणीतास्मि केनचित् । प्रकाशं सोऽस्तु कौमारः स एव हि पतिर्मम ॥२१०॥ एवं तयोक्ते गगनात्सोऽत्र विद्याधराधिपः । अवतारदिव्यरूपो हारकेयूरराजितः ॥२११॥ को भवानिति पृष्टश्च तयैवं स जगाद ताम् । अह मदनवेगाख्यस्तन्वि विद्याधराधिपः ॥२१२॥ मया च प्राग्विलोक्य त्वां पुरा पितृगृहे स्थिताम् । त्वत्प्राप्तिदस्तपं कृत्वा वरः प्राप्तो महेश्वरात् ॥२१३॥ वत्सेश्वरानुरक्ता च तद्रूपेण मया द्रुतम् । प्रवृत्तद्विवाहैव परिणीतासि युक्तितः ॥२१४॥ इति वाक्सुधया तस्य श्रुतिमार्गप्रविष्टया । किञ्चित्कलिङ्गसेनाभूदुच्छ्वासितहृदम्बुजा ॥२१५॥ अथ स मदनवेगस्तां समाश्वास्य कान्तां विहितधृतिवितीर्णस्वर्णराशिं च तस्मै । उषित इति तथान्तर्वेश्मसद्मसु भक्तितः पुनरुपगमनाय द्यां तदैवोत्पपात ॥२१६॥ दिव्याम्प्य स्वपतिमथ न मरणगम्यं धामात्पितृभवनमुज्झितमित्यवेक्ष्य । तत्रैव वस्तुमथ सापि कलिङ्गसेना चक्रे मतिं मदनवेगकृताभ्यनुज्ञा ॥२१७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुकालम्बके सप्तमस्तरङ्गः ।
षष्ठ लम्बक ४७५
षष्ठ लम्बक ४७५ इस प्रकार मन्त्री के राजा के साथ चले जाने पर अपने बन्धु-बान्धवों से छूटी हुई और वियोग में पड़ी हुई कलिङ्गसेना झुंड से बिछुड़ी हुई हरिणी के समान हाथी के पैरों से रौंदी हुई कमलिनी के समान मलिन मुखवाली भ्रमरों से घिरी हुई कमलिनी के समान बिखरे हुए केशोंवाली और कौमार के नष्ट होने से मलिन एवं निष्प्रभा कलिङ्गसेना आकाश की ओर देखती हुई यह कहने लगी—॥२०७-२१०॥ 'वत्सराज का रूप धारण करके जिसने मुझे विवाहित किया है वह मेरे कौमार का हरण करनेवाला प्रकट हो। वही मेरा पति है' ॥२११ ॥ उसके ऐसा कहते ही वह विद्याधरों का राजा मदनवेग हार और केयूर पहने हुए दिव्य रूप से उतरकर आया ॥२११॥ 'तुम कौन हो ?' कलिङ्गसेना के इस प्रकार पूछने पर मदनवेग ने उससे कहा— 'हे सुन्दरि ! मैं मदनवेग नाम का विद्याधरों का राजा हूँ। मैंने तुझे पहले ही तेरे पिता के घर में देखा था और तुम्हें प्राप्त करने के लिए तपस्या करके शिवजी से वर पाया है ॥२१२-२१३॥ तू वत्सराज पर आसक्त थी इसलिए मैंने शीघ्र ही उससे विवाह होने के पूर्व उपाय करके तुझे विवाहित कर लिया है ॥२१४॥ मदनवेग की ऐसी वाणी-रूपी अमृतधारा ने कानों के मार्ग से कलिङ्गसेना के हृदय में प्रवेश कर उसके हृदय-कमल को प्रफुल्लित और विकसित कर दिया ॥२१५॥ तदनन्तर वह मदनवेग उस अपनी प्यारी पत्नी को धीरज बँधाकर और उसे स्वर्ण की प्रचुर राशि प्रदान कर, 'यह भी अच्छा ही हुआ ऐसा सोचती हुई और हृदय में पति भक्ति को प्रतिष्ठित करती हुई कलिङ्गसेना से पूछकर वह आकाश में उड़ गया ॥२१६॥ [L21: अपने पति का स्थान दैवी है मनुष्य द्वारा जानने योग्य नहीं है अपने पिता का घर कल का छोड़ दिया'—ऐसा सोचकर कलिङ्गसेना ने मन्दनवेग की अनुमति प्राप्त कर उसी के पास रहने का विचार स्थिर किया ॥२१७॥ सप्तम तरङ्ग समाप्त ।
४७६ कथासरित्सागर
४७६ कथासरित्सागर
अष्टमस्तरङ्गः
वत्सराजस्य कथा (पूर्वानुवृत्ता)
ततः कलिङ्गसेनायाः स्मरन्ननुपमं वपुः। एकदा मन्मथाविष्टो निशि वत्सेश्वरोऽभवत् ॥१॥ उत्थाय सङ्गहृस्तः सन् गत्वैव प्रविवेश सः। एकाकी मन्दिरं तस्याः कृताखिम्ब्यादरस्तया ॥२॥ तत्र प्रार्थयमानस्तां भार्यार्थे स महीपतिः। परपत्न्यहमस्मीति प्रत्याख्यातस्तयाब्रवीत् ॥३॥ तृतीयं पुरुषं प्राप्ता यतस्त्वमसि बन्धकी। परवारगतो दोषो न मे त्वद्गमने ततः ॥४॥ एव कलिङ्गसेना सा राज्ञोक्ता प्रत्युवाच तम्। स्वधर्ममागता राजन्नहं विद्याधरेण हि ॥५॥ व्यूढा मदनवेगेन स्वैरं त्वद्रूपधारिणा। स एवैकश्च भर्ता मे तत्कस्मादस्मि बन्धकी ॥६॥ किं वातिलङ्घन्तबन्धूनां स्वेच्छाजातधृतात्मनाम्। इमास्ता विपदः स्त्रीणां कुमारीणां कथैव का ॥७॥ दृष्टाशकुनया सख्या निषिद्धापि व्यसर्जंयम्। त्वत्पार्श्वे यदहं दूतं तस्य खेदः फलं मम ॥८॥ तत्स्पृशसि बलान्मां चेत् प्राणांस्त्यक्ष्याम्यहं ततः। का नाम कुलजा हि स्त्री भर्तृद्रोहं करिष्यति ॥९॥
पतिव्रताया वेश्यपरम्पा कथा
तथा च कथयाम्यत्र तव राजन्कथां शृणु। पुराभूदिन्द्रदत्ताख्यश्चेतिविद्देशमहीपतिः ॥१०॥ स पापशोधने तीर्थे कीर्त्यै देवकुलं महत्। चक्रे यशशरीरार्थी शरीरं वीक्ष्य भङ्गुरम् ॥११॥ तच्च मन्दिरमाच्छश्वद् वीक्षितुं स ययौ नृपः। सर्वेश्च तीर्थस्नानाय सङ्ग तत्राभवज्जनः ॥१२॥ एकदा च ददर्शात तीर्थस्नानार्थमागताम्। स राजात्र वणिग्भार्या प्रभासस्थितभर्तृकाम् ॥१३॥
षष्ठ लम्बक ७४७
षष्ठ लम्बक ७४७ अष्टम तरंग वत्सराज की कथा (अनुक्रमशः) एक बार रात के समय वत्सराज उदयन कलिङ्गसेना के अनुपम सौन्दर्य का स्मरण करके कामावेश से क्षुब्ध (उत्तेजित) हो गया ॥१॥ और नग्नकर हाथ में नंगी तलवार लिये अकेले ही उसके भवन में गया। कलिङ्गसेना ने आदर-सत्कार के साथ उसका स्वागत किया ॥२॥ तब राजा ने उससे पत्नी बनने की प्रार्थना की। उत्तर में कलिङ्गसेना ने कहा—'अब मैं दूसरे की पत्नी हो गई हूँ'—ऐसा कहकर उसे रोक दिया ॥३॥ 'तू तीसरे पुरुष के पात्र बनी गई इसलिए व्यभिचारिणी हो गई। अतः तेरा समागम करने में कोई दोष नहीं' वत्सराज ने कहा ॥४॥ राजा के इस प्रकार कहने पर कलिङ्गसेना ने कहा—'हे राजन् ! मैं तुम्हारे लिए यहाँ आ गई किन्तु तुम्हारा रूप धारण करनेवाले मदनवेग नामक विद्याधर ने गुप्त रूप से मेरे साथ विवाह कर लिया। वही मेरा एक पति है अब मैं व्यभिचारिणी कैसे हुई ॥५, ६॥ अपने सम्बन्धियों का परित्याग कर स्वेच्छाचार से आत्मदान करनेवाली स्त्रियों के लिए यदि ये विरतियां हैं तो कुमारी कन्याओं की तो बात ही क्या ? ॥७॥ आयुध को जाननेवाली मद्वेणी द्वारा रोके जाने पर भी मैंने तुम्हारे पास जो दूत भेजा उसी का यह परिणाम है ॥८॥ लेकिन यदि बलात्पूर्वक ऐसा स्पर्श करोगे तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। कौन कुलीन स्त्री पति के साथ द्रोह (विश्वासघात) करेगी ॥९॥ पतिव्रता बन्धुमती की कथा इस विषय पर मुझसे एक कथा कहती हूँ सुनो— पहले समय में चेदि देश का राजा दृढवर्मा था ॥१०॥ उस राजा ने शरीर को क्षणभंगुर समझकर एवं उसी शरीर की रक्षा के लिए पारलौकिक आनन्द में से ही कुछ सदा एक देवमन्दिर बनवाया ॥११॥ एक बार वह राजा मन्दिर की सीढ़ियों से युक्त मन्दिर को देखने के लिए वहाँ गया। वहाँ पर तीर्थाटन के लिए पूज्य सभी अन्य आये हुए थे ॥१२॥ तब उस राजा ने नीचे जल के लिए आयी हुई एक वीणाभट को देखा, जिसका सौन्दर्य रूपमद के निमित्त कुसुम (कन्या) से था । १३ । ८
४७८ कथासरित्सागर
४७८ कथासरित्सागर
स्वच्छकान्तिसुधासिक्तां चित्ररूपविभूषणां । जङ्गमामिव कन्दर्पराजधानीं मनोरमाम् ॥१४॥ त्वयाहं विजये विश्वमिति प्रीत्येव पादयो। आश्लिष्टां पञ्चबाणस्य तूणीद्वयशोभया ॥१५॥ सा दृष्ट्वैव मनस्तस्य जहार नृपतेस्तथा। यथान्विष्य गृहं तस्या स ययौ विवशो निशि ॥१६॥ तां च प्रार्थयमान सन् जगदे स तया नृपः। रक्षिता त्वं न युक्तं ते परदाराभिमर्षणम् ॥१७॥ हठात्स्पृशसि वा मां चेदधर्मस्ते महान्भवेत्। मरिष्यामि च सद्योऽहं न सहिष्ये च दूषणम् ॥१८॥ इत्युक्तोऽपि तथा तस्मिन् बलं राज्ञि चिकीर्षति। शीलभ्रंशभयात्तस्याः सद्यो हृदयमस्फुटत् ॥१९॥ तद्दृष्ट्वा सपदि भीतः स गत्वैव यथागतम्। दिनैस्तेनानुतापेन राजा पञ्चत्वमाययौ ॥२०॥ इत्याख्याय कथामेतां समयभ्रष्टयानता। भूयः कलिङ्गसेना सा वत्सेश्वरमभाषत ॥२१॥ तस्मादधर्मे मत्प्राणहरणे मा मतिं कृथा। इहास्थिताया वस्तुं मे देहि याम्यन्यतोऽन्यथा ॥२२॥ एतत्कलिङ्गसेनायाः श्रुत्वा वत्सेश्वरोऽथ सः। विचार्य विरतो भूत्वा धर्मत्रासामवापत ॥२३॥ राजपुत्रि ! वस स्वेच्छं भर्त्रा सममिहामुना। नाहं वक्ष्यामि ते किञ्चिदिदानीं मा भयं कृथाः॥२४॥ इत्युक्त्वैव गते तस्मिन् स्वैरं राज्ञि स्वमन्दिरम्। श्रुत्वा मदनवेगस्तन्नभसोऽवततार सः ॥२५॥ प्रिये साधु कृतं नैवमकरिष्यः शुभे यदि। नाभविष्यद्धर्मं यस्मान्नासहिष्यत तन्मया ॥२६॥ इत्युक्त्वा सान्त्वयित्वा तां निशां नीत्वा तया सह। तत्रैव गच्छन्नागच्छन्नासीद् विद्याधरोऽथ सः ॥२७॥ कलिङ्गसेनापि च सा पत्यौ विद्याधरेश्वरे। तत्रास्त मर्त्यभावेऽपि दिव्यभोगसुखान्विता ॥२८॥
षष्ठ लम्बक ७७९
षष्ठ लम्बक ७७९ स्वच्छ लावण्यमय सुधा से सींची हुई आश्चर्यमय रूपराशि आभूषणों से अलंकृत और मन को आकृष्ट करनेवाली कामदेव की राजधानी के समान वह स्त्री थी। और, वह स्त्री 'तेरे द्वारा मैं विश्व-विजय करूँगा'—मानों इस प्रकार कामदेव के तरकश-रूपी दोनों पैरों (पिंडलियों) से युक्त थी ॥१४-१५॥ देखते ही उस स्त्री ने राजा के मन को ऐसा हर लिया कि विवश होकर वह राजा उसके घर का पता लगाकर रात में वहाँ गया ॥१६॥ प्रार्थना करते हुए राजा से उसने कहा—'तुम तो प्रजा के रक्षक हो। तुम्हें परस्त्री का धर्म नहीं बिगाड़ना चाहिए' ॥१७॥ यदि बलपूर्वक मुझे छुओगे तो तुम्हे पाप लगेगा। मैं भी तुरन्त मर जाऊँगी। इस कलंक को कदापि सहन न करूँगी ॥१८॥ ऐसा कहने पर भी राजा के बलात्कार करने की चेष्टा करने पर शील नाश होने के भय से उस वैश्य-वधू का हृदय तुरन्त फट गया। यह देखकर लज्जित राजा लौट गया और उसी पश्चाताप में वह भी मर गया ॥१९-२०॥ इस प्रकार इस कथा को कहकर भय और नम्रता से भरी हुई कलिङ्गसेना ने वत्गराज से कहा—'इसलिए मेरे प्राण हरण करनेवाले अधर्म में मन को न लगाओ। मैं तुम्हारी आश्रित हूँ। तुम मुझे यहाँ रहने दो अथवा मैं यहाँ से चली जाऊँ' ॥२१-२२॥ कलिङ्गसेना की ऐसी बातें सुनकर धर्मात्मा वत्गराज पापकर्म से विरत होकर उससे कहने लगा—'हे राजकुमारी तुम अपने पति के साथ अपनी इच्छा से यहाँ रहो। मैं तुम्हें कुछ न कहूँगा। अब भय न करो' ॥२३-२४॥ ऐसा कहकर राजा के अपने भवन में चले जाने पर, यह सब समाचार सुनकर मदनवेग आकाश से उतरा ॥२५॥ आकर अपनी पत्नी कलिङ्गसेना से बोला—'तूने बहुत अच्छा किया। यदि इससे अन्यथा करती तो मैं कदापि सहन न करता' ॥२६॥ ऐसा कहकर कलिङ्गसेना को धीरज बँधाकर और उसके साथ रात बिताकर मदनवेग उसी भवन में आना-जाना करने लगा ॥२७॥ वह कलिङ्गसेना भी अपने पति विद्याधरराज के साथ कनकप्रभनगर के भी दिव्य भोगों का उपभोग करती हुई वहाँ रहने लगी ॥२८॥
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर
वत्सराजोऽपि सञ्चिन्तां मुक्त्वा मन्त्रिवचः स्मरन्। ननन्द लब्धं मन्वानो देवीं राज्यं सुतं तथा ॥२९॥ देवी वासवदत्ता च मन्त्री यौगन्धरायणः। अभूतां निर्वृतौ सिद्धे नीतिकल्पलताफले ॥३०॥
मदनमञ्चुका जन्म कथा
अथ गच्छत्सु दिवसेष्वापाण्डुमुखपङ्कजा। दध्रे कलिङ्गसेना सा गर्भमुत्पन्नदोहदा ॥३१॥ तुङ्गौ विरेजतुस्तस्या स्तनौवाश्यामचूचुकौ। निधानकुम्भौ कामस्य मदमुद्राङ्किताविव ॥३२॥ ततो मदनवेगस्तामुपेत्य परिसम्यधात्। कलिङ्गसेने दिव्यानामस्माकं समयोऽस्त्ययम् ॥३३॥ जातं मानुषगर्भं यन्मुक्त्वा यामो विदूरतः। कण्वाश्रमे न तत्याज मेनका किं शकुन्तलाम् ॥३४॥ त्वं यद्यप्यप्सराः पूर्वं तदप्यविनयान्निजात्। क्षत्रशापेन सम्प्राप्ता मानुष्यं देवि साम्प्रतम् ॥३५॥ तेनैव बन्धकीशब्दो जातो साध्व्या अपीह ते। तस्मादपत्यं रक्षेस्त्वं स्थानं यास्याम्यहं निजम् ॥३६॥ स्मरिष्यसि यदा मां च सन्निधास्ये सदा तव। एवं कलिङ्गसेनां तामुक्त्वा साश्रुविलोचनाम् ॥३७॥ समाश्वास्य च दत्त्वा च तस्यै सद्रत्नसञ्चयम्। तच्चित्तः समयाकृष्टो ययौ विद्याधरेश्वरः ॥३८॥ कलिङ्गसेनाप्यत्रासीदपत्यार्था शचीमिव। आलम्ब्य वत्सराजस्य भुजच्छायामुपाश्रिता ॥३९॥ अत्रान्तरे कृतवतीं साङ्गमप्राप्तये तपः। आदिदेश रतिं मार्त्तामनङ्गस्याम्बिकापतिः ॥४०॥ वत्सराजगृहे जातो दग्धपूर्वः स ते पतिः। नरवाहनदत्ताख्यो योनिजो मद्विसर्जनात् ॥४१॥ मदाराधनतस्त्वं तु मर्त्यलोकेऽप्ययोनिजा। जनिष्यसे ततस्तेन भर्त्रा साङ्गेन मोक्ष्यसे ॥४२॥ एवमुक्त्वा रतिं शम्भुः प्रजापतिमथाविशत्। कलिङ्गसेना तनयां सोष्यते दिव्यसम्भवम् ॥४३॥
षष्ठ लम्बक ७८१
षष्ठ लम्बक ७८१ वत्सराज भी कलिङ्गसेना की चिन्ता छोड़कर मन्त्री यौगन्धरायण की बात सोचता हुआ यशरूपी राज्य और पुत्र को मानों पुनः प्राप्त कर प्रसन्न रहने लगा ॥२९॥ नीति-रूपी कल्पलता के फलने-पकने पर रानी वासवदत्ता और मन्त्री यौगन्धरायण भी निश्चिन्त हो गये ॥३०॥ मदनमञ्चुका के जन्म की कथा कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कुछ पीले और पतले मुँहवाली तथा विविध प्रकार की इच्छाएँ रखनेवाली कलिङ्गसेना ने गर्भ धारण किया ॥३१॥ कालिमा लिये हुए उसके उत्तुंग स्तनों के अग्रभाग कामदेव की मद-मुद्रा से अंकित उसके कोष (खजाने) के घड़ों के समान सुशोभित हो रहे थे ॥३२॥ तब उसके पति मदनवेग ने एक बार उससे कहा—'हे कलिङ्गसेना दिव्य व्यक्तियों का यह नियम है कि मनुष्य-योनि में उत्पन्न अपने गर्भ को छोड़कर दूर चले जाते हैं। क्या मेनका ने कण्व के आश्रम में शकुन्तला को नहीं छोड़ दिया था ? ॥३३-३४॥ यद्यपि तू भी पूर्वजन्म की अप्सरा है किन्तु अपने ही अविनय (उद्दण्डता) के कारण इन्द्र के शाप से मानव-योनि को प्राप्त हुई है ॥३५॥ इसी कारण पतिव्रता होने पर भी तूने बन्धकी (व्यभिचारिणी) यह विशेषण प्राप्त किया। इसलिए तू अपनी सन्तान की रक्षा करना और मैं अपने स्थान को चला जाऊँगा ॥३६॥ जब तू मुझे स्मरण करेगी तभी तेरे समीप आ जाऊँगा। विद्याधर ने आँसू बहाती हुई कलिङ्गसेना से इस प्रकार कहा ॥३७॥ और, उसे धीरज बँधाकर तथा अच्छे-अच्छे रत्न उसे देकर, उसी में मन लगाया हुआ और समय हो जाने के कारण खिंचा हुआ विद्याधर-राज चला गया ॥३८॥ कलिङ्गसेना भी सखी के समान सन्तान की आशा को लिये हुए वत्सराज की छत्रछाया के सहारे वहीं रहने लगी ॥३९॥ इसी बीच कामदेव की पत्नी रति ने सम्पूर्ण शरीरयुक्त पति (कामदेव) की प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की और शिवजी ने उसे आज्ञा दी कि 'मेरे द्वारा पहले भस्म किया गया वह तेरा पति (कामदेव) वत्सराज के घर में उत्पन्न हुआ है। उसका नाम नरवाहनदत्त है। मेरे साथ उद्दण्डता करने के कारण वह देवता होकर भी योनिज है। उसी शापप्रथा के फलस्वरूप तू भी मर्त्यलोक में अयोनिज होकर सम्पूर्ण शरीरवाले पति से मिलेगी ॥४०-४२॥ रति से ऐसा कहकर शिवजी ने प्रजापति से कहा—'कलिङ्गसेना दिव्य वीर्य से उत्पन्न पुत्र का प्रसव करेगी ॥४३॥
७८२ कथासरित्सागर
७८२ कथासरित्सागर
तं हृत्वा मायया तस्यास्तत्स्थाने त्वमिमां रतिम्। निर्माय मानुषीं कन्यां त्यक्तदिव्यतनुं क्षिपेः॥४४॥ इतीश्वराज्ञामादाय मूर्ध्नि वेधस्यथो गते। कलिङ्गसेना प्रसवं प्राप्ते काले चकार सा॥४५॥ जातमात्रं सुतं तस्या हृत्वाऽथात्र स्वमायया। रतिं तां कन्यकां कृत्वा न्यधाद् विधिरलक्षितम्॥४६॥ सर्वैश्च तत्र तामेव कन्यां जातामलक्षत। दिवाप्यकाण्डप्रतिपच्चन्द्रलेखामिवोदिताम् ॥४७॥ कान्तिद्योतिततद्वासगृहां निर्जित्य कुर्वतीम्। रत्नदीपशिखाश्रेणिर्लज्जिता इव निष्प्रभाः॥४८॥ कलिङ्गसेना तां दृष्ट्वा जातामसदृशीं सुताम्। पुत्रजन्माधिकं सोत्पादुत्सवं विततान सा॥४९॥ अथ वत्सेश्वरो राजा सदेवीकः समन्त्रिकः। कन्यां कलिङ्गसेनाया जातां शुश्राव तादृशीम्॥५०॥ श्रुत्वा च स नृपोऽकस्माद्वाचेश्वरचोदितः। देवीं वासवदत्तां तां स्थिते यौगन्धरायणे॥५१॥ जाने कलिङ्गसेनेषा दिव्या स्त्री शापतश्च्युता। अस्यां जाता च कन्येयं दिव्याश्चर्यरूपधृक्॥५२॥ तदसौ कन्यका तुल्या रूपेण तनयस्य मे। नरवाहनदत्तस्य महादेवीत्वमर्हति॥५३॥ तच्छ्रुत्वा जगदे राजा देव्या वासवदत्तया। महाराज किमेवं त्वमकस्मादद्य भाषसे॥५४॥ कुलद्वयविशुद्धोऽयं क्व पुत्रस्ते वत क्व सा। कलिङ्गसेनातनया बन्धकीगर्भसम्भवा॥५५॥ श्रुत्वैद् विमृशन् राजा सोऽब्रवीद्भद्राहं स्वतः। वदाम्यतत्प्रविश्यान्तः कोऽपि जल्पयतीव माम्॥५६॥ नरवाहनदत्तस्य कन्ययं पूर्वनिर्मिता। भार्येत्येवं वदन्तीं च शृणोमीव गिरं दिवः॥५७॥ कलिङ्गसेना हि वासावेवपरमा शुक्लोदयता। पूर्वकर्मवशादेवस्या बन्धकीगर्भसम्भवः॥५८॥
षष्ठ लम्बक ४८१
षष्ठ लम्बक ४८१ तुम उसका अपहरण करके उसके स्थान पर इस रति को मनुष्य बनाकर रख देना' ॥४४॥ इस प्रकार ईश्वर (शिव) की आज्ञा को शिर स स्वीकार करके ब्रह्मा के चले जाने के पश्चात् समय आने पर कलिगसेना ने प्रसव किया ॥४५॥ इतने में ही प्रजापति ने अपनी माया के प्रभाव से उसके पुत्र का अपहरण करके रति को मानुषी कन्या बनाकर अलक्षित रूप से उसके समीप रख दिया ॥४६॥ दिन में भी अकालज प्रतिपदा की चन्द्रलेखा के समान उदित उस कन्या की उत्पत्ति का वहाँ रहनेवाले सभी लोगों ने सत्य समझा ॥४७॥ वह कन्या अपने शरीर की कान्ति से रत्नों की प्रभा को निस्तेज करती हुई प्रसूति-गृह को आलोकित कर रही थी ॥४८॥ कलिगसेना ने अनन्यसदृशी (अद्भुत) कन्या को देखकर पुत्रजन्म से भी अधिक हर्ष और प्रसन्नता के साथ व्यापक उत्सव मनाया ॥४९॥ तदनन्तर वत्सराज उदयन ने अपनी रानियों और मन्त्रियों के साथ कलिङ्गसेना द्वारा उत्पन्न हुई अनुपम कन्या का वृत्तान्त सुना ॥५०॥ सुनते ही भगवत्प्रेरित राजा ने शची और यौगन्धरायण के सामने ही इस प्रकार कहा—'मैं समझता हूँ कि यह कलिङ्गसेना शाप से पतित कोई स्वर्गीय स्त्री है। इससे उत्पन्न हुई यह कन्या भी दिव्य ही है, क्योंकि इसका रूप आश्चर्यमय है ॥५१-५२॥ इसलिए यह कन्या रूप में मेरे कामदेव के समान है। यह नरवाहनदत्त की महारानी होने के लायक है ॥५३॥ राजा के ऐसा कहने पर वासवदत्ता ने राजा से कहा-'महाराज, आज तुम यह क्या कह रहे हो? कहाँ मातृकुल और पितृकुल दोनों से शुद्ध यह तुम्हारा कुल और कहाँ व्यभिचारिणी से उत्पन्न कलिङ्गसेना की कन्या ?' ॥५४-५५॥ यह सुनकर सोचते हुए राजा ने कहा-'यह मैं स्वयं नहीं कह रहा हूँ, कोई मेरे अन्तर में बैठा हुआ कोई मुझसे कहला रहा है ॥५६॥ और ऐसी आकाशवाणी भी सुन रहा हूँ कि यह कन्या नरवाहनदत्त की पूर्वजन्म की पत्नी है। साथ ही उसमदिरानुगा कलिङ्गसेना की यह पतिव्रता पत्नी है। पूर्व जन्मानुरूप कर्म के कारण उसके लिए सुरपत्नी शब्द का प्रयोग हुआ है ॥५७-५८॥
०८४ कथासरित्सागर
०८४ कथासरित्सागर इति राज्ञोदिते प्राह मन्त्री यौगन्धरायणः । श्रूयते देव यत्त्वत्रे रतिर्दग्धे स्मरे पुरा ॥५९॥ मर्त्यलोकावतीर्णेन सशरीरेण सङ्गमः । मर्त्यभावगतायास्ते स्वेन भर्त्रा भविष्यति ॥६०॥ इति शापाद् वरं शर्वो रत्यै स्वपतिमीप्सवे । कामावतारश्चोक्तः प्राग्विद्युन्माचा सुतस्तव ॥६१॥ रत्यावतरणीयं च मर्त्यभावे सुराङ्गना । गर्भग्राहिकया चाद्य ममैव वर्णितं रहः ॥६२॥ मया कलिङ्गसेनाया गर्भे प्राग्गर्भसम्पदा । युक्तो दृष्टस्तदैवाम्यन्तरूयं तद्विवर्जितम् ॥६३॥ तदाश्चर्यं विलोक्याहं तवाख्यातुमिहागता । इति स्त्रिया यथोक्तं मे जातैषा प्रतिभाति ते ॥६४॥ तज्जाने मायया देव्याः सैषा रतिरयोनिजा । कलिङ्गसेनातनया गर्भवीर्येण निर्मिता ॥६५॥ भार्या कामावतारस्य पुत्रस्य तव भूपते । तथा चात्र कथामेतां यदासम्बन्धिनीं शृणु ॥६६॥ भृत्यो वैश्रवणस्याभूद्विरूपाक्ष इति श्रुतः । यक्षो निधानरक्षाणां प्रधानाध्यक्षतां गतः ॥६७॥ मथुरायां बहिसंस्थं निधानं स च रक्षितुम् । यक्षं नियुक्तवानेकं शिलास्तम्भमिवापरम् ॥६८॥ तत्र छत्रग्रहीवासी कश्चित्पाशुपतो द्विजः । निधानान्वेषणोपायात् गन्त्यवादी कणाशनः ॥६९॥ स मानुषवसादीपहस्तो यावत्परभ्रमात् । स्थानं तावत्तस्यात्र कराद्दीपः पपात सः ॥७०॥ रुदाशेन च तेनात्र स्थितं निधिमवेत्य सः । उद्घाटयितुमारेभे महाम्यैः गणिभिर्द्विजैः ॥७१॥ अथ योऽसौ नियुक्तोऽभूद्यक्षो रक्षाविधौ स तत् । दृष्ट्वा गत्वा यथावस्तु विरूपाक्षं व्यजिज्ञपत् ॥७२॥ गच्छ व्यापाद्य क्षिप्रं धूर्तान्तान्मययाविदः । इत्यादिदेश तं यक्षं विरूपाक्षः स शासनः ॥७३॥
षष्ठ लम्बक ७८५
षष्ठ लम्बक ७८५ राजा के इस प्रकार कहने पर मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज सुना जाता है कि कामदेव के दग्ध हो जाने पर उसकी पत्नी रति ने तपस्या की कि मर्त्यलोक में अनङ्ग सशरीर कामदेव से मेरा समागम हो। तपस्या से प्रसन्न होकर अपने पति को चाहती हुई रति को वर दिया कि तू भी मनुष्य-योनि में जन्म लेकर अपने पति से मिलेगी ॥ ९६ ॥ पहले ही दिव्यवाणी ने तुम्हारे पुत्र को कामदेव का अवतार घोषित किया है। यह कन्या भी शिवजी की आज्ञा से रति के अवतार-रूप में उत्पन्न हुई है। यह बात प्रत्यक्ष करानेवाली धात्री ने एकान्त में मुझसे कही है ॥९१-९२॥ उसने बताया कि मैंने कलिङ्गसेना के गर्भ को पहले शय्या पर देखा था उसी समय उस अनिर्वचनीय रूप में देखा ॥९३॥ उस आश्चर्य को देखकर ही मैं तुम्हें कहने आई हूँ। इस प्रकार उस स्त्री ने मुझसे कहा और मेरी बुद्धि भी यही कहती है। अतः मैं समझता हूँ कि देवमाया ने अपनी माया के प्रभाव से उस रूपशालिनी रति को कन्या बनाकर यहाँ रख दिया और वास्तविक गर्भ को तिरोहित कर दिया है ॥९४-९५॥ यही कन्या कामदेव के अवतार तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की पत्नी है। इस सम्बन्ध में मैं एक यक्ष की कथा कहता हूँ सुनो ॥९६॥ विकतानन्द नामक एक यक्ष कुबेर का भृत्य था। वह अगणित खजानों का प्रधानाध्यक्ष बन गया ॥९७॥ उसने मथुरा नगरी के बाहरी भाग में स्थित एक खजाने की रक्षा के लिए यमदूत के सादृश्य के समान एक यक्ष को नियुक्त किया ॥९८॥ किसी समय उस नगरी का निवासी खजाने को जाननेवाला एवं दूसरा खजाना खोजने के लिए बार-बार भूमि की परीक्षा करने लगा। परीक्षा करते हुए उसके हाथ का कञ्चन की चाँदी से बनी हुई बत्ती एक स्थान पर गिर पड़ी ॥९९-१००॥ उस लक्षण से कपतान ने उसी स्थान पर खजाने का होना निश्चित करके अपने अन्य धनदत्त मित्रों के साथ खजाना खोदना आरम्भ किया ॥१०१॥ यह यक्ष रात में उस गुप्त निधि की रक्षा के लिए नियुक्त था उसने अविलम्ब विकतानन्द से यह समाचार कहा ॥१०२॥ मंत्री विकतानन्द के गुप्त बात के सम्बन्धी विचार करने पर जब तक यमदूत-सदृश दूतों को खजाना दिलाने के कहने ही वाला था ॥१०३॥
७८६ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
७८६ कथासरित्सागर ततः स यक्षो गत्वैव स्वयुक्त्या निजघान तान्। निधानवादिनो विप्रान्सम्प्राप्तमनार्यान् ॥७४॥ तद्बुद्ध्वा धनदः क्रुद्धो विरूपाक्षमुवाच तम्। ब्रह्महत्या कथं पाप कारिता सहसा त्वया ॥७५॥ दुर्गतो वार्त्तिकजनो लोभात्किं नाम नाचरेत्। निवार्यन्ते स विप्राय विघ्नेस्तैस्त्वेनं हन्यते ॥७६॥ इत्युक्त्वाथ शशापैनं विरूपाक्षं धनाधिपः। मर्त्ययोनौ प्रजायस्व दुष्कृताचरणादिति ॥७७॥ प्राप्तशापोऽथ कस्यापि भूतले ब्राह्मणस्य सः। विरूपाक्षः सुतो जातो ब्राह्मणस्याग्रहारिणः ॥७८॥ ततोऽस्य यक्षिणी पत्नी धनाध्यक्षं व्यजिज्ञपत्। देव यत्र स भर्त्ता मे क्षिप्तस्तत्रैव मां क्षिप ॥७९॥ प्रसीद नहि शक्नोमि वियुक्ता तेन जीवितुम्। एव तया स विज्ञप्तः साध्व्या वैश्रवणोऽभ्यधात् ॥८०॥ तस्य विप्रस्य सदने जातो भर्त्ता स तेऽनघे। तस्यैव दास्या गेहे त्वं निपतिष्यस्ययोनिजा ॥८१॥ तत्र तेन समं भर्त्रा सङ्गमस्ते भविष्यति। स्वप्रसादात्स शापं च तीर्त्वा मत्पार्श्वमेष्यसि ॥८२॥ इति वैश्रवणादेशात्सा साध्वी पतिता ततः। दास्यास्तस्या गृहद्वारि कन्या भूत्वैव मानुषी ॥८३॥ अकस्माच्च तया दास्या कन्या दृष्टाद्भुताकृतिः। गृहीत्वा दर्शिता चास्य स्वामिनोऽथ द्विजन्मनः ॥८४॥ न्वियेयं कन्यका क्वापि निःसन्देहमयोनिजा। त्याग्या मम चक्रीहानय तां श्यमदाद्द्रुतम् ॥८५॥ इयं हि मम पुत्रस्य मन्ये भार्यात्वमर्हति। इति सोऽपि द्विजो दासीं तामुवाच मनन्तरम् ॥८६॥ प्रमादत्र विवृद्धा सा कन्या विप्रात्मजश्च सः। अन्योन्यदर्शनापहृतात्मनो बभूवतुः ॥८७॥ ततः कृतविवाही तौ तेन पित्रेण दम्पती। प्रजातिस्मरणव्याप्तावुत्तीर्णविरहाविव ॥८८॥