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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

कदाचिन्न विपच्यते। मात्रातिमात्राप्याशिता सुखं यस्य विप- च्यते ॥ ४ ॥ तीक्ष्णाग्निरिति तं विद्यात्समाग्निः श्रेष्ठ उच्यते ॥ समाग्निवाले पुरुषके यथोचित आहार भले प्रकार पाचन होता है और मन्दाग्नि- वाले पुरुषको थोडा भी आहार यथार्थ नहीं पचता और विषमाग्निवाले मनुष्यको कभी अच्छी तरहसे अन्न पचे और कभी नहीं पचे और बहुत भोजन करा हुआ भी जिसके सुखपूर्वक पचजावे उसको तीक्ष्णाग्नि कहते हैं । इन चारों प्रकारकी अग्निमें समाग्नि उत्तम है । तीक्ष्णाग्निके कहनेसे भस्मकका ग्रहण नहीं करना चाहिये क्योंकि अत्यन्त तीक्ष्णाग्निको भस्मक कहते हैं उसके लक्षण चरकमें कहे हैं ॥ यथा- नरे क्षीणकफे पित्तं कुपितं मारुतानुगम् ॥ ५ ॥ सोष्मणा पाचकस्थाने बलमग्नेः प्रयच्छति । तदा लब्धबलो देहं रूक्षं यत्सानिलोऽनलः ॥ ६ ॥ अभिभूय पचत्यन्नं तैक्ष्ण्यादाशु मुहुर्मुहुः । पक्त्वाऽन्नं स ततो धातूञ्शोणितादीन्पचत्यपि ॥ ७ ॥ ततो दौर्बल्यमातङ्कं मृत्युं चोपनयेत् परम् । भुक्तेऽन्ने लभते शान्तिं जीर्णमात्रे प्रताम्यति । तृट्कासदाहमोहाः स्यु- र्व्याधयोऽत्यग्निसंभवाः ॥ ८ ॥ क्षीणकफवाले पुरुषके कफ कुपित हो वायुसे मिलकर ऊष्माके साथ पाचक- स्थानमें जाकर अग्निको बल देवे तब जठराग्नि वातकी सहायता पाकर प्रबल होकर देहको रूखा कर देवे और उसके जोरसे बारंबार अन्नको पचावे । अन्नको पचाय पीछे रुधिरादि धातुओंको पचावे, रुधिर आदिके पचनेसे देहमें दुर्बलताका रोग और मृत्युको मनुष्य प्राप्त होवे, जब अन्नको खावे तब तो शांति हो जाय और जब अन्न पचजाय तब मूर्च्छित होय । प्यास, खांसी, दाह, मोह, (कुछ सुध न रहै) ये रोग अत्यन्त अग्निसे होते हैं ! इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामग्निमांद्यनिदानं समाप्तम् ॥

अथाजीर्णनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( ६९ ) अथाजीर्णनिदानम् । अग्निमांद्य और अजीर्ण इनका परस्पर कारण है, इसीसे अग्निमांद्यके पीछे अजीर्णनिदानको कहते हैं- आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैस्त्रिभिः । अजीर्णं केचि- दिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः ॥ १ ॥ अजीर्णं पञ्चमं केचिन्निर्दोषं दिनपाकि च । वदन्ति षष्ठं चाजीर्णं प्राकृतं प्रतिवासरम् ॥ २ ॥ मनुष्यके कफसे आम, पित्तसे विदग्ध, वातसे विष्टब्ध ऐसे तीन प्रकारका अजीर्णरोग होता है । और जो भोजन करा सो पक्व होय नहीं रस शेष रहे सो रसशेषसे चतुर्थ अजीर्ण होय है । और रात्रि दिनमें जो आहार पचे और जिसमें अफरा, हडफूटन कुछ होय यह पांचवां अजीर्ण किसीके मतसे है । और जो नित्य ही स्वाभाविक अजीर्ण रहे अर्थात् विकृतिजन्य न होय उसको छठा अजीर्ण कहते हैं इस अजीर्णके पचानेके अर्थ सुश्रुतमें वामपार्श्वशयनादिक उपाय कहे हैं सो करने चाहिये ॥ भुक्त्वा शतपदं गच्छेदामपार्श्वेन संविशेत् । शब्दरूपरसस्पर्श- गन्धांश्च मनसः प्रियान् ॥ भुक्तवानुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ३॥ भोजन करे पीछे सौ पेंड डोलना, बांई करवट शयन करना, अपने मनको जो प्रिय शब्द, रूप, रस, स्पर्श, सुगन्ध उनको सेवन करना इस प्रकार करनेसे अन्न भले प्रकार पचे है ॥ अजीर्णके कारण । अत्यम्बुपानाद्विषमाशनाच्च सन्धारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च । कालेऽपि सात्म्यं लघु चापि भुक्तमन्नं न पाकं भजते नरस्य॥४॥ ईर्ष्याभयक्रोधपरिप्लुतेन लुब्धेन शुग्दैन्यनिपीडितेन । प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमानमन्नं न सम्यक्परिपाकमेति ॥ ५ ॥ बहुत जल पीनेसे, भोजनके समयको छोड पीछे भोजन करनेसे, मल, मूत्र आदि वेगोंके रोकनेसे, दिनमें सोनेसे, रातमें जागनेसे इन कारणोंसे भोजनके समय यदि १ शंका-आमादिक तीनों अजीर्ण और रसशेषमें क्या भेद है? उत्तर-आम, विदग्ध, विष्टब्ध ये तीनों अजीर्ण अन्नसे उत्पन्न होते हैं और रसशेष अजीर्ण आहारके रससे उत्पन्न होता है ॥

( ७० ) माधवनिदान ।

( ७० ) माधवनिदान । लघु और स्निग्ध गरम आदिगुणयुक्त भी हितकारी पदार्थ खाय तो भी अन्न अच्छी रीतिसे नहीं पचे ये देहके कारण कहे । अब अजीर्णके कारण जो मनसे सम्बन्ध रखते हैं उनको कहते हैं-ईर्ष्या कहिये परद्रव्यको न देख सकना, डरना, क्रोध करना इन कारणोंसे युक्त तथा लोभ, शोक, दीनतासे पीडित और मत्सरता करना इन कारणोंसे मनुष्यके भोजन करा हुआ अन्न भले प्रकार पचता नहीं है ॥ आमादिक अजीर्णोंके लक्षण । तत्राामे गुरुतोत्क्लेशः शोथो गण्डाक्षिकूटगः । उद्गारश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्त्तते ॥ ६ ॥ उन चारों अजीर्णोंमें प्रथम आमाजीर्णके लक्षण कहते हैं-पेट और अंग भारी हो, वमनके आनेकेसे प्रतीत हो, कपोल और नेत्रोंमें सूजन होवै और इसी अजी- र्णके प्रभावसे जैसा भोजन करा होय मीठा आदि उसी प्रकारकी डकार आवे ॥ विदग्धाजीर्णके लक्षण । विदग्धे भ्रमतृण्मूर्च्छाः पित्ताच्च विविधा रुजः । उद्गारश्च सधूमाम्लः स्वेदो दाहश्च जायते ॥ ७ ॥ विदग्ध अजीर्णमें भ्रम, प्यास और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं और पित्तके अनेक रोग प्रगट हों तथा धुएँके साथ खट्टी डकार आवे पसीना आवे और दाह होय ॥ विष्टब्ध अजीर्णके लक्षण । विष्टब्धे शूलमाध्मानं विविधा वातवेदनाः । मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम् ॥ ८ ॥ विष्टब्ध अजीर्णके ये लक्षण हैं-शूल, अफरा, अनेक वातकी पीडा, मल और अधोवायुका रुकजाना, देह जकडजाय, मोह और देहमें पीडा होय ॥ रसशेष अजीर्णके लक्षण । रसशेषेऽन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे । रसशेष अजीर्णके ये लक्षण हैं-अन्नमें अरुचि, हृदयमें शुद्धि न होय और देह भारी होय ॥ अजीर्णके उपद्रव । मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदनं भ्रमः । उपद्रवा भवन्त्येते मरणं चाप्यजीर्णतः ॥ ९ ॥

भाषाटीकासमेत । ( ७१ ) मूर्च्छा, बडबड, ओकारी अर्थात् वमन, लारका गिरना, ग्लानि, भ्रम ये अजी- र्णके उपद्रव हैं और बहुत बडा अजीर्ण मनुष्यको मार भी डालता है ॥ बहुत भोजन ही अजीर्णका हेतु है, उसीको कहते हैं- अनात्मवन्तः पशुवद् भुञ्जते येऽप्रमाणतः । रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ॥ १० ॥ जिन मनुष्योंकी इन्द्रियें स्वाधीन नहीं हैं वे पशुके समान अप्रमाण भोजन करते हैं उनके रोगोंका कारण अजीर्णरोग प्रगट होता है ॥ अत्र कहते हैं कि, अजीर्णरोगसे विषूचिकारोगकी उत्पत्ति होती है, इसलिये अजीर्णके अनन्तर विषूचिकाको कहते हैं- अजीर्णमामं विष्टब्धं विदग्धं च यदीरितम् । विषूच्यलसकौ तस्माद्भवेच्चापि विलम्बिका ॥ ११ ॥ आम, विष्टब्ध और विदग्ध ये जो अजीर्ण कहे हैं इनसे विषूचिका ( हैजा ) अलसक और विलंबिका पैदा होवे है इनसे चौथा रसशेष अजीर्णको विषूच्यादि- कोंको उत्पादक नहीं लिखा है । इसका कारण यह है कि, उस रसाजीर्णको अपरि- णाममात्रत्वकरके विषूचिका आदिके आरम्भत्व स्वभावादिकोपमतके कहनेसे आम, विदग्ध और विष्टब्ध इनसे क्रमपूर्वक विषूचिका, अलसक, विलंबिका ये प्रगट होती हैं । ऐसे कार्त्तिककुण्ड आचार्य कहता है सो असत्य है क्योंकि विदग्ध अजीर्णको विलंबिकाका प्रगट करना असम्भव है. क्योंकि उस विलंबिकाका आगे कफ वातसे प्रगट होना कहेंगे और विदग्धभावको पित्तजन्यता है इसलिये यह मत मन्तव्य नहीं है । इसी कारण तीनों अजीर्ण मिलकर विषूचिका आदिको प्रगट करते हैं यह बकुल आचार्यका मत है ॥ विषूचिकाकी निरुक्ति कहते हैं- सूचीभिरिव गात्राणि तुदन् संतिष्ठतेऽनिलः । यत्राजीर्णे च सा वैद्यैर्विषूचीति निगद्यते ॥ १२ ॥ जिस अजीर्णमें वादी देहको सूईके सदृश पीडा देय अर्थात् सूईसे चुभे उसको वैद्य विषूचिका कहते हैं ॥ न तां परिमिताहारा लभन्ते विदितागमाः । मूढास्तामजितात्मानो लभन्तेऽशनलोलुपाः ॥ १३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ७२ ) माधवनिदान ।

( ७२ ) माधवनिदान । जिनका आहार परिमाणका है और जो वैद्यविद्याके कहने पर चलते हैं उनको कदाचित् विषूचिका रोग नहीं होय । जो अज्ञानी, जिनकी इंद्रियें वशमें नहीं, जो भोज- नके लालची हैं ऐसे मनुष्योंको यह विषूचिका रोग अवश्य होता है ॥ विषूचिकाके लक्षण । मूर्च्छातिसारो वमथुः पिपासा शूलभ्रमोद्वेष्टनजृम्भदाहाः । वैवर्ण्यकंपौ हृदये रुजश्च भवन्ति तस्यां शिरसश्च भेदः ॥ १४ ॥ मूर्च्छा, अतिसार, वमन, प्यास, शूल, भ्रम, जांघोंमें पीडा जँभाई, दाह, देहका विवर्ण, कम्प, हृदयमें पीडा और मस्तकमें पीडा। ये लक्षण हो उसको विषूचिका कहते हैं । इसीको महामारी अथवा हैजा कहते हैं ॥ अलसकके लक्षण । कुक्षिरानाह्यतेऽत्यर्थं प्रताम्येत्परिकूजति । निरुद्धो मारुतश्चैव कुक्षावुपरि धावति ॥ १५ ॥ वातवर्चोनिरोधश्च यस्यात्यर्थं भवेदपि । तस्यालसकमाचष्टे तृष्णोद्गारौ तु यस्य च ॥ १६ ॥ कूखमें और पेटमें अफरा हो, मोह हो, पीडासे पुकारे, पवन चलनेसे रुककर कूखमें और कण्ठादि स्थानोंमें फिरे, मल मूत्र और गुदाकी पवन रुक, प्यास बहुत लगे, डकार आवे ये लक्षण जिसमें होयँ उसको अलसकरोग कहते हैं ॥ विलम्बिकाके लक्षण । दुष्टं तु भुक्तं कफमारुताभ्यां प्रवर्त्तते नोर्ध्वमधश्च यस्याम् । विलम्बिकां तां भृशदुश्चिकित्स्यामाचक्षते शास्त्रविदः पुराणाः॥ १७ जिस मनुष्यके भोजन करा हुआ अन्न-कफ वात करके दूषित हो, ऊपर नीचे नहीं जाय अर्थात् वमन विरेचन न होय उसको वैद्यविद्याके जाननेवाले जिसकी चिकित्सा नहीं ऐसी विलंबिका रोग कहते हैं । कोई शंका-करे कि, अलसक और विलंबिका इन दोनोंकी वात कफके प्रबल होनेसे ऊपर नीचे प्रवृत्ति होती है । इन दोनोंमें भेद क्या है ? सो कहो । उत्तर-अलसकमें शूल आदि घोरपीडा होती है और विलंबिकामें नहीं होती इतना ही भेद है ॥ अजीर्णसे प्रगट विषूच्यादिको कहकर अजीर्णजन्य आमके दूसरे कार्य्यान्तर कहते हैं- यत्रस्थमामं विरुजेत्तमेव देशं विशेषेण विकारजातैः । दोषेण येनावततं शरीरं तल्लक्षणैरामसमुद्भवैश्च ॥ १८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

कोई स्थान नियत नहीं है यह दिखाया ॥

भाषाटीकासमेत । ( ७३ ) जिस ठिकानेपर आम रहता है उस ठिकानेपर जिस दोषसे वह स्थान व्याप्त हो उसके लक्षण ( पीडा, दाह गौरव आदि ) करके और आमजन्य विकार ( आमवाता- दिक ) विशेष पीडा होती है, इस लिये जाना गया कि, और ठिकानेपर थोडी पीडा होती है और “ यत्र ” इस सर्वनामशब्दसे कुपित हुए वातादिकोंके सदृश आमका कोई स्थान नियत नहीं है यह दिखाया ॥ विषूचिका और अलसक इनके असाध्य लक्षण । यः श्यावदन्तौष्ठनखोऽल्पसंज्ञो वम्यर्दितोऽभ्यन्तरयातनेत्रः । क्षामस्वरः सर्वविमुक्तसन्धिर्यायान्नरः सोऽपुनरागमाय ॥ १९ ॥ जिस रोगीके दांत नख होठ काले पडजावें और संज्ञा जाती रहे, वमनसे पीडित होवे और नेत्र भीतरको बैठजायँ मन्द स्वर हो तथा हाथपैरोंकी संधि ढीली पडजाय वह मनुष्य बचे नहीं । विलंबिका स्वरूपसे ही असाध्य है यह जैज्जट आचार्यका मत है ॥ [ निद्रानाशोऽरतिः कम्पो मूत्राघातो विसंज्ञिता । अमी उपद्रवा घोरा विषूच्यां पञ्च दारुणाः ॥ २० ॥ प्रायेणाहारवैषम्यादजीर्णं जायते नृणाम् । तन्मूलो रोगसंवातस्तद्विनाशाद्विनश्यति ॥२१॥ निद्राका नाश, मनका न लगना, कम्प, मूत्रका रुकना, संज्ञाका नाश ये विषूचिकाके घोर पांच उपद्रव हैं । बहुधा भोजनकी विषमतासे अजीर्णरोग मनु- ष्योंको होता है, वही अजीर्ण सब रोगोंका कारण है उस अजीर्णरोगके नाश होनेसे सब रोगोंका नाश होता है ॥ ये दोनों श्लोक क्षेपक हैं । ] अजीर्ण जाता रहा उसके लक्षण । उद्गारशुद्धिरुत्साहो वेगोत्सर्गो यथोचितः । लघुता क्षुत्पिपासा च जीर्णाहारस्य लक्षणम् ॥ २२ ॥ शुद्ध डकार आवें, शरीर और मनका प्रसन्न होना, जैसा भोजन करा हो उसके सदृश मल मूत्रकी भले प्रकार प्रवृत्ति होना, शरीर हलका होय परन्तु कोष्ठ विशेष हलका हो, भूख और प्यास लगे, भोजन पचनेके उत्तर ये लक्षण होते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामजीर्णरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ७४ ) माधवनिदान ।

( ७४ ) माधवनिदान । अथ कृमिरोगनिदानम् । —————— अजीर्णसे कृमिरोग प्रगट होय है इसीसे अजीर्गरोगके अनन्तर कृमिरोग कहे हैं— कृमयस्तु द्विधा प्रोक्ता बाह्याभ्यन्तरभेदतः । बहिर्मलकफासृग्विड्जन्मभेदाच्चतुर्विधाः ॥ १ ॥ कृमिरोग दो प्रकारका है । एक बाहरका दूसरा भीतरका । तहां बाहरके मल ( पसीना आदि ) और कफ, रुधिर, विष्ठा इन कारणोंसे बहिः कृमिरोग चार प्रकारका है ॥ बाह्यकृमियोंके नाम । नामतो विंशतिविधा बाह्यास्तत्र मलोद्भवाः । तिलप्रमाणसंस्थान- वर्णाः केशाम्बराश्रयाः ॥२॥ बहुपादाश्च सूक्ष्माश्च यूकालिक्षादि- नामतः । द्विधा ते कुष्ठपिडिकाकण्डूगण्डान्प्रकुर्वते ॥ ३ ॥ उस कृमिरोगके बीस नामोंसे बीस भेद हैं। तहां बाहरके मलसे प्रगट कृमि तिलके समान परिमाण और आकृति और श्वेत कृष्णवर्णवाली होती हैं। वस्त्र और केशोंमें रहनेवाली होती हैं तथा बहुत पैरकी और छोटी जूँ लीख नामोंसे प्रसिद्ध दो प्रका- रकी हैं । ये कृमियें कोढ, पिडिका, खाज इत्यादिरोग प्रगट करे हैं ॥ कृमिरोगका कारण । अजीर्णभोजी मधुराम्लनित्यो द्रवप्रियः पिष्टगुडोपभोक्ता । व्यायामवर्जी च दिवाशयानो विरुद्धभुक्संलभते कृमींश्च ॥ ४ ॥ अजीर्णमें भोजन करे, प्रतिदिन मीठा खट्टा खावे तथा पतला पदार्थ ( जैसे कढी रायता आदि ) खावे, पीसा अन्न मैदा आदि और गुडके पदार्थ खावे और भोजन करके परिश्रम न करे, दिनमें सोवे, विरुद्ध भोजन, जैसे दूध मछली आदिको खावे ऐसे पुरुषके कृमिरोग प्रगट होता है ॥ कौन कारणसे कौनसी कृमि प्रगट होती है माषपिष्टान्नलवणगुडशाकैः पुरीषजाः । मांसमत्स्यगुडक्षीरदधिशुक्तैः कफोद्भवाः ॥ विरुद्धाजीर्णशाकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि ॥ ५ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (७६) उड़द पीसा अन्न ( लड्डू घेवर गूंझा आदि ) नोनके गुडके तथा शाक आदि ऐसे पदार्थ खानेसे मलकी कृमि प्रगट होती है। मांस मछली गुड दूध दही कांजी ऐसे पदार्थ खानेसे कफकी कृमि पैदा होती है। विरुद्धपदार्थ जैसे दूध मछली और आधा कच्चा आधा पक्का शाक जैसे हरा चनेका आदि ऐसे भोजनोंसे रुधिरजन्य कृमि पैदा होती है ॥ पेटमें कृमि पडगई हों उसके लक्षण । ज्वरो विवर्णता शूलं हृद्रोगः सदनं भ्रमः । भक्तद्वेषोऽतिसारश्च संजातक्रिमिलक्षणम् ॥ ६ ॥ ज्वर हो, शरीरका रंग और प्रकारका होजावे, शूल, हृदय दूखे, वमनकीसी इच्छा हो, भ्रम, भोजन बुरा लगे, दस्त होयें ये लक्षण जिसके पेटमें गिंडोहा आदि कृमि पड जाती हैं उसको होते हैं ॥ कफकी कृमिके लक्षण । कफादामाशये जाता वृद्धाः सर्पन्ति सर्वतः । पृथुब्रध्ननिभाः केचित्केचिद्गण्डूपदोपमाः ॥ ७ ॥ रूढधान्याङ्कुराकारास्तनुदीर्घास्तथाऽणवः । श्वेतास्ताम्रावभासाश्च नामतः सप्तधा तु ते ॥ ८ ॥ अन्नादा उंदरावेष्टा हृदयादा महारुजः । चुरवो दर्भकुसुमाः सुगन्धास्ते च कुर्वते ॥ ९ ॥ हृल्लासमास्यस्रवणमविपाकमरोचकम् । मूर्च्छांच्छर्दितृषानाहकार्य्यश्वयथुपीनसान् ॥ १० ॥ कफसे आमाशयमें प्रगट हुई कृमियें जब बढ जाती हैं तब चारों तरफ डोलती हैं, उनमेंसे कोई मोटी चामकी बाधीके सदृश, कोई गिंडोहेके आकार, कोई धान्यके अँकुरके समान होती हैं। कितनी छोटी, बडी, चौडी होती हैं और किसीका वर्ण श्वेत, किसीका तांबेके समान होता है। उन्होंके सात नाम हैं। सो इस प्रकार- १ अन्नाद, २ उदरावेष्ट, ३ हृदयाद, ४ महारुज, ५ चुरु, ६ दर्भकुसुम और ७ सुगन्ध ये नाम कोई सार्थक हैं और कोई निरर्थक हैं। व्यवहारके निमित्त पहले आचायोंने कहे हैं। इन कृमियोंसे वमनकीसी इच्छा होय, मुखसे पानी गिरे, अन्नका पाक न होवे, अरुचि, मूर्च्छा, वमन, प्यास, अफरा, शरीर कृश होवे, सूजन और पीनस इतने विकार होते हैं ॥

( ७६ ) माधवनिदान ।

( ७६ ) माधवनिदान । रुधिरकी कृमिके लक्षण । रक्तवाहिशिरास्थाना रक्तजा जन्तवोऽणवः । अपादा वृत्तताम्राश्च सौक्ष्म्यात्केचिददर्शनाः ॥ ११ ॥ केशादा रोमविध्वंसा रोमद्वीपा उदुम्बराः । षट् ते कुष्ठैककर्माणः सह सौरसमातरः ॥ १२ ॥ रुधिरकी बहनेवाली नाडियोंमें रुधिरसे प्रगट कृमि बारीक, पादरहित, गोले तांबेके रंगके होते हैं, कोई बहुत बारीक होती हैं, वह देखनेसे भी नहीं दीखे। ये कृमि छः प्रकारकी हैं। उनके नाम ये हैं-१ केशाद, २ रोमविध्वंस, ३ रोमद्वीप, ४ उदुम्बर, ५ सौरस, ६ मातर ये कुष्ठको पैदा करती हैं ॥ विष्ठासे प्रटग कृमिके लक्षण । पक्वाशयपुरीषोत्था जायन्तेऽधोविसर्पिणः । वृद्धास्ते स्युर्भवेयुश्च ते यदाऽऽमाशयोन्मुखाः ॥ १३ ॥ तदास्योद्गारनिश्वासा विड्गन्धानुविधायिनः । पृथुवृत्ततनुस्थूलाः श्यावपीतसितासिताः ॥ १४ ॥ ते पञ्च नाम्ना कृमयः ककेरुकमकेरुकाः । सौसुरादामलूनाश्च लेलिहा जनयन्ति च ॥ १५ ॥ विड्भेदशूलविष्टम्भकार्श्यपारुष्यपाण्डुताः । रोमहर्षाग्निसदनं गुदकण्डूर्विमार्गगाः ॥ १६ ॥ पक्वाशयमें विष्ठासे प्रगट कृमि गुदाके मार्ग होकर बाहर निकलती हैं। जब ये बढ जाती हैं तब आमाशयमें प्राप्त होकर डकार और श्वाससे विष्ठाकीसी वास आने लगती है । ये कृमि बडी, छोटीं, गोल, मोटी, रंगमें, काली, पीली, सफेद नीली होती हैं। इनके पांच नाम हैं-१ कके रुक, २ मके रुक, ३ सौसुराद, ४ आमलून, ५ लेलिह । जब ये कृमि मार्गको छोड अन्य मार्गमें जाती हैं तब इतने रोग प्रगट करैं हैं। दस्तका पतला होना, शूल, अफरा, देहमें कृशता तथा देहमें कठोरता, पाण्डुरोग, रोमांच, मन्दाग्नि और गुदामें खुजलीका होना ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां कृमिरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ संमूलाख्येति पाठान्तरम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पाण्डुरोगनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । ( ७७ ) अथ पाण्डुरोगनिदानम् । पाण्डुरोगाः स्मृताः पञ्च वातपित्तकफैस्त्रयः । चतुर्थः सन्निपातेन पञ्चमो भक्षणान्मृदः ॥ १ ॥ मलसे प्रगट कृमिरोग पांडु ( पीलिया ) रोगको प्रगट करे है. इसी कारण कृमि- रोगके अनन्तर पांडुरोगका निदान कहते हैं । तहां प्रथम पांडुरोगकी संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं-१ वातका, २ पित्तका, ३ कफका, ४ सन्निपातका और ५ माटीके खानेसे पांडुरोग पांच प्रकारका कहा है ॥ पांडुरोगके कारण और सम्प्राप्तिके लक्षण । व्यवायमम्लं लवणानि मद्यं मृदं दिवास्वप्नमतीव तीक्ष्णम् । निषेव्यमाणस्य विदूष्य रक्तं दोषास्त्वचं पाण्डुरतां नयन्ति॥२॥ अति मैथुन, खट्टे पदार्थका भोजन, नोनका पदार्थ खानेसे, बहुत मद्य पीनेसे, मिट्टी खानेसे, दिनमें सोनेसे, अत्यन्त तीखा पदार्थ खानेसे इन कारणोंसे तीनों दोष रुधिरको बिगाड देहकी त्वचाको पीले रंगकी कर देते हैं । इस जगह रुधिरका तो उपलक्षणमात्र है, रक्तके कहनेसे त्वचा मांस इनको दूषित करते हैं यह दृढबलने कहा है । हारीतने रसको दूष्य कहा है दोष नाम वातादिक और दूष्य कहिये रसरक्तादि ॥ पांडुरोगके पूर्वरूप । त्वक्स्फोटनष्ठीवनगात्रसादमृद्भक्षणप्रेक्षणकूटशोथाः । विण्मूत्रपीतत्वमथाविपाको भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि ॥ ३ ॥ त्वचाका फटना, मुखसे बारम्बार थूकना, अंगोंका जकडना, मिट्टी खानेकी इच्छा, नेत्रोंपर सूजन, मल, मूत्र पीले हों, अन्नका परिपाक न होय ये लक्षण पांडु- रोग प्रगट होनेवाला होय है तब होते हैं ॥ वातपांडुरोगके लक्षण । त्वङ्‌मूत्रनयनादीनां रूक्षकृष्णारुणात्मता । वातपाण्ड्वामये कम्पतोदानाहभ्रमादयः ॥ ४ ॥ वातके पांडुरोगमें त्वचा, मूत्र, नेत्र इनमें रूखापना कालापना और लाली होती है तथा कंप, सुई छेदनकासा चुभना, अफरा, भ्रम, आदिशब्दसे भेद और शूला- दिक भी होते हैं ॥

(७८) माधवनिदान ।

(७८) माधवनिदान । पित्तजपांडुरोगीके लक्षण । पीतमूत्रशकृन्नेत्रो दाहतृष्णाज्वरान्वितः । भिन्नविट्कोऽतिपीताभः पित्तपाण्डामयी नरः ॥ ५ ॥ पित्तपांडुरोगीके ये लक्षण होते हैं—मल मूत्र और नेत्र पीले हों, दाह, प्यास, ज्वर इनसे पीडित हो, मल पतला हो और उस रोगीके देहकी कांति अत्यन्त पीली होती है ॥ कफपांडुरोगीके लक्षण । कफप्रसेकश्वयथुतन्द्रालस्यातिगौरवैः । पाण्डुरोगः कफाच्छुक्लैस्त्वङ्‌मूत्रनयनाननैः ॥ ६ ॥ मुखसे कफका गिरना, सूजन, तन्द्रा, आलसक शरीरका भारी होना, त्वचा, मूत्र, नेत्र, मुख इनका सफेद होना इन लक्षणोंसे कफका पांडुरोग जानना ॥ सन्निपातयुक्त पांडुरोगके असाध्य लक्षण । ज्वरारोचकहृल्लासच्छर्दितृष्णाक्लमान्वितः । पाण्डुरोगी त्रिभिर्दोषैस्त्याज्यः क्षीणो हतेन्द्रियः ॥ ७ ॥ ज्वर, अरुचि, ओकारी ( उबकाई ), वमन, प्यास और क्लम इतने उपद्रवयुक्त जो त्रिदोषजन्य पांडुरोगी क्षीण होगया हो और जिसकी इंद्रियें अपना अपना विषय ग्रहण करनेकी शक्ति न रखती हों तो उसको वैद्य त्याग दे ॥ मिट्टीखानेसे प्रगट पांडुरोगकी सम्प्राप्ति । मृत्तिकादनशीलस्य कुप्यत्यन्यतमो मलः । कषाया मारुतं पित्तमूपरा मधुरा कफम् ॥८॥ कोपयेन्मृद्रसादींश्च रौक्ष्याद् भुक्तं च रूक्षयेत् । पूरयत्यविपक्कैव स्रोतांसि निरुणद्ध्यपि ॥ ९ ॥ इन्द्रियाणां बलं हत्वा तेजो वीर्यौजसी तथा। पाण्डु- रोगं करोत्याशु बलवर्णाग्निनाशनम् ॥ १० ॥ १ चरकमें लिखा है—सर्वान्नसेविनः सर्वे दुष्टा दोषास्त्रिदोषजम् । त्रिलिंगं संप्रकुर्वन्ति पांडुरोगं सुदुःसहम् ॥ सम्पूर्ण अन्नोंके सेवन करनेवाले पुरुषके तीनों दोष दुष्ट हुए त्रिदोषज पांडुरोगको करते हैं जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हैं उसको सन्निपातका पांडुरोग जानना और वह असाध्य है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (७९) मिट्टी खानेका जिस मनुष्यको अभ्यास पडजाय उसके वातादिक दोष कुपित होवें, कषेली मिट्टीसे वात कुपित होय, खारी मिट्टीसे पित्त और मीठी मिट्टीसे कफ कुपित होवे। फिर वही मिट्टी पेटमें जाकर रसादिक धातुओंको रूखा करे । जब रौक्ष्य गुण प्रगट होजाय तब जो अन्न खाय सो रूखा होजाय । फिर वही मिट्टी पेटमें बिना पके रसको रस बहनेवाली नसोंमें प्राप्त कर उनके मार्गको रोकदे, रसके बहने- वाली नसोंका मार्ग जब रुकजाय तब इन्द्रियोंका बल अर्थात् अपने अपने विषय ग्रहण करनेकी शक्तिका नाश होय, शरीरकी कांति तेज और ओज कहिये सब धातुओंका सार हृदयमें रहता है सो क्षीण होकर पाण्डुरोग प्रगट करे उसमें बल, वर्ण और अग्नि इनका नाश होता है ॥ पांडुके विशेष लक्षण । शूनाक्षिकूटगण्डभ्रूः शूनपन्नाभिमेहनः । कृमिकोष्ठोऽतिसार्येत मलं चासृक्कफान्वितम् ॥ ११ ॥ नेत्र, कपोल, भ्रुकुटी, पैर, नाभि और लिंग इनमें सूजन हो और कोठेमें क्रिमि पडजॉय तथा रुधिर और कफ मिला दस्त उतरे सब पाण्डुरोगोंमें जब पेटमें कृमि पडजॉय हैं तब ये पूर्वोक्त लक्षण होते हैं । यह जैज्जट आचार्यका मत है और कोई कहता है-ये मृत्तिकाजन्य पांडुरोगके लक्षणहैं। क्योंकि, मृत्तिकाजन्य पाण्डुरोगके लक्षण अनन्तर लिखे हैं परन्तु विदेहने तो ये मृत्तिकाजन्य पांडुरोगके लक्षण स्पष्ट कहे हैं ॥ असाध्य पांडुरोगके लक्षण । पाण्डुरोगश्चिरोत्पन्नः खरीभूतो न सिद्ध्यति । कालप्रकर्षा- च्छूनाङ्गो यो वा पीतानि पश्यति ॥ १२ ॥ बद्धालपविट् सह- रितं सकफं योऽतिसार्यते । दीनः श्वेतातिदिग्धाङ्गश्छर्दि- मूर्च्छातृषान्वितः ॥ १३ ॥ स नास्त्यसृक्क्षयाद्यस्तु पाण्डुः श्वेतत्वमाप्नुयात् । पाण्डुदन्तनखो यस्तु पाण्डुनेत्रश्च यो भवेत् ॥ १४॥ पाण्डुसङ्घातदर्शी च पाण्डुरोगी विनश्यति । अन्तेषु शूनं परिहीनमध्यं म्लानं तथा तेषु च मध्यशूनम् ॥ १५ ॥ गुदे च शोफस्यथ मुष्कयोश्च शूनं प्रताम्यं तमसंज्ञकल्पम् । विवर्जयेत्पाण्डुकिनं यशोर्थी तथातिसारज्वरपीडितं च ॥ १६ ॥ बहुत दिनका पांडुरोग बहुत काल बीतनेसे पुराना होजाता है सो अच्छा नहीं होय । अथवा-सब देहमें सूजन आगई होवे और उसको पदार्थ पीले दीखें सो भी

( ८० ) माधवनिदान ।

( ८० ) माधवनिदान । असाध्य है। अथवा-जिस मनुष्यका बँधाहुआ मल थोडा हरे रंगका कफमिश्रित उतरे सो भी असाध्य है । अथवा-जो पुरुष दीन कहिये ग्लानियुक्त हो और जिसकी देहका श्वेत वर्ण हो और वमन, मूर्च्छा, प्यास इनसे पीडित होवे सो पांडु- रोगी नष्ट होवे । अथवा-रुधिरक्षय होनेसे जो पांडुरोग श्वेतत्वको प्राप्त होय सो भी असाध्य है । जिसके दांत, नख और नेत्र पीले होंय वह रोगी असाध्य है । जिसको सब पदार्थ पीलेही पीले दीखें वह रोगी मरे । हाथ, पैर, शिर, इनमें सूजन हो और जिसका मध्य पतला होय ऐसा पांडुरोगी असाध्य है, इससे विपरीत साध्य है। जिस रोगीके देहके मध्यमें सूजन हो और हाथ, पग, शिर ये सूखजायँ तथा गुदा, लिङ्ग इनमें सूजन होय तथा मरेके समान होगया होय ऐसे पांडुरोगीको जिस वैद्यको यशकी इच्छा हो सो त्याग दे । इसी प्रकार अतिसार और ज्वर इनसे पीडित रोगीको वैद्य त्याग देवे परन्तु इस अन्तके श्लोकमें जो “ पाण्डुकिनं ” यह पाठ है। इस जगह पालकिनं ऐसा पाठ कोई आचार्य मानते हैं सो ठीक है क्योंकि ऐसा पढनेसे पांडुरोगकी अवस्था अर्थात् पांडुरोगका भेद जो पालकी है उसके भी लक्षण इस पाठसे आगये । सो सुश्रुतमें लिखा है, इसीका आश्रय लेकर किसी अन्यने भी लिखा है। यथा- अन्ते शूनः कृशो मध्ये त्वथवा गुदशेफसि ॥ शूनो ज्वरातिसाराद्यैर्मृतकल्पस्तु पालकी ॥ १७ ॥ जिस मनुष्यके हाथ पैरोंके ऊपर सूजन और देहका मध्य कृश होगया अथवा गुदा लिंगपर सूजन हो तथा ज्वर अतिसारके मुर्देके समान हो ये लक्षण पालकी रोगके हैं । पांडुरोगका भेद कामला है ॥ कामलाके लक्षण । पाण्डुरोगी तु योऽत्यर्थं पित्तलानि निषेवते । तस्य पित्तमसृङ्मांसं दग्ध्वा रोगाय कल्पते ॥ १८ ॥ हारिद्रनेत्रः स भृशं हारिद्रत्वङ्नखाननः । रक्तपित्तशकृन्मूत्रो भेकवर्णो हतेन्द्रियः ॥ १९ ॥ दाहाविपाकदौर्बल्यसदनारुचिकर्षितः । कामला बहुपित्तेषा कोष्ठशाखाश्रया मता ॥ २० ॥ १ सकामलापालकिपाण्डुरोगः कुम्भाह्वयो लाघविकोऽलसाख्यः । इति ॥

भाषाटीकासमेत । ( ८१ ) जो पाण्डुरोगी अत्यन्त पित्तकारक वस्तुओंके सेवन करे उसके पित्त, रुधिर मांसको जलाय ( दुष्ट कर ) कामलारूप रोग प्रगट करनेको समर्थ होय, उस मनु- ष्यके नेत्र अत्यन्त पीले होयँ, त्वचा, नख और मुख ये पीले होयँ, रक्तपित्तयुक्त मल, मूत्र काले होयँ अथवा पीले होयँ, वह मनुष्य वर्षाऋतुमें मेंढकके समान पीला होवे, इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होय, दाह, अन्न पचे नहीं, दुर्बलता, अंगग्लानि, अन्नमें अरुचि इनसे पीडित होय. जिसमें पित्त प्रवल है ऐसी यह कामला एक कोष्ठाश्रय और दूसरी शाखा ( रक्तादि धातु ) आश्रित है । जैसे कासरोगसे भी राजयक्ष्मा पैदा होती है और स्वतन्त्र भी होती है उसी प्रकार कामला स्वतन्त्र भी होती है ॥ अब कहते हैं कि, पाण्डुरोगको उपेक्षा करनेसेही कामलादिक होते हैं उसीकी दूसरी अवस्था कुंभकामला है । अथ कुम्भकामलाके लक्षण । कालान्तरात्खरिभूता कृच्छा स्यात्कुम्भकामला । बहुत कालसे पुरानी पडनेसे जो कुंभकामला होवे सो कृच्छ्रसाध्य होती है । कुम्भ कहिये कोष्ठ तद्गत जो कामला उसको कुम्भकामला कहते हैं अर्थात् कोष्ठाश्रय कामला ॥ असाध्य कामलाके लक्षण । कृष्णपीतशकृन्मूत्रो भृशं शूनश्च मानवः । संरक्ताक्षिमखच्छर्दिंविण्मूत्रो यश्च ताम्यति ॥ २१ ॥ जिस मनुष्यका मल काला और मूत्र पीला हो और शरीरपर सूजन विशेष होवे और नेत्र मुख, वमन, मल और मूत्र ये अत्यन्त लाल होयँ, मोह होय वह कामलावान् रोगी बचे नहीं ॥ दाहारुचित्तृडानाहतन्द्रामोहसमन्वितः । नष्टाग्निसंज्ञः क्षिप्रं च कामलावान्विपद्यते ॥ २२ ॥ दूसरे असाध्य लक्षण-दाह, अरुचि, प्यास, अफरा, तन्द्रा इन लक्षणयुक्त तथा मन्दाग्नि और विस्मृतिवान् कामलावाला रोगी तत्काल मरे ॥ १" स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥"

( ८२ ) माधवनिदान ।

( ८२ ) माधवनिदान । कुम्भकामलाके असाध्य लक्षण । छर्द्यरोचकहृल्लासज्वरक्लमनिपीडितः । नश्यति श्वासकासार्त्तो विड्भेदी कुम्भकामली ॥ २३ ॥ वमन, अरुचि, ओकारीका आना, ज्वर, अनायास श्रम इनसे पीडित तथा श्वास खाँसी इनसे जर्जरित और अतिसारयुक्त ऐसा कुम्भकामलावाला रोगी मरजावे ॥ पाण्डुरोगसे हलीमक रोग प्रगट होता है, सो कहते हैं- यदा तु पाण्डुवर्णः स्याद्धरितः श्यावपीतकः । बलोत्साहक्षयस्तन्द्रा मन्दाग्नित्वं मृदुज्वरः ॥ २४ ॥ स्त्रीष्वहर्षोऽङ्गमर्दश्च दाहस्तृष्णाऽरुचिर्भ्रमः । हलीमकं तदा तस्य विद्यादनिलपित्ततः ॥ २५ ॥ जिस समय पाण्डुरोगीका वर्ण हरा, काला, पीला होय और बल व उत्साह इनका नाश, तन्द्रा, मन्दाग्नि, महीन ज्वर, स्त्रीसंभोगकी इच्छाका नाश, अंगोंका टूटना, दाह, प्यास, अन्नमें अप्रीति और भ्रम ये उपद्रव वातपित्तसे प्रगट हली- मक रोगके हैं ॥ पानकी लक्षण । सन्तापो भिन्नवर्चस्त्वं बहिरन्तश्च पीतता । पाण्डुता नेत्रयोर्यस्य पानकीलक्षणं भवेत् ॥ २६ ॥ सन्ताप कहिये इन्द्रिय, मन इनका ताप, मलका पतला होना, भीतर बाहर पीला हो जावे और नेत्रोंका पीला होना ये पानकी रोगके लक्षण हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां पाण्डुकामलाहलीमकनिदानं समाप्तम् ॥ अथ रक्तपित्तनिदानम् । पाण्डुरोगके सदृश रक्तपित्तको भी पित्तजन्य होनेसे तदनन्तर रक्तपित्तनिदानको कहते हैं- घर्मव्यायामशोकाध्वव्यवायैरतिसेवितैः । तीक्ष्णोष्णक्षारलवणैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ १ ॥ १ रक्तं च तत् पित्तं च रक्तपित्तम् । अथवा रक्तं च पित्तं चेत्यनयोः समाहारः रक्तपित्तम्, तस्य निदानम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ८३ ) पित्तं विदग्धं स्वगुणैर्विदहत्याशु शोणितम् । ततः प्रवर्त्तते रक्तमूर्ध्वं वाऽधो द्विधापि वा ॥ २ ॥ ऊर्ध्वं नासाक्षिकर्णास्यैर्मेढूयोनिगुदैर्धः । कुपितं रोमकूपैश्च समस्तैस्तत्प्रवर्त्तते ॥ ३ ॥ धूपमें बहुत डोलनेसे, अति परिश्रम करनेसे, शोकसे, बहुत मार्ग चलनेसे, अति मैथुन करनेसे, मिरच आदि तीखी वस्तु खानेसे, अग्निके तापनेसे जवाखार आदि खारे पदार्थ, नोनसे आदि ले लवणके पदार्थ, खट्टी कडुवी ऐसी वस्तुओंके खानेसे कोपको प्राप्त भया जो पित्त सो अपने तीक्ष्ण द्रव पूति इत्यादि गुणोंसे रुधिरको बिगाडे तब रुधिर ऊपरके अथवा नीचेके मार्ग अथवा दोनों मार्ग होकर प्रवृत्त हो निकले ( ऊपरके मार्ग, नाक, नेत्र मुख इनके द्वारा निकले ) और अधोमार्ग कहिये लिंग गुदा और योनि इनके रास्ते होकर निकले और जब रुधिर अत्यन्त कुपित होय तब दोनों मार्ग और सब रोमछिद्रोंके द्वारा निकले हैं ॥ रक्तपित्तका पूर्वरूप । सदनं शीतकामित्वं कण्ठधूमायनं वमिः । लोहगन्धिश्च निश्वासो भवत्यस्मिन् भविष्यति ॥ ४ ॥ ग्लानि, शीतकी इच्छा, कण्ठसे धूआं निकलना, वमन और तपाये भये लोहेपर जल गेरनेसे जैसी गन्ध आवे ऐसी श्वास लेनेसे गन्धका आना जिस मनुष्यमें इतने लक्षण मिलते होयँ उसको जानना कि, इसके रक्तपित्त प्रगट होवेगा ॥ कफयुक्त रक्तपित्तके लक्षण । सान्द्रं सपाण्डु सस्नेहं पिच्छिलं च कफान्वितम् । सघन, कुछ पीला और कुछ चिकना तथा गाढा ऐसा रक्तपित्त कफमिश्रित जानना॥ वातिक रक्तपित्तके लक्षण । श्यावारुणं सफेनं च तनु रूक्षं च वातिकम् ॥ ५ ॥ नीलवर्ण, लालवर्ण, कुछ झागयुक्त, पतला और रूखा ऐसा रक्तपित्त वातका जानना ॥ पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण । रक्तपित्तं कषायाभं कृष्णं गोमूत्रसंनिभम् । मेचकागारधूमाभमञ्जनाभं च पैत्तिकम् ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ८४ ) माधवनिदान ।

( ८४ ) माधवनिदान । जो रक्तपित्त काढेके रंगसमान हो, काला, गौके मूत्र समान हो अथवा मोरकी चन्द्रिकाके समान नीलवर्ण अर्थात् बैंगनी रंगके सदृश होय, घरके धूएँके सुर्माके समान हो ये पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण हैं । शंका-क्यों जी ! केवल पैत्तिक रक्त- पित्त नहीं हो सके है । कारण इसका यह है कि, जैसे कफके रक्तपित्तका मार्ग कहा है इस प्रकार पैत्तिक रक्तपित्तका नहीं कहा ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु यह मार्ग जो कहा है सो वातकफके लक्षण प्रति नहीं कहा है ॥ द्विदोषजादि रक्तपित्तके लक्षण । संसृष्टलिङ्गं संसर्गात्त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् । ऊर्ध्वगं कफसंसृष्टमधोगं मारुतान्वितम् ॥ ७ ॥ द्विमार्गं कफवाताभ्यामुभाभ्यामनुवर्त्तते । दो दोषके मिलनेसे जो रक्तपित्त होता है उसमें दोनों दोषोंके लक्षण मिलनेसे द्विदोषज जानना और जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों उसको सन्निपातका रक्त पित्त जानना । ऊपरके मार्गसे कफका और नीचेके मार्ग होकर वातका और दोनों- मार्गोंसे जो रक्तपित्त निकले सो वात और कफ इन दोषोंसे प्रगट भया जानना ॥ ऊर्ध्वगादिकोंका साध्यासाध्यविचार । ऊर्ध्वं साध्यमधो याप्यमसाध्यं युगपद्द्रुतम् ॥ ८ ॥ ऊपरके मार्गसे लोही निकले सो साध्य है (क्योंकि कफसे प्रगट है सो कफके रक्तपित्तमें काथ तीखे रस कफपित्तके हरणकर्ता होते हैं ) और नीचेके मार्गसे जिसमें रुधिर गिरे सो याप्य ( साध्यासाध्य ) है इसका कारण यह है कि, पित्तके हरणमें विरेचन मुख्य है और इसपर वातपित्त शमन करनेवाला मधुररस प्रधान वमन देनेसे विरुद्धमार्गी होते हैं अर्थात् ( वेगमात्रका अवरोधक है परन्तु पित्तका हरण करनेवाला नहीं है ) और दोनों मार्गोंसे गिरनेवाला रक्तपित्त असाध्य है कारण इसपर विरुद्ध चिकित्सा करनी पडती है ॥ साध्य होनेके कारण । एकमार्गं बलवतो नातिवेगं नवोत्थितम् । रक्तपित्तं सुखे काले साध्यं स्यान्निरुपद्रवम् ॥ ९ ॥ बलवान् पुरुषके एक मार्ग अर्थात् ऊपरके मार्गसे जाता हो, अतिवेग नहीं हो, १-यदुक्तं चरके “ साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । विरेचनस्य योग्यत्वाद् बहुत्वाद् भेषजस्य च । विरेचनं हि पित्तस्य जयाय परमौषधम् ॥ ” इत्यादि । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ८५ ) नवीन प्रगट भया हो और हेमन्त शिशिर कालमें प्रगट भया हो और दुर्बलता आदि उपद्रवरहित हो ऐसा रक्तपित्त साध्य होता है ॥ दोषभेदसे साध्यासाध्य लक्षण । एकदोषानुगं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते । त्रिदोषजमसाध्यं स्यान्मन्दाग्नेरतिवेगितम् ॥ १० ॥ व्याधिभिः क्षीणदेहस्य वृद्धस्यानश्नतश्च यत् ॥ ११ ॥ एकदोषका रक्तपित्त साध्य है, द्विदोषका याप्य है और तीनों दोषोंका असाध्य है। मन्दाग्नि अतिवेगसे हो, रोगसे क्षीण देहवालेका, बूढ़े मनुष्यका और जिसका आहार थकगया हो ऐसे मनुष्योंका रक्तपित्त असाध्य होता है ॥ रक्तपित्तके उपद्रव । दौर्बल्यं श्वासकासज्वरवमथुमदाः पाण्डुता दाहमूर्च्छा भुक्ते घोरो विदाहस्त्वधृतिरपि सदा हृद्यतुल्या च पीडा । तृष्णा कोष्ठस्य भेदः शिरसि च तपनं पूतिनिष्ठीवनत्वं भक्तद्वेषाविपाकौ विकृतिरपि भवेद्रक्तपित्तोपसर्गाः ॥ १२ ॥ अशक्तता, श्वास, खांसी, ज्वर, वमन, धतूरेके फल खानेसे जैसी अवस्था हो ऐसी अवस्था, शरीरका पीला वर्ण होजाय, मूर्च्छा, अन्न खानेसे अत्यन्त दाह हो, अधीरपना, सर्वकाल हृदयमें विलक्षण पीडा, प्यास, कोष्ठभेद (अर्थात् मल पतला हो), मस्तकमें पीडा, दुर्गन्धयुक्त थूकना, अन्नमें अरुचि, आहारका परिपाक न होना ये रक्तपित्तके उपद्रव हैं और उसी प्रकार उस रक्तपित्तकी विकृति भी होय है सो आगे-“ मांसप्रक्षालनाभम् ” इत्यादि श्लोककरके कहते हैं ॥ असाध्य लक्षण । मांसप्रक्षालनाभं क्वथितमिव च यत्कर्द्दमाम्भोनिभं वा मेदःपूयास्रकल्पं यकृदिव यदि वा पक्वजम्बूफलाभम् । यत्कृष्णं यच्च नीलं भृशमतिकुणपं यत्र चोक्ता विकारा- स्तद्वर्ज्यं रक्तपित्तं सुरपतिधनुषा यच्च तुल्यं विभाति॥१३॥ जो रक्तपित्त मांस धोये हुए जलके समान हो अथवा सडे पानीके समान अथवा कीचके समान अथवा जलके समान; उसी प्रकार मेद, राध, रुधिर इनके समान अथवा कलेजेके टुकडेके समान अथवा पकी जामुनके समान किंवा काले रंगका किंवा नील कहिये पपैया पक्षीके पंखके समान जिसमें मुरदेकीसी बास आवे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( ८६ ) माधवनिदान ।

( ८६ ) माधवनिदान । और जिसमें पूर्वोक्त ( कहे ) श्वासकासादि विकार युक्त हों ऐसा रक्तपित्त वर्जित है और जो रक्तपित्त इन्द्रधनुषके वर्ण समान रंगवाला हो सो भी त्याज्य है अर्थात् ऐसे रक्तपित्तकी वैद्य चिकित्सा न करे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । येन चोपहतो रक्तं रक्तपित्तेन मानवः । पश्येद दृश्यं वियच्चापि तच्चासाध्यमसंशयम् ॥ १४ ॥ जिस रक्तपित्तने मनुष्यको ग्रस लिया होय वह दृश्य ( घटपटादि ) और वियत ( आकाश ) इनको रक्तवर्णका देखे वह रोगी निःसन्देह असाध्य जानना ॥ लोहितं छर्दयेद्यस्तु बहुशो लोहितेक्षणः । लोहितोद्गारदर्शी च म्रियते रक्तपैत्तिकः ॥ १५ ॥ दूसरे असाध्य लक्षण-जो वारंवार रुधिरकी वमन करे और जिसके लाल नेत्र होयँ तथा डकार भी लाल आवे वह रक्तपित्तवाला रोगी मरजावे ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायां रक्तपित्तनिदानं समाप्तम् ॥ अथ राजयक्ष्मनिदानम् । —⁘⁘⁘⁘— वेगरोधात् क्षयाच्चैव साहसाद्विषमाशनात् । त्रिदोषो जायते यक्ष्मा गदो हेतुचतुष्टयात् ॥ १ ॥ वात, मूत्र, पुरीष आदि वेगोंके रोकनेसे, अतिमैथुन, उपवास, ईर्ष्या, खेद इत्यादिक धातुक्षयके कारणोंसे, बलवान्से वैर करनेसे, विषमाशन कहिये कुस- मय थोडा अथवा बहुत भोजन करनेसे इन चार कारणोंसे तीनों दोषोंके कोपसे मनुष्यके राजयक्ष्मा रोग होता है । वेगका रोकना ही वातकोपका कारण है, यह सत्य है तथापि वातकोपसे अग्नि दुष्ट होकर कफपित्तका कोप होता है, इन चार हेतुओंमें असंख्य हेतुओंका अन्तर्भाव होता है. रसादि धातुओंके शोषणे (सुखाने) से इस रोगको ( शोष ) कहते हैं तथा शरीरमें पाचनादि सर्व क्रियाओंको क्षय करे है इसीसे इस रोगको ( क्षय ) कहते हैं और राजा ( चन्द्र ) इस रोगसे अतिपीडित भया इसीसे इसको ( राजयक्ष्मा ) कहते हैं । यह सुश्रुतका १ संशोषणाद्रसादीनां शोष इत्यभिधीयते । क्रियाक्षयकरत्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ॥ राज्ञश्चन्द्रमसो यस्मादभूदेष किलामयः । तस्मात्तं राजयक्ष्मेति केचिदाहुर्मनीषिणः ॥ इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( ८७ ) आशय है और वाग्भटने इसको सर्व रोगोंका राजा कहा है इसीसे इसको राजयक्ष्मा नाम कहा है । इस श्लोकमें जो कहा है कि, त्रिदोषका एक ही यक्ष्मा रोग प्रगट होता है उसका तात्पर्य यह है कि, तीनों दोषोंके कारणभेदसे अनेक प्रकारका नहीं है सो सुश्रुतमें कहा भी है और इस श्लोकमें “वेगरोधात्” इस पदमें केवल वात, मूत्र, मल इनका ही ग्रहण करना चाहिये, श्रमादिक सबोंका ग्रहण नहीं है, सो चरकमें लिखा है ॥ राजयक्ष्माकी विशिष्टसंप्राप्ति । कफप्रधानैर्दोषैस्तु रुद्धेषु रसवर्त्मसु । अतिव्यवायिनो वापि क्षीणे रेतस्यनन्तराः ॥ क्षीयन्ते धातवः सर्वे ततः शुष्यति मानवः ॥ २ ॥ कफ है प्रधान जिनमें ऐसे जो वातादि दोष तिन करके रसके बहनेवाली नाडि- योंके मार्ग रुक जानेसे (इससे यह सूचना करी कि, रसमार्ग बन्द होनेसे हृदयमें स्थित जो रस उसको बिगाड और उसी स्थानमें विकृति कहिये और प्रकारका स्वरूप करके खांसीके वेगसे मुखमार्ग होकर निकाले) सो चरकमें लिखा भी है । (इससे अनुलोमक्षयं दिखाय अब प्रतिलोमक्षय कैसा होता है उसको कहते हैं-) अथवा अतिमैथुन करनेसे मनुष्यका वीर्य क्षीण होता है, जब शुक्र क्षीण होजाय तब समीपकी धातु क्षीण होयं तब पुरुष सूखने लगता है, जैसे शुक्र क्षीणके अनन्तर मज्जा क्षीण होय, मज्जा क्षीणके अनन्तर हड्डी क्षीण होयं ऐसे पूर्वपूर्व धातु क्षीण हो जायं । शंका--क्यों जी ! रस, रुधिर, मांस, मेदा, हड्डी, मज्जा, शुक्र इनमें क्रमसे प्रत्येक क्षीण होनेसे शुक्रका क्षय होना उचित है, परन्तु कार्यभूत शुक्रका क्षय होनेसे कारणभूत धातुओंका नाश कैसे होता है ? उत्तर--जब शुक्रका क्षय होता है तब वात कुपित होता है, सो तन्त्रान्तरोंमें लिखा है अर्थात् धातुके नष्ट होनेसे पवनको बहनेवाली नाडियोंका मार्ग बन्द होकर वायुको कुपित करे तब वही पवन समीपकी मज्जा धातुको सुखावे तदनंतर हड्डी और उसके पश्चात् मेदा इसी रीतिसे रसपर्यंत धातुओंको सुखावे है, इस जगहपर दृष्टान्त है-जैसे अग्निमें तपायभया लोहका गोला गीली पृथ्वीमें धरनेसे प्रथम समीपकी पृथ्वीके आर्द्रपनेको शोषण करे पीछे दूरका गीलापन शोषण करे उसी रीतिसे यहां जानना चाहिये ॥ १ “एक एव मतः शोषः स.त्रिपातात्मको यतः । उद्रेकात्तत्र लिंगानि दोषाणां निर्मितानि हि॥” इति । २ “ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् । वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः॥” इत्यादि । ३ रससे रुधिर, रुधिरसे मांस, इसी रीतिसे शुक्रपर्यंत धातुओंका क्षय हो सो । ४शुक्रसे रसपर्यंत धातुओंका शोष हो सो। ५ “वायोर्धातुक्षयात् कोपो मार्गस्यावरणेन च” इति॥