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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६७ विनिगन्तुमशक्यत्वात् । न ह्याकारस्ततो ज्ञानस्वरूपादन्यः, तत्र च तथोत्पन्नानि कारणानि प्रत्येकमेव समर्थानीति कथं तेषु विशेषं विनिगमयिष्यसि । यद्यपि सकलसमर्थहेत्वनुविधानमस्ति, तथापि स्फुटं तावद्घटस्यानुविधान- मिति तदेव तदाकारप्रयोजकमित्यत इति चेन्न । समस्तकारणान्तरानुविधानव- द्घटानुविधानस्य प्रामाणिकत्वाविशेषेण किं स्फुटत्वास्फुटत्वाभ्यां स्यात् । स्फुटा- नुविधानमादायैव विषयनिरुक्तिं कुर्म इति चेन्न । सर्वहेत्वनुविधानस्य न्यायतः स्फुटत्वात् । दृश्यमानमनुविधानं यस्येति चेन्न । दत्तोत्तरत्वात् । दृश्यमानतैव च विष- यताऽनिर्वचनान्न शक्योपदर्शना । ज्ञानकर्मत्वमित्यपि न ; ज्ञानेन कर्मणः सम्बन्धस्य निर्वक्तव्यत्वात् । तन्निरुक्तिभङ्गश्च ईश्वराभिसन्धौ ज्ञाततावादे द्रष्टव्यः । है, अर्थात् उसमें कोई विनिगमक नहीं है ; कारण आकार विज्ञान से भिन्न नहीं है, किन्तु विज्ञानरूप ही है । अतः मिलित कारण ही ज्ञान के आकार के हेतु हैं । फिर उन हेतुओं में अमुक आकार का हेतु है, इस विशेष का निश्चय कैसे करेंगे ? समर्थन—यद्यपि ज्ञान के आकार में सभी हेतुओं का अन्वय है, तथापि घट का अन्वय स्फुट है । अतः घट ही आकार का प्रयोजक है । एवञ्च ‘स्फुटानुविधानत्वे सति आकारसमर्पको हेतुः’ ऐसा लक्षण कर ही सकते हैं । खण्डन—यदि सम्पूर्ण कारणों का आकार में अन्वय प्रमाण से सिद्ध है, तो ‘अमुक कारण का अन्वय स्फुट है और अमुक का नहीं है’ इस कथन से क्या लाभ है ? यदि कहें कि ‘स्फुट अभिधान’ इस कथन का यही प्रयोजन है कि स्फुट लक्षण होता है, तो सभी कारणों का अन्वय एक-सा है; अतः युक्ति से सभीका अन्वय स्फुट ही है । समर्थन—‘जिसका अन्वय ज्ञान के आकार में प्रत्यक्ष है, वह विषय है’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—जब सभी कारण हैं, तो सबका अन्वय प्रत्यक्ष ही है । किञ्च— प्रत्यक्षता भी विषयता ही है, अतः आत्माश्रय हो जायगा । समर्थन—‘ज्ञान का कर्म विषय है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—ज्ञान के साथ कर्म का क्या सम्बन्ध है, यह कहना होगा । किन्तु उसका निर्वाचन नहीं कर सकते, यह बात ‘ईश्वराभिसन्धि’ नामक ग्रन्थ के ज्ञाततावाद में स्पष्ट है, वहीं देख लेना चाहिए ! [अर्थात् ज्ञान और कर्म का सम्बन्ध संयोग नहीं हो सकता,

विना सम्बन्धान्तरं यद्विशेषणं ज्ञानं स विषयः। तेन विना सम्बन्धान्तरं ज्ञानविशेष्यं विषयः। विशेष्यं चेदं यद्विशिष्टनामकं तत्त्वान्तरं यद्गतं धर्मं गृह्णातीति। अत्रोच्यते ; यद्गतं धर्मं गृह्णातीत्येतावन्मात्रमेव विवक्षितं गृह्णातीत्येवेति वा ? आद्ये दण्डस्यापि विशेष्यत्वापातः , तद्गतस्यापि सत्त्वादेर्धर्मस्य ग्रहणात्। नापरः ; भवति हि व्यभिचारिणो धूमस्याविच्छिन्नमूलकत्वादि विशेषणं तद्वि- शिष्टं च तत्त्वान्तरम्। न च विशेष्यस्य धर्मं व्यभिचारितां गृह्णाति। अथोर्ध्वाविरतगतिविशिष्टस्याविच्छिन्नमूलता विशेषणम्। न च तथाभूतस्य व्यभिचारिता धर्म इत्युच्यते। मैवम् ; प्रथमविशिष्टः किं व्यभिचारी न वा ? क्योंकि ज्ञान द्रव्य नहीं है। समवाय भी नहीं, ज्ञान आत्मा का गुण होने से वह समवायेन घट में नहीं रह सकता। परस्पर विरुद्ध होने से दोनों के तादात्म्य सम्बन्धकी बात तो दूर ही रही। फलतः दोनों का सम्बन्ध क्रिया-कर्मभाव ही कहना होगा। किन्तु वह भी नहीं हो सकता । परसमवेत-क्रियाफलशालित्वरूप कर्मत्व का स्वप्रकाशवाद में खण्डन किया गया है। फिर, फलत्व भी क्या है ? ज्ञातता या व्यवहार तो नहीं कह सकते, क्योंकि अभी-अभी उनका खण्डन कर ही चुके हैं। यदि विषयत्व कर्मत्व कहें, तो आत्माश्रय हो जायगा, इत्यादि दूषण इस लक्षण में जानने चाहिए।] समर्थन — 'अन्य सम्बन्ध के बिना ज्ञान जिसका विशेषण हो। वह विषय है।' फलित यह हुआ कि अन्य सम्बन्ध के बिना ज्ञान का जो विशेष्य हो, वह विषय है। विशिष्ट नामक पदार्थान्तर जिसके धर्म का ग्रहण करे, वह विशेष्य है। 'ज्ञातो घटः' यहाँ ज्ञान बिना किसी अन्य सम्बन्ध के घट में विशेषण है, अतः घट विशेष्य है। खण्डन — जिसके धर्म का ग्रहण करे इसका क्या अर्थ है — जिसके यत्किंचित् धर्म का ग्रहण करे, यह अर्थ है ? या जिसके सम्पूर्ण धर्मों का ग्रहण करे यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष मानें तो 'दण्डी पुरुषः' यहाँ दण्ड भी विशेष्य हो जायगा; कारण विशिष्ट दण्ड में स्थित सत्त्वादि धर्म का ग्रहण करता ही है। द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, कारण वह्नि के व्यभिचारी धूम से अविच्छिन्नमूलत्वविशिष्ट धूम अन्य है और वह धूम के धर्म व्यभिचारित्व का ग्रहण नहीं करता। अतः धूम में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन — अविच्छिन्नमूलत्व ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम का ही विशेषण है एवञ्च उक्त विशेषणविशिष्ट धूम का व्यभिचारित्व धर्म नहीं है, अतः धूम में अव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन — ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्टरूप विशेषणसे विशिष्ट धूम व्यभिचारी है या नहीं ?

परिच्छेद ] विषय-विषयी-भाव-लक्षण का खण्डन ४६६ आद्ये स एव दोषः; द्वितीये विशेषणान्तरान्तर्भाववैयर्थ्यम्, प्रथमविशिष्ट एव च तद्दोषावसरः । अथ यद्धर्मविशिष्टस्य तद्विशेषणं तद्धर्मं गृह्णाति, न सर्वम् । न च व्यभिचा- रिताविशिष्टस्य तानि विशेषणानीति चेन्न । तत्किं धूममात्रं न व्यभिचारि ? ततश्च व्यभिचारिताविशिष्टस्यैव तस्य तानि तथा । भवतु व्यभिचारिता तद्विशे- षणम्, परं सा न विशेष्यकोटिरिति चेन्न । अद्यापि विशेष्याज्ञानात् । किञ्च—तद्विशेषणमिति तत्सम्बन्धिमात्रं वा विशेषणतया वा सम्बन्धि ? आद्येऽतिप्रसङ्गः । द्वितीये तु तथैवान्योन्याश्रयादि । आद्य पक्ष में ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम के व्यभिचारित्व रूप धर्म को अविच्छिन्नमूलत्व- विशिष्ट ग्रहण नहीं करता। अतः अव्याप्ति तदवस्थ ही है। द्वितीय पक्ष में विशेषण व्यर्थ है। यदि उक्त विशेषण नहीं दें, तो ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम व्यभिचारितारूप धर्म का ग्रहण नहीं करता, अतः धूम में अव्याप्ति पूर्ववत् स्थित है। समर्थन—'जिस धर्म से विशिष्ट विशेष्य का विशेषण हो, तद्धर्मरूप जिसके धर्म का विशिष्ट ग्रहण करे, सब धर्मों का नहीं, वह विशेष्य है'। व्यभिचारिताविशिष्ट धूम का अविच्छिन्नमूलत्व विशेषण नहीं है, अतः वहाँ अव्याप्ति नहीं है। खंडन—तब क्या धूममात्र व्यभिचारी नहीं है ? यदि है, तो व्यभिचारिताविशिष्ट ही अविच्छिन्न- मूलत्व धूम में विशेषण है, अतः पूर्ववत् अव्याप्ति है। समर्थन—'जो धर्म विशेष्यता का अवच्छेदक हो, तद्धर्मरूप जिसके तद्धर्म का विशिष्ट नामक तत्त्वान्तर ग्रहण करे, वह विशेष्य है।' खंडन—विशेष्य का ही यह लक्षण है, अतः अभीतक उसका ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा। किंच—'तद्विशेषण' शब्द का क्या अर्थ है, 'जिसका सम्बन्धी हो' यह अर्थ है या 'जिसका विशेषणतारूप से सम्बन्धी हो' यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में उपलक्षण (उपरञ्जक) के भी सम्बन्धी होने से वह भी विशेषण हो जायगा। द्वितीय पक्ष में विषयत्व की निरुक्ति में विशेषणत्व का और विशेषणत्व की निरुक्ति में विषयत्व का प्रवेश होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा। कारण ज्ञान की प्रकारतारूप विषयता ही विशेषणता है।

४७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ किञ्च विशेष्यत्वलक्षणो यस्तद्गतो धर्मस्तं गृह्णाति न वा ? आद्येऽतिव्याप्तिः, द्वितीये गृह्णात्येवेति नियमोऽसिद्धः । किञ्च—'मत्समवायो ज्ञानस्ये'त्यत्र भवति मत्समवायस्य ज्ञानं विशेषणं सम्बन्धान्तरमन्तरेणैव, न च विषयः । न च गुणगुण्यादिविशेष्यभावे यः सम्बन्धान्तरमन्तरेणेत्युक्त्या व्यव- च्छेद्यतां नीतः, स एवार्यं समवाय इति कथं न व्यवच्छेद्यतां प्रतिपत्स्यते ? यतोऽत्र तस्यैव विशेषणविशेष्यभावत्वादन्तरत्वासिद्धिरिति । तस्मात् सम्बन्धान्तरेण ज्ञानं विशेषणं यस्येत्युक्तम्, तत्र ज्ञानं सम्बन्ध- मनपेक्ष्य स्वभावत एव यथाऽर्थस्य विशेषणं तथा समवायस्यापीति न कश्चि- द्विशेष इति साधूक्तं 'मत्समवायो ज्ञानस्ये'त्यत्र ज्ञानविषयता समवायस्य स्यादिति । ज्ञानाभावे च प्रसङ्गात् । किंच—विशिष्ट विशेष्य धूमगत विशेष्यत्वरूप धर्म का ग्रहण करता है या नहीं ? यदि ग्रहण करता है, तो अविशेष्य में भी विशिष्ट में विशेष्यत्व हो जायगा । यदि ग्रहण नहीं करता, तो सब धर्मों का ग्रहण न होने से धूम में भी असम्भव हो जायगा । किंच—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ समवाय में ज्ञान अन्य सम्बन्ध के बिना ही विशेषण होता है, पर वह ( समवाय ) ज्ञान का विषय नहीं है । समर्थम—समवायसम्बन्ध से ज्ञान आत्मा का विशेषण है, अतः ज्ञान को विषयत्व न हो, इसलिए सम्बन्धान्तर पद समवाय के व्यवच्छेद के लिए है । फिर उससे 'मत्सम- वायो ज्ञानस्य' यहाँ भी समवाय का व्यवच्छेद क्यों न हो ? खण्डन — सम्बन्धान्तर पद का अर्थ अन्य सम्बन्ध है । यहाँ अन्य से विशेष्यविशेषणभाव से अन्य का ग्रहण करते हैं और समवाय विशेष्य से अन्य नहीं है । अतः अन्य शब्द से समवाय का व्यवच्छेद नहीं होगा । तस्मात् 'ज्ञान अन्य सम्बन्ध के बिना जिसका विशेषण हो, वह विषय है' इस लक्षण का जैसे ज्ञान सम्बन्ध के बिना ही स्वरूप सम्बन्ध से अर्थ का विशेषण है, वैसे ही 'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ समवाय का भी विशेषण होगा । दोनों स्थलों में कोई विशेष नहीं है । अतः उक्त स्थल में समवाय के विषय होने से अतिव्याप्ति हो जायगी, यह ठीक ही कहा है । इतना ही नहीं, इस लक्षण की अतिव्याप्ति भी है । अर्थात् 'ज्ञानाभावोऽस्ति' यहाँ अभाव में ज्ञान स्वरूप से ही विशेषण होता है, अतः अभाव भी विषय हो जायगा ।

परिच्छेद ] विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४७१ न च तत्र स एव समवायः सम्बन्धः ; अत्रापि विशेषणविशेष्यभावस्यैव सम्बन्धत्वात् । नासौ सम्बन्धिनोऽन्यः, तादृशश्च व्यवच्छेद्य इति चेन्न । समवायेऽपि तुल्यत्वात् । संयोगसमवायौ व्यवच्छिद्येते इति चेन्न । ज्ञानाभावे तथापि प्रसङ्गात् । न तत्र ज्ञानं विशेषणम्, किन्तु उपलक्षणमिति चेन्न । अतीतानागतयो- रविषयत्वापत्तेः । समर्थन—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ स्वरूप सम्बन्ध से ही समवाय में ज्ञान विशेषण है और वह स्वरूप समवायरूप ही है। एवञ्च सम्बन्धान्तर (समवाय) से ही विशेषण है, उसके बिना नहीं; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो सर्वत्र असम्भव हो जायगा; कारण 'ज्ञातो घटः' इत्यादि स्थल में भी विशेषण- विशेष्यभावरूप सम्बन्धान्तर से ही ज्ञान घट में विशेषण होता है । समर्थन—सम्बन्धान्तर पद से सम्बन्धी से अन्य सम्बन्ध का ग्रहण होता है । विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्धी से अन्य नहीं है, अतः सर्वत्र असम्भव नहीं होगा । खण्डन—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ भी समवाय सम्बन्धी ही है और वही उक्त स्थल में स्वरूप है । अतः सम्बन्धान्तर के बिना ही ज्ञान के समवाय में विशेषण होने से अतिव्याप्ति युक्त ही है । समर्थन—सम्बन्धान्तर पद से संयोग और समवाय का व्यवच्छेद विवक्षित है । 'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ स्वरूप समवायरूप है, अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—ऐसा मानने पर भी 'ज्ञानाभावः' यहाँ भी ज्ञान का विषय अभाव हो जायगा, कारण यहाँ सम्बन्धान्तर (समवाय) के बिना ही ज्ञान अभाव का विशेषण होता है । समर्थन—ज्ञान अभाव में विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है । अतः विशेषण- घटित उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—अतीतविषयक, ('अभूद्वृष्टिः' ) और अनागतविषयक ('भविष्यति वृष्टिः' ) ज्ञानस्थल में वृष्टि ज्ञान की विषय न कहलायेगी, कारण वर्तमान वस्तुओं में ही विशेषण-विशेष्यभाव होता है । अतीत विषय वर्तमान ज्ञान का विशेष्य नहीं हो सकता ।

४७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावे चिन्तेयमिति चेन्न । अभावस्याविषयत्वापातात् । ज्ञानादन्यत् ज्ञानीयञ्च यत्कारणादि तत्रापि प्रसङ्गादिति किं विस्तरेण । न च ज्ञानाकारतायां गोचरस्य नास्त्येव ज्ञानगोचरयोर्भेदः ; प्रतीतिविरोधात् । भेदमनिच्छता च स प्रतिषेद्धुमप्यनर्ह इति । भेद‌लक्षण-खण्डनम् 'वक्तव्यस्तर्हि कोऽसौ भेदो नाम ? स हि स्वरूपं वा स्यात् , इतरेतराभावो यदि 'बिना सम्बन्धान्तर के ज्ञान का भावरूप जो विशेष्य है, वह विषय है' ऐसा लक्षण करें, तो 'घटो नास्ति' इस ज्ञान का अभाव विषय नहीं कहलायेगा । किंच— ज्ञान से भिन्न जो ज्ञान के सम्बन्धी कारणादि हैं, उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण 'ज्ञानस्य कारणम्' इत्यादि स्थल में भी सम्बन्धान्तर के बिना ही कारणादि ज्ञान के विशेष्य होते हैं । विज्ञों के लिए विषयविषयिभाव का खण्डन इतना ही बहुत है, विस्तार व्यर्थ है । समर्थन —विषय ज्ञान का स्वरूप ही है, अतः ज्ञान और विषय में परस्पर भेद नहीं है । एवञ्च ज्ञानाभिन्नत्व ही ज्ञान-विषयत्व है । खण्डन—ज्ञान और विषय में अभेद अनुभव से विरुद्ध है, भेद ही अनुभव से सिद्ध है । किंच—यदि भेद न हो, तो 'ज्ञानगोचरयोर्नास्ति भेदः' इस प्रकार भेद का खण्डन भी नहीं हो सकेगा, कारण जो एकदेश या एक काल में रहता है, उसीका निषेध अन्य देश या अन्य काल में होता है । सर्वथा असत् शशशृङ्ग का निषेध नहीं होता । भेद-लक्षण का खण्डन किंच-- भेद क्या वस्तु है, यह भी कहिये ! क्या स्वरूप ही भेद है या अन्योन्या- भाव या वैधर्म्य ? इनमें यदि प्रथम पक्ष मानें, तो अभेद भ्रम ही नहीं होगा । कारण १. ऊपर 'भेदमनिच्छता' इत्यादि ग्रन्थ से नैयायिक मत का अनुसरणकर बौद्ध का खण्डन किया गया है कि यदि भेद प्रमित ही नहीं, तो उसका खण्डन कैसा ? इसपर बौद्ध कहेगा कि किसीकी प्रतिषेध्यता में प्रमितत्व ( सत्यत्व ) ही प्रयोजक नहीं, प्रतीतत्व मात्र से भी प्रतिषेध हो सकता है । यदि प्रतीतत्व मानें, तो फिर कहिये, वह भेद ही क्या है ? अतः खण्डनकार का यह भेद-खण्डन का पूर्वपक्ष सौगत मत के माध्यम से ही समझना चाहिए । इसी तरह यद्यपि प्रत्यक्ष-बाधोद्धार प्रकरण में एकबार भेद का निरास हो ही चुका है फिर भी 'आत्मतत्त्व-विवेक' में विशेष रूप से भेद का जो मण्डन किया गया है, उसका खण्डन करने के लिए यह ग्रन्थ है, यह भाव है ।

परिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४७३ वा, धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; भिन्नेऽभिन्नभ्रमानुपपत्तिप्रसङ्गात् । भ्रान्त्याऽपि धर्मिस्वरूपावगाहनात् । अन्यथा कस्याभेदं सा भ्रान्तिरुल्लिखेत् । ननु निःसम्बन्धित्वेन व्यवस्थितेषु तरुदारुप्रभृतिषु नानाधारोऽवयव्यन्य एवाऽऽरोप्यते, येषु त्वारोप्यते ते भेदेनैव भान्ति । किन्तु अनारब्धावयविषु तेष्वारब्धावयवितया विभ्रम्यते । मैवम्; तेषामनुदाहरणीयत्वात् । अतस्मिन् 'स एवायमि'ति प्रत्यभिज्ञाभासार्थानां दृष्टान्तत्वेनेष्टत्वात् । तत्रापि धर्मान्तरारोपाभ्युपगमे तादात्म्याभावस्य संसर्गाभावप्रवेशापत्तेः । न चैवमप्येष्टव्यमेव, तथापि स्वरूपभेदग्रहे तत्राभेदस्य धर्मस्याप्यशक्यारोपत्वात् । स्वरूप ही भेद होने से भेदग्रह उस अभेदभ्रम का विरोधी है; भ्रम भी धर्मी के स्वरूप को विषय करता ही है । यदि भ्रम धर्मी के स्वरूप को विषय न करे, तो किसमें अभेद को विषय करेगा ? समर्थन—परस्पर-सम्बन्ध-रहित ( उदासीन रूप से ) विद्यमान दूरस्थ अनेक तरु-दारु प्रभृति में एक अवयववाले का अभेद-भ्रम नहीं होता, किन्तु नाना अवयववाले अन्य अवयवी का ही आरोप होता है। जहाँ वह आरोपित होता है, वे भेदरूप में ही भासते हैं । किन्तु अनारब्ध अवयवियों में आरब्धावयवित्व का आरोप होता है । एवञ्च वह भेदग्रह का विरोधी नहीं है । खंडन—जहाँ दूरत्व दोष से अनेक वृक्षों में एकवृक्षत्व का भ्रम होता है, उस स्थल में हमने दोष नहीं दिया है । किन्तु जहाँ भिन्न में 'स एवायम्' ऐसा प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम होता है, उस उदाहरण में दोष दिया है । समर्थन—प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम में भी तादात्म्यरूप धर्म का ही भ्रम होता है, धर्मी के अभेद का नहीं । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो अन्योन्याभाव का संसर्गाभाव में अन्तर्भाव हो जायगा । कारण 'नायं चैत्रः' इस विशेष-दर्शन को यदि भेदविषयक मानें, तो इससे धर्मारोप की निवृत्ति नहीं होगी । अतः धर्मारोपवादी उक्त विशेष-दर्शन को निश्चय ही संसर्गाभावविषयक मानेंगे । किन्तु आप अन्योन्याभाव का अस्वीकार नहीं कर सकते, कारण उसीके निरूपण में प्रवृत्त हैं । किञ्च—स्वरूप-भेद का ग्रह होने पर तादात्म्यरूप धर्म का भी आरोप नहीं हो सकता । कारण तादात्म्य भी अभेदरूप ही है और भेदग्रह होने पर अभेद-भ्रम नहीं हो सकता । ६०

४७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

नापि द्वितीयः ; प्रतीतावन्योन्याश्रयप्रसङ्गात् । प्रतियोगिरूपत्वेन अप्रतीतावधिकरणप्रतीतिः, अधिकरणस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्च तद्ग्रहणकारणम् । अतः केतरेतराश्रय इति चेत् । मैवम् ; एवं हि सति 'कुम्भः पटो न भवती'त्यत्र यथैव तस्याभावस्य प्रतियोगितया पटो निषिद्ध्यते तथा कुम्भोऽपीति सोऽपि कुम्भात्मतया निषिद्धः प्रसज्येत । वस्तुतोऽन्योन्याभावस्य कुम्भप्रतियोगित्वेऽपि कुम्भस्यापटत्वनिरूपणकाले कुम्भस्य प्रतियोगिता नापेक्ष्यते, किन्त्वाश्रयतैवेति कुम्भाप्रतिक्षेपः । पटस्य तु प्रतियोगितैवापेक्ष्यते, न त्वाश्रयतेति कुम्भवत् पटस्यापि न सङ्ग्रहापत्तिः । यद्यप्यन्योन्याभावस्य उभयप्रतियोगिता ; तथाप्यन्या कुम्भाश्रयता, अन्या च पटाश्रयता, अन्या कुम्भप्रतियोगिता, अन्या च पटप्रतियोगिता । तेनान्यो- इतरेतराभाव या अन्योन्याभाव भेद है, यह द्वितीय पक्ष मानें तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । कारण प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी का ज्ञान अन्योन्याभाव के ज्ञान में कारण है और अभावरूपत्व ही प्रतियोगित्व है। अतः जबतक अभाव-ज्ञान न हो, तबतक अभावाभावस्वरूप प्रतियोगित्व का ज्ञान नहीं होगा । समर्थन—प्रतियोगित्वरूप से अप्रतीति के काल में अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अस्मृति के काल में प्रतियोगी की स्मृति अन्योन्याभाव के ग्रह में कारण है, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है। खण्डन—ऐसा मानने पर 'कुम्भः पटो न भवति' यहाँ जैसे उस अभाव के प्रतियोगित्वरूप से पट निषिद्ध होता है, वैसे ही कुम्भ भी निषिद्ध होता है। अतः उस काल में कुम्भत्वरूप से कुम्भ का निषेध हो जायगा । वस्तुतः अन्योन्याभाव कुम्भप्रतियोगिक होने पर भी कुम्भ में पट के निषेध- काल में कुम्भ की प्रतियोगिता अपेक्षित नहीं, किन्तु आश्रयता ही अपेक्षित है। अतः उस काल में कुम्भ का निषेध नहीं होता । इसी तरह पट की प्रतियोगिता ही अपेक्षित है, आश्रयता नहीं । अतः कुम्भ के तुल्य पट का अधिकरणरूप से संग्रह नहीं होता । समर्थन—यद्यपि अन्योन्याभाव के दोनों प्रतियोगी और दोनों अधिकरण हैं, तथापि कुम्भनिष्ठ आश्रयता अन्य है और पटनिष्ठ आश्रयता अन्य । वैसे ही कुम्भनिष्ठ प्रति- योगिता अन्य है और पटनिष्ठ प्रतियोगिता अन्य । अतः अन्योन्याभाव के उभय- प्रतियोगिक और उभयाश्रित होने पर भी सर्वत्र दोनों का निषेध या संग्रह नहीं होता ।

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७५ न्याभावस्योभयप्रतियोगिकत्वे चोभयाश्रितत्वे च नोभयोरपि सङ्ग्रहप्रतिक्षेप- विरोधापत्तिः । नापि च प्रतियोगित्वस्यानुयोगिनो भेदोपजीवनेऽन्योन्याश्रयः, अनुपजीवने च स्वस्मादपि भेदग्रहापत्तिः प्रसज्येत । यतः स्मर्यमाणस्य प्रतियोगिता, अनुभूय- मानस्य चाऽऽश्रयतेत्येतावन्मात्र एवोक्ते स्वस्मादपि भेदग्रहानापत्तिः । न चैवं ' स एवायमि'त्यत्रापि भेदग्रहप्रसङ्गः; वास्तवतत्सत्त्वासत्त्वाभ्यां विशेषात् । मैवम्; तथाहि—किमधिकरणप्रतीतिरधिकरणतया प्रतीतिः, उत वस्तुगत्या अधिकरणस्य स्वरूपेण विवक्षिता ? आद्ये किमीयाऽधिकरणतया घटादेः प्रतीति- स्तस्य कारणं स्यात् । न तावदन्योन्याभावाधिकरणतया; दण्डाद्यप्रतीतौ दण्डा- धिकरणताया इव तदप्रतीतौ तदधिकरणतायाः प्रत्येतुं पूर्वमशक्यत्वात् , विशिष्ट- किन्तु जिस काल में जिसमें प्रतियोगित्व की विविक्षा होती है, उसका निषेध और अन्य का संग्रह होता है । यदि अनुयोगिनिष्ठ भेद प्रतियोगित्वज्ञान की अपेक्षा करता है, तो प्रतियोगित्व के अभावाभावरूप होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'यदि अपेक्षा नहीं करता, तो स्व से स्व में भेदग्रह हो जायगा' यह शङ्का भी युक्त नहीं है । कारण स्मृति का विषय प्रतियोगी होता है और अनुभव का विषय अधिकरण, इतना ही कहने पर स्व में स्व के भेदग्रह की आपत्ति नहीं होगी । समर्थन—'स एवायम्' यहाँ इदमंश गृह्यमाणधर्मिक और तदंश स्मर्यमाणप्रतियोगिक होने से 'भेदग्रह क्यों न हो' यह शङ्का भी युक्त नहीं । कारण प्रतियोगी के स्मृत होने पर भी वास्तव भेद न होने से भेदप्रतीति नहीं होती । अर्थात् भेदसत्तासहित प्रतियोगी-स्मरणादि ही भेदग्रह के कारण हैं । यहाँ वैसा न होने से भेदप्रतीति नहीं होती । खण्डन—अधिकरण-प्रतीति से क्या अधिकरणत्वरूप से अधिकरण की प्रतीति विवक्षित है या वस्तुतः जो अधिकरण है, उसकी स्वरूपतः प्रतीति विवक्षित है ? प्रथम पक्ष मानें, तो कहिये किसकी अधिकरणता से घटादि की प्रतीति भेद-प्रत्यय का कारण है ? अन्योन्याभाव की अधिकरणतारूप से अधिकरणता-प्रतीति तो कारण हो नहीं सकतीं; क्योंकि दण्ड के अप्रतीतिकाल में दण्डाधिकरणता की तरह अभाव के अप्रतीति-

४७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ प्रतीत्या विशेषणस्यावश्योल्लेख्यत्वात्, विशिष्टस्य च विशेषणघटितमूर्तित्वात् । नापि यस्य कस्यचिदधिकरणतया प्रतीतिस्तत्कारणम्, यत्र भिन्नेऽभेद- भ्रमस्तत्र धर्मिणः सत्त्वाद्याधारतया प्रतीतावपि तदनुत्पत्तेः । न तन्मात्रात्तदुत्पत्तिः ; अपितु प्रतियोगिस्मृतिसहितात् । सा च तदा नास्तीति तदनुत्पत्तिरिति चेन्न । प्रतियोगिस्मृतिरपि किं प्रतियोगितया स्मृतिः, उत वस्तुगत्या प्रतियोगिनः स्वरूपेणेति विकल्प्यत्वात् । आद्ये किमन्योन्याभावप्रतियोगितया, यस्य कस्यचित् प्रतियोगितया वा ? नाद्यः ; अन्योन्याभावाप्रतीतौ तदनुपपत्तेः पूर्ववत् । नापि द्वितीयः ; तस्य वस्तुगत्या भिन्नस्याभिन्नतया भ्रमविषयीकृतस्य स्वदेशेतरदेशादावसत्त्वेन प्रतीयमानत्वे स्वाभावप्रतियोगितया प्रतीतावप्यन्योन्याभावप्रतीत्यनुपपत्तेः । प्रतियोग्यनुभूतिः सा, न स्मृतिरिति चेन्न । स्मृतित्वस्याप्रयोजकत्वात् । काल में भी अन्योन्याभाव की अधिकरणता की प्रतीति संभव है । विशिष्ट विशेषणघटित होने से उसकी प्रतीति में विशेषण का उल्लेख आवश्यक है । जिस किसीकी अधिकरण- तारूप से अधिकरण-प्रतीति भेदग्रह का कारण नहीं है, क्योंकि जहाँ भिन्न में अभेद-भ्रम होता है, वहाँ भी धर्मी की सत्त्व के आधारत्वरूप से प्रतीति होती है । अतः भेद-प्रत्यय हो जायगा । समर्थन — केवल अधिकरणस्वरूप से अधिकरण की प्रतीतिमात्र कारण नहीं है, किन्तु प्रतियोगी की स्मृति से युक्त तादृश प्रतीति ही कारण है । भ्रमस्थल में प्रतियोगी की स्मृति न होने से भेदग्रह नहीं होता । खण्डन — प्रतियोगी की स्मृति भी जो कारण है, क्या वह प्रतियोगित्वरूप से विवक्षित है या वस्तुतः जो प्रतियोगी हो, उसकी स्वरूप से स्मृति कारण है ? प्रतियोगित्वरूप से कहें, तो क्या अन्योन्याभाव के प्रति- योगित्वरूप से प्रतीति कारण है या जिस किसीके प्रतियोगित्वरूप से ? आद्य पक्ष में अन्योन्याभाव की अप्रतीति-काल में अन्योन्याभाव की प्रतियोगितारूप से प्रतीति पूर्वोक्त प्रकार से हो नहीं सकती, फिर वह कारण कैसे हो सकती है ? द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण जिस काल में अन्य देश- ( आपण ) निष्ठ अभाव का प्रतियोगित्व-ग्रह है, उस काल में वस्तुतः भिन्न में जो अभेद-भ्रम होता है, वहाँ भेद-ग्रह हो जायगा । समर्थन — प्रतियोगी की स्मृति भेद-ग्रह का कारण है । यहाँ तो प्रतियोगी की अनु-

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७७ अन्यथा अनुभवमानयोरन्योन्याभावाप्रतीतिप्रसङ्गात् । अत्रान्तराले स्मृतिकल्पनया 'नान्योन्‍यात्मानाविमौ' इत्यनुभवबाधितया प्रयोजकत्वेऽपि वा स्मृतित्वस्य 'योऽसौ तत्र नासीत् सोऽयमि'ति स्मर्यमाणाभावप्रतियोगिकत्वेऽपि वस्तुगत्या भिन्नस्याभिन्नतया भ्रमेणोल्लिख्यमानस्यान्योन्याभावप्रतीत्यनुदयात् । दोषाभावोऽपि हेतुः, स भ्रमोदाहरणे नास्तीति चेन्न । पूर्वदृष्टे स्मृतिमतो वस्तुगत्याऽन्यस्यैवानन्तरदृष्टस्य पूर्वदृष्टात् भिन्नमभिन्नं वेति अनिरूपितस्यापि सम्भवेन तत्रेतरेतराभावबुद्ध्यापत्तेः । बुद्ध्यत एवेति चेन्न । पश्चात्संशयदर्शनात् । विशेषधीरपि तत्र हेतुरिति चेन्न । विशेषत्वस्यान्योन्याभावनिरूपणं विना दुर्निरूपत्वात् । भूति है, स्मृति नहीं, अतः भेद-ग्रह नहीं होगा । खण्डन—'इमौ न अन्योन्यात्मानौ' इस स्थल में जहाँ प्रतियोगी का अनुभव है, स्मृति नहीं, वहाँ भी भेद-ग्रह होता है, पर उसमें प्रतियोगी का स्मृतित्व प्रयोजक ही नहीं है । किंच 'इमौ न अन्योन्यात्मानौ' यहां अनुभव से बाधित होने से भेद-ग्रह में प्रतियोगी-स्मृति के प्रयोजकत्व की कल्पना व्यर्थ है । किंच—'योऽसौ तत्र नासीत् सोऽयम्' इस स्थल में जहाँ स्मृतिविषय अभाव प्रतियोगी है, वहां वस्तुतः भिन्न में अभिन्न का भ्रम होता है । यदि प्रतियोगी-स्मृति को प्रयोजक मानें, तो उक्त स्थल में भेद-ग्रह हो जायगा । समर्थन—भेदज्ञान में दोषाभाव भी हेतु है और वह अभेद-भ्रमस्थल में है नहीं, अतः वहां भेद-ग्रह नहीं होता । खण्डन—जहाँ पूर्वदृष्ट की स्मृति हो और अनन्तर उससे वस्तुतः भिन्न का ही प्रत्यक्ष हुआ हो, किन्तु 'वह पूर्वदृष्ट से भिन्न है या अभिन्न है' ऐसा निश्चय न हो, वहाँ दोषाभाव भी होने से भेद-ग्रह हो जायगा । 'वहाँ भेद-ग्रह होता ही है' यह नहीं कह सकते, कारण पीछे संदेह देखा जाता है । यदि भेद का ग्रह होता तो संदेह कैसे होता ? समर्थन—भेद-ग्रह में विशेष का दर्शन भी कारण है । अभेद-भ्रमस्थल में विशेष का दर्शन है नहीं, अतः भेद-ग्रह नहीं होता । खण्डन—जबतक भेद का ज्ञान न हो तबतक विशेष का ज्ञान हो नहीं सकता, कारण व्यावृत्ति ( इतर से भेद )- ज्ञान के जनक धर्म को ही 'विशेष' कहते हैं । एवञ्च अन्योन्याभाव के निरूपण के बिना विशेष का निरूपण हो नहीं सकता ।

४७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ एतेन वस्तुगत्या प्रतियोगिनः स्वरूपेण स्मृतिः सहकारिणीत्येतदपि व्युदस्तम् । वस्तुगत्याऽधिकरणस्य स्वरूपेण प्रतीतिः सहकारिणीत्यपि, भिन्नस्या- भिन्नतया वृक्षादेः प्रतीयमानस्यान्योन्याभाववत्तया ग्रहणप्रसङ्गात् । नापि तृतीयः ; अभावस्य निर्धर्मकतापक्षे तस्य विश्वाभिन्नत्वप्रसक्तौ विश्वस्याप्यभावरूपत्वेन निर्धर्मकतया धर्मलक्षणान्योन्याभावविरहिण एकरूप्या- पत्तेः, अभावे धर्माभावात् । स्वरूपमेव भेद इति चेत् ; योऽसौ भेदस्तस्य स्वात्मा स किं कस्मादपि भेदः, उत निष्प्रतियोगिक एव ? न तावन्निष्प्रतियोगिक एव; प्रमाणाभावे- नासत्त्वप्रसङ्गात् । योऽसौ भेदव्यवहारोऽस्ति स कस्मादपि, न तु नीलव्यवहारवत् निष्प्रतियोगिकः । स च निष्प्रतियोगिको नोपपद्यते । निष्प्रतियोगिकोऽपि वा समर्थन — वस्तुस्वरूप से जो प्रतियोगी हो, उसका स्वरूप से स्मरण भेदज्ञान का कारण है तथा वस्तुतः जो अधिकरण हो, उसका स्वरूप से ज्ञान भेद-ग्रह का सहकारी है । अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खण्डन — भिन्न-भिन्न वृक्षों में जहाँ अभेद-भ्रम होता है, वहाँ भी भेद-ग्रह हो जायगा; पर होता नहीं । अतः प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के ज्ञान को कारण मानना चाहिए । प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी के ज्ञान को कारण मानें तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । 'भेद वैधर्म्य है' यह तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है, कारण जो पण्डित अभाव में धर्म को नहीं मानते, उनके मत में अभाव ( संसर्गाभाव अथवा भेद ) विश्व से भिन्न नहीं होगा, किन्तु अभिन्न हो जायगा । फिर विश्व भी अभावरूप होने से धर्मरहित होने के कारण धर्मरूप भेद से रहित है, अतः एकरूप हो जायगा । समर्थन — 'वैधर्म्यं भेदः' यह भावस्थल के लिए ही है । अभाव-स्थल में तो स्वरूप को ही भेद कहेंगे, तो उपर्युक्त दोष न होगा । खंडन — जो अभाव का स्वरूप ही भेद है, तो वह किसी प्रतियोगी से निरूपित है या निष्प्रतियोगिक याने प्रतियोगी के निरूपण से रहित ? प्रतियोगी के निरूपण से रहित भेद हो नहीं सकता । यदि भेद को निष्प्रतियोगिक मानें; तो प्रमाण न होने से उसकी सिद्धि ही नहीं होगी, कारण जो भेद-व्यवहार होता है वह किसी प्रतियोगी से ( प्रतियोगी की अपेक्षा ) ही होता है । वह नीलपीतादिव्यवहार की तरह प्रतियोगी से रहित नहीं होता । अतः बिना प्रतियोगी के भेद की उपपत्ति नहीं हो सकती ।

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४७६ यद्ययं सप्रतियोगिकव्यवहारं करोति, प्रतियोगिनियमो न स्यादिति स्वस्मादपि भेदव्यवहारं कुर्यात् । स्वस्माद्भेदः कथं सम्भवतीति चेत्; तत्किं भिन्नाद्भेदः, नन्वेवमनवस्था स्यात् । नापि प्रथमः ; वक्तव्यं हि तद्यस्मादसौ भेदः, न तावत् सर्वस्मात्, स्वात्म- नोऽपि भेदप्रसङ्गात् । नापि घटादेः; घटादिना सह तस्यावध्यवधिमद्भावो योऽसौ स अर्थान्तरं वा स्यात् स्वरूपमेव वा ? आद्ये तस्यापि भेदावधित्वेन तत्राप्येवमनुयोगे यद्येतदेवोत्तरम्, अनवस्था स्यात् । अथ तत्र स्वरूपमेव; तर्हि 'प्रथमस्य तथाभावे प्रद्वेषः किन्निबन्धनः' इति प्रथमत एव स्वरूपं वाच्यम् । तदपि न ; तथाहि—यदि घटाभिः सार्धमवध्यवधि- यदि निष्प्रतियोगिक भेद से भी प्रतियोगी का व्यवहार करें, तो प्रतियोगी का नियम ही नहीं रहेगा । एवञ्च स्व से स्व में भेद की प्रतीति होने लगेगी । समर्थन—स्व में स्व के भेद का सम्भव कैसे होगा ? अर्थात् धर्मित्व और प्रतियोगित्व भेदैकार्थसमवायी होने से एकत्र रह नहीं सकते, क्योकि एकत्व और अनेकत्व परस्पर विरुद्ध हैं । अतः स्व में स्व का भेद नहीं रह सकता । खण्डन— तो क्या भिन्न में भेद होता है ? यदि भिन्न में भेद मानें, तो अनवस्था हो जायगी । देखिये—जिस भेद से भिन्न है, वह भेद भी अन्य भेद से भिन्न में ही रहेगा । इस तरह एक भेद से भिन्न में अन्य भेद के रहने से अनवस्था हो जायगी । 'वह भेद किसी प्रतियोगी की अपेक्षा से है' यह प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण कहना होगा कि किसकी अपेक्षा वह भेद है ? सबकी अपेक्षा तो वह भेद है नहीं, कारण यदि सबकी अपेक्षा भेद मानें, तो सर्व में स्व का भी अन्तर्भाव होने से स्व से भी स्व का भेद हो जायगा । घटादि की अपेक्षा सभी भेद अभाव नहीं हैं, कारण घटादि के साथ जो अभाव का अवधि-अवधिमद्भाव सम्बन्ध है, वह अन्य पदार्थ है या स्वरूप है ? यदि उसे अन्य पदार्थ मानें, तो वह भी अभावनिष्ठ भेद की अवधि है, अतः उसके साथ अवध्यवधिमद्भाव को भी अर्थान्तर कहेंगे, तो इस प्रकार उत्तरोत्तर अवध्यव- धिमद्भाव के स्वीकार से अनवस्था हो जायगी । यदि वहाँ स्वरूप को ही सम्बन्ध मानें, तो प्रथम सम्बन्ध को स्वरूप मानने में क्या द्वेष है, जो उसे अर्थान्तर मानते हैं, अतः प्रथम सम्बन्ध को ही स्वरूप मान लेना चाहिए । किन्तु ऐसा मान नहीं सकते ।

मद्भावसम्बन्धोऽस्य स्वरूपं प्रतियोगिना सार्धं तद्भावस्वरूपस्यास्य निषेध्य- निषेधभावलक्षणः सम्बन्धः स्वरूपं न स्यात्, स्वरूपस्यैकत्वात् । अनयोश्च सम्बन्धयोर्भिन्नत्वात् । न हि यदेव प्रतियोगिनः सकाशाद्भिन्नत्वं तदेव तन्निषेधत्वमिति सम्भवति, ततो व्यतिरिक्तस्यानिषेध्यसाधारणत्वात् , निषेध्यनिषेधभावस्य नियतवस्त्वपेक्ष- त्वादिति । एवं कार्यकारणभावादौ स्वभावसम्बन्धान्तरेऽपि वाच्यम् । ऊहनी- यश्चाऽन्यत्रापि स्वरूपभेदे दोष एषः । किञ्च धर्मान्तरं भेद इति ब्रुवतः कोऽभिसन्धिः - किं घटत्वादय एव भेदः, उत भेदो नामान्य एवैकः कश्चिद्धर्मः ? आद्ये घटत्वादीनां सप्रतियोगिकत्वप्रसङ्गः, भेदस्य सप्रतियोगिकत्वात् । न च घटत्वादयस्तथा, पटाद्यनपेक्षतयैव प्रतीतेः । यदा पटाद्यपेक्षया प्रतीयन्ते तदा भेदव्यवहारं कुर्वन्तीति चेन्न । प्रतीतौ कस्य पराद्यपेक्षेति वाच्यम्-किं घटत्वादेरुत धर्मस्य कस्यचित् ? आद्ये पटा- देखिये—यदि घटादि के साथ अभाव के अवधि-अवधिमद्भावरूप संबन्ध को स्वरूप मानें, तो प्रतियोगी के साथ अभाव का निषेध्यनिषेधकभावरूप संबन्ध स्वरूप न कहलायेगा, कारण स्वरूप एक है और ये दोनों सम्बन्ध भिन्न-भिन्न हैं । अर्थात् अभाव एकरूप होने से वह इन भिन्न-भिन्न सम्बन्धस्वरूप ( द्विरूप ) नहीं हो सकता । जो प्रतियोगी से भिन्न है, वही प्रतियोगी का निषेधक है—ऐसा भी सम्भव नहीं, कारण उस घटादि से भिन्नत्व अनिषेध्य पटादि-साधारण भी है और घटादि से निषेध्य-निषेधकभाव नियत वस्तु है । इसी प्रकार मृद्घट के कार्य-कारणभाव को स्वरूप माने तो मृद्घट का विशेष्यविशेषणभावरूप सम्बन्ध स्वरूप न कहलायेगा । कारण स्वरूप एक है और एक कार्यकारणभाव से अन्यत्र भी विशेष्यविशेषणभाव होने से दोनों सम्बन्ध भिन्न हैं । अन्यत्र भी स्वरूपभेद में इस दोष की ऊहा (अनुवृत्ति) करनी चाहिए । किञ्च—'धर्मान्तर भेद है' यह कहनेवाले का क्या अभिप्राय है, क्या घटत्वादि ही भेद हैं या अन्य ही कोई एक धर्म भेद है ? प्रथम पक्ष कहें, तो भेद सप्रतियोगिक होने से घटत्वादि भी सप्रतियोगिक हो जायँगे । किन्तु घटत्वादिक सप्रतियोगिक नहीं हैं, कारण पटादि की अनपेक्षा से उनकी प्रतीति होती है । समर्थन—जिस काल में घटत्वादि की पटादि की अपेक्षा प्रतीति होती है, उस काल में वे घटत्वादि भेद-व्यवहार कराते हैं। और जिस काल में पटादि की अपेक्षा के

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८१ पेक्षामन्तरेण घटत्वप्रतीत्यनुपपत्तिप्रसङ्गः । नहि यदन्तरेण यदुत्पद्यते तत्तत्कारणं नाम ? वह्नाविवावान्तरजातिभेदे कारणभेदस्य चरितार्थयितुमशक्यत्वात् । साक्षा- त्कारित्वादिना सह परापरभावानुपपत्तेः । जात्योः परापरत्वसङ्करमिच्छतामपि मते पञ्चम्यर्थावधिभावः प्रतिपाद्यमानः केन सममन्वियात् । घटत्वस्यावधिघटितत्वे तथैव परं प्रतीत्यापत्तेः । बिना घटत्वादि की प्रतीति होती है, उस काल में घटत्वादि-व्यवहार होता है । खण्डन—प्रतीति में किसे पटादि की अपेक्षा है, यह कहना होगा, क्या घटत्वादि को या घटत्वादिनिष्ठ किसी धर्म को ? आद्यपक्ष में पटादि की अपेक्षा के बिना घटत्वादि की कदाचित् भी प्रतीति नहीं होगी, पर वह होती है। फिर पटादि की अपेक्षा के बिना भी यदि घटत्वादि की प्रतीति को आप मानें, तो घटत्वादि में पटादि की अपेक्षा कारण ही नहीं रही, क्योंकि जिसकी अपेक्षा के बिना जो उत्पन्न होता है, उसमें वह कारण नहीं होता । समर्थन—वह घटत्वज्ञान विलक्षण है, जिसमें पटादि की अपेक्षा है । अतः जैसे वह्नि में विलक्षण जाति मानकर तृण, अरणि और मणि की कारणता व्यभिचरित नहीं होती, वैसे ही घटत्वज्ञान में भी दो जातियाँ मानने पर पटादि की अपेक्षा का व्यभिचार नहीं होगा । खण्डन --वह्नि में तृणादि-कारणता प्रत्यक्ष है, अतः वहाँ विलक्षण जाति को मानकर व्यभिचार का निवारण उचित ही है । किन्तु यहाँ घटत्वज्ञान में पटादिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उससे ज्ञानगत विलक्षण जाति की कल्पना युक्त नहीं है । किञ्च—प्रत्यक्षत्व जाति पटादि-ज्ञान में भी है और वहाँ घटत्व-ज्ञानत्व नहीं है, घटत्व-ज्ञानत्व अनुमित्यात्मक घटत्व-ज्ञान में भी है, वहाँ प्रत्यक्षत्व नहीं है और दोनों प्रत्यक्षात्मक घटत्व-ज्ञान में है, अतः सङ्कर दोष होने से घटत्व-ज्ञानत्व जाति नहीं हो सकती । किञ्च—सङ्कर होने पर भी घटत्व-ज्ञानत्व को जाति मान लें, तो भी 'पटात्' इस पंचमी से उक्त अवधित्व का कहाँ अन्वय होगा ? घटत्व तो अवधि में साकांक्ष है नहीं । यदि उसे अवधि में साकांक्ष मानें, तो सर्वदा अवधि की अपेक्षा से घटित ही घटत्वादि की प्रतीति होने लगेगी । ६१

तद्धर्मस्य तथात्वमिति चेन्न । तथाहि—न द्वितीयः, स एव सापेक्षप्रति- पत्तिर्भेदो न तु घटत्वादिः; घटत्वादेश्च स भेदः स्यात् , तद्धर्मकत्वात् । घटादेस्तु भेदपर्य्यनुयोगे तदभिधानमसङ्गतम् । कथञ्च भिन्नैरनुगतव्यवहारः स्यात् । तथापि तथा सति वा किन्न तैरेव तदादिव्यवहारोऽपि स्यात् । नापि द्वितीयः ; अनभ्युपगमात् । सप्तपदार्थानामनन्तर्भावप्रसङ्गात् , स्वात्मनि वृत्त्यवृत्तिभ्यामनुपपत्तेश्च । समर्थन—घटत्वादि का धर्म भेद है, और वही अवधि में सापेक्ष है। खंडन— यही द्वितीय कल्प है, पर वह भी युक्त नहीं। कारण वही, जिसकी सापेक्ष प्रतिपत्ति (प्रतीति) है, भेद मानिये, घटत्वादि को भेद क्यों मानते हैं? वह भेद घटत्वादि का धर्म होने से घटत्वादि का हुआ। अतः घटनिष्ठ भेद के प्रश्न पर उसका कथन असङ्गत है। किञ्च—यदि घटत्व-पटत्वादि प्रत्येकवृत्ति धर्म का भेद कहें, तो उस धर्म के एक-एक- निष्ठा होने से अनुगत भेदबुद्धि या भेद-व्यवहार कैसे होगा ? यदि च सर्वत्र अनुगत भेद न होने पर भी अनुगत भेदव्यवहार मान लें, तो वैसे ही अनुगत गोत्वादि के बिना भी अनुगत गवादि-व्यवहार हो जायगा। फिर गोत्वादि जातियों की कल्पना भी व्यर्थ हो जायगी। ‘भेद अन्य कोई धर्म है’ यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है, कारण वैसा धर्म अन्योन्याभाव ही हो सकता है। किन्तु अन्योन्याभाव खण्डित होने से उसका स्वीकार संभव ही नहीं है। अन्योन्याभाव से भिन्न ऐसा कोई धर्म भी नहीं है, जो सप्त पदार्थों में रहे और भेद-व्यवहार के योग्य हो। यदि ऐसे किसी विलक्षण धर्म को मान लें, तो उसका सप्तपदार्थों में अन्तर्भाव न होने से ‘सात ही पदार्थ हैं’ यह वैशेषिकों का विभाग असङ्गत हो जायगा। किंच—वह विलक्षणधर्मरूप भेद स्व (भेद) में रहता है या नहीं? यदि नहीं रहता, तो भेदरहित भेद सर्वात्मक होनेके कारण उसका सप्त पदार्थों में ही अन्तर्भाव हो जाने से भेद को अतिरिक्त मानना व्यर्थ है। यदि रहता है, तो वही भेद रहता है या अन्य? यदि वही रहता है, तो आत्माश्रय हो जायगा। यदि अन्य भेद रहता है, तो उस भेद में अन्य भेद, फिर उसमें भी अन्य भेद, इस तरह अनवस्था हो जायगी।

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८३ ईदृशाञ्च उपाध्यालीढवैचित्र्याणां जात्या समर्थने सर्वोपाध्युपधानानां जात्यैव समर्थनं स्यात् । ननु घटत्वादय एव भेदाः, घटत्वादिज्ञानाविशेषेऽपि च प्रतियोगिज्ञान- सहकारिवशाद्विचित्रव्यवहारोपपत्तिरिति चेन्न । व्यवहारसत्यत्वार्थं वास्तवानुगत- विशेषस्यावश्यं स्वीकर्तव्यत्वे तथैव पर्यनुयोगानुवृत्तेः । अनन्तभेदपरम्पराभ्युपगमे च तत्क्रमज्ञेयतायां प्रतीत्यपर्यवसानात् । तद्युग- पज्ज्ञेयतायामत्यन्तसदृशतया कस्यचिदन्यभेदस्यान्यदीयत्याऽपि ग्रहणसम्भवा- दिना सर्वत्र प्रामाण्यानाश्वासप्रसङ्गात् । सर्वप्रतीतिनियमानङ्गीकारे चाप्रतीतसत्त्वे प्रमाणाभावात् । समर्थन—सप्तपदार्थों में वृत्ति भेद को जाति ही क्यों न मानें ? खण्डन—प्रति- योगित्व, अधिकरणत्व आदिरूप उपाधियों से जिसमें वैचित्र्य है, ऐसे भेद को भी यदि जाति मानें, तो प्रमेयत्वादि को भी जाति ही मान लीजिये । फिर उपाधिमात्र का उच्छेद ही हो जायगा । समर्थन—घटत्व आदि ही भेद हैं । घटत्व आदि के ज्ञान में विशेष न होने पर भी प्रतियोगिज्ञानरूप सहकारी की अपेक्षा से विचित्र व्यवहार की उपपत्ति होती है । खण्डन—‘घटः’ इत्याकारक तथा ‘पटाद् भिन्नः घटः’ इत्याकारक दो प्रकार के व्यवहार होते हैं । उन व्यवहारों की सत्यता के लिए वास्तविक अर्थगत विशेष अवश्य मानना होगा । यदि उसे न मानें, तो दोनों में से एक व्यवहार असत्य हो जायगा । यदि अर्थगत विशेष को मान लें, तो वही भेद हो जायगा, घटत्वादि को भेद मानना व्यर्थ है । यदि भेद को अनन्त मानें, तो वह भेद-परम्परा क्रमशः ज्ञेय है या एककाल में ? यदि क्रमशः ज्ञेय मानें, तो भेद अनन्त होने से भेद-प्रतीति की समाप्ति ही नहीं होगी । यदि एक ही काल में सभी भेदों का ज्ञान मानें, तो सभी भेदों के सदृश होने से ‘किससे कौन भिन्न है, यह इससे भिन्न है या नहीं ?’ इस तरह सर्वत्र सन्देह-विपर्यय होने लगेंगे । फलतः प्रामाण्य में अविश्वास हो जायगा । समर्थन—तीन या चार भेदों का ग्रहण होता है । भेद-परम्परा का ग्रहण नहीं होता । खण्डन—ऐसा मानने पर जिस भेद का ग्रहण न हुआ, उसका स्वाश्रय से अभेद होने पर मूलपर्यन्त अभेद हो जाने से भेद का अत्यन्त अभाव हो जायगा ।

४८४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

जिज्ञासायां तस्य तस्यापि ज्ञेयत्वे तद्बुद्धीनां भेदबुद्धित्वात् तदर्थेष्वनुगतत्व- स्याप्यनुपपत्त्या तेष्वेकजात्याद्यभ्युपगमे तद्भेदेऽपि तदङ्गीकारे परस्पराश्रयाश्रयि- भावप्रसङ्गात् । एवं सत्तादीनामानन्त्यस्वीकारे द्रष्टव्यम् । किञ्च घटत्वादेर्भेदत्वेऽवधिभूतपटत्वादिसापेक्षप्रतिपत्तिकतायां घटत्ववत् पटत्वस्यापि भेदरूपस्य भेदावधिप्रतिपत्तिसापेक्षतयाऽवधेश्च घटत्वादित्वेन घटत्वादिप्रतीत्यपेक्षायामन्योन्याश्रयत्वप्रसङ्गः । भेदस्वरूपत्वे घटत्वादेरवध्यपेक्षा, न तु स्वरूपमात्रप्रतिपत्तौ । स्वरूपमात्रेण चावधित्वम् तत्कृत एवमिति चेन्न । भेदरूपता यदि तस्य स्वात्मैव तदा

समर्थन—उस काल में किन्हीं भेदों का ज्ञान न होने पर भी जिज्ञासा होने पर क्रमशः भेदों का ज्ञान होता ही है। भाव यह है कि जो कभी भी उपलब्ध नहीं होता, वह असत् होता है । अनन्त भेद नियमतः उपलब्ध नहीं होते, ऐसी बात नहीं । किन्तु जब यद्विषयक जिज्ञासा हो, तब वह भेद प्रतीत होता है, ऐसा नियम मानेंगे । एवञ्च भेद का भान हो जाने से मूलपर्यन्त अभेद नहीं होगा। खण्डन—उन सब भेद- बुद्धियों के भेदबुद्धि होने से उनके विषय भेदों में अनुगत एक धर्म न मानने पर एकाकार बुद्धि न होगी । अतः एक धर्म या जाति अवश्य माननी होगी । फिर उस जाति में भी भेद मानेंगे और उस भेद में उस जाति को मानेंगे—इस तरह परस्पर भेद और जाति में आधाराधेयभाव हो जायगा । इसी प्रकार सत्ता में सत्ता मानने में अनवस्था तथा उन सत्ताओं के क्रमशः ज्ञेयत्व में प्रतीति का अपर्यवसान और युगपद् ज्ञेयत्व में सत्ताज्ञान में प्रामाण्य का अविश्वास आदि दोषों को जानना चाहिए । किंच—यदि घटत्वादि को भेदरूप मानें, तो पटत्वादि का ज्ञान घटत्वादिरूप जो अवधि उसकी अपेक्षा से होगा। एवञ्च घटत्व के तुल्य पटत्व भी भेदरूप होने से उसका ज्ञान भी पटत्वरूप अवधि के ज्ञान की अपेक्षा से होगा । अतः भेदरूप होने से पटत्वादि अवधि को घटत्वादिरूप से घटत्वादि की अपेक्षा होने से अन्योन्या- श्रय हो जायगा । समर्थन—घटत्वादि को जिस काल में भेदरूप मानते हैं, उस काल में अवधि की प्रतीति की अपेक्षा होती है । स्वरूपतः घटत्वादि अवधि में सापेक्ष नहीं हैं और स्वरूप से ही अवधि है, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खण्डन—घटत्व का स्वरूप ही भेद है, तो यह कथन कि 'स्वरूपमात्र की प्रतिपत्ति के काल में अवधि की अपेक्षा नहीं

परिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८५ स्वरूपमात्रप्रतिपत्तौ नावध्यपेक्षेति शून्यं वचनम् । अथ धर्मान्तरं तदा स एव भेदोऽस्तु, कृतं तद्वत्तया घटत्वादेर्भेदरूपतेति प्रक्रियाकल्पनया । अस्तु स एव धर्मान्तरं भेद इति चेन्न । दूष्यत्वात् । अथापि स्वरूपादित्रयमिदं भेद इति कथं सङ्गच्छते, तद्व्यवहारस्यैकाकारस्य नानानिमित्तत्वे गोत्वाद्यनुगताकारप्रतीतेरपि कथमेकनिमित्तत्वसिद्धौ प्रामाण्यं व्यभिचारात् । सामान्यविशेषैरेव परसामान्यबुद्धिव्यवहारोपपत्तौ तत्कल्पनानुपपत्तेः । किञ्च भेदे भेदान्तरमस्ति न वा ? आद्येऽनवस्था । द्वितीये तदभाव एव स्यात्, धर्मिण्येव तत्प्रवेशात् । भेदस्वभावत्वात् स्वात्मन्यपि स्वयमेव तद्व्यवहारमयं करोति, सत्तेव सद्- व्यवहारमिति चेन्न । यदि स्वस्मादभिन्नः स्वस्य भेद इति स्वस्मादित्यवधेयावधि- होती' युक्ति से शून्य है । यदि 'घटत्वादिनिष्ठ अन्य धर्म ही भेद है, घटत्वादि रूप भेद नहीं है' ऐसा कहें, तो उसी धर्म को भेद मानिये । उस धर्म के होने से घटत्वादि भेदरूप हैं' इस प्रक्रिया की कल्पना व्यर्थ है । वही धर्म भेद है, यह नहीं कह सकते, क्योंकि अन्योन्याश्रय दोष होने से वह दूषित है । जबतक तीनों में अनुगतभेदत्वरूप अनुगत धर्म न मानें, तबतक स्वरूप, वैधर्म्य और अन्योन्याभाव यथास्थान तीनों भेद हैं— यह कथन नहीं जँचता । यदि इन तीनों में अनुगत एकरूप न होने पर भी एकाकार व्यवहार मान लें, तो अनुगत गोत्वादि न होने पर भी 'गौः' इत्याकारक गोमात्र में एकाकार व्यवहार हो जाने से गोत्वादि जातियों का स्वीकार भी व्यर्थ है । इसी प्रकार गोत्व, अश्वत्व आदि अपर जातियों से 'द्रव्यम्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति का निर्वाह हो जाने से द्रव्यत्वरूप परजाति का तथा द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वरूप अपर सामान्य से 'सन्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति हो जाने से भेद का सत्तारूप पर सामान्य का स्वीकार व्यर्थ हो जायगा । किंच— भेद में अन्य भेद रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो अनवस्था हो जायगी । यदि नहीं रहता तो उसका धर्म के साथ भेद न होने से धर्मी में प्रवेश होने से भेद का अभाव हो जायगा । समर्थन—भेद में भेद न होने पर भी स्वभाव से ही भेद अपने में भेद-व्यवहार कर लेता है । जैसे सत्ता में सत्ता के न होने पर 'सत्ता अस्ति' ऐसा व्यवहार होता है । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो 'स्वस्मात् अभिन्नः स्वस्य भेदः' इस प्रतीति

४८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावस्वरूपः स्वयम्, भेदोऽन्यस्माच्च स्वस्य, तदाऽस्य भेदस्य स्वात्मप्रतियोगिक- त्वेन स्वाश्रयत्वेन चाङ्गीकारे स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः किं नाङ्गीक्रियते, विरोधाभावात् । स्वीक्रियेताप्येवं यदि तथा प्रतीतिर्व्यवहारो वा स्यादिति चेन्न । अस्त्यपि शब्दाभासादेस्तथा प्रतीतिराभासशब्दव्यवहारश्च । सत्यौ प्रतीतिव्यवहारौ स्वीकारकारणम् । न च तौ स्वात्मन एव स्वस्माद् भेद- विषयौ स्त इति चेन्न । स्वात्मा स्वस्यैवाधिकरणमवधिश्चेत्यपि तर्हि न सत्या प्रतीतिः सम्भवति, न वा व्यवहारः । तत्कथमित्थमङ्गीकुरुषे ? ननु न वयं स्वात्मा स्वाधिकरणं स्वावधिर्वेत्यभ्युपगच्छामः ; किन्तु धर्मा- न्तरे तत्प्रतियोगिके तदाधारे वा स्वीकृते यौ बुद्धिव्यवहारावुपपद्येते तावनवस्था- भयाद्धर्मान्तरमन्तरेणैव स्वभावाद्भेदः करोतीति ब्रूम इति चेत् । तर्ह्यन्यत्र यादृशी के अनुरोध से वही भेद स्व का प्रतियोगी और स्व का आश्रय ( अवधि ) भी हुआ । यदि घटादि से स्व का भेद स्वस्वरूप मान लिया जाय, तो भेद के स्वप्रतियोगिक और स्वाश्रय मानने से 'स्वस्मादपि स्वयं भिन्नः' ऐसी प्रतीति होने लगेगी, कारण इसमें कोई विरोध नहीं रहा । समर्थन--ऐसा स्वीकार करते, यदि स्व से स्व में भेदावगाही व्यवहार या बुद्धि होती । किन्तु वैसा व्यवहार या बुद्धि नहीं होती । अतः स्व से स्व में भेद नहीं मानते । खंडन--शब्दाभासरूप व्यवहार तथा शब्दाभास से स्व से स्व में भेदबुद्धि भी होती ही है । समर्थन--सत्य व्यवहार तथा सत्य बुद्धि उक्त स्वीकार के कारण मानेंगे । स्व से स्व में भेदावगाही सत्यबुद्धि या सत्य व्यवहार नहीं होता । अतः स्व से स्व में भेद सत्य सिद्ध नहीं होता । खण्डन--तब तो भेद स्वयं स्व का अधिकरण है और स्व का प्रतियोगी है ऐसी सत्य प्रतीति या सत्य व्यवहार नहीं होता । फिर आप भेद को स्व ( भेद ) का अधिकरण तथा प्रतियोगी कैसे मानते हैं ? समर्थन--'भेद स्व ( भेद ) का अधिकरण और प्रतियोगी है' ऐसा हम नहीं मानते । किन्तु यदि भेद में अन्य भेद को मान लें, तो उसमें जैसे भेदप्रतियोगिकत्व तथा भेदाश्रयत्व का व्यवहार या बुद्धि होती है, वैसे ही अनवस्था के भय से स्व में अन्य भेद को न मानकर भेद स्वभाव से ही भेद-व्यवहार करता है, ऐसा हम कहते हैं ।