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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन २६६ पूर्वमुक्तोत्तरत्वात् । प्रवृत्तिसामर्थ्येन प्रामाण्यावधारणसम्भवादापातः सन्देहेऽप्य- दोषात् । सामान्यतो निर्दोषत्वस्य भोमाग्रजेऽप्यभावात्, विशेषतस्तथात्वस्य असाधारण्यपर्यवसायित्वात् । यथार्थवाक्यं शब्दः प्रमाणमित्यत्र को दोष इति चेन्न । पूर्वोक्तयाथार्थ्यदूष- णानि तावत्प्रथमः । यथार्थमिति विशेषणस्य व्यवच्छेदकत्वाऽव्यवच्छेदकत्वयोः पूर्ववद्दोषश्च द्वितीयः । वाक्यत्वानिरुक्तिश्च तृतीयः । तथाहि—किमिदं वाक्यं नाम ? प्रयोक्ता सदोष ही है। 'वह वाक्य अप्रमाण है' यह नहीं कह सकते; कारण उसका विषय अबाधित है और संवादी प्रवृत्ति होने से उसमें प्रामाण्य ही सम्भव है। सदोष पुरुष का वचन होने से उसमें आपाततः सन्देह हो, तो भी कुछ हानि नहीं। किञ्च—यदि निर्दोष शब्द का अर्थ सब दोषों से रहित मानें, तो युधिष्ठिर भी ऐसे नहीं हैं। यदि यत्किञ्चित् दोष के अभाव से विशिष्ट को निर्दोष शब्दार्थ मानें, तो लक्षण सर्वलक्ष्यसाधारण न होने से अननुगम हो जायगा । अर्थात् यदि वञ्चनारूप दोष के अभाव का लक्षण में निवेश करें, तो तदभावविशिष्ट वक्ता के वाक्यमात्र में समन्वय हो जायगा, पर लोभरूप दोषा- भावविशिष्ट वक्ता के वाक्य में समन्वय नहीं होगा । समर्थन—'यथार्थवाक्य शब्द-प्रमाण है' इस लक्षण में क्या दोष है ? खंडन— प्रथम तो 'यथार्थानुभवः प्रमा' इस लक्षण के खण्डन में उक्त दोष होंगे । अर्थात् यदि वाक्य में अर्थसादृश्य प्रमेयत्वरूप से ग्रहण करें तो आभासवाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः 'यथार्थज्ञानजनक वाक्य प्रमाण है' ऐसा लक्षण करना होगा । इस लक्षण में भी यदि यत्किञ्चित् रूप से सादृश्य का ग्रहण करें, तो भ्रान्तिज्ञान प्रमेयत्वरूप से अर्थसदृश होने से तज्जनक वाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि भासमान आकार से सादृश्य का ग्रहण करें, तो 'रूपी घटः' इस वाक्य में अव्याप्ति हो जायगी; कारण रूपकत्त्व से ज्ञान में अर्थसादृश्य नहीं है, आदि दोष होंगे । इसी तरह यदि अयथार्थ वाक्य को 'यथार्थ' इस विशेषण का व्यवच्छेद्य मानें, तो जो अंशतः यथार्थ और अंशतः अयथार्थ वाक्य है, वह यथार्थ अंश में भी प्रमाण न होगा । यदि व्यवच्छेद्य न मानें, तो यथार्थविशेषण व्यर्थ हो जायगा—यह द्वितीय दोष है । वाक्यत्व की अनिरुक्ति तृतीय दोष है। देखिये—वाक्य क्या वस्तु है ? अर्थात् उसका निर्वचन नहीं हो सकता ।

एकार्थावच्छिन्नपदसमुदायो वाक्यमिति चेन्न । एकत्वविषयत्वावच्छिन्न- त्वानां वाच्यानि दूषणानि तावत्सन्तु, पदपदार्थं तु चिन्तयामः । सुप्तिङन्तं पदमिति केचित् । वर्णा विभक्त्यन्ताः पदमित्यन्ये । तत्र नाद्यः ; प्रत्येकं मिलितस्य चाव्यापकत्वात् । पृथक्प्रवृत्तिनिमित्ततायाश्च वाक्यलक्षणाव्यापकत्वापातात् । नापि द्वितीयः ; विभक्त्यर्थस्यानुगतस्यासम्भवात् 'विभक्तिरि'त्यनेन सुप्तिङोः , 'प्राग्दिशोऽविभक्ति'रित्यनेन च तसिलादेः पृथक् पृथगेव विभक्तिसंज्ञाविधानात् शब्दसाम्येन च लक्षणाऽयोगात् । निर्वचन—'एक अर्थ से अवच्छिन्न अर्थात् एक अर्थ का वाचक पदसमुदाय वाक्य है ।' खंडन—एकत्व, अर्थत्व और अवच्छिन्नत्व में वक्तव्य दोष संप्रति रहने दें । अर्थात् सम्प्रति क्या एकत्व संख्यारूप है या द्वित्वादिविरहरूप ? इसी तरह अवच्छि- न्नत्व भी विशेषण-विशेष्यसम्बन्धत्व-से अतिरिक्त है या अनतिरिक्त ? दोनों ही विकल्प नहीं बन सकते, यह सब चतुर्थ परिच्छेद में विचारा जायगा । यहाँ केवल पद शब्द के अर्थ का विचार करते हैं कि पदशब्द का अर्थ क्या है ? निर्वचन—कोई आचार्य 'सुप्तिङन्तं पदम्' यह पद का लक्षण करते हैं । अन्य आचार्य 'विभक्त्यन्त वर्ण' को पद कहते हैं । खण्डन—इनमें प्रथम लक्षण युक्त नहीं है, कारण यदि सुबन्त को पद कहें, तो तिङन्त में और यदि तिङन्त को पद कहें, तो सुबन्त में अव्याप्ति हो जायगी । यदि सुप्तिङन्त को पद कहें, तो सुप्तिङ दोनों किसीके अन्त में नहीं हैं, अतः असम्भव हो जायगा । यदि 'सुबन्तं पदम्, तिङन्तं पदम्' इस रीति से दो लक्षण करें, तो सुबन्त 'पद है इस लक्षण की तिङन्त में और तिङन्त पद है, इस लक्षण की सुबन्त में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय लक्षण भी युक्त नहीं है, कारण 'विभक्तिश्च' इससे सुप्-तिङ् की और 'प्राग्- दिशोऽविभक्तिः इससे तसिलादि की पृथक्-पृथक् विभक्ति-संज्ञा होने से विभक्तिशब्द का अनुगत अर्थ नहीं है। अतः शब्दसम होने से केवल सुबन्त-तिङन्त में समन्वित विभक्त्यन्त वर्ण पद है, यह लक्षण हो नहीं सकता । अन्यथा यदि यह लक्षण मानें, तो सुपरहित केवल तसिलन्त भी पद हो जायगा ।

परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन ३०१ किञ्च—वर्णा इति बहुत्वस्य विवक्षितत्वे 'अहम्' इत्यादेरपदत्वप्रसङ्गः । अविव- क्षितत्वे 'देवदत्त' इत्यन्ताकारस्य पदत्वापातः, तस्य विभक्त्यन्तत्वात् । सार्थकस्तथेति चेत्; 'भवति'त्यादौ शवकारादीनां पदत्वप्रसङ्गः, शपः सार्थक- त्वात् । यत्र विहिता विभक्तिस्तदिति चेन्न । शवकारं परित्यज्य पदत्वप्रसङ्गात् । तन्मध्यपतितत्वाच्छबकारोऽपि गृह्यत इति चेत्; तर्हि यत्र विभक्तिर्विधीयते तत्र तद्विभक्तिमध्यपतितं पदमिति वा विवक्षितम्, यत्र विभक्तिर्विधीयते तत्तद्विभक्तिमध्यवर्तिसहितं पदमिति वा ? आद्ये शवकारस्यापि पृथगेव पदत्व- प्रसङ्गः, लक्षणस्य चाव्यापकत्वात् । द्वितीये 'देवदत्तः' इत्यस्यापदत्वप्रसङ्गः , मध्यवर्तिनोऽभावेन मध्यवर्तिसहितविशेषणाभावात् । क्वचिन्मध्यवर्तिसहितस्य क्वचित्केवलस्येति यथासम्भव इति चेन्न । एकानु- गतरूपानभिधाने लक्षणस्याव्यापकतापत्तेर्दुर्निवारत्वात् । किञ्च—'वर्णाः' यहाँ यदि अच् सहित हलों के बहुत्व की विवक्षा करें, तो 'अहम्' इत्यादि पद न कहलायेगा । यदि बहुत्व की विवक्षा न करें, तो 'देवदत्तः' यहाँ 'अः' भी विभक्त्यन्त होने से पद कहा जायगा । समर्थन—'सार्थक विभक्त्यन्त' पद है, अतः 'देवदत्तः' इसका घटक 'अः' पद हो जायगा । खंडन—ऐसा कहने पर 'भवति' का घटक 'अति' भी पद हो जायगा । कारण शप्-प्रत्यय होने से वह सार्थक भी है । समर्थन—'जिससे विभक्ति विहित हो, [ सार्थक विभक्त्यन्त ] वह पद है।' शप् से विभक्ति विहित न होने से वह विभक्त्यन्त पद नहीं होगा । खण्डन—शप् के अकार को त्यागकर 'भूति' एतावन्मात्र पद हो जायगा। लोक में तन्मात्र में पदत्व प्रसिद्ध नहीं है, अतः इष्टापत्ति नहीं कह सकते । समर्थन—'प्रकृति-प्रत्यय के मध्य होने से शप्-विशिष्ट ही पद है।' खंडन—इसमें जहाँ-जहाँ विभक्ति का विधान हो, वहाँ तन्मध्यपतित पद है, यह अर्थ विवक्षित है अथवा जिससे विभक्ति का विधान हो, तन्मध्यपतितयुक्त पद है, यह अर्थ विवक्षित है ? प्रथम पक्ष में शप् का अकार पृथक् ही पद हो जायगा । किञ्च--'भवति' आदि में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में 'देवदत्तः' यह पद न कहलायेगा, कारण मध्यवर्ती का अभाव होने से वह तद्विशिष्ट नहीं है । समर्थन—'कहीं-कहीं जिससे विभक्ति विहित हो, मध्यवर्तिसहित विभक्त्यन्त वह पद है' तथा 'कहीं-कहीं जिससे विभक्ति विहित हो, केवल वह विभक्त्यन्त ही पद है।'

किञ्च—‘देवदत्त + सु’ इत्यपि पदं स्यात् । अथ अपशब्दोऽयम्, पदत्वे सति रुत्वादेर्विधानस्यावश्यम्भावित्वादिति चेन्न । यत एवायमपशब्दः, अत एव भवतो दोषः प्रसज्यते—अपशब्देऽपि पदलक्षणं गतमिति । तस्मात् पाणिनिनाऽऽचार्येण शब्दसिद्ध्यर्थं पदसंज्ञेयं रुत्वादिविध्यनुरोधेनापशब्ददशायामन्यैव कृता नदी- संज्ञावत्, न लौकिकपदव्यवहारसिद्ध्यर्थम् । साधुशब्दविशेषे ततश्च तस्यान्यदेव लक्षणं वाच्यम् । अन्यथा दाक्षीनन्दनोदीरितनदीसंज्ञाप्रत्यभिज्ञायां पाथः प्रार्थयमानः काननस्थलीमलीकाभिमानी भवानीहेत । अथोच्यते—विभक्त्यन्तमेव सर्वलक्षणप्रवृत्त्या निष्पन्नं व्यावहारिकं पदमिति लक्षणमस्तु । मैवम् ; सर्वलक्षणप्रवृत्तेः सर्वत्रासम्भवात् । सम्भवत्सर्वलक्षणप्रवृत्त्येति चेन्न । सम्भवत्त्वं तत्काले कालान्तरे वा विवक्षितम् ? आद्ये ‘देवदत्त+रु’ इत्यपि पदं स्यात् रुत्वविधानकाले विसर्गस्यासम्भावितत्वात् । खण्डन — सब लक्ष्यों में एक अनुगत लक्षण न होने से प्रथम लक्षण की द्वितीय लक्षणों के लक्ष्य में और द्वितीय की प्रथम लक्षण के लक्ष्य में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च —‘देवदत्त + सु’ यह भी पद हो जायगा, कारण यह भी विभक्त्यन्त है । समर्थन —यह अपशब्द या अशुद्ध शब्द है, अतएव ऐसा नहीं बोलते । किन्तु पद तो है ही, कारण यदि यह पद न हो, तो रुत्व-विसर्ग कैसे होगा ? खण्डन —अपशब्द है, इसीलिए तो दोष होता है कि अपशब्द में भी आपके पद-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । तस्मात् आचार्य पाणिनि ने शब्दसिद्धि के लिए रुत्व आदि विधियों के अनुरोध से नदीसंज्ञा के तुल्य अपशब्द-साधारण पद का अन्य ही लक्षण किया है । लौकिक पद-व्यवहार की सिद्धि के लिए केवल साधुशब्दविषयक लक्षण नहीं किया है। अतः लौकिक पद का और ही लक्षण करना चाहिए । अन्यथा यदि पाणिनिकृत लक्षण को लोकसाधारण मानें, तो दाक्षीनन्दनकृत नदीसंज्ञा का अनुसन्धानकर अलीक- अभिमानी आप निर्जल काननस्थली को नदी मानकर जल के लिए उसे प्राप्त कीजिये । समर्थन —विभक्त्यन्त ही [ सब लक्षणों की प्रवृत्ति से निष्पन्न ] लौकिक पद है । खंडन —सर्वत्र सब लक्षणों की प्रवृत्ति न होने से असम्भव हो जायगा । समर्थन —जिन-जिन लक्षणों की जहाँ-जहाँ प्रवृत्ति हो, उन सब लक्षणों से निष्पन्न विभक्त्यन्त लौकिक पद है। खंडन —'उस काल में जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति सम्भव हो', यह अर्थ है अथवा 'अन्य काल में भी जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति

परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन ३०३ कालान्तरेऽपीति पक्षे 'देवदत्त' इत्यपि पदं न स्यात्, इत्यादिपदपूर्वकालभाविनो यत्वयलोपादेरकरणात् । शब्दान्तरसन्निधिव्यतिरेकेण यद्भावि लक्षणं तद्विवक्षितमिति चेन्न । 'जीविका- कृत्य व्याचष्टे' इत्यर्थे 'जीविकां कृत्वा व्याचष्टे' इति प्रयुज्यमानं वाक्यं स्यात् । एकार्थाविच्छिन्नपदसमुदायस्य तत्रापि गतत्वात् । कृत्वेत्यनेन सम्बद्धस्य जीविका- मित्यस्योक्तपदलक्षणेन सङ्गृहीतत्वात् । यदुपाधिका यल्लक्षणप्रवृत्तिस्तदुपाधिसम्पत्तौ तेन निष्पन्नं तथेति चेन्न । यत्र नास्त्युपाधिसम्पत्तिस्तत्र केवल तस्यां सत्यामित्यस्याभावादपदत्वापत्तेः । यस्यामवस्थायां यस्य लक्षणस्योपनिपातस्तत्सर्वसम्पत्तौ विभक्त्यन्तं पदमिति का सम्भव हो', यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में 'देवदत्त+रु' यह भी पद हो जायगा, कारण रुत्वविधानकाल में विसर्ग की प्रवृत्ति तो है नहीं और जिन-जिन सूत्रों की प्रवृत्ति है, वे प्रवृत्त हो चुके हैं। द्वितीय पक्ष में 'देवदत्तः' यह भी पद न कहलायेगा, कारण उसके साथ 'इति' आदि जोड़ने पर यत्व, यलोप आदि की प्रवृत्ति की भी सम्भावन है, किन्तु वे अभी प्रवृत्त नहीं हुए हैं। समर्थन—'शब्दान्तर-सन्निधान के अभावकाल में जिन-जिन लक्षणों की प्रवृत्ति हो, उन-उन लक्षणों की प्रवृत्ति से निष्पन्न पद है।' खण्डन—'जीविकाकृत्य व्याचष्टे' इस अर्थ में प्रयुक्त 'जीविकां कृत्वा व्याचष्टे' यह भी वाक्य हो जायगा । कारण 'कृत्वा' इससे सम्बद्ध 'जीविकाम्' यह उक्त पद लक्षण से संगृहीत हो जाने से वह एक अर्थ से अवच्छिन्न पदसमुदायरूप वाक्य है ही। समर्थन—'जिन-जिन कारणों से जिन-जिन सूत्रों की प्रवृत्ति हो, उन-उन कारणों की सम्पत्ति होने पर उन-उन सूत्रों की प्रवृत्ति से निष्पन्न ही पद है। और औपम्यरूप अर्थ तथा 'कृत्वा' और 'जीविकाम्' इन दो पदों के परस्पर सन्निधानरूप कारण से गति- संज्ञा-समासल्यप् की प्रवृत्ति होती है। अतः इन सूत्रों की प्रवृत्ति होने पर ही उक्त वाक्यघटक पद होंगे, अन्यथा नहीं । खंडन—जहाँ औपम्यादि कारण नहीं हैं, वहाँ 'उपाधिसम्पत्तौ सत्याम्' इस लक्षणांश का समन्वय न होने से पदत्व नहीं होगा। समर्थन—'जिस अवस्था में जिन-जिन सूत्रों की प्रवृत्ति हो, उन उन-उन सूत्रों की प्रवृत्ति होने पर उस अवस्था में विभक्त्यन्त पद है।' खंडन—लक्षण में 'अवस्था' पद से अवस्था-विशेष का ग्रहण है या अवस्था-सामान्य का ? यदि

३. तृतीय परिच्छेद: प्रत्यक्ष, अनुमान, व्याप्ति, पक्षधर्मता व हेत्वाभास खण्डन

३०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम चेन्न । यस्यामवस्थायामित्यवस्थानां भिन्नभिन्नाकारेण परामर्शे लक्षणस्याननुगमा- दव्यापकतादोषः । अवस्थानामैक्यमविवक्षितमसम्भावितं च । सर्वदा सर्वावस्था- विषये लक्षणप्रसङ्गादिति । स च 'भवति, भवति, भवतीति, भवत्यस्तीति, पटः पटा- विति, पटं पट इति चे'त्यतिव्याप्तिः । एतेन — अपौरुषेयं वाक्यं तदित्यपि निरस्तम् । अर्थापत्ति-लक्षण-खण्डनम् का पुनरर्थापत्तिरपि ? अवस्था-विशेष का ग्रहण करें, तो जिस 'देवदत्तः' इस अवस्था का लक्षण में निवेश होगा, उससे अन्य यज्ञदत्त आदि अवस्थाओं में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण अवस्थामात्र में ऐकरूप्य अविवक्षित तथा असम्भावित है । अन्यथा सब अवस्थाओं में, सब कालों में सब लक्षणों की प्रवृत्ति हो जायगी । अर्थात् यदि अवस्थाओं का ऐक्य पदों की एकरूपतारूप है, तो 'भवति' यह तिङन्त तथा 'भवति' सप्तम्यन्त तथा 'भवति' सम्बोधन तीनों की एक अवस्था होने से 'भवति' इस अवस्था में प्रवृत्त सब लक्षणों की प्रवृत्ति किसी 'भवति' में नहीं है, अतः तीनों में अपदत्व हो जायगा । यदि अर्थैकरूप अवस्थाओं का ऐक्य हो, तो 'अस्ति, भवति' इन दोनों की एक अवस्था होने से उस अवस्था में प्रवृत्त सब लक्षणों की एक में प्रवृत्ति न होने से अव्याप्ति हो जायगी । यदि एकविभक्तिकत्वरूप अवस्थाओं का ऐक्य हो, तो 'पटः पटौ' इन दोनों में प्रथमारूप एक विभक्ति होने से एक-अवस्था हो जायगी और उस अवस्था में प्रवृत्त सभी लक्षणों से प्रत्येक की निष्पत्ति न होने से अव्याप्ति हो जायगी । यदि प्रातिपदिक का ऐक्यरूप अवस्थाओं का ऐक्य है, तो 'पटम्, पटः' इन दोनों की एक-अवस्था में प्राप्त सब लक्षणों से प्रत्येक की निष्पत्ति न होने से अव्याप्ति हो जायगी । पद तथा वाक्य की निरुक्ति न होने से ही अपौरुषेय वैदिकवाक्य प्रमाण-शब्द है, यह लक्षण भी खण्डित जानना चाहिए । अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डन अर्थापत्ति क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से मीमांसक का अभिमत अर्था- पत्ति-प्रमाण भी अनिर्वचनीय ही है ।

५परिच्छेद ] अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डन ३०५ अन्यथानुपपत्तिरिति चेन्न । यतोऽन्यत्वं तत्सिद्धेरग्रे तदसिद्धेः । सिद्धे नानुषपत्तिरिति चेन्न । विशेषणव्यवच्छेद्याप्रतीतौ तद्वैयर्थ्येन तदनुपा- दाने सर्वथाऽनुपपत्त्यर्थतायां फलविरोधात् । केनाप्यनुपपत्त्यर्थत्वे साध्यसिद्ध्य- पर्यवसानात् । निर्वचन—‘अन्यथा ( बहिःसत्त्व के बिना ) जीवित देवदत्त के गृह में असत्त्व की अनुपपत्ति अर्थापत्ति प्रमाण है' ऐसा लक्षण हो सकने से वह अनिर्वचनीय नहीं है । खंडन—जिस बहिःसत्त्व के बिना अनुपपत्ति है, उसकी पहले से ही सिद्धि होने से आगे अर्थापत्ति प्रमाण की सिद्धि ही नहीं हो सकती । अर्थात् बहिःसत्त्वान्यथात्वरूप उपपादक का ज्ञान प्रतियोगिज्ञानाधीन होने से पहले बहिःसत्त्व ज्ञात होना ही चाहिए । फिर तो बहिःसत्त्वरूप अर्थापत्ति का कोई प्रयोजन ही नहीं रहा । समर्थन—देवदत्त का बहिःसत्त्व अर्थापत्ति का फल है और सामान्यतः सिद्ध बहिः- सत्त्व के बिना अनुपपत्ति अर्थापत्तिरूप करण है । अतः सामान्यतः बहिःसत्त्व की प्रथम से सिद्धि होने पर भी कुछ हानि नहीं है । खंडन—यदि विशेषतः असिद्ध देवदत्तीय बहिःसत्त्व के व्यवच्छेदार्थ 'सिद्धेन' यह विशेषण है, तो पूछा जा सकता है कि वह व्यवच्छेद्य प्रसिद्ध है या नहीं ? यदि हाँ, तो फल पहले से ही सिद्ध होने से अर्थापत्ति व्यर्थ है । यदि वह प्रसिद्ध नहीं है, तो व्यवच्छेद्य का अभाव होने से ही उक्त विशेषण व्यर्थ है । यदि वह विशेषण न देकर अनुपपत्तिमात्र को अर्थापत्ति कहें, तो फल के साथ विरोध हो जायगा । अर्थात् 'सर्वप्रकारेण अनुपपत्तिमात्र' को करण कहें, तो अनुपपत्ति शब्द का फल के साथ विरोध होने से उपपादक प्रमा अनुपपन्न हो जायगी, कारण वह भी सर्वान्तःपाती है। एवञ्च लक्षण में असंभव हो जायगा । यदि 'केनापि प्रकारेण अनुपपत्तिमात्र'को करण कहें, तो वैसा करण चाहे कुछ भी फल सिद्ध कर सकता है, 'देवदत्तीय बहिःसत्त्व' रूप साध्य की सिद्धि में ही उसका पर्यवसान हो नहीं सकता । १ जहाँ ज्योतिषशास्त्र से 'वर्षशतजीवी देवदत्तः' ऐसा ज्ञान होने पर 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्' ऐसा सामान्यतो दृष्ट अनुमान होता है, फिर अनुपलब्धि प्रमाण से 'देवदत्तो गृहे नास्ति' ऐसा ज्ञान होता है, वहाँ 'देवदत्तस्य गृहे असत्त्वे सति वर्षशतजीवित्वं बहिःसत्त्वं विना अनुपपन्नम्, इति तेन बहिःसत्त्वं कल्प्यते' ऐसा ज्ञान होता है । यहाँ पर अन्यथानुपपत्ति प्रमाणरूप अर्थापत्ति है और बहिःसत्त्वकल्पन फलरूप अर्थापत्ति है । 'अर्थस्य आपत्तिर्यस्याः' इस व्युत्पत्ति से प्रमाण में और 'अर्थस्य आपत्तिः' इस व्युत्पत्ति से प्रमा में अर्थापत्ति शब्द का प्रयोग होता है । मीमांसक प्रत्यक्षादि चार प्रमाणों से पृथक् अर्थापत्ति को पञ्चम प्रमाण मानते हैं । उसीका खण्डन यहाँ करते हैं । ३६

३०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रमाणयोर्विरोधानुपपत्तिरिति चेन्न । असिद्धत्वात् । प्रमाणत्वेनाभिमन्य- मानयोरिति । अभिमतेर्भ्रमार्थत्वेऽतिप्रसङ्गात् । ज्ञानार्थत्वेऽप्युक्तदोषानिवृत्ति- रेव । अनिर्णीत प्रामाण्याप्रामाण्ययोरित्यत्रापितथैव । तथाहि—सत्प्रतिपक्षेऽपि तस्य तदुपपादकः फलकत्वापत्तेः । तत्र विरोधे व्याहत्याैकाप्रामाण्यनिश्चयः, यत्र तु नैवं तद्विवक्षितमिति चेन्न । एवं सत्प्रतिपक्षवदन्यत्रापि विरोधार्थत्वेनैवाभासत्वाविशेषात् । समर्थन—ज्योतिःशास्त्र से 'वर्षशतजीवी देवदत्तः' ऐसा निश्चय होने पर 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्' यह सामान्यतो दृष्ट अनुमान और 'देवदत्तः गृहे नास्ति' यह अनुपलब्धि दोनों प्रमाणों का बहिःसत्त्व-कल्पना के बिना परस्पर विरोध होना अनुप- पत्ति या अर्थापत्ति है, जो बहिःसत्त्वरूप फल की कल्पनाकर शान्त हो जाती है । खण्डन—प्रमाणों में परस्पर विरोध कहीं भी देखा नहीं गया है, अतः ऐसा लक्षण अयुक्त (असंभव समर्थन—अपने-अपने विषय में शूर होने से भले ही प्रमाणों में विरोध न हो, प्रमा- णत्वेन अभिमतों में विरोध की अनुपपत्ति अर्थापत्ति है, ऐसा कहेंगे, तब तो असंभव न होगा। खण्डन—'अभिमत' शब्द का अर्थ क्या है, क्या भ्रम है, क्या ज्ञान है या ऐसा ज्ञान, जिसका प्रामाण्य-अप्रामाण्य अनिश्चित हो ? तीनों पक्षों में दोष होगा । यदि अभिमत का अर्थ भ्रम कहें, तो अतिप्रसंग हो जायगा। अर्थात् माला में एक को 'सर्पोऽयम्' यह भ्रान्ति हुई, तो दूसरे को 'दण्डोऽयम्' । एवञ्च यहाँ भी दोनों में विरोधानुपपत्ति होकर उपपाद- कान्तर की कल्पना अर्थापत्ति होने लगेगी । यदि ज्ञान अर्थ मानें, तो भी उक्त दोष बना ही रहेगा, अर्थात् उस ज्ञान को प्रमाण मानेंगे, तो विरोध ही असिद्ध होगा और यदि अप्रमाण या प्रमाण-अप्रमाणसाधारण मानें, तो पहले पक्ष का ही दोष रहेगा । तृतीय पक्ष में भी वैसा ही अतिप्रसंग है । देखिये—यदि ज्ञानों के विरोध की अनुपपत्ति से उपपादक की कल्पना करें, तो 'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्, शब्दो नित्यः श्रावणत्वात्' इस सत्प्रति- पक्षस्थल में भी ज्ञानों का विरोध अनुपपन्न होकर किसी अन्य उपपादक की कल्पना करेगा । अर्थात् वहाँ भी अर्थापत्ति का लक्षण अतिव्याप्त हो जायगा । समर्थन—सत्प्रतिपक्ष-स्थल में विरोध होने पर व्याघात होने से एक के अप्रामाण्य का निश्चय होता है । किन्तु अर्थापत्ति-स्थल में बहिःसत्त्व की कल्पना से भी उपपत्ति हो जाती है, व्याघात नहीं होता । अतः वहा एक के अप्रामाण्य का निश्चय नहीं होता । हमें यहाँ ऐसा ही विरोध विवक्षित है । खंडन—जैसे सत्प्रतिपक्ष-स्थल में विरोध

परिच्छेद ] अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डनं ३०७ तर्कयोर्विरोधोऽपेक्षित इति चेन्न । मिथो विरोधेन तर्कयोरप्याभासत्वात् । विशेषप्रवृत्तप्रमाणार्थप्रतिक्षेपविषयत्वसंशयोऽविशेषप्रवृत्ततद्विपरीतार्थप्रमाणस्य विरोध इति चेन्न । विशेषविषयप्रमाणबोधितवैपरीत्ये सति तद्विरुद्धार्थांशे संशयस्य दुर्बलस्यानवकाशत्वेन अविशेषप्रवृत्तप्रमाणविषयतां तदीयां गोचरयितुमप्यसा- मर्थ्यादेव । अविशेषप्रवृत्तस्य प्रमाणस्य तद्विपरीतार्थविशेषविषयप्रमाणदर्शनं तदितरविशेष- विषयप्रमाफलं तथेति चेन्न । अविशेषप्रवृत्तस्य प्रमाणस्य तद्विपरीतार्थविशेष- से एक के आभासत्व की कल्पना होती है, वैसे ही अर्थापत्ति-स्थल में भी विरोध से एक का आभासत्व हो जायगा । समर्थन -- यहाँ 'विरोध' पद से तर्कों का विरोध विवक्षित है । अर्थात् ज्योतिषशास्त्र से 'वर्षशतजीवी देवदत्तः' ऐसा ज्ञान होने पर 'यदि देवदत्तः क्वचित् न स्यात् तदा वर्षशतजीवी न स्यात् , यदि देवदत्तः बहिर्न स्यात् तदा गेहनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगी न स्यात्' इन दोनों तर्कों के 'क्वचित्' शब्द का गृहसत्त्व में पर्यवसान होने से विरोध की अनुपपत्ति ही अर्थापत्ति है । खंडन - प्रमाणों की तरह तर्कों में भी विरोध नहीं होता । यदि विरोध हो, तो वे तर्काभास हो जाते हैं । प्रकृत में अनुपलब्धि से बाधित होने से क्वचित्त्व से प्रवृत्त तर्क का गृहसत्त्व में पर्यवसान नहीं हो सकता, अतः विरोध नहीं है । समर्थन - 'सामान्यतः प्रवृत्त सत्त्वविषयक पूर्वजात सामान्यतो दृष्टरूप अनुमानप्रमाण- धर्मिक तादृश संशय को ही अर्थापत्ति कहेंगे, जिसका विषय पश्चात् जात अनुपलब्धिरूप प्रमाण के विषय गृहासत्त्व का अभाव (गृहसत्त्व) हो ।' अर्थात् 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्, इत्यनुमितौ गृहसत्त्वविषयत्वमस्ति न वा' यह संशय अर्थापत्ति है । खंडन - 'देवदत्तो गेहे नास्ति' इस अनुपलब्धिरूप प्रमाण से गृहास व का बोध (विशेष-दर्शन) होने पर गृहसत्त्व अंश के बोधन में दुर्बल संशय बाधित हो जाने से उसमें सामान्यतः प्रवृत्त प्रमाण की विरुद्ध-अंशीय विषयता को विषय करने की सामर्थ्य ही नहीं हो सकती । अर्थात् संशय विशेषादर्शनमूलक ही होता है । यहाँ जब गृहासत्त्व का विशेषदर्शन हो गया, तो गृहसत्त्वविषयक संशय हो ही नहीं सकता । समर्थन -- 'सामान्यतः प्रवृत्त 'देवदत्तः क्वचिदस्ति वर्षशतजीवित्वात्' इस सामान्यतो दृष्टरूप प्रमाण का तद्विषयविपरीतार्थ गृहासत्त्वविषयक अनुपलब्धिरूप प्रमाण का दर्शन तदितरविषय बहिःसत्त्वप्रमा का जनक है और वही अर्थापत्ति है ।' खंडन - प्रमाणों का विपरीतार्थत्वज्ञान उभय विषयों के सत्त्वासत्त्वरूप विरोध-गर्भ

३०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

विषयस्य च प्रमाणस्य च विषययोस्तद्विपरीतत्वविशेषणप्रतीत्यङ्गीकारलब्धायां परस्परविरुद्धत्वप्रतीतौ धर्मिणोर्विरुद्धधर्माध्यासस्य भेदस्य विरोधविवेचनस्फुटतद्गर्भ- प्रवेशतया तत्सहज्ञेयस्य तन्नान्तरीयकस्य वाऽन्यत्रेवाऽन्यत एव प्राप्तेः । किञ्च—अविशेषप्रवृत्तस्यैव तस्य किं विशेषविषयत्वम्, अथ सामान्यतः प्रवृत्तस्य नान्तरीयकत्या प्रागेव विशेषविषयस्य विशेषविषयत्वेनाज्ञातस्य विशेष- विषयत्वम् , अथवा सामान्यस्य तद्विषयस्य विशेषः, उत तद्विषयीकृतविशेषगतं किमपि धर्मान्तरमिदानीं प्रमीयते ? नाद्यः ; अर्थापत्तेर्भ्रमकरणत्वापत्तेः । न द्वितीयः ; तदनुव्यवसायोत्पत्ते- स्तद्विषयप्रतीत्यसम्भवात् । न तृतीयः ; सामान्यस्यानन्तर्भाविताश्रयस्य प्रत्येतुम- शक्यत्वात् प्रागेव तत्सिद्धेः । है और विरोधपदार्थ सत्त्व-असत्त्व का एक धर्मी में असमावेश ही है । अतः विरोध- ज्ञान के साथ ही धर्मिभेद ज्ञात हो ही जाता है। यदि भेद को अन्योन्याभावरूप मानें, तो 'सत्त्वासत्त्वे भिन्नधर्मिके विरुद्धत्वात्' इस अनुमान से ही धर्मिभेद सिद्ध हो जायगा। यद्यपि सत्त्वासत्त्व से धर्मिभेदमात्र की ही सिद्धि होती है, सत्त्व के बहि- धर्मिकत्व की सिद्धि नहीं हो सकती; फिर भी जब असत्त्व गृहधर्मिक प्रमित हो जाता है, तब सत्त्व का धर्मिभेद बहिर्धर्मिक ही पर्यवसित होता है। एवञ्च फिर स्वतन्त्र अर्थापत्ति प्रमाण मानने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती । किञ्च—सामान्यतः प्रवृत्त प्रमाण में ही विशेषविषयकत्व पश्चात् ज्ञात होता है, या सामान्यतः प्रवृत्त प्रमाण ही नान्तरीयक होने से प्रथम से ही विशेषविषयक है, किन्तु वह विशेषविषयकत्व अज्ञात है, जो इदानीं ज्ञात होता है अथवा सामान्यविषयक ज्ञान ही विनिगमक न होने से गृहसत्त्व और बहिःसत्त्व उभयविषयक है, 'गृहे नास्ति' इस अन्यथानुपपत्ति से उसका इदानीं बहिःसत्त्व में पर्यवसान ज्ञात होता है किंवा सामान्य- ज्ञान के विषय-विशेष में कोई अन्य धर्म इदानीं प्रतीत होता है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है, कारण सामान्यविषयक ज्ञान में विशेषविषयत्व का विषय करनेवाला ज्ञान भ्रम हुआ । अतः उसका करण अर्थापत्ति अप्रमाण हो जायगी । द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं, कारण सामान्यविषयक ज्ञान नान्तरीयक होने से विशेष- विषयक भी है। अतः अनुव्यवसाय से ही विशेषविषयत्व का ज्ञान हो जाने से तदर्थ अर्थापत्ति का स्वीकार व्यर्थ ही है। तृतीय कल्प भी युक्त नहीं, कारण यदि सामान्यज्ञान नान्तरीयक होने से विशेषद्वयविषयक मानें, तो भी अभिमत बहिःसत्त्वविषयकत्व पूर्व से ही सिद्ध है। अतः तद्ज्ञापक अर्थापत्ति अनुवादक ही हुई, स्वतन्त्र प्रमाण नहीं ।

परिच्छेद ] अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन १०६ नापि चतुर्थः; तद्धि प्रतीयमानविरोधिद्वयतिरिक्तत्वम्, अन्यद्वा स्यात् ? नान्त्यः; तत्प्रतीतौ सामर्थ्यानुपदर्शनेन अनियमप्रसङ्गात् । न प्रथमः; अनुगताननु- गतजातिव्यक्तिचाक्षुषाचाक्षुपादिव्यक्तिगन्धादितादात्म्यवादिनये तदुभयप्रमाता- दात्म्यविषयताव्युदासं विना विरोधासिद्ध्या तद्गमणिकात्वस्यैवासिद्धेः । तदुभयप्रतीतौ च तदवधारणे प्रागेव तत्प्रतीतौऽर्थापत्त्यनुवादतापत्तेः । अनुपलब्धिलक्षण-खण्डनम् योग्यानुपलम्भोऽभावप्रमाकरणमित्यप्ययुक्तम्; प्रमाणाभावस्य तथात्वे चतुर्थ कल्प भी युक्त नहीं है । कारण वह धर्म क्या है, प्रतीयमान विरोधी धर्म- ( गृहसत्त्व ) व्यतिरिक्तत्व ( बहिःसत्त्व ) है या उससे अन्य ही कोई धर्म है ? इनमें द्वितीय पक्ष तो युक्त नहीं है ; कारण उक्त धर्म का अन्यत्वरूप से ज्ञान होने पर भी विशेषरूप से ज्ञान न होने से उसमें अर्थापत्ति की सामर्थ्य कह नहीं सकते । प्रथम पक्ष भी अयुक्त है, कारण जो ( आचार्य ) अनुगत जाति और अननुगत व्यक्ति का तथा चाक्षुष व्यक्ति और अचाक्षुष गन्ध का तादात्म्य मानते हैं; उनके मत में देवदत्त के सत्त्व- असत्त्व का भी गृह के साथ तादात्म्य ही है । अतः उन दोनों का विरोध ही नहीं है । फिर वह विरुद्धत्व प्रतीति से बहिःसत्त्व का गमक कैसे होगा ? जो धर्म और धर्मी का भेद मानते हैं, उनके मत में भी धर्मी का भेद धर्मी के विरोध की प्रतीति के साथ ही ज्ञेय है या नान्तरीयक होने से अनुमान का विषय है । अतः इस कल्प में भी अर्थापत्ति अनुवादक होने से प्रमाण नहीं हो सकती । अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन 'योग्य अनुपलब्धि अभाव-प्रमा का करण है—यह भी अयुक्त है; कारण यदि उपलब्धि शब्द का अर्थ प्रमा हो, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम से पूर्व रजतत्व की स्मृतिरूप ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति होने पर भी रजतत्व की प्रमा का अभाव ही है । अतः अनुप- लब्धिरूप कारण होने से 'इदं न रजतम्' ऐसी अभाव-प्रमा ही होनी चाहिए, 'इदं १ 'भूतले घटः, भूतले पटः' इत्यादि व्यवहार से जैसे घटादि भावों को बाह्य पदार्थ मानते हैं, वैसे ही 'भूतले घटाभावः, भूतले पटाभावः' इत्यादि व्यवहार से भेदवादी अभाव को भी बाह्य पदार्थ मानते हैं। भेद यह है कि नैयायिक उसे प्रत्यक्षसिद्ध मानते हैं, तो मीमांसक चक्षुरादि सन्निकर्ष न होने से इस अभाव-प्रमा को अनुपलब्धिप्रमाणजन्य मानते हैं। यहाँ उसी अनुपलब्धि प्रमाण का खण्डन करते हैं।

३१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम विभ्रमानुदयप्रसङ्गात् । उपलम्भाभावमात्रस्य तथात्वे शङ्खधवलिमप्रतिसन्धानवतः पीतभ्रमानुदयप्रसङ्गात् । कालभेदात्तत्राविरोध इति चेन्न। तथापि संसृष्टयोरन्योन्याभावाग्रहण- प्रसङ्गात्, तादात्म्यस्य स्वरूपमात्रानतिरेकात् । अभावस्फुरणे च तत्प्रतिभानस्य ध्रौव्यात् । किञ्च—योग्यता हि तत्तदविनाभूतान्यप्रतियोगिप्रमापकसाकल्यमिष्यते । रजतम्' ऐसा भ्रम नहीं होना चाहिए । यदि उपलम्भ शब्द का ज्ञानमात्र अर्थ करें, तो यद्यपि 'इदं रजतम्' इस विशिष्टवैशिष्ट्यावगाही भ्रमस्थल में दोष नहीं है, कारण प्रत्यक्ष में सन्निकर्ष के बिना भान न होने से भ्रम से पूर्व ज्ञानलक्षणा सन्निकर्ष के सम्प- त्त्यर्थ रजतत्व की स्मृति अवश्य माननी पड़ेगी । अतः रजतत्वोपलब्धि का अभावरूप कारण न होने से 'इदं न रजतम्' यह अभाव-प्रमा नहीं होगी [ किन्तु 'इदं रजतम्' यह भ्रम ही होगा । ] फिर भी 'श्वेतः शंखः' ऐसा स्मरण रखनेवाले को विरोधी ज्ञान होने से पीतत्वस्मृति नहीं रहती । एवञ्च वहाँ पीतत्वोपलम्भाभावरूप कारण होने से 'पीतो न शंखः' यह अभाव-प्रमा ही होनी चाहिए, 'पीतः शंखः' यह भ्रम नहीं होना चाहिए । समर्थन—'पीतः शङ्खः' इस भ्रम में पीतत्व का भान पीतत्वस्मृतिरूप ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति के बिना हो नहीं सकता । अतः अनुभव के अनुरोध से कल्पना करेंगे कि उक्त स्मृति के जनक संस्कार के उद्बोधक पित्तादि दोष से ही 'श्वेतः शङ्खः' इस पूर्वद्वितीयक्षणवर्ती प्रतिसन्धान का प्रतिबन्ध भी होता है । अर्थात् प्रतिबन्धक के न होने से भ्रम से पूर्वक्षण में पीतत्व-स्मृति है। अतः अनुपलब्धिरूप कारण न होने से अभाव की प्रमा नहीं होती, किन्तु 'पीतः शङ्खः' ऐसा भ्रम ही होता है । खंडन—तब तो चक्षुःसंयुक्त घट-पटादि के अन्योन्याभाव का प्रत्यक्ष न होगा । कारण अभाव-प्रत्यक्ष में प्रतियोगी के प्रत्यक्ष का अभाव कारण है और अन्योन्याभावग्रह-स्थल में सर्वत्र नियमतः प्रतियोगी का प्रत्यक्ष रहता है । 'तादात्म्य अन्योन्याभाव का प्रतियोगी है, घट-पट नहीं' यह नहीं कह सकते, कारण घट-पट का तादात्म्य घट-पटरूप होने से यदि तादात्म्य उसका प्रतियोगी है, तो घट-पट भी प्रतियोगी ही हैं । इसी प्रकार 'घटः पटात्मा न' इत्याकारक अन्योन्याभाव के प्रत्यक्षस्थल में सर्वत्र नियमतः घट-पट की प्रतीति ही रहती है । अतः यदि अनुप- लब्धि को कारण मानें, तो अन्योन्याभाव का कहीं भी प्रत्यक्ष नहीं होगा । किञ्च—प्रतियोगी और उससे व्याप्त प्रतियोगिसन्निकर्षादि से अन्य प्रतियोगी प्रमाजनक आलोकादि का समूह ही योग्यता है । ऐसा मानने पर जहाँ भाव (प्रति-

परिच्छेद ] अनुपलब्धि लक्षण का खण्डन ३११ तथा सति च यत्र भावोपलम्भस्तत्राप्यभावप्रमा स्यात् । न हि तत्र हेतुव्यतिरेकेणैव वा सत्येव वा तदभावप्रमोत्पद्यते । तत्तदविनाभूतविरहसहितः स तथेति चेन्न । तदविनाभूतव्यतिरेकस्य तद्‌व्यति- रेकेणैवान्यथासिद्धसन्निधेरपि हेतुत्वाङ्गीकारे प्रमाणाभावात् । अत एव आलोकस्या- ध्यक्षणे नाऽऽलोकान्तरवत्ताऽवयवेनावयविना वा, आलोकेनान्यथासिद्धसन्निधि- र्हेतुरित्यालोकाभावग्रहे सा नापेक्ष्यते । अर्थाक्षयोगस्तु नार्थव्याप्तः , अंशत ऐक्यात् । तद्विरहसहितः स तथेति चेन्न । इन्द्रियसन्निकर्षस्य हि प्रतियोग्युपलम्भे तावद्धेतुताऽङ्गीक्रियते । तत्र किं सन्निकर्षव्यतिरेके कार्यानुदयोदाहरणमेष्टव्यं न वा ? योगी ) का प्रत्यक्ष होता है, वहाँ भी अभाव की प्रमा हो जायगी । अर्थात् जहाँ 'घटः' ऐसी प्रमा है, वहाँ भी 'घटो नास्ति' ऐसी प्रमा हो जानी चाहिए । कारण वहाँ हेतु के बिना ही या विद्यमान ही घटादि-प्रमा नहीं होती है, किन्तु हेतु से ही होती है । अतः प्रतियोगी की प्रमा की कारणसमूहरूप योग्यता विद्यमान है । समर्थन—प्रतियोगी और प्रतियोगिव्याप्त के अभाव से युक्त प्रतियोगिप्रमाजनक साकल्य उक्त स्थल में नहीं है, किन्तु प्रतियोगी का सन्निकर्ष ही है। अतः अभाव की प्रमा नहीं होती । खण्डन—प्रतियोगिव्याप्त का अभाव प्रतियोगी के अभाव से अन्यथासिद्ध होने से उसे प्रमा का हेतु मानने में कोई प्रमाण नहीं है। अर्थात् जब अभाव की प्रमा में प्रतियोगी-व्याप्त का अभाव कारण ही नहीं है, तब प्रतियोगिव्याप्त के होने पर भी अभाव-प्रमा होनी चाहिए। अन्यथासिद्ध हेतु नहीं होता, इसीलिए अवयवी या अवयवरूप आलोक के प्रत्यक्ष में अवयव या अवयवीरूप अन्य आलोक अन्यथासिद्ध होने के कारण आलोकाभाव ( तम ) के प्रत्यक्ष में भी उसकी अपेक्षा नहीं होती । किञ्च—योग्यता के लक्षण में 'तदविनाभूत' शब्द से प्रतियोगी के सन्निकर्ष का ग्रहण अभिप्रेत है । किन्तु प्रतियोगी से व्याप्त प्रतियोगी का सन्निकर्ष नहीं होता, कारण प्रतियोगी का सन्निकर्ष 'प्रतियोगी' से घटित है; अतः अंशतः एक है । एवञ्च स्व से व्याप्त स्व नहीं होता, अतः असंभव हो जायगा । समर्थन—प्रतियोगी के अभाव से सहित प्रतियोगी की प्रमा का जनक साकल्य अभाव-प्रमा क हेतु है, ऐसा कहेंगे । प्रतियोगी के प्रत्यक्षस्थल में प्रतियोगी का अभाव नहीं है, अतः वहाँ अभाव की प्रमा नहीं होती । खण्डन—इन्द्रिय-सन्निकर्ष

३१२ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ प्रथम

न यदि, तदा सन्निकर्षस्य हेतुतैव कुतो मन्तव्या, अन्यथैव कार्योत्पत्त्युपपत्तेः। एष्टव्यं चेत्तर्हि तत्रैवोदाहरणे व्यवधायकेनेन्द्रियसन्निकर्षशून्ये परमार्थतश्चाभाववति उक्तकारणसम्पत्तेरभावप्रमा स्यात्। तत्र व्यवधायकाभावः प्रतियोग्युपलम्भको नास्तीति चेन्न। सन्निकर्षस्य प्रमा- व्यतिरेकप्रयोजकत्वावधारणोदाहरणमेव तर्हि तन्न स्यात्। व्यवधायकस्य सन्निकर्ष- विरोधिनैव प्रमाविरोधित्वमिति चेत्; तर्हि व्यवधायकाभावः सन्निकर्षोत्पत्तौ कारणम्, न त्वभावप्रमाविशेषोत्पत्ताविति स्थिते स प्रसङ्गस्तदवस्थ एव। न च सन्निकर्षाभावादेव तदानीमुक्तकारणासम्पत्तिः, प्रतियोगिसन्निकर्षस्य अभावप्रमोत्पादकत्वे नित्यं तदनुत्पत्त्यापत्तेः। को आप प्रतियोगी के उपलम्भ में हेतु मानते हैं। वहाँ सन्निकर्ष के अभाव में प्रति- योगी की अप्रत्यक्षता इष्ट है या नहीं? यदि नहीं, तो सन्निकर्ष की हेतुता ही सिद्ध कैसे होगी, कारण सन्निकर्ष के बिना भी कार्य की उत्पत्ति हो गयी। यदि उक्त स्थल में अप्रत्यक्ष इष्ट हो, तो उसी उदाहरण में व्यवधायक के होने पर इन्द्रिय-सन्निकर्ष नहीं है और वस्तुतः अभाव और उक्त योग्यता भी है। अतः वहाँ अभाव-प्रमा होनी चाहिए। समर्थन—वहाँ व्यवधायकाभावरूप प्रतियोगी के उपलम्भ का कारण नहीं है, अतः उक्त योग्यता के न होने से अभाव की प्रमा नहीं होती। खण्डन—यदि व्यव- धायकाभाव को कारण मानें, तो उक्त स्थल सन्निकर्ष के अभाव से प्रतियोगी की प्रमा के अभाव का उदाहरण नहीं हुआ। एवञ्च सन्निकर्ष की हेतुता सिद्ध नहीं होगी। यदि कहें कि व्यवधायक सन्निकर्ष का विरोधी होने से प्रमा का विरोधी है, तो व्यव- धायक का अभाव सन्निकर्ष की उत्पत्ति में कारण है, प्रतियोगी की प्रमा में नहीं। अतः उक्त स्थल में अभाव की प्रमा क्यों नहीं होती, यह आपत्ति वैसी ही बनी रही। समर्थन—प्रतियोगी का सन्निकर्ष प्रतियोगी का व्याप्त नहीं है, कारण अंशतः एक है और स्व से स्व व्याप्त नहीं होता। अतः तत्-तत् अविनाभूत से अन्य प्रति- योगी के प्रमापक साकल्य के मध्य प्रतियोगी का सन्निकर्ष भी आता है और उक्त स्थल में वह नहीं। अतः वहाँ अभाव की प्रमा नहीं होती। खण्डन—प्रतियोगी का सन्निकर्ष अभाव-प्रमा का कारण नहीं है; क्योंकि यदि उसे कारण मानें, तो प्रति- योगी के सन्निकर्षस्थल में नियमतः अभाव का ही ग्रहण होने लगेगा।

परिच्छेद ] अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन ३१३ अत एव नाव्‍यवधानमधिकं कारणमेष्टव्यम्, इन्द्रियसन्निकर्षे एव तदुपपत्तेः । न चाऽऽश्रयसाक्षात्कारोऽपि, प्राङ्नास्तिताग्रहादौ व्यभिचारात् । ननु व्यवधायकसद्भावेऽपि यत्र परमार्थतोऽस्त्यभावः, तत्रोक्तकारणाद्भावा- वधारणमस्त्येव को विरोधः । स न तावद्भावयोगिन्यपि तावता तद्विरहग्रमा प्रसज्येत । तर्हि प्रतियोग्यभावसहितोऽनुपलम्भ एवाभावप्रमाणमस्तु, जहीहि योग्यताविशेषणनिवेशव्यसनम् । योग्यताविशेषणाप्रक्षेपेऽनुपलम्भमात्रतो वस्तु- गत्या प्रतियोग्यभाववत्यपि न भावनिश्चयः । कदाचित्तु संशयो जायते, तत्कथं तथाऽङ्गीक्रियत इति चेत् ; तर्हि व्यवधानेऽप्येवमेवेति योग्यताविशेषणाप्रक्षेपेऽपि तुल्यम् । अतएव व्यवधायक के अभाव के तुल्य व्यवधान का अभाव भी प्रतियोगी के प्रत्यक्ष में अधिक कारण नहीं है । कारण इन्द्रियसन्निकर्ष की उत्पत्ति में ही उसका सार्थक्य है । समर्थन—अभाव के प्रत्यक्ष में आश्रय का साक्षात्कार भी कारण है । उक्त स्थल में वह नहीं है, अतः अभाव की प्रमा नहीं होती । खण्डन—यदि अभाव की प्रमा में आश्रय के साक्षात्कार को कारण मानें, तो घर से बाहर स्थित पुरुष को गृहनिष्ठ चैत्राभाव का प्रत्यक्ष नहीं होगा, कारण उसे आश्रय का साक्षात्कार नहीं है । समर्थन—व्यवधायक के होने पर भी वस्तुतः जहाँ अभाव है, वहाँ उक्त कारण होने से अभाव-प्रमा होती ही है। उसमें विरोध ही क्या है ? जहाँ व्यवहित भाव है, वहाँ प्रतियोगिविरहरूप कारण न होने से अभाव की प्रमा नहीं होगी । खंडन—तब तो प्रतियोगी के अभाव से विशिष्ट अनुपलब्भ को ही अभाव-प्रमा का कारण मानिये, 'योग्यता' के निवेश का व्यसन छोड़िये । समर्थन—यदि योग्यता का निवेश न करें, तो अन्धकार में वस्तुतः अभावयुक्त देश में भी अनुपलब्धिमात्र से अभाव का निश्चय नहीं होता; किन्तु कदाचित् सन्देह ही होता है (पिशाच के न रहते हुए भी अन्धकार में 'पिशाच रहता हुआ भी दिखायी नहीं पड़ता या वह है ही नहीं ?' ऐसा सन्देह होता ही है ), वह उपपन्न कैसे होगा ? अर्थात् यदि योग्यता पद न दें, तो ऐसे अनुपलब्भ में अतिव्याप्ति हो जायगी । खण्डन—तब तो व्यवधायक होने पर भी अभाव का सन्देह ही होता है, निश्चय नहीं । एवञ्च उक्त योग्यता का निवेश करने पर भी अतिव्याप्ति तुल्य ही है । ४०

१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अपि च--मेयस्य वास्तवसत्त्वं प्रमाणकोटावनिवेशार्हमेव । मेयवस्तुसत्त्व- निर्धारणार्थमेव हि प्रमाणाप्रमाणविवेचनं विचारकाणाम् । अन्यथाऽनुमाने व्याप्तावुपाधिनिरासाय आयासो व्यर्थः स्यात्, व्याप्तपक्षधर्मताज्ञानमात्रस्यैव कारणत्वाङ्गीकारेण सौष्ठव्यात् । प्राङ्नास्तिताप्रमितौ च यद्यभावप्रमाणतां मन्यसे, तर्हि सा न स्यात् । तत्रेदानों जायमानाभावप्रमोत्पत्तौ अभाववास्तवसत्ताविरहस्यापोदानीं क्वचित्स- म्भवात् । फलविषयकालिकाभावोपलक्षिताश्रयादेः कारणकोटिनिवेशने विशेषा- भावात् । तदुपलक्षितत्वस्यैव विशेषणस्य विशेषत्वेऽतिप्रसङ्गात् । तथापि सामान्यतो विशेषाभावोऽसिद्ध इति चेन्न । तस्य सत्त्वे निर्वचनापातात् । किञ्च--मेय का वास्तविक सत्त्व प्रमाण-कोटि में निवेशार्ह नहीं है। कारण मेय- रूप वस्तु के सत्त्व के निर्धारणार्थ ही विचारक लोग लक्षण से प्रमाण-अप्रमाण का विवेचन करते हैं । अन्यथा (यदि मेय के स्वरूप का प्रमाण-दल में निवेश कर सकें, तो ) अनुमानस्थल में व्याप्ति में उपाधि के निरासार्थ प्रयास व्यर्थ हो जायगा । कारण मेयविशिष्ट व्याप्तिपक्षधर्मता के ज्ञानमात्र को कारण मानने से ही निर्वाह हो सकेगा । किञ्च--यदि 'प्रतियोगी के अभाव से विशिष्ट प्रतियोगी के प्रमापक साकल्यरूप योग्यता से विशिष्ट अनुपलब्धि' को प्रमाण मानें, तो जहाँ सम्प्रति घट है, किन्तु पहले उसका अभाव था, वहाँ अतीत अभाव की 'प्रागत्र घटो नासीत्' ऐसी प्रमा नहीं होगी, कारण सम्प्रति अभावघटित उक्त प्रमाण नहीं है। यदि 'फल (प्रमा) विषय जो अतीत- काल तात्कालिक अभाव से उपलक्षित अधिकरण से विशिष्ट प्रतियोगी के प्रमापक साकल्य' को योग्यता कहें, तो उक्त स्थल में यद्यपि आपाततः दोष की प्रतीति नहीं होती, तथापि उक्त निवेश में कोई विशेष नहीं है । 'फलविषयकालिक अभावोपलक्षितत्व' को अतिप्रसङ्ग होने से विशेष कह नहीं सकते । यदि अभाव से उपलक्षित आश्रय को अभाव-प्रत्यक्ष में कारण मानें, तो सर्वत्र प्रतियोगी से युक्त अधिकरण में अभाव की प्रमा हो जायगी, कारण यदा-कदाचित् विद्यमान अभाव से उपलक्षित प्रतियोगी से युक्त अधिकरणमात्र है ही । समर्थन--यद्यपि विशेष का निर्वाचन नहीं हो सकता, तथापि प्राङ्नास्तितास्थल में अभाव की मा होती है और अन्यत्र प्रतियोगी से युक्त अधिकरण में अभाव की प्रमा नहीं होती; अतः फल के अनुरोध से विशेष की कल्पना करेंगे कि कोई विशेष है । खण्डन--यदि उक्त स्थल में विशेष है, तो अवश्य ही उसका निर्वाचन होना चाहिए । अन्यथा सर्वत्र सामान्यतः ही उत्तर होगा, विशेषतः उत्तर का सर्वत्र अभाव हो जायगा ।

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१५ हेत्वाभासखण्डने असिद्ध-लक्षण-खण्डनम् कश्चायमसिद्धो नाम ? तथाहि—व्याप्तिपक्षधर्मत्वाभ्यामप्रमितोऽसिद्ध इत्यलक्षणम्; हेत्वाभासान्तराणामपि ह्यसिद्धप्रवेश एवं सति स्यात्। व्याप्तिं पक्षधर्मतां तत्प्रमिति वा न विरुन्धतां हेतुदोषत्वासम्भवात् । ननु नेदमीदृशम् । तथाहि—केचिद् दोषा व्याप्तिपक्षधर्मतातत्प्रमितिविरहा- हेत्वाभास के खंडन में असिद्ध-लक्षण का खंडन 'सामान्यतो विशेषाभावोऽसिद्धः' यह जो पीछे कहा है, वहाँ असिद्ध भी क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से अनिर्वचनीय है । निर्वचन—व्याप्ति और पक्षधर्मता से जो अप्रमित हो, वह असिद्ध है । खण्डन—ऐसा मानने पर विरुद्ध आदि अन्य हेत्वा- भासों का भी असिद्ध में ही प्रवेश हो जायगा । कारण व्याप्ति तथा पक्षधर्मता और उनकी प्रमिति के जो विरोधी नहीं, वे हेतु-दोष ही नहीं कहे जा सकते । विरुद्धादि हेतुदोष हैं, अतः वे व्याप्ति तथा पक्षधर्मता और तत्प्रमिति के विरोधी अवश्य हैं । एवञ्च विरोधी होने से वे व्याप्ति-पक्षधर्मता से अप्रमित हैं ही । समर्थन—ऐसा बात नहीं है। देखिये—कोई दोष व्याप्ति-पक्षधर्मता और तत्प्र- मिति के अभावरूप हैं, कोई व्याप्ति आदि के अभाव के अनुमापक हैं, तो कोई १ यहाँतक प्रमाण-सामान्य का लक्षण और उसके विशेष प्रत्यक्ष, अनुमानादि के लक्षणों का विस्तार के साथ खण्डन किया जा चुका । अब प्रसंगतः प्रमाणाभासों का भी खण्डन कर रहे हैं, जिनमें अनुमानाभास या हेत्वाभासों का यह खण्डन आरम्भ हो रहा है । यहाँ सहज ही यह शंका उठती है कि जब प्रमाणाभासों का ही खण्डन करना है, तो प्रत्यक्षाभासों का खण्डन ग्रन्थकारने क्यों नहीं किया ? किन्तु इसका समाधान यही है कि न्यायसूत्रकार ने भी शब्दतः प्रत्यक्षाभासों का निरूपण नहीं किया है। अतः अलग से उनका खण्डन आवश्यक नहीं है । ग्रन्थकारों ने तत्तत् प्रसंग में उनका उल्लेख अवश्य किया है, तो यहाँ भी प्रसंगतः तत्तत् स्थलों में उनका खण्डन किया ही गया है। इसके विपरीत हेत्वाभास कथाङ्ग होने के कारण सूत्रकार ने उन्हें कण्ठतः कहा है । अतएव उनका यहाँ प्रधान रूप से खण्डन किया जा रहा है । यदि कहें कि संशय भी उन्होंने कण्ठतः कहा है, तो उसका भी प्रत्यभिज्ञा-खण्डन के समय कुछ खण्डन किया ही गया है, शेष चतुर्थ परिच्छेद में भी होगा। हेत्वाभासों में भी सव्यभिचार, विरुद्ध, सत्प्रतिपक्षित, असिद्ध, बाधित—यह क्रम होने पर भी यतः यहाँ पीछे 'सामान्यतः विशेषाभावोऽसिद्धः' कहा गया है, अतः प्रकृततया बुद्धिस्थ होने से पहले असिद्ध का ही खण्डन प्रस्तुत किया जा रहा है। यद्यपि भेदस्थापना के लिए हेत्वाभासों का उपन्यास करना वादी का स्ववधार्थ उद्यम ही माना जायगा, क्योंकि उनका सहज परिहार हो जाने से वादी निगृहीत हो जायगा । अतः उसके हेत्वाभासों का खण्डन आवश्यक नहीं। फिर भी उन्हीं हेत्वाभासों को लेकर द्वैतापत्ति तो आ ही सकती हैं। इसलिए उनका यहाँ खण्डन उचित ही है ।

३१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

त्मानः, केचित्तु व्याप्त्यादिभङ्गे लिङ्गभूताः, प्रतिबन्धकतयाऽनुमित्युत्पत्तिं निरुन्धा- नाश्च केचिद्दोषभूयं भजन्ते । तत्र प्रथमे तावदसिद्धमध्यमध्यासते । तद्यथा— व्याप्यत्वासिद्धः सोपाधिरूपः, अनौपाधिकसम्बन्धिता हि व्याप्तिः, सहोपाधिता चानुपाधिताविरहरूपैव । एवमधिकरणासिद्धिरपि असिद्धावेवान्तर्भाविष्णुः, पक्षपदोपात्तस्याऽऽश्रयस्य व्यतिरेकरूपा हि सा । सिद्धसाधनमपि तथैव । सिषाधयिषितधर्मविशिष्टो हि पक्ष उच्यते । यच्च सिद्धं न तत्र सिषाधयिषाऽस्ति । ततो विशेषणाभावायत्तो विशिष्टपक्षरूपस्य तत्राभावः । न च वाच्यं यथा सव्यभिचारत्वादङ्गव्याप्तिकमिति पृथगेव सव्यभिचारस्य दोषत्वम् , तथाऽसिद्धत्वात्तत्र सिषाधयिषा नास्तीति सिद्धत्वस्यापि पृथगेव दोषत्वं प्राप्नोति, लिङ्गद्वारेणासिद्धिपर्यवसायित्वात् । अन्यथा व्याप्त्यादिविरहपर्यवसायित- मात्रेण सव्यभिचारत्वादीनामप्यसिद्धावेवान्तर्भावः स्यादिति । यतः सिषाधयिषाभावो न प्रतिपत्रा सिद्धत्वाल्लिङ्गाद्गम्यते । किं नाम ? प्रतिबन्धक होने से अनुमिति का निरोध करते हैं । उनमें प्रथम दोष असिद्ध के मध्य आता है, कारण व्याप्यत्वासिद्ध सोपाधिरूप है । अनौपाधिक सम्बन्ध ही व्याप्ति है और अनौपाधित्वविरह ही सोपाधित्व है । इसी प्रकार अधिकरणासिद्धि भी असिद्ध के मध्य अन्तर्भूत होने योग्य है, कारण वह पक्ष पद से उपात्त आश्रय का व्यतिरेकरूप है । ऐसे ही सिद्धसाधन भी असिद्ध के मध्य अन्तर्भूत है । कारण सिषाधयिषित ( सिद्धिविषयक इच्छा का विषय ) धर्मविशिष्ट ही पक्ष कहा जाता है । जो सिद्ध है, उसमें सिषाधयिषा नहीं होती । तस्मात् विशेषण ( सिषाधयिषा ) के अभाव से प्रयुक्त विशिष्टरूप पक्ष का भी वहाँ अभाव है ही । प्रश्न—'जैसे 'यह हेतु नष्टव्याप्तिक है, सव्यभिचार होने से' ऐसी अनुमिति होने के कारण असिद्ध से पृथक् ही सव्यभिचारत्व दोष होता है, वैसे ही साध्य के सिद्ध होने से सिषाधयिषा नहीं होती, अतः सिद्धत्व भी असिद्धि से पृथक् ही दोष होना चाहिए । सिद्धत्व का हेतुरूपता द्वारा असिद्धि में पर्यवसान है। यदि सिद्धसाधन को पृथक् दोष न मानें, तो व्याप्त्यादि के विरह में पर्यवसित होने से सव्यभिचार आदि का भी असिद्ध में ही अन्तर्भाव हो जायगा । उत्तर—प्रतिपत्ता ( ज्ञाता ) को सिद्धत्वरूप हेतु से सिषाधयिषाभाव का ज्ञान नहीं होता, किन्तु इच्छाभावरूप उसका ज्ञान न्यायमत में प्रत्यक्ष से और मीमांसक के

परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१७ इच्छाभावस्य तस्य यथादर्शनं प्रत्यक्षादेरेवाधिगमः । इच्छैव तु तत्र यन्नास्ति तत्र सिद्धत्वं प्रयोजकमित्येतावन्मात्रेण सिद्धत्वमुपन्यस्यते सिद्धसाधने, न त्विच्छाभाव- मनुमातुं लिङ्गतयेति । एवं स्वरूपासिद्धिरपि पक्षधर्मताविरहरूपैव । ये तु व्याप्तिपक्षधर्मताविरहलिङ्गभूतास्तेऽसिद्धतः पृथगेव हेत्वाभासाः । तद्यथा—विरुद्धः साध्यविपरीतव्याप्तः । तत्र साध्यव्यतिरेकव्याप्तता हेतोर्न साध्यव्याप्तताभावः । किन्नाम ? साध्यव्यतिरेकेण सहानौपाधिकः सम्बन्धोऽन्य एवासौ । इत्थमेव पक्षधर्मताविरहात्माऽपि नायम् । किन्नाम ? ततः साध्यव्यति- रेकेण सह निरुपाधिसम्बन्धत्वात् तत्र साध्यव्याप्तिरस्य नास्तीत्यनुमीयते । तथा सति च साध्यव्याप्तिव्यतिरेकलिङ्गं सद्विरुद्धः पृथगेव हेत्वाभासो भवति । एवमनैकान्तिकोऽपि न व्याप्तिव्यतिरेकरूपः, किन्तु तल्लिङ्गमेव । तथाहि— हेतोरन्वयस्य व्यतिरेकस्य वा व्यभिचारो न साध्यसाधनव्याप्तिविरहात्मा । किं नाम ? व्यभिचारो हेतोः साध्यव्याप्तिविरहं विना न सम्भवतीति लिङ्गभावेन मत में अनुपलब्धि से ही होता है। वहाँ जो इच्छा नहीं होती, उसमें सिद्धत्व प्रयोजक है, इसीलिए सिद्धत्व का सिद्धसाधन में कथन है, इच्छाभाव के अनुमान में लिङ्गरूप से नहीं । इसी प्रकार 'शब्दोऽनित्यः चाक्षुषत्वात्' यहाँ स्वरूपासिद्धि भी पक्षवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता का अभावरूप ही है । प्रश्न—तब तो व्याप्ति और पक्षधर्मतादि के अभाव के हेतु हेत्वाभास भी असिद्ध में ही अन्तर्भूत हो जायेंगे, क्योंकि दोनों के आभासत्व में कोई विशेष ही नहीं है ? उत्तर—जो दोष व्याप्ति और पक्षधर्मता के अभाव के हेतु हैं, वे असिद्ध से पृथक् ही हेत्वाभास हैं । देखिये, साध्याभाव से व्याप्त विरुद्ध है । हेतु में साध्याभावव्याप्तता साध्यव्याप्तत्वाभावरूप नहीं, किन्तु उससे अन्य साध्याभाव के साथ अनौपाधिक सम्बन्ध- रूप है। इसी प्रकार विरुद्ध भी पक्षधर्मता का विरहरूप नहीं है; किन्तु यतः साध्याभाव के साथ निरुपाधिक सम्बन्ध होने से 'साध्य की व्याप्ति इस हेतु में नहीं है' ऐसी अनुमिति होती है, अतः विरुद्ध भी साध्य की व्याप्ति के अभाव में हेतु होने से पृथक् ही हेत्वाभास है । इसी प्रकार अनैकान्तिक भी व्याप्ति का अभावरूप नहीं, किन्तु व्याप्त्यभाव का लिंगरूप है । देखिये—हेतु के अन्वय या व्यतिरेक का व्यभिचार साध्य-साधनव्याप्ति- विरहरूप नहीं है । किन्तु हेतु में साध्य की व्याप्ति के विरह के बिना व्यभिचार हो ही नहीं सकता, अतः वह हेतुरूप से व्याप्तिभङ्ग का बोधन करता है । यदि हेतु

३१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम व्याप्तिभङ्गं बोधयति । यदि हि निरुपाधिः साध्येन सम्बन्धोऽस्य भवेत्, कथं व्यभिचरितुं शक्नुयात् । तस्माद् व्याप्तिविरहलिङ्गं व्यभिचारः , न तु व्याप्ति- विरहः । पक्षधर्मताविरहरूपता त्वनैकान्तिकस्यासम्भावितैव । सत्प्रतिपक्षतायां चानवगम्यमानविशेषप्रतिपक्षप्रतिरुद्धतया यत्साध्यनिश्चया- ऽजनकत्वं हेतोः स प्रतिबन्धकसद्भावे कार्याजनकत्वमितरकारणसाधारणो वस्तु स्वभावः । तस्य व्याप्तिपक्षधर्मताविरहरूपताऽसम्भावितैव । बाधस्तु साधनवति पक्षे साध्याभावबोधनात्मा भवन्नपि न व्याप्तिविरहाव- गमरूपः । सामान्यतोऽनौपाधिकसम्बन्धरूपा हि व्याप्तिः, साधनवति च पक्षे साध्यविरहो न सोपाधिता साध्याविरोधिस्वभावत्वात्तस्याः । नाप्यसौ सामान्यतः साध्यसाधनसम्बन्धस्य विरहरूपः, बाधे सत्यपि सामान्येन साध्यसाधनयोः सम्बन्धस्य दृष्टान्तावगतस्यानपलापात् । में साध्य का निरुपाधिक सम्बन्ध होता, तो व्यभिचार कैसे होता ? इसलिए व्यभिचार व्याप्तिविरह का लिङ्ग है, व्याप्तिविरहरूप नहीं । 'शब्दोऽनित्यः सत्त्वात्' इत्यादि व्यभिचारस्थल में पक्षधर्मता ही है, अतः व्यभिचार को पक्षधर्मता का विरहरूप भी नहीं कह सकते । सत्प्रतिपक्ष में प्रकृत हेतु साध्यनिश्चय का जनक नहीं हो पाता । कारण प्रतिपक्षी द्वारा उद्भावित प्रतिहेतु की अपेक्षा हेतु में व्याप्ति-पक्षधर्मता का सत्त्व या असत्त्वरूप विशेष ज्ञात न होने से वह प्रतिहेतु द्वारा प्रतिबद्ध हो जाता है । सत्प्रतिपक्ष में प्रति- बन्धक होने पर साध्यनिश्चय की यह अजनकता अन्य कारण-साधारण वस्तुस्वभाव है । वह कोई व्याप्तिविरहरूप या उसका उन्नायक होने से दोष नहीं है । अतः सत्प्रतिपक्ष की व्याप्ति-पक्षधर्मताविरहरूपता सम्भव ही नहीं । साधनयुक्त अधिकरण' में साध्याभाव का ज्ञानरूप बाध भी व्याप्ति-विरह का ज्ञान- रूप नहीं है । देखिये—सामान्यतः अनौपाधिक सम्बन्ध ही व्याप्ति है । साधनवान् पक्ष में साध्य का अभाव उपाधिरूप नहीं है, क्योंकि उपाधि साध्य की विरोधि नहीं है और साध्याभाव साध्य का विरोधी है । इसी प्रकार सामान्यतः साध्य-साधनसम्बन्ध का विरह भी बाध नहीं है, कारण बाध होने पर भी दृष्टान्त में ज्ञात साध्य-साधनसम्बन्ध का अपलाप नहीं हो सकता ।