लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
( ८४ ) लीलावती । हुआ ३५ । ३० । २० इनका भाग दिया तब १००/३५ १००/३० १००/२० ऐसा हुआ. यहां क्रमसे ५ । १० । २० का अपवर्तन दिया तब २०/७ १०/३ ५/१ ऐसा रूप हुआ, इनका समच्छेद करके योग किया तब २३५/२१ ऐसा हुआ, इसको अलग लिखा और जिनका योग किया है उन अङ्कों २०/७ १०/३ ५/१ को अलग २ मिश्र धन ९४ से गुणा किया तब १८८०/७ ९४०/३ ४७०/१ ऐसा रूप हुआ. इनमें योग २३५/२१ का अलग २ भाग लिया तब २४ । २८ । ४२ चौबीस, अट्ठाइस, ब्यालीस तीन खण्ड हुए. अब पंचराशिककी रीतिसे सब राशियोंका ब्याज निकाला अर्थात् १०० सौ निष्कका १ एक महीनेमें ५ पाँच निष्क तो २४ चौबीस निष्कका ७ सात महीनेमें क्या १ १०० २४/५ ७ फल को पलटा तब १ १०० २४/५ ७ ऐसा न्यास होने पर बहुत राशिके घात ८४० आठसौ चालीसमें थोड़ी राशिके घात १०० का भाग दिया तब लब्धि ब्याज ८ २/५ यह हुआ. इसी प्रकार यदि १०० सौका एक महीनेमें ३ निष्क मिलता है तो २८ अट्ठाईसका १० दश महीनेमें क्या १ १०० २८/३ १० फलको पलटा तब १ १०० २८/३ १० ऐसा न्यास होनेपर बहुत राशिक घात ८४० में थोडी राशिके घातका भाग दिया तब लब्धि हुआ ब्याज ८ २/५ वही इसी प्रकार यदि १०० सौका एक महीनेमें ४ चार निष्क तो ४२ बयालीस का ५ पांच महीनेमें क्या १ १०० ४२/४ ५ फलको पलटा तब १ १०० ४२/४ ५ ऐसा न्यास होने पर बहुत राशिके घात ८४० में थोडी राशिके घात १०० का भाग लिया लब्धि वही ८ २/५ हुआ. अथ मिश्रान्तरे करणसूत्रम्- अब और मिश्रगणितकी रीति लिखते हैं, आधे श्लोकमें- प्रक्षेपका मिश्रहता विभक्ताः प्रक्षेपयोगेन पृथक्फलानि ॥ अन्वयः-प्रक्षेपकाः मिश्रहताः प्रक्षेपयोगेन विभक्ताः पृथक् फलानि भवन्ति ॥ अर्थः-अनेक मनुष्य इकट्ठे होकर अपने २ हिस्सेसे व्यवहारमें जो धन लगाते हैं उसको प्रक्षेप कहते हैं और व्यवहार करनेके अनन्तर घटाया, नफा होकर जो इकट्ठा धन होता है उसको मिश्रधन कहते हैं. प्रक्षेपधनोंको अलग २ मिश्रधनसे गुणा करके सब जगे प्रक्षेप धनके जोडका भाग दे तब अलग २ फल मालूम हो जाता है ॥ अत्रोद्देशकः-इस विषयमें उदाहरण- पञ्चाशदेकसहिता गणकाष्टषष्टिः पञ्चोनिता नवतिगदिध- नानि येषाम् ॥ प्राप्ता विमिश्रितधनैस्त्रिशती त्रिभिस्तैर्वा- णिज्यतो वद विभज्य धनानि तेषाम् ॥ १ ॥
अन्वयः-हे गणक ! येषाम् एकसहिता पञ्चाशत् १ । अष्टषाष्टः २ । पञ्चोनिता नवतिः ३ । आदिधनानि सन्ति । तैः त्रिभिः विमिश्रितधनैः वाणिज्यतः त्रिशती प्राप्ता तर्हि तेषां धनानि विभज्य वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितचातुरीधुरीण ! जिनके ५१ इक्यावन, ६८ अडसठ, ८५ पिच्यासी यह प्रक्षेपधन हैं, उन तीनोंने इकट्ठा धन करके व्यवहार किया तब सब धन उनको ३०० तीनसौ मिला ता उन तीनोंको क्या २ मिला यह अलग २ करके कहो? ॥ १ ॥ न्यासः-प्रक्षेपकाः ५१ । ६८ । ८५ मिश्रधनम् ३०० जातानि धनानि ७५ । १०० । १२५ एतान्यादिधनैरुनानि लाभाः २४ । ३२ । ४० अथवा-मिश्रधनम् ३०० आदिधनैक्येन २०४ ऊनं सर्वलाभयोगः ९६ अस्मिन्प्रक्षेपगुणिते प्रक्षेपयोग २०४ भक्ते लाभाः २४ । ३२ । ४० । फैलाव-यहां तीन वणिक् हैं उनका अलग २ धन ( प्रक्षेपधन ) ५१ । ६८ । ८५ इकावन, अडसठ, पिच्यासी है और मिश्रधन ३०० तीनसौ है इसी मिश्रधनसे प्रक्षेप- धनोंको अलग २ गुणा किया तब १५३०० । २०४०० । २५५०० ऐसा होनेपर प्रक्षेपधनोंके योग २०४ दोसौ चारसे तीनों जगह भाग दिया तब ७५ । १०० । १२५ पिछहत्तर, सौ, एकसौ पच्चीस यह क्रमसे तीनों जगह गुणनफल हुआ इनमें क्रमसे तीनोंको व्यवहार करके ७५ । १०० । १२५ । मिला. इन तीनों राशियोंमें क्रमसे प्रक्षेप धन ५१ । ६८ । ८५ को घटाया तब क्रमसे २४ । ३२ । ४० लाभ हुआ ॥ अथवा मिश्रधन ३०० में प्रक्षेप (आदि) धनोंके योगको घटाया तब सबको मिलकर ९६ छियानवे लाभ हुआ, इसको प्रक्षेपधनोंसे अलग २ गुणा किया तब क्रमसे ४८९६ । ६५२८ । ८१६० हुआ. यहां तीनों जगह प्रक्षेप योग २०४ का भाग लिया तब तीनोंको क्रमसे २४ । ३२ । ४० लाभ हुआ. इन तीनोंको जोडा तो वही मिलकर तीनों ९६ छियानवे लाभ हुआ. वाप्यादिपूरणे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब फुहारोंके द्वारा हौज, वापी पूरा होनेकी रीति आधे श्लोकमें लिखते हैं- भजेच्छिदोंशै रथ तैर्विमिश्रै रूपं भजेत्स्यात्परिपूतिकालः ॥ २३ ॥
( ८६ ) लीलावती । अन्वयः–छिदः अंशैः विभजेत् । अथ तैः विमिश्रैः रूपं विभजेत् । तदा परिपू- र्तिकालः स्यात् ॥ २३ ॥ अर्थः–हरोंमें अंशोंका भाग दे, फिर हरोंमें भाग देनेसे जो लब्धि हुई है, उनका योग करके उस योगका एक १ में भाग दे तब भर जानेका समय लब्धि होता है ॥ २३ ॥ उदाहरणम्– ये निर्झरा दिनदिनार्द्धतृतीयषष्ठैः संपूरयन्ति हि पृथक्पृ- थगेव मुक्ताः ॥ वापीं यदा युगपदेव सखे विमुक्तास्ते केन वासरलवेन तदा वदाशु ॥ १ ॥ अन्वयः–हे सखे ! ये निर्झराः पृथक्पृथक् एव मुक्ता हि दिनदिनार्द्धतृतीयषष्ठैः वापीं संपूरयन्ति ते युगपत् एव विमुक्ताः तदा केन वासरलवेन वापीं पूरयंति इति आशु वद ? ॥ १ ॥ अर्थः–हे मित्र ! तीन झरने ( फुहारे ) हैं वह अलग २ छोडनेसे वापी ( हौज ) को एक तो एक दिनमें भरता है, दूसरा आधे दिनमें भरता है, तीसरा दिनके तीसरे भागमें, भरता है, चौथा दिनके छठे भागमें भरता है, यदि उनको एक साथ छोड़ दें तो वह चारों फुहारे मिलकर वापीको ( हौजकों ) कितनी देरमें भरेंगे सो जल्दी कहो ? ॥ १ ॥ न्यासः– १/१ १/२ १/३ १/६ लब्धो वापीपरिपूृतिकालो दिनांशाः १/१२ फैलाव–यहां चारों फुहारे दिनके १/१ १/२ १/३ १/६ इन भागोंमें पूरा करते हैं. ऊपर कही हुई रीतियोंके अनुसार अंशोंका हरोंमें भाग दिया तब क्रमसे १/१ २/१ ३/१ ६/१ इनका योग किया तो १२/१ ऐसा रूप हुआ, इसका रूप ( एक १ ) में भाग लिया तब १/१२ एकके नीचे बारह हर लब्धि हुआ, यही उत्तर है. अर्थात् सब फुहारे मिलके एक दिनके बारहवें अंशमें ( एक घंटेमें ) हौजको भर देंगे ॥ अथ क्रयविक्रये करणसूत्रं वृत्तम्– अब वस्तु मोल लेना अथवा बेचना इसकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं– पण्यैः स्वमूल्यानि भजेत्स्वभागैर्हत्वा तदैक्येन भजेच्च तानि ॥ भागांश्च मिश्रेण धनेन हत्वा मौल्यानि पण्यानि यथाक्रमं स्युः ॥ २४ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
क्रयावक्रयव्यवहारः। (८७) अन्वयः-स्वमूल्यानि स्वभागैः हत्वा पण्यैः विभजेत् तानि भागान् च मिश्रधनेन हत्वा तदैक्येन विभजेत् तदा यथाक्रमं मौल्यानि पण्यानि च स्युः ॥ २४ ॥ अर्थः-अपने २ मूल्योंको अपने २ भागोंसे गुणा करे और उन गुणा किये हुए अंकोंमें जो वस्तु बेची जाय उसकी तोलका भाग ले, भाग लेनेसे जो राशि आवे उनको दानमें अलग २ लिखे; फिर एक १ जगहका योग करे, दूसरी जगहके अंकोंको विना योग किये लिखा रहने दे.फिर जिनका योग नहीं किया है, उनको अलग २ मिश्रधनसे गुणा करे और जोडे हुए अङ्कोंसे भाग ले तो उन वस्तुओंका अलग २ मूल्य मालूम होगा. फिर भागोंको मिश्रधनसे गुणा करके उसी योगका भाग दे तब अलग २ तोल मालूम होगी ॥ २४ ॥ उद्देशकः- उदाहरणः- सार्द्धं तण्डुलमानकत्रयमहो द्रम्मेण मानाष्टकं मुद्गानाञ्च यदि त्रयोदशमिता एता वणिक्काकिणीः ॥ आदायार्पय तण्डुलां शयुगलं मुद्रैकभागान्वितं क्षिप्रं क्षिप्रभुजो व्रजेमहि यतः सार्थोऽग्रतो यास्यति ॥ १ ॥ अन्वयः-अहो वणिक् ! यदि सार्द्धं तण्डुलमानकत्रयम् मुद्गानां च मानाष्टकं द्रम्मेण लभ्यते तर्हि एताः त्रयोदश मिताः काकिणीः आदाय मुद्रैकभागान्वितं तण्डुलांशयुगलं क्षिप्रम् अर्पय वयं हि क्षिप्रभुजः व्रजेमहि यतः सार्थः अग्रतः यास्यति ॥ १ ॥ अर्थः-हे वैश्यवर्य्य ! साढे तीन ३ १/२ मान चावल और मूंग ८ आठ मान १ द्रम्मकी आती है, तो यह १३ तेरह काकिणी लो और दोनों वस्तु दो, परन्तु मूगका एक भाग हो और चावल दो २ भाग हों. ( जल्दी दो क्योंकि हम जल्दी भोजन बना खाकर चले जायँ नहीं तो संगके आदमी आगे चले जायँगे. ) तो कहो उस वणिकने मूंग कितनी दी और चावल कितने दिये और उनका अलग २ मोल क्या हुआ ? ॥ १ ॥ न्यासः-पण्ये ७/२, ८; मौल्ये १/१, १/१; स्वभागौ २/१, १/१; मिश्र- धनम् १३/६४ अत्र स्वमूल्ये स्वभागगुणिते पण्याभ्यां भक्ते जाते ४/७, १/८ भागौ च २/१, १/१ मिश्रधनेन १३/६४ संगुण्य भक्ते जाते तण्डुलमुद्गमूल्ये १/६, १/१२८ तथा तण्डुलमुद्गमाने भागौ
$\frac{७}{९}$ $\frac{७}{१८}$ अत्र तण्डुलमूल्ये पणौ २ काकिण्यौ २ वराटकाः १३ $\frac{१}{३}$ मुद्गमूल्ये काकिण्यौ २ वराटकाः ३ $\frac{२}{३}$ ॥ फैलाव-अपने २ मूल्यों $\frac{१}{१}$ $\frac{१}{१}$ को अपने २ भागों $\frac{२}{१}$ $\frac{१}{१}$ से गुणा किया अर्थात् चावलोंके मूल्य $\frac{१}{१}$ को चावलोंके भाग $\frac{२}{१}$ से गुणा किया तब $\frac{२}{१}$ ऐसा रूप हुआ और मूंगके मूल्य $\frac{१}{१}$ को मूंगके भागसे $\frac{१}{१}$ गुणा किया तब $\frac{१}{१}$ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार अपने २ मूल्यको अपने २ भागोंसे गुणा करनेपर $\frac{२}{१}$ $\frac{१}{१}$ ऐसा रूप हुआ. अब इनमें अपनी २ तोलका भाग दिया अर्थात् $\frac{२}{१}$ में चाव- लोंकी तोल $\frac{३}{१}$ का भाग दिया तब $\frac{२}{३}$ ऐसा रूप हुआ और $\frac{१}{१}$ में मूंगकी तोल $\frac{२}{१}$ का भाग दिया तब $\frac{१}{२}$ ऐसा रूप हुआ, इस प्रकार दोनों स्थानोंमें भाग देनेसे $\frac{२}{३}$ $\frac{१}{२}$ ऐसा रूप हुआ. इनको दो जगह लिखा फिर एक जगह लिखा फिर एक जगह दोनों $\frac{२}{३}$ $\frac{१}{२}$ राशियोंका योग कर लिया और एक जगह वैसा ही रहने दिया. जहां योग किया वहां $\frac{७}{६}$ ऐसा रूप हुआ, बिना योग किये हुए दोनों राशियों $\frac{२}{३}$ $\frac{१}{२}$ को मिश्रधन $\frac{१३}{८}$ से गुणा किया तब $\frac{५२}{२४८}$ $\frac{१६}{१२१}$ ऐसा रूप हुआ. इन दोनों राशियोंमें पहले जो योग $\frac{७}{६}$ कर आये हैं, उसका भाग लिया तो क्रमसे लब्धि हुआ $\frac{७}{९}$ $\frac{७}{१८}$ यह क्रमसे चावल और मूंगका द्रम्मरूप मोल हुआ, अर्थात् २ दो भाग चावलका मोल दो २ पण २ काकिणी १३ तेरह वराटक और वराटकका तृतीयांश $\frac{१}{३}$ हुआ और एक भाग मूंगका मूल्य २ दो काकिणी ६ छ वराटक और दो वराटकका तीसरा भाग $\frac{२}{३}$ हुआ, फिर उपरोक्त रीति के अनुसार चावल और मूंगके भागों $\frac{२}{१}$ $\frac{१}{१}$ को मिश्र धन $\frac{१३}{६४}$ से गुणा किया तो हुए $\frac{२६}{६४}$ $\frac{१३}{६४}$ इनमें ऊपर जो योग $\frac{७}{६}$ किया था उसका भाग लिया तब क्रमसे चावल और मूंग तोलमें $\frac{७}{१२}$ $\frac{७}{२४}$ मान मिलेगा ॥
उदाहरणम्- दूसरा उदाहरण- कर्पूरस्य वरस्य निष्कयुगलेनै कं पलं प्राप्यते वैश्यानन्दन चन्दनस्य च पलं द्रम्माष्टभागेन चेत् ॥ अष्टांशेन तथाऽगुरोः पलदलं निष्केण मे देहि तान् भागैरेककषोडशाष्टकमितैर्धूपं चिकीर्षाम्यहम् ॥ २ ॥ अन्वयः- हे वैश्यानन्दन ! चेत् वरस्य कर्पूरस्य एकं पलं निष्कयुगलेन प्राप्यते । चन्दनस्य च पलं द्रम्माष्टभागेन प्राप्यते । तथा अष्टांशेन अगुरोः पलदलं प्राप्यते
क्रयविक्रयव्यवहारः । (८९) तर्हि तान् एककषोडशाष्टकमितैः भागैः मे निष्केण देहि । यतः अहं धूप चिकीर्षामि ॥ २ ॥ अर्थः-हे अपनी माताको आनन्द देनेवाले वैश्यकुमार ! यदि सुन्दर कर्पूर एक पल २ दो निष्कका मिलता है और चन्दन एक पल द्रम्मके आठवें भाग १/८ का मिलता है और अगर १/२ आधा पल द्रम्मके आठवें भागमें मिलता है तो इन सब वस्तुओंको अर्थात् कपूर १ एक भाग चन्दनके १६ सोलह भाग अगरके ८ आठ भाग एक निष्कसे मुझको दो क्योंकि मुझको धूप करनेकी इच्छा है ॥ २ ॥ (यहां बताओ कि, तीनों चीजें तोलमें कितनी २ मिलेंगी और उनका अलग २ क्या मोल होगा ? ) न्यासः-पण्यानि १/१ १/१ १/२ मूल्यानि ३२/१ १/८ १/८ भागाः १/१ १६/१ ८/१ मिश्रधनम् द्रम्माः १६ लब्धानि कर्पूरादीनां मूल्यानि १४ २/६ ६/६ ६/६ तथैव तेषां पण्यानि ७/१६ ७/१६ ३/२ ॥ फैलाव- कर्पूर. चन्दन. अगर. मिश्रधन मोल ३२/१ भाग १/१ मोल १/८ भाग १६/१ मोल १/८ भाग ८/१ १६ पल १/१ पल १/१ पल १/२ यहाँ अपने २ मूल्यको अपने २ भागोंसे उपरोक्त रीति के अनुसार गुणा किया अर्थात् कर्पूरके मूल्य ३२/१ का अपने भाग १/१ स गुणा किया तब ३२/१ ऐसा रूप हुआ. फिर चन्दनके मूल्य १/८ को अपने भाग १६/१ स गुणा किया तब २/१ ऐसा रूप हुआ और अगरके मूल्य १/८ का अपने भाग ८/१ से गुणा किया तब ८/६४ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार तीनोंके मूल्योंको अपने २ भागोंसे गुणा करनेसे ऐसा ३२/१ २/१ १/१ रूप हुआ. इनमें अपनी २ तोलका भाग लिया अर्थात् ३२/१ में अपनी तोल १/१ का भाग लिया तब ३२/१ ऐसा रूप हुआ. २/१ में अपनी तोल १/१ का भाग लिया तब २/१ ऐसा स्वरूप हुआ. १/१ में अपनी तोल १/२ का भाग देनेसे २/१ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार तीनों राशिमें अपनी २ तोलका भाग देनेसे ३२/१ २/१ २/१ ऐसा स्वरूप हुआ, इनको दो जगह अलग २ लिखा, एक जगह तीनों राशिका योग कर लिया और एक जगह वैसा ही रहने दिया. जहाँ योग किया वहा ३६/१ ऐसा रूप हुआ, फिर बिना योग करी हुई जो राशि १ ३२/१ २/१ २/१ ह उनको मिश्रधन १६/१ द्रम्मसे अलग २ गुणा किया, तब ५१२/१ ३२/१ ३२/१ ऐसा रूप हुआ, इनमें ऊपर जो योग ३६/१ कर आये हैं उसका अलग २ भाग लिया.
( ९० ) लीलावती । तब लब्धिका १२८/१ ६/१ ६/१ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार कर्पूर चन्दन, अगर इनका क्रमसे १४ ३/१ ६/१ ६/१ इतना द्रम्म मूल्य हुआ, फिर कर्पूर चन्दन, अगर इन तीनोंके भागों १/१ १६/१ ५/१ को मिश्रधन १६/१ से गुणा किया तब १६/१ २५६/१ १२८/१ ऐसा रूप हुआ. इनमें ऊपर जो योग किया था ३६/१ उसका भाग दिया तब लब्धिका ५/१ ६४/१ ९ ऐसा रूप हुआ इस प्रकार कर्पूर चन्दन अगर इनकी क्रमसे ५/१ ७ ३/१ ३ ५/१ इतना पल तोल हुआ यही मिलेगा. रत्नमिश्रीकरणसूत्रं वृत्तम्- रत्नोंके विषयकी मिश्र गणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- नरघ्नदानोनितरत्नशेषैरिष्टे हते स्युः खलु मूल्यसंख्याः ॥ शेषैर्हते शेषवधे पृथकस्थैरभिन्नमूल्यान्यथवा भवन्ति॥ २५॥ अन्वयः-खलु नरघ्नदानोनितरत्नशेषैः इष्टे हते मूल्यसंख्या स्युः । अथवा शेषवधे पृथक्स्थैः शेषैः हते अभिन्नमूल्यानि भवन्ति ॥ २५ ॥ अर्थः- (जहां मनुष्योंका अपने पदार्थोंके परस्पर अलटे पलटे समान धन कहा हो) तहां मनुष्योंकी संख्यासे गुणी हुई दानकी संख्याके घटानेसे जितने २ रत्न शेष रहें उनका अलग २ इष्ट अङ्कमें भाग ले तब जो जो लब्धि होगी वही निश्चय करके प्रति २ रत्नका मोल होगा. अथवा-सब जो शेष रहें उन सबको परस्पर गुणा करके जो राशि हो उसमें शेष अङ्कोंका अलग २ भाग दे तब प्रति २ रत्न का मोल लब्धि मिलेगा ॥ २५ ॥ अत्रोद्देशकः-इस विषयका उदाहरण- माणिक्याष्टकमिन्द्रनीलदशकं मुक्ताफलानां शतं सद्रत्नानि च पञ्च रत्नवणिजां येषां चतुर्णां धनम् ॥ संगस्नेहवशेन ते निजधनाद्दत्त्वैकमेकं मिथो जातास्तुल्यधनाः पृथग्वद सखे तद्रत्नमूल्यानि मे ॥१॥ अन्वयः- हे सखे ! येषां रत्नवणिजां माणिक्याष्टकम् इन्द्रनीलदशकम् मुक्ताफलानां शत सद्रत्नाणि च पञ्च चतुर्णां धनम् आसीत् ते सङ्गस्नेहवशेन निजधनात् एकम् एकम् मिथः दत्त्वा तुल्यधनाः जाताः तर्हि रत्नमूल्यानि मे पृथक् वद ॥ १ ॥
रत्नमिश्रकव्यवहारः । (९१) अर्थः-हे मित्र ! जिन रत्नोंके व्यापार करनेवाले चार पुरुषोंका क्रमसे ८ आठ माणिक १० दश इन्द्रनीलमणि १०० सौ मोती ५ पांच सुन्दर हीरे यह धन था. उन्होंने मार्गमें स्नेह होनेसे अपने २ धनमेंसे आपसमें एक २ रत्न दिया तब उन सबके पास तुल्य मूल्यका धन हो गया तौ कहो माणिक आदि प्रति रत्नका क्या मोल होगा ? ॥ १ ॥ न्यासः--मा० ८ नी० १० मु० १०० व० ५ । दानम् १ नराः ४ । नरगुणितदानेन ४रत्नसंख्यासूनितासु शेषाणि मा० ४। नी० ६। मु० ९६ । व० १ एतैरिष्टराशौ भक्ते रत्नमूल्यानि स्यु रिति । तानि च यथाकथंचिदिष्टे कल्पिते भिन्नानि ॥ अत्रेष्टं स्वधिया कल्प्यते तथाऽत्रापीष्टं कल्पितम् ९६ ॥ अतो जातानि मूल्यानि २४ । १६ । १ । ९६ समधनम् २३३ । अथवा शेषाणां घाते २३०४ पृथक् शेषैर्भक्ते जातान्यभिन्नानि ५७६। ३८४ । २४ । २३०४ । जनानां चतुर्णां तुल्यधनम् ५५९२ तेषामैते द्रम्माः सम्भाव्यन्ते ॥ फैलाव-यहाँ व्यापारियोंने एक १ रत्न देकर पलटा किया वही एक रत्नदान है और मनुष्य चार ४ हैं, इस कारण मनुष्योंकी संख्या ४ से दानकी संख्या १ को गुणा किया तब ४ चार हुए. इनको सबके रत्नोंमेंसे घटाया तो बचे मा० नी० मु० $ \hspace{19em}४\hspace{1.5em}६\hspace{1.5em}९६$ हीरा इनका अलग २ इष्ट ९६ छियानवे मानकर उसमें भाग दिया तब क्रमसे एक $ \hspace{0.5em}१$ २ माणिक आदिका मोल हुआ. मा० नी० मु० ही० इस प्रकार आपसमें एक २ $ \hspace{11em}२४\hspace{1.5em}१६\hspace{1.5em}१\hspace{1.5em}९६$ रत्न पलट लेनेसे सबका धन बराबर हो जाता है, क्योंकि माणिकवालेके पास पाँच ५ माणिक एक १ नीलमणि, १ एक मुक्ता १ एक हीरा है. ऊपर १ माणिकआदि सबका मोल बता आये हैं, उसी हिसाबसे जोडा. अर्थात् ५ पाँच माणिकका मोल १२० एकसौ बीस द्रम्म हुए और एक नीलमणिका मोल १६ सोलह द्रम्म हुआ और एक १ मुक्ताका १ एक द्रम्म हुआ. १ एक हीरेके ९६ छियानवे द्रम्म हुए, सबको जोडा तब २३३ दोसौ तैंतीस द्रम्म हुये. इसी प्रकार दूसरेके पास एक १ माणिक सात ७ नीलमणि एक १ मुक्ता एक १ हीरा है, तीसरेके पास एक १
( ९२ ) लीलावती । माणिक एक १ नीलमणि सतानवे ९७ मुक्ता एक १ हीरा है. चौथेके पास एक १ माणिक एक १ नीलमणि एक १ मोती दो २ हीरा है सबका उपरोक्त मूल्यके अनु- सार जोडनेसे समधन २३३ दोसौ तैंतीस होता है जैसा कि आगे यंत्रमें लिखा है
व्यौपारी. | पहला | दूसरा | तीसरा | चौथा माणिक. | ५ | १ | १ | १ नीलमणि. | १ | ७ | १ | १ मुक्ताफल. | १ | १ | ९७ | १ हीरा. | १ | १ | १ | २
| | पहला | दूसरा | तीसरा | चौथा | माणिक. एकका मू० २४ | संख्या. मूल्य. ५ १२० | संख्या. मूल्य. १ २४ | संख्या. मूल्य. १ २४ | संख्या. मूल्य. १ २४ | नीलमणि. एकका मू० १६ | सं० मू० १ १६ | सं० मू० ७ ११२ | सं० मू० १ १६ | सं० मू० १ १६ | मुक्ताफल. एकका मू० १ | सं० मू० १ १ | सं० मू० १ १ | सं० मू० ९७ ९७ | सं० मू० १ १ | हीरा. एकका मू० ९६ | सं० मू० ९६ | सं० मू० १ ९६ | सं० मू० १ ९६ | सं० मू० २ १९२ | सबका जोड. | २३३ | २३३ | २३३ | २३३ |
इस उदाहरणमें इष्ट कल्पना करना अपनी बुद्धिके अनुसार लिखा है. उसकी रीति यह है कि, रत्नोंमें मनुष्य संख्यासे गुणा करी हुई दोकी संख्या घटाकर जो रत्न शेष रहें उनमेंसे पहली दो राशियोंमें किसी अंकका परिवर्तन लगे तो दे ले. परिवर्तन देनेसे जो अंक आवे उनको परस्पर घात कर ले. घात करनेसे जो अंक आवें उनको जिस अंकका परिवर्तन दिया हो उससे गुणा करे. फिर जो अंक हो उसका एक राशि शोषित रत्नोंमेंकी दोनोंको किसी अंकका परिवर्तन लग सके तो दे, परिवर्तन देनेसे जो अंक आवे उनका परस्पर घात करे और जिस अंकका परिवर्तन दिया हो, उससे गुणा करे, इसी प्रकार जितनी राशि हों, सबसे इसी
रीतिसे क्रिया करे. यदि किसीका परिवर्तन न लग सकता हो तो दोनों राशियोंका ही परस्पर घात कर ले और उसीको एक राशि मान ले जैसा कि इसी उदा- हरणोंमें मनुष्योंकी संख्या ४ से गुणित रत्नोंकी संख्या ४ को रत्नोंमें घटानेसे ४, ६, १, ९६ यह राशियें होती हैं. यहां पहली दो २ राशियें ४, ६ में दो २ का परि- वर्तन दिया तब २, ३ ऐसा स्वरूप हुआ. इन दोनों अंकोंका परस्पर घात किया तब ६ छ हुआ, इसको परिवर्तन अंक २ दोसे गुणा किया तब १२ बारह हुए. अब १२ को एक राशि माना और एकराशि शेषत रत्नोंमें १ क ली, तब १२, १ एक ऐसा स्वरूप हुआ. यहां किसीका परिवर्तन नहीं लग सकता. इस कारण दोनों राशियोंके घात १२ को ही एक राशि माना और एक शेषत रत्नोंमेंकी ९६ ली. तब १२, ९६ ऐसा स्वरूप हुआ. यहां १२ बारहका परिवर्तन दिया तब १, ८ ऐसा स्वरूप हुआ. यहां दोनों राशियोंका घात ८ आठ हुआ, इसको परिवर्तक अङ्क १२ से गुणा किया तब ९६ छियानवे हुआ. अब वोही शेषत राशि नहीं रही इस कारण यही ९६ इष्ट है इसी पर उपरोक्त क्रिया करनेसे उत्तर मिलेगा ॥ अथवा-शेष अङ्कों ४ । ६ । १ । ९६ का घात करके उसको इष्ट माना २३०४ इसमें अलग २ शेषोंका भाग लिया तब भी प्रतिरत्नका मूल्य मिला. ५७६ । ३८४। २४ । २३०४ । इस रीतिसे सबका समान धन अलग २ पाँच हजार पांचसौ बानवे ५५९२ होता है ॥ अथ सुवर्णगणिते करणसूत्रं वृत्तम्- अब सुवर्णके विषयमें मिश्रगणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं. सुवर्णवर्णाहतियोगराशौ स्वर्णैक्यभक्ते कनकैक्यवर्णः ॥ वर्णो भवेच्छोधितहेमभक्ते वर्णोद्धृते शोधितहेमसंख्या ॥ २६ ॥ अन्वयः-सुवर्णवर्णाहतियोगराशौ स्वर्णैक्यभक्ते कनकैक्यवर्णः स्यात्। शोधितहेमभक्ते वर्णः स्यात् । वर्णोद्धृते शोधितहेमसंख्या भवेत् ॥ २६ ॥ अर्थः-सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण ( प्रमाण जितनेका हो उस धनसे ) गुणा करे. फिर गुणा करनेसे जो गुणनफल हो उनको जोड ले उसमें सब सुवर्णोंकी तोलके योगका भाग दे तब जो लब्धि हो, वह सब मिले हुए सुवर्णका एक भाव होता है और यदि उसी वर्ण और तोलके घातयोगमें शोधे हुए सुवर्णका भाग दे तब पहले वर्णकी संख्या मालूम होती है और यदि वर्णका भाग ले तब शोधे हुए (जिसको शोधा है उसकी ) सुवर्णकी तोल मालूम होती है ॥
(९४) लीलावती। उदाहरणानि- विश्वार्कुरुद्रदशवर्णसुवर्णमाषा दिग्वेदलोचनयुगप्रमिताः क्रमेण ॥ आवर्णितेषु वद तेषु सुवर्णवर्णं तूर्णं सुवर्णगणि- तज्ञ वणिग्भवेत्कः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सुवर्णगणितज्ञ ! वणिक् ! विश्वार्कुरुद्रदशवर्णसुवर्णमाषाः क्रमेण दिग्वेदलोचनयुगप्रमिताः संति तेषु आवर्तितेषु सुवर्णवर्णं तूर्णं वदकः भवेत् ? ॥१॥ अर्थः-हे सुवर्णके गणितमें प्रवीण वैश्य ! १३ तेरह १२ बारह ११ ग्यारह दश १० के वर्ण ( भाव ) के सुवर्णके क्रमसे १० दश ४ चार दो २ चार ४ मासे हैं अर्थात् तेरहके भावका सुवर्ण दश १० मासे हैं, बारह १२ के भावका चार ४ मासे हैं ग्यारह ११ के भावका २ दो मासे हैं दश १० के भावका चार ४ मासे हैं इन सब सुवर्णोंको मिलाकर गला लिया तब क्या भावका होगा ? यह शीघ्र कहो ॥ १ ॥ ते शोधने यदि च विंशतिरुक्तमाषाः स्युः षोडशाशु वद वर्ण- मितिस्तदा का॥ चेच्छोधितं भवति षोडशवर्णहेम ते विंशतिः कति भवन्ति तदा तु माषाः ॥२ ॥ अन्वयः-ते विंशतिः उक्तमाषाः शोधने यदि षोडश स्युः तदा का वर्णमितिः स्यात् इति आशु वद । चेत् ते विंशतिः शोधितं षोडशवर्णहेम भवति तदा कति माषाः भवन्ति ? ॥ २ ॥ अर्थः-वही पहले कहे हुए बीस २० मासे यदि शोधनेसे सोलह १६ मासे रह गया तो सुवर्ण किस वर्ण ( भाव ) का होगा ? यह शीघ्र कहो और यदि वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेसे सोलह १६ के भावका हो जाय तो कितने मांसे रहेगा ? ॥ २ ॥ न्यासः-- १३/१० १२/४ ११/२ १०/४ जाता आवर्तिते सुवर्णवर्णमितिः १२ ॥ एत एव यदि शोधिताः सन्तः षोडश माषाः भवन्ति तदा वर्णः १५ । यदि तदेव शोधितं षोडशवर्णं स्वर्णं भवति तदा पञ्चदश १५ माषा भवन्ति ॥
फैलाव-यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण (भाव) से गुणा किया तब क्रमसे गुणनफल १३०, ४८, २२, ४० यह हुआ, इनका योग (जोड) किया तब दोसौ चालीस २४० हुआ, इसमें सुवर्णके तोलका योग २० का भाग लिया तब १२ बारह लब्धि हुआ यही सब सुवर्णको गलाकर सबको एक भाव होगा. और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानस १६ सोलह मासे रहा. वहाँ ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घात योग २४० में शोधनेसे जो सुवर्णके तोल १६ रही है उसका भाग दिया तब १५ लब्धि हुआ यही शुद्ध हुए सुवर्णका भाव होगा ॥ और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेस १६सोलहके भावका हो जाता है वहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घातयोग २४० म शुद्ध करनेपर जो वर्ण (भाव) हुआ. १६ उसका भाग लिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ. यही शुद्ध सुवर्णकी तोल रहेगी ॥ अथ वर्णज्ञानाय करणसूत्र वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है उनमेंसे जिस वर्णको नहीं जानते हैं उसके जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नाद्युतिजातवर्णात्सुवर्णतद्वर्ण वधैक्यहीनात् ॥ अज्ञातवर्णाभ्रिजसंख्ययाप्तमज्ञातवर्णस्य भवेत्प्रमाणम् ॥२७॥ अन्वयः-द्युतिजातवर्णात् स्वर्णैक्यनिघ्नात् सुवर्णतद्वर्णवधैक्यहीनात् अज्ञातवर्णा- भिजसंख्यया यत् आप्तं तत् अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं भवेत् ॥ २७ ॥ अथः-अनेक प्रकारके सुवर्ण मिलानेसे जो वर्ण (भाव) होता है वह युतिजात वर्ण कहा जाता है, उस युतिजात वर्णको सोनेकी तोलके योग (जोड) से गुणा करके उसमें सोनेकी तोल और वर्ग इनके घात योगको घटा दे जो शेष रहे उसमें उस सुवर्णकी तोलका भाग दे जिसका वर्ण नहीं जानते हैं उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उसी वर्णकी संख्या है. जिसकी संख्या नहीं जानते हैं ॥ २७ ॥ उदाहरणम्- दशेशवर्णा वसुनेत्रमाषा अज्ञातवर्णस्य षडेतदैक्ये ॥ जातं सखे द्वादशकं सुवर्णमज्ञातवर्णस्य वद प्रमाणम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! वसुनेत्रमाषाः दशेशवर्णाः सन्ति । अज्ञातवर्णस्य षट् माषाः सन्ति । एतदैक्ये द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं वद ? ॥ १ ॥
( ९६ ) लीलावती । अर्थः-हे मित्र ! आठ ८ और दो २ मासे सुवर्ण दश १० और ग्यारह ११ के वर्ण ( भाव ) का है और जिसका भाव नहीं जानते वह सुवर्ण ६ छ मासे है और सबको मिलाकर गलानेसे एक भाव १२ बारह होता है तो जिसका वर्ण ( भाव ) नहीं जानते हैं उसका क्या भाव होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- $\begin{matrix} १० & ११ & ० ८ & २ & ६ \end{matrix}$ लब्धमज्ञातवर्णमानम् १५ ॥ फैलाव-यहां युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ ) बारह १२ हैं, उसको सुवर्णकी तोलके योग ( जोड ) १६ सोलह १६ से गुणा किया तब १९२ एक सौ बानवे हुए. इसमें १९२ सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्णसे गुणा करके ८० । २२ जो योग ( जोड ) १०२ हुआ उसको घटाया तब नव्वे ९० बचे इसमें अज्ञात वर्ण सुवर्णकी तोल ६ का भाग दिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ, यही उस सुवर्णका वर्ण ( भाव) है. जिसका वर्ण नहीं जानते थे. क्योंकि पहले कही हुई रीति के अनुसार अब सुवर्णकी तोलोंको अपने २ वर्णसे गुणा किया तब क्रमसे ८०, २२, ९० यह गुणनफल हुए. इनका योग किया तब १९२ एकसौ बानवे हुए, इसमें सुवर्णकी तोल ८, २, ६ के जोड. १६ का भाग देनेसे वही १२ बारह लब्धि युतिजातवर्ण मालूम हो जाता है ॥ सुवर्णज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है; उनमेंसे जिसकी तोल नहीं जानते हैं उसकी तोल जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नो युतिजातवर्णः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च ॥ अहेमवर्णाङ्घ्रिजयोगवर्णविश्लेषभक्तोऽविदिताङ्घ्रिजं स्यात्॥२८॥ अन्वयः-युतिजातवर्णः स्वर्णैक्यनिघ्नः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च अहेमवर्णाङ्घ्रि जयोगवर्णविश्लेषभक्तः अविदिताङ्घ्रिजं स्यात् ॥ २८ ॥ अर्थः-युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ है ) को सब सुवर्णकी योगसे गुणा करे. फिर जो गुणनफल हो उसमें जिन सुवर्णोंका वर्ण मालूम है उन सुवर्णोंकी तोलको अपने २ भावसे गुणा करके जो योग हो उसको घटा दे जो शेष रहे उसमें जिस सुवर्णका तोल नहीं मालूम है उसका वर्ण और युतिजातवर्ण इनका अन्तर करनेसे जो शेष रहे, उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उस तोलकी संख्या है, जिस तोलको नहीं जानते थे ॥ २८ ॥
,सुवर्णगणितमिश्रप्रकारः। (९७) उदाहरणम्- उदाहरण कहते हैं.- दशेन्द्रवर्णा गुणचन्द्रमाषाः किंचित्तथा षोडशकस्य तेषाम्॥ जातं युतौ द्वादशकं सुवर्णं कतीह ते षोडशवर्णमाषाः ॥ १ ॥ अन्वयः-गुणचंद्रमाषाः दशेंद्रवर्णाः सन्ति । तथा षोडशकस्य किञ्चित् सन्ति । तेषां युतौ द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि इह ते षोडशवर्णमाषाः कति सन्ति? ॥ १॥ अर्थः-सुवर्ण ३ तीन और १ एक मासे क्रमसे दश १० और १४ चौदहके वर्णका है और जिसकी तोल नहीं जानते वह सोलह वर्णका है और सबको मिलाकर गलानेसे बारह १२ के भावका सुवर्ण होता है तो कहो वह सोलह १६ के भावका सुवर्ण कितना है ? ॥ १ ॥ न्यासः- १०/३ १४/१ १६/० लब्धं माषमानम् १ ॥ फैलाव-यहाँ युतिजातवर्ण १२ बारह है, उसको तोलके योग ४ चारसे गुणा किया तब ४८ अडतालीस हुआ. इसमें जिनकी तोल मालूम है उन सुवर्णोंको अपने २ वर्णसे गुणा करके ३०, १४, योग किया तब ४४ चौवालीस हुआ, इसको घटाया तब ४ चार शेष रहा. इसमें जिस सुवर्णकी तोल नहीं जानते हैं उसका १६ और युतिजातवर्ण १२ का अन्तर करनेसे जो शेष ४ रहा उसका भाग दिया तब १ एक लब्धि हुआ. यही उस सुवर्णकी तोल है. जिसका वर्ण जानकर भी तोल नहीं जानते थे. क्योंकि, ऐसा होनेपर सुवर्णकी तोलोंको अपने वर्णसे गुणा किया तब ३०, १४, १६ ऐसा हुआ. इसके योग ६० में तोलके योग | ३ | पांच ५ का भाग लिया तब लब्धि १२ बारह वही युति जात वर्ण होता है॥ | १ | | १ | | ५ | सुवर्णज्ञानायाऽन्यकरणसूत्रं वृत्तम्- जहाँ किसी भी वर्णकी तोल बिना जाने दोनोंकी तोल जाननेकी रीति और लिखते हैं एक श्लोकमें. साध्येनोनोऽनल्पवर्णो विधेयः साध्यो वर्णः स्वल्पवर्णोनितश्च॥ इष्टक्षुण्णे शेषके स्वर्णमाने स्यातां स्वल्पानल्पयोर्वर्णयोस्ते २९॥ अन्वयः-अनल्पवर्णः साध्येन ऊनः विधेयः । साध्यः वर्णः च स्वल्पवर्णोनितः विधेयः । ततः स्वल्पानल्पयोः वर्णयोः शेषके इष्टक्षुण्णे स्वर्णमाने स्याताम् ॥ २९ ॥ ७
( ९८ ) लीलावती । अर्थ:-योगजवर्ण ( युतिजातवर्ण ) को बड़ी संख्यावाले वर्णमें घटावै और युतिजातवर्णमें थोड़ी संख्यावाले वर्णको घटावै, फिर जो दोनोंमें शेष रहें उनको अलग २ कोई इष्ट कल्पना कर उससे गुण दे तब क्रमसे सुवर्णकी तोल मालूम होती है ॥ २९ ॥ उदाहरणम्- हाटकगुटिके षोडशदशवर्णे तद्युतौ सखे जातम् ॥ द्वादशवर्णसुवर्णं ब्रूहि तयोः स्वर्णमाने मे ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! षोडशदशवर्णे हाटकगुटिके स्तः तद्युतौ द्वादशवर्णं जातम् तर्हि तयोः स्वर्णमाने मे ब्रूहि ! ॥ १ ॥ अर्थ:-हे मित्र ! १६ सोलह और १० दशके वर्ण ( भाव ) की सुवर्णकी दो गोली हैं और उनको मिलाकर गलानेसे बारह १२ के वर्णका सुवर्ण होता है तो कहो वह दोनों सुवर्णकी गोली कितनी २ तोलकी हैं ? ॥ १ ॥ न्यासः- १६/० १०/० साध्यो वर्णः १२ कल्पितमिष्टं १ लब्धे सुवर्णमाने १६/२ १०/४ अथवा द्विकेनेष्टेन १६/४ १०/८ अर्द्धगुणितेन वा १६/१ १०/२ फैलाव-यहाँ साध्य ( युतिजातवर्ण. ) बारह १२ को बड़ी संख्यावाले वर्ण १६ सोलहमें घटाया तब ३ चार शेष रहा और युतिजातवर्ण १२ में थोड़ी संख्यावाले वर्ण १० को घटाया तब २ शेष रहे. इन दोनों शेष राशियों ४, २ को कल्पना किये हुये इष्ट १ एकसे गुणा किया तब क्रमसे थोड़ी और बहुत संख्यावाले वर्णके सुवर्णके तोल ४, २ हुई. अर्थात् दशवर्ण वालेकी तोल ४ चार सोलह १६ वर्णवालेकी तोल २ दो हुई. क्योंकि ऐसा होनेपर सुवर्णके वर्ण और तोलके घातयोग ७२ बहत्तरमें तोलके योग ६छ का भाग देने से लब्धि १२ बारह हुई वही युतिजातवर्ण मिलता है. इसी प्रकार जब २ दोको इष्ट माना तब सोलह १६ वर्णवालेकी तोल चार ४और दशवर्णवालेकी आठ ८होती है और १/२ आधेको इष्ट माना तब सोलह वर्णवालेकी तोल १ एक और दश १० वर्णवालेकी तोल २ दो होती है इस प्रकार जैसा इष्ट मानोगे वैसी ही तोल मिलेगी ॥
छन्दश्चितिगणितप्रकारः । ( ९९ ) अथ छन्दश्चित्यादौ करणसूत्रं श्लोकत्रयम्- अब छन्दका प्रकार इत्यादि जाननेकी रीति तीन श्लोकमें लिखते हैं. एकाद्येकोत्तरा अङ्का व्यस्ता भाज्याः क्रमस्थितैः ॥ परः पूर्वेण संगुण्यस्तत्परस्तेन तेन च ॥ १ ॥ ३० ॥ एकद्वित्र्यादिभेदाः स्युरिदं साधारणं स्मृतम् ॥ छन्दश्चित्युत्तरे छन्दस्युपयोगोऽस्य तद्विदाम् ॥ २ ॥३१॥ मूषावहनभेदादौ खण्डमेरौ च शिल्पके ॥ वैद्यके रसभेदीये तन्नोक्तं विस्तृतेर्भयात् ॥ ३ ॥ ३२ ॥ अन्वयः-एकाद्येकोत्तराः व्यस्ताः अङ्काः क्रमस्थितैः भाज्याः परः पूर्वेण संगुण्यः तत्परः तेन तेन इति अङ्कान्तं क्रिया कार्या ॥ १ ॥ एवम् एकद्वित्र्यादिभेदा स्युः । इदं साधारणं स्मृतम् । छन्दश्चित्युत्तरे छन्दसि तद्विदाम् अस्य उपयोगो भवति ॥२॥ मूषावहनभेदादौ खण्डमेरौ शिल्पके रसभेदीये वैद्यके च अस्य उपयोगो भवति तत् अत्र विस्तृतेः भयात् न उक्तम् ॥ ३ ॥ अर्थः-जितने अङ्क हों, उनको एक २ बढाकर उलटा लिखे और उनके नीचे एक २ बढाकर एक आदिक्रमसे अङ्क लिखे यह दो पंक्ति हुई, इसमें ऊपरकी पंक्तिको भाज्य और नीचेकी पंक्तिको भाजक माने. अर्थात् आदि अङ्कके नीचे एकको हर जाने इस प्रकार क्रमसे एक २ के नीचे एक २ को हर माने और सबको जुदा २ लिखे. सब अङ्कोंमें पहले अंकको सिद्ध अंक जानें, इस सिद्ध अंकसे अगले भाज्य अंकसे गुणा करे फिर उसी भाज्यके नीचेके अंकका भाग दे, फिर जो लब्धि हो उसको सिद्ध अंक जानें, इस सिद्ध अंकको आगेकें भाज्य अंकसे गुणा करे और उसके नीचेके भाजकका भाग दे इस प्रकार जहाँ तक अंक हों तहाँ तक क्रिया करे. इस प्रकार क्रमसे एक, दो, तीन आदिक भेद होते हैं. अथवा-जितने भाज्य भाजक अङ्क हों, सबको पहलेके अंकसे आगेको गुणा कर ले, फिर जो अंक गुणनसे निष्पन्न हों उसमें नीचे लिखे हुए भाजक अंकोंका अलग २ भाग देनेसे जो लब्धि आवे वह भी क्रमसे एक, दो, तीन आदिक भेद होंगे. यह रीति यहाँ साधारण रीतिसे लिखी है ॥ छन्दोंका प्रस्तार जाननेके विषयमें छन्दःशास्त्रमें छन्दःशास्त्र जाननेवालोंको इसका उपयोग होता है (काम पडता है) और द्वारोंकी वायुके भेद जाननेमें छन्दःशास्त्रान्तर्गत खण्डमेरूमें तथा शिल्पशास्त्रमें, रसभेदविषयक वैद्यकमें भी इसका उपयोग होता है यहां ज्यादा विस्तार होगा इस कारण नहीं लिखा है ॥१॥२॥३॥
( १०० ) लीलावती । तत्र छन्दश्चित्युत्तरे किंचिदुदाहरणम्- तहां पहले प्रस्तारके विषयमें कुछ उदाहरण दिखलाते हैं- प्रस्तारे मित्र गायत्र्याः स्युः पादे व्यक्तयः कति ॥ एकादिगुरुवश्चाशु कथ्यतां तत्पृथक्पृथक् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! गायत्र्याः पादे प्रस्तारे कृते सति कति व्यक्तयः स्युः । एका दिगुरवः च कति व्यक्तयः स्युः तत् पृथक्पृथक् आशु कथ्यताम् ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! गायत्री छन्दके चौथे ( छ अक्षरके ) पादमें प्रस्तार करनेसे कितनी व्यक्ति ( भेद ) होंगी, एक, दो, तीन इत्यादि गुरुवाली कितनी व्यक्तियाँ होंगी ? सो अलग २ शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ यथोक्तकरणेन लब्धा एकगुरुव्यक्तयः ६ द्विगुरवः १५ त्रिगुरवः २० । चतुर्गुरवः १५ । पञ्चगुरवः ६ । षड्गुरवः १ । तथैकः सर्वलघुः १ एवमासामैक्यम् पाद- व्यक्तिमितिः ६४ ॥ एवं चतुश्चरणाक्षरसंख्यकानङ्गान्यु- थोक्तम् विन्यस्य एकादिगुरुभेदानानीयैतान् सैकान् एकीकृत्य जाता गायत्रीवृत्तव्यक्तिसंख्या १६७७७२१६ एवमुक्ताद्युत्कृतिपर्यन्तं छन्दसां व्यक्तिमितिर्ज्ञातव्या ॥ फैलाव-यहाँ पूर्वोक्त रीतिके अनुसार छ ६ अक्षरका गायत्रीका चरण है, इस कारण छ से लेकर एक पर्य्यंत उलटे अंक लिखकर उसके नीचे क्रमसे एक, दो इत्यादि अंक ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ लिखे, फिर यहां उपरोक्त रीतिके अनुसार कोई सिद्ध अंक तो है ही नहीं. इस कारण पहले ६/१ में हरका भाग देकर लब्धि ६ छ हुआ, इसको सिद्ध अंक माना, इस सिद्ध अंकसे आगेके अंकमें ५/२ जो भाज्यः पांच ५ है उससे सिद्ध अंकको गुणा किया तब ३० तीस हुआ फिर भाजक २ दोस भाग लिया तब १५ पन्द्रह दूसरा अंक हुआ फिर इस सिद्ध अंकसे आगेके अंक ४/३ के भाज्यसे इस सिद्ध अंक १५ को गुणा किया तब ६० साठ हुआ, इसमें भाजक ३ का भाग लिया तब २० बीस तीसरा सिद्ध अङ्क हुआ. इसको इसके आगेके अङ्क ३/४ के भाज्य ३ से गुणा किया तब ६० साठ हुआ, इसमें भाजक ४ चारका भाग लिया तब लब्धि १५ पन्द्रह, चौथा सिद्ध अङ्क हुआ, फिर इसके आगेके
मिश्रकव्यवहारः । (१०१) अङ्क $\frac{२}{५}$ के भाज्य २ से गुणा किया तब ३० तीस हुआ, इसमें भाजक ५ पांचका भाग लिया तब ६ ६ लब्धि पाँचवाँ सिद्ध अङ्क हुआ. फिर इसके आगेके अङ्क $\frac{१}{६}$ के भाज्यसे गुणा किया तब ६ ६ हुआ. भाजकका इसमें भाग दिया तब १ एक छठा सिद्ध अङ्क लब्धि हुआ. इस प्रकार सिद्ध अङ्क (एक आदि गुरुके भेद) यह ६ । १५ । २० । १५ । ६ । १ हुए, इनमें सर्व लघुका भेदमें एक और मिला दिया तब गायत्रीके पादमें प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद हुए ॥ अथवा $\frac{\xi}{१}\ \frac{\varphi}{२}\ \frac{\gamma}{३}\ \frac{३}{\gamma}\ \frac{२}{\varphi}\ \frac{१}{\xi}$ यहाँ ऊपरके भाज्य सब अंकोंको पहले २ से आगे २ को गुणा किया तब अपने ऊपरके गुणित अंकमें अपने २ नीचेके अङ्कोंको भी पहले २ आगेके अङ्कको गुणा करके नीचे रखता जाय, फिर नीचेके अङ्कका भाग दे अर्थात् पहला अङ्क तो छ $\frac{\xi}{१}$ है इससे दूसरे अङ्क ५ को गुणा किया और नीचेकी पंक्तिमें पहले १ से दूसरे २ को गुणा किया तब $\frac{३०}{२}$ ऐसा हुआ. फिर तीसरे आगेके अङ्क चारको गुणा किया तब तब तीसरा अङ्क $\frac{१२०}{\xi}$ हुआ इस प्रकार अन्ततक किया तब $\frac{\xi}{१}\ \frac{३०}{२}\ \frac{१२०}{\xi}\ \frac{३६०}{२४}\ \frac{७२०}{१२०}\ \frac{७२०}{७२०}$ ऐसा हुआ फिर नीचेके अंकका ऊपरकेमें सब जगह भाग दिया तब क्रमसे वही ६।१५।२०।१५।६।१ आदि गुरुके भेद हुए एक सहित सर्व लघुको जोडा तब वही सब इकट्ठे ६४ चौंसठ भेद हुए. इसी प्रकार जब चारों पादोंको मिलाके भेद निकाले तब सम्पूर्ण गायत्री छन्दके १६७७७२१६ इतने भेद हुए. इसी प्रकार और छन्दोंके प्रस्तारमें भी जानना ॥ खण्डमेरुके विषयमें जो काम इस रीतिका पडता है सो दिखाते हैं.
${c} | ० |
\hline | १ | १ |
\hline | १ | २ | १ |
\hline | १ | ३ | ३ | १ |
\hline | १ | ४ | ६ | ४ | १ |
\hline | १ | ५ | १० | १० | ५ | १ |
\hline | १ | ६ | १५ | २० | १५ | ६ | १ | $
( १०२ ) लीलावती । इस खण्डमेरुमें छन्दःशास्त्रोक्त क्रिया करनेसे अन्तमें जो अङ्क आते हैं वह एक दो तीन इत्यादि गुरु वर्णोंके क्रमसे भेद होते हैं, इस गणितके करनेसे यह मालूम होता है कि, यह छन्दःशास्त्रोक्त रीतिसे निकाले हुए भेदहीका है या नहीं ॥ प्रस्तार बनानेकी यह रीति है कि, जितने अक्षरोंका प्रस्तार करना हो, पहले उतने ही गुरु लिखे, फिर आदिके गुरुके नीचे लघु लिखे. जैसे- $\begin{matrix} SSSSSS ISSSSS \end{matrix}$ फिर अगाडीके जैसे ऊपर हों वैसा ही लिखे जैसा कि $\begin{matrix} SSSSSS I SSSSS \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है और बाकी जो आगे रहे वह जैसे ऊपर लिखे हैं, वैसे ही नीचे भी लिखे और पहले कमती रहजाय तो गुरु अक्षरोंसे पूरा करे. जैसा $\begin{matrix} I S S S S S I S S S S \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है आगे सब ऊपरके अनुसार लिखे हैं और यहां आदि (पहले) में एक कमती रहा इस- कारण उसके गुरुसे पूरा किया तब ऐसा I S S S S S हुआ इसी प्रकार जबतक सब लघु हो जाँय तबतक क्रिया करे. S I S S S S इस प्रकार गायत्रीके चौथे पादके अक्षरोंका प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद होते हैं. उदाहरणं शिल्पे- शिल्पके विषयका उदाहरण- एकद्वित्र्यादिमूषावहनमितिमहो ब्रूहि मे भूमिभर्तु- र्हर्म्ये रम्येऽष्टमूषे चतुरविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले ॥ एकद्वित्र्यादियुक्ता मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तै- रेकस्मिन्षड्रसैः स्युर्गणक कति वद व्यञ्जने व्यक्तिभेदाः ॥१॥ अन्वयः- अहो गणक ! चतुरंविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले अष्टमूषे रम्ये भूमिभर्तुः हर्म्ये एकद्वित्र्यादिमूषावहनमिति मे ब्रूहि । तथा एकास्मिन् व्यञ्जने मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तैः षड्रसैः एकद्वित्र्यादियुक्ताः व्यक्तिभेदाः कति स्युः इति वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! चतुरपुरुषके बनाये हुए रमणीय चौडे दालानोंसे सुशोभित आठ ८ खिडकीवाले अतिसुन्दर राजाके महलमें एक एक, दो दो, तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ :छ, सात सात, आठ आठ, खिडकी अलग २ खोलनेसे वायुके कितने भेद होंगे ? सो कहो तथा एक ही रसोईमें मीठा, कडुवा, कसीला, वकसा, खारा, चरपरा इन छ रसोंसे एक एक, दो, दो,
मिश्रकव्यवहारः । ( १०३ ) तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ छ, रसोंके अलग २ स्वादके भोजन बनाये जाँय तो कितनी तरहके व्यञ्जन बनेंगे ? सो कहो ॥ १ ॥ मूषान्यासः--८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ लब्धा एकद्वित्र्यादिमूषावहनसंख्याः । ८ २८ ५६ ७० ५६ २८ ८ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ एवमष्टमूषे राजगृहे मूषावहनभेदाः २५५ । अथ द्वितीयोदाहरणम्- न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ - लब्धा एकादिरससंयोगेन पृथग्व्यक्तयः । ६ १५ २० १५ ६ १ १ २ ३ ४ ५ ६ एतासामैक्यम् ६३ । इति मिश्रकव्यवहारः । फैलाव-पहले उदाहरणमें आठ खिडकियोंके वायुके भेद निकालने हैं इस कारण आठसे लेकर अङ्क एकस्थान बढाकर व्यत्यय ( उलटे ) लिखें- ८/१ ७/२ ६/३ ५/४ ४/५ ३/६ २/७ १/८ फिर उसके नीचे क्रमसे एक, दो इत्यादि अङ्क लिखें, फिर यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार कोई अङ्क है नहीं, जिसको पहली पहल आठसे गुणा किया जाँय इस कारण आठहीमें नीचेके लिखे हुए एकका भाग दिया तब आठ ८ ही लब्धि हुए. फिर इस अङ्कको एक जगह अलग लिखा फिर दूसरा अङ्क ७ सात है उससे आठ ८ को गुणा किया तब ५६ हुए, इसमें उसी ७ सातके नचे लिखे हुए २ दोका भाग लिया तब २८ अट्ठाईस लब्धि हुए. इसको भी पहले आठके धोरे लिखा फिर इन २८ को ऊपरकी पंक्तिमें तीसरा अङ्क जो ६ छ है, उससे गुणा किया और छके नीचे अङ्क ३ तीनका भाग लिया तब ५६ छप्पन्न मिला, इसको पहले लिखे हुए अट्ठाईसके आगे लिखा इसी प्रकार अन्ततक विधि करी तो अलग २ एक एक खिडकीके ८ आठ भेद दोदोके २८ अट्ठाईस, तीन तीनके ५६, चार चारके ७० सत्तर, पांच पांचके ५६,