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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

मिश्रकव्यवहारः । (१०१) अङ्क $\frac{२}{५}$ के भाज्य २ से गुणा किया तब ३० तीस हुआ, इसमें भाजक ५ पांचका भाग लिया तब ६ ६ लब्धि पाँचवाँ सिद्ध अङ्क हुआ. फिर इसके आगेके अङ्क $\frac{१}{६}$ के भाज्यसे गुणा किया तब ६ ६ हुआ. भाजकका इसमें भाग दिया तब १ एक छठा सिद्ध अङ्क लब्धि हुआ. इस प्रकार सिद्ध अङ्क (एक आदि गुरुके भेद) यह ६ । १५ । २० । १५ । ६ । १ हुए, इनमें सर्व लघुका भेदमें एक और मिला दिया तब गायत्रीके पादमें प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद हुए ॥ अथवा $\frac{\xi}{१}\ \frac{\varphi}{२}\ \frac{\gamma}{३}\ \frac{३}{\gamma}\ \frac{२}{\varphi}\ \frac{१}{\xi}$ यहाँ ऊपरके भाज्य सब अंकोंको पहले २ से आगे २ को गुणा किया तब अपने ऊपरके गुणित अंकमें अपने २ नीचेके अङ्कोंको भी पहले २ आगेके अङ्कको गुणा करके नीचे रखता जाय, फिर नीचेके अङ्कका भाग दे अर्थात् पहला अङ्क तो छ $\frac{\xi}{१}$ है इससे दूसरे अङ्क ५ को गुणा किया और नीचेकी पंक्तिमें पहले १ से दूसरे २ को गुणा किया तब $\frac{३०}{२}$ ऐसा हुआ. फिर तीसरे आगेके अङ्क चारको गुणा किया तब तब तीसरा अङ्क $\frac{१२०}{\xi}$ हुआ इस प्रकार अन्ततक किया तब $\frac{\xi}{१}\ \frac{३०}{२}\ \frac{१२०}{\xi}\ \frac{३६०}{२४}\ \frac{७२०}{१२०}\ \frac{७२०}{७२०}$ ऐसा हुआ फिर नीचेके अंकका ऊपरकेमें सब जगह भाग दिया तब क्रमसे वही ६।१५।२०।१५।६।१ आदि गुरुके भेद हुए एक सहित सर्व लघुको जोडा तब वही सब इकट्ठे ६४ चौंसठ भेद हुए. इसी प्रकार जब चारों पादोंको मिलाके भेद निकाले तब सम्पूर्ण गायत्री छन्दके १६७७७२१६ इतने भेद हुए. इसी प्रकार और छन्दोंके प्रस्तारमें भी जानना ॥ खण्डमेरुके विषयमें जो काम इस रीतिका पडता है सो दिखाते हैं.

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( १०२ ) लीलावती । इस खण्डमेरुमें छन्दःशास्त्रोक्त क्रिया करनेसे अन्तमें जो अङ्क आते हैं वह एक दो तीन इत्यादि गुरु वर्णोंके क्रमसे भेद होते हैं, इस गणितके करनेसे यह मालूम होता है कि, यह छन्दःशास्त्रोक्त रीतिसे निकाले हुए भेदहीका है या नहीं ॥ प्रस्तार बनानेकी यह रीति है कि, जितने अक्षरोंका प्रस्तार करना हो, पहले उतने ही गुरु लिखे, फिर आदिके गुरुके नीचे लघु लिखे. जैसे- $\begin{matrix} SSSSSS ISSSSS \end{matrix}$ फिर अगाडीके जैसे ऊपर हों वैसा ही लिखे जैसा कि $\begin{matrix} SSSSSS I SSSSS \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है और बाकी जो आगे रहे वह जैसे ऊपर लिखे हैं, वैसे ही नीचे भी लिखे और पहले कमती रहजाय तो गुरु अक्षरोंसे पूरा करे. जैसा $\begin{matrix} I S S S S S I S S S S \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है आगे सब ऊपरके अनुसार लिखे हैं और यहां आदि (पहले) में एक कमती रहा इस- कारण उसके गुरुसे पूरा किया तब ऐसा I S S S S S हुआ इसी प्रकार जबतक सब लघु हो जाँय तबतक क्रिया करे. S I S S S S इस प्रकार गायत्रीके चौथे पादके अक्षरोंका प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद होते हैं. उदाहरणं शिल्पे- शिल्पके विषयका उदाहरण- एकद्वित्र्यादिमूषावहनमितिमहो ब्रूहि मे भूमिभर्तु- र्हर्म्ये रम्येऽष्टमूषे चतुरविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले ॥ एकद्वित्र्यादियुक्ता मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तै- रेकस्मिन्षड्रसैः स्युर्गणक कति वद व्यञ्जने व्यक्तिभेदाः ॥१॥ अन्वयः- अहो गणक ! चतुरंविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले अष्टमूषे रम्ये भूमिभर्तुः हर्म्ये एकद्वित्र्यादिमूषावहनमिति मे ब्रूहि । तथा एकास्मिन् व्यञ्जने मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तैः षड्रसैः एकद्वित्र्यादियुक्ताः व्यक्तिभेदाः कति स्युः इति वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! चतुरपुरुषके बनाये हुए रमणीय चौडे दालानोंसे सुशोभित आठ ८ खिडकीवाले अतिसुन्दर राजाके महलमें एक एक, दो दो, तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ :छ, सात सात, आठ आठ, खिडकी अलग २ खोलनेसे वायुके कितने भेद होंगे ? सो कहो तथा एक ही रसोईमें मीठा, कडुवा, कसीला, वकसा, खारा, चरपरा इन छ रसोंसे एक एक, दो, दो,

मिश्रकव्यवहारः । ( १०३ ) तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ छ, रसोंके अलग २ स्वादके भोजन बनाये जाँय तो कितनी तरहके व्यञ्जन बनेंगे ? सो कहो ॥ १ ॥ मूषान्यासः--८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ लब्धा एकद्वित्र्यादिमूषावहनसंख्याः । ८ २८ ५६ ७० ५६ २८ ८ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ एवमष्टमूषे राजगृहे मूषावहनभेदाः २५५ । अथ द्वितीयोदाहरणम्- न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ - लब्धा एकादिरससंयोगेन पृथग्व्यक्तयः । ६ १५ २० १५ ६ १ १ २ ३ ४ ५ ६ एतासामैक्यम् ६३ । इति मिश्रकव्यवहारः । फैलाव-पहले उदाहरणमें आठ खिडकियोंके वायुके भेद निकालने हैं इस कारण आठसे लेकर अङ्क एकस्थान बढाकर व्यत्यय ( उलटे ) लिखें- ८/१ ७/२ ६/३ ५/४ ४/५ ३/६ २/७ १/८ फिर उसके नीचे क्रमसे एक, दो इत्यादि अङ्क लिखें, फिर यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार कोई अङ्क है नहीं, जिसको पहली पहल आठसे गुणा किया जाँय इस कारण आठहीमें नीचेके लिखे हुए एकका भाग दिया तब आठ ८ ही लब्धि हुए. फिर इस अङ्कको एक जगह अलग लिखा फिर दूसरा अङ्क ७ सात है उससे आठ ८ को गुणा किया तब ५६ हुए, इसमें उसी ७ सातके नचे लिखे हुए २ दोका भाग लिया तब २८ अट्ठाईस लब्धि हुए. इसको भी पहले आठके धोरे लिखा फिर इन २८ को ऊपरकी पंक्तिमें तीसरा अङ्क जो ६ छ है, उससे गुणा किया और छके नीचे अङ्क ३ तीनका भाग लिया तब ५६ छप्पन्न मिला, इसको पहले लिखे हुए अट्ठाईसके आगे लिखा इसी प्रकार अन्ततक विधि करी तो अलग २ एक एक खिडकीके ८ आठ भेद दोदोके २८ अट्ठाईस, तीन तीनके ५६, चार चारके ७० सत्तर, पांच पांचके ५६,

( १०४ ) लीलावती । छ ६के २८, सात सातके ८, आठ आठका १ एक भेद होंगे सबको जोडा तब सब भेद मिलकर २५५ दोसौ पचपन हुए. दूसरा उदाहरण-६ छ रसके भेद जानते हैं इस कारण छहसे लेकर एक २ स्थान बढाकर उलटे अंक लिखे और उनके नीचे एक दो इत्यादि क्रमसे लिखे- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ फिर उसी रीतिसे पहले ऊपरकी पंक्तिके पहले अंक छ ६ में उसीके नीचे लिखे हुए एकका भाग लिया तब छ लब्धि हुए, इनको एक स्थानमें अलग लिखा फिर छके आगे जो ऊपरकी पंक्तिमें ५ पांचका अंक है उससे छको गुणा किया और पांचके नीचे जो दो २ का अंक है उसका भाग लिया तब पन्द्रह १५ लब्धि हुए. इनको पहले अलग लिखे हुए छ ६ के आगे लिखा. फिर ऊपरकी पंक्तिमें तीसरा अङ्क जो चार ४ है उससे १५को गुणा किया और चार ४ के नीचेका जो तीनका अङ्क है उसका भाग लिया तब २० बीस लब्धि हुए इनको पहले अलग लिखे हुए १५ पन्द्रहके धोरे लिखा. इस प्रकार जहाँतक अङ्क हैं वहाँतक क्रिया करनेसे क्रमसे एक एक रसके छ ६, दो दोके १५ पन्द्रह, तीन तीनके २० बीस, चार चारके १५ पन्द्रह, पांच पांचके छ ६,छ के १ एक होंगे सबको जोडा तब मिलकर सब ६३ तिरसठ हुए. इति मिश्रकव्यवहारः । अथ श्रेढीव्यवहारः । अब श्रेढीव्यवहारका गणित लिखते हैं, इसका नाम श्रेढी इस कारण है कि, इसका सीढी (सोपान) की तरह गणित है. तत्र संकलितैक्ये करणसूत्रं वृत्तम्-- तहाँ पहले जोडे हुए अङ्कोंके जोडनेकी रीति (जैसे दश जगह विजातीय २ अङ्कोंको जोडा है, तहाँ उन दशों जगहका जो जोड है उसको शीघ्र जोडनेकी रीति) लिखते हैं. एक श्लोकमें- सैकपदघ्नपदार्द्धमथैकाद्यंकयुतिः किल संकलिताख्या ॥ सा द्वियुतेन पदेन विनिघ्नी स्यान्त्रिहृता खलु संकलितैक्यम् ३३॥ अन्वयः-किल सैकपदघ्नपदार्द्धं सङ्कलिताख्या एकाद्यङ्कयुतिः भवति । अथ सा द्वियुतेन पदेन विनिघ्नी त्रिहृता खलु सङ्कलितैक्यं स्यात् ॥ ६३ ॥ अर्थः-(जो अन्तका अङ्क होता है उसको पद कहते हैं) पदमें एक जोडे फिर पदके आधेसे गुणा करे तब जो लब्धि होगी वह निश्चय करके एक आदि अंकोंका

जोडा होगा, वही लब्धिमें दो युक्त पदसे गुणा करके तीनका भाग दे तब निश्चय करके जोडे हुए अंकोंका जोड हो जाता है ॥ ३३ ॥ उदाहरणम्- एकादीनां नवान्तानां पृथक्संकलितानि मे ॥ तेषां संकलितैक्यानि प्रचक्ष्व गणक द्रुतम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे गणक! एकादीनां नवान्तानां सङ्कलितानि मे पृथक् वद । तेषां सङ्कलि- तैक्यानि च पृथक् द्रुतं प्रचक्ष्व ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे ज्योतिषिक ! एकसे लेकर नौ ९ तक अलग २ लिखे हुए अंकोंका जोड मुझसे कहो और उन्हीं एकसे लेकर नौ ९ तक अंकोंके जोडका जोड (अर्थात् एकतकका जोड, दोतकका जोड, तीनतकका जोड, चारतकका जोड, पाँचतकका जोड, छतकका जोड, साततकका जोड, आठतकका जोड, नौ ९ तकका जोड इन सब जोडोंका इकट्ठा अलग २ जोड) कहो ? ॥१॥ न्यासः-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ संकलितानि १ ३ ६ १० १५ २१ २८ ३६ ४५ एषामैक्यानि १ ४ १० २० ३५ ५६ ८४ १२० १६५ फैलाव-यहाँ अन्तका अंक नौ ९ है इस कारण उसका नाम पद है. पद ९ नौमें एक १ जोडा तब १० दश हुए, इनको पदके आधे ९/२ से गुणा किया तब ९०/२ ऐसा हुआ. यहाँ अंशमें हरका भाग दिया तब ४५ पैंतालीस लब्धि हुए, यही एकसे लेकर नौतक अंकोंका जोड हुआ. इसी प्रकार एकतकका, दोतकका, तीनत- कका, चारतकका, पांचतकका, छतकका, साततकका, आठतकका, नौतकका, जोड क्रमसे १ ३ ६ १० १५ २१ २८ ३६ ४५ हुआ. फिर इन जोडोंका भी अलग २ एक राशितकका, दोतकका, तीनतकका, चारतकका, पांचतकका, छतकका साततकका, आठतकका नौतकका जोड जानना है, इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार लब्धि (जोड) ४५ को दो २ से युक्त पद ९ नौसे अर्थात् ग्यारह ११ से गुणा किया तब ४९५ इतने हुए, इनमें तीन ३ का भाग लिया तब एकसौ पैंसठ १६५ हुए, यह नौतकके जोडोंका जोड हुआ. इसी रीतिके करनेसे पहले जोडकी राशियोंमें एकतकका दोतकका, तीनतकका, चारतकका, पांचतकका, छतकका, साततकका, आठतकका, नौतकका क्रमसे १ ४ १० २० ३५ ५६ ८४ १२० १६५ जोड हुआ. इसी प्रकार जितने अङ्क हों सबक' संकलन मालूम हो सकता है ॥

( १०६ ) लीलावती । कृत्यादियोगे करणसूत्रं वृत्तम्- एक आदि क्रमसे अंकोंके वर्गोंको तथा घन आदिको जोडनेकी सरल रीति एक श्लोकमें- द्विघ्नपदं कुयुतं त्रिविभक्तं सङ्कलितेन हतं कृतियोगः ॥ सङ्कलितस्य कृतेः सममेकाद्ये कघनै क्यमुदीरितमाद्यैः ॥ ३४ ॥ अन्वयः-द्विघ्नपदं कुयुतं त्रिविभक्तं संकलितेन हतं कृतियोगः स्यात् । सङ्कलितस्य कृतेः समम् आद्यैः एकाद्यङ्कघनै क्यम् उदीरितम् ॥ ३४ ॥ अर्थः-पदको दूना कर एक जोडनेसे जो अंक हो उसमें तीनका भाग देनेसे जो अङ्क मिले उससे पदतकके संकलितको गुणा करे तब एक आदि अङ्कोंके घनोंका जोड होगा ॥ ३४ ॥ उदाहरणम्- तेषामेव च वर्गैक्यं घनैक्यं च वद् द्रुतम् ॥ कृतिसंकलनामार्गे नाकुला यदि ते मतिः ॥ १॥ अन्वयः-तेषाम् एव वर्गैक्यं घनैक्यं च द्रुतं वद? यदि कृतिसंकलनामार्गे ते मतिः आकुला न अस्ति ॥ १ ॥ अर्थः- तिनहीं एकसे लेकर नौतक अंकोंके वर्गके जोडको तथा घनोंके जोडको शीघ्र कहो ? यदि तुम्हारी बुद्धि जोडनेमें व्याकुल न हो तो ॥ १ ॥ न्यासः- १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ वर्गैक्यम् १ ५ १४ ३० ५५ ९१ १४० २०४ २८५ घनैक्यम् १, ९, ३६, १००, २२५, ४४१, ७८४, १२९६, २०२५ फैलाव-इनका वर्ग तो परिकर्म्माष्टकमें कही हुई रीतिसे जानना फिर ऊपर कही हुई रीति के अनुसार वर्गोंका जोड मिलेगा, जैसा कि, यहां नौतकको वर्गका जोड जानना है. इस कारण उपरोक्त रीति के अनुसार पद नौको दूना किया तब अठारह हुए, इसमें एक जोड दिया तब १९ उन्नीस हुए, इनमें ३ तीनका भाग लिया तब १९/३ हुए इससे पदके सङ्कलित ४५ को गुणा किया तब २८५ दोसौ पचासी हुए यही एकसे लेकर ९ नौतकके अङ्कोंके वर्गका जोड हुआ ॥ अब उन्हीं अङ्कोंका घनयोग करना है, इस कारण ऊपर कहीहुई रीति के अनुसार पद ९ नौके संकलन ४५ पैंतालीसका वर्ग किया तब २०२५ दोहजार पचीस हुए CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

श्रेढीव्यवहारः । (१०७) यही एकसे ९ नौतक अंकोंके घनोंका योग है. इसी प्रकार जितने चाहे उतने अंकोंका वर्गैक्य घनैक्य जान सकता है ॥ यथोत्तरचयेऽन्त्यादिधनज्ञानाय करणसूत्रम्- जहाँ पहले दिन कुछ धन दे, फिर प्रतिदिन कुछ बढ़ती दे तहाँ मध्यधन, अन्त्यधन, सर्व धन (अर्थात् जितने दिनों तक दिया उसके मध्यमें कितना दिया और अन्तके दिन कितना दिया, तथा सब दिनोंमें कितना धन दिया.) इसके जान- नेके वास्ते रीति एक श्लोकमें लिखते हैं ॥ व्येकपदघ्नचयो मुखयुक्स्यादन्त्यधनं मुखयुग्दलितं तत् ॥ मध्यधनं पदसंगुणितं तत्सर्वधनं गणितञ्च तदुक्तम् ॥ ३५ ॥ अन्वयः-व्येकपदघ्नचयः मुखयुक् अंत्यधनं स्यात्। तत् सुखयुक् दलितं मध्य धनं स्यात् । तत् पदसंगुणितं सर्वधनं स्यात् । तत् गणितं च उक्तम् ॥ ३५ ॥ अर्थः-(जो धन बढाकर दिया जाता है उसको चय कहते हैं.) एक करके हीन पदसे चय धनको गुणा करे, फिर उसमें पहले दिनके धन (मुख) को जोड दे तब अन्तके दिनका दिया हुआ धन मालूम हो जाता है, उस मालूम हुए अन्तके धनमें मुख (आदिदिन) का धन जोड दे. फिर आधा कर ले तब जो रहेगा वह मध्यके दिनका दिया हुआ धन होगा और इसी मध्यधनको पदसे गुणा कर दे. तब जो कुछ धन सब दिनोंमें दिया है सो मालूम होता है. इस रीतिको गणितके जाननेवाले गणितशब्दसे व्यवहार करते हैं ॥ ३५ ॥ उदाहरणम्-- आद्ये दिने द्रम्मचतुष्टयं यो दत्त्वा द्विजेभ्योऽनुदिनं प्रवृत्तः ॥ दातुं सखे पञ्चचयेन पक्षे द्रम्मा वद द्राक्कति तेन दत्ताः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यः आद्ये दिने द्विजेभ्यः द्रम्मचतुष्टयं दत्त्वा अनुदिनम् पञ्चच- येन दातुम् प्रवृत्तः तेन पक्षे कति द्रम्माः दत्ताः इति द्राक् वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जो पुरुष पहले दिन ब्राह्मणोंको ४ चार द्रम्म देकर प्रतिदिन पांच पांच बढाकर देनेको प्रवृत्त हुआ तो उस पुरुषने पक्षभर (१५ दिन) में कितने द्रम्म दिये ? यह शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः--आ ० ४। च ० ५। ग ० १५. मध्यधनम् ३९

( १०८ ) लीलावती । अन्त्यधनम् ७४ सर्वधनम् ५८५ फैलाव-जो पहले दिन दिया जाता है उसको आदिधन कहते हैं और जिस धनकी बढतीसे दिया जाय वह चय कहाता है और जितने दिन दिया जाता है वह दिन गच्छ कहाते हैं. इस प्रकार इस उदाहरणमें आदि धन ४ चार है क्योंकि पहले दिन ४ चार दिया है और पांच चय है क्योंकि पांचकी वृद्धिसे दिया है और पन्द्रह १५ गच्छ है. क्योंकि पन्द्रह १५ दिन दिया है. अब यहां मध्यधन जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार पद १५ पन्द्रहमें एक १ कम किया तब १४ चौदह रहे. इनसे चय ५ पांचको गुणा किया तब ७० सत्तर हुए. इनमें मुख ४ चारको जोडा तब ७४ चौहत्तर हुए, यह अंत्यधन हुआ अर्थात् अन्तके पन्द्रहवें दिन ७४ चौहत्तर दिया, फिर इसी अंत्यधन ७४में मुख ४ जोडा तब ७८ अठहत्तर हुए आधा किया तब ३९ उनतालीस हुए यह मध्य धन हुआ. इस मध्य धन ३९ को पद १५ पन्द्रहसे गुणा किय तब ५८५ पांचसौ पचासी हुए. यह सर्वधन हुआ. अर्थात् पन्द्रह दिनमें सब ५८५ इतना दिया इस प्रकार मध्यधन ३९ अन्त्यधन ७४ सर्वधन ५८५ हुआ. उदाहरणान्तरम्- दूसरा उदाहरण- आदिः सप्त चयः पञ्च गच्छोऽष्टौ यत्र तत्र मे ॥ मध्यान्त्यधनसंख्ये के वद् सर्वधनञ्च किम् ॥ २ ॥ अन्वयः-यत्र आदिः सप्त चयः पञ्च गच्छः अष्टौ तत्र मध्यान्त्यधन संख्ये के सर्वधनं च किम् ? इति मे वद ॥ २ ॥ अर्थः-जहां आदिधन सात है, चयधन पांच ५ है और गच्छ ८ आठ है, वहां मध्यधन और अन्त्यधनकी क्या संख्या होगी और सर्वधन क्या होगा ? यह मुझसे कहो ॥ २ ॥ न्यासः--आदि ० ७ । च ० ५ । ग ० ८ । मध्यधनम् ४९/२ अन्त्यधनम् ४२ सर्वधनम् १९६ ॥

श्रेढीव्यवहारः । ( १०९ ) समदिने गच्छे मध्यदिनाभावान्मध्यात्प्रागपरदिनधनयो- र्योगाद्धं मध्यदिनधनं भवितुमर्हतीति प्रतीतिरुत्पाद्या ॥ फैलाव-यहां मुख सात ७ है, चय ५ पांच है, गच्छ ८ आठ है, ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार पद आठमें एक १ घटाया तब ७ रहे; इन ७ से चय ५ पांचको गुणा किया तब ३५ हुए; इसमें मुख ७ को जोडा तब ४२ बयालीस हुए; यही अन्त्यके दिन जो धन दिया वह अन्त्यधन है. अब इसी अन्त्यधन ४२ में मुख ७ सात जोडा, तब ४९ उनचास हुए; इनको आधा किया तब ४९/२ हुए; यही मध्यके दिन दिया हुआ मध्यधन है. इसी मध्यधन ४९/२ को गच्छ ८ से गुणा किया तब १९६ एक सौ छियानवे हुए. यही सर्वधन अर्थात् आठ ८ दिनमें जो सब धन दिया सो है. यद्यपि आठ दिन सम है इसमें कोई दिन मध्यका ठीक नहीं हो सकता है; तथापि मध्यके आदिके और मध्यके अन्त्यके दिनके योगका जो धन है उसका जो आधा होगा; उसीको मध्यधन मानकर प्रतीतिकी उत्पत्ति करना ॥ मुखज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम् ॥ जहां मध्यधन जानते हैं और अन्त्यधन जानते हैं तथा सर्व धन जानते ह परंतु आदिधन नहीं जानते हैं; तहां आदि धन जाननेकी रीति आधे श्लोकमें लिखते हैं- गच्छहृते गणिते वदनं स्याद्वेकपदघ्नचयार्द्धविहीने ॥ अन्वयः-गणित गच्छहृते व्येकपदघ्नचयार्द्धविहीने च वदनं स्यात् ॥ अर्थः-गणित ( श्रेढीव्यवहार अर्थात् सर्वधन ) में गच्छका भाग ले; जो लब्धि आवे उसमें एक करके हीन पदसे गुणा किये हुए चयके आधेको घटावे जो शेष रहे वही मुख ( आदिधन ) जानना ॥ उदाहरणम्- पञ्चाधिकं शतं श्रेढीफलं सप्तपदं किल ॥ चयं त्रयं वयं विद्मो वदनं वद नन्दन ॥ १ ॥ अन्वयः-हे नन्दन ! किल पञ्चाधिकं शतं श्रेढीफलं सप्तपदं त्रयं चयं वयं विद्मः तत्र वदनं वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे अतिआनन्द देनेवाले मित्र ! निश्चय करके हम १०५ एकसौ पाँच सर्वधन और ७ सात पद ( गच्छ ) ३ तीन चय हम जानते हैं तो तहां आदि धन क्या होगा ? सो कहो ॥ १ ॥

( ११० ) लीलावती। न्यासः-आ० । च ० ३ ग० ७ सर्वधनं १०५ लब्धमादिधनम् ६ फैलाव-इस उदाहरणमें चय ३ तीन गच्छ ७ सात सर्वधन १०५ एकसौ पाँच है केवल आदि धन नहीं जानते हैं उसके जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सर्वधन १०५ में गच्छ ७ सातका भाग लिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुए. इनमें एक १ करके हीन जो पद अर्थात् ६ इससे चय ३तीनको गुणा किया तब १८ अठारह हुए इसका आधा किया तब ९ नौ हुए इनको १५ में घटाया तब ६ छ शेष रहे यही आदिधन है क्यों कि आदि धन जानकर सर्वधन निकालते हैं तो वही १०५ आता है. चयज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- आदिधन सर्वधन और गच्छ जानकर चय जाननेकी रीति आधे श्लोकम लिखते हैं. गच्छहृतं धनमादिविहीनं व्येकपदार्द्धहृतं च चयः स्यात् ॥ ३६॥ अन्वयः-धनं गच्छहृतम् आदिविहीनं व्येकपदार्द्धहृतं च चयः स्यात् ॥ ३६ ॥ अर्थः-सर्वधनमें गच्छका भाग दे, जो लब्धि आवे उसमें आदि धनको घटा दे जो शेष रहे उसमें एक करके हीन पदका भाग दे तब जो लब्धि आव उसको चय जानना ॥ ३६ ॥ उदाहरणम्- प्रथममगदह्ना योजने यो जनेशस्तदनु ननु कयाऽसौ ब्रूहि यातोऽध्ववृद्ध्या ॥ अरिकरिहरणार्थं योजनानाम- शीत्या रिपुनगरमवाप्तः सप्तरात्रेण धीमन् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे धीमन् ! यः जनेशः योजनानाम् अशीत्या अरिकरिहरणार्थं सप्तरा- त्रेण रिपुनगरम् अवाप्तः असौ प्रथमम् अह्ना योजने अगमत् तदनु ननु कया अध्ववृद्ध्या प्रयातः इति त्वम् ब्रूहि ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे चातुरीधुरीणमित्र ! जो राजा ८० योजनपर अपने शत्रुरूप हस्तीके मारनेके वास्ते सात दिनमें शत्रुके नगरको पहुँच गया. यहां राजा पहले दिन दो २ योजन मार्ग चला था; तो यह निश्चय करके कहो कि उसके बाद वह कितना रास्ता प्रतिदिन ज्यादा चला ? ॥ १ ॥ न्यासः-आ० २ । च० । गच्छ ७ धन ८० । लब्धमुत्तरम् २२ फैलाव- इस उदाहरणमें आदि धन २ दो है; क्योंकि पहले दिन दो योजन चला है और सात गच्छ है, क्योंकि सात ७ दिनमें पहुँचा है. सर्व धन ८० अस्सी

है. क्योंकि बिलकुल अस्सी योजन चला यहाँ चय नहीं मालूम है. इसके जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सर्वधन ८० में गच्छ ७ सातका भाग दिया तब ८०/७ यह हुआ इसमें आदिधन २ दोको घटाया अर्थात समच्छेदसे घटाया तब ६६/७ इतना रहा इसमें एक करके हीन पद ६ छह के आधे ३ का भाग दिया तब २२/७ यह लब्धि हुआ; यही चय हुआ; अर्थात् २२/७ इतने मार्गकी वृद्धिसे वह राजा प्रतिदिन चला था ॥ गच्छज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जहां आदिधन, मध्यधन, सर्वधन, चय यह तो जानते हैं और गच्छ नहीं जानते हैं तहां गच्छ जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- श्रेढीफलादुत्तरलोचनघ्नाच्चयार्द्धवक्रान्तरवर्गयुक्तात् ॥ मूलं मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छमुदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ अन्वयः-आचार्याः उत्तरलोचनघ्नात् चयार्द्धवक्रान्तरवर्गयुक्तात् श्रेढीफलात् मूलम् मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छम् उदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ अर्थः-सर्वधनको दो २ से गुणा किये हुए चयसे गुणा करे, फिर चयका आधा और आदिधन इनका अन्तर करनेसे जो मिले उसको द्विगुणित चयसे गुणा किये हुए सर्वधनमें जोड दे तब जो राशि सिद्ध हो उसका मूल ले, उस मूलमें आदि धन घटा दे और चयका आधा जोड दे, फिर चयका भाग दे जो लब्धि हो उसको गणितके आचार्य्य लोग गच्छ कहते हैं ॥ ३७ ॥ उदाहरणम्- द्रम्मतत्रयं यः प्रथमेऽह्नि दत्त्वा दातुं प्रवृत्तो द्विचयेन तेन ॥ शतत्रयं षष्ट्यधिकं द्विजेभ्यो दत्तं कियद्भिर्दिवसैर्वदाशु ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! यः द्विजेभ्यः प्रथमेऽह्नि द्रम्मतत्रयं दत्त्वा द्विचयेन दातुम् प्रवृत्तः तर्हि तेन षष्ट्यधिकं शतत्रयं कियद्भिः दिवसैः दत्तम् इति त्वम् आशु वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे प्रियसखे ! जो दानी पहले दिन ब्राह्मणोंको तीन द्रम्म देकर फिर प्रतिदिन २ द्रम्म बढाकर देने लगा, तो उसने ३६० तीनसौ साठ द्रम्म कितने दिनमें दिये यह तुम शीघ्र कहो ? ॥ १ ॥ न्यासः-आ० ३ । च० २ । ग० । ध० ३६० । लब्धो गच्छः १८ फैलाव-इस उदाहरणमें आदि ३ तीन हैं; चय दो हैं; सर्वधन ३६० हैं; यह सब जानते हैं परन्तु गच्छ नहीं जानते हैं, इस कारण गच्छ जाननेके वास्ते ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार चय २ दोको दो २ से गुणा किया तब चार ४ हुए. इससे

( ११२ ) लीलावती । सर्वधन ३६० को गुणा किया तब १४४० एक हजार चारसौ चालीस हुए फिर चयका आधा १ एक और मुख ३ तीनका अन्तर किया तब २ दो बचा इसका वर्ग किया तब ४ चार हुआ, यह द्विगुणित चयसे गुणा किये हुए सर्वधन १४४० में जोडा तब १४४४ एक हजार चारसौ चौवालीस हुए, इसका वर्गमूल लिया तब ३८ अडतीस मिले, इसमें आदि तीन ३ को घटाया तब ३५ पैंतीस रहे फिर चयका आधा १ एक जोडा तब ३६ छत्तीस हुए इसमें चय दो २ का भाग दिया तब १८ अठारह लब्धि हुए यही गच्छ है ॥ अथ द्विगुणोत्तरादिफलानयने करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- अब द्विगुणोत्तरफल ( जहाँ पहले दिन जो धन दिया; दूसरे दिन उससे द्विगुणा तीसरे दिन दूसरे दिनसे द्विगुण इस प्रकार जहां उत्तरोत्तर द्विगुणादिधन दिया जाय तहाँ फल ) जाननेकी रीति डेढ़ श्लोकमें लिखते हैं- विषमे गच्छे व्येके गुणकः स्थाप्यः समेऽर्द्धिते वर्गः ॥ गच्छक्षयान्तमन्त्याद्व्यस्तं गुणवर्गजं फलं यत्तत् ॥ ३८ ॥ व्येकं व्येकगुणोद्धृतमादिगुणं स्याद्गुणोत्तरे गणितम् ॥ अन्वयः-गच्छे विषमे सति व्येके गुणकः स्थाप्यः । गच्छे समे सति अर्द्धिते वर्गः स्थाप्यः । एवं गच्छक्षयान्तं कुर्य्यात् । अन्त्यात् यत् व्यस्तं गुणवर्गजम् फलं तत् व्येकं व्येकगुणोद्धृतम् आदिगुणं गुणोत्तरे गणितं स्यात् ॥ ३८ ॥ अर्थः-जहाँ गच्छ विषम हो तहाँ गच्छमें एक घटा दे और गुण स्थापन करे और यदि गच्छ सम हो तो आधा करके वर्ग स्थापन करे, इसी प्रकार जहाँतक गच्छ शून्य हो तहाँतक किया करे इस प्रकार गुण और वर्गकी लगार बन जाती है फिर पिछला जो गुण है उससे अपने ऊपर जो वर्ग है वहाँ वर्ग करके लिखे. फिर उस वर्ग फलको आगे गुण हो तो उससे गुणा करे और आगे वर्ग हो तो वर्ग करके रक्खे, इसी रीतिसे सबसे ऊपर जो राशि आवे उसमें एक घटा दे जो शेष बचे उसमें एक करके हीन गुणका भाग दे जो लब्धि हो उसको आदिधनसे गुणा करे जो गुणनफल हो वही सर्वधन ( द्विगुणोत्तरादिमें फल ) होगा ॥ ३८ ॥ उदाहरणम्- पूर्वं वराटकयुगं येन द्विगुणोत्तरं प्रतिज्ञातम् ॥ प्रत्यहमर्थिजनाय स मासे निष्कान्ददाति कति ॥ १ ॥ अन्वयः-येन अर्थिजनाय वराटकयुगं दत्त्वा प्रत्यहं द्विगुणोत्तरम् प्रतिज्ञातम् सः मासे कति निष्कान् ददाति ? ॥ १ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

श्रेढीव्यवहारः । ( ११३ ) अर्थः-जिसने याचकको पहले दिन दो वराटक देकर प्रतिदिन दूना २ देनेका इकरार किया, वह एक महीनेमें कितने निष्क देगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः-आ० २ चये गुणः २ । गच्छः ३० । लब्धा वराटकाः २१४७४८३६४६ निष्कवरा- टकाभिर्भक्ता जाता निष्काः १०४८५७ द्रम्माः ९ पणाः ९ काकिण्यौ २ वराटकाः ६ फैलाव-इसका उदाहरणमें आदिधन दो २ है; चय द्विगुण है, गच्छ एक मास अर्थात् ३० तीस दिन हैं यहाँ सर्वधन जानना है इसालय कही हुई रीतिके अनु- सार यहां गच्छ तीस सम है तो इसका आधा १५ करके वर्ग स्थापन किया फिर पन्द्रह शेष विषम हैं इस कारण इसमें एक घटाया तब १४ रहे और गुणस्थान किया फिर १४ सम है. इस कारण आधा किया ७ और वर्ग स्थापन किया फिर शेष ७ वर्ग-वर्ग १०७३७४१८२४ विषम है इसकारण एक घटाया, तब गुण-२ गुण .... .... ३२७६८ ६ छ रहे और स्थापन किया, फिर ६ वर्ग-वर्ग .... .... १६३८४ सम हैं इस कारण आधा किया ३ और गुण-२ गुण .... .... १२८ वर्ग स्थापन किया, फिर शेष ३ विषम वर्ग-वर्ग .... .... .... ६४ है. इस कारण एक घटाया तब २ रहा गुण-२ गुण ... .... .... ८ और वर्ग स्थापन किया,फिर २ सम हैं; वर्ग-वर्ग .... .... .... ४ इस कारण आधा १ किया और वर्ग- गुण-२ गुण .... .... .... २ स्थापन किया फिर १ विषम है इस कारण एक घटाया और गुण स्थापन किया इस प्रकार किया करनेसे अब शून्य रह गया अब उलटी तरफ अर्थात् पिछली (नीचेकी) तरफ गुण है इस कारण गुण दो २ दो २ (दुगना देना स्वीकार कियाहै, इसकारण गुण दो २ है) को गुणके सामने लिखा. फिर गुणके ऊपर वर्ग है, इसकारण उन दोका वर्ग करके ४ वर्गके सामने लिखा. फिर वर्गके ऊपर गुण है; इस कारण इन चारको दो२से गुणा करके ८ गुणके सामने लिखा. फिर गुणके ऊपर वर्ग है; इस कारण ८ का वर्ग करके ६४ वर्गके सामने लिखा. फिर वर्गके ऊपर गुण है; इस कारण ६४ को २ से गुणके लिखा इस प्रकार ऊपर तक किया तब १०७३७४१८२४ हुए, इसमें एक घटाया तब बचे १०७३७४१८२३ इस अङ्कमें एक १ करके हीन जो गुण १ है उसका भाग ६

( ११४ ) लीलावती । दिया तब लब्धि हुए १०७३७४१८२३ फिर इनको आदि धन दो २ से गुणा किया तब हुए २१४७४८३६४६ इन वराटकोंके निष्क किये तब हुए १०४८५७ द्रम्म ९ पण ९ काकिणी २ कौडी ६ ॥ उदाहरणम्- दूसरा उदाहरण- आदिर्द्विकं सखे वृद्धिः प्रत्यहं त्रिगुणोत्तरा ॥ गच्छः सप्तदिनं यत्र गणितं तत्र किं वद् ॥ २ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यत्र आदिः द्विकम् प्रत्यहं त्रिगुणोत्तरा वृद्धिः गच्छः सप्तदिनं तत्र गणितं किं भवति ? इति वद् ॥ २ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जहाँ आदिधन २ दो है और प्रतिदिन वृद्धि ( चय ) त्रिगुणी है और गच्छ सात ७ दिन हैं, तहाँ क्या श्रेढीफल होगा ? सो कहो ॥ २ ॥ न्यासः-आ० २ चयः ३ ग० ७ लब्धं गणितम् २१८६ फैलाव-इस उदाहरण में आदि धन दो २ है चय३ तीन है गच्छ ७ सात है केवल सर्वधन नहीं जानते हैं उसके जानने के वास्ते ऊपर कही हुई रीति के अनुसार गच्छ सात ७ विषम है इस कारण एक १ घटा दिया और गुण लिखा फिर शेष ६ सम है इसके आधे किये और वर्ग लिखा फिर ३ विषम है इस कारण एक घटा दिया और गुण-३ गु० .... २१८७ गुण लिखा, फिर शेष २ सम है आधा किया वर्ग-वर्ग .... ७२९ और वर्ग लिखा फिर १ एक विषम बचा एक गुण-३ गु० .... ....२७ घटा दिया और गुण लिखा तब कुछ शेष नहीं वर्ग-वर्ग .... .... ९ रहा फिर इस प्रकार जो गुणवर्गकी पंक्ति मिली गुण-गुण .... .... ३ उसमें नीचेकी तरफ पहले गुण है तहाँ चय ३ तीनको लिखा फिर उसके ऊपर वर्ग लिखा है इस कारण ३ तीनका वर्ग करके ९ उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर ३ गुण लिखा है इस कारण ९ नौको ३ तीनसे गुणा करके २७ उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर वर्ग लिखा है इस कारण २७ का वर्ग करके ७२९उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर गुण लिखा है, इस कारण ७२९ को ३ तीनसे गुणा करके २१८७ उसके ऊपर लिखा फिर अन्त आगया, इस कारण इसमें एक १ हीन किया तब शेष रहे २१८६ इसमें एक करके हीन गुण २ का भागलिया और आदिधन २ से गुणा किया तब लब्धि मिले २१८६यही सर्वधन हुआ। समादिवृत्तज्ञानाय वरणसूत्रं सार्द्धार्या ॥

३. श्रेणी-व्यवहार, क्षेत्र-व्यवहार व समतल ज्यामिति

श्रेढीव्यवहारः । ( ११५ ) सम अर्द्धसम विषम इत्यादि छन्दोंके भेद जाननेकी रीति डेढ श्लोक आर्याछन्दमें लिखते हैं- पादाक्षरमितगच्छे गुणवर्गफलञ्चये द्विगुणे ॥ ३९ ॥ समवृत्तानां संख्या तद्वर्गो वर्गवर्गश्च ॥ स्वस्वपदानौ स्यातामर्द्धसमानाञ्च विषमाणाम् ॥ ४० ॥ अन्वयः-पादाक्षरमितगच्छे चये द्विगुणे यत् गुणवर्गफलं सा समवृत्तानां संख्या भवति । तद्वर्गः वर्गवर्गः च पृथक् स्वस्वपदोनौ अर्द्धसमानां विषमाणां च संख्ये स्याताम् ॥ ४० ॥ अर्थः-पादके जितने अक्षर हों उसको गच्छ माने और चयको दूना करै तब ऊपर कही हुई गुणवर्गकी रीतिके अनुसार जो फल आवेगा सो समवृत्तोंकी संख्या होगी और उस फलका वर्ग करके समवृत्तकी संख्या घटाकर जो शेष रहेगा सो अर्द्ध सम वृत्तोंकी संख्या होगी और पहला जो वर्गफल है, उसका वर्ग करके पहला वर्गफल घटा देनेसे जो शेष रहेगा सो विषमवृत्तोंकी संख्या होगी ॥ ४० ॥ उदाहरणम्- समानामर्द्धतुल्यानां विषमाणां पृथक्पृथक् ॥ वृत्तानां वद मे संख्यामनुष्टुप्छन्दसि द्रुतम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! अनुष्टुप्छन्दसि समानाम् अर्द्धतुल्यानां विषमाणां च वृत्तानां संख्याम् मे पृथक् पृथक् द्रुतम् वद ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! अनुष्टुप् छन्दसे सम, अर्द्धसम और विषम, वृत्तोंकी भी संख्या मुझसे अलग अलग शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः-उत्तरो गुणः २ । गच्छः ८ । लब्धाः समवृत्तानां संख्याः २५६ । तथाऽर्द्धसमानाम् ६५२८० । विषमाणाञ्च ४२९४९०१७६० । फैलाव-इस उदाहरणमें अनुष्टुप् छन्दके विषयका प्रश्न है इस कारण अनुष्टुप् छन्दके पादक अक्षर ८ आठको गच्छ माना और चय २ को दूना किया फिर गुणव- र्गकी रीति करी; अर्थात् यहां आदि चय २ दो है;इस कारण सम अंक होनेसे आधा करके वर्ग स्थापन किया, फिर शेष १ एक विषम हैं; इस कारण १ घटा दिया और गुण स्थापन किया; अब यहाँ पहिले नीचेकी तरफ वर्ग लिखा है; इस कारण गच्छ

(११६) लीलावती । ८ आठका वर्ग किया तब ६४ चौंसठ हुआ; फिर गुण लिखा है; इस कारण द्विगु- णित चय ४ से वर्ग किये हुए चौंसठ ६४ को गुणा किया तब २५६ दोसौ छप्पन हुए. यही समवृत्तोंकी संख्या हुई. फिर २५६ इसका वर्ग किया तब ६५५३६ इतने हुए; इसमें अपने मूल २५६ को घटा दिया तब ६५२८० यह अर्द्ध समवृत्तोंकी संख्या हुई. फिर पहले वर्गफल ६५५३६ का वर्ग किया तब ४२९४९६७२९६ इतने हुए, इसमें अपना मूल घटा दिया तब ४२९४९०१७६० यह शेष रहे. यही विषमवृत्तोंकी संख्या हुई ॥ समवृत्त उसको कहते हैं, जिसके चारों चरणके वर्ण समान हों. अर्द्धसम उसको कहते हैं, जिसके प्रथम, तृतीय चरण एक जातिके हों और द्वितीय, चतुर्थ चरण एक जातिके हों ॥ विषम उसको कहते हैं, जिसके चारों चरण भिन्न भिन्न हों । इति लीलावत्यां श्रेढीव्यवहारः । इति प्रथमः खण्डः।

क्षेत्रव्यवहारः। (११७) अथ द्वितीयखण्डः। तत्रादौ क्षेत्रव्यवहारः। पहले क्षेत्रव्यवहार कहते हैं- तत्र भुज कोटिकर्णानामन्यतमाभ्यामन्यतमानय- नाय करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- तहाँ क्षेत्रव्यवहारमें भुज, कोटि, कर्ण यह तीन विभाग होते हैं, उनमेंसे दोको जानकर तीसरेको जाननेकी रीति दो श्लोकमें लिखते हैं- इष्टो बाहुर्यः स्यात्तत्स्पर्द्धिन्यां दिशीतरो बाहुः ॥ त्र्यस्रे चतुरस्रे वा सा कोटिः कीर्त्तिता तज्ज्ञैः ॥ १ ॥ तत्कृत्योर्योगपदं कर्णो दोः कर्णवर्गयोर्विवरात् ॥ मूलं कोटिः कोटिश्रुतिकृत्योरन्तरात्पदं बाहुः ॥ २ ॥ अन्वयः-त्र्यस्रे चतुरस्रे वा यः इष्टः बाहुः तत्स्पर्द्धिन्यां दिशि यः इतरः बाहुः सा तज्ज्ञैः कोटिः प्रकीर्त्तिता ॥ १ ॥ तत्कृत्योः योगपदं कर्णः स्यात् । दोः कर्णवर्गयोः विवरात् मूलं कोटिः स्यात् कोटिश्रुतिकृत्योः अन्तरात् पदम् बाहुः स्यात् ॥ २ ॥ अर्थः-त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रमें जो माना हुआ भुज है, उसको रोकने- वाली जो दूसरी बाहु है उसको गणितशास्त्रके जाननेवाले कोटि कहते हैं. (कोटि और भुजके अग्रभागोंको बाँधनेवाली जो रेखा है उसको कर्ण कहते हैं) भुज और कोटिके वर्गका योगकर वर्गमूल लेनेसे जो लब्धि हो वह जात्यत्रिभुजमें कर्णका प्रमाण होता है. भुज और कर्णका वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे; उसका मूल लेनेसे जो लब्धि हो वह कोटिका प्रमाण होता है; कोटि और कर्णका वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे उसका मूल लेनेसे जो लब्धि हो वह भुजका प्रमाण होता है ॥ २ ॥ उदाहरणम्- कोटिश्चतुष्टयं यत्र दोस्त्रयं तत्र का श्रुतिः ॥ कोटिं दोः कर्णतः कोटिश्रुतिभ्याञ्च भुजं वद॥ १ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

( ११८ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र चतुष्टयं कोटिः त्रयं दोः तत्र श्रुतिः का ? दोः कर्णतः कोटिं वद कोटिश्रुतिभ्याम् भुजं च वद ॥ १ ॥ अर्थः-जहाँ ४ चार कोटिका प्रमाण है तीन ३ भुजका प्रमाण है तहाँ कर्णका क्या प्रमाण होगा ? और भुज कर्ण जानकर कोटिका क्या प्रमाण होगा और कोटि कर्ण जानकर भुजका क्या प्रमाण होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- कोटिः ४ भुजः ३ भुजवर्गः ९ कोटिवर्गः १६ एतयोर्योगात् २५ मूलम् ५ कर्णो जातः ॥ अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्- कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्वर्गांतरम् १६ एतन्मूलं कोटिः ४ अथ कोटिकर्णाभ्यां भुजानयनम्- कोटिः ४ कर्णः ५ अनयोर्वर्गांतरम् ९ एतन्मूलं भुजः ३ फैलाव-यहां नीचेकी आडी रेखा मानी हुई भुज है और उसको रोकती हुई जो सीधी रेखा है, वह कोटि है. और दोनों रेखाओंको बाँधने- वाली जो तिरछी रेखा है सो कर्ण है. अब यहां भुजप्रमाण ३ तीन और कोटिप्रमाण ४ चार तो जानते हैं परन्तु यह नहीं जानते हैं कि कर्णका क्या प्रमाण है इस कारण ऊपर कहे हुए सूत्रके अनुसार भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुआ; और कोटि ४ चारका वर्ग किया तब १६ हुआ इनका योग किया तब २५ पचीस हुए; इसका मूल लिया तब ५ पाँच लब्ध हुआ. यही इस क्षेत्रमें कर्णका प्रमाण है ॥

क्षेत्रव्यवहारः । (११९) अब कर्णभुज जानकर कोटि जाननेका उदाहरण- इस उदाहरणमें कर्णप्रमाण ५ और भुजप्रमाण ३ तीन जानते हैं परन्तु कोटिका प्रमाण नहीं जानते; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार कर्ण ५ पांचका वर्ग किया तो २५ हुए और भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुए. इनका अन्तर किया तब १६ शेष रहे इनका मूल लनेसे ४ चार लब्धि हुए यही कोटिकी प्रमाण है. अब कोटि और कर्ण जानकर भुज लानेका उदाहरण- इस उदाहरणमें कोटिप्रमाण ४ और कर्णप्रमाण ५ पांच जानते हैं, परन्तु भुजका प्रमाण नहीं जानते इस कारण ऊपरकी रीतिके अनुसार कोटि ४ का वर्ग किया तब १६ हुए और कर्ण ५ पांचका वर्ग किया तब २५ हुए; इनका अन्तर किया तब ९ नौ शेष रहे इनका मूल लिया तब तीन लब्धि हुए. यही भुजका प्रमाण है ॥ प्रकारान्तरेण तज्ज्ञानाय करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- भुज, कोटि, कर्ण जाननेकी और रीति कहते हैं डेढ श्लोकमें- राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥ वर्गयोगो भवेदेवं तयोर्योगान्तराहतिः ॥ ३ ॥ वर्गान्तरं भवेदेवं ज्ञेयं सर्वत्र धीमता ॥ अन्वयः-ययोः राश्योः वर्गयोगः कार्य्यः तयोः द्विघ्ने घाते अन्तरवर्गेण युते सति वर्गयोगः भवेत् । एवं तयोः योगान्तराहतिः कार्य्या तदा वर्गान्तरम् भवेत् धीमत सर्वत्र एवं ज्ञेयम् ॥ ३ ॥ अर्थः-जिन राशियोंका वर्गयोग करना हो उनका परस्पर घात कर ले फिर दो २ से गुणा कर ले और उन्हीं राशियोंके अन्तरका वर्ग जोडनेपर जो राशि सिद्ध हो वही उन राशियोंके वर्गोंका योग होगा. इसी प्रकार जिन राशियोंका वर्गान्तर करना हो उनका योग कर ले और उन्हीं राशियोंके अन्तरसे गुणा कर दे तब वर्गान्तर हो जाता है बुद्धिमान् सब जगह ऐसा ही जाने ॥ ३ ॥

( १२० ) लीलावती । कोटिश्चतुष्टयमिति पूर्वोक्तोदाहरणे-- इसका ( कोटिश्चतुष्टयमित्यादि ) पहला ही उदाहरण है। न्यासः-कोटिः ४। भुजः ३। अनयोर्घाते १२ द्विघ्ने २४ अन्तर्वर्गेण १ युते वर्गयोगः २५ अस्य मूलम् कर्णः ५। अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्- कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्योगः ८ पुनरे- तयोरन्तरेण २ हतो वर्गान्तरम् १६ अस्य मूलम् ४ कोटिः अथ भुजज्ञानम्- कोटिः ४ कर्णः ५ एवं जातो भुजः ३ फैलाव-इस उदाहरणमें भुज और कोटि जानते हैं परन्तु कर्णका प्रमाण नहीं जानते; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार ४। ३ इन दोनों राशियोंका घात किया तब बारह हुए; इनको २ से गुणा किया तब २४ हुए, इसमें उन ही ४ । ३ दोनों राशि योंके अन्तर १ का वर्ग जोड दिया तब २५ हुए; यह भुजको टिके वर्गका योग हुआ पहली रीतिके अनुसार इसका मूल लिया तब पांच लब्धि हुआ, यही कर्णका प्रमाण है ॥ अब कर्ण और भुज जानकर कोटि लानेका उदाहरण लिखते हैं- ऊपर कही हुई वर्गान्तरकी सरल रीतिके अनुसार भुज ३ तीन कर्ण ५ पांचका योग किया तब ८ हुए; इसमें उन ही ३ । ५ दोनों राशियोंके अन्तर २ से गुणा किया तब १६ हुए; इनका पहली रीतिके अनुसार मूल लिया तब चार ४ लब्धि हुए. यही कोटिका प्रमाण है ॥ अब कर्णकोटि जानकर भुज लानेका उदाहरण दिखाते हैं-