भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक १२१

षष्ठ लम्बक १२१ हाँ आखेट का अधिक सेवन भी हानिकारक होता है। इसके अधिक सेवन या व्यसन से ही पांडु आदि पूर्व राजाओं का विनाश हुआ है॥१४८॥ इस प्रकार बुद्धिमान् मन्त्री अमरगुप्त द्वारा कहे गये राजा विक्रमसिंह ने उसे स्वीकार किया॥१४९॥ दूसरे दिन ही वह राजा पृथ्वी को घुड़सवार, पैदल सिपाही और शिकारी कुत्तों से दिशाओं को विभिन्न जालों और मचानों से एवं आकाश को प्रक्षप्रचित बहेलियों के शब्दों से भरता हुआ शिकार के लिए नगरी (उज्जयिनी) से बाहर निकला॥१५०-१५१॥ हाथी पर बैठकर जाते हुए उस राजा ने नगर के बाहर सूने शिवालय में एक साथ एकान्त में खड़े दो मनुष्यों को देखा॥१५२॥ वे दोनों आपस में कुछ मन्त्रणा करते हुए-से खड़े थे। उन पर दूर से ही सन्देह करता हुआ राजा आखेट-वन (शिकारगाह) में गया॥१५३॥ वहाँ जाकर राजा ने तलवार से काटे हुए बूढ़े बाघों तथा सिंहों के गर्जनों से पूरित जंगली स्थानों और पहाड़ों में सन्तोष प्रकट किया॥१५४॥ राजा ने हाथियों को मारनेवाले सिंहों के नखों से गिरे हुए पराक्रम के बीजों के समान मोतियों से सारी जंगली भूमि भर दी॥१५५॥ टेढ़े-टेढ़े उछलनेवाले मृग उससे दिशा माप रहे थे। किन्तु राजा बिना टेढ़ा हुए ही उन्हें शीघ्रता से बींधता हुआ अपनी शस्त्रविद्या पर हर्ष प्रकट करता था॥१५६॥ बहुत समय तक आखेट करके शान्त सेवकों के साथ डोरी सहारे डाले गये मगृण को लेकर वह राजा उज्जयिनी को लौटा॥१५७॥ लौटते हुए उसने उसी देवमन्दिर में इतने समय तक उसी प्रकार खड़े-खड़े बातें करते हुए उन दोनों मनुष्यों को फिर से देखा जिन्हें जाते समय देखा था॥१५८॥ ये दोनों कौन हैं और इतने समय तक क्या मन्त्रणा कर रहे हैं इतनी लम्बी और गुप्त मन्त्रणा करनेवाले ये अवश्य ही कोई गुप्तचर होंगे॥१५९॥ ऐसा सोचकर और द्वारपाल को भेजकर राजा ने दोनों को पकड़वाकर बँधवा दिया। तदनन्तर दूसरे दिन उन्हें दरबार में बुलाकर पूछा-'तुम कौन हो। और इतने लम्बे समय तक वहाँ क्या मन्त्रणा करते रहे? ॥१६०-१६१॥ उन दोनों के अभय प्रार्थना करने पर एक युवक इस प्रकार कहने लगा-'सुनो महा राज ! आपकी इसी नगरी म शरभदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था॥१६२-१६३॥

६२४ कथारित्सागर

६२४ कथारित्सागर छमे स कतमो भर्त्ता त्वमिदानीं पतिर्मम । येनात्मनिरपेक्षेण हृता मृत्युमुखादहम् ॥१८०॥ स चैष दृश्यते भृत्यैः सहागच्छन्पतिर्मम । अतः स्वैरं त्वमस्मान् पश्चादागच्छ साम्प्रतम् ॥१८१॥ रूक्ष्येऽन्तरे हि मिलिता यास्यामो यत्र कुत्रचित् । एवं तयोक्तस्तदहं तथेति प्रतिपन्नवान् ॥१८२॥ सुरूपाप्यर्पितात्मापि परस्त्रीयं किमेतया । इति धैर्यस्य मार्गोऽयं न चाष्टम्यस्य शङ्किनः ॥१८३॥ अनादृत्य च सा भर्त्रा बाष्पा सम्भाषिता सती । तेन साक समुत्थेन गन्तुं प्रावर्त्तत क्रमात् ॥१८४॥ अहं च गुप्तवत्तत्पाथेयं परवर्त्मना । पश्चादन्वक्षितस्तस्य दूरमध्वानमभ्यगाम् ॥१८५॥ सा च हस्तिमयभ्रष्टमङ्काञ्जनितां रुचम् । पथि मिथ्या वदन्ती तं पतिं सर्व्वप्यवर्जयत् ॥१८६॥ कस्य रक्तोन्मुखी गाढरुडान्ताविषकुत्सहा । तिष्ठेदनपकृत्य स्त्री भुजगीव विकारिता ॥१८७॥ क्रमाच्च लोहनगरं प्राप्ता स्मस्ते पुरं वयम् । वणिज्याजीविनो यत्र भर्तुस्तस्या गृहं स्त्रियाः ॥१८८॥ स्थिताः स्मस्तदहश्चात्र सर्वे वाह्ये सुरालये । तत्र सम्मिलितश्चैष द्वितीयो ब्राह्मणः सखा ॥१८९॥ नवेऽपि दर्शनेऽन्योन्यमाश्वासः समभूच्च नौ । चित्तं जानाति जन्तूनां प्रेम जन्मान्तरार्जितम् ॥१९०॥ ततो रहस्यमात्मीयं सर्व्वमस्मै मयोदितम् । तद्बुद्ध्वैव तदा स्वैरं मामेकशयमब्रवीत् ॥१९१॥ तूष्णीं भवास्त्युपायोऽत्र यत्कृते त्वमिहागतः । एतस्या भर्तुर्भगिनी विद्यतेऽत्र वणिक्स्त्रियाः ॥१९२॥ गृहीतार्था मया साकमितः सा गन्तुमुद्यता । तत्करिष्ये तदीयेन साहाय्येन तवेप्सितम् ॥१९३॥

षष्ठ लम्बक ६९५

षष्ठ लम्बक ६९५ इसलिए वह मेरा पति नहीं हो सकता है। अब तुम्हीं मेरे भर्त्ता हो जिसने अपने जीवन की चिन्ता न करके मुझे मृत्यु-मुख से निकाला॥१८०॥ वह मेरा पति नौकरों के साथ आ रहा है। अब तुम भी हमारे पीछे धीरे-धीरे आओ। अवसर मिलने पर जहाँ कहीं म, चले जायेंगे। उसके इस प्रस्ताव को मैंने स्वीकार कर लिया ॥१८१ १८२॥ 'यह सुन्दरी है और मुझे आत्म-समर्पण कर चुकी है। फिर भी उस परकीया स्त्री से क्या प्रयोजन ? —यह तो धैर्य का मार्ग है यौवन का नहीं॥१८३॥ कुछ ही देर में आकर पति द्वारा आश्वस्त की गई वह बाला उसके और उसके भृत्यों के साथ आगे-आगे चलने लगी॥१८४॥ उस स्त्री द्वारा गुप्त रूप से दिये गये मार्ग-भोजन को लिया हुआ मैं भी उसके पीछे छिप छिपकर दूर तक चला गया॥१८५॥ उस स्त्री ने हाथी के भय से भागने पर टूटे हुए शरीर की पीड़ा के बहाने मार्ग में उस पति को अपने शरीर पर हाथ भी नहीं रखने दिया॥१८६॥ सच है अनुरक्त और आकृष्ट, गाढ़ी अन्तर्वेदना के दुःख से कुम्हलाई और बिगड़ी हुई स्त्री सर्पिणी के समान किसका अपकार किये बिना रह सकती है?॥१८७॥ क्रमशः चलते हुए हम लोग शोभनपुर नामक पुर में पहुँचे जहाँ पर व्यापार से जीविका करनेवाले उस स्त्री के पति का घर था॥१८८॥ उस दिन हमलोग नगर के बाहर एक देव-मन्दिर में ठहर गये। वहीं पर मुझे यह दूसरा मित्र ब्राह्मण मिला॥१८९॥ हमलोगों की उस नवीन और प्रथम परिचय में ही परस्पर परम विश्वास और प्रेम उत्पन्न हो गया। सच है प्राणियों का चित्त पूर्वजन्म के संचित प्रेम को भलीभाँति समझ लेता है॥१९०॥ तब मैंने अपना सारा रहस्य इसे बता दिया। यह सब सुन लेने के पश्चात् इसने मुझे धीरे से कहा—'चुप रहो। जिस लिए तुम यहाँ आये हो उसका उपाय है। इस बनिये की स्त्री की बहिन यहाँ है। वह धन लेकर मेरे साथ यहाँ से भागनेवाली है। उसीकी सहायता से तुम्हारा काम सिद्ध करेगा ॥१९१-१९२॥ ऐसा कहकर यह ब्राह्मण चला गया और बनिये की स्त्री की ननद अर्थात् उसकी बहिन को इसने सब सच्चा समाचार सुना दिया॥१९३॥ ७९

६२२ कथासरित्सागर

६२२ कथासरित्सागर

तस्य प्रवीरपुत्रेच्छाकृताग्न्याराधनोद्भवः । अहमेष महाराज वेदविद्याविदः सुतः ॥१६४॥ तस्मिंश्च भार्यानुगते पितरि स्वर्गते शिशुः । अपीतविद्योप्यानाभ्यास्स्वभागं श्यक्तवानहम् ॥१६५॥ प्रवृत्तश्चाभवं द्यूतं शस्त्रविद्याञ्च सेवितुम् । कस्य नोच्छृङ्खलं बाल्यं गुरुशासनवर्जितम् ॥१६६॥ तेन क्रमेण चोत्तीर्णे दशवे जातदोर्मदः । अटवीमेकदा बाणानहं द्धोप्तुं गतोऽभवम् ॥१६७॥ तावत्सन पथा चैका नगर्या निर्गता वधूः । अगात्कर्णीरपारूढा जन्यैर्बहुभिरन्विता ॥१६८॥ अकस्माच्च तदैवात्र करी त्रोटितशृङ्खलः । कुतोऽप्यागत्य तामेव वधूमभ्यापतन्मदात् ॥१६९॥ तद्भयेन च सर्वेऽपि त्यक्त्वा तामनुयायिनः । तद्भर्त्रापि सह क्लीबाः पलाय्येत्तस्ततो गताः ॥१७०॥ तद्दृष्ट्वा सहसावाहं ससम्भ्रममचिन्तयम् । हा कथं कातरैरेभिस्त्यक्तैकेयं तपस्विनी ॥१७१॥ तदहं वारणादस्माद्रक्षाम्यशरणामिमाम् । आपन्नत्राणविकलैः किं प्राज्ञैः पौरुषेण वा ॥१७२॥ इत्यहं मुक्तनादस्तं गजेन्द्रं प्रति धावितः । गजोऽपि तां स्त्रियं हित्वा स मामेवाभ्यदुद्रुवत् ॥१७३॥ ततोऽहं भीतया नार्या वीक्ष्यमाणस्तया नवन् । पलायमानश्च गजं तं दूरमपकृष्टवान् ॥१७४॥ क्रमात्पत्रभरां भग्नां प्राप्य शाखां महातरोः । आत्मानं च समाच्छाद्य सङ्क्रमध्यमगामहम् ॥१७५॥ तत्राग्रे स्थापयित्वा तां शाखां तिर्यक्शुरोग्रवात् । पलायितोऽहं हस्ती च स तां शाखामचूर्णयत् ॥१७६॥ ततोऽहं योषितस्तस्याः समीपगमनं द्रुतम् । शरीरकुशलं चैतामपृच्छमिह भीषिताम् ॥१७७॥ सापि मां वीक्ष्य दुःखार्ता सहर्षा चावदत्तथा । किं मे कुशलमेतस्मै दत्ता कापुरुषाय या ॥१७८॥ [L31: ईदृशे सङ्कटे यो मां त्यक्त्वा क्वापि गतः प्रभो । एतत्तु कुशलं यत्त्वमक्षतः पुमरीक्षितः ॥१७९॥

षष्ठ लम्बक ६१३

षष्ठ लम्बक ६१३ उसने एक महावीर पुत्र की प्राप्ति के लिए अग्नि-देवता की आराधना की। उसी वेदविद्या- विशारद ब्राह्मण का मैं पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६४॥ पत्नी के साथ मेरे पिता के स्वर्ग चले जाने पर शिशु-काल में ही मैंने विद्याध्ययन तो किया किन्तु अनाथ होने के कारण अपना मार्ग त्याग दिया ॥१६५॥ मैं द्यूत और शस्त्र-विद्या का अभ्यास करने लगा। सच है, गुरुजनों के शासन से रहित किसकी बाल्यावस्था उच्छृङ्खल नहीं हो जाती ॥१६६॥ क्रमशः बाल्यावस्था बीतने पर युवावस्था में भुजबल के मद से मत्त होकर बाणों को छोड़ने के लिए मैं एकबार जंगल में गया ॥१६७॥ उस समय रथ पर बैठी हुई और बहुत-से बरातियों से घिरी हुई एक नई वधू नगरी से निकली ॥१६८॥ इतने में ही मैंने देखा एकाएक बिगड़ा हुआ एक हाथी साँकल तोड़कर कहीं से आकर उस वधू पर आक्रमण करने लगा। हाथी के डर से उसके सभी पुरुषार्थ-हीन साथी उसके पति के साथ इधर-उधर भाग गये ॥१६९-१७०॥ यह देखकर घबराये हुए मैंने सोचा—'ओह, इन कायरों ने इस वधू को कैसे सर्वथा असहाय और अकेला ही छोड़ दिया' ॥१७१॥ तो मैं अब इस हाथी से इस अनपराधा की रक्षा करता हूँ। विपद्ग्रस्त की रक्षा से हीन प्राणों से या पराक्रम से लाभ ही क्या है ॥१७२॥ ऐसा सोचकर मैंने हाथी को ललकारा। हाथी भी उस स्त्री को छोड़कर मेरी ओर भागता हुआ आया ॥१७३॥ उस डरी हुई वधू से वेग से जाता हुआ और शब्द करता हुआ मैं हाथी को दूर तक दौड़ाता हुआ ले गया ॥१७४॥ इस प्रकार दौड़ते हुए मुझे मार्ग में घने पत्तोंवाली टूटी हुई एक वृक्ष की शाखा मिली। मैंने अपने को उसी में छिपा लिया और धीरे-धीरे छिपकर वृक्षों और पत्तों के झुरमुट में चला गया ॥१७५॥ उस शाखा को तिरछी करके मैंने पेड़ के साथ रख दिया और मैं भाग गया। पीछे से दौड़कर आते हुए हाथी ने उस शाखा को क्रोध में रौंद डाला ॥१७६॥ तब हाथी के चले जाने पर मैं उस स्त्री के पास आया और भयभीत उससे मैंने उसके शरीर का कुशल पूछा ॥१७७॥ वह मुझे देखकर कुण्ठित और हर्षित दोनों भाव प्रकट करती हुई बोली—क्या कुशल पूछते हो? मुझे ऐसे एक कायर मानव को दिया गया जो मुझे ऐसे प्राण-संकट में छोड़कर कहीं भाग गया। कुशल यही है कि तुम्हें मैंने बिना किसी फल (भाव) के पुत्र देखा ॥१७८-१७९॥

१२४ कथासरित्सागर

१२४ कथासरित्सागर तन्मे स कतमो भर्त्ता त्वमिदानीं पतिर्मम। येनात्मनिरपेक्षेण कृता मृत्युमुखावहे॥१८०॥ स चैष दृश्यते भृत्यै सहागच्छन्पतिर्मम। अतः स्वैरं त्वमस्माकं पश्चादागच्छ साम्प्रतम्॥१८१॥ मध्येऽन्तरे हि मिलिता यास्यामो यत्र कुत्रचित्। एवं तयोक्तस्तदहं तथेति प्रतिपन्नवान्॥१८२॥ सुस्वाप्यर्पितदारमपि परस्त्रीयं किमेतया। इति धैर्यस्य मार्गोऽयं न तारुण्यस्य सङ्गिनः॥१८३॥ क्षणादेत्य च सा भर्त्रा बाला सम्भाविता सती। तेन साकं सभृत्येन गन्तुं प्रावर्त्तत क्रमात्॥१८४॥ अहं च गुप्ततद्वृत्तपाथेयः परवर्त्मना। पश्चादलक्षितस्तस्य दूरमध्वानमभ्यगाम्॥१८५॥ सा च हस्तिमदभ्रष्टमङ्गाङ्गजनितां रुजम्। पथि मिथ्या वदन्ती तं पतिं स्पर्शेऽप्यवर्जयत्॥१८६॥ कस्य रक्तोन्मुखी गाढरूढान्तरविषद्दुःसहा। तिष्ठेदनपकृत्य स्त्री भुजगीव विकारिता॥१८७॥ क्रमाच्च क्रोहनगरं प्राप्ताः स्मस्ते पुरं वयम्। वणिग्ज्याजीविनो यत्र भर्तुस्तस्या गृहं स्त्रियाः॥१८८॥ स्थिताः स्मस्तद्वहिश्चात्र सर्वे बाह्ये सुरालये। तत्र संम्मिलिताश्चैष द्वितीयो ब्राह्मणः सखा॥१८९॥ नवेऽपि वर्त्तनेऽन्योन्यमाश्वासः समभूच्च नो। चित्तं जानाति जन्तूनां प्रेम जन्मान्तरार्जितम्॥१९०॥ ततो रहस्यमात्मीयं सर्वमस्मै मयोदितम्। तद्बुद्ध्वैव तथा स्वैरं मामेवमयमब्रवीत्॥१९१॥ तूष्णीं भवास्त्युपायोऽत्र यत्कृते त्वमिहागतः। एतस्या भर्तुर्भगिनी विद्यतेऽत्र वणिक्स्त्रियाः॥१९२॥ गृहीतार्था मया साकमितः सा गन्तुमुद्यता। तत्करिष्ये तदीयेन साहाय्येन तवेप्सितम्॥१९३॥

षष्ठ लम्बक ६२५

षष्ठ लम्बक ६२५ इसलिए वह मेरा पति नही हो सकता है। अब तुम्हीं मेरे भर्त्ता हो जिसने अपने जीवन की चिन्ता न करके मुझे मृत्यु-मुख से निकाला॥१८ ॥ वह मेरा पति नौकरों के साथ आ रहा है। अब तुम भी हमारे पीछे धीरे-धीरे आना। अवसर मिलने पर जहाँ कहीं भी चल जायेंगे। उसके इस प्रस्ताव को मैंने स्वीकार कर लिया ॥१८६। १८२॥ 'वह सुन्दरी है और मुझे आत्म-समर्पण कर चुकी है। फिर भी उस परकीया स्त्री से क्या प्रयोजन ? —यह तो धैर्य का मार्ग है, यौवन का नहीं॥१८३॥ कुछ ही देर में आकर पति द्वारा आश्वस्त की गई वह बामा उसके और उसके भृत्यों के साथ आगे-आगे चलने लगी॥१८४॥ उस स्त्री द्वारा स्पष्ट रूप से दिये गये मार्ग-सोधन को किया हुआ मैं भी उसके पीछे छिप छिपकर दूर तक चला गया॥१८५॥ उस स्त्री ने हाथी के भय से माकन पर टूटे हुए शरीर की पीड़ा के बहाने मार्ग में उस पति को अपने शरीर पर हाथ भी नहीं रखने दिया॥१८६॥ सच है अनुरक्त और आकृष्ट गाढ़ी अन्तर्वेदना के दुःख से कुम्ह और बिगड़ी हुई स्त्री सर्पिणी के समान किसका अपकार किये बिना रह सकती है?॥१८७॥ क्रमशः चलते हुए हम लोग मोहनपुर नामक पुर में पहुँचे जहाँ पर व्यापार से जीविका करनेवाले उस स्त्री के पति का घर था॥१८८॥ उस दिन हमलोग नगर के बाहर एक देव मन्दिर में ठहर गये। वहीं पर मुझे यह दूसरा मित्र ब्राह्मण मिला॥१८९॥ हमदोनों की उस नवीन और प्रथम परिचय में ही परस्पर परम विश्वास और प्रेम उत्पन्न हो गया। सच है, प्राणियों का चित्त पूर्वजन्म के संचित प्रेम का मनोनीति समझ लेता है॥१९०॥ तब मैंने अपना सारा रहस्य इसे बता दिया। यह सब सुन लेने के पश्चात् इसने मुझ वैसे से कहा— मत डरो। जिस लिए तुम यहाँ आये हो उसका उपाय है। इस बनिये की स्त्री के भाई की बहिन यहाँ है। वह पत्र देकर मेरे साथ यहाँ से आनेवाली है। उसीकी सहायता से तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा ॥१९१॥ ऐसा कहकर वह ब्राह्मण चला गया और बनिये की स्त्री की ननद, अर्थात् उसकी बहिन को इसने सब सच्चा समाचार सुना दिया॥१९२॥ ७९

६१६ कथासरित्सागर

६१६ कथासरित्सागर इत्युक्त्वा मामयं विप्रो गत्वा तस्यास्तदा रहः। वणिग्वधू ननान्दुस्तद्यथावस्तु न्यवेदयत् ॥१९४॥ अन्येद्यु कृतसंवित्त्व सा ननान्द्रा समेत्य ताम्। प्रावेशयद् भ्रातृजायां तत्र देवगृहान्तरे ॥१९५॥ रात्रान्तःस्थितयोनों च मध्यादेतं तदैव सा। मित्र मे भ्रातृजायायास्तस्या वेषमकारयत् ॥१९६॥ कृततद्वेषमेनं च गृहीत्वा नगरान्तरम्। भ्रात्रा सहाविशद् गेहं कृत्वा नः कार्यसंविदम् ॥१९७॥ अह च निर्गत्य सतस्तया पुरुषवेषया। वणिग्वध्वा सम प्राप्त क्रमेणोज्जयिनीमिमाम् ॥१९८॥ सद्यनान्दा च सा रात्रौ तदहः सोत्सवास्ततः। मत्तसुप्तजनाद् गेहादनेन सह निर्गता ॥१९९॥ ततश्चाय गृहीत्वा तां विप्रश्छन्न प्रयातकैः। आगतो नगरीमेतामचावां मिलिताविह ॥२००॥ इत्यावाभ्याममे भार्ये प्राप्ते प्रत्यग्रयोवने। ननान्दृभ्रातृजाये ते स्वानुरागसमर्पिते ॥२०१॥ अतो निवासे सर्वत्र नैव शङ्कामहे वयम्। कस्याश्वसिति चेतो हि विहितस्वैरसाहसम् ॥२०२॥ तदवस्थामहेतोश्च विसार्थ च रहुधिधरम्। आवां मन्त्रयमाणौ ह्वौ दुष्टौ देवेन दूरतः ॥२०३॥ दृष्ट्वानाय्य च संयम्य स्थापितौ चारचक्षुषा। अथ पृष्टौ च वृत्तान्तं स चैष कथितो मया ॥२०४॥ देव प्रमवतीदामीमित्यनेनोदिते सदा। राजा विक्रमसिंहस्तो विप्रो द्वावप्यभाषत ॥२०५॥ तुष्टोऽस्मि वो भयं मामूविहैव पुरि तिष्ठतम्। अहमेव च दास्यामि पर्याप्तं युवयोध॑नम् ॥२०६॥ इत्युक्त्वा स ददौ राजा यथेष्टं जीवनं तयोः। तौ च भार्यान्वितौ तस्य निकटे तस्यतु सुखम् ॥२०७॥ इत्थं श्रियासु निवसन्तमपि यासु तासु पुसां श्रियः प्रबलसत्त्वबहिष्कृतासु। एवं च साहसमनेष्वथ बुद्धिमत्सु सन्तुष्य दाननिरताः क्षितिया भवन्ति ॥२०८॥

षष्ठ लम्बक ६२७

षष्ठ लम्बक ६२७ दूसरे दिन सम्मति करके बनिये की उस बहिन ने अपनी भाभी (नव वधू) के साथ एक देव-मन्दिर में प्रवेश किया। मन्दिर के भीतर पहले ही से प्रविष्ट हम दोनों में से उसने मेरे मित्र को भाभी का वेष धारण कराया और उसी वेष में उसे भाई के घर ले गई। मैं उस पुरुष-वेष में स्थित वणिक की वधू के साथ मन्दिर से निकलकर क्रमशः उज्जैन आ गया ॥१९४-१९८॥ उसकी ननद भी घर में विवाहोत्सव के कारण लोगों के मद्यपान करके सो जाने पर इसके साथ रात में निकल भागी और यहाँ आने पर हम दोनों मिले ॥१९९-२ ॥ इस प्रकार हम दोनों ने नवयौवना और स्वयं प्रेम से आसक्त ननद-भाभी को प्राप्त किया ॥२ १॥ महाराज अब हम दोनों विश्राम के लिए प्रत्येक स्थान पर शंका कर रहे हैं। ऐसा गुप्त साहस करने पर भला किसका चित्त शान्त रह सकता है ? ॥२ २-२ ३॥ धन रखने के स्थान और धन कमाने के उपाय सोचते हुए हम दोनों को दूर से आपने देखा ॥२ ४॥ तदनन्तर गुप्तचर के सन्देह से आपने हम दोनों को पकड़वाकर बँधवा दिया। आज आपके पूछने पर सारा समाचार हमने स्पष्ट रूप से आपसे कह दिया। अब महाराज की जो इच्छा हो। ऐसा कहने पर राजा विक्रमसिंह ने दोनों से कहा- 'मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। भय मत करो। इसी नगर में रहो। मैं ही तुमको पर्याप्त धन दूँगा' ॥२ ५-२ ६॥ ऐसा कहकर राजा ने उनको पर्याप्त जीविका दे दी। तदनन्तर वे दोनों अपनी-अपनी स्त्रियों के साथ वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥२ ७॥ इस प्रकार उच्च महात्माओं न बहिष्कृत सदोष क्रियाओं में भी पुरुषों को सफलता प्राप्त होती है। और, साहस करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषों पर प्रसन्न होकर राजा इस प्रकार दानी हो वरता है ॥२ ८॥

इत्यैहिकेन च पुराविहितेन चापि स्वेनैव कर्मविभवेन शुभाशुभेन। शश्वद्भवत्यनुरूपविचित्रभोगः सर्वो हि नाम ससुरासुर एष सर्गः॥२१०॥ तत्स्वप्नवृत्तनियतो नभसश्च्युता या ज्वाला त्वयास्तदन्तर विशतीह दृष्टा। सा कापि देवि सुरजातिरसंशयं ते गर्भं कुतोऽपि खलु कर्मवशात्प्रपन्ना॥२११॥ इति निजभर्तुर्वदनाच्छ्रुत्वा नृपतेः कलिङ्गदत्तस्य। देवी तारादत्ता प्राप सगर्भा परं प्रमदम्॥२१२॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुका लम्बके प्रथमस्तरङ्गः।

द्वितीयस्तरङ्गः कलिङ्गसेनाया जन्मकथा ततः कलिङ्गदत्तस्य राज्ञो गर्भभराल्लसा। राज्ञी तक्षशिलायां सा तारादत्ता शनैरभूत्॥१॥ उदेष्यच्चन्द्रलेखां च प्राचीमनुचकार सा। आसन्नप्रसवा पाण्डुमुखी तरलताविका॥२॥ जज्ञे च तस्या नचिरादनन्यसदृशी सुता। वेधसः सर्वसौन्दर्यसर्गवर्णकसन्निभा॥३॥ ईदृक्पुत्रो न किं जात इतीव स्नेहालिने। रक्षाप्रदीपास्तत्कान्तिजिता विच्छायतां ययुः॥४॥ पिता कलिङ्गदत्तश्च जातां तां तादृशीमपि। दृष्ट्वा तद्रूपपुत्राशावैकल्याद्विमना अभूत्॥५॥ दिष्ट्या तामपि सम्भाव्य स पुत्रेच्छुरदूयत। शोककन्दः क्व कन्या हि क्वानन्दः कायदात्सुतः॥६॥ ततश्चेतोविनोदाय खिन्नो निर्गत्य मन्दिरात्। ययौ नानाजनाकारं विहारं स महीपतिः॥७॥ तत्रैकदेशे शुश्राव धर्मपाठकभिक्षुणा। जनमध्योपविष्टेन कथ्यमानमिदं वचः॥८॥

षष्ठ लम्बक ६२९

षष्ठ लम्बक ६२९ इस जन्म या पूर्वजन्म के किये हुए अपने ही भले-बुरे कर्मों के प्रभाव से सुरों और असुरों-सहित समस्त संसार कर्मानुसार विविध भोगों का भोग करता है॥१२ ॥

जो शुक्ल ध्यान से आकाश से गिरती हुई उपमा को जो पेट में प्रवेश करती हुई देखा है हे राज्ञी ! वह निष्कलङ्क कोई देव योनि का प्राणी अपने पूर्वजन्म कहीं समाप्त हुआ है ॥१३ ।

अपने पति राजा कलिङ्गसेन से यह सुनकर रानी तारादत्ता परम हर्षित हुई॥ १३॥

प्रथम तरंग समाप्त

दूसरा तरंग कलिङ्गसेना के जन्म की कथा

तदनन्तर रूपलावण्य मयी व राजा कलिङ्गसेन की रानी तारादत्ता गर्भ भार से धीरे धीरे आलसने लगी॥१॥

प्रसव काल के समीप आने पर वह रूपवती और चपल नेत्रवालो (पुतलियों) में आश्चर्य भरी चञ्चल बाल्यावस्थावाली पुत्री रत्न का अवतार करने लगी। २॥

कुछ ही दिनों के पश्चात् उसने रूपलावण्य मयी कन्या उत्पन्न हुई जो साक्षात् सौन्दर्य की प्रतिमा के समान थी ।३।

राजा पुत्र न होने पर भी कन्या उत्पन्न होने पर ही बहुत प्रसन्न हुआ और उसने बड़ा उत्सव मनाया ॥४॥

उस रूपवती कन्या का नाम कलिङ्गसेना रक्खा गया क्योंकि रूप-सौन्दर्य में वह अप्सराओं से भी अधिक रूपवती थी और कलिङ्गसेन के कन्या होने से वह कलिङ्गसेना ही कहलायी ॥५॥

राजा अपनी उस रूपवती पुत्री को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसने उसके लिए अनेक

दास-दासियों की व्यवस्था की और उसका लालन-पालन बड़े स्नेह से होने लगा ॥६॥

शनैः-शनैः वह कन्या शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान बढ़ने लगी और

उसके रूप-लावण्य को देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे ॥७॥

५३ कथासरित्सागर

५३ कथासरित्सागर अर्थप्रदानमेवाहुः संसारे सुमहत्तपः । अर्थदाः प्राणदाः प्रोक्ताः प्राणा ह्यर्थेषु कीर्तिताः ॥९॥ बुद्धेन च परस्यार्थे करुणाकुलचेतसा । आत्मापि तृणवद्दत्तः का वराके घने कथा ॥१०॥ तादृशेन च वीरेण तपसा स गतस्पृहः । सम्प्राप्तदिव्यविज्ञानो बुद्धो बुद्धत्वमागतः ॥११॥ आ शरीरभृतः सर्वेष्विष्टेष्वाशानिवर्तनात् । प्राज्ञः सत्त्वहितं कुर्यात्सम्यक्सम्बोधिबुद्धये ॥१२॥ सप्तराजकन्यानां कथा तथा च पूर्वं कस्यापि कृतनाम्नो महीपतेः । अजायन्तातिसुभगाः क्रमात्सप्त कुमारिकाः ॥१३॥ बाला एव च तास्त्यक्त्वा वैराग्येण पितुर्गृहम् । श्मशानं शिश्रियुः पृष्टा जगदुश्च परिच्छदम् ॥१४॥ असारं विश्वमेवैतन्नमापीदं शरीरकम् । तत्राप्यभीष्टसंयोगसुखादि स्वप्नविभ्रमः ॥१५॥ एकं परहितं त्वत्र संसारे सारमुच्यते । तदनेनापि देहेन कुर्मः सत्त्वहितं वयम् ॥१६॥ क्षिपामो जीवदेवैतञ्छरीरं पितृकानने । क्रव्याद्गणोपभोगाय कान्तेनापि ह्यनेन किम् ॥१७॥ विरक्तराजपुत्रस्य कथा तथा च राजपुत्रोऽत्र विरक्तः कोऽप्यभूत्पुरा । स युवापि सुकान्तोऽपि परिव्रज्यामशिश्रियत् ॥१८॥ स जातु भिक्षुः कस्यापि प्रविष्टो वणिजो गृहम् । दृष्टस्तद्भार्यास्तित्वरन्या पश्यन्त्यायतवेक्षणः ॥१९॥ सा तल्लोचनशोभापहृतचित्ता तमब्रवीत् । मधमास्तमिमं लक्ष्मीदृशेन त्वया व्रतम् ॥२०॥ सा धन्या स्त्री तपानेन चक्षुषा या निरीक्ष्यसे । इत्युक्तः स तया भिक्षुरुद्धृत्याक्षमपाटयत् ॥२१॥

षष्ठ लम्बक ६११

षष्ठ लम्बक ६११ 'संसार में धन देना ही सबसे महान् तप है। अर्थ देनेवाला प्राणदाता कहा जाता है क्योंकि प्राण धन में कीलित हैं॥९॥ करुणा से व्याकुलचित्त बुद्ध ने अपनी आत्मा को भी तृण के समान दे डाला। तब अकिंचन जन की क्या कथा ॥१०॥ ऐसे धैर्ययुक्त तप से निरीह बुद्ध ने दिव्य ज्ञान प्राप्त कर बुद्धत्व लाभ किया ॥११॥ इसलिए सभी प्रिय पदार्थों से आशा को हटाकर बुद्धिमान् व्यक्ति को भलीभाँति ज्ञान की प्राप्ति के लिए आजीवन प्राणियों का हित करना चाहिए' ॥१२॥ सात राजकुमारियों की कथा पूर्व समय में कृक नाम के किसी राजा की क्रम से अति सुन्दरी सात कन्याएँ उत्पन्न हुईं॥१३॥ बाल्यकाल में ही वे कन्याएँ वैराग्य से पिता का घर छोड़कर श्मशान का सेवन करने लगीं और अपने कुटुम्बियों से कहने लगीं—॥१४॥ 'यह सारा विश्व असार है। उसमें भी यह तुच्छ शरीर सर्वथा असार है उसमें भी अपनी प्रिय वस्तुओं या प्राणियों का मिलना स्वप्न सा-सा भ्रम है॥१५॥ ऐसे असार संसार में दूसरों का हित करना ही एक मात्र सार है। इसलिए हमलोग इस शरीर से भी परहित कर रही हैं॥१६॥ इस जीते हुए सुन्दर शरीर को हम श्मशान में फेंक देती हैं जिससे यह मांस खानेवाले पशु-पक्षियों के उपयोग में आ सके। अन्यथा इस सुन्दर शरीर का क्या उपयोग है?' ॥१७॥ एक विरक्त राजकुमार की कथा और भी सुनो। पूर्वकाल में एक राजपुत्र था। वह सुन्दर युवा होने पर भी परिव्राजक बन गया ॥१८॥ वह भिक्षु किसी वैश्य के घर कभी भिक्षा लेने के लिए गया। कन्दर्प के समान बड़े-बड़े नेत्रवान् उस भिक्षुक को उस वैश्य की युवती स्त्री ने देखा और वह उसके आँखों के लावण्य पर आसक्त होकर बोली—'राम सुन्दर तुमने यह कष्टकर व्रत क्यों धारण किया॥१९-२०॥ वह स्त्री धन्य है जो तुम्हारे इन नयनों से देखी जाती है। उसके इस प्रकार कहने पर भिक्षु ने अपनी आँख फोड़ ली। ॥२१॥ १ ऐसी ही दन्तकथा महाकवय कवि सूरदास के सम्बन्ध में प्रचलित है। आयर- लैण्ड के आरक्षी बीजीड के सम्बन्ध में भी ऐसी दन्तकथा प्रचलित है।—अनु.

६३२ कथासरित्सागर

६३२ कथासरित्सागर अनेन च हस्ते कृत्वा तन्मातः पश्येदमीदृशम् । जुगुप्सितमसृङ्मांसं गृह्यतां यदि रोचते ॥२२॥ ईदृगेव द्वितीयं च वद रम्यं किमेतयोः । इत्युक्ता तेन तद्दृष्ट्वा व्यषीदत्सा वणिग्वधूः ॥२३॥ उवाच च हहा ! पापं मया कृतमभव्यया । यदहं हेतुतां प्राप्ता लोचनोत्पाटने तव ॥२४॥ तच्छ्रुत्वा भिक्षुरवदन्माभूद्व्यथा तव भव्या । मम त्वया ह्युपकृतं यत् शृणु निदर्शनम् ॥२५॥

एकस्य तपस्विनः राज्ञश्च कथा

आसीत्कोऽपि पुरा कान्ते कुत्राप्युपवने यतिः । मनुजाङ्गत्वपि वैराग्यनिश्चयेनिकयेच्छया ॥२६॥ तपस्यतश्च कोऽप्यस्य राजा तत्रैव दैवतः । विहर्तुमागतः साकमवरोधवधूजनैः ॥२७॥ विहृत्य पानसुप्तस्य पार्श्वादुत्थाय तस्य च । नृपस्य चापलाद्राज्ञीसमस्तदुद्याने किलाभ्रमन् ॥२८॥ दृष्ट्वा तत्रैकदेशे च तं समाधिस्थितं मुनिम् ॥ अतिष्ठन्परिवार्यैनं किमेतदिति कौतुकात् ॥२९॥ चिरस्थितासु तास्वत्र प्रबुद्धः सोऽथ भूपतिः । अपश्यन् दयिताः पार्श्वे तत्र बभ्राम सर्वतः ॥३०॥ ददर्श चात्र राज्ञीस्ताः परिवार्य मुनिं स्थिताः । कुपितश्चेर्ष्यया तस्मिन्खड्गेन प्राहरन्मुनौ ॥३१॥ ऐश्वर्यमीर्ष्यानिर्बुद्ध्यं क्षीबस्य निर्विवेकिता । एकैकं किं न यत्कुर्यात् पञ्चाङ्गिरवे तु का कथा ॥३२॥ ततो गते नृपे तस्मिंस्तादृशमपि तं मुनिम् । अमूर्तं प्रकटीभूय काप्युवाचात्र देवता ॥३३॥ महात्मन्येन पापेन क्रोधेनैतत्कृतं त्वयि । स्वशक्त्या तमहं हन्मि मन्यते यदि तद्भवान् ॥३४॥

षष्ठ लम्बक ६३३

षष्ठ लम्बक ६३३ और, उन आँखों को हथेली में रखकर कहा—देखो माता यह ऐसी है। यह घृणित रक्त और मांस है। यदि अच्छा लगता है तो इसे ले लो॥२२॥ इसी प्रकार की दूसरी भी आँख है। बताओ इनमें कौन अधिक सुन्दर है। भिक्षु के इस प्रकार कहने पर वैश्यवधू खिन्न हो गई॥२३॥ और कहने लगी 'हाय हाय अभागिन मैंने यह क्या पाप कर डाला! मैं तुम्हारी आँखों के उखाड़ने का कारण बनी!॥२४॥ यह सुनकर भिक्षुक बोला—'माता तुम्हें कष्ट न होना चाहिए। तुमने मेरा उपकार किया है। इस प्रसंग में उदाहरण सुनो॥२५॥ एक तपस्वी और राजा की कथा प्राचीन समय में गंगा के किसी तट पर स्थित एक सुन्दर उपवन में वैराग्य के कारण सब कुछ त्यागने की इच्छा से एक यति रहता था॥२६॥ उसके तपस्या करते हुए कोई राजा अपने रनिवास की रानियों के साथ घूमने के लिए वहाँ आया॥२७॥ विहार करने के पश्चात् मद्यपान करके सोए हुए उस राजा के पास से उठकर चंचल रानियाँ उद्यान में चारों ओर घूमने लगीं॥२८॥ उस उद्यान के एक ओर समाधि में बैठे हुए मुनि को देखकर 'यह क्या है' इस प्रकार के कौतुक से वे उसे घेर कर बैठ गईं॥२९॥ विलम्ब हो जाने के कारण जागने पर राजा ने उन्हें देखने के लिए चारों ओर चक्कर लगाना प्रारम्भ किया॥३०॥ ढूँढ़ते हुए उसने जब मुनि को घेरकर बैठी हुई रानियों को देखा तब राजा ने डाह से जलती हुई तलवार निकालकर उससे मुनि पर प्रहार कर दिया॥३१॥ ऐश्वर्य, डाह, निर्दयता, मदोन्मत्तता और विवेक-शून्यता इनमें एक ही क्या अनर्थ नहीं कर सकता? यदि पाँचों अनियाँ एकत्र हों तो क्या कहना॥३२॥ राजा के चले जाने पर कटे हुए अंगोंवाले क्रोध रहित मुनि के सामने प्रकट होकर किसी देवी ने कहा—॥३३॥ 'हे महात्मन्! जिस पापी ने क्रोध से तुम्हारे प्रति यह अत्याचार किया है, उसे मैं अपनी शक्ति से मार देती हूँ यदि तुम चाहो तो'॥३४॥ ८

११४ कथासरित्सागर

११४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा स जगावैतद्देवि मा स्मैवमादिशः । स हि धर्मसहायो मे न विप्रियकृत् पुनः ॥३५॥ तत्प्रसादात्क्षमाधर्मं भगवत्याप्तवानहम् । कस्य क्षमय किं देवि नैव घोरं समाचरेत् ॥३६॥ न कोपो नदवरस्यास्य देहस्यार्थे मनस्विनः । प्रियाप्रियेपु साम्येन क्षमा हि ब्रह्मणः पदम् ॥३७॥ इत्युक्ता मुनिना साभ्रं तपसा तस्य तोषिता । अङ्गानि देवता कृत्वा निर्व्रणानि तिरोदधे ॥३८॥ तदद्या सोऽपि तस्यैवैपकारी मतो नृप । : नेत्रोत्खननहेतोस्त्वं तपोवृद्ध्या तथास्य मे ॥३९॥ इत्युक्त्या स वशी भिक्षुर्विनम्रां तां वणिग्वधूम । शान्तेऽपि वपुषि स्वस्मिन्नतास्थः सिद्धये ययौ ॥४०॥ सम्माद्यालेऽपि रम्येऽपि यः काये गत्वरे ग्रहः । सस्योपचारस्वतन्मात्रैः प्राज्ञस्य दास्यते ॥४१॥ तदिमा वयमेतस्मिन्निसर्गसुभगर्द्धयनि । श्मशाने प्राणिनामर्थे विक्षिप्यामः शरीरकम् ॥४२॥ इत्युक्त्वा परिवारं ता मन्त्रं राजकुमार्किका । तयैव यत्र प्रापुश्च मन्सिद्धिं परां ततः ॥४३॥ एवं निस्त्रे शरीरेऽपि ममत्वं नास्ति धीमताम् । कि पुन गतदाराग्निपरिग्रहवृणेष्विह ॥४४॥ इत्याकर्ण्य स नृपः श्रुत्वा विहारे धर्मशाटवान् । बुद्धिमन्तो भीत्या स विप्रं प्रायात् स्वमन्दिरम् ॥४५॥ तत्रात्तवाप्यमातङ्गः कल्याणप्रभायाः पुनः । स राजा शृण्वन् चैनाप्यम् द्विजन्मना ॥४६॥ राजन् कि वञ्चकाग्रस्तप्रमनाः परितप्यसे । गुरुम्योऽप्युत्तमाः सन्तः निबन्धेह परत्र च ॥४७॥ : गज्जत्सत्त्वं का तत्त युक्तेरात्मा महीभृताम् । यं भक्षयन्ति जना यत्र भाटका इव ॥४८॥ नृपान्तु श्रुतिमात्राद्या मुख्यश्चिन्त्यतया गुणैः । तीर्णा दुस्तरदुर्गाश्च प्रभूतिक्षमः पशमदम् ॥४९॥

षष्ठ लम्बक ११५

षष्ठ लम्बक ११५ यह सुनकर वह ऋषि बोला- देवि ऐसा न करो। वह राजा मेरे धर्म में सहायक है विरोधी नहीं ॥३५॥ हे भगवति उसकी कृपा से मुझे क्षमा-धर्म मिला। यदि वह ऐसा न करे, तो किस पर क्षमा की जाय ॥३६॥ मनस्वी जन इस नश्वर शरीर के लिए कोप नहीं करते। मित्र और शत्रु पर समान रूप से क्षमा करना ही ब्राह्मण का धर्म है ॥३७॥ इस प्रकार मुनि से कही गई और उसकी तपस्या से सन्तुष्ट वह देवी यति के अंगों को अक्षत (पूर्ण) करके अन्तर्धान हो गई ॥३८॥ अतः जैसे वह राजा उस ऋषि का उपकारी बना उसी प्रकार आँखें उखाड़ लेने के कारण मेरे तप को बढ़ाकर हे माता तुमने भी उपकार किया है ॥३९॥ ऐसा कहकर वह यती भिक्षु प्रणाम करती हुई उस वैश्य-वधू के मग्न होने पर अपने सुन्दर शरीर का भी ध्यान न देकर सिद्धि के लिए चला गया ॥४०॥ यह कथा सुनकर राजकन्याएं बोलीं—इसलिए चारु और सुन्दर होने पर भी नष्ट होने वाले शरीर पर क्या आग्रह ? इसलिए प्राणिमात्र के प्रति उपकार करना ही एक मात्र बुद्धिमान् के लिए प्रशंसनीय कार्य है ॥४१॥ इसलिए हम सातों कन्याएं स्वाभाविक सुख के घर इस श्मशान में प्राणियों के उपकार के लिए क्षुद्र शरीर को दे रही हैं॥४२॥ अपने परिवारवालों को इस प्रकार कहकर उन सातों राजकुमारियों ने ऐसा ही किया और उससे परमसिद्धि प्राप्त की ॥४३॥ बुद्धिमानों को अपने शरीर पर भी ममता नहीं होती। पुत्र-दारा आदि घास-फूस की तो बात ही क्या ॥४४॥ उस राजा ने विहार में धर्मोपदेशक से यह सब बातें सुनकर दिन व्यतीत किया और सायंकाल अपने भवन में आकर फिर भी कन्या-जन्म के शोक में मग्न हो गया। इतने पर घर के किसी बूढ़े ब्राह्मण ने आकर राजा से कहा—हे राजन् ! कन्यारत्न के जन्म से क्यों इतना सन्तप्त हो रहे हो। कन्याएँ तो पुत्र से भी उत्तम होती हैं और इहलोक तथा परलोक में भी कल्याण देनेवाली होती हैं ॥४५-४७॥ राज्य के लोभी पुत्रों में राजाओं का कैसा प्रेम जो बन्दरों के समान पिता को नोच खाते हैं॥४८॥ कुन्तिभोज आदि राजा कुन्ती आदि कन्याओं के कारण ही दुःसह दुर्वासा आदि के शाप से बच गये ॥४९॥

१६६ कथासरित्सागर

१६६ कथासरित्सागर फल यच्च सुतादानात् कृत पुत्रात् परत्र यत्। सुलोचनाख्यामत्र किञ्च यन्मि निशम्यताम् ॥५०॥ सुषेणनृपते कथा आसीद्राजा सुषेणाख्यश्चित्रकूटाचले युवा। कामोऽन्य इव यो धात्रा निर्मितस्त्र्यम्बकेर्ष्या ॥५१॥ स चक्रे दिव्यमारामं मूले तस्य महागिरे । सुराणां नन्दनोद्यानवासवैरस्यदायिनम् ॥५२॥ तन्मध्ये च चकारैकां वापीमुत्फुल्लपङ्कजाम्। लक्ष्मीलीलाारविन्दानां नवाकरमहीमिव ॥५३॥ सस्यास्तस्थौ स सद्रत्नसोपानायास्तटे सदा। पत्नीनां स्वानुरूपाणामभावादवधूसखः ॥५४॥ एकदा तेन मार्गेण नभसा सुरसुन्दरी। रम्भा जम्भारिभवनादाजगाम यदृच्छया ॥५५॥ सा तं ददर्श राजानं तत्रोद्याने विहारिणम्। साक्षा मधुमिवोत्फुल्लपुष्पकाननमध्यगम् ॥५६॥ वापिकापद्मपतितां दिवोऽनु पतितां श्रियम्। चन्द्रं किमेष नैसद् वा क्षीरस्य ह्यनपायिनी ॥५७॥ नूनं पुष्पोपद्यानं पुष्पेक्षुः सोऽयमागतः। किं तु सा रतिरेतस्य क्व गता सहचारिणी ॥५८॥ इत्यौत्सुक्यकृताश्लेषा सावतीर्ण मभोन्तरात्। रम्भा मानुषरूपेण राजानं तमुपागमत् ॥५९॥ उपेतां तां च महसा दृष्ट्वा राजा सविस्मय । अचिन्तयदहो नेयमसंभाव्यवपुर्भवेत् ॥६०॥ न तावन्मानुषी येन पादौ मास्य रजःस्पृशौ। न चक्षुः सनिमेषं वा तस्माद्दिव्यैव साप्सरो ॥६१॥ प्रष्टव्या तु मया नयं पलायेत हि जातुचित्। रतिभेनासहा प्रायो दिव्याः कारणक्रुताः ॥६२॥ इति ध्यायन् स नृपतिः कृतसम्भाषणस्तया। वरक्रमणेय हरकार तत्कथापदमाप्तवान् ॥६३॥

राजा सुषेण और सुलोचना की कथा

षष्ठ स्तम्बक १३७ कन्यादान से परलोक में जो सुख मिलता है वह पुत्रों से कहाँ मिल सकता है ? राजा सुषेण और सुलोचना की कथा मैं इस सम्बन्ध में सुलोचना की कथा कहता हूँ सुनो ॥५० ॥ चित्रकूट^१ पर्वत पर सुषेण नाम का एक युवा राजा था। उसे ब्रह्मा ने मानों शिवजी की ईर्ष्या से नवीन कामदेव के समान निर्मित किया था। उस राजा ने उस विशाल पर्वत की तलहटी में एक सुन्दर उद्यान बनवाया जो देवताओं के नन्दन वन के विहार में विरसता उत्पन्न करता था। अर्थात् उसने अपनी सुन्दरता से नन्दन वन को भी तिरस्कृत कर दिया था ॥५१-५२॥ उस उद्यान के मध्य उस राजा ने विकसित कमलों वाली एक सुन्दर बावली बनवाई थी जो मानों लक्ष्मी के लीला कमलों के लिए नये खजाने के समान थी ॥५३॥ अच्छ रत्नों से जड़ी हुई सीढ़ियोंवाली उस बावली के किनारे पत्नियों के अभाव में वह अकेला ही बैठा रहता था। एक बार उसी के आकाशमार्ग से जाती हुई रम्भा इन्द्र-भवन से अकस्मात् वहीं आ गई ॥५४-५५॥ रम्भा ने उद्यान में बैठे हुए राजा को इस प्रकार देखा मानों प्रफुल्ल पुष्प-वन में मूर्ति मान् वसन्त विराजमान हो ॥५६॥ उसे देखकर रम्भा सोचने लगी बावली के कमलों पर गिरी हुई क्या यह स्वयं की लक्ष्मी है ?^२ अथवा साक्षात् चन्द्रमा है ? क्या यह इसकी स्थायी शोभा है अथवा पुष्पधन्वा कामदेव स्वयं ही पुष्प-चयन करने यहाँ उपस्थित हुआ है। किन्तु यदि वह है तो उसकी सहचारिणी रति यहाँ कहाँ है। उत्सुकता के कारण इस प्रकार तर्क-वितर्क करती हुई रम्भा मनुष्य के रूप में राजा के समीप आई ॥५७-५९॥ समीप आई हुई उसे देखकर राजा सोचने लगा कि यह असम्भव शरीरवाली कौन स्त्री है ? यह मानुषी तो नहीं है क्योंकि इसके चरण भूमिस्यर्श नहीं करते और आँखें भी अपलक हैं। अतः यह अवश्य ही कोई दिव्या स्त्री है ॥६०-६१॥ पूछने पर कदाचित् यह भाग न जाय इसलिए इससे पूछना नहीं चाहिए। कारण में शंकित दिव्य स्त्रियाँ प्राय रति का भेद (रहस्य खुलना) सहन नहीं करतीं ॥६२॥ ऐसा सोचते हुए उस राजा ने उससे बात करते हुए समझ उसी समय उस सूखे से सङ्ग किया ॥६३॥ १ किसी-किसी पुस्तक में त्रिकूटाचल पर्वत का नाम आया है। यह हिमालय का एक भाग है, जिसके शिखर, सोने चान्दी और लोहे के बने हुए हैं। श्रीमद्भागवत के आठव स्कन्ध में इसका कथन है। २ इस वाक्य में उत्प्रेक्षालंकार है।

१२८ कथासरित्सागर

१२८ कथासरित्सागर चिक्रीड च चिरं सोऽत्र साकमप्सरसा तया। दिवं सापि न सस्मार रम्यं प्रेम न जन्मभूः ॥६४॥ तत्सखीयक्षिणीवृष्टेरुपरी स्वर्णराशिभिः। सास्यभूमिर्नरेन्द्रस्य धौतैश्शिखरैरिव ॥६५॥ कालेन चास्य राज्ञ सा सुवेगस्य वराप्सराः। असूतानन्यसदृशीं धृतगर्भा सती सुताम् ॥६६॥ प्रसूतमात्रैव च सा जगादेनं महीपतिम्। राजञ्शापोऽयमीवृद्धमे क्षीणो जात' स चाधुना ॥६७॥ अहं हि रम्भा नाकस्त्री त्वयि दृष्टेऽनुरागिणी। जाते च गर्भे मुक्त्वा तं गच्छामस्तत्क्षणं वयम् ॥६८॥ समयो हीदृशोऽस्माकं तद्रक्षे कन्यकामिमाम्। एतद्विवाहाज्ञाके नो भूयो भावी समागमः ॥६९॥ एवमुक्त्वाप्सरा रम्भा विवशा सा तिरोदधे। तद्दुःखान्न च स राजाभूत्तदा प्राणव्ययोद्यतः ॥७०॥ निरास्थेनापि किं त्यक्तं विश्वामित्रेण जीवितम्। मेनकायां प्रयातायां प्रसूयैव शकुन्तलाम् ॥७१॥ इत्यादि सचिवैरुक्तो ज्ञातार्थः स नृपो धृतिम्। शनैरादत्त कन्यां च पुनस्सङ्गमकारणम् ॥७२॥ तां च बालां सवेगाग्र पिता सर्वाङ्गसुन्दरीम्। सोऽतिलोचनसौन्दर्यान्नाम्ना चक्रे सुलोचनाम् ॥७३॥ कालेन यौवनप्राप्तामुद्यानस्थां ददर्श ताम्। युवा यदृच्छया भ्राम्यन्वत्सस्य काश्यपो मुनिः ॥७४॥ स तपोराशिरूपोऽपि दृष्ट्वैवैतां नृपात्मजाम्। अनुरागरसोऽभूदिति धाम व्यचिन्तयत् ॥७५॥ अहो रूपं किमप्यस्याः कन्यायाः परमाद्भुतम्। नेमां प्राप्नोति चेद् भार्या किमन्यत्तपसः फलम् ॥७६॥ इति ध्यायन् मुन्युवा स सुलोचनया तया। अददर्शि प्रज्वलत्तेजा विधूम इव पावकः ॥७७॥ तं वीक्ष्य सापि सप्रेमा साक्षसूत्रकमण्डलुम्। शान्तश्च कमनीयश्च कोऽयं स्यादित्यचिन्तयत् ॥७८॥