कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक ३११
तृतीय लम्बक ३११ तुम्हारे पूर्वज पांडवों ने भी पूर्व की दिशा से ही विजय प्रारम्भ की थी और गंगातटवर्ती हस्तिनापुर को राजधानी बनाया था क्योंकि साम्राज्य पौरुष के अधीन है, उसमें किसी देश- विशेष का कोई महत्त्व नहीं है॥६३-६४॥ यौगन्धरायण के इस प्रकार कहकर चुप हो जाने पर राजा उदयन पुरुषार्थ को बहुमान देने के कारण बोला—यह सत्य है कि देश-विशेष साम्राज्य का कारण नहीं होता। उच्च कोटि के व्यक्तियों के सम्पत्ति प्राप्त करने में अपना पुरुषार्थ ही एकमात्र कारण है॥६५-६६॥ किन्तु बलवान् उच्च व्यक्ति आश्रयहीन होकर भी लक्ष्मी प्राप्त करता है। क्या आपलोगों ने सत्त्ववान् (जीवनवाले) व्यक्ति की कथा नहीं सुनी है ? ॥६७॥ इतना कहकर मन्त्रियों से प्रार्थित वत्सराज ने महारानियों के सामने ही कथा कहना प्रारम्भ किया॥६८॥ वीर विदूषक ब्राह्मण की कथा समस्त भूतल में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। पूर्व समय में उसमें आदित्यसेन नाम का राजा राज्य करता था ॥६९॥ आदित्य के ही समान महाप्रतापी आदित्यसेन का रथ भी कभी कहीं रुकता न था॥७०॥ चन्द्रमा के समान उस राजा का छत्र ऊँचा होने पर अन्य सभी राजाओं के छत्र दूर हो जाते थे क्योंकि उन (राजाओं) की गर्मी शान्त हो जाती थी। वह राजा भूतल में प्राप्त हो सकनेवाले सभी भोगों का वैसे ही आश्रय-स्थान था जैसे समस्त रत्नों का आश्रय समुद्र होता है। वह राजा किसी समय यात्रा के लिए निकला और सेना के साथ गंगा के तट पर आकर ठहर गया। वहाँ ठहरे हुए राजा के समीप वहाँ का रहनेवाला गुप्तवर्मा नाम का कोई धनी साहूकार कन्यारत्न को उपहार-स्वरूप लेकर राजद्वार में उपस्थित हुआ॥७१-७४॥ वह द्वारपाल से बोला—देव ! यह तीनों लोकों की रत्न-स्वरूपा कन्या मेरे घर में उत्पन्न हुई है। इसे मैं अन्य कहीं प्रदान नहीं कर सकता। आप ही इस उपहार के योग्य हैं। द्वारपाल से इस प्रकार निवेदन कराकर गुप्तवर्मा ने राजा को अपनी कन्या दिखाई। स्नेहापूर्ण राजा उसके कामाग्नि के समान सौन्दर्य-प्रभाव में पिघलकर पानी-पानी हो गया॥७५-७८॥
३१२ कथासरित्सागर
३१२ कथासरित्सागर स्वीकुर्वतो च तत्पाल महाब्धोपशोभिताम्। चकार गुणवर्माणं परितुष्यात्मनः समम् ॥७९॥ अतस्तां परिणीय प्रियां तेजस्वतीं भूपः। श्लाघमानी स तया मायमुज्जयिनीं ययौ ॥८०॥ तत्र तन्मुखसक्तैकदृष्टी राजा ह्यभूतया। न्ददर्श राजकार्याणि न यथा सुमहाम्यपि ॥८१॥ तजस्वतीदृशलापकीलितेव त्रिल धृतिः। माघमप्रप्रजानन्दस्तस्यात्राङ्गुतमशक्यत ॥८२॥ धिरप्रविष्टो निर्गान्ध मोन्त'पुरान्नृपः। निरगादरिवर्गस्य हृदयातु रुजाम्बरः ॥८३॥ कालेन तस्य जज्ञे च राज्ञः सर्वानिनन्दिता। कन्या तेजस्वती देव्यां बुद्धौ च विजिगीषुता ॥८४॥ परमाद्भुतरूपा सा तृणीकृत्य जगत्त्रयम्। हृपं तस्याकरोत्कन्या प्रताप च जिगीषुता ॥८५॥ अथाभियोक्तुमुत्सिक्तः सामन्त कश्चिदेकदा। आदित्यसेनः प्रययावुज्जयिन्याः स भूपतिः ॥८६॥ तां च तेजस्वतीं राज्ञीं समास्कन्दकरेणुकाम्। सहप्रयायिनीं चक्रे सम्यक्स्याश्चिदेवताम् ॥८७॥ आरुरोह वराश्वं च दर्पोद्यमंनिश्ररम्। जङ्गमाद्रिनिभं शृङ्गं स श्रीवृक्षं समेखलम् ॥८८॥ आसुत्कोत्थितपादाभ्यामभ्यस्यन्तमिवान्बर । गति गरुत्मतो दृष्ट्वा वेगसद्ब्रह्मचारिणः ॥८९॥ जवस्य मम पर्याप्ता कि नु स्यादिति मेदिनीम्। कथयन्तमिवोन्नम्य कन्धरां धीरया दृशा ॥९०॥ किंचिद् गत्वा च सम्प्राप्य समां भूमि स भूपतिः। अश्वमुत्तजयामास तेजस्वत्याः प्रवक्षयन् ॥९१॥ सोऽश्वस्तत्पाणिघातेन यन्त्रेणेवैरित शरः। जगाम क्ष्वाप्यतिजवादलक्ष्यो लोकलोचनै ॥९२॥ १ श्रीवृक्ष-इत्यश्वजातिः। पर्वत पक्षे श्री वृक्षो विश्वद्रुमः, अन्य पक्षेण रोमावली।
तृतीय लम्बक ११५
तृतीय लम्बक ११५ वह तेजस्वती नाम की कन्या अपनी उज्ज्वल कान्ति से दिशाओं को ऐसे प्रकाशित कर रही थी मानों कामदेव के मंगल-भवन की रत्नदीप-शिखा हो। आदित्यसेन ने महारानी-पद के योग्य उस कन्या को ग्रहण कर और प्रसन्न होकर गुणवर्मा को अपने समान राजा बना दिया ॥७९॥
राजा ने उसके साथ विवाह करके अपने को कृत-कृत्य समझा और उसे लेकर उज्जयिनी आया ॥८० ॥
उज्जयिनी आकर राजा रात-दिन उसका मुंह निहारने में ही लगा रहता था। इसी कारण राज्य-सम्बन्धी बड़े-बड़े कार्यों को भी देखता न था ॥८१॥
तेजस्वती के मधुर वचनों से कीलित राजा के कानों को दुःखित प्रजा का चीत्कार-शब्द अपनी ओर आकृष्ट न कर सका ॥८२॥
बहुत काल से अन्तःपुर में गया हुआ राजा बाहर न निकला किन्तु उसकी इस स्थिति से शत्रुओं के हृदय का भय निकल गया ॥८३॥
कुछ समय के अनन्तर उस राजा से महादेवी में अति सुन्दरी कन्या और बुद्धि में विजय करने की इच्छा उत्पन्न हुई ॥८४॥
तदनन्तर राजा किसी विद्रोही सामन्त-राजा पर चढ़ाई करने के लिए उज्जयिनी से बाहर निकला। उसके साथ हथनी पर चढ़ी हुई महारानी तेजस्वती भी सेना के देवता के समान चली। राजा हर्ष से पसीने के झरने बहाते हुए, जंगम पर्वत के समान शीघ्रजङ्घ नाम के घोड़े पर सवार हुआ। कुछ दूर जाकर समतल भूमि मिलने पर राजा ने तेजस्वती को अपना कोशल दिखाने के लिए घोड़े को तेज कर दिया। जिस प्रकार यन्त्र से फेंका हुआ बाण सरसराकर वेग से जाता है, उसी प्रकार राजा की जाँघों से प्रेरित वह घोड़ा तीर के समान उड़ चला और लोगों की आँखों से ओझल हो गया ॥८५ २॥ ४
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तृतीय लम्बक ३१५
तृतीय लम्बक ३१५ इस कारण व्याकुल मन्त्रिव्रन्द इस घटना को अनिष्ट समझ कर सेनाओं के साथ उज्जयिनी लौट आये ॥१३-१४॥ वहाँ आकर नगर-रक्षा के घेरे (परकोटे) के द्वारों को बन्द करके और उनकी रक्षा का प्रबन्ध करके प्रजा को आश्वासन देते रहे। उधर वह घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ राजा को भीषण सिंहों से भरे हुए विन्ध्याचल के घोर जंगल में ले गया। दैवयोग से उस घोड़े के सहसा रुकने पर राजा को चारों ओर दृष्टि फैलाने पर, दिशाओं का ज्ञान न रहा और वह भूख से व्याकुल हो गया ॥१५-१७॥ ऐसे समय कोई चारा न देखकर घोड़ों की नस्ल का जाननेवाला राजा घोड़े से नीचे उतर पड़ा और उसे प्रणाम करके बोला—हे ईश्वर ! तुम घोड़े नहीं वास्तव में देवता हो तुम्हारे ऐसे उच्च जाति के घोड़े स्वामी-द्रोह नहीं करते। यहाँ पर तुम ही मेरी शरण (रक्षक) हो। इसलिए मुझे कल्याण-मार्ग से ले जाओ। पूर्वजन्म का स्मरण करता हुआ घोड़ा मन में पछताता हुआ राजा की बात मान गया। उच्चैः (कुलीन) घोड़े सचमुच देवता ही होते हैं ॥१८-२ ०॥ तब राजा के पुनः सवार होने पर वह घोड़ा स्वच्छ शीतल जल से भरे हुए और मार्गों श्रम को दूर करनेवाले रास्ते से चला ॥२१॥ सायंकाल तक चार सौ कोस की दूरी पर उज्जयिनी के समीप उसने राजा को पहुँचा दिया ॥२२॥ सायंकाल होने पर जबकि अँधेरा फैलने लगा उज्जैन नगर के द्वार बन्द हो गये और उस घोड़े के वेग से अपने घोड़ों के पराजित हो जाने की लज्जा से मानो सूर्य के अस्ताचल की कन्दरा में छिप जाने पर वह घोड़ा नगरी के बाहर रात में भीषण दीखनेवाले श्मशान में राजा को ले गया। बुद्धिमान् घोड़ा राजा को ठहराने के लिए श्मशान के समीप एक ब्राह्मण के शून्य मठ में ले गया ॥२३-२५॥ राजा ने उस मठ को रात बिताने के योग्य देखकर उसमें प्रवेश किया राजा का घोड़ा थक गया था ॥२६॥ यह श्मशान का रक्षक सिपाही है या चोर है ऐसा कहकर उस मठावासी ब्राह्मण ने राजा को अन्दर जाने से रोका ॥२७॥
५१६ कथासरित्सागर
५१६ कथासरित्सागर निर्ययुस्ते च ससक्तबर्हा ल्लोरनिट्टराः । भयकाश्यपकोपानां गृहं हि च्छान्दसा द्विजाः ॥१०८॥ विदूषक-ब्राह्मणस्य कथा रटत्सु तेषु तत्रेको निर्जगाम ततो मठात् । विदूषकाख्यो गुणवाधुर्यं सत्त्ववतां द्विजः ॥१०९॥ यो युवा बाहुशाली च तपसाराध्य पावकम् । प्राप खड्गोत्तमं सम्माद्ययातमात्रोपगामिनम् ॥११० ॥ स दृष्ट्वा तं निशि प्राप्तं धीरो भव्याकृतिं नृपम् । प्रच्छन्नः कोऽपि देवोऽयमिति दध्यौ विदूषकः ॥१११॥ विधूय विप्रांश्चान्यांस्तान्स सर्वाननुचिताशयः । नृपं प्रवेशयामास मठान्तः प्रश्रयानतः ॥११२॥ विश्रान्तस्य च दासीभिर्धौताङ्घ्रेरजसः क्षणात् । आहारं कल्पयामास राज्ञस्तस्य निजोचितम् ॥११३॥ स चापनीतपर्याणं तदीयं तुरगोत्तमम् । यवसादिप्रदानेन चकार विगतश्रमम् ॥११४॥ रक्षाम्यहं शरीरं ते तत्सुखं स्वपिहि प्रभो ! इत्युवाच च तं श्रान्तमास्तीर्णशयनं नृपम् ॥११५॥ सुप्ते च तस्मिन्द्वारस्थो जागरामास स द्विजः । चिन्तितोपस्थिताग्नेयखड्गहस्तोऽखिलां निशाम् ॥११६॥ प्रातश्च तस्य नृपतेः प्रबुद्धस्यैव स स्वयम् । अमुक्त एव तुरगं सज्जीचक्रे विदूषकः ॥११७॥ राजापि स तमामन्त्र्य समारुह्य च वाजिनम् । विवेशोज्जयिनीं दूराद्दृष्टो हर्षाकुलैर्जनैः ॥११८॥ प्रविष्टमभिजग्मुस्तं सर्वाः प्रकृतयः क्षणात् । तदागमनानन्दरूसातङ्करुत्कारजा ॥११९॥ आययौ राजभवनं स राजा सचिवान्वितः । ययौ तेजस्वती देव्या हृदयान्य महाज्वरः ॥१२० ॥ वाताहुतोत्सवाक्षिप्तपताकांशु कपङ्क्तिभि । उत्सारिता इवाभून्नगर्यास्तत्क्षणं शुषः ॥१२१॥
तृतीय लम्बक १३७
तृतीय लम्बक १३७ इस प्रकार लड़ते-झगड़ते वे लोभी और निष्ठुर ब्राह्मण मठ के बाहर निकल आये क्योंकि वेदपाठी ब्राह्मण स्वभावतः भय कठोरता और क्रोध के घर होते हैं॥१०८॥ उनके चिल्लाने पर उस मठ से एक गुणी और जीवन (जीवट) वाला विदूषक नाम के ब्राह्मण ने अग्नि-देवता की आराधना से ऐसा उत्तम खड्ग प्राप्त किया था जो स्मरण करते ही स्वयं हाथ में आ जाता था॥१०९-११०॥ उस धीर-वीर ब्राह्मण ने भव्य स्वरूपवाले राजा को देखकर सोचा कि यह कोई देवता आया है॥१११॥ वह सब अनुचित विचार रखनेवाले उन मूर्ख ब्राह्मणों को दूर करके (हटाकर) नम्रता से स्वागत करता हुआ राजा को मठ में ले गया ॥११२॥ मठ में जाकर दासियों द्वारा रास्ते की धूल झाड़ने-पोंछने के अनन्तर उसने राजा के लिए उसके योग्य भोजन बनवाया। राजा के लिए भोजन आदि की व्यवस्था करके विदूषक ने स्वयं ही घोड़े की जीन-लगाम आदि खोलकर और उसे घास-दाना आदि देकर उसकी थकावट दूर कर दी॥११३-११४॥ बिस्तर पर लेटे हुए राजा से उसने कहा—स्वामि ! आप निश्चिन्त होकर सोइए, मैं रात-भर आपके शरीर की रक्षा करूँगा। ऐसा कहकर स्मरण-मात्र से आये हुए खड्ग को हाथ में लेकर वह सारी रात द्वार पर पहरा देता हुआ जागता रहा॥११५-११६॥ प्रातःकाल जैसे ही राजा उठा विदूषक ने स्वयं ही जाकर घोड़े की जीन-लगाम कसकर उसे तैयार कर दिया ॥११७॥ राजा भी विदूषक से मिलकर और घोड़े पर सवार होकर उज्जैन गया। वहाँ हर्ष भरे नागरिक आँखें फाड़-फाड़कर उसे देखने लगे ॥११८॥ राजा के नगर में प्रवेश करते ही उसके आगमन के आनन्द से विभोर नागरिक कोलाहल करते हुए राजा के समीप आये॥११९॥ तब वह राजा मन्त्रियों से घिरा हुआ राजभवन में गया और उधर रानी तेजस्वती के हृदय से महान् घोर-ज्वर निकल गया ॥१२०॥ राजा के पुनरागमन-महोत्सव के उपलक्ष्य में लगी हुई ध्वजाओं के वस्त्रा के वायु से हिलाये जाने के कारण मानों नगरी का सारा शोक झाड़-बुहारकर दूर कर दिया गया॥१२१॥
११८ कथासरित्सागर
११८ कथासरित्सागर अकरोदा न्दिनान्तं च देवी तावन्महोत्सवम् । यावन्नगरलोकोऽभूत्सर्वः सिन्दूरपिञ्जरः ॥१२२॥ अन्येद्युः स तमादित्यसेनो राजा विद्रूपकम् । मठादानाययामाम तस्मात् सर्वैर्द्विजैः सह ॥१२३॥ प्रस्थाप्य रात्रिद्वैसान्ते ददौ तस्मै च सत्कृतम् । विद्रूपकाय ग्रामाणां सहस्रमुपकारिणे ॥१२४॥ पौरोहित्ये च चक्रे तं प्रदत्तच्छत्रवाहनम् । विप्रं श्शतशो नृपतिः कौतुकालोकितो जनैः ॥१२५॥ एवं सर्वैव सामन्ततुल्यः सोऽभूद् विद्रूपकः । माषा हि नाम जायन्त महत्भूयकृतिः कुतः ॥१२६॥ यांश्च प्राप नृपाद् ग्रामांस्तान्सर्वान् स महाशयः । तमठाद्यर्थिमिर्विप्रैः समं साधारणान् व्यधात् ॥१२७॥ तस्थौ च सेवमानस्तं राजानं च तदाश्रितः । मुञ्चानश्च सहान्यैस्तद्ब्राह्मणैर्ग्राससञ्चयम् ॥१२८॥ काले गच्छति चान्ये ते सर्वे प्राधान्यमिच्छवः । भवं तं गणयामासुर्द्विजा धनमदोद्धताः ॥१२९॥ विमिश्रैः सप्त१ सख्या तैरकस्थानाश्रयैरपि । संख्यातीतरबाध्यन्त ग्रामा दुष्टैर्ग्रहैरिव ॥१३०॥ उज्झद्वत्सलेषु तेष्वासीदुदासीनो विद्रूपकः । अल्पभावपु धीराणामवज्ञैव हि शोभते ॥१३१॥ एकदा कलहासक्तान् बुद्ध्वा तानभ्युपाययौ । कश्चित्पञ्चवक्रधरो नाम विप्रः प्रकृतिनिष्ठुरः ॥१३२॥ परार्थस्यायवावद्युः काणोऽप्यम्लानदर्सनः । कुब्जोऽपि वाचि सुस्पष्टो विप्रस्तानित्यभाषत ॥१३३॥ प्राप्ता भिक्षाचरर्भूत्वा भवद्भिः श्रीरियं शठाः । तन्नाशयथ किं ग्रामानन्योन्यमसहष्णवः ॥१३४॥ विद्रूपकस्य दापोऽयं यन यूयमुपेक्षिताः । तत्तत्सङ्घमचिरात्पुनर्भिक्षां भ्रमिष्यथ ॥१३५॥ १ सप्तभिर्युहैरेक स्थानं स्थितैः प्रलयो भवतीति सिद्धान्तविरोधीतम् ।
तृतीय लम्बक १११९
तृतीय लम्बक १११९ उस दिन सबबेर (सारा दिन) महाराज उत्सव में मग्न रहे। जबतक सूर्य के साथ सारी नागरिक जनता सिन्दूर से लाल न हो गई, अर्थात् सायंसंध्या तक सामान्य प्रजा के उत्सव चलते रहे ॥१२२॥ दूसरे दिन राजा आदित्यसेन ने उस मठ से विदूषक व गाँव उसमें रहनेवाले सभी ब्राह्मणों को बुलवाया ॥१२३॥ सभा में रात का समस्त वृत्तान्त सुनाकर राजा ने उपकार करनेवाले विदूषक को एक हजार गाँव पुरस्कार (इनाम) में दिये। और उस उस उत्तम छत्र छाया व अपने पुरोहितों में नियुक्त करके लगाने के लिए छत्र और सवारी के लिए घोड़ा दिया। सभी सभासद् राजा की इस उदारता को आश्चर्य से देखने लगे ॥१२४-१२५॥ इस प्रकार वह ब्राह्मण उसी समय राजा के सामन्त के समान हो गया। सच है महान् व्यक्तियों का उपकार करना निष्फल नहीं होता ॥१२६॥ उस महान् हृदय विदूषक ने भी राजा से पाये हुए गाँवों को मठ में रहनेवाले सभी ब्राह्मणों में समान भाव से बाँट दिया। और स्वयं राजा का आश्रित होकर उसकी सभा में रहने लगा एवं उन सभी ब्राह्मणों के साथ गाँव की आय द्वारा समान रूप से जीवन-निर्वाह करने लगा ॥१२७-१२८॥ कुछ समय के अनन्तर बिना परिश्रम प्राप्त राजवृत्ति की आय से मदोन्मत्त वे सभी मठ- वासी ब्राह्मण अपनी-अपनी प्रधानता चाहते हुए परस्पर झगड़ने लगे। उसमें दुष्ट ग्रहों के समान सात ब्राह्मण एक गुट बनाकर गाँवों के कार्यों में बाधा पहुँचाने लगे। उन ब्राह्मणों की इस प्रकार उच्छृंखलता करने पर विदूषक उदासीन (तटस्थ) हो गया। धैर्यशाली व्यक्तियों के लिए छोटी-छोटी बातों में तटस्थता ही अच्छी रहती है ॥१२९-१३१॥ इस प्रकार जब वे आपस में झगड़ रहे थे तब चण्डपार नाम का एक शठ कपटी ब्राह्मण मठ में आया। वह (ब्राह्मण) काना होने पर भी दूसरे के न्याय के लिए स्पष्ट दृष्टा था और कुबड़ा होने पर भी वाणी से स्पष्ट बोलता था ॥१३२-१३३॥ वह उनसे बोला—'अरे मूर्खो ! तुम भिखमंगों ने किसी तरह यह महती (सम्पत्ति) प्राप्त की है, उसे आपस में लड़कर क्यों नष्ट कर रहे हो। यदि इस प्रकार लड़ोगे तो फिर भीख मांगोगे ॥१३४-१३५॥ १. सृष्टि के प्रारम्भ में सात ग्रह एक राशि में थे और प्रलयकाल में भी वे एक राशि में एकत्र होंगे—ऐसा ज्योतिष-सिद्धान्तवादियों का मत है। ज्योतिष-सिद्धान्त में अनेक कारणों का एक राशि पर एकत्र होना अनिष्टकारी होता है।
५२ कथारित्सागर
५२ कथारित्सागर वरं हि दवायतेतबुद्धिस्थानमनायकम्। न तु विप्लुतसर्वार्थं विभिन्नबहुनायकम्॥१३६॥ तदेकं नायकं धीरं कुरुध्वं वचसा मम। स्थिरया यदि कृत्यं वो भूयश्चिकित्सया धिया॥१३७॥ तच्छ्रुत्वा नायकत्वं ते सर्वेऽप्यच्छन्यदात्मनः। तदा विचिन्त्य मूढांस्तान्पुनश्चक्रधरोऽब्रवीत् ॥१३८॥ सङ्कल्पशालिनां तर्हि समयं वो वदाम्यहम्। इतः श्मशानं शूलायां मद्यच्चौरा निषूदिताः॥१३९॥ नासास्तेषां निशि च्छित्त्वा यः सुसत्त्व इहानयेत्। स युष्माकं प्रधानः स्याद् वीरो हि स्वाम्यमर्हति॥१४०॥ इति चक्रधरेणोक्तान् विप्रांस्तानन्तिकस्थितः। कुरुध्वमेतत् को दोष इत्युवाच विदूषकः॥१४१॥ ततस्तमप्यवदन्विप्रा नैतत्कर्त्तुं क्षमा वयम्। यो वा शक्तः स कुरुतां समये च वयं स्थिताः॥१४२॥ ततो विदूषकोऽवादीदहमेतत्करोमि भोः। आनयामि निशि च्छित्त्वा नासास्तेषां श्मशानतः॥१४३॥ ततस्तद्दुष्करं मत्वा तेऽपि मूढास्तमब्रुवन्। एवं कृते त्वमस्माकं स्वामी नियम एष नः॥१४४॥ इत्येवास्थाप्य समयं प्राप्तायां रजनौ च तान्। आमन्त्र्य विप्रान् प्रययौ श्मशानं स विदूषकः॥१४५॥ प्रविवेश च तद्वीरो निजं कर्मेव भीषणम्। चिन्तितोपस्थितानेककपाशैकपरिग्रहम् ॥१४६॥ डाकिनीनादसबुद्गुध्रवायस-वाशिते । उल्कामुखमुखोल्काग्निबिस्फारितचितानले ॥१४७॥ ददर्श तत्र मध्ये च स तान् शूलाधिरोपितान्। पुंश्चालांसिकाच्छेदमियेबोर्धीकृताननान् ॥१४८॥ यावच्च निकटं तेषां प्राप तावत्तयोऽपि ते। यतान्नाधिष्ठितास्तस्मिन्प्रहरन्ति स्म मुष्टिभिः॥१४९॥ निष्कंप्य एव खड्गेन सोऽपि प्रतिजघान तान्। न विक्षितं प्रयत्नो हि धीराणां हृदये भिया॥१५०॥
तृतीय लम्बक १२१
तृतीय लम्बक १२१ बिना नेता का और भाग्य के आधार पर छोड़ा हुआ एक स्थान अच्छा है किन्तु सर्वनाश करनेवाले बहुत नेताओं का होना अच्छा नहीं ॥१३६॥ यह विदूषक का दोष है कि उसने तुमलोगों की उपेक्षा करके तुम्हें स्वतन्त्र छोड़ दिया। इसलिए मेरे कहने से किसी एक को नेता बना लो इसके द्वारा तुम्हारी सम्पत्ति स्थिर रहेगी और बढ़ती रहेगी। चक्रधर के ऐसा कहने पर वे सभी अपने-अपने को नेता मानने के लिए तैयार हुए। तब चक्रधर ने उन्हें महामूर्ख समझ कर कहा—आपस में लड़ते हुए तुमलोगों के लिए मैं शर्त निश्चित करता हूँ यहाँ के श्मशान में फाँसी से मारे गये तीन चोर झूल रहे हैं॥१३७-१३९॥ उन तीनों की नाक काटकर जो वीर ले आये वह तुममें प्रधान (नेता) हो सकता क्योंकि वीर ही स्वामी बन सकता है ॥१४० ॥ चक्रधर द्वारा इस प्रकार कहे गये ब्राह्मणों को विदूषक ने कहा—'इस शर्त को मान लो क्या हानि है' ? ॥१४१॥ इस कार्य के करने में असमर्थ वे बोले—'हम यह नहीं कर सकते जो समर्थ हो वह करे, हम शर्त मानने को तैयार हैं। तब विदूषक बोला—'मैं यह कार्य करता हूँ। रात को श्मशान से उनकी नाक काटकर लाता हूँ ॥१४२-१४३॥ तब वे मूर्ख उससे बोल उठे—'ऐसा करने पर तुम हमारे नेता बनोगे—इस निश्चय पर हम दृढ़ हैं'॥१४४॥ इस प्रकार शर्त लगाकर रात आने पर उन ब्राह्मणों से कहकर विदूषक श्मशान में गया ॥१४५॥ स्मरण करते ही उपस्थित होनेवाले खड्ग को हाथ में लेकर अपने रूप के समान भीषण श्मशान में गया ॥१४६॥ डाकिनी शाकिनी आदि के शब्दों से युक्त चीख और कौआ के शब्दों से भीषण मुँह से आग उगलते हुए गीदड़ों की वह्नि-ज्वाला से फैलती हुई चिता-वह्नि से डरावने उस श्मशान के बीच उसने सूली पर चढ़े हुए, नाक कटने के भय से मानों ऊपर की ओर मुँह किये हुए, तीन चोरों को देखा ॥१४७-१४८॥ विदूषक जब उनके समीप पहुँचा तब वैतालों से आक्रान्त वे तीनों मुर्दे उसे मुक्कों से मारने लगे ॥१४९॥ निडर विदूषक ने भी उन्हें खड्ग से मारा। यह सच है कि वीर पुरुषों के हृदय भय से विचलित ही नहीं होते ॥१५० ॥ ४१
१२२ कथासरित्सागर
१२२ कथासरित्सागर तत्रापश्यत्कन्यकाविशालनेत्रां स भामिनीम् । तस्यां परमं बद्ध्वा च कृतो जगद् वाममि ॥५१॥ आगच्छन्त्य दर्पोव शपम्योपरि सस्थितम् प्रद्याज दमगानत्र जपन्' म विदूषक ॥५२॥ तस्यष्णोवनवागानुकादुपगम्य तम् । प्रच्छन्न पृच्छन्नम्य तस्यो प्रद्याजगम्य म ॥५३॥ क्षणात् प्रद्याजगम्याप पूवाग मुसवागश । निर्गाप्य मुरागग्य उराका माभेच्य गरेणा ॥५४॥ गृणोता गगाम्तांग म परिग्राजगता । उपाय माद्यामाम शय गानिकतन तम् ॥५५॥ उत्रिग्म पोमाखनाणपिष्ठित शर । आगगा प मग्यप स्वग्य प्रद्याजरोज ग ॥५६॥ तगगन्ध गगा गनु प्रयुग ता । रिगार्ता म मजामग्यदगाणित ॥५७॥
तृतीय लम्बक ३२३
तृतीय लम्बक ३२३ तलवार की मार से बैताल मुर्दों को छोड़कर भाग गये बैतालों का पावेश हट जाने पर विद्रूपक ने उन तीनों चोरों की नाक काट ली और उन्हें एक वस्त्र-खण्ड में बाँध लिया ।।१५१।। वहाँ से लौटते हुए विद्रूपक ने श्मशान में मुर्दे पर बैठकर जप करते हुए एक प्रव्राजक (साधु) को देखा ।।१५२।। विद्रूपक उसकी चेष्टा और कार्यक्रम देखने की लालसा से उसकी पीठ की ओर आकर छिप गया ।।१५३।। कुछ ही समय के अनन्तर मुर्दे ने साबर के नीचे फूत्कार किया उसके मुंह से अग्नि की ज्वाला और नाभि से सरसों निकले ।।१५४।। साधक संन्यासी ने सरसों के उन दानों को हाथ में ले लिया और उठकर मुर्दे को थप्पड़ मारा ।।१५५।। तदनन्तर वैताल से आविष्ट वह मुर्दा उठा और वह साधक उसके ही कन्धे पर बैठ गया। उसपर चढ़कर वह सहसा चलने लगा तो कौतूहलवश विद्रूपक भी छिपे-छिपे उसकी पीठ के पीछे चला। कुछ ही दूर जाने पर साधु, दुर्गा की मूर्तिवाले शून्य मन्दिर के अन्तर्गृह में गया और वह वैतालवाला शव भूमि पर गिर गया ।।१५६-१५९।। विद्रूपक भी मूर्ति से छिपकर उसकी गति-विधि देखता रहा। साधक ने देवी की पूजा करके प्रार्थना की—हे देवि यदि तुम मुझपर प्रसन्न हो तो मुझे मेरा इच्छित वर प्रदान करो। नहीं तो मैं अपना बलिदान करके तुम्हें प्रसन्न करता हूँ ।।१६०-१६१।। उस कठोर सङ्कल्पभावना से पवित्र उस साध को उस गर्भगृह से निकली हुई वाणी ने कहा—'राजा दाशिद्यसेन की लड़की को लाकर उसका बलिदान करो तो तुम अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकते हो' ।।१६२-१६३।। यह सुनकर उस साधक ने बाहर निकल कर उस मुर्दे को फिर थप्पड़ लगाकर जगाया और वह नृत्य करने लगा ।।१६४।।
१२४ कथासरित्सागर
१२४ कथासरित्सागर
तस्य च स्कन्धमारुह्य निर्यद्वक्त्रामलाधिपः । आनेतुं राजपुत्रीं तामुत्पत्य नभसा ययौ ॥ १६५ ॥ विदूषकोऽपि तत्सर्वं दृष्ट्वा तत्र व्यचिन्तयत् । कथं राजसुतानेन हन्यत मयि जीवति ॥ १६६ ॥ इहैव तावत्तिष्ठामि यावदायास्यसौ शठः । इत्यालोच्य स तत्रैव तस्थौ छन्नो विदूषकः ॥ १६७॥ प्रव्राजकश्च गत्वैव वातायनपथेन सः । प्रविश्यान्तःपुरं प्राप सुप्तां निशि नृपात्मजाम् ॥ १६८ ॥ आययौ च गृहीत्वा तां गगनेन तमोमयः । कान्तिप्रकाशितदिशं राहुः शशिकलामिव ॥ १६९ ॥ हा तात हाम्बति च तां क्रन्दन्तीं कन्यकां वहन् । तत्रैव देवीभवनं सोऽन्तरिक्षादवातरत् ॥ १७० ॥ प्रविवेश च तत्कालं वेतालं प्रविमुच्य सः । कन्यारत्नं तदादाय देवीगर्भगृहान्तरम् ॥ १७१ ॥ सत्र यावन्निहन्तुं तां राजपुत्रीमियेष सः । तावदाकृष्टखड्गोऽत्र प्रविवेश विदूषकः ॥ १७२ ॥ आः पाप ! मालतीपुष्पमश्मना हन्तुमीहसे । यदस्यामाकृतौ शस्त्रं व्यापारयितुमिच्छसि ॥ १७३॥ इत्युक्त्वाकृष्य केशेषु शिरस्तस्य विवस्वतः । प्रव्राजकस्य चिच्छेद खड्गेन स विदूषकः ॥ १७४॥ आश्वासयामास च तां राजपुत्रीं भयाकुलाम् । प्रविशन्तीमिवाङ्गानि किञ्चित्प्रत्यभिजानतीम् ॥ १७५॥ कथमन्तःपुरं राज्ञो राजपुत्रीमिमामिह । नययमिति तत्कालमसौ धीरो व्यचिन्तयत् ॥ १७६॥ भो विदूषक ! शृण्वेतद्योऽस्य प्रव्राट् त्वया हतः । महानेतस्य वेतालः सिद्धोऽभूत्सर्पपास्तथा ॥ १७७॥ ततोऽस्य पृथ्वाराज्ये च वाञ्छा राजात्मजासु च । उदपद्यत तेनायमेव मूढोऽद्यवञ्चितः ॥ १७८ ॥ तद्गृहाणसवीमांस्त्व सर्पपान्वीर येन ते । इमामेकां निशामद्य भविष्यत्यम्बरे गतिः ॥ १७९॥
तृतीय लम्बक १२५
तृतीय लम्बक १२५ मुँह से आग की ज्वाला उगलते हुए उसके कन्धे पर बैठकर साधक प्रव्राजक राजकुमारी को लाने के लिए आकाश-मार्ग से चला ॥१६५॥ विदूषक यह सारी घटना देखकर सोचने लगा कि मेरे जीते-जी यह राजकुमारी का वध कैसे करेगा ? ॥१६६॥ इसलिए मैं तबतक यहीं ठहरता हूँ जबतक वह नीच आता है। ऐसा सोचकर वह वहीं छिपा रहा ॥१६७॥ इस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ प्रव्राजक खिड़की के रास्ते से राजकुमारी के भवन में जा पहुँचा ॥१६८॥ उसने उसे इस प्रकार पकड़ा जिस प्रकार अंधकारपूर्ण आकाश में कान्ति फैलानेवाली शशिकला को राहु पकड़ता है ॥१६९॥ इतने में ही अरे बाप ! अरी मां ! इस प्रकार चिल्लाती हुई राजकन्या को लिये हुए वह नीच आकाश से नीचे उतरा। उस बैताल (मुर्दे) को उसी प्रकार छोड़कर कन्या को लेकर देवी की मूर्ति के समीप पहुँचा ॥१७०-१७१॥ वह जब राजकुमारी का वध करने के लिए तैयार हुआ इतने में ही तलवार खींचे हुए विदूषक भी मन्दिर में घुसा और बोला—'ओ पापी ! मालती के फूल को पत्थर से पीसना चाहता है जो इस कोमल कन्या पर शस्त्र प्रहार करना चाहता है' ॥१७२-१७३॥ ऐसा कहकर और उसकी जटा पकड़कर विदूषक ने साधक संन्यासी का वध कर डाला और भय से काँपती हुई एवं अत्यन्त सिकुड़ती हुई राजकन्या को धीरज बँधाया ॥१७४ १७५॥ वह सोचने लगा कि अब इसे (राजकुमारी को) फिर रतिवास में कैसे पहुँचाऊँ ? ॥१७६॥ इतने में ही आकाशवाणी हुई—'हे विदूषक ! तुमने इस प्रव्राजक को मारा है इसे यह बैताल और सरसों सिद्ध थे ॥१७७॥ इसीलिए इसकी पृथ्वी का राज्य और राजकुमारी को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई थी। किन्तु आज यह ठगा गया ॥१७८॥ इसलिए हे वीर ! तुम उसके सरसों के दाने ले लो इससे केवल एक आज की रात तुम्हारी आकाश में गति हो जायगी' ॥१७९॥
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर इत्याकाशगता वाणी जातहर्षं जगाद तम्। अनुगृह्णन्ति हि प्रायो देवता अपि साधुवृत्तम् ॥१८०॥ ततो वस्त्राञ्चलात्तस्य स परिव्राजकस्य तान्। जग्राह सर्षपान्हस्ते तामङ्के च नृपात्मजाम् ॥१८१॥ यावच्च देवी भवनात्स तस्मान्निर्ययौ बहि। उच्चचार पुनस्तावदन्या नभसि भारती ॥१८२॥ इहैव देवीभवन मासस्यान्ते पुनस्त्वया। आगन्तव्य महावीर ! विस्मर्त्तव्यमिदं न ते ॥१८३॥ तच्छ्रुत्वा सप्रयुक्तत्वा सद्यो देवीप्रसादतः। उत्पात नभो बिभ्रद्राजपुत्रीं विदूषकः ॥१८४॥ गत्वा च गगनेनाशु स तामन्तःपुरान्तरम्। प्रावेशयद्राजसुतां समाश्वस्तामुवाच च ॥१८५॥ न मे भविष्यति प्रातर्गतिर्व्योम्नि ततश्च माम्। सर्वे द्रक्ष्यन्ति निन्द्यन्ति तत्सम्प्रत्येव याम्यहम् ॥१८६॥ इति तेनोदिता बाला बिभ्यती सा जगाद तम्। गते त्वयि मम प्राणास्त्रासाक्रान्ता प्रयान्त्यमी ॥१८७॥ तन्महाभाग मा गास्त्वं देहि मे जीवितं पुनः। प्रतिपन्नार्थनिर्वाहः सहज हि सतां व्रतम् ॥१८८॥ तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास स सुसत्त्वो विदूषकः। यदस्तु मे न गच्छामि मुञ्चेत्प्राणान् भयादियम् ॥१८९॥ ततश्च नृपतेर्भक्तिः का मया विहिता भवेत्। इत्यालोच्य स तत्रैव तस्थावन्तःपुरे निशि ॥१९०॥ व्यायामजागराच्छ्रान्तो ययौ निद्रां क्षनेनच सः। राजपुत्री त्वनिद्रैव भीता तामनयन्निशाम् ॥१९१॥ विश्राम्यतु क्षण तावदिति प्रमादमानसा। सुप्तं प्रबोधयामास सा प्रभातेऽपि नव तम् ॥१९२॥ ततः प्रविष्टा ददृशुस्तमन्तःपुरचारिणः। ससम्भ्रमाश्च गत्वैव राजानं तं व्यजिज्ञपन् ॥१९३॥ राजाप्यवेक्षितुं तत्त्वं प्रतीहारं व्यसर्जयत्। प्रतीहारश्च गत्वात्तस्तत्रापश्यद् विदूषकम् ॥१९४॥
तृतीय लम्बक ३२७
तृतीय लम्बक ३२७ यह सुनकर वह प्रसन्न हुआ। सच है ऐसे वीर और सत्कार्यकर्ताओं को देवताओं की भी कृपा प्राप्त होती है॥१७८ ॥ तब विदूषक ने उस मृत साधु के आँचल से सरसों निकालकर एक हाथ में लिये और दूसरे हाथ से राजकन्या को गोद में लेकर बाहर निकला ॥१७९॥ जब वह देवी के मन्दिर से बाहर निकला तब उसे पुनः दूसरी आकाशवाणी सुन पड़ी—'हे महाबीर ! महीने के अन्त में तुम इस मन्दिर में फिर आना यह भूलना नहीं ॥१८०-१८१॥ यह सुनकर और उसे स्वीकार करके देवी की कृपा से राजकुमारी को लिये हुए विदूषक आकाश की ओर उड़ा॥१८४॥ आकाशमार्ग से जाकर राजकन्या को उसके भवन में पहुँचाकर और उसे धीरज बँधाकर बोला—'सबेरे आकाश में उड़ने की मेरी शक्ति न रहेगी। यह केवल इसी रात के लिए प्राप्त थी। तब इस घर से निकलते हुए मुझे सब लोग देखेंगे। इसलिए मैं अभी ही जा रहा हूँ' ॥१८५ १८६॥ विदूषक के भलीभाँति समझाने पर भी डरती हुई बालिका उससे बोली—'तुम्हारे जाने पर भय से काँपते हुए मेरे प्राण अब निकल रहे हैं। इसीलिए हे महापुरुष ! तुम न जाओ। स्वीकार किये हुए कार्य का निर्वाह करना सज्जनों का स्वाभाविक व्रत (नियम) है ॥१८७-१८८॥ यह सुनकर महा प्राणवान् विदूषक सोचने लगा—'जो भी हो मैं नहीं जाता। यह भय से प्राणों को छोड़ देगी। तब मेरी राज-सेवा ही क्या हुई ? । ऐसा सोचकर वह वहीं राजकन्या के भवन में ठहर गया। धीरे-धीरे श्रम और जागरण से थका हुआ वह रात में भी सो गया। किन्तु डरी हुई राजकुमारी ने जाग करके ही सारी रात व्यतीत की ॥१८९ १९१॥ 'यह कुछ देर विश्राम कर ले'—इस प्रकार स्नेहपूर्ण-हृदया राजकन्या ने उसे प्रातःकाल नहीं जगाया। तब रनिवास की सेविकाओं ने अन्दर आकर उसे देखा और घबराकर राजा से निवेदन किया ॥१९२-१९३॥ राजा ने भी तत्त्व जानने की इच्छा से अपने निजी सेवक को भेजा। उसने अन्दर आकर उस विदूषक को देखा॥१९४॥
३२८ कथासरित्सागर
३२८ कथासरित्सागर शुश्राव च यथावृत्तं स सद्योराजसुतामुखात्। तथैव गत्वा राज्ञे च स समग्रं न्यवेदयत् ॥१९५॥ विद्रूपकस्य सत्त्वज्ञस्तच्छ्रुत्वा स महीपतिः। किमवेत् स्यादिति क्षिप्रं समुद्भ्रान्त इवाभवत् ॥१९६॥ आनाययच्च दुहितुर्मन्दिरात् विद्रूपकम्। वशानुयाग मनसा तस्या स्नेहानुपातिना ॥१९७॥ पप्रच्छ च यथावृत्तं न राजा तमुपागतम्। मा भूरुत्रश्च सोऽप्यस्मै विप्रो वृत्तान्तमब्रवीत् ॥१९८॥ अदर्शयच्च वस्त्रान्ते निबद्धाश्चोरनासिकाः। प्रभाद्सम्भविनस्तांश्च सर्पंपाभूमिमेदिनः ॥१९९॥ ततः सम्भाव्य सत्यं तत्तांश्चानाय्य मठद्विजान्। सशिरश्छत्ररोपेतान् पृष्ट्वा तन्मूलकारणम् ॥२००॥ स्वयं श्मशाने गत्वा च दृष्ट्वा तांश्छिन्ननासिकान्। पुंश्चांस्त च निर्लूनकण्ठं प्रव्राजकाधमम् ॥२०१॥ उत्पन्नप्रत्ययो राजा स तुष्टोय महाशयः। विद्रूपकाय कृतिने सुताप्राणप्रदायिने ॥२०२॥ ददौ तस्मै च तामेव तत्रैव तनयां निजाम्। किमदेयमदाराणामुपकारिषु तुष्यताम् ॥२०३॥ क्षीरवासााम्बुजप्रीत्या भूमं राजसुताकरे। गृहीतपाणिर्येनास्यां लेभे लक्ष्मीं विद्रूपकः ॥२०४॥ ततो राजोपचारेण स तया कान्तया सह। आदित्यसेनभूपस्तेस्तस्थौ श्लाघ्ययशा गृहे ॥२०५॥ अथ यातेषु दिवसेष्वेकदा दैवचोदिता। समुवाच निशायां सा राजपुत्री विद्रूपकम् ॥२०६॥ नाथ स्मरसि यत्तत्र तत्र देवीगृहे निशि। मासान्ते त्वमिहागच्छेरित्युक्तं दिव्यया गिरा ॥२०७॥ तत्र चाद्य गतो मासो भवतस्तच्च विस्मृतम्। इत्युक्तः प्रियया स्मृत्वा स जहर्ष विद्रूपकः ॥२०८॥ साधु स्मृतं त्वया तन्वि ! विस्मृतं तन्मया पुनः। इत्युक्त्वाऽऽलिङ्गनं चास्यै स ददौ पारितोषिकम् ॥२०९॥
तृतीय लम्बक ३७१
तृतीय लम्बक ३७१ राज-सेवक ने राजकुमारी के मुंह से सुना हुआ सारा समाचार राजा से कह दिया ॥१९५॥
विदूषक के मन और बल को जाननेवाला राजा 'यह क्या बात है ? - ऐसा सोचता हुआ व्याकुल-सा हो गया। और कन्या के महल से विदूषक को बुला ठीक-ठीक समाचार पूछा। उसने भी प्रारम्भ से अन्त तक सारा समाचार कह डाला। और कपड़े के कोने में बँधे हुए उन चोरों की कटी हुई नाक भी दिखा दी साथ ही प्रव्राजक के उस भूमिश्रेणी सरभों के शवों को भी दिखाया ॥१९६-१९९॥
राजा ने सारी घटना का सत्य समझकर सभी मठवासी ब्राह्मणों को चक्कर के साथ बुलाया और उनसे मूल कारण जानकर श्मशान में जाकर उन तीनों नक-कटों को देखा और कटे हुए गलेवाले उस दुष्ट साधक को (देवी-मन्दिर में) देखा ॥२०-२१॥
इन प्रमाणों से विश्वस्त राजा ने कन्या को प्राणदान करनेवाले विदूषक को अपनी कन्या प्रदान कर दी। सच है उदार व्यक्तियों के उपकारों के लिए कौन-सी वस्तु अदेय है? ॥२०२॥
राजकुमारी के हाथ में लक्ष्मी का निवास था इसी कारण विदूषक ने उसका पाणि-ग्रहण करते ही लक्ष्मी को प्राप्त किया ॥२०४॥
वह यशस्वी विदूषक अपनी पत्नी के साथ आदरसम्पन्न के घर राजाओं के समान रहने लगा ॥२०५॥
कुछ दिनों के बाद दैव से प्रेरित राजकन्या ने रात्रि में विदूषक से कहा कि 'हे स्वामिन् ! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है कि देवी-मन्दिर में आकाशवाणी ने कहा था कि 'एक मास बाद तुम यहाँ आना' । तदनुसार आज मास समाप्त हो गया आप उसे भूल गए। पत्नी ने यह सुनकर विदूषक प्रसन्न हुआ। और बोला- 'प्रिये ! तुमने अच्छा स्मरण दिला दिया मैं उसे भूल ही गया था। ऐसा कहकर उसने उसे पुरस्कार में आलिंगन दिया ॥१-२ ॥ ४२
११० कथासरित्सागर
११० कथासरित्सागर
सुप्तायां च ततस्तस्यां निभृत्यान्तःपुरान्निशि। आदाय खड्गं स्वस्यं सस्तद्देवीभवनं ययौ ॥२१॥ प्राप्तो विदूषकोऽह्र मौरिति तत्र जपन् बहिः। प्रविशेत्यशृणोद् वाचमन्तः केनाप्युदीरिताम् ॥२११॥ प्रविश्य चान्तरे सोऽथ दिव्यमावासमैक्षत। तदन्तर्दिव्यरूपों च कन्यां दिव्यपरिच्छदाम् ॥२१२॥ स्वप्रभाभिन्नतिमिरं रजनिज्वलिशिखामिव। हरकोपाग्निदग्धस्मरसञ्जीवनौषधिम् ॥२१३॥ किमेतदिति साश्चर्यं स तया दृष्टया स्वयम्। सस्नेहबहुमानेन स्वागतेनाभ्यनन्द्यत ॥२१४॥ उपविष्टं च सञ्जातविश्रम्भं प्रम-दर्शनात्। तत्स्वरूपपरिज्ञानसोत्सुक सा तमब्रवीत् ॥२१५॥ अह विद्याधरी कन्या भद्रा नाम महान्वया। इह कामचरस्वाप्नं त्वामपश्यमहं तदा ॥२१६॥ त्वद्गुणाकृष्टचित्ता च तत्कालमहमेव ताम्। अश्रुत्यवाणीमसृजं पुनरागमनय ते ॥२१७॥ अद्य विद्या प्रयोगाच्च सतोऽद्य प्रेरिता मया। सा से राजसुतेवाऽस्मिन् कार्ये स्मृतिमजीजनत् ॥२१८॥ त्वदर्थं च स्थितास्मीह तत्तुभ्यमिदमर्पितम्। शरीरं सुन्दर ! मया कुरु पाणिग्रहं मम ॥२१९॥ इत्युक्तो भद्रया भव्यो विद्याधर्या विदूषकः। तथेति परिणिन्ये तां गान्धर्वविधिना तदा ॥२२ ॥ अतिष्ठदथ तत्रैव दिव्यं भोगमवाप्य सः। स्वपौरुषफलब्ध्येव प्रियया सङ्गतस्समा ॥२२१॥ अत्रान्तरे प्रबुद्धा सा राजपुत्री निशाक्षये। भर्तारं तमपश्यन्ती विषादं सहसागमत् ॥२२२॥ उत्थाय चान्तिकं मातुः प्रस्खलद्भिः पदैर्ययौ। विह्वला सङ्गमवाष्पातरङ्गितविलोचना ॥२२३॥ स पतिर्मे गतः क्वापि राज्ञीविति च मातरम्। आत्मापराधसम्भ्रान्ता सानुतापा च साब्रवीत् ॥२२४॥