माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । ( १८७) वातकी पथरीके लक्षण । तत्र वाताद् भृशं चार्तो दन्तान्खादति वेपते । मथ्नाति मेहनं नाभिं पीडयत्यनिशं क्वणन् ॥ ६ ॥ सानिलं मुञ्चति शकृन्मुहुर्मेहति बिन्दुशः । श्यावा रूक्षाऽश्मरी चास्य स्याच्चिता कण्टकैरिव ॥ ७ ॥ वायुकी पथरीसे रोगी अत्यन्त पीडा करके व्याप्त होय, दांतोंको चबावे, कांपे, लिंगको हाथसे रगडे, नाभिको रगडे और रातदिन दुःखसे रोवे और मूत्र आनेके समय पीडा होनेके कारण अधोवायुका परित्याग करे, मूत्र वारम्वार टपक २ गिरे, उसके पथरीका रंग नीला और रूखा होय, उसके ऊपर कांटे होयँ ॥ पित्तकी पथरीके लक्षण । पित्तेन दह्यते बस्तिः पच्यमान इवोष्मवान् । भल्लातकास्थिसंस्थाना रक्ता पीता सिताऽश्मरी ॥ ८ ॥ पित्तकी पथरीके रोगीके बस्तिमें दाह होवे और क्षारसे जैसा दाह होय ऐसी वेदना होय, बस्तिके ऊपर हाथ धरनेसे गरम मालूम होय और भिलावेकी मींगीके समान होय, लाल, पीली, काली होय ॥ कफकी पथरीके लक्षण । बस्तिर्निस्तुद्यत इव श्लेष्मणा शीतलो गुरुः । अश्मरी महती श्लक्ष्णा मधुवर्णाथवा सिता ॥ ९ ॥ कफकी पथरीसे वस्तिमें सुई चुभनेकीसी पीडा होय, शीतलपना होय और पथरी बडी मुर्गीके अण्डेसमान, चिकनी और मद्य ( दारू ) के रंगकीसी अर्थात् कुछ पीली सफेद हुईसी होय ॥ यह कफकी पथरी बहुधा बालकोंके होती हैं सो कहे हैं- एता भवन्ति बालानामेषामेव च भूयसा । आश्रयोपच्याल्पत्वादग्रहणाहरणे सुखा ॥ १० ॥ पूर्वोक्त त्रिदोषज अश्मरी ( पथरी ) विशेषकरके बालकोंके होती है, भूयसा इस षद्के कहनेसे त्रिदोषज अश्मरी बालकोंके अतिरिक्त वडोंके भी होती है, कारण उनका भारी मीठा शीतल चिकना आहार है और उनकी वस्ति छोटी तथा पुष्टता थोडी होय है, इसीसे वैद्योंको उसका चीरना फाडना काटना निकालना कठिन नहीं होय सो सुश्रुतने भी कहा है ॥
( १८८ ) माधवनिदान ।
( १८८ ) माधवनिदान । शुक्राश्मरीके लक्षण । शुक्राश्मरी तु महतां जायते शुक्रधारणात् ॥ ११ ॥ स्थाना- च्च्युतममुक्तं हि मुष्कयोरन्तरेऽनिलः । शोषयत्युपसंहृत्य शुक्रं तच्छुष्कमश्मरी ॥ १२ ॥ बस्तिरुक्कूच्छ्रमूत्रत्वं मुष्क- श्वयथुकारिणी । तस्यामुत्पन्नमात्रायां शुक्रमेति विली- यते ॥ १३ ॥ पीडिते त्ववकाशोऽस्मिन्नश्मर्येव च शर्करा । शुक्राश्मरी पथरी यह शुक्र ( वीर्य ) के रोकनेसे बडे मनुष्योंको ही होती है । मैथुन करनेके समय अपने स्थानसे चलायमान होगया वह वीर्य उस समय मैथुन न करे तब शुक्र (वीर्य) बाहर नहीं निकले, भीतर ही रहे तब वायु उस शुक्रको उठाकर सुखा देता है। उसीको शुक्रजाश्मरी कहते हैं। इस करिके अंडकोषोंमें सूजन, वस्तिमें पीडा और मूत्रकृच्छ्रता होती है। शुक्राश्मरीकी आदिमें लिंग और अंडकोष पेडु इनमें पीडा होती है। वीर्यके नाश होनेके कारण पथरीकी नाईं शर्करा उत्पन्न होती है ॥ पथरीशर्कराके उपद्रव । अणुशो वायुना भिन्ना सा तस्मिन्ननुलोमगे ॥ १४ ॥ निरेति सह मूत्रेण प्रतिलोमे विबध्यते । मूत्रस्रोतःप्रवृत्ता सा सक्ता कुर्यादुपद्रवान् ॥ १५ ॥ दौर्बल्यं सदनं कार्श्यं कुक्षिशूल- मथारुचिम् । पाण्डुत्वमुष्णवातं च तृष्णां हृत्पीडनं वमिम् ॥ १६॥ वायु बस्तिमें अनुलोमगतिसे प्रवेश होय तौ वह शर्करा वायुकरके छोटी २ इकट्ठी होकर मूत्रके साथ बाहर निकले, और यदि वायु प्रतिलोम होय तो मूत्रमार्गको रोक दे, यदि मूत्रमार्गमें प्राप्त होय तो मूत्रके बहनेवाले छिद्रोंको रोक दे, फिर इतने उपद्रवोंको प्रगट करे । दुर्बलता, ग्लानि, कृशता, कूखमें शूल, अरुचि, पाण्डुरोग, उष्णवात, प्यास, हृदयमें पीडा, वमन ये सब उपद्रव होयँ ॥ असाध्य लक्षण । प्रशूननाभिवृषणं बद्धमूत्रं रुजान्वितम् । अश्मरी क्षपयत्याशु शर्करा सिकतान्विता ॥ १७ ॥ जिसकी नाभि और वृषण सूजजाय, मूत्र उतरे नहीं, शूलसे पीडित होय ऐसे पुरुषके शर्करा और सिकतायुक्त पथरी प्राणनाश करै ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनिमाथुरीभाषा- टीकायामश्मरीनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
माधवनिदानम् ।
ॐ श्रीशं वन्दे । 189 माधवनिदानम् । भाषाटीकासमेतम् । उत्तर भाग । अथ प्रमेहनिदानम् । आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि । नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ १ ॥ बैठनेके सुखसे, निद्राके सुखसे अथवा स्वप्नसुख कहिये स्वप्नमें स्त्रीप्रसंग आदि सुखसे, दही, ग्रामके संचारी जीव भेड बकरी आदि, जलके संचारी जीव मच्छी कछुआ आदि, अनूप ( जलसमीप ) के रहनेवाले जीव हंस चकवा आदि प्राणियोंके मांसरस, दूध, नया अन्न और नया जल तथा शर्करा आदि गुडके पदार्थ अथवा गुडके विकार ये और जितने कफकारक पदार्थ हैं सो सब प्रमेह होनेके कारण हैं ॥ कफपित्तवातप्रमेहोंकी क्रमसे सम्प्राप्ति । मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतः प्रदूष्य । करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ २ ॥ क्षीनेषु दोषेष्ववकृष्य धातून्संदूष्य मेहान्कुरुतेऽनिलश्च । साध्याः कफोत्था दश पित्तजाः षड् याप्या न साध्याः पवनाच्चतुष्काः॥ समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ३ ॥ बस्ति ( मूत्रस्थान ) गत कफ मेद मांस और शरीरके क्लेदको बिगाडकर प्रमे- हको उत्पन्न करे है, उसी प्रकार गरम पदार्थसे पित्त कुपित होकर पूर्वोक्त मेद मांसको बिगाडकर प्रमेहको उत्पन्न करे है और लंघन रूक्षादि पदार्थोंके सेवनसे कुपित भया वायु दोष ( पित्तकफ ) के क्षीण होनेसे धातु ( वसा मज्जा ओज लसीका ) को ईंचकर वस्तिके मुखपर लाकर प्रमेहको प्रगट करे है । कफसे प्रगट दश प्रमेह साध्य हैं । कारण इसका यह है कि, कफ दोष और मेदःप्रभृति दूष्य इनपर कटुतिक्तादि क्रिया समान है अर्थात् कटु तिक्तादिकोंसे विकृत कफ तथा मेद मांसादि शांत होते हैं । इस रोगमें रोगका ही प्रभाव ऐसा है कि, इसमें तुल्यं दूष्यको साध्य कहा है और प्रमेहके बिना और रोगोंको अतुल्य ( असमान १ ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता । रक्तगुल्मे पुरातनत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥
( १९० ) माधवनिदान ।
( १९० ) माधवनिदान । दूष्यत्व साध्य ) का हेतु होय है । पित्तकी छः प्रमेह विषम चिकित्सा करनेसे याप्य होय हैं अर्थात् पित्त हरण करनेवाले जो शीत मधुर आदि द्रव्य वह मेदको बढाने- वाले हैं और मेद हरणकर्त्ता उष्ण कटुकादि द्रव्य वह पित्तकर्त्ता है ऐसी क्रिया विषम है। वादीसे प्रगट चार प्रमेह मज्जादि गम्भीर धातुके आकर्षण करनेसे अत्यन्त पीडा कर्त्ता है और इनकी ( महात्यय ) बडी कठिन क्रिया है । कोई कोई चकारसे विषमक्रिया ही कहते हैं इसीसे ये चार असाध्य हैं ॥ प्रमेहका दोषदूष्यसंग्रह । कफः सपित्तं पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः । मज्जारसौजः पिशितं च दूष्याः प्रमेहिनां विंशतिरेव मेहाः ॥ ४ ॥ कफ पित्त और वादी ये दोष और मेद रुधिर शुक्र जल मांस स्नेह ( चर्बी) लसीका ( मांसका जल ) मज्जारस ओज और मांस ये दूष्य जानने । इन दोष और दूष्य दोनोंसे बीस प्रकारके प्रमेह होते हैं ॥ प्रमेहका पूर्वरूप । दन्तादीनां मलाढ्यत्वं प्राग्रूपं पाणिपादयोः । दाहश्चिक्कणता देहे तृट्श्वासश्चोपजायते ॥ ५ ॥ दांतोंमें आदिशब्दसे जिह्वा तालु आदिका ग्रहण जानना इनमें मैल बहुत रहे, हाथ पैरमें दाह, अङ्गका चिकनापना, प्यास, श्वास, चकारसे केशों ( बालों ) का आपसमें लिपट जाना और नखोंका बढना ये प्रमेहके पूर्वरूप होते हैं ॥ सामान्य लक्षण । सामान्यं लक्षणं तेषां प्रभूताविलमूत्रता ॥ ६ ॥ बहुत और गाढा मूत्र उतरे ये प्रमेहके सामान्य लक्षण हैं। प्रमेहके कारण । दोषदूष्यविशेषेऽपि तत्संयोगविशेषतः । मूत्रवर्णादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्प्यते ॥ ७ ॥ दोष और दूष्य इनके भेद न होनेसे परन्तु दोष और दूष्य इनके संयोगभेदसे मूत्र वर्णादि भेद करके प्रमेहमें भेद होते हैं । दश छः चार इत्यादिक दोष ( वात पित्त कफ ) दूष्य ( मांस मेद मज्जादि ) जैसे सफेद पीला काला तांबेके रंगका और श्याम इन पांच रंगोंके संयोग करनेसे पिंगल पाटलादि अनेक वर्णभेद होते हैं इसी प्रकार दोषादिकोंके संयोगसे नानाप्रकारके प्रमेह होते हैं ॥ १ यत्तु मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकासञ्ज्ञं लभते ।
भाषाटीकासमेत । ( १९१ ) संयोग भेदकी कैसे प्रतीति हो ऐसे कोई पूछे तो उसके वास्ते कहते हैं-मूत्रके वर्णादिभेदसे समान कारणोंके भेद कल्पना करने चाहिये जैसे-घट (घडा) बनानेके समय मृत्तिकादि कारण सामग्रीमें भेद नहीं है परन्तु कुम्भकारादि (कुम्हार आदि) प्रयत्नभेद करके घडा सरवा मटकना आदि अनेक जातिभेद हो जाते हैं और यह तो तत्तत् (उन उन) आहारादिकोंका जो अदृष्ट फल है वेही संयोगभेदके हेतु हैं ॥ कफकी १० प्रमेहके लक्षण । अच्छं बहु सितं शीतं निर्गन्धमुदकोपमम् । मेहत्युदकमेहेन किंचिदाविलपिच्छिलम् ॥ ८ ॥ इक्षो रसमिवात्यर्थं मधुरं चेक्षु- मेहतः। सान्द्रीभवेत्पर्युषितं सान्द्रमेहेन मेहति ॥९॥ सुरामेही सुरातुल्यमुपर्यच्छमधो घनम् । संहृष्टरोमा पिष्टेन पिष्टवद्ब- हुलं सितम्॥१०॥ शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा शुक्रमेही प्रमेहति । मूत्राणूसिकतामेही सिकतारूपिणो मलान्॥११॥ शीतमेही सुबहुशो मधुरं भृशशीतलम् । शनैः शनैः शनैर्मेही मन्दं मन्दं प्रमेहति ॥ लालातन्तुयुतं मूत्रं लालामेहेन पिच्छिलम् ॥ १२ ॥ १-उदकप्रमेहकरके स्वच्छ बहुत सफेद शीतल गन्धरहित पानीके समान कुछ गाढा और चिकना मूते है। २-इक्षुप्रमेहसे ईखके रससमान अत्यन्त मीठा ऐसा मूत्र होय । ३-सांद्रप्रमेहसे रात्रिमें पात्रमें धरनेसे जैसा होवे ऐसा मूत्र होय । ४-सुरा- प्रमेहसे-दारूके समान ऊपर निर्मल और नीचे गाढा ऐसा मूते । ५-पिष्टप्रमेहसे पिसे चावलोंके पानीसमान सफेद और बहुत मूते तथा मूतते समय रोमांच होय । ६-शुक्रप्रमेहसे शुक्र (वीर्य) के समान अथवा शुक्रमिला मूत्र होय । ७-सिकता- मेहसे मूत्रके कण और बालूरेतके समान मलके रवा गिरे । ८-शीतमेहसे मधुर तथा अत्यन्त शीतल ऐसा बारबार बहुत मूते । ९-शनैर्मेहसे धीरे २ और मन्द मन्द मूते । १०-लालाप्रमेहसे लारके समान तारयुक्त और चिकना मूत्र होय है ॥ पित्तकी ६ प्रमेहकं लक्षण । गन्धवर्णरसस्पर्शैः क्षारेण क्षारतोयवत् ॥ १३ ॥ नीलमेहेन नीलाभं कालमेही मषीनिभम् । हारिद्रमेही कटुकं हरिद्रा- सन्निभं दहेत् ॥ १४ ॥ विस्रं माञ्जिष्ठमेहेन मञ्जिष्ठासलिलोप- मम् । विस्रमुष्णं सलवणं रक्ताभं रक्तमेहतः ॥ १५ ॥ ११-क्षारप्रमेहसे खारी जलके समान गन्ध वर्ण रस और स्पर्श ऐसा मूत्र होता है । १२-नीलप्रमेहसे नीले रंगका अर्थात् पपैया पक्षीके पंखके सदृश मूते ।
( १९२ ) माधवनिदान ।
( १९२ ) माधवनिदान । १३-कालप्रमेहसे स्याईके समान काला मूते । १४-हारिद्रप्रमेहसे तीक्ष्ण हल्दीके समान और दाहयुक्त मूते। १५-मांञ्जिष्ठप्रमेहसे आम दुर्गंध और मंजीठके समान मूते । १६-रक्तप्रमेहसे दुर्गंधयुक्त गरम खारी और रुधिरके समान लाल मूत्र करे ॥ वातकी ४ प्रमेहके लक्षण । वसामेही वसामिश्रं वसाभं मूत्रयेन्मुहुः । मज्जाभं मज्जामिश्रं वा मज्जमेही मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥ कषायमधुरं रूक्षं क्षौद्रमेहं वदेद् बुधः । हस्ती मत्त इवाजस्रं मूत्रं वेगविवर्जितम् ॥ साल- सीकं विबद्धं च हस्तिमेही प्रमेहति ॥ १७ ॥ १७-वसाप्रमेही वसा ( चर्बी ) युक्त अथवा वसाके समान मूते । १८-मज्जा- प्रमेही मज्जाके समान अथवा मज्जा मिला बारम्बार मूते । १९-क्षौद्रप्रमेही कसैला मीठा और चिकना ऐसा मूते । २०-हस्तिममेही मस्त हाथीके समान निरन्तर वेग- रहित जिसमें तार निकले और ठहर ठहरके मूते ॥ कफप्रमेहके उपद्रव । अविपाकोऽरुचिश्छर्दिर्ज्वरः कासः सपीनसः । उपद्रवाः प्रजायन्ते मेहानां कफजन्मनाम् ॥ १८ ॥ अन्नका परिपाक न होय, अरुचि, वमन, ज्वर, खांसी, पीनस ये कफप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ पित्तप्रमेहके उपद्रव । बस्तिमेहनयोः शूलं मुष्कावदरणं ज्वरः । दाहस्तृष्णाम्लिकामूर्च्छा विड्भेदः पित्तजन्मनाम् ॥ १९ ॥ बस्ति और लिंगमें पीडा होय, अण्डकोशोंका पककर फटना, ज्वर, प्यास, खट्टी डकार, मूर्च्छा और पतला दस्त होय ये पित्तप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ वातप्रमेहके उपद्रव । वातजानामुदावर्तकण्ठहृद्ग्रहलोलताः । शूलमुन्निद्रता शोषः कासः श्वासश्च जायते ॥ २० ॥ उदावर्त, गला, हृदय इनका रुकना, लोलता ( सर्वरसभक्षणेच्छा ), शूल, निद्रा- नाश, शोष, सूखी खांसी, श्वास ये वातप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १९३ ) प्रमेहके असाध्य लक्षण । यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रस्रुतमेव च । पिडिकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥ २१ ॥ ऊपर कहि आये अविपाकादि उपद्रव वे सब होंय, जिसके मूत्रका स्राव बहुत हुआ होय, शराविका आदि जो पिडिका आगे कहेंगे वे होंयँ, रोगका अंगमें प्रवेश होय ऐसे लक्षण होनेसे वह प्रमेह मनुष्यको मार डाले ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । जातः प्रमेही मधुमेहिनो वा न साध्यरोगः स हि बीजदोषात् । मधुमेही पुरुषसे उत्पन्न भया जो प्रमेहवान् पुरुषका रोग वह बीजदोषके कार- णसे साध्य नहीं होय । इस जगह मधुमेहशब्दसे साधारण प्रमेह जानना । इस जगह भी मधुकोशटीकावालेने मधुमेहशब्दपर बहुतसा शास्त्रार्थ लिखा है ॥ कुलपरंपरागत अन्यविकारोंका असाध्यत्व कहते हैं- ये चापिकेचित्कुलजा विकाराभवन्ति तांस्तान्प्रवदन्त्यसाध्यान्॥२२ जो कोई कुष्ठादिक कुलपरंपरागत विकार हैं वे सब असाध्य हैं ॥ सर्व प्रमेहकी उपेक्षा करनेसे मधुमेह होता है, उसको कहते हैं- सर्व एव प्रमेहास्तु कालेनाप्रतिकारिणः । मधुमेहत्वमायान्ति तदाऽसाध्या भवन्ति हि ॥ २३ ॥ सब प्रमेह औषधके विना काल करके मधुमेहत्वको प्राप्त होते हैं, तब वे असाध्य हो जाते हैं । धातुक्षय और आवरण इनसे कुपित भयी वायु मधुमेहका हेतु होती है॥ मधुमेहे मधुसमं जायते स किल द्विधा । क्रुद्धे धातुक्षयाद्वायौ दोषावृतपथेऽथवा ॥ २४ ॥ मधुमेहमें मूत्र मधु ( शहद ) के समान होय है, सो दो प्रकारका है, एक जो धातुक्षय होनेसे वायु कुपित होकर होय और दूसरा दोषों करके पवनका मार्ग आवृत ( ढकने ) करके होय है ॥ आवरणके लक्षण । आवृत्तो दोषलिङ्गानि सोऽनिमित्तं प्रदर्शयन् । क्षीणः क्षणात्पुनः पूर्णो भजते कृच्छ्रसाध्यताम् ॥ २५ ॥ आवृत वायुसे प्रगट मधुमेह जिस पित्तादि दोष करके आच्छादित होय उसके लक्षण अकस्मात् दीखें, क्षणभरमें क्षीण होय, क्षणमें पूर्ण होय वह कष्टसाध्य जानना॥ ८ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १९४ ) माधवनिदान ।
( १९४ ) माधवनिदान । मधुमेहशब्दकी प्रवृत्ति विषय निमित्त । मधुरं यच्च मेहेषु प्रायो मध्विव मेहति । सर्वेऽपि मधुमेहाख्या माधुर्याच्च तनोरतः ॥ २६ ॥ प्रमेहोंमें रोगी प्रायशः मधु ( शहद ) के समान मीठा मूते और सब शरीरको मीठा करदे इसीसे सर्व प्रमेहको मधुमेह संज्ञा दीनी है और अमृतसागरमें जो छः प्रमेह आत्रेयके मतसे लिखे हैं वे प्रमाणरहित हैं और प्रसिद्धमें भी प्रमेह बीस प्रका- रके हैं इसीसे हमने छोडदीने हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां प्रमेहनिदानं समाप्तम् ॥ अथ प्रमेहपिडिकानिदानम् । शराविका कच्छपिका जालनी विनताऽलजी । मसूरिका सर्षपिका पुत्रिणी सविदारिका ॥ १ ॥ विद्रधिश्चेति पिडिकाः प्रमेहोपेक्षया दश । सन्धिमर्मसु जायन्ते मांसलेषु च धामसु ॥२॥ प्रमेहकी उपेक्षा करनेसे शराविकादि दश पिडिका सन्धि मर्म और मांसल ठिकानोंमें होती हैं ॥ सबके लक्षण । अन्तोन्नता च तद्रूपा निम्नमध्या शराविका । सदाहा कूर्मसं- स्थाना ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ॥ ३ ॥ जालनी तीव्रदाहा तु मांसजालसमावृता । अवगाढरुजोत्क्लेदा पृष्ठे वाप्युदरेऽपि वा ॥ ४ ॥ महती पिडिका नीला सा बुधैर्विनता स्मृता । रक्ता सिता स्फोटवती दारुणा त्वलजी भवेत् ॥ ५ ॥ मसूरदल- संस्थाना विज्ञेया तु मसूरिका । गौरसर्षपसंस्थाना तत्प्रमाणा च सर्षपी ॥६॥ महत्यल्पचिता ज्ञेया पिडिका चापि पुत्रिणी । विदारीकन्दवद्वृत्ता कठिना च विदारिका ॥ विद्रधेर्लक्षणैर्युक्ता ज्ञेया विद्रधिका तु सा ॥ ७ ॥ १ शराविका-यही पिटिका ऊपरके भागमें ऊंची और मध्यमें बैठीसी होय जैसा मिट्टीका शराव होय है ऐसी होय है । २ कच्छपिका-ये कछुएके पीठके समान
भाषाटीकासमेत । ( १९५ ) कुछ दाहयुक्त ऐसी होय है । ३ जालनी-ये तीव्र दाहकरके संयुक्त और मांसके जालसे व्याप्त होय है । ४ विनता-ये फुन्सी पीठमें अथवा पेटमें होय है इसकी पीडा बहुत होय, ठंडी होय तथा बडी और नीले रंगकी होय है । ५ अलजी-लाल काली बारीक फोडोंकरके व्याप्त भयंकर होय है। ६ मसूरिका-मसूरकी दालके समान बडी होय है। ७ सर्षपिका-सफेद सरसोंके समान बडी होय है। ८ पुत्रिणी-ये बीचमें एक बडी फुन्सी होय उसके चारों ओर छोटी २ फुन्सी और होय उसको पुत्रिणी कहते हैं । ९ विदारिका-यह विदारीकंदके समान गोल और करडी होय है । १० विद्रधिका-यह विद्रधिके लक्षण करके युक्त होय है । भोज और सुश्रुतके मतसे नौ पिडिका हैं और चरकके मतसे सात ही हैं ॥ पिटिकाकी उत्पत्ति । ये यन्मयाः स्मृता मेहास्तेषामेतास्तु तन्मयाः ॥ ८ ॥ विना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः । तावच्चैता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपरिग्रहः ॥ ९ ॥ जो प्रमेह जिस दोषकरके उल्बण होय है तिसकरके तिसी दोषके उल्बणकरके पिटिका होती है। ये पिटिका प्रमेहके विना दुष्ट मेदके होनेसे भी प्रगट होती है। जब- तक इनकी गांठ नहीं बन्धे तबतक नहीं दीखें । 'ये यन्मयाः स्मृता मेहाः' इस पदके ऊपर मधुकोशवालेने शास्त्रार्थ लिखा है, ग्रन्थ बढनेके भयसे हमने नहीं लिखा ॥ असाध्यपिटिकाके लक्षण । गुदे हृदि शिरस्यंसे पृष्ठे मर्मसु चोत्थिताः । सोपद्रवा दुर्बलाग्नेः पिडिकाः परिवर्जयेत् ॥ १० ॥ गुदामें हृदयमें शिरमें कन्धेमें पीठमें और मर्मस्थानमें उठी पिटिका और उप- द्रवयुक्त हो तथा दुर्बलाग्नि पुरुषकी पिटिका त्याज्य है । पिटिकाके उपद्रव चरकने कहे हैं सो इस प्रकार-"तृट्कासमांससंकोचमोहहिक्कामदज्वराः । विसर्पमर्मसंरोधाः पिटिकानामुपद्रवाः ॥" इसका अर्थ सुगम है इसीसे नहीं लिखा । शंका-क्यों जी ! स्त्रियोंको प्रमेह क्यों नहीं होय ? उत्तर-इसका कारण और ग्रन्थोंमें इस प्रकार लिखा है-" रजःप्रसेकान्नारीणां मासि मासि विशुध्यति । कृत्स्नं शरीरं दोषाश्च न प्रमेहन्त्यत स्त्रियः ॥ " स्त्रियोंके महीनेके महीने रज बहा करै है इसीसे सर्व देह और दोष शुद्ध होते हैं इसीसे स्त्रियोंको प्रमेह होना कहीं नहीं देखा, यह भी एक बलवान् कारण है और सोमादिक रोग होते हैं। कदाचित कोई कहे कि और रोगका होना CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १९६ ) माधवनिदान ।
( १९६ ) माधवनिदान ।
असम्भव है तो यह केवल झगडेका स्थान है, इसका किसीने यथार्थ निर्णय नहीं करा । प्रमेहनिवृत्तिके लक्षण सुश्रुतमें कहे हैं, यथा- " प्रमेहिणो यदा मूत्रमनाविल- मपिच्छिलम् । विशदं कटु तिक्तं च तदारोग्यं प्रचक्षते ॥ " इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां प्रमेहपिटिकानिदानं समाप्तम् ॥
अथ मेदोनिदानम् ।
मेदका कारण और सम्प्राप्ति । अव्यायामदिवास्वप्नश्लेष्मलाहारसेविनः । मधुरोऽन्नरसः प्रायः स्नेहान्मेदो विवर्द्धते ॥ १ ॥ मेदसाऽऽवृतमार्गत्वात्पुष्यन्त्यन्ये न धातवः । मेदस्तु चीयते यस्मादशक्तः सर्वकर्मसु ॥ २ ॥ दंड कसरतके न करनेसे, दिनमें सोनेसे और कफकारक पदार्थोंके सेवन करनेसे ऐसी रीतिसे वर्त्तनेवाले पुरुषका अन्नरस केवल मधुर कहिये आमरूप हो स्नेहकरके मेदको बढावे । मेद करके मार्ग बन्द होनेसे अन्य धातु ( हाड मज्जा वीर्य आदि ) पुष्ट नहीं होते और मेद बढे तब वह पुरुष सर्व कर्म करनेको अशक्त होय ॥ मेदस्वीपुरुषके लक्षण । क्षुद्रश्वासतृषामोहास्वप्रक्रथनसादनैः । युक्तः क्षुत्स्वेददुर्गन्धै- रल्पप्राणोऽल्पमैथुनः ॥ ३ ॥ मेदस्तु सर्वभूतानामुदरेष्वस्थिषु स्थितम् । अत एवोदरे वृद्धिः प्रायो मेदस्विनो भवेत् ॥ ४ ॥ क्षुद्र श्वास " रूक्षायासोद्भवः " इत्यादि पिछाडी कहि आये सो तृषा मोह निद्रा अकस्मात् श्वासका रोग अंगग्लानि भूख पसीना और दुर्गन्धि इन लक्षणों- करके वह पुरुष युक्त होय, उसकी शक्ति घटजाय और मैथुन करनेमें उत्साह न होय । मेद यह सब प्राणिमात्रोंके उदर और हड्डियोंमें रहे इसीसे मेदवाले पुरुषका पेट बढा करता है ॥ मेदस्वीकी अवस्थाविशेष । मेदसावृतमार्गत्वाद्वायुः कोष्ठे विशेषतः । चरन्संधुक्षयत्यग्नि- माहारं शोषयत्यपि ॥ ५ ॥ तस्मात्स शीघ्रं जरयत्याहारं
भाषाटीकासमेत । ( १९७ ) चापि कांक्षति । विकारांश्चाश्नुते घोरान्कांश्चित्कालव्यति- क्रमात् ॥ ६ ॥ एतावुद्रवकरौ विशेषादग्निमारुतौ । एतौ हि दहतः स्थूलं वनं दावानलो यथा ॥ ७ ॥ मेदसे मार्ग रुकजानेसे कोठेमें पवनका सञ्चार विशेष होय तब अग्निको यह पवन बढावे, भोजनकिये आहारको तुरन्त शोषण करे, तब वह आहार शीघ्र पच कर फिर भोजनकी इच्छाको प्रगट करे और भोजन करनेमें कालका व्यतिक्रम होनेसे भयंकर वातके रोग उत्पन्न होय । यह अग्नि और वायु बडा उपद्रव करै है, जैसे दावानल (वन अग्नि) वनको जलावै है उसी प्रकार ये दोनों उस स्थूल (मोटे) पुरुषको जलाती है ॥ अत्यन्त मेद बढनेका परिणाम । मेदस्यतीव संवृद्धे सहसैवानिलादयः । विकारान्दारुणान्कृत्वा नाशयन्त्याशु जीवितम् ॥ ८ ॥ मेद अत्यन्त बढनेसे वायु आदि ये अकस्मात् भयंकर विकार (प्रमेह पिटिका ज्वर भगन्दर विद्रधि वातरोग इत्यादि) उत्पन्न करके शीघ्रही जीवनका नाश करें ॥ स्थूललक्षण । मेदोमांसातिवृद्धत्वाच्चलस्फिगुदरस्तनः । अयथोपचयोत्साहो नरोऽतिस्थूल उच्यते ॥ ९ ॥ मेद और मांस ये अत्यन्त बढनेसे जिस पुरुषके कूले पेट और स्तन ये थलथल हले और उसके शरीरकी स्थूलता बढी होय अर्थात् जैसी चाहिये तैसी न होय तथा उत्साह (होशियारी) न रहे ऐसे मनुष्यको अतिस्थूल कहते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां मेदोनिदानं समाप्तम् ॥ अथ कार्श्यनिदानम् । प्रसंगवशसे कार्श्य (क्षीणता) रोगका निदान ग्रन्थान्तरसे लिखते हैं- वातो रूक्षान्नपानानि लङ्घनं प्रमिताशनम् । क्रियातियोगः शोकश्च वेगनिद्राविनिग्रहः ॥ १ ॥ नित्यं रोगोऽरतिर्नित्यं व्यायामो भोजनाल्पता । भीतिर्धनादिचिन्ता च कार्श्यकारण-
( १९८ ) माधवनिदान ।
( १९८ ) माधवनिदान । मीरितम् ॥ २ ॥ क्रोधोऽतिमैथुनं चैव शुक्रव्याधिस्तथैव च । कार्श्यस्य हेतवः प्रोक्ताः समस्तैरपि तान्त्रिकैः ॥ ३ ॥ कुपित वायु, रूखा अन्न ( चना कांगुनी सामकिया आदि ) रूक्ष पान ( औटाया जल आदि ), लंघन, ( थोडा भोजन ), क्रियातियोग कहिये वमन विरेचनका बहुत होना, शोक ( बन्धुवियोगादिक ), मूत्र मल आदि वेगोंका रोकना, निद्राका रोकना, नित्य ही रोगी रहना, सर्वदा अरति होना, व्यायाम ( दण्डकसरत ) और मार्गका चलना आदि श्रम, अतिभय, धन आदिकी चिन्ता, क्रोध, अतिमैथुन, शुक्र, व्याधि- ( प्रमेहरोगदिक ) ये सर्व कार्श्य ( क्षीणता ) होनेके कारण वैद्य कहते हैं ॥ कृश मनुष्यके लक्षण । शुष्कस्फिगुदरग्रीवाधमनीजालसन्ततिः । अस्थिशेषोऽतिकृशतः स्थूलपर्वा नरो मतः ॥ ४ ॥ जिसके कूले, पेट, गरदन और धमनी कहिये नाडियोंका जाल ये सब सूख जायँ तथा हड्डी सूख जायँ और पर्व कहिये जोड मोटे होयँ वह पुरुष कृश ( लटा ) कहाता है ॥ अतिकृशको वर्जनीय वस्तु । व्यायाममतिसौहित्यं क्षुत्पिपासा महौषधम् । न कृशः सहते तद्वदतिशीतोष्णमैथुनम् ॥ ५ ॥ व्यायाम ( दण्डकसरत ) का करना, अतिसौहित्य ( अतितृप्त होवे तबतक भोजन ), भूख, प्यास, उत्कट औषध तथा अतिशीतलता, अतिगरमी और अति- मैथुन इनको कृश मनुष्य नहीं सह सके हैं इसीसे इनको त्याग दे ॥ अतिकृशके जो रोग होते हैं उनको कहते हैं- प्लीहा कासः क्षयः श्वासगुल्मार्शांस्युदराणि च । भृशं कृशं प्रधावन्ति रोगाश्च ग्रहणीमुखाः ॥ ६ ॥ जो मनुष्य ज्वरादि रोगोंसे कृश होय अथवा वातरूक्षान्नपानादिकोंसे कृश होय और वह कुपथ्य करे तौ इतने रोग होयँ जो विदाही और अभिष्यन्दी वस्तु खाय तौ प्लीहा ( तापतिल्ली ) होय और खटाई खाय तौ खांसी होय और अतिमैथुन करे तौ क्षयीका रोग होय और व्यायाम शीतल भोजनपानादिक करे तौ श्वास रोग होय, रूखा अन्नपान कडुवा खट्टा भक्षण और शीतल भारी चिकना आदिका सेवन करे तो गुल्म ( गोला ) होय और अर्श ( बवासीर ) कारक पदार्थ सेवनसे बवासीर होय । इसी प्रकार उदररोग संग्रहणी आदि रोग होते हैं ॥
भाषाटीकासमेत । (१९९) अब कहते हैं कि, कोई कृश भी बलवान् होय हैं इसमें क्या हेतु है ?- आधानसमये यस्य शुक्रभागोऽधिको भवेत् । मेदोभागस्तु हीनः स्यात्स कृशोऽपि महाबलः ॥ ७ ॥ गर्भ रहनेके समय शुक्रका भाग अधिक होय और मेदका भाग थोडा होय तो मेद् थोडे होनेसे तो कृश होय और शुक्राधिक्य होनेसे बलवान् होय ॥ कोई स्थूल होनेपर निर्बल होता है इसका कारण कहते हैं- मेदसोंऽशोऽधिको यस्य शुक्रभागोऽल्पको भवेत् । स स्निग्धोऽपि सुपुष्टोऽपि बलहीनो विलोक्यते ॥ ८ ॥ गर्भ रहते समय मेदका भाग अधिक होय और शुक्रका भाग थोडा होय तो वह पुष्ट भी है परन्तु बलहीन होता है ॥ यथा पिपीलिका स्वल्पा यथा च वरटी बलात् । स्वतश्चतुर्गुणं भारं नीत्वा गच्छति सम्मुखम् ॥ ९ ॥ दृष्टान्त-जैसे पिपीलिका (चैंटी) आप अतिकृश है और खानेकी वस्तु दाल चावल आदि भारी भी हैं परन्तु उनको खींचकर बिलमें लेजाती है और वरटी (पीली झांखी) झींगर आदि आपसे चौगुना भारी भी हो परन्तु खींचकर अपने स्थानमें लेजाती है इसी प्रकार बलवान् पुरुष जानना ॥ असाध्यकार्श्य कहते हैं- स्वभावात्कृशकायो यः स्वभावादल्पपावकः । स्वभावादबलो यश्च तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ १० ॥ जिसका स्वतः स्वभावसे कृश शरीर है और जिसकी स्वभावसे मन्दाग्नि है और जो स्वभावसे बलहीन है उसकी चिकित्सा नहीं है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां कार्श्यरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथोदररोगनिदानम् । अग्निका दुष्ट होना यही उदररोगका विशेषकरके कारण है- रोगाः सर्वेऽपि मन्देऽग्नौ सुतरामुदराणि च । अजीर्णान्मलिनैश्चान्नैर्जायन्ते मलसञ्चयात् ॥ १ ॥ १ तेषामग्निबले हीने कुप्यंति पवनादयः । इति । २ तात्स्थ्यतद्धर्मताभ्यां च तत्समीप- तयापि च । तत्साहचर्याच्छब्दानां वृत्तिरेषा चतुर्विधा॥ इति । ३अतिसंचितदोषाणां पापकर्म च कुर्वताम् । उदराण्युपजायन्ते मन्दाग्नीनां विशेषतः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २०० ) माधवनिदान ।
( २०० ) माधवनिदान । अग्नि मन्द होनेसे सब रोग होते हैं और उदर रोग तो विशेषकरके होय है । कारण यह है कि अग्निमांद्य यह त्रिदोषजनक है और अजीर्णसे, मलिन अन्न ( विरुद्ध- अध्यशनादिक ) से और मल ( दोष तथा पुरीषादिक ) इनके संचयसे उदररोग होय है । इस जगह उदरशब्दकरके उदरस्थित रोग जानने, सो ग्रन्थान्तरमें लिखे हैं ॥ उदरकी सम्प्राप्ति । रुद्धां स्वेदोम्बुवाहीनि दोषाः स्रोतांसि सञ्चिताः । प्राणाग्न्यपानान्संदूष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ २ ॥ वातादिदोष स्वेद ( पसीना ) बहनेवाली और जलको बहनेवाली नाड़ियोंके मार्गको रुद्ध ( रोक ) कर और वे दोष बढकर प्राणवायु, अग्नि और अपानवायु इनको अत्यन्त दुष्ट कर मनुष्योंके उदररोग उत्पन्न करैं हैं । उदररोगका पूर्वरूप सुश्रुतमें लिखा है-“ तत्पूर्वरूपं बलवर्णाकांक्षा वलीविनाशो जठरे तु राज्यः । जीर्णा- परिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुजः पादगतश्च शोथः ॥” उदरके सामान्यरूप । आध्मानं गमनेऽशक्तिर्दौर्बल्यं दुर्बलाग्निता । शोथः सदनमङ्गानां सङ्गो वातपुरीषयोः ॥ दाहस्तन्द्रा च सर्वेषु जठरेषु भवन्ति हि ॥ ३ ॥ अफरा, चलनेकी शक्तिका नाश, दुर्बलता, मन्दाग्नि, सूजन, अंगग्लानि, वायुका तथा मलका रुकना, दाह, तन्द्रा ये लक्षण सब उदरमें होते हैं ॥ उदररोगकी संख्या । पृथग्दोषैः समस्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोदकैः । संभवन्त्युदराण्यष्टौ तेषां लिङ्गं पृथक्शृणु ॥ ४ ॥ पृथक् दोषोंसे अर्थात् वातसे, पित्तसे, कफसे, सन्निपातसे ( सन्निपातोदर ), प्लीहोदर, बद्धोदर, क्षतोदर और जलोदर सब मिलाकर ८ भये । उनके लक्षण पृथक् पृथक् कहते हैं ॥ वातोदरके लक्षण । तत्र वातोदरे शोथः पाणिपन्नाभिकुक्षिषु । कुक्षिपार्श्वोदरकटीपृष्ठरुक्पर्वभेदनम् ॥ ५ ॥ १ स्रोतोरोधश्चात्र बाहिरेव न पुनरन्तः । यदुक्तं चरके-“ स्वेदस्तु बाह्येषु स्रोतःसु प्रतिहतगतिस्तिर्यगवतिष्ठमानस्तदेवोदकमाप्यायति ” अतएवोदरपूर्णता अन्नरसेन भवति । २ स्वेदाम्बुवहानां स्रोतसां भेदानाह-स्वेदवहानां मेदोमूलं लोमकूपश्च, उदकवहानां स्रोतसां तालूमूलं क्लोम च । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २०१ ) शुष्ककासोऽङ्गमर्दोऽधो गुरुता मलसंग्रहः ॥ ६ ॥ श्यावारुणत्वगादित्वमकस्माद्वृद्धिहासवत् । सतोदभेदमुदरं तनुकृष्णशिराराततम् ॥ ७ ॥ आध्मातदृतिवच्छब्दमाहतं प्रकरोति च । वायुश्चात्र सरुक्छब्दो विचरेत्सर्वतो गतिः ॥ ८ ॥ वातोदरमें हाथ, पैर, नाभि और कूर्ख इनमें सूजन होय, सन्धियोंका टूटना, तथा कूर्ख, पसवाडे, पेट, कमर, पीठ इनमें पीडा, सूखी खांसी, अंगोंका टूटना, कमरसे नीचेके भागमें भारीपना, मलका संग्रह होना, त्वचा नख नेत्रादिकका काला लाल होना, पेट अकस्मात् ( निमित्तके बिना ) बडा हो जाय, अथवा छोटा हो जाय, सुई चुभानेकीसी तथा नोचनेकीसी पीडा होय, पेटमें चारोंतरफ बारीक काली शिराओं ( नाडियों ) से व्याप्त होय, चुटकी मारनेसे फूली पखालके समान शब्द होय । इस उदरमें वायु चारों तरफ डोलकर शूल करे तथा गूँजे ॥ पित्तोदरके लक्षण । पित्तोदरे ज्वरो मूर्च्छा दाहस्तृट् कटुकास्यता । भ्रमोऽतिसारः पीतत्वं त्वगादावुदरं हरित् ॥ ९ ॥ पीतताम्रशिरानद्धं सस्वेदं सोष्म दह्यते । धूमायते मृदुस्पर्शं क्षिप्रपाकं प्रद्रूयते ॥ १० ॥ पित्तके उदररोगमें ज्वर, मूर्च्छा, दाह, प्यास, मुखमें कडुआट, भ्रम, अतिसार, त्वगादिक ( नख नेत्र ) इनमें पीलापना, पेट हरा होय, पीली तामेकी नाडियोंसे उदर व्याप्त हो, पसीना आवे, गरमीसे सब देहमें दाह होय, आंतोंसे धूँआंसा निकलता दीखे, हाथके स्पर्श करनेसे नरम मालूम हो, शीघ्र पाक होय अर्थात् जलोदरत्वको प्राप्त होय और उसमें घोर पीडा होय ॥ कफोदरके लक्षण । श्लेष्मोदरेऽङ्गसदनं स्वापश्वयथुगौरवम् । निद्रोत्क्लेशोऽरुचिः श्वासः कासः शुक्लत्वगादिता ॥ ११ ॥ उदरं स्तिमितं स्निग्धं शुक्लराजीततं महत् । चिराभिवृद्धिकठिनशीतस्पर्शं गुरु स्थिरम् ॥ १२ ॥ कफके उदररोगमें हाथ पैर आदि अंगोंमें शून्यता हो और जकड जाय, सूजन हो, अंग भारी हो जाय, निद्रा आवै, वमन होयगी ऐसी मालूम होय, अरुचि होय,
(२०२) माधव निदान।
(२०२) माधव निदान। श्वास, खांसी होय, त्वचा नख नेत्रादिक सफेद हों पेट निश्चल चिकना सफेद नाडियोंसे व्याप्त हो, इनकी वृद्धि बहुत कालमें होय, पेट करडा और शीतल मालूम होय तथा भारी और स्थिर होय ॥ सन्निपातोदरके लक्षण । स्त्रियोऽन्नपानं नखरोममूत्रविडार्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः । यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गरांश्र्व दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद्वा ॥ १३ ॥ तेनाशु रक्तं कुपिताश्र्व दोषाः कुर्युः सुघोरं जठरं त्रिलिंगम् । तच्छीतवाते भृशदुर्दिने वा विशेषतः कुप्यति दह्यते च ॥ १४ ॥ स चातुरो मूर्च्छति हि प्रसक्तं पाण्डुः कृशः शुष्यति तृष्णया च । दूष्योदरं कीर्तितमेतदेव- खोटे आचरणवाली स्त्री जिस पुरुषको नख केश (बाल) मल मूत्र आर्तव (रजोदर्शनका रुधिर) मिला अन्नपान देय, अथवा जिसका शत्रु विष देवे अथवा दुष्टांबु (जहर मिला मछली तिनका पित्ता आदि औटा हुआ ऐसा जल) और दूषीविषे (मन्दविष) इनके सेवन करनेसे रुधिर और वातादिक दोष शीघ्र कुपित होकर अत्यन्त भयंकर त्रिदोषात्मक उदररोग उत्पन्न करते हैं, वे शीतकालमें अथवा शीतल पवन चले उस समय, अथवा जिस दिन वर्षाका झड लगे उस दिन विशेष करके कोपको प्राप्त हो और दाह होय (इसका कारण यह है कि, उस समय दूषीविषका कोप होय है) वह रोगी निरन्तर विषके संयोगसे मूर्च्छित होय देहका पीला वर्ण तथा कृश होय और परिश्रम करनेसे शोष होय, प्यास होय तो इसको दूष्योदर कहते हैं ॥ प्लीहोदरके लक्षण । -प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ १५ ॥ विदाह्यभिष्यन्दिरतस्य जन्तोः प्रदुष्टमत्यर्थमसृक्कफश्र्व । प्लीहाभिवृद्धिं कुरुतः प्रवृद्धौ प्लीहोत्थमेतज्जठरं वदन्ति ॥ १६ ॥ तद्वामपार्श्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र । मन्दज्वराग्निः कफपित्तलिंगैरुपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ॥ १७ ॥ १ यदुक्तम्-जीर्णं विषन्नोषधिभिर्हृतं वा दावाग्निना वाऽऽतपशोषितं वा । स्वभावतो वा गुणविप्रहीणं विषं हि दूषीविषतामुपैति ॥ इति ॥ १ एतदेव सन्निपातोदरं दूष्योदरं कीर्तितं न पुनरधिकम् इत्यर्थः । रक्तं दूष्यं दूषयित्वा भवतीति दूष्योदरं किंवा परस्परं दूषयन्तीति दोषा एव दूष्यास्तैः कृतमुदरम् दूष्योदरम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २०३ ) अब प्लीहोदरके लक्षण कहता हूँ तू सुन। विदाही ( वंशकरीरादि अर्थात् दाह करनेवाली ) और अभिष्यन्दी ( दध्यादि ) अर्थात् स्रोत ( छिद्र ) रोकनेवाली ऐसे अन्न निरन्तर सेवन करनेवाले पुरुषके अत्यन्त दुष्ट भये जो रुधिर और कफ बढकर प्लीहा ( तापतिल्ली ) को बढावें इस उदरको प्लीहोत्थ उदर कहते हैं, यह बाईं- तरफ बढता है। इस अवस्था में रोगी बहुत दुःख पाता है, देहमें मन्दज्वर होय, मन्दाग्नि होय तथा कफ पित्तोदरके लक्षण इसमें मिलते हैं, बल क्षीण हो अत्यन्त पीला वर्ण होय ॥ यकृदाल्युदरके लक्षण । सव्यान्यपार्श्वे यकृति प्रदुष्टे ज्ञेयं यकृद्धाल्युदरं तदेव ॥ १८ ॥ दहने तरफ जो यकृत् कहिये कलेजा है वह दुष्ट कहिये रोगके होनेसे प्लीहोदरके समान उदर होय उसको यकृद्दाल्युदर कहते हैं। दोषोंकरके यकृतका भेद होय है इसीसे यकृद्दालि उदर कहते हैं ॥ इसमें दोषोंका सम्बन्ध कहते हैं- उदावर्त्तरुजानाहैर्मोह तृड्दहनज्वरैः । गौरवारुचिकाठिन्यैर्विद्यात्तत्र मलान्क्रमात् ॥ १९ ॥ उदावर्त्त, शूल, अफरा इनसे वायु, मोह, प्यास, ज्वर इनसे पित्त और भारीपना, अरुचि, कठिनता इनसे कफ ऐसे क्रमपूर्वक दोषोंका सम्बन्ध जानना ॥ बद्धगुदोदरके लक्षण । यस्यांत्रमन्नैरुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा पिहितं यथावत् । संचीयते तस्य मलः सदोषः शनैः शनैः संकरवच्च नाड्याम् ॥२०॥ निरुध्यते तस्य गुदे पुरीषं निरेति कृच्छ्रादतिचाल्पमल्पम् । हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति तस्योदरं बद्धगुदं वदन्ति ॥ २१ ॥ जिस पुरुषकी आंत उपलेप कहिये गाढे अन्न करके (शाकादिक अथवा बाल तथा बारीक पत्थरके टुकडे करके ) बद्ध हो जाय, उस पुरुषका दोषयुक्त मल धीरे धीरे आंतडीकी नलीमें होकर जैसे बुहारीसे झारा तृण धूर आदि क्रमसे बढे है इसी प्रकार बढे और वह मल बडे कष्टसे गुदद्वारा थोडा थोडा निकलै, जब मलका निकलना बन्द हो जाय तब मल दोषोंकरके गुदासे ऊपर आवै इसीसे उदर बढे है अर्थात् हृदय और नाभिके मध्य अन्नपाकस्थानकी वृद्धि हो इसीसे इस उदरको १ यकृद्धालयति दोषैर्भेदयतीति यकृद्धाल्युदरम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २०४ ) माधवनिदान ।
( २०४ ) माधवनिदान । बद्धगुदोदर कहते हैं । अथवा गुदाके ऊपर आंतोंको बद्ध होनेसे बद्धगुद कहते हैं । यह चरकका मत है ॥ क्षतोदरके लक्षण । शल्यं तथान्नोपहितं यदन्त्रं भुक्तं भिनत्त्यागतमन्यथा वा । तस्मात्स्रुतोऽन्त्रात्सलिलप्रकाशः स्रावः स्रवेद्वै गुदतस्तु भूयः॥२२॥ नाभेरधश्चोदरमेति वृद्धिं निस्तुद्यते दाल्यति चातिमात्रम् । एतत्परिस्राव्युदरं प्रदिष्टं- कांटा धूल आदिके साथ मिलकर पेटमें चला जाय अथवा पक्वाशयसे शल्या- दियुक्त अन्न विलोम (टेढ़ा तिरछा ) चलाजाय तब आंतोंको काटे और सीधा जाय तो नहीं काटे, अथवा जम्भाई अति अशन करनेसे आंत फटजाय सो चरकमें लिखा भी है उन फटे आंतोंके गलित पानीके समान स्राव पुनः गुदाके मार्ग होकर झरै, नाभिके नीचेका भाग बढ़ै, नोचनेकीसी तथा भेद ( चीरने ) कीसी पीडासे अत्यन्त व्यथित होय, इस क्षतोदरको ग्रन्थान्तरमें परिस्रावि उदर कहते हैं और इसीको छिद्रोदर कहते हैं यह गयदासका मत है ॥ जलोदरकी उत्पत्ति और लक्षण । -दकोदरं कीर्तयतो निबोध ॥ २३ ॥ यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा वान्तो विरक्तोऽप्यथवा निरूढः । पिबेज्जलं शीतलमाशु तस्य स्रोतांसि दूष्यन्ति हि तद्वहानि ॥ २४॥ स्नेहोपलिप्तेष्वथ वापि तेषु दकोदरं पूर्ववदभ्युपैति । स्निग्धं महत्तत्परिवृद्धनाभि समाततं पूर्णमिवाम्बुना च ॥ यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥२५॥ अब जलोदर कैसे होय है? उसको कहते हैं सुनो, जिसने स्नेह ( घृततैलादि ) पान करा होय अथवा अनुवासनबस्ति करी हो, वमन करा हो अथवा दस्त करे हों अथवा निरूहबस्ति करी होय, ऐसा पुरुष शीतलजल पीवे तब उसकी जल बहनेवाली नसोंके मार्ग तत्काल दुष्ट होय हैं, वे उदक बहनेवाले स्रोत ( मार्ग ) स्नेहसे उपलिप्त ( चिकने ) होनेसे पूर्ववत् ( अर्थात् अन्नरस उपस्नेह न्यायकरके अर्थात् इनको बाहर लायकर उदरको उत्पन्न करे ) जलोदर होय है उसमें चिकनापन दीखे, ऊंचा होय, १ " शर्करातृणलोष्टास्थिकंटकैरन्नसंयुतैः । भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैर्जृम्भयात्यशनेन वा ॥"इति॥
भाषाटीकासमेत । (२०५) नाभिके पास बहुत ऊंचा होय, चारों ओर तनासा मालूम होय, पानीकी पोट भरीसी होय जैसे पानीसे भरी पखालमें जल हलै है उसी प्रकार हले, गडगड शब्द- करे, कांपे इनको जलोदर अर्थात् जलन्धर कहते हैं ॥ साध्यासाध्यविचार । जन्मनैवोदरं सर्वं प्रायः कृच्छ्रतमं विदुः ॥ २६ ॥ बलिनस्तदजाताम्बु यत्नसाध्यं नवोत्थितम् । सर्व प्रकारके उदर जन्मसे ही प्रायः अत्यन्त कष्टसाध्य होते हैं । बलवान् पुरु- षके नवीन प्रकट भया हो और उसमें पानी नहीं प्रगट भया हो ऐसा बडे यत्नसे साध्य होय ॥ पानी नहीं प्रगट भया हो ऐसे उदरके लक्षण चरकमें कहे हैं- अशोथमरुणाभासं सशब्दं नातिभारिकम् ॥ २७ ॥ सदा गुडगुडायन्तं शिराजालगवाक्षितम् । नाभिं विष्टभ्य पायौ तु वेगं कृत्वा प्रणश्यति ॥ २८ ॥ हृद्वंक्षणकटीनाभिगुदं प्रत्येकशूलिनः । कर्कशं सृजतो वातं नातिमन्दे च पावके ॥ २९ ॥ लालया विरसे चास्ये मूत्रेऽल्पे संहते विशि । अजातोदकमित्येतैर्युक्तं विज्ञाय लक्षणैः ॥ ३० ॥ जातोदकके लक्षण भी चरकमें इस प्रकार कहे हैं सो लिखते हैं- पयःपूर्णा दृतिरिव क्षोभे शब्दकरं मृदु । अप्रव्यक्तशिरं शूनं नितान्तमुदरं महत् ॥ ३१ ॥ आलस्यमास्यवैरस्यं मूत्रं बहुशकृत्स्रुतम् । जातोदकस्य लिङ्गं स्यान्मंदोऽग्निः पाण्डुतापि च ॥३२॥ इति। पक्षाद्वद्धगुदं तूर्ध्वं सर्वं जातोदकं तथा । प्रायो भवत्यभावाय च्छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम् ॥ ३३ ॥ बद्धगुदोदर १५ दिवसके पिछाडी असाध्य होता है, उसी प्रकार सब प्रकारके उदक (पानी) उत्पन्न होनेसे नाशकारक होता है, और छिद्रान्त्रोदर यह प्रायः नाशक होता है । कदाचित् शल्य अथवा शस्त्रचिकित्सा जैसी होनी चाहिये ऐसी होय तो उदक (पानी) प्रगट भया उदररोग छिद्रान्त्र अथवा बद्धगुद साध्य होता है. यह प्रायः इस पदसे सूचना करी ॥
( २०६ ) माधवनिदान ।
( २०६ ) माधवनिदान । असाध्य लक्षण । शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम् । बलशोणितमांसाग्निपरिक्षीणं च वर्जयेत् ॥ ३४ ॥ जिस उदररोगीके नेत्रोंपर सूजन होय लिंग टेढा हो गया हो, पेटकी त्वचा गीली तथा पतली होगई हो, बल, रुधिर, मांस और अग्नि ये जिसके क्षीण हो गये हों ऐसा रोगी त्याज्य है ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । पार्श्वभङ्गान्नविद्वेषशोथातीसारपीडितम् । विरिक्तं चाप्युदरिणं पूर्यमाणं विवर्जयेत् ॥ ३५ ॥ पार्श्वभंग (पसलियोंमें पीडा), अन्नमें अरुचि, शोथ, अतिसार इनसे पीडित और दस्त करानेसे जिसका पेट फिर पानीसे भरजाय, ऐसे उदररोगीको वैद्य त्यागदेय ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् उदररोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ शोथरोगनिदानम् । ————܀———— शोथकी सम्प्राप्ति । रक्तपित्तकफान्वायुर्दुष्टो दुष्टान्बहिः शिराः । नीत्वा रुद्धगतिस्तैर्हि कुर्यात्त्वङ्मांससंश्रयम् ॥ सोत्सेधं संहतं शोथं तमाहुर्निचयादतः ॥ १ ॥ कुपित भई वायु स्वकारणसे दुष्टभये रक्तपित्तकफको बाह्यशिरा (बाहरकी नाडियों) में प्राप्त करके पुनः उन्हीं रक्तपित्त कफसे रुकगया है मार्ग जिसका ऐसा यह पवन त्वचा और मांस इनके आश्रयसे सूजन उत्पन्न करे, वह सूजन ऊंची और कठिन होय, इसको रक्तसहित त्रिदोषोंका सम्बन्ध है, इससे इस शोथको सन्निपा- तात्मक कहते हैं “त्वङ्मांससंश्रयम्” इस पदसे व्रणशोथसे शोथका भेद दिखाया क्योंकि व्रणशोथकी उत्पत्ति आठ व्रणवस्तुओंमें होती है, सो कहा भी है—“त्वङ्- मांसशिरास्नाय्वस्थिसन्धिसन्धिकोष्ठमर्माणि इति अष्टौ व्रणवस्तूनि भवंति ” इति ॥ सर्वहेतुविशेषैस्तु रूपभेदान्नवात्मकम् । दोषैः पृथग्द्वयैः सर्वैरभिघाताद्विषादपि ॥ २ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA