कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
| प्रकरण ५३-५४ | ## समाहर्तृप्रचारः |
|---|---|
| अध्याय ३५ | ### गृहपतिवैदेहकतापसव्यञ्जनाः प्रणिधयः |
(१) समाहर्ता चतुर्धा जनपदं विभज्य ज्येष्ठमध्यमकनिष्ठविभागेन ग्रामाग्रं परिहारकमायुधीयं धान्यपशुहिरण्यकुप्यविष्टप्रतिकरमिदमेतावदिति निबन्धयेत्।
(२) तत्प्रदिष्टः पञ्चग्रामीं दशग्रामीं वा गोपश्चिन्तयेत्।
(३) सीमावरोधेन ग्रामाग्रं कृष्टाकृष्टस्थलकेदारारामषण्डवाटवनवास्तुचैत्यदेवगृहसेतुबन्धश्मशानसत्रप्रपापुण्यस्थानविवीतपथिसंख्यानेनक्षेत्राग्रं, तेन सीम्नां क्षेत्राणां च मर्यादारण्यपथिप्रमाणसम्प्रदानविक्रयानुग्रहपरिहारनिबन्धान् कारयेत्। गृहाणां च करदाकरदसंख्यानेन।
समाहर्त्ता और गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण
(१) समाहर्त्ता (रेवेन्यू कलक्टर) को चाहिए कि वह सारे जनपद को चार हिस्सों में बाँटकर उन्हें श्रेष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ के क्रम से उनकी गणना, उपज, भौगोलिक परिस्थिति उनका नकशा, खसरा एवं रकवा आदि को अपने रजिस्टर में दर्ज कर ले; जो गाँव नियमित रूप से सैनिक जवानों को दें तथा जो गाँव अन्न, पशु, सोना, चाँदी, नौकर-चाकर आदि को नियमित रूप से दें, उनका व्योरा भी रजिस्टर में दर्ज कर लें।
(२) समाहर्त्ता के आदेशानुसार पाँच-पाँच या दस-दस गावों का एक-एक केन्द्र बनाकर उसका प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे।
(३) नदी, पहाड़, जंगल, दीवाल आदि के द्वारा गाँवों की सरहदबन्दी करके उसको रजिस्टर में चढ़ाया जाय, खेतों का व्योरा चढ़ाने वाले रजिस्टर में इतनी बातें दर्ज रहनी चाहिये; खेती योग्य जमीन, खेती के अयोग्य या पथरीली जमीन, ऊँची-नीची जमीन, साठी-गेहूँ योग्य जमीन, बाग-बगीचे योग्य जमीन, केले के योग्य जमीन, ईख के योग्य जमीन, जंगल के योग्य जमीन, आबादी के योग्य जमीन, चैत्य, देवालय, तालाब, श्मशान, अन्नक्षेत्र, प्याऊ, तीर्थस्थान, चरागाह, और रथ-गाड़ी तथा पैदल मार्ग के योग्य जमीन। इसी प्रकार नदी, पर्वत आदि सरहद और खेतों की लम्बाई-चौड़ाई का भी उल्लेख होना चाहिए। इन बातों के अलावा ऐसे जंगल,
१६ कौ०
२४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) तेषु चैतावच्चातुर्वर्ण्यमेतावन्तः कर्षकगोरक्षकवैदेहककारुकर्मकर-दासाश्चैतावच्च द्विपदचतुष्पदमिदं च हिरण्यविष्टिशुल्कदण्डं समुत्तिष्ठतीति । (२) कुलानां च स्त्रीपुरुषाणां बालवृद्धकर्मचरित्राजीवव्ययपरिमाणं विद्यात् । (३) एवञ्च जनपदचतुर्भागं स्थानिकः चिन्तयेत् । (४) गोपस्थानिकस्थानेषु प्रदेष्टारः कार्यकरणं बलिप्रग्रहं च कुर्युः । (५) समाहर्तृप्रदिष्टाश्च गृहपतिकव्यञ्जना येषु ग्रामेषु प्रणिहितास्तेषां ग्रामाणां क्षेत्रगृहकुलाग्रं विद्युः । मानसञ्जाताभ्यां क्षेत्राणि भोगपरिहा-
जो ग्रामवासियों के काम न आते हों, खेतों में जाने-आने के रास्ते, उनकी नाप, किस व्यक्ति ने किस व्यक्ति को कौन खेत जोतने लिए दिया है, बिक्री का ब्योरा, तकाबी, मुल्तबी और छूट आदि का भी उल्लेख होना चाहिए । साथ ही रजिस्टर में यह भी दर्ज होना चाहिए कि वहाँ कितने घर, जमीन की किस्त तथा मकानों का किराया देने वाले हैं और कितने नहीं हैं ।
( १ ) रजिस्टर में इस बात का उल्लेख किया जाय कि उन घरों में इतने ब्राह्मण, इतने क्षत्रिय, इतने वैश्य और इतने शूद्र रहते हैं, इसी प्रकार वहाँ के किसान, ग्वाले, व्यापारी, कारीगर, मजदूर, और दासों की संख्या भी रजिस्टर में दर्ज होनी चाहिये, फिर सारे मनुष्यों और सारे पशुओं का जोड़ अलग-अलग लिया जाय, अन्त में इनसे इतना सोना, इतने नौकर, इतना टैक्स और इतना दण्ड राजा को प्राप्त हुआ, यह भी जोड़ देना चाहिए ।
( २ ) गोप नामक अधिकारी को चाहिए कि वह प्रत्येक परिवार के स्त्री पुरुष, बालक तथा वृद्ध की गणना और उनके कार्य, चरित्र, आजीविका एवं व्यय आदि के सम्बन्ध में पूरी जानकारी रखे ।
( ३ ) इसी प्रकार जनपद के चौथे हिस्से का प्रबन्ध स्थानिक नामक अधिकारी करे ।
( ४ ) गोप और स्थानिक के कार्यक्षेत्र में प्रदेष्टा ( कण्टक शोधनाधिकारी ) नामक अधिकारी राज्य के शत्रुओं का दमन करें । गोप और स्थानिक टैक्स न देने वालों से टैक्स वसूल करें । राज्य के बलवान् व्यक्ति यदि शासन में विघ्न-बाधा उपस्थित करें तो उनका भी वे दमन करें ।
( ५ ) गृहस्थ ( गृहपति ) के वेश में रहने वाले गुप्तचर, समाहर्त्ता की आज्ञानुसार अपने क्षेत्र के गाँवों का रकवा, घर और परिवारों की तादात को अच्छी तरह से जानें । वे गुप्तचर यह नोट रखें कि कौन खेत कितने बड़े हैं और उनकी उपज क्या है, किस घर से कर वसूल किया जाता है और कौन घर छोड़ा जाता है, यह
प्र० ५३-५४ : अ० ३५ ] समाहर्ता और गुप्तचरों के कार्य २४३
राभ्यां गृहाणि वर्णकर्मभ्यां कुलानि च । तेषां जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्युः । प्रस्थितागतानां च प्रवासावासकारणमनर्थ्यानां च स्त्रीपुरुषाणां चारप्रचारं च विद्युः ।
(१) एवं वैदेहकव्यञ्जनाः स्वभूमिजानां राजपण्यानां खनिसेतुवनकर्मान्तक्षेत्रजानां परिमाणमर्घं च विद्युः । परभूमिजातानां वारिस्थलपथोपयातानां सारफल्गुपण्यानां कर्मसु च, शुल्कवर्त्तन्यातिवाहिकगुल्मतरदेयभागभक्तपण्यागारप्रमाणं विद्युः ।
(२) एवं समाहर्तृप्रदिष्टास्तापसव्यञ्जनाः कर्षकगोरक्षकवैदेहकानामध्यक्षाणां च शौचाशौचं विद्युः । पुराणचोरव्यञ्जनाश्चान्तेवासिनश्चैत्यचतुष्पथशून्यपदोदपाननदीपानतीर्थायतनाश्रमारण्यशैलवनगहनेषु स्तेनामित्रप्रवीरपुरुषाणां च प्रवेशनस्थानगमनप्रयोजनान्युपलभेरन् ।
परिवार ब्राह्मणों का है या क्षत्रियों का और वे क्या-क्या कार्य करते हैं। वे गुप्तचर यह भी जाने कि उन परिवारों के प्राणियों ( मनुष्यों तथा पशुओं ) का संख्या कितनी है और उनकी आमदनी खर्च के जरिये क्या हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने-आने वाले लोगों और अपने स्थान को छोड़कर दूसरी जगह बस जाने वाले लोगों के सम्बन्ध में, राजा से सम्बन्ध न रखने वाली नर्तकियों, जुआरियों, भाँडों आदि के आवास-प्रवास पर भी वे गुप्तचर निगरानी रखें और यह भी जानें कि शत्रुओं के गुप्तचर कहाँ-कहाँ पर रहकर क्या-क्या कार्य कर रहे हैं।
( १ ) इसी प्रकार व्यापारी के वेष में रहने वाले गुप्तचर ( वैदेहक ) समाहर्त्ता के आदेशानुसार अपने अधिकार-क्षेत्र में उत्पन्न और बेची जाने वाली सरकारी वस्तुओं, खनिज पदार्थों, तालाबों, जंगलों तथा कारखानों से उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की तौल एवं कीमत को अच्छी तरह से समझें। विदेशी व्यापारियों ने चुङ्गी, सीमाकर, मार्गरक्षा का कर, नाव कर, अन्तपाल का टैक्स, साझेदारी का हिस्सा, भत्ता, भोजन-व्यय और बाजार आदि का टैक्स कितना दिया है, यह भी वे जानें।
( २ ) इसी प्रकार तपस्वी के वेष में रहने वाले गुप्तचर ( तापस ), समाहर्त्ता की आज्ञानुसार, अपने क्षेत्र में रहने वाले किसान, ग्वाले, व्यापारी और अध्यक्षों की ईमानदारी तथा बेईमानी के रहस्यों को जानें। पुराने चोरों के वेष में रहने वाले उन तापस गुप्तचरों के शिष्य ( पुराणचोर ) देवालय, चौराहा, निर्जन स्थान, तालाब, नदी, कुओं के समीपस्थ जलाशय, तीर्थस्थान, आश्रम, जंगल, पहाड़ और घना जंगल आदि स्थानों में ठहर कर चोरों, शत्रुओं, शत्रुओं के भेजे हुए तीक्ष्ण तथा रसद आदि गुप्तचरों का ठीक-ठीक पता लगायें।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि
| २४४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) समाहर्ता जनपदं चिन्तयेदेवमुत्थितः । चिन्तयेयुश्च संस्थास्ताः संस्थाश्चान्याः स्वयोनयः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गृहपतितापसव्यञ्जनप्रणिधिर्नाम पंचविंशोऽ- ध्यायः, आदितः पञ्चपञ्चाशः ।
---: ० :---
(१) इस प्रकार अपने कार्यों में तत्पर समाहर्त्ता जनपद की रक्षा का प्रबन्ध करें और उसकी आज्ञा से कार्य करने वाले गुप्तचर एवं उनके विभिन्न संघ, संस्था आदि जनपद के प्रबन्ध में तत्पर रहें।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गृहपतितापसव्यञ्जन प्रणिधि पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त ।
---: ० :---
प्रकरण ५५ | नागरिकप्रणिधिः अध्याय ३६ |
(१) समाहर्तृवन्नागरिको नगरं चिन्तयेत्, दशकुलीं गोपो, विंशतिकुलीं चत्वारिंशत्कुलीं वा । स तस्यां स्त्रीपुरुषाणां जातिगोत्रनामकर्मभिः जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्यात् । (२) एवं दुर्गचतुर्भागं स्थानिकश्चिन्तयेत् । (३) धर्मवसथिनः पाषण्डिपथिकानावेद्य वासयेयुः । स्वप्रत्ययाश्च तपस्विनः श्रोत्रियांश्च । (४) कारुशिल्पिनः स्वकर्मस्थानेषु स्वजनं वासयेयुः । वैदेहकाश्चान्योन्यं स्वकर्मस्थानेषु । पण्यानामदेशकालविक्रेतारमस्वकरणं च निवेदयेयुः । (५) शौण्डिकपाक्वमांसिकौदनिकरूपाजीवाः परिज्ञातमावासयेयुः । अतिव्ययकर्तारमत्याहितकर्माणं च निवेदयेयुः ।
नागरिक के कार्य
( १ ) समाहर्त्ता की तरह नागरिक अधिकारी भी नगर के प्रबन्ध की चिन्ता करे । उत्तम दस कुलों, मध्यम बीस कुलों और अधम चालीस कुलों का प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे । उन कुलों के स्त्री-पुरुषों के वर्ण, गोत्र, नाम, कार्य, उनकी संख्या और उनके आय-व्यय के सम्बन्ध के वह भली भाँति जाने ।
( २ ) इसी प्रकार दुर्ग के चौथे हिस्से का प्रबन्ध, अर्थात् दुर्ग में रहने वाले स्त्री-पुरुषों के सम्बन्ध में उक्त जानकारी स्थानिक नामक अधिकारी प्राप्त करे ।
( ३ ) धर्मशाला के प्रबन्धक को चाहिए कि वह, धूर्त-पाखण्डी मुसाफिरों को गोप की अनुमति से ही टिकाये, किन्तु जिन तपस्वियों या श्रोत्रियों को वह स्वयं जानता है, उन्हें अपनी जिम्मेदारी पर भी टिका सकता है ।
( ४ ) मोटे तथा महीन कार्य को करने वाले सुपरिचित एवं विश्वस्त कारीगर को अपने कार्य करने के स्थानों में ठहराया जा सकता है । व्यापारी लोग अपने जान-पहचान वाले व्यापारियों को अपनी-अपनी दूकानों में ठहरा सकते हैं, किन्तु देश-काल के विपरीत व्यापार करने वाले या दूसरे के सामान को अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति की सूचना नागरिक को कर देनी चाहिए ।
( १ ) मद्य-मांस बेचने वाले, होटल वाले और वेश्यायें अपने-अपने परिचितों
| २४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) चिकित्सकः प्रच्छन्नव्रणप्रतीकारयितारमपथ्यकारिणं च गृहस्वामी च निवेद्य गोपस्थानिकयोर्मुच्यते । अन्यथा तुल्यदोषः स्यात् ।
(२) प्रस्थितागतौ च निवेदयेत् । अन्यथा रात्रिदोषं भजेत । क्षेमरात्रुषु त्रिपणं दद्यात् ।
(३) पथिकोत्पथिकांश्च बहिरन्तश्च नगरस्य देवगृहपुण्यस्थानवनश्मशानेषु सत्रणमनिष्टोपकरणमुद्भाण्डीकृतमाविग्नमतिस्वप्नमध्वक्लान्तमपूर्वं वा गृह्णीयुः ।
(४) एवमभ्यन्तरे शून्यनिवेशायवेशनशौण्डिकौदनिकपाक्वमांसिकद्यूतपाषण्डावासेषु विचयं कुर्युः ।
(५) अग्निप्रतीकारं च ग्रीष्मे मध्यमयोरह्णश्चतुर्भागयोः । अष्टभागोऽग्निदण्डः । बहिरधिश्रयणं वा कुर्युः ।
को अपने घर ठहरा सकते हैं । जो व्यक्ति अधिक खर्चीला दीखे या अधिक शराब पीता हो, उसकी सूचना गोप अथवा स्थानिक के पास भेज देनी चाहिए ।
( १ ) जो व्यक्ति हथियार लगे अपने घावों का इलाज छिपा कर कराता है और रोग या महामारी आदि फैलाने वाले द्रव्यों का छिपे तौर से उपयोग करता है, उसका इलाज करने वाला वैद्य यदि उसके इन कार्यों की सूचना गोप या स्थानिक को दे देता है तो वह अदण्ड्य है, किन्तु यदि वह सूचना न दे तो अपराधी के समान ही उसको भी दण्ड दिया जाना चाहिए, जिस घर में ऐसे कार्य किए जाते हों उस घर का मालिक यदि गोप या स्थानिक को सूचित कर देता है तो वह क्षम्य है, अन्यथा उसको भी अपराधी के समान दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( २ ) घर के मालिक को चाहिए कि वह घर से जाने वाले या घर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सूचना गोप को दे । अन्यथा वे लोग रात्रि में यदि किसी की चोरी आदि करें तो गृहस्वामी उसके लिए उत्तरदायी समझा जायगा । वे लोग भले ही कुछ भी अपराध न करें, किन्तु सूचना न देने के अपराध में गृहस्वामी प्रतिरात्रि तीन पण दण्ड का भागी है ।
( ३ ) व्यापारियों के वेश में बड़े-बड़े मार्गों पर घूमने वाले, ग्वाले तथा लकड़हारे के वेश में रास्ता छोड़कर जंगलों में घूमने वाले, नगर के भीतर या बाहर बने हुए मन्दिरों, तीर्थों, जंगलों या श्मशानों, कहीं भी, हथियार से घायल, हथियार तथा विष को लिये हुए, सामर्थ्य से अधिक भार उठाये हुए, डरे हुए, घबड़ाये हुए, घोर निद्रा में सोये हुए, थके हुए या इसी प्रकार का कोई अजनबी पन किये हुये, इस प्रकार के सन्दिग्ध व्यक्ति को पकड़कर नागरिक के सुपुर्द कर देना चाहिए ।
( ४ ) इसी प्रकार नगर के खंडहरों में, कल-कारखानों में, शराब की दूकानों में, होटलों में, मांस बेचने वाली दूकानों में, जुआघरों में, पाखंडियों के अड्डों में कोई सन्दिग्ध व्यक्ति दिखाई दे तो, गुप्तचर उसको पकड़ कर नागरिक को सौंप दें ।
( ५ ) गर्मी की ऋतु में मध्याह्न के चार भागों में आग जलाने की मनाही कर
प्र० ५५ : अ० ३६ ] नागरिक के कार्य २४७
(१) पादः पञ्चघटीनाम् । कुम्भद्रोणीनिःश्रेणीपरशुशूर्पाङ्कुशकचग्रहणीदृतीनां चाकरणे । (२) तृणकटच्छन्नान्यपनयेत् । अग्निजीविन एकस्थान् वासयेत् । स्वगृहद्वारेषु गृहस्वामिनो वसेयुरसम्पातिनो रात्रौ । रथ्यासु कुटव्रजाः सहस्रं तिष्ठेयुः, चतुष्पथद्वारराजपरिग्रहेषु च । (३) प्रदीप्तमनभिधावतो गृहस्वामिनो द्वादशपणो दण्डः । षट्पणोऽवक्रयिणः । प्रमादाद्दीप्तेषु चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः । (४) प्रादीपिकोऽग्निना वध्यः । (५) पांसुन्न्यासे रथ्यायामष्टभागो दण्डः । पङ्कोदकसन्निरोधे पादः । राजमार्गे द्विगुणः ।
देनी चाहिए। जो भी इस आज्ञा का उल्लंघन करे उसे एक पण का आठवां हिस्सा दण्ड दिया जाय । अथवा ( यदि आवश्यक ही हो तो ) घास-फूस के मकानों के बाहर खुली जगह में आग जलाई जाय ।
( १ ) यदि कोई व्यक्ति निषिद्ध समय में पांच घड़ी तक आग जलावे तो उसे चौथाई पण दण्ड दिया जाय और उस व्यक्ति को भी यही दण्ड दिया जाय, जो गर्मी के मौसम में अपने घर के सामने पानी से भरे घड़े, पानी से भरी नांद, सीढ़ी, कुल्हाड़ा, सूप, छाज, कोंचा, फूस आदि को निकालने के लिए लम्बा लट्ठ, और चमड़े की मशक आदि वस्तुओं का इन्तजाम करके न रखें ।
( २ ) गर्मी की मौसम में फूस और चटाई के बने मकानों को एकदम उठा देना चाहिए। बढ़ई और लुहार आदि को किसी एक जगह में ही बसाया जाना चाहिए । घरों के स्वामियों को रात को अपने ही दरवाजों पर सोना चाहिए । गलियों तथा बाजारों में पानी से भरे हुए एक हजार घड़ों का हर समय प्रबन्ध रहना चाहिए । इसी प्रकार चौराहों, नगर के प्रधान द्वारों, खजानों कोष्ठागारों, गजशालाओं और अश्वशालाओं में भी पानी के भरे हजार-हजार घड़ों का हर समय इंतजाम रहना चाहिए ।
( ३ ) यदि गृहस्वामी घर में लगी हुई आग को बुझाने का प्रबंध न करे तो उस पर बारह पण दण्ड कर देना चाहिए । उस घर में रहने वाला किरायेदार भी यदि ऐसा ही करे तो उसे छह पण दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि धोखे से अपने घर में ही आग लग जाय तो गृहस्वामी को चौवन पण दण्ड देना चाहिए ।
( ४ ) मकान में आग लगाने वाला व्यक्ति यदि पकड़ लिया जाय तो उसे प्राण दण्ड की सजा देनी चाहिए ।
( ५ ) सड़क पर मिट्टी या कूड़ा-करकट डालने वाले व्यक्ति को पण का आठवाँ हिस्सा ( १/८ पण ) दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति गाड़ी, कीचड़ या पानी से सड़क को रोके उसे १/४ पण दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति राजमार्ग को इस प्रकार गन्दा करे या रोके उसे दुगुना दण्ड दिया जाना चाहिए ।
२४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) पुण्यस्थानोदकस्थानदेवगृहराजपरिग्रहेषु पणोत्तरा विष्ठादण्डाः । मूत्रेष्वर्धदण्डाः । (२) भैषज्यव्याधिभयनिमित्तमदण्ड्याः । (३) मार्जारश्वनकुलसर्पप्रेतानां नगरस्यान्तरुत्सर्गे त्रिपणो दण्डः । खरोष्ट्राश्वतरशवपशुप्रेतानां षट्पणः । मनुष्यप्रेतानां पञ्चाशतपणः । (४) मार्गविपर्यासे शवद्वारादन्यतः शवनिर्णयने पूर्वः साहसदण्डः । द्वाःस्थानां द्विशतम् । श्मशानादन्यत्र न्यासे दहने च द्वादशपणो दण्डः । (५) विषण्नालिकमुभयतोरात्रं यामतूर्यम् । तूर्यशब्दे राज्ञो गृहाभ्याशे सपादपणमक्षणताडनं प्रथमपश्चिमयामिकम् । मध्यमयामिकं द्विगुणम् । बहिश्चतुर्गुणम् ।
(१) राजमार्ग पर मल-त्याग करने वालों को एक पण, पवित्र तीर्थस्थानों पर मल-त्याग करने वालों को दो पण, जलाशयों पर मल-त्याग करने वालों पर तीन पण, देवालय में मल-त्याग करने वालों पर चार पण और खजाना, कोष्ठागार आदि स्थानों पर मलत्याग करनेवाले व्यक्तियों पर पाँच पण दण्ड किया जाना चाहिए । इन्हीं स्थानों में यदि कोई व्यक्ति पेशाब करे तो उस पर इसका आधा दण्ड किया जाना चाहिए ।
(२) यदि जुलाब लेने के कारण या अतिसार, प्रमेह आदि बीमारियों के कारण अथवा किसी डर से, उक्त स्थानों में कोई व्यक्ति मल-मूत्र-त्याग करे तो उसे दण्ड नहीं देना चाहिए ।
(३) मरे हुये बिल्ली, कुत्ता, नेवला और साँप को यदि कोई व्यक्ति नगर के पास या नगर के बीच में डाल आवे तो उस पर तीन पण दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि गधा, ऊँट, खच्चर तथा घोड़ा आदि को इस प्रकार छोड़ दिया जाय तो छोड़ने वाले को छह पण दण्ड दिया जाय । मनुष्य की लाश इस प्रकार छोड़ी जाने पर पचास पण दण्ड दिया जाना चाहिए ।
(४) मुर्दों को ले जाने के लिए जो रास्ता नियत है उसको छोड़ कर और जो द्वार नियत है, उसको छोड़कर दूसरी ही ओर से मुर्दा ले जाने वालों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । द्वार का रक्षक पुरुष यदि उन मुर्दा ले जाने वालों को न रोके तो उसे दो-सौ पण दण्ड दिया जाना चाहिए । श्मशान भूमि के अन्यत्र मुर्दा जलाने और गाड़ने वालों पर बारह पण दण्ड करना चाहिए ।
(५) रात की पहिली छह घड़ी बीत जाने पर और रात के अन्तिम छह घड़ी बाकी रह जाने पर, दोनों समय भोंपू देना चाहिये । उस रात्रि-घोष के बीच यदि कोई व्यक्ति राजमहल के पास गुजरता हुआ दिखाई दे तो उसे सवा पण दण्ड दिया जाना चाहिए । जो व्यक्ति रात्रिघोष के ठीक मध्यकाल में आता-जाता पकड़ा जाय, उसे ढाई पण दण्ड देना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति नगर के बाहर इस प्रकार आता-जाता पकड़ा जाये तो उस पर पाँच दण्ड कर देना चाहिए ।
प्र० ५५ : अ० ३६ ] नागरिक के कार्य २४९
(१) शङ्कनीये देशे लिङ्गे पूर्वापदाने च गृहीतमनुयुञ्जीत । (२) राजपरिग्रहोपगमने नगररक्षारोहणे च मध्यमः साहसदण्डः । (३) सूतिकाचिकित्सकप्रेतप्रदीपयानानागरिकतूर्यप्रेक्षाग्निनिमित्तं द्राभिश्चाग्राह्याः । (४) चाररात्रिषु प्रच्छन्नविपरीतवेषाः प्रव्रजिता दण्डशस्त्रहस्ताश्च मनुष्या दोषतो दण्ड्याः । (५) रक्षिणामवार्यं वारयतां वार्यं चावारयतामक्षणद्विगुणो दण्डः । स्त्रियं दासीमधिमेहयतां पूर्वः साहसदण्डः, अदासीं मध्यमः, कृतावरोधामुत्तमः, कुलस्त्रियं वधः । (६) चेतनाचेतनिकं रात्रिदोषमशंसतो नागरिकस्य दोषानुरूपो दण्डः, प्रमादस्थाने च ।
( १ ) उक्त रोक लगे समय में यदि कोई व्यक्ति बगीचों में छिपे हुये पाये जाँय, या जिनके पास ऐसा सामान पाया जाय कि उन पर चोर-डाकू होने का शक किया जा सके, अथवा जो पहिले से ही बदनाम हों और इस प्रकार घूमते हुए मिल जांय तो उनसे पूछा जाना चाहिए 'तुम कौन हो ? कहाँ से आये हो ? कहाँ जाओगे ? क्या कार्य करते हो ? यहाँ तुम क्यों आये हो ?' यदि वे सन्तोषजनक उत्तर दें तो उनके साथ उचित व्यवहार किया जाना चाहिए ।
( २ ) यदि इस प्रकार का कोई शंकित व्यक्ति सरकारी इमारतों या नगर-रक्षा के लिए बने सफ़ीलों अथवा दुर्गों के ऊपर चढ़ता हुआ पकड़ा जाय तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) यदि उक्त रोक लगे समय में प्रसूता स्त्री, वैद्य हकीम, मुर्दाफ़रोश, उजाला लिए, सूचनार्थ आवाज करते हुए, नाटक-सिनेमा देखने, आग बुझाने आदि के लिए और जिनके पास राजकीय अनुमतिपत्र हो, आते-जाते पकड़ लिये जायें तो उन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाहिए ।
( ४ ) विशेष उत्सवों के समय रात्रि में रोक हटा दी जाने पर जो व्यक्ति मुँह ढँककर अथवा वेष बदलकर तथा संन्यासी के वेष में दण्ड या हथियार लिए पकड़े जाय, उन्हें अपराध के अनुसार दण्ड देना चाहिए ।
( ५ ) जो पहरेदार रोके जाने योग्य व्यक्तियों को न रोक लें तो उन्हें, रोक लगे समय के अपराध से दुगुना अर्थात् ढाई पण दण्ड देना चाहिए । जो पुरुष दूसरे की स्त्री तथा दासी के साथ बलात्कार करे, उसे प्रथम साहस दण्ड देना चाहिए । दासी आदि के अलावा किसी वेश्या के साथ बलात्कार करने पर मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए । यदि कोई दासी या वेश्या किसी की पत्नी बन चुकी हो और तब उसके साथ कोई बलात्कार करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । जो पुरुष कुलीन स्त्रियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करे उसको प्राणदण्ड की सजा देनी चाहिए ।
( ६ ) जान-बूझकर या अनजाने में, रात को किये गये अपराधों की सूचना
| २५० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
|---|
(१) नित्यमुदकस्थानमार्गभूमिच्छन्नपथवप्रप्राकाररक्षावेक्षणं नष्टप्रस्मृतापसृतानां च रक्षणम् । (२) बन्धनागारे च बालवृद्धव्याधितानाथानां जातनक्षत्रपौर्णमासीषु विसर्गः । पुण्यशीलाः समयानुबद्धा वा दोषनिष्क्रयं दद्युः । (३) दिवसे पञ्चरात्रे वा बन्धनस्थान् विशोधयेत् । कर्मणा कायदण्डेन हिरण्यानुग्रहेण वा ॥ (४) अपूर्वदेशाधिगमे युवराजाभिषेचने । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नागरिकप्रणिधिर्नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः, आदितः षट्पञ्चाशः ।
समाप्तमिदमध्यक्षप्रचारो नाम द्वितीयमधिकरणम् ।
— : ० : —
यदि कोई नगरवासी अध्यक्ष को न पहुँचावे तो अपराध के अनुसार उसके लिए दण्ड नियत होना चाहिए । उन पहरेदारों को भी उनके अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए, जिन्होंने पहरा देने में किसी प्रकार का प्रमाद किया हो ।
(१) नगर-अधिकारी ( नागरिक ) को चाहिए कि वह जल-स्थल मार्ग, सुरंग मार्ग, सफील, परकोटा, खाई तथा बुर्ज आदि की अच्छी तरह देख-भाल करें, और उन सभी खोये हुए, भूले हुए, छूटे हुए, आभूषण, सामान या प्राणियों को तब तक अपने संरक्षण के रखे, जब तक कि उनके असली मालिक का पता न लग जाय ।
(२) जेल में बन्द हुए बूढे, बच्चे बीमार और अनाथ कैदियों को राजा की वर्ष गांठ आदि अच्छे उत्सवों या पूर्णिमा आदि पर्वों पर छोड़ देना चाहिए । धोखे में यदि कोई धर्मात्मा पुरुष अपराधी बनाकर कैद में डाला गया हो तथा ऐसे व्यक्ति, जो भविष्य में अपराध न करने की प्रतिज्ञा करते हों, उन्हें अपराध के बदले में धन लेकर छोड़ देना चाहिए, उन्हें फिर जेल में न रखा जाना चाहिए ।
(३) प्रतिदिन या प्रति पाँचवें दिन, ऐसा नियम बना दिया जाय कि उस दिन धन लेकर, शारीरिक दण्ड देकर या कार्य कराकर ( निष्क्रय ) कुछ कैदी छोड़ दिये जांय । धनदण्ड, शारीरिक दण्ड या कार्यदण्ड, इन तीनों में से जो कैदी आसानी से जिस दण्ड को भुगत सके वही दण्ड उसको दिया जाय ।
(४) किसी नये देश की जीतने पर, युवराज का राज्याभिषेक होने पर और राजपुत्र के जन्मोत्सव पर कैदियों को छोड़ देना चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नागरिकप्रणिधि नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ।
दूसरा खण्ड
खण्ड १५३५
तीसरा अधिकरण
तीसरा अधिकरण
धर्मस्थीय
प्रकाशकीय विज्ञप्ति
परिशिष्ट ३.
| प्रकरण ५६-५७ |
|---|
| अध्याय १ |
व्यवहारस्थापना विवाहपदनिबन्धाश्चः
(१) धर्मस्थास्त्रयस्त्रयोऽमात्या जनपदसन्धिसंग्रहणद्रोणमुखस्थानीयेषु व्यावहारिकानर्थान् कुर्युः । (२) तिरोहितान्तरगारनक्तारण्योपध्युपह्वरकृतांश्च व्यवहारान् प्रतिषेधयेयुः । कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डाः । श्रद्धेयानां तु द्रव्यव्यपनयः । (३) परोक्षेणाधिकरणग्रहणमवक्तव्यकरा वा तिरोहिताः सिद्धयेयुः । (४) दायनिक्षेपोपनिधिविवाहसंयुक्ताः स्त्रीणामनिष्कासिनीनां व्याधितानां चामूढसंज्ञानामन्तरगारकृताः सिद्धयेयुः । (५) साहसानुप्रवेशकलहविवाहराजनियोगयुक्ताः पूर्वरात्रव्यवहारिणां च रात्रिकृताः सिद्धयेयुः ।
शर्तनामों का लेखन प्रकार और तत्संबंधी विवादों का निर्णय
( १ ) दो राज्यों या गाँवों की सीमा ( जनपद-संधि ) पर, दस गाँवों के केन्द्र ( संग्रहण ) में, चार सौ गाँवों के केन्द्र ( द्रोणमुख ) में और आठ सौ गाँवों के केन्द्र ( स्थानीय ) में तीन-तीन न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) एक साथ रह कर इकरारनामा, शर्तनामा आदि व्यवहार-संबंधी कार्यों का प्रबंध करें ।
( २ ) नियम-विरुद्ध शर्तनामे : उन शर्तनामों को न्याय-विरुद्ध घोषित किया जाय, जो छिप कर, घर के अंदर, रात में, जंगल में, छल-कपट से और एकांत में किए गए हैं । ऐसा नियम विरुद्ध कार्य करने वालों और कराने वालों, दोनों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इस प्रकार के व्यवहारों में सुनकर गवाही देने वालों को आधा साहस दण्ड, और श्रद्धा-सहानुभूति रखने वालों को अर्थदण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जिस व्यवहार को गुप्त रूप से किसी दूसरे ने सुन लिया हो तथा जिसको नियम विरुद्ध-साबित न किया जा सके, ऐसा व्यवहार यदि छिपा कर भी किया गया हो तो उसे गैर कानूनी करार न दिया जाय ।
( ४ ) पर्दानशीन महिलाओं तथा चैतन्य रोगियों के द्वारा दायभाग, अमानत, धरोहर और विवाहसंबंधी घर के अंदर किए हुए व्यवहार भी नियमविरुद्ध न समझे जांय ।
( ५ ) डाका ( साहस ), चोरी ( अनुप्रवेश ), झगड़ा, विवाह तथा सरकारी
२५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
( १ ) सार्थव्रजाश्रमव्याधचारणमध्येष्वरण्यचरणामारण्यकृताः सिद्धयेयुः । ( २ ) गूढाजीविषु चोपधिकृताः सिद्धयेयुः । ( ३ ) मिथःसमवाये चोपह्वरकृताः सिद्धयेयुः । ( ४ ) अतोऽन्यथा न सिद्धयेयुः । अपाश्रयवद्भिर्वा कृताः, पितृमता पुत्रेण, पित्रा पुत्रवता, निष्कुलेन भ्रात्रा, कनिष्ठेनाविभक्तांशेन, पतिमत्या पुत्रवत्या च स्त्रिया, दासाहितकाभ्याम्, अप्राप्तातीतव्यवहाराभ्याम्, अभिशस्तप्रव्रजितव्यङ्गव्यसनिभिश्चान्यत्र निसृष्टव्यवहारेभ्यः । ( ५ ) तत्रापि क्रुद्धेनार्तेन मत्तेनोन्मत्तेनावगृहीतेन वा कृता व्यवहारा न सिद्धयेयुः कर्तृकारयितृश्रोतॄणां पृथग् यथोक्ता दण्डाः । ( ६ ) स्वे स्वे तु वर्गे देशे काले च स्वकरणकृताः सम्पूर्णचाराः शुद्धदेशा दृष्टरूपलक्षणप्रमाणगुणाः सर्वव्यवहाराः सिद्धयेयुः ।
हुक्म और रात के प्रथम पहर में वेश्यासंबंधी व्यवहार यदि रात के समय में भी किए जांय तो उन्हें गैरकानूनी नहीं माना जाय ।
( १ ) व्यापारी, ग्वाले, आश्रमवासी, शिकारी और गुप्तचर आदि जंगलों में रहने वालों तथा घूमने वालों के द्वारा जंगल में किए गए व्यवहार भी वैध समझे जांय ।
( २ ) गुप्तरूप से जीविका चलाने वालों द्वारा किए गए छल-कपट संबंधी व्यवहार भी नियमानुकूल समझे जांय ।
( ३ ) आपसी समझौते से एकांत में किए गए व्यवहार भी नियमसंगत हैं ।
( ४ ) इस प्रकार की विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्वीकार किए गए सभी व्यवहार गैरकानूनी समझे जांय । निराश्रित व्यक्ति, जिसका पिता जीवित हो, जिसका पुत्र जीवित हो, बिरादरी से बहिष्कृत भाई, जिसकी संपत्ति का बँटवारा न हुआ हो, जिस स्त्री का पति या पुत्र जीवित हो, दास, नाबालिग, बहुत बूढ़ा, समाज में निंदित, संन्यासी, लूले-लंगड़े और बीमार आदि व्यक्तियों द्वारा किए गए व्यवहार भी जायज न समझे जांय; किन्तु उन व्यवहारों को वैध समझा जाय जो कि उन्हें राजा की ओर से प्राप्त हो चुके हों ।
( ५ ) क्रोधी, दुःखी, मत्त, उन्मत्त, पागल आदि व्यक्तियों के द्वारा किये गये व्यवहार भी वैधानिक न समझे जांय । जो भी व्यक्ति इस प्रकार के व्यवहार करें या करायें तथा सुनें उन्हें पूर्वोक्त दण्ड देने चाहिएँ ।
( ६ ) परीक्षा : अपनी-अपनी जाति में उचित देश-काल और प्रकृति के अनुसार किए गए दोषरहित सभी व्यवहार वैध समझे जांय; बशर्ते कि उनकी सूचना
प्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५७
(१) पश्चिमं चैषां करणमादेशाधिवर्जं श्रद्धेयम् । इति व्यवहार-स्थापना ।
(२) संवत्सरमृतुं मासं पक्षं दिवसं करणमधिकरणमृणं वेदकावेदकयोः कृतसमर्थावस्थयोर्देशग्रामजातिगोत्रनामकर्माणि चाभिलिख्य वादिप्रतिवादि-प्रश्नानर्थानुपूर्व्या निवेशयेत् । निविष्टांश्चावेक्षेत ।
(३) निबद्धं पादमुत्सृज्यान्यं पादं सङ्क्रामति । पूर्वोक्तं पश्चिमेनार्थेन नाभिसन्धत्ते । परवाक्यमनभिग्राह्यमभिग्राह्यावतिष्ठते । प्रतिज्ञाय देशं 'निर्दिश' इत्युक्ते न निर्दिशति । निर्दिष्टाद् देशादन्यं देशमुपस्थापयति । उपस्थिते देशेऽर्थवचनं 'नैवम्' इत्यपव्ययते । साक्षिभिरवधृतं नेच्छति । असम्भाष्ये देशे साक्षिभिर्मिथः सम्भाषत । इति परोक्तहेतवः ।
(४) परोक्तदण्डः पञ्चबन्धः । स्वयंवादिदण्डो दशबन्धः । पुरुषभृति-रष्टांशः । पथिभक्तमर्घविशेषतः । तदुभयं नियम्यो दद्यात् ।
दी गई हो और उनके रूप, लक्षण, प्रमाण तथा गुण की अच्छी तरह परीक्षा की गई हो ।
( १ ) बलात्कार जैसे व्यवहारों को छोड़ कर उनके सभी व्यवहार न्याय-सम्मत माने जाँय । यहाँ तक व्यवहार की स्थापना बताई गई ।
( २ ) अपने-अपने पक्ष की सहादत के लिए उपस्थित हुए मुद्दाला ( वेदक ) और मुद्दई ( आवेदक ) के देश, गाँव, जाति, गोत्र, नाम और व्यवसाय आदि को पहिले लिखा जाय; फिर कर्जा लेने या चुकाने का वर्ष, ऋतु, पक्ष, महीना, दिन, स्थान और गवाही आदि को लिखा जाय; अन्त में मुद्दई तथा मुद्दाला के बयान क्रमपूर्वक लिखे जाँय । तब जाकर उन पर विचार किया जाय ।
( ३ ) पराजय के लक्षण : बयान देते समय जो व्यक्ति प्रसङ्ग की बात न कहकर इधर-उधर की हाँकने लगता है; जिसके बयानों में कोई सिलसिला न हो, दूसरे की अमान्य बात को पकड़ कर उस पर डट जाता है, कर्जा लेने के स्थान पर हलफ देकर भी पूछने पर नहीं बतलाता या उसकी जगह किसी दूसरे ही स्थान को बतलाता है स्थान ठीक बताने पर ऋण लेने से मुकर जाता है; गवाहों की बात को स्वीकार नहीं करता; और निषिद्ध स्थान में गवाहों से मिल कर बात करता है; उसको हारा हुआ समझना चाहिए ।
( ४ ) पराजय का दण्ड : ऐसे हारे हुए व्यक्ति को ऋण की रकम का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । बिना गवाह के अपनी ही बात को जो बार-बार ठीक कहता जाय उसको ( देय रकम ) का दसवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । इसके अतिरिक्त हर्जने के रूप में हारे हुए अपराधी से नौकरों के वेतन का आठवाँ हिस्सा और रास्ते का भोजन-भत्ता भी अदा कर लिया जाय ।
१७ कौ०
२५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) अभियुक्तो न प्रत्यभियुञ्जीत, अन्यत्र कलहसाहससार्थसमवायेभ्यः । न चाभियुक्तेऽभियोगोऽस्ति । (२) अभियोक्ता चेत् प्रत्युक्तस्तदहरेव न प्रतिब्रूयात्, परोक्तः स्यात् । कृतकार्यविनिश्चयो ह्यभियोक्ता, नाभियुक्तः । (३) तस्याप्रतिब्रुवतस्त्रिरात्रं सप्तरात्रमिति । अत ऊर्ध्वं त्रिपणावरार्ध्यं द्वादशपणपरं दण्डं कुर्यात् । त्रिपक्षादूर्ध्वमप्रतिब्रुवतः परोक्तदण्डं कृत्वा यान्यस्य द्रव्याणि स्युस्ततोऽभियोक्तारं प्रतिपादयेदन्यत्र प्रत्युपकरणेभ्यः । तदेव निष्पततोऽभियुक्तस्य कुर्यात् । अभियोक्तुर्निष्पातसमकालः परोक्तभावः । प्रेतस्य व्यसनिनो वा साक्षिवचनाः सारम् । अभियोक्ता दण्डं दत्त्वा कर्म कारयेत् । आधिं वा स कामं प्रवेशयेत् । रक्षोधनरक्षितं वा कर्मणा प्रतिपादयेदन्यत्र ब्राह्मणादिति ।
( १ ) फौजदारी, डाका, व्यापारियों और लिमिटेड कम्पनियों के झगड़ों को छोड़कर अभियुक्त, अभियोक्ता पर उलटा मुकदमा नहीं चला सकता है। अभियुक्त भी पहिली बात को लेकर अभियोक्ता पर पुनः मुकदमा नहीं चला सकता है।
( २ ) जवाबतलबी : जवाबतलब किये जाने पर तत्काल ही वादी यदि उत्तर नहीं देता तो उसको पराजित समझा जाय । क्योंकि पूरे सोच-विचार के बाद ही अभियोक्ता दावा दायर करता है, जब कि अभियुक्त ऐसी स्थिति में नहीं रहता है ।
( ३ ) मुहलत : इसलिए, अभियुक्त यदि फौरन ही जवाब न दे सके तो उसे तीन से सात रात तक की मुहलत दी जाय । इतनी मुहलत मिलने पर भी यदि वह उत्तर नहीं दे पाता तो उस पर तीन से बारह पण तक का दण्ड किया जाय । यदि डेढ़ महीने की मुहलत के बाद भी वह अपने अभियोग की सफाई पेश नहीं कर पाता तो उसको देय धन का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय और उसकी सम्पत्ति में से जितना भी न्यायसंगत हो उतना हिस्सा अभियोक्ता को दिलाया जाय; सारी सम्पत्ति को दिये जाने के बाद भी यदि कुछ कर्जा बाकी रह जाय तो अभियुक्त के जीवन-निर्वाह योग्य अन्न, वस्त्र, बर्तन, बिस्तर आदि सामान अभियोक्ता को नहीं दिलाया जाय । यदि अभियोक्ता अपराधी सिद्ध हो जाय तब उपर्युक्त सारे अधिकार अभियुक्त को दिये जायें; किन्तु अभियुक्त ही यदि अपराधी साबित हो जाय तो उसको सफाई पेश करने की मुहलत न दी जाय; बल्कि तत्काल ही पूर्वोक्त दण्ड दिया जाय । यदि बीच ही में अभियुक्त मर जाय या किसी भारी विपदा में फँस जाय तो उसके गवाहों की सहादत के अनुसार अदालत अपराधी अभियोक्ता को यथोचित दण्ड देकर उससे काम ले । नियत समय तक न्यायालय उसको अपने अधिकार में रखे अथवा उससे जन-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को कराये । यदि अभियोक्ता ब्राह्मण हो तो उससे ऐसे कार्य न करवाये जायँ ।
प्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५९
(१) चतुर्वर्णाश्रमस्यायं लोकस्याचाररक्षणात् ।
नश्यतां सर्वधर्माणां राजधर्मः प्रवर्तकः ॥
(२) धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम् ।
विवादार्थश्चतुष्पादः पश्चिमः पूर्वबाधकः ।
(३) अत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु ।
चरित्रं सङ्ग्रहे पुंसां राज्ञामाज्ञा तु शासनम् ॥
(४) राज्ञः स्वधर्मः स्वर्गाय प्रजा धर्मेण रक्षितुः ।
अरक्षितुर्वा क्षेप्तुर्वा मिथ्यादण्डमतोऽन्यथा ॥
(५) दण्डो हि केवलो लोकं परं चेमं च रक्षति ।
राज्ञा पुत्रे च शत्रौ च यथादोषं समं धृतः ॥
(६) अनुशासद्धि धर्मेण व्यवहारेण संस्थया ।
न्यायेन च चतुर्थेन चतुरन्तां महीं जयेत् ॥
(७) संस्थया धर्मशास्त्रेण शास्त्रं वा व्यावहारिकम् ।
यस्मिन्नर्थे विरुद्ध्येत धर्मेणार्थं विनिर्णयेत् ॥
(८) शास्त्रं विप्रतिपद्येत धर्मन्यायेन केनचित् ।
न्यायस्तत्र प्रमाणं स्यात्तत्र पाठो हि नश्यति ॥
( १ ) राजाज्ञा : चारों वर्ण, चारों आश्रम, सम्पूर्ण लोकाचार और नष्ट होते हुए सभी धर्मों का रक्षक राजा है; इसीलिये उसे धर्म का प्रवर्त्तक माना जाता है।
( २ ) धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा, ये विवाद के निर्णायक साधन होने के कारण राष्ट्र के चार पैर माने जाते हैं; इन्हीं पर सारा राज्य टिका है। इनमें भी धर्म से व्यवहार, व्यवहार से चरित्र और चरित्र की अपेक्षा राजाज्ञा श्रेष्ठ है।
( ३ ) उनमें धर्म सच्चाई में, व्यवहार साक्षियों में चरित्र समाज के जीवन में और राजाज्ञा राजकीय शासन में स्थित रहती है।
( ४ ) धर्मपूर्वक प्रजा पर शासन करना ही राजा का निजी धर्म है; वही उसको स्वर्ग तक ले जाता है। इसके विपरीत प्रजा की रक्षा न कर उसको पीड़ा पहुँचाने वाला राजा कभी भी सुखी नहीं रहता है।
( ५ ) पुत्र और शत्रु को उनके अपराध के अनुसार समानरूप से राजा द्वारा दिया हुआ दण्ड ही लोक और परलोक की रक्षा करता है।
( ६ ) धर्म, व्यवहार, चरित्र और न्यायपूर्वक शासन करता हुआ राजा सारी पृथ्वी का स्वामित्व प्राप्त करे।
( ७ ) जहाँ भी चरित्र तथा लोकाचार का धर्मशास्त्र के साथ विरोध की बात उपस्थित हो, वहाँ धर्मशास्त्र को ही प्रमाण मानना चाहिए।
( ८ ) किन्तु, किसी बात पर यदि राजा के धर्मानुकूल शासन का धर्मशास्त्र के
२६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) दृष्टदोषः स्वयंवादः स्वपक्षपरपक्षयोः । अनुयोगार्जवं हेतुः शपथश्चार्थसाधकः ॥ (२) पूर्वोत्तरार्थव्याघाते साक्षिवक्तव्यकारणे । चारहस्ताच्च निष्पाते प्रदेष्टव्यः पराजयः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयाऽधिकरणे विवादपदनिबन्धो नाम प्रथमोऽध्यायः, आदितोः सप्तपञ्चाशः ।
—: ० :—
साथ विरोध पैदा हो जाय, तो वहाँ राज-शासन को ही प्रमाण मानना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से धर्मशास्त्र का पाठ मात्र ही नष्ट होता है।
(१ निर्णय के हेतु : मुकदमे का फैसला देने से पूर्व कुछ बातें आवश्यक हैं; जैसे १. जिसका अपराध देख लिया गया हो, २. जिसने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया हो; ३. सरलता से जिरह; ४. सरलता से कारणों का पता लग जाना और २. कसम दिलाना, ये पाँचों बातें सच्चाई को सिद्ध करने में सहायक होती हैं ।
(२) यदि उक्त पांच हेतुओं के माध्यम से भी वादी-प्रतिवादी की पारस्परिक विरुद्ध दलीलों का उचित समाधान न हो सके तो साक्षियों और गुप्तचरों के द्वारा मामले की छान-बीन कराकर अपराध का फैसला देना चाहिए ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में विवादपदनिबन्ध नामक पहला अध्याय समाप्त ।
—: ० :—