भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

द्वितीय लम्बक २१९

द्वितीय लम्बक २१९ 'रात्रि के जागरण और अति मद्यपान से मेरे सिर में वेदना हो रही है'—ऐसा कहकर वह कपड़े के टुकड़े से मस्तक को बाँधकर सो गया ॥१५२॥ इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा वैश्यपुत्र गया। उसने भी उसी प्रकार दुर्दशा भोगी ॥१५३॥ वह नंगा ही कुट्टिनी के घर पहुँचकर बोला कि चोरों ने मेरी यह दुर्दशा की है ॥१५४॥ वह भी सिर-दर्द का बहाना करके सिर में कपड़ा लपेटकर सो गया ॥१५५॥ इस प्रकार क्रमशः वे चारों वैश्यपुत्र वंचित और अपमानित हुए, किन्तु एक दूसरे से अपनी व्यथा छिपाता ही रहा ॥१५६॥ वे इस प्रकार दुर्मति और धन-नाश होने से अत्यन्त लज्जित थे। उन्होंने उस कुट्टिनी परिव्राजिका से भी यह बात प्रकाशित नहीं की और उसके घर से अपने घर चले गये ॥१५७॥ उनके चले जाने पर वह परिव्राजिका कुट्टिनी भी सफल-मनोरथ होने के कारण अपनी धूर्त शिष्या सिद्धिकरी के साथ अभिनन्दन करने के लिए देवस्मिता के घर पर गई ॥१५८॥ देवस्मिता ने भी उसका भलीभाँति स्वागत करके मानों प्रसन्नता और सन्तोष प्रकट करने के लिए धतूरे के चूर्ण से मिला हुआ वही मद्य खूब पिलवाया ॥१५९॥ उसके पश्चात् मद्यपान से उन्मत्त उस कुट्टिनी और उसकी शिष्या के भी नाक-कान कटवा कर उन्हें उसी मल-कुण्ड में फेंकवा दिया जिसमे वैश्यपुत्रों को फेंका गया था ॥१६०॥ देवस्मिता ने इस भय से कि 'वे लज्जित और अपमानित वैश्यपुत्र अपने देश जाकर बदला लेने के लिए मेरे पति को मार न डालें' इसलिए उसने यह सारा वृत्तान्त अपनी सास को सुना दिया ॥१६१॥ तब सास ने कहा—'बेटी ! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया। किन्तु इस कांड से मेरे पुत्र (तुम्हारे पति) को हानि हो सकती है ॥१६२॥ तब देवस्मिता ने कहा—"जैसे पहले समय में शक्तिमती ने अपने पति की रक्षा की थी उसी प्रकार मैं भी 'उनकी' रक्षा करती हूँ" ॥१६३॥

कथासरित्सागर

२२ कथासरित्सागर

कथ शक्तिमती पुत्रि! ररक्ष पतिमुच्यताम्। इति पृष्टा तया श्वश्र्वा साऽथ देवस्मिताऽब्रवीत् ॥१६४॥ अस्मद्देशे पुरस्यान्तर्मणिभद्र इति श्रुतः। पूर्वैः कृतप्रतिष्ठोऽस्ति महायक्षः प्रभावतः ॥१६५॥ तस्योपयाचितान्येत्य तत्रत्या कुर्वते जनाः। तत्तद्वाञ्छितसिद्धि-हेतोस्तैस्तैरुपायनै ॥१६६॥ यो नरः प्राप्यते तत्र रात्रौ सह परस्त्रिया। स्थाप्यते सोऽस्य यक्षस्य गर्भागारे तया समम् ॥१६७॥ प्रातस्ततश्च सस्त्रीकः स नीत्वा राजसंसदि। प्रकटीकृत्य तद्वृत्तं निगृह्यत इति स्थितिः ॥१६८॥ एकदा तत्र नक्तं च सक्तः परजायया। वणिक्समुद्रदत्ताख्यः प्राप्तोऽभूत्पुररक्षिणा ॥१६९॥ नीत्वा च तेन क्षिप्तोऽभूत्सपरस्त्रीक एव सः। यक्षसद्मनि तस्मिन् दुर्वृत्तागेह वणिक ॥१७०॥ तत्क्षणं वणिजश्चास्य महाप्रज्ञा पतिव्रता। भार्या शक्तिमती नाम तं वृत्तान्तमबुध्यत ॥१७१॥ साऽथ धीरान्यरूपेण तद्यक्षायतनं निशि। पूजामादाय साश्वासा सखीजनयुता ययौ ॥१७२॥ तत्रैत्य दक्षिणाशोभावेत्तस्या एव पूजकः। ददौ प्रवेशमुद्घाट्य द्वारमुक्त्वा पुराधिपम् ॥१७३॥ सा च प्रविश्य स-स्त्रीके दुष्टे पत्त्यौ विलक्षिते। स्वं वेषं कारयित्वा तां निर्याह्यात्यक्त्वापरस्त्रियम् ॥१७४॥ सा च निर्गत्य रात्रौ स्त्री तद्वेषैव ततो ययौ। तस्थौ शक्तिमती तत्र तेन भर्त्रा समं तु सा ॥१७५॥ प्रातश्च राजाधिकृतैरेत्य यावन्निरूप्यते। तावत्स्वपत्न्याैव युतः शर्वे स ददृशे वणिक् ॥१७६॥ तद्बुद्ध्या यक्षमवमान्मृत्योरिव मुखादप। दण्डयित्वा पुराध्यक्षं वणिजं तममोचयत् ॥१७७॥ एवं शक्तिमती पूर्वं ररक्ष प्रज्ञया पतिम्। अहं तद्वेव भर्त्तारं गत्वा रक्षामि युक्तितः ॥१७८॥

द्वितीय लम्बक २२१

द्वितीय लम्बक २२१ सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा 'बेटी शक्तिमती ने कैसे अपने पति की रक्षा की थी ?—सास के इस प्रकार प्रश्न करने पर देवस्मिता ने कहा—'हमारे देश में नगर के भीतर मणिभद्र नाम के एक महायक्ष की मूर्ति एक मन्दिर में प्रतिष्ठित है। नगर-निवासी अपनी-अपनी कार्यसिद्धि के लिए उस मणिभद्र-मन्दिर में जाकर मन्नतें मानते हैं, और अपने-अपने कार्य के अनुसार वहाँ उपहार चढ़ाते हैं। जो व्यक्ति उस मन्दिर में दूसरी स्त्री के साथ पाया जाता था उसे रात में मन्दिर के भीतरी भाग में बन्द कर दिया जाता था। वह प्रातःकाल उसी स्त्री के साथ राजसभा में ले जाया जाता था। वहाँ उसका वृत्तान्त प्रकट करके उसे मार डालने का दण्ड दिया जाता था। ऐसी व्यवस्था वहाँ थी ॥१६४-१६८॥ एक बार उस मन्दिर में रात के समय दूसरी स्त्री के साथ समुद्रदत्त नामक बनिये को नगर-रक्षक (कोतवाल) ने पकड़ा और उसे मन्दिर के भीतर उस स्त्री के साथ बन्द करके सुदृढ़ साँकल लगवा दिये ॥१६९-१७०॥ उसी समय समुद्रदत्त की अत्यन्त बुद्धिमती और पतिव्रता पत्नी ने यह समाचार सुना। और साथियों के साथ पूजा-सामग्री आदि उपहार लेकर वह मन्दिर में गई ॥१७१-१७२॥ मन्दिर के पुजारी ने लम्बी दक्षिणा के लोभ से कोतवाल को कहकर मन्दिर का द्वार खुलवा दिया ॥१७३॥ उसने मन्दिर के भीतर जाकर किसी स्त्री के साथ अपने पति को देखा और अपने कपड़े उस स्त्री को पहिनाकर कहा—'तुम जाओ' ॥१७४॥ वह स्त्री शक्तिमती के वेष में बाहर निकल गई और शक्तिमती उस स्त्री के वेष में पति के पास रह गई ॥१७५॥ प्रातःकाल राजा के अधिकारियों ने जब जाकर देखा तो वह बनिया अपनी स्त्री के साथ पाया गया ॥१७६॥ यह वृत्तान्त जानकर राजा ने मृत्यु-मुख से उसे मुक्त कर दिया और प्रमाद करने के कारण कोतवाल को दंड दिया ॥१७७॥ समुद्रदत्त की कथा समाप्त। जिस प्रकार पूर्वकाल में शक्तिमती ने बुद्धि से अपने पति की रक्षा की थी उसी प्रकार मैं भी उपाय करके अपने पति की रक्षा करूँगी ॥१७८॥

२१२ कथारित्सागर

२१२ कथारित्सागर इति देवस्मिता द्व्यू रह उक्त्वा तपस्विनी। स्वचेटिकाभिः सहिता वणिग्वेषं चकार सा ॥१७९॥ आरुह्य च प्रवहणं वणिज्याव्याजतस्ततः । कटाहद्वीपमगमद्यत्र सोऽस्याः पतिः स्थितः ॥१८०॥ गत्वा तं च पतिं तत्र वणिङ्मध्यं ददर्श सा। गुहसेनं समाश्वासमिव मूर्त्तिधरं बहिः ॥१८१॥ सोऽपि तां पुंस्त्वाकारां दूराद्दृष्ट्वा पिबन्निव। प्रियायाः सदृशः सोऽथ वणिग्त्यादित्यचिन्तयत् ॥१८२॥ सा तु देवस्मिता तत्र भूपं गत्वा व्यजिज्ञपत्। विज्ञप्तिरॅस्ति तत्कार्यं संशृण्वन्तां प्रजा इति ॥१८३॥ ततः सर्वान्समानीय राजा पौरान् सरोत्सुकः। का सा विज्ञप्तिरस्तीति वणिग्वेषामुवाच ताम् ॥१८४॥ गता देवस्मितायाणीहि मध्ये मम स्थिताः। पलाय्य दासास्त्वात्तारूंस्तान् देव प्रयच्छतु ॥१८५॥ अथ तामब्रवीद्राजा सर्वे पौरा इमं स्थिताः। गन्धर्वाप्रत्यभिशाय मिजान्भागानुहाण ताम् ॥१८६॥ ततस्तया जगृहिरे स्वगृहे प्राग्गलाङ्किताः। वणिक्सुतास्तं पञ्चाट निरस्यापहृदाम्बराः ॥१८७॥ गापवाहमुक्ता एष यष दासा भवन्ति सः। इति पृच्छन् सामून्तुनन्त्या वणिजन्मन् ॥१८८॥ सा प्रत्यवयोग्गा तान् यदि न प्रत्ययोऽस्ति वः। तदाऽत्र प्रत्ययार्था गुभं गान्धुकम मया ॥१८९॥ गद्यपि तत्समुद्घाट्य गपुषां पाण्डुरङ्कवान्। सर्वैश्च दृष्टमन्तःपुरे राजा च संशयम् ॥१९०॥ तद्विहाय वणिग्भावं गत्वा तत्रान्तरिन्दुकैः। विमर्दाद्दि दिनदृष्टं च सो दर्शिता स्वदम् ॥१९१॥ सा ज्ञात्वा यथावृत्तं सर्वैरेव सगुह्यका। सान्त्वनं प्रतिपन्ना इति सा चावन्मृतः ॥१९२॥ स्वाङ्गेभ्यो वणिजांस्तांश्च शत्रुत्वे सानुकम्पितः। त्यागदण्डं पुनः भूपिः गत्वा तस्य च भक्तः ॥१९३॥

द्वितीय लम्बक २२३

द्वितीय लम्बक २२३ अपनी सास से एकान्त म इस प्रकार बातें करके देवस्मिता ने अपनी सहेलियों के साथ व्यापारी बनियों का-सा वेष बनाया। और व्यापार करने के बहाने से जहाज पर चढ़कर कटाह द्वीप में पहुँची जहाँ उसका पति ठहरा था। कटाह-द्वीप के जौहरी-बाजार में व्यापारियों के मध्य बैठे हुए उसने मूर्त्तिमान् धैर्य के समान अपने पति को देखा॥१७९-१८०॥ गुप्तसेन ने भी पुरुष के वेष में अपनी पत्नी देवस्मिता को भलीभाँति पहचाना तो नहीं किन्तु 'यह उसी के समान कौन है ?' —देखकर इस चिन्ता में निमग्न हो गया ॥१८१-१८२॥ देवस्मिता ने कटाह-द्वीप के राजा के पास जाकर प्रार्थनापूर्वक निवेदन किया कि आप अपने नगर की सारी जनता को एकत्र करें ॥१८३॥ उसकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा ने सभी नागरिकों को कौतूहल के साथ एकत्र किया और बनिये के वेष में स्थित देवस्मिता से कहा—'नागरिक एकत्र हैं तुम अपनी प्रार्थना सुनाओ' ॥१८४॥ उत्तर में देवस्मिता ने कहा—'यहाँ मेरे चार दास भागकर आये हैं। महाराज ! उन्हें मुझे सौंप दें' ॥१८५॥ तब राजा ने उससे कहा कि ये सभी नागरिक यहाँ उपस्थित हैं। इनमें से तुम अपने चारों दासों को पहचानकर पकड़ो ॥१८६॥ तब देवस्मिता ने अपने घर में दंडित अतएव अपने-अपने माथे पर दुपट्टा बाँधे हुए उन चारों वैश्यपुत्रों को पहचानकर पकड़ लिया ॥१८७॥ उनके पकड़े जाने पर वहाँ एकत्र सभी बनिये क्रोध से बोले—'ये तो जहाजी व्यापारियों के पुत्र हैं। तुम्हारे दास कैसे हो सकते हैं ?' तब उसने उन्हें प्रत्युत्तर दिया कि 'यदि आपलोगों को विश्वास नहीं है तो इनके मस्तकों को देखें। मैंने कुत्ते के पदचिह्नों से इन्हें दाग दिया है' ॥१८८-१८९॥ तब सभी ने उसकी बात सुनकर दुपट्टे हटाकर देखा कि उनके मस्तकों पर कुत्ते के पैर दागे गये थे ॥१९० ॥ इस स्थिति से वैश्य लज्जित हो गये और राजा को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ॥१९१॥ इसके पश्चात् राजा ने स्वयं देवस्मिता से पूछा कि 'यह क्या बात है ?' ॥१९२॥ राजा के पूछने पर देवस्मिता ने सारा और सत्य वृत्तान्त सबको सुना दिया जिसे सुनकर जनता हँसने लगी और तब राजा ने कहा कि 'न्यायतः ये तेरे दास हैं। तब वहाँ के वैश्यों ने धन- संग्रह करके देवस्मिता को दिया और उन चारों को दासता से मुक्ति दिलाई। राजा ने भी उस पतिव्रता को पर्याप्त धन और वैश्यपुत्रों को दंड दिया ॥१९३॥

२२४ कथासरित्सागर

२२४ कथासरित्सागर आदाय तद्धनमवाप्य पतिं च तं स्वं देवस्मिता सकरुसज्जनपूजिता सा। प्रत्याययौ निजपुरीमथ ताम्रलिप्तीं नास्या बभूव च पुनः प्रियविप्रयोगः ॥१९४॥ इति स्त्रियो देवि ! महाकुलोद्गता विशुद्धधीरश्चरितैरुपासत। सर्व्वं भर्त्तारमनन्यमानसाः पतिः सतीनां परमं हि दैवतम् ॥१९५॥ इत्याकर्ण्य वसन्तकस्य वदनादेतामुदारां कथां मार्गे वासवदत्तया नवपरित्यक्ते पितुर्वेश्मनि। तल्लज्जासदनं विधाय विवृधे वत्सेश्वरे भर्त्तरि प्राक्प्रौढप्रणयाबबद्धमपि सद्भक्त्येकतानं मनः ॥१९६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथा मुख लम्बके पञ्चमस्तरङ्गः षष्ठस्तरङ्गः अथ विन्ध्यान्तरे तत्र वत्सराजस्य तिष्ठतः। पार्श्वं चण्डमहासेनप्रतीहारः समाययौ ॥१॥ स चागत्य प्रणम्यैनं राजानमिदमब्रवीत्। राजा चण्डमहासेनस्तव सन्दिष्टवानिदम् ॥२॥ युक्तं वासवदत्ता यत्स्वयमेव त्वया हृता। त्वदर्थमेव हि मया त्वमानीत इहाभवः ॥३॥ सप्रतस्य च नैवाहं दत्तेया से मया स्वयम्। मैवमस्मासु ते प्रीतिर्मेनेति विशङ्किना ॥४॥ तदिदानीमविधिना गतास्या दुहितुर्यथा। न विवाहो भवेद्राजन् प्रतीषेधास्तथा मनाक् ॥५॥ गोपालको हि न चिरादत्रैवेष्यति मत्सुतः। स चास्याः स्वसुरुद्वाहं यथाविधि विधास्यति ॥६॥ इतीमं वत्सराजाय सुन्देशमवधार्य सः। तत्तद्वासवदत्तायै प्रतीहारो न्यवेदयत् ॥७॥

द्वितीय लम्बक २२५

द्वितीय लम्बक २२५ इस प्रकार समस्त जनता से प्रशंसित वह पतिव्रता देवस्मिता धन और पति को साथ लेकर अपनी नगरी ताम्रलिप्ति को लौट आई और फिर कभी उसे पति-वियोग नहीं हुआ ॥१९४॥ हे देवि ! इस प्रकार अच्छे कुल में उत्पन्न एवं धीर और उदार चरित्रवाली होती हैं जो अनन्य मन से पतिपरायण होती हैं क्योंकि पति ही सती स्त्रियों का परम देवता है ॥१९५॥ वसन्तक के मुख से इस प्रकार की कथा को सुनकर वासवदत्ता ने तुरन्त छोड़े हुए पिता के घर को लज्जा-गृह बनाकर वत्सेश्वर के प्रति प्रौढ़ प्रेम में पगे हुए मन को भक्ति-प्रवण बना दिया ॥१९६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुख लम्बक का पंचम तरंग समाप्त। षष्ठ तरंग वत्सराज की कथा कुछ दिनों बाद उसी विन्ध्य-शिविर में रहते हुए वत्सराज के पास चंडमहासेन का प्रति- हार (दूत) आया ॥१॥ आकर और राजा को प्रणाम करके उसने कहा—‘महाराज ! चंडमहासेन ने सन्देश देकर मुझे आपके पास भेजा है और कहलाया है—"तुमने जो वासवदत्ता का हरण किया है यह उचित ही किया है। इसीलिए तुम मेरे द्वारा अपहरण कराकर उज्जैन ले आये गये थे ॥२-३॥ कैद में बँधे हुए मैंने तुम्हें कन्या स्वयं इस शंका से नहीं दी कि तुम सम्भवतः इस प्रकार प्रसन्न न होगे। इसलिए हे राजन् ! मेरी कन्या का विवाह अवैवाहिक न हो इसलिए कुछ प्रतीक्षा करो शीघ्र ही मेरा पुत्र गोपालक वहीं आवेगा और विधिपूर्वक अपनी बहिन का विवाह तुमसे करेगा" ॥४-५॥ इस प्रकार प्रतिहार ने वत्सराज को यह सन्देश सुनाकर वासवदत्ता को भी सुनाया। तब प्रसन्न वासवदत्ता के साथ प्रसन्नचित्त राजा ने कौशाम्बी जाने की इच्छा प्रकट की ॥६॥ २९

२२६ कथासरित्सागर

२२६ कथासरित्सागर ततः सानन्दया सार्धं तया वासवदत्तया। हृष्टो वत्सश्वरश्चक्रे कौशाम्बीगमनं मनः॥८॥ गोपालकस्यागमनं प्रतीक्षेथां युवामिह। तेनैव सह पश्चाच्च कौशाम्बीमागमिष्यथः॥९॥ इत्युक्त्वा स्थापयामास स तत्रैव महीपतिः। श्वाशुरं तं प्रतीहारं स्वमित्रं च पुलिन्दकम्॥१०॥ ततोऽनुयातो राजेन्द्रः प्लवद्भिर्मेदनीभरान्। अनुरागागतविन्ध्यप्राग्भारैरिव जङ्गमैः॥११॥ तुरङ्गसैन्यसङ्घातसुराघातसधर्म्मया । स्तूयमान इवोत्क्रान्तवन्दिसन्दर्भया मुदा॥१२॥ नभोविलङ्घिभिः सान्द्ररजोराशिभिरुद्धतैः। सपक्षमूभूदुल्लासशङ्कां कुर्वञ्छतक्रतोः॥१३॥ स प्रतस्थे ततो देव्या सह वासवदत्तया। स्वपुरीं प्रति राजेन्द्रः प्रातरेवापरेऽहनि॥१४॥ ततश्च दिवसैस्त्रिभिरुल्लङ्घ्य तमध्वापं सः। विशश्राम निशामेकां रुमण्वन्मन्दिरे नृपः॥१५॥ अन्येद्युस्तां च कौशाम्बीं चिरात्प्राप्तमहोत्सवां। मार्गोत्सुको मुखजनो प्रविवेश प्रियासखः॥१६॥ तया च स्त्रीभिरारब्धमङ्गलस्नानमण्डना। चिरादुपगते पत्यौ बभौ नारीव सा पुरी॥१७॥ ददृशुश्चात्र पौरास्तं वत्सराजं वधूसखम्। प्रशान्तशोकाः शशिनं सविद्युतमिवाम्बुदम्॥१८॥ हर्म्यप्रस्थांश्च पिबुः पौरनार्यो मुखेन्दिभः। व्योमगङ्गाततोत्फुल्लहेमाम्बुरुहविभ्रमम् ॥१९॥ ततः स्वं राजभवनं वत्सराजो विवेश सः। नृपश्रियवापरया सह वासवदत्तया॥२०॥ छेवामतनुपाकीर्णमागधोद्गीतमङ्गलम् । सुप्तप्रबुद्धमिव तद्रेजे राजगृहं तदा॥२१॥ अथ वासवदत्ताया भ्राता गोपालकोऽचिरात्। आययौ सह कृत्वा तौ प्रतीहारपुलिन्दकौ॥२२॥

द्वितीय लम्बक २२७

द्वितीय लम्बक २२७ तुम दोनों यहाँ रहकर गोपालक के आगमन की प्रतीक्षा करो उसके आने पर साथ ही आ जाना—उदयन ने समुद्रगृह के प्रतिहार और अपने मित्र पुलिन्दक को ऐसा कहकर वहीं ठहरा दिया॥८—१०॥ तब दूसरे दिन प्रातःकाल ही राजा ने धूमधाम के साथ कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया। राजा की सवारी के पीछे मदों का झरना बहाते हुए मदोन्मत्त हाथी झूम रहे थे जो प्रेम से राजा का अनुगमन करती हुई विन्ध्य की घाटी-से प्रतीत हो रहे थे। पीछे चलते हुए घोड़ों के पदाघातों से भाँती पृथ्वी राजा के वन्दियों का काम कर रही थी। सेना के पैरों से उठी हुई और आकाश में पहुँची हुई धूल के बड़े-बड़े गुब्बारों से इन्द्र के लिए विपक्षी पर्वतों को भ्रम उत्पन्न करते हुए राजा ने प्रस्थान किया॥११—१३॥ निरन्तर यात्रा करके दूसरे दिन प्रातःकाल राजा अपनी राजधानी में पहुँचा और पहली रात को सेनापति रुमण्वान् के घर विश्राम किया। दूसरे दिन चिरकालीन विरह से उत्सुक प्रजा के लिए महोत्सव के समान वह राजा अपनी प्रिया वासवदत्ता के साथ अपने भवन में पहुँचा। उस समय मार्ग के दोनों ओर से उत्सुक जनता राजा का दर्शन कर रही थी॥१४-१६॥ राजा के आगमन की प्रसन्नता से नगर की स्त्रियों ने मङ्गलमान प्रारंभ किया जिससे मालूम होता था कि मानों नगरी अपने स्वामी के आगमन की प्रसन्नता में मङ्गलमान कर रही है॥१७॥ महारानी वासवदत्ता के साथ उदयन को देखकर नगर की जनता शोक और क्षोभ से रहित होकर इस प्रकार प्रसन्न होकर नाचने लगी जैसे बिजली-सहित मेघों को देखकर मयूर नाच उठते हैं॥१८॥ नगरी के ऊँचे मकानों पर राजदर्शनार्थ खड़ी हुई रमणियों ने आकाश-गंगा में खिले हुए कमलों के समान अपने मुख-कमलों से सारे आकाश को घेर लिया॥१९॥ इस प्रकार नगर-यात्रा करता हुआ राजा उदयन दूसरी राजलक्ष्मी के समान वासवदत्ता के साथ राजप्रासाद में आया ॥२०॥ सेवा में आये हुए सामन्त-राजाओं से भरा हुआ बन्दियों और गायकों के गीत-स्वर से गूंजता हुआ राजप्रासाद ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अभी वह सोकर जगा हो॥२१॥ राजा के राजभवन में पहुँच जाने के बाद शीघ्र ही चंडमहासेन का बड़ा पुत्र गोपालक प्रतिहार और पुलिन्दक के साथ कौशाम्बी आ पहुँचा॥२२॥

२२८ कथासरित्सागर

२२८ कथासरित्सागर कृतप्रत्युद्गमं राज्ञा तमानन्दमिवापरम्। प्राप वासवदत्ता सा प्रहर्षोत्फुल्ललोचना ॥२३॥ अमुं भ्रातरमेतस्याः पश्यन्त्या मास्म मूर्च्छना। इत्येव तस्यास्तत्काल रुरोधाश्रु विलोचने ॥२४॥ पितृसन्देशवाक्यैश्च तेन प्रोत्साहिताय सा। मेने कृतार्थमात्मानं स्वजनेन समागतम् ॥२५॥ ततो यथावद्ववृधेस्तया वत्सेश्वरस्य च। व्यधो गोपालकोऽन्येद्युस्तयोद्वाह महोत्सवम् ॥२६॥ रतिहस्तलीनवोर्द्धिमिश्रमिव पल्लवमुज्ज्वलम्। पाणिं वासवदत्ताया सोऽथ वत्सेश्वरोऽग्रहीत् ॥२७॥ सापि प्रियकरस्पर्शसान्द्राम्वननिमीलिता। सकम्पस्वेददिग्धाङ्गी गाढरोमाञ्चकञ्चिता ॥२८॥ सुसमोहमवाप्यन्यवाक्यास्मैनिरन्तरे विद्धेव पुष्पचापेन सद्य एव समलक्ष्यत ॥२९॥ दृष्टिं धूमामिताम्राक्षां तस्या वह्निं प्रदक्षिणे। मदिरा मध्माधुर्यसूत्रपातमिवाकरोत् ॥३ ॥ गोपाल्कार्पिते रत्ने राज्ञा चोपायनैस्तदा। पूर्णकोशो बभौ सत्यां वत्सक्षो राजराजताम् ॥३१॥ निर्वर्तितविवाहो तानादौ लोकस्य पश्यतः। वधूवरौ विविशतुः पश्चात्स्वं वासवेश्मनि ॥३२॥ अथ सम्मामयामास पट्टबन्धादिना स्वयम्। निजोत्सवे वत्सराजो गोपालकपुमिन्दको ॥३३॥ राज्ञां सम्माननार्थं च पौराणां च यथोचितम्। योगन्धरायणस्तेन हम्बजांश्च न्ययुज्यत ॥३४॥ तोऽब्रवीद्रुमण्वन्तमेव यौगन्धरायणः। ज्ञा कष्टे नियुक्तो स्त्वो लोकचित्तं हि दुर्ग्रहम् ॥३५॥ अरन्जितश्च बालोऽपि रोषमुत्पादमवृधुकम्। तथा च शुश्विमा बालबिनष्टककथां सखे ॥३६॥

द्वितीय लम्बक २२९

द्वितीय लम्बक २२९ राजा ने आगे जाकर उसका स्वागत किया और उसके आ जाने पर आनन्द से खिले हुए लोचनोंवाली वासवदत्ता दूसरे आनन्द के समान भाई से मिली। भागी हुई वासवदत्ता को भाई के साथ लज्जा का अनुभव न करना पडे मानो इसीलिए उसकी आँखें प्रेमाश्रुओं से डबडबा आईं। पिता के सन्देश-वचनों से प्रोत्साहित वासवदत्ता ने अपने भाई से मिलकर अपने को कृतकृत्य समझा॥२३—२५॥

दूसरे दिन दोनों का विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। गोपालक सारे दिन विवाह-महोत्सव के प्रबन्ध में व्यस्त रहा। रतिरुपी लता से नवीन निकले हुए पल्लव के समान कोमल वासवदत्ता के हाथ को वत्सेश्वर ने ग्रहण किया। उदयन का स्पर्श होने पर वासवदत्ता उस स्पर्श के गम्भीर आनन्द में निमग्न हो गई। उसके सारे शरीर में कम्प और पसीना होने लगा। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो कामदेव ने सम्मोहन करनेवाले वायव्य और वारुण अस्त्रों की निरन्तर वर्षा से उसे बेध डाला हो (वायव्यास्त्र के प्रभाव से कम्प और वारुणास्त्र के प्रभाव से स्वेद बह रहा था।) ॥२६—२९॥

अग्नि की प्रदक्षिणा करते समय धुएं से कुछ लाल हुई आँखों में मानो मदिरा के मधुर नशे ने सूत्रपात कर दिया हो ऐसा प्रतीत हो रहा था॥३०॥

इस अवसर पर गोपालक द्वारा दिये गये रत्नों तथा अन्य मित्र-राजाओं के बहुमूल्य उपहारों से वत्सराज राजराज कुबेर-सा लग रहा था॥३१॥

विवाहित वे दोनों वर और वधू पहले तो दर्शकों की आँखों में प्रविष्ट हुए, पश्चात् अपने शयनागार में॥३२॥

तदनन्तर अपने विवाह-महोत्सव में राजा ने गोपालक और पुलिन्दक को भेंट देकर पट्टबन्ध आदि से सम्मानित किया॥३३॥

राजाओं तथा प्रतिष्ठित नागरिकों के सम्मान का कार्य यौगन्धरायण और रुमण्वान् को सौंपा गया था॥३४॥

इस अवसर पर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् से कहा कि 'राजा ने हमलोगों को बड़े ही कठिन कार्य पर नियुक्त किया है, क्योंकि सभी लोगों के चित्तों को प्रसन्न करना दुस्तर है॥३५॥

अप्रसन्न बालक भी मन में क्रोध और क्षोभ उत्पन्न कर देता है। इस सम्बन्ध में बाल- विनष्टक की कथा कहता हूँ सुनो॥३६॥

२४ कथासरित्सागर

२४ कथासरित्सागर बभूव रुद्रशर्माख्यः कश्चन ब्राह्मणः पुरा । बभूवतुश्च तस्य द्वे गृहिण्यो गृहमेधिनः ॥३७॥ एका सुतं प्रसूयैव तस्य पञ्चत्वमाययौ । तत्सुतोऽपरमातुश्च हस्त शेनापिष्ठोऽभवत् सः ॥३८॥ सा च किञ्चिद्विविदूष्यस्य रूक्षं तस्याशनं ददौ । सोऽपि तनाभवद् बालो धूसराङ्गः पृथूदरः ॥३९॥ मातृहीनस्त्वयायं मे कथं शिशुरुपेक्षितः । इति तामपरां पत्नीं रुद्रशर्मापि सोऽभ्यधात् ॥४०॥ सेव्यमानोऽपि हि स्नेहैरोगेन किमप्यसौ । किं करोम्यहमस्येति साध्यथ पतिमब्रवीत् ॥४१॥ नूनमेवस्वभावोऽयमिति मेने च स द्विजः । स्त्रीणामलीकमुग्धं हि वचः को मन्यते मृषा ॥४२॥ बाल एव विमष्टोऽयमिति बालविनष्टकः । नाम्ना स बालस्तत्र संवृद्धोऽभूत्पितुर्गृहे ॥४३॥ असावपरमाता मां कदयत्यति सर्वदा । वरं प्रतिक्रिया कांश्चिद्यतवेत्तस्या करोम्यहम् ॥४४॥ इति सञ्चिन्तयामास सोऽथ बालविनष्टकः । व्यतीतपञ्चषड्वर्षोऽपि वयसा बत बुद्धिमान् ॥४५॥ अथागतं राजकुलाज्जगाद पितरं रहः । तात द्वौ मम तातौ स्त इत्यविस्पष्टया गिरा ॥४६॥ एवं प्रत्यहमाह स्म स बालः सोऽपि तत्पिता । तां सोपपतिमाशङ्क्य भार्यां स्पर्शेऽप्यवर्जयत् ॥४७॥ सापि दध्यौ विना दोषं कस्मान्मे कुपितः पतिः । किञ्चिद् बालविनष्टेन कृतं किञ्चिद् भवेदिति ॥४८॥ सादरं स्नापयित्वा च दत्वा स्निग्धं च भोजनम् । कृत्योत्सङ्गे च पप्रच्छ सा तं बालविनष्टकम् ॥४९॥ पुत्र किं रोपितस्तातो रुद्रशर्मा त्वया मयि । तच्छ्रुत्वैव स तां बालो जगादापरमातरम् ॥५०॥ अतोऽधिकं ते दास्यामि न चेदद्यापि शाम्यसि । स्वपुत्रपोषिणी कस्मान्मां क्लिदनासि सर्वदा ॥५१॥

द्वितीय लम्बक २३१

द्वितीय लम्बक २३१ बाल-विनष्टक की कथा प्राचीन समय में रुद्रशर्मा नामक एक ब्राह्मण था। उस गृहस्थ की दो स्त्रियाँ थीं। उनमें से एक पुत्र प्रसव करके मर गई अतः रुद्रशर्मा ने उसके बालक को दूसरी माता के हाथ सौंप दिया ॥३७-३८॥ जब वह बालक कुछ बड़ा हुआ तब उसकी माता उसे रूखा-सूखा भोजन देने लगी। इसी कारण वह बालक धूमिल शरीरवाला और बड़े पेट (तोंद) वाला हो गया ॥३९॥ बालक की शारीरिक स्थिति देखकर रुद्रशर्मा ने उस पत्नी से कहा कि 'तूने इस मातृहीन बच्चे की उपेक्षा की है। उत्तर में उसने पति से कहा कि 'स्नेह से लालन-पालन करने पर भी यह ऐसा ही रहता है। इसके लिए मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहने पर रुद्रशर्मा ने समझा कि यह इस बालक की प्रकृति ही है। स्त्रियों के झूठे और मोहकारी वचनों को कौन नहीं मान जाता ? यह बालक ही विनष्ट है—वह बालक पिता के घर में बढ़ने लगा इसलिए उसका नाम ही बाल-विनष्टक पड़ गया। एक बार बालक ने सोचा कि यह मेरी माता मेरी दुर्दशा करती है और अपने पुत्र का भलीभाँति लालन-पालन करती है अतः मैं इसका बदला लूँगा। बाल- विनष्टक की अवस्था यद्यपि पाँच वर्ष की ही थी किन्तु बहुत बुद्धिमान् था ॥४०—४५॥ एक बार राजगृह से आये हुए अपने पिता को एकान्त में उसने अस्पष्ट स्वर में कहा— 'पिता ! मेरे दो पिता हैं। उसके कहने पर रुद्रशर्मा ने अपनी पत्नी को जारिणीवाला समझकर उससे स्पर्श करना भी छोड़ दिया। वह भी चिन्ता करने लगी कि 'मेरा पति सहसा कुपित क्यों है ? अवश्य ही इस बाल-विनष्टक ने कुछ किया होगा' ॥४६—४८॥ एक बार उसने बड़े ही प्रेम से बाल-विनष्टक को स्नान करा और सुन्दर तथा स्निग्ध आहार खिलाकर, उसे गोद में बैठाकर प्यार के साथ कहा— 'बेटा ! तुमने अपने पिता रुद्रशर्मा को मुझपर कुपित क्यों करा दिया है ? यह सुनते ही बालक विमाता से कहने लगा। अभी मैं उनमें भी अधिक युद्ध करूँगा क्योंकि तुम अपने लड़के के ही पालन-पोषण में ध्यान देती हो और मुझे सदा कष्ट देती हो ॥४९-५१॥

तच्छ्रुत्वा प्रणता सा च क्षमापे शपथोत्तरम् । पुनर्नेवं करिष्यामि तत्प्रसादाय मे पतिम् ॥५२॥ ततः स बालोऽवादीत्तां तदार्थातस्य मत्पितुः । व्यादर्शं दर्शयत्वेका स्वञ्चेटी वेद्म्यहं परम् ॥५३॥ तथेत्युक्त्वा तया चेटी नियुक्ता रुद्रशर्मणः । आगतस्य क्षणात्तस्य दद्यामास दर्पणम् ॥५४॥ तत्र तस्य तत्काल प्रतिबिम्ब स दश्यन् । सोऽय द्वितीयस्तातो मे तातेत्याह स्म बालकः ॥५५॥ तच्छ्रुत्वा विगतशङ्कस्तामकारणदूषिताम् । पत्नीं प्रति प्रसन्नोऽभूद्रुद्रशर्मा तदैव सः ॥५६॥ एवमुत्पादयेद्दोष बालोऽपिविकृतिं गतः । तदय रञ्जनीयो न सम्यक्परिकरोऽखिलः ॥५७॥ इत्युक्त्वा सरुमण्वन्तः सोऽथ यौगन्धरायणः । सर्वं सम्मानयामास वत्सराजोत्सवे जनम् ॥५८॥ तथा च राजलोक तौ रञ्जयामासतुर्यथा । मदेकप्रवणावेताविति सर्वोऽप्यमन्यत ॥५९॥ तौ चाप्यपूजयद्राजा सचिवो स्वकरापितैः । वस्त्राङ्गरागाभरणद्रव्यैरिष्टैश्च सबसत्सकौ ॥६०॥ कृतोद्वाहोत्सवः सोऽथ युक्तो वत्सेश्वरस्तया । मनोरथफलान्येव मेने वासवदत्तया ॥६१॥ चिरादुद्गमित स्नेहात्सोऽप्यभूत्सततं तयोः । निशान्ताखिलचेष्टच्चक्रवर्त्तीतितुष्टयो रसक्रमः ॥६२॥ यथा यथा च दम्पत्यो प्रौढि परिणयो ययौ । तयोस्तथा तथा प्रेम नवीभावमिवाययौ ॥६३॥ गोपालकोऽथ थीवाहकतुं सन्देशतः पितुः । प्रययौ शीघ्रमभ्येति वत्सराजेन याचितः ॥६४॥ सोऽपि वत्सेश्वरो जातु चपलः पूर्वसङ्गताम् । गुप्तां विरचितां नाम मेनेऽन्तःपुरचारिकाम् ॥६५॥ तद्गोत्रस्खलितो देवी पादलग्न प्रसादयन् । ममे सुभगसाम्राज्यमभिषिक्तस्तदश्रुभिः ॥६६॥

द्वितीय लम्बक २३३

द्वितीय लम्बक २३३ उसका यह उत्तर सुनकर ब्राह्मणी सौगन्ध खाकर नम्रतापूर्वक उससे बोली—'अब मैं ऐसा न करूँगी। तुम मेरे पति को प्रसन्न करा दो। तब वह बालक बोला—'जब मेरे पिता आयें तब तुम्हारी दासी उसे एक शीशा दिखाये उसके बाद मैं सब कर दूँगा ॥५२-५३॥ उसकी विमाता ने दासी को इसके लिए तैयार किया। फलतः उसने यज्ञशर्मा के आते ही उसे शीशा दिखलाया ॥५४॥ उसी समय शीशे में अपने पिता के प्रतिबिम्ब को दिखाते हुए बालक ने कहा—'यही मेरा दूसरा पिता है' ॥५५॥ बालक की बात सुनकर ब्राह्मण शंका-रहित हो गया और निष्कारण दूषित अपनी पत्नी के प्रति प्रसन्न हो गया ॥५६॥ 'इस प्रकार एक बच्चा भी बिगड़कर दोष उत्पन्न कर सकता है'। अतः हम लोगों को इन सभी बालकों को प्रसन्न रखना चाहिए ॥५७॥ ऐसा कहकर रुमण्वान् के साथ यौगन्धरायण ने वत्सराज के विवाहोत्सव में सम्मिलित समस्त जनों का सावधानी से ऐसा स्वागत किया कि प्रत्येक व्यक्ति यही समझता कि सारा प्रबन्ध मेरे ही लिए हो रहा है ॥५८॥ अन्त में राजा ने यौगन्धरायण रुमण्वान् और वसन्तक को स्वयं उत्तमोत्तम वस्त्र आभूषण इत्र पान और ग्राम दान (जागीर) करके सादर पुरस्कृत किया (इनाम बाँटे) ॥५९॥ विवाह हो जाने पर वासवदत्ता से युक्त वत्सराज ने इसे अपने मनोरथों का फल समझा ॥६०॥ चिरकाल की प्रतीक्षा के उपरान्त उमड़ा हुआ उनका प्रेम प्रातःकाल के समय रात-भर के सन्तप्त चकवा-चकवी के समान सुखद हुआ ॥६१॥ उस दम्पती का प्रेम जैसे-जैसे प्रौढ़ होता गया वैसे-वैसे उसमें नवीनता आती गई ॥६२॥ गोपालक भी विवाहकर्त्ता पिता का सन्देश पाकर वत्सराज से पुनः आने का निश्चय करके उज्जयिनी चला गया ॥६३॥ चंचल वृत्तिवाला वत्सराज रतिवास की विरचिता नाम की दासी से गुप्त प्रेम करता था। अतः कभी भ्रम में उसका नाम लेने के कारण कुपित वासवदत्ता के चरणों पर गिरकर उसे प्रसन्न करता हुआ और उसके आँसुओं से सींचा जाता हुआ अपने को सौभाग्य-साम्राज्य में अभिषिक्त समझता था ॥६५-६६॥ ३

२३४ कथासरित्सागर

२३४ कथासरित्सागर किं च बन्धुमतीं नाम राजपुत्रीं भुजार्जिताम्। गोपालकेन प्रहितां कन्यां देव्या उपायनम् ॥६७॥ तया मञ्जुलिकेत्येव नाम्नान्येनैव गोपिताम्। अपरामिव लावण्यमलङ्घरद्गतां श्रियम् ॥६८॥ वसन्तकसहायः संवृष्टदोषानलसागृहः। गान्धर्वविधिना गुप्तमुपयेमे स भूपतिः ॥६९॥ तच्च वासवदत्तास्य ददर्श निभृतस्थिता। प्रचुकोप च रूढया च सा निनाय वसन्तकम् ॥७०॥ तत प्रव्राजिकां तस्याः सखीं पितृकुलागताम्। स सांकृत्यायनीं१ नाम शरणं शिश्रिये नृपः ॥७१॥ सा तां प्रसाद्य महिषीं तया नैव कृताज्ञया। ददौ बन्धुमतीं राज्ञे पेशलं हि सतीमनः ॥७२॥ ततस्तं बन्धनाद्देवी सा मुमोच वसन्तकम्। स चागत्याग्रतो राज्ञीं हसन्निति जगाद ताम् ॥७३॥ बन्धुमत्यापराधः च किं मया देवि तः कृतम्। डुण्डुभेषु प्रहरथ क्रुद्धः यूयमहीन्प्रति ॥७४॥ एतद्द्वजमुपमानं मे व्याचक्ष्वेति कुतूहलात्। देव्या पृष्टस्तया सोऽथ पुनराह वसन्तकः ॥७५॥ पुरा कोऽपि रुरुर्नाम मुनिपुत्रो यदृच्छया। परिभ्रमन्ददर्शैकां कन्यामद्भूतदर्शनाम् ॥७६॥ विद्याधरात्समुत्पन्नां मेनकायां द्युयोषिति। स्थूलकेशेन मुनिना बर्धितामाश्रमे निजे ॥७७॥ सा च प्रमद्वरा नाम दृष्टा तस्य रुरोर्मनः। जहार सोऽथ गत्वा तां स्थूलकेशादयाचत ॥७८॥ स्थूलकेशोऽपि तां तस्मै प्रतिशुश्राव कन्यकाम्। आसन्नः च विवाहः साकस्माद्दष्टवामहिः ॥७९॥ तत्रो विषण्णहृदयः शुश्रावर्मा गिरं दिवि। एतां क्षीणामुप प्राहान् म्न्यायुषोऽद्धैः जीवय ॥८०॥ १ राजान्तःपुरे राज्ञीनां धर्मोपदेशाय प्रव्राजिकावचेनप्रौढाः, काषायावसनाः, विधवा स्त्रियः तिष्ठन्तिस्म्यति प्रायो दृश्यते।

द्वितीय लम्बक ११५

द्वितीय लम्बक ११५ इसके अतिरिक्त गोपालक द्वारा वासवदत्ता के लिए उपहार में भेजी हुई बन्धुमती नाम की राजकुमारी को वत्सराज ने गान्धर्व विधि से विवाहित किया। उसे मंजुक्षिका के नाम से छिपाकर भेजा गया था। वह लावण्य-समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी के समान सुन्दर थी। इस गुप्त विवाह को वासवदत्ता ने छिपकर देख लिया था। फलतः उस कार्य के प्रधान आयोजक वसन्तक पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुई और उसे बँधवाकर ले गई॥६७-७० ॥ तब राजा ने वासवदत्ता के पितृकुल से आई हुई सांकृत्यायनी नाम की परिव्राजिका की शरण ली॥७१॥ राजा ने परिव्राजिका को प्रसन्न करके महारानी को मनाया। परिव्राजिका की आज्ञा से वासवदत्ता ने बन्धुमती को राजा के लिए दे दिया और वसन्तक को कैद से मुक्त कर दिया। सती स्त्रियों का हृदय कोमल होता है॥७२॥ बन्धन से छूटने पर विदूषक वसन्तक ने हँसते हुए कहा कि अपराध तो बन्धुमती ने (विवाह कराकर) किया मैंने क्या किया (जो कैद किया गया) ? विषधर साँपों का क्रोध बेचारे डेंडहों (पानी के निर्विष साँपों) पर निकालती हो ॥७३-७४॥ उसके यह कहने पर वासवदत्ता ने कौतुक से पूछा—इस उदाहरण को विस्तृत रूप से समझाओ ॥७५॥ रुरु और प्रमद्वरा की कथा वसन्तक ने समझाते हुए फिर कहा—प्राचीन समय में रुरुकुमार नाम का एक मुनिकुमार था। उसने भ्रमण करते हुए एक अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखा॥७६॥ वह कन्या किसी विद्याधर द्वारा स्वर्गीय अप्सरा मेनका से उत्पन्न की गई थी और स्थूलकेशा नाम के ऋषि ने अपने आश्रम में उसका पालन-पोषण किया था॥७७॥ उस रुरुनामक ऋषिकुमार ने उस प्रमद्वरा नाम की कन्या को स्थूलकेशा ऋषि से माँगा क्योंकि उस कन्या ने उसका मन हर लिया था॥७८॥ स्थूलकेशा ने भी उसे कन्या देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु विवाह-समय के निकट ही उस कन्या को सर्प ने काट लिया था॥७९॥ तब दुःखी ऋषिकुमार ने आकाशवाणी सुनी कि 'तुम अपनी आयुष्य का आधा भाग देकर इसे जीवि करो अन्यथा इसकी आयु क्षीण हो चुकी है' ॥८० ॥

२३६ कथासरित्सागर

२३६ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा स ददौ तस्य तत्रार्द्धं निजायुषः । प्रत्युज्जिजीव सा तेन सोऽपि तां परिणीतवान् ॥८१॥ अथ क्रुद्धो रुरुर्नित्यं यं यं सर्पं ददर्श सः। तं तं जघान भार्या मे दष्टाऽमीभिर्भवेदिति ॥८२॥ अथैकस्तं जिघांसन्तं मर्त्यवानाह डुण्डुभः । अहिंस्यः कुपितो ब्रह्मन्हंसि त्वं डुण्डुभानकथम् ॥८३॥ अहिना ते प्रिया दष्टा विभिन्नो ह्यहिडुण्डुभौ । अहयः सविषाः सर्वे निर्विषा डुण्डुभा इति ॥८४॥ तच्छ्रुत्वा प्रत्यवादीत्स सखे को नु भवानिति । डुण्डुभोऽप्यवदद्ब्राह्मह शापच्युतो मुनिः ॥८५॥ भवत्संवादपर्यन्तः शापोऽयमभवच्च मे । इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्भूयस्तामब्रवीद्गुरुः ॥८६॥ तदेतदुपमानाय तव देवि मयोदितम् । डुण्डुभेषु प्रहरथ ऋद्धा यूयमहिष्विति ॥८७॥ एवमभिधाय वचनं सन्नर्माहास वसन्तके विरते । वासवदत्ता च प्रति तुतोष पार्श्वे स्थिता पत्युः ॥८८॥ इति मधुमधुराणि वत्सराजश्चरणगतः कुपितानुयापनानि । ससतमुदयनश्चकार देव्या विविधवसन्तकोक्तशतानि कामी ॥८९॥ रसना मदिरारसैकसिक्ता कलवीणारवरागिणी श्रुतिश्च । दयितामुखनिश्चला च दृष्टिः सुखिनस्तस्य सदा बभूव राज्ञः ॥९०॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बकेऽष्टमस्तरङ्गः समाप्तश्चायं कथामुखलम्बको द्वितीयः ।

द्वितीय लम्बक २१७

द्वितीय लम्बक २१७ ऐसा सुनकर ऋषिपुत्र ने अपनी आयु का आधा भाग देकर उसे जीवित किया और उसके साथ विवाह कर लिया ॥८१॥ विवाह के अनन्तर रुह मुनि सर्पों पर इतना क्रुद्ध हुआ कि वह जहाँ भी किसी सर्प को देखता था उसे मार डालता था—यह समझकर कि इन सर्पों ने मेरी प्रियतमा के प्राणों का हरण किया ॥८२॥ एक बार अपने को मारते हुए ऋषि को देखकर डुंडुभ (पानी का निर्विष साँप) मनुष्य की वाणी में बोला कि 'तुम साँपों पर क्रुद्ध हो तो हम डुंडुभों को क्यों मारते हो? तुम्हारी प्रियतमा को सर्प ने काटा है ॥८३॥ सर्प और डुंडुभ दोनों पृथक् जातियाँ हैं। अहि (सर्प) सदा विषवाले और डंडुभ सदा विष-हीन होते हैं। यह दोनों में भेद है। तब रुह ने उससे पूछा कि 'तुम कौन हो? उत्तर में उसने कहा—'मैं शाप के कारण पतित मुनि हूँ। यह शाप तुमसे वार्तालाप करने तक ही था। ऐसा कहकर उसके अन्तर्धान हो जान पर रुह ने डडुभों को मारना छोड़ दिया ॥८४-८५॥ महारानी ! यही मैंने उपमा के लिए आपसे कहा कि अहियों पर क्रुद्ध आप डुंडुभों को व्यर्थ मारती हैं॥८७॥ इस प्रकार विनोद-मिश्रित हास्य के साथ कहकर वसन्तक के चले आने पर पति के साथ बैठी हुई वासवदत्ता उसके प्रति सन्तुष्ट हुई ॥८८॥ इस प्रकार कामी उदयन कुपिता वासवदत्ता के चरणों में मधुर-मधुर याचना (प्रार्थना) करता हुआ विदूषक वसन्तक के हास्य-कौतकों से रंजित होकर देवी वासवदत्ता के साथ समय व्यतीत करने लगा ॥८९॥ उस सुखी राजा की रसना सदा मद्य में निरत कान वीणा की मधुर झंकारों में तल्लीन और दृष्टि सदा वासवदत्ता के मुख पर निश्चल रहती थी ॥९ ॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर का कथामृत नामक द्वितीय लम्बक समाप्त।

लावानको नाम तृतीयो लम्बकः

लावानको नाम तृतीयो लम्बकः इव गुणगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति यं विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति बन्धुरीं भुवि भवप्रसादेन त ॥ प्रथमस्तरङ्गः राज्ञ उदयमस्य कथा (पूर्वानुवृत्त) निर्विघ्नविश्वनिर्माणसिद्धये यदनुग्रहम्। मय स वव्रे धातापि तस्मै विघ्नजिते नमः॥१॥ आश्लिष्यमाणः प्रियया शत्रूरोऽपि यदाज्ञया। उत्क्रमते स भुवनं जयत्यसमसायकः॥२॥ एव स राजा वत्सशः क्रमेण सुतरामभूत्। प्राप्तवासवदत्तत्सुखासक्तैकमानसः ॥३॥ यौगन्धरायणश्चास्य महामन्त्री दिवानिशम्। सेनापती रुमण्वंश्च राज्यभारमुदूहतुः ॥४॥ स कदाचिच्च चिन्तावानानीय रजनौ गृहम्। निजगाद रुमण्वन्तं मन्त्री यौगन्धरायणः ॥५॥ पाण्डवान्वयजातोऽयं वत्सराजोऽस्य च मेदिनी। कुलक्रमागतं कृत्स्ना पुरं च गजसाह्वयम् ॥६॥ तत्सर्वमजिगीषेण त्यक्तमेतेन भूभृता। इहैव चास्य सञ्जातं राज्यमल्पे मण्डलम्॥७॥ स्त्रीपद्यमृगयासक्तो निश्चिन्तोऽद्यैव तिष्ठति। अस्मासु राज्यचिन्ता च सर्वानैव समर्पिता ॥८॥ तदस्माभिः स्वबुद्धयैव तथा कार्यं यथैव तत्। समग्रपृथिवीराज्यं प्राप्नोत्येष क्रमागतम् ॥९॥ एवं कृते हि भक्तिश्च मन्त्रिता च कृता भवेत्। सर्वं च साध्यते बुद्ध्या तथा चैतां कथां शृणु॥१०॥ १ हस्तिनापुर मित्यर्थः। २ धीर ललित नायक स्वस्यामिदमतिनिश्चिन्तो मुहुदर्शितं कलापरो वीरकलित स्यात्