माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत। (२५१) विद्रधिके लक्षण। विद्रधिं सन्निपातेन यथोक्तमभिनिर्द्दिशेत् ॥ १३ ॥ विद्रधिनिदानमें जो सन्निपातविद्रधिके लक्षण कहे हैं वे ही यहां विद्रधिशूकके लक्षण जानने ॥ तिलकालकके लक्षण। कृष्णानि चित्राण्यथ वा शूकानि सविषाणि तु । पातितानि पचंन्त्याशु मेढ्रं निरवशेषतः ॥ १४ ॥ कालानि भूत्वा मांसानि शीर्यंते यस्य देहिनः । सन्निपातसमुत्थांस्तु तान्विद्यात्तिलकालकान् ॥ १५ ॥ काले अथवा चित्रविचित्र रंगकेसे विषशूकोंके लेप करनेसे तत्काल सर्व लिङ्ग पक जाय तथा सब मांस तिलके सदृश काला होकर गलजाय, इस त्रिदोषोत्पन्न व्याधिको तिलकालक कहते हैं ॥ असाध्य शूकदोषके लक्षण। तत्र मांसार्बुदं यच्च मांसपाकश्च यः स्मृतः । विद्रधिश्च न सिद्ध्यंति ये च स्युस्तिलकालकाः ॥ १६ ॥ तिस शूकदोषमें मांसार्बुद, मांसपाक, विद्रधि और तिलकालक ये चार असाध्य हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां शूकदोषनिदानं समाप्तम् ॥ अथ कुष्ठनिदानम् । विरोधीन्यन्नपानानि द्रवस्निग्धगुरूणि च । भजतामागतां छर्दिं वेगांश्चान्यान्प्रतिघ्नताम् ॥ १ ॥ व्यायाममतिसन्तापमतिभुक्त्वा निषेविणाम् । शीतोष्णलंघनाहारान्क्रमं मुक्त्वा निषेविणाम् ॥ २ ॥ घर्मश्रमभयार्त्तानां द्रुतं शीतांबुसेविनाम् । अजीर्णाध्यशनानां च पंचकर्म्मापचारिणाम् ॥ ३ ॥
( २५२ ) माधवनिदान ।
( २५२ ) माधवनिदान । नवान्नदधिमत्स्यातिलवणाम्लनिषेविणाम् । माषमूलकपिष्टान्नतिलक्षीरगुडाशिनाम् ॥ ४ ॥ व्यवायं चाप्यजीर्णेऽन्ने निद्रां च भजतां दिवा । विप्रान्गुरून्धर्षयतां पापं कर्म च कुर्वताम् ॥ ५ ॥ वातादयस्त्रयो दुष्टास्त्वग्रक्तं मांसमंबु च । दूषयंति स कुष्ठानां सप्तको द्रव्यसंग्रहः ॥ अतः कुष्ठानि जायंते सप्त चैकादशैव च ॥ ६ ॥ विरोधी कहिये क्षीरमत्स्यादि, पतले, स्नेहयुक्त, भारी ऐसे अन्नपानके सेवन करनेसे रर्द्दके वेगको रोकनेसे और अन्य वेग कहिये मलमूत्रादिवेगोंके रोकनेसे, भोजन करके अत्यन्त व्यायाम ( दण्डकसरत ) अथवा अतिसंताप ( सूर्यका ताप ) सह- नेसे, शीत, गरमी, लंघन और आहार इनके सेवन उक्त क्रम छोडकर करनेसे धूप, श्रम और भय इनसे पीडित होय और उसी समय शीतल जल पीवे, कच्चा अन्न भक्षण करनेसे तथा भोजनके ऊपर भोजन करनेसे, वमन, विरेचन, निरूहण, अनुवासन, नस्यकर्म इन पंचकर्मके करते समय अपथ्य करनेसे, नया अन्न, दही, मछली, अत्यन्त खारी खट्टा पदार्थके सेवन करनेसे, उडद, मूली, पिष्टीकी बनी वस्तु, तिल, दूध, गुड इनके खानेसे, अन्नके पचे विना स्त्रीसंग करनेसे तथा दिनमें सोनेसे, ब्राह्मण गुरु इनका तिरस्कार करनेसे, पापकर्मके आचरण करनेसे ऐसे पुरु- षोंके वातादिक तीनों दोष त्वचा, रुधिर, मांस और जल इनको दुष्ट कर कुष्ठरोग ( कोढ ) उत्पन्न करे, कुष्ठ होनेके वातादि तीनों दोष और त्वचादि दूष्य ये सात पदार्थ अवश्य कारणभूत हैं इनसे ही अठारह प्रकारके कुष्ठ होते हैं, तिनमें सात महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ हैं ॥ कुष्ठोंको त्रिदोषजत्व भी होनेसे दोषाधिक्यसे वे सात प्रकारके हैं सो कहते हैं- कुष्ठानि सप्तधा दोषैः पृथग्द्वंद्वैः समागतैः । सर्वेष्वपि त्रिदोषेषु व्यपदेशोऽधिको मतः ॥ ७ ॥ पृथक् पृथक् दोषों करके ३, द्वन्द्वज ३ और सन्निपातसे १ सब मिलकर सात कुष्ठ भये । सब कुष्ठ त्रिदोष होनेपर भी जो दोष अधिक होय उसीसे व्यवहार करना चाहिये अर्थात् जिस दोषके लक्षण मिलें उसी दोषका कुष्ठ जानना जैसे “वातेन कुष्ठं कापालं” अर्थात् वाताधिक्य होनेसे कापाल कुष्ठ होता है ॥ कुष्ठके पूर्वरूप । अतिश्लक्ष्णखरस्पर्शस्वेदास्वेदविवर्णता ॥ ८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २५३ ) दाहः कंडूस्त्वचि स्वापस्तोदः कोष्ठोन्नतिः क्लमः । व्रणानामधिकं शूलं शीघ्रोत्पत्तिश्चिरस्थितिः ॥ ९ ॥ रूढानामपि रूक्षत्वं निमित्तेऽल्पेऽपि कोपनम् । रोमहर्षोऽसृजः काष्र्ण्यं कुष्ठलक्षणमग्रजम् ॥ १० ॥ जिस ठिकाने कुष्ठ होनहार होय उस जगह हाथोंसे अत्यन्त चिकना मालूम होय अथवा खरदरा मालूम होय, उस ठिकाने पसीने आवे अथवा नहीं आवे तथा उस ठिकानेका वर्ण पलट जाय, दाह होय, खुजली चले, त्वचाको स्पर्श मालूम न होय, नोचनेकीसी पीडा होय, विषैली माखीके काटनेके सदृश चकत्ते उठे, परि- श्रम करे विना देहमें श्रम होय, व्रणमें पीडा अधिक होय, उन फोडोंकी उत्पत्ति शीघ्र होकर बहुत दिवसपर्यंत रहे, जब फोडा भरनेको होय तब रूखे रहें उनका थोडे निमित्त होनेसे कोप होय, रोमांच होय और रुधिर काला पडजाय, ये कुष्ठ होनेके पूर्वरूप होते हैं ॥ सप्त महाकुष्ठोंके लक्षण । कृष्णारुणकपालाभं यद्रूक्षं परुषं तनु । कापालं तोदबहुलं तत्कुष्ठं विषमं स्मृतम् ॥ ११ ॥ कापालकुष्ठ जो काले तथा लाल खोपडीके सदृश, रूखे, खरखरे, पतले ऐसे त्वचावाले तथा नोंचनेकीसी अधिक पीडायुक्त होयँ, वे दुश्चिकित्स्य हैं अर्थात् चिकित्सा करनेमें कठिन हैं। इसको कापालकुष्ठ कहते हैं ॥ औदुम्बरकुष्ठके लक्षण । रुग्दाहरागकंडूभिः परीतं लोमपिंजरम् । उदुंबरफलाभासं कुष्ठमौदुंबरं वदेत् ॥ १२ ॥ औदुम्बरकुष्ठ शूल, दाह लाल और खुजली इनसे व्याप्त होय, इसमें बाल कपिलवर्णके होयँ तथा ये गूलरफलके समान होते हैं ॥ मण्डलकुष्ठके लक्षण । श्वेतं रक्तं स्थिरं स्त्यानं स्निग्धमुत्सन्नमंडलम् । कृच्छ्रमन्योन्यसंयुक्तं कुष्ठं मंडलमुच्यते ॥ १३ ॥ मण्डलकुष्ठ सफेद, लाल, कठिन, गीला अथवा जलयुक्त, चिकना, जिसका आकार मण्डलके सदृश ऊपरको उठा होय तथा एक दूसरेसे मिला होय, ऐसा यह मण्डलकुष्ठ कष्टसाध्य है ॥
( २५४ ) माधवनिदान ।
( २५४ ) माधवनिदान । ऋक्षजिह्वकुष्ठके लक्षण । कर्कशं रक्तपर्यन्तमन्तः श्यावं सवेदनम् । यहक्षजिह्वासंस्थानमृक्षजिह्वं तदुच्यते ॥ १४ ॥ ऋक्षजिह्वकुष्ठ कठोर, अन्तविषे लाल होय, बीचमें काला होय, पीडा करे तथा रीछके जीभके समान होय ॥ पुण्डरीककुष्ठके लक्षण । सश्वेतं रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम् । सोत्सेधं च सरागं च पुंडरीकं प्रचक्षते ॥ १५ ॥ पुण्डरीककुष्ठ पुण्डरीक ( श्वेतकमल ) पत्रके समान सफेद होय और उसके अन्त- भाग लाल होयँ, यत्किञ्चित् ऊंचा निकल आवे और मध्यमें थोडा लाल होय है ॥ सिध्मकुष्ठके लक्षण । श्वेतं ताम्रं च तनु यद्रजो घृष्टं विमुंचति । प्रायेणोरसि तत्सिध्ममलाबुकुसुमोपमम् ॥ १६ ॥ सिध्मकुष्ठ सफेद, लाल, पतली, खुजानेसे भूसीसी उडे । यह विशेषकरके छातीमें होता है ( छातीमें कफ प्रधान होनेसे ) । प्रायः इसके कहनेसे छातीके अतिरिक्त और स्थानमें भी होय हैं और घीयाके फूलके आकार होय है ॥ काकणकुष्ठके लक्षण । यत्काकणंतिकावर्णं सपाकं तीव्रवेदनम् । त्रिदोषलिङ्गं तत्कुष्ठं काकणं नैव सिध्यति ॥ १७ ॥ काकणकुष्ठ चिरमिटीके समान लाल अर्थात् बीचमें काला होय और आसपास लाल होय अथवा बीचमें लाल होय और आसपास काला होय, किञ्चित् पका तीव्र, पीडायुक्त, जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों यह कुष्ठ अच्छा नहीं होय ॥ ग्यारह क्षुद्रकुष्ठोंके लक्षण । अस्वेदनं महावास्तु यन्मत्स्यशकलोपमम् । तदेककुष्ठं चर्माख्यं बहलं हस्तिचर्मवत् ॥ १८ ॥ चर्मकुष्ठ पसीनारहित, बहुत जगह व्यापनेवाला, मछलीकी त्वचासमान और जिसका चर्म हाथीके चर्म समान मोटा और कठोर होय उसको चर्मकुष्ठ कहते हैं ॥ किटिभकुष्ठके लक्षण । श्यावं किणखरस्पर्शं परुषं किटिभं स्मृतम् ।
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भाषाटीकासमेत । (२५५) किटिभकुष्ठ नीलवर्ण, व्रणकी चटके समान कठोर स्पर्श मालूम होय और परुष कहिये रूक्ष होय ॥ वैपादिककुष्ठके लक्षण । वैपादिकं पाणिपादस्फोटनं तीव्रवेदनम् ॥ १९ ॥ वैपादिक जिसमें हाथ और पैर फटजायँ और पीडा बहुत होय, इस विपा- दिकाको बिवाई नहीं जानना, क्योंकि बिवाई केवल पैरमें ही होती है और बिवा- ईको शास्त्रमें पाददारी कहते हैं और विपादिकामें हाथ पैरोंमें फुन्सी श्यामरंगकी होती हैं और वे फुन्सी चुचाती हैं तथा खुजाती हैं, इसीसे पाददारी भिन्न और विपादिका भिन्न है ॥ अलसकुष्ठके लक्षण । कण्डूमद्भिः सरागैश्च गण्डैरलसकं चितम् । खुजलीयुक्त और लाल फफोलोंसे व्याप्त जो कुष्ठ हो उसको अलसककुष्ठ कहते हैं ॥ दद्रुमण्डलकुष्ठके लक्षण । सकण्डूरागपिटिकं दद्रुमण्डलमुद्गतम् ॥ २० ॥ दद्रुमण्डलकुष्ठ इसमें खुजली होय, लाल होय और फोडा होय और ये ऊंचे उठ आवें मंडलके आकार गोल उत्पन्न होय, इसीसे इसको दद्रुमंडल कहते हैं ॥ चर्मदलकुष्ठके लक्षण । रक्तं सशूलं कंडूमत्स्फोटं यद्दलत्यपि । तच्चर्मदलमाख्यातमस्पर्शसहमुच्यते ॥ २१ ॥ चर्मदलकुष्ठ यह लाल हो, शूलयुक्त, खुजलीयुक्त, फफोलोंसे व्याप्त होकर फूटजाय, इसमें हाथ लगानेसे सहा न जाय, इसमें त्वचा फटजाय ॥ पामाकुष्ठके लक्षण । सूक्ष्मा बह्वयः पीडिकाः स्राववत्यः पामेत्युक्ताः कण्डुमत्यः सदाहाः । पामाकुष्ठ पिडिका छोटी और बहुत होयँ उनमेंसे स्राव होय तथा खुजली चले और दाह होय इस कुष्ठको पामा (खाज) कहते हैं ॥ कच्छुकुष्ठके लक्षण । सैव स्फोटैस्तीव्रदाहैरुपैता ज्ञेया पाण्योः कच्छुरुग्रा स्फिचोश्च ॥ २२ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
(२५६) माधवनिदान ।
(२५६) माधवनिदान । कच्छुकुष्ठ वही पामा मोटे फोडोंकरके तथा तीव्रदाहयुक्त होय और हाथोंमें हो, उसको कच्छु कहते हैं । उग्रा यह चूतडमें होती है ॥ विस्फोटकुष्ठके लक्षण । स्फोटाः श्यावारुणाभासा विस्फोटाः स्युस्तनुत्वचः । विस्फोटिक फोडे काले व लाल रंगके होयँ और जिनकी त्वचा पतली होय उसको विस्फोट कहते हैं ॥ शतारुकुष्ठके लक्षण । रक्तं श्यावं सदाहार्ति शतारु स्याद्बहुव्रणम् ॥ २३ ॥ शतारु लाल, होय, श्याम होय, जलन होय, शूल होय तथा जिनमें अनेक फोडे होयँ उसको शतारुकुष्ठ कहते हैं ॥ विचर्चिकाके लक्षण । सकण्डूः पिडिका श्यावा बहुस्रावा विचर्चिका । विचर्चिका खुजलीयुक्त, काले रंगकी जो फुन्सी (माताके समान) होय तथा उसमेंसे स्राव बहुत होय, उसको विचर्चिका कहते हैं। चर्मकुष्ठसे लेकर विचर्चिका- कुष्ठ पर्यंत १२ कुष्ठ होते हैं और पीछे क्षुद्र कुष्ठ ११ कहैं हैं, ऐसी कोई शंका करे उसके निमित्त कहते हैं । विचर्चिका पैरोंमें होकर फूटकर अर्थात् विपादिका होय हैं ऐसे कहनेसे संख्या नहीं बढे इस विषयमें भोजका यह मत है ॥ वातजादि कुष्ठोंके लक्षण । खरं श्यावारुणं रूक्षं वातात्कुष्ठं सवेदनम् ॥ २४ ॥ पित्तात्प्रकुपितं दाहरागस्रावान्वितं स्मृतम् । कफात्क्लेदि घनं स्निग्धं सकण्डूशैत्यगौरवम् । द्विलिंगं द्वंद्वजं कुष्ठं त्रिलिंगं सान्निपातिकम् ॥ २५ ॥ वायुके योगसे कुष्ठ खरदरा, काले रंगका अथवा लालवर्ण रूखा और पीडा- युक्त ऐसा होय है । पित्तके योगसे कुपित कुष्ठमें दाह, लाली और स्रावयुक्त होय है । कफके योगसे क्लेदयुक्त, सघन, चिकना, खुजली, शीतलता युक्त और भारी ऐसा होय है। द्वंदूज कुष्ठमें दो दोषोंके लक्षण होते हैं। सान्निपातिक कुष्ठमें तीन दोषोंके लक्षण होते हैं ॥ १ दोषाः प्रदूष्य त्वङ्मांसं पाणिपादसमाश्रिताः । पिडिकां जनयंत्याशु दाहकण्डूसम- न्विताम् ॥ दाल्यते त्वक् खरा रूक्षा पाण्योर्ज्ञेया विचर्चिका ॥ पादे विपादिका ज्ञेया स्थाना- न्यत्वाद्विचर्चिका ॥
भाषाटीकासमेत । (२५७) रसादिसप्तधातुगत कुष्ठोंके क्रमसे लक्षण । त्वक्स्थे वैवर्ण्यमंगेषु कुष्ठे रौक्ष्यं च जायते । त्वक्स्वापो रोमहर्षश्च स्वेदस्यातिप्रवर्तनम् ॥ २६ ॥ रसधातुगत कुष्ठ होनेसे अंगका वर्ण पलट जाय है, अंग रूखा होय, त्वचा शून्य होय, रोमाञ्च हो और पसीना बहुत आवे ॥ रक्तगत कुष्ठके लक्षण । कण्डूर्विपूयकश्चैव कुष्ठे शोणितसंश्रये ॥ २७ ॥ रक्तगत कुष्ठमें खुजली और राध बहुत होय ॥ मांसगत कुष्ठके लक्षण । बाहुल्यं वक्त्रशोषश्च कार्कश्यं पिडिकोद्गमः । तोदः स्फोटः स्थिरत्वं च कुष्ठे मांससमाश्रिते ॥ २८ ॥ मांसगत कुष्ठ होनेसे मुख बहुत सूखे, अंगमें कर्कशपना होय, देहमें फुन्सी पैदा होय, सुई नोचनेकीसी पीडा होय, फोडे होयँ वे बहुत दिन रहें ॥ मेदोगत कुष्ठके लक्षण । कौण्यं गतिकक्षयोऽङ्गानां संभेदः क्षतसर्पणम् । मेदःस्थानगते लिङ्गं प्रागुक्तानि तथैव च ॥ २९ ॥ मेंदमें कुष्ठ होनेसे कौण्य कहिये हाथ गिरपडे, चलनेकी शक्ति मारी जाय हडफूटन होय, घाव फैल जाय और पूर्वोक्त लक्षण (रसरक्तमांसगतकुष्ठके लक्षण) होयँ ॥ अस्थिमज्जागत कुष्ठके लक्षण । नासाभंगोऽक्षिरागश्च क्षतेषु कृमिसंभवः । स्वरोपघातश्च भवेदस्थिमज्जासमाश्रिते ॥ ३० ॥ अस्थि (हड्डी) और मज्जागत कुष्ठ होनेसे नाक गिरपडे, नेत्र लाल होयँ, घावमें कीडे पड जाँय, स्वर बैठ जाय ये लक्षण होयँ ॥ शुक्रार्त्तवगत कुष्ठके लक्षण । दंपत्योः कुष्ठबाहुल्याद्दुष्टशोणितशुक्रयोः । यदपत्यं तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ॥ ३१ ॥ जिन स्त्रीपुरुषोंके रुधिर शुक्र कुष्ठाधिक्यसे दुष्ट होयँ, उस दुष्ट हुए वीर्य और रजसे प्रगट भई जो सन्तान सो भी कोढ़ी होती है, इस जगह दुष्टहुए शुक्र और १ त्वक्शब्देनात्र रसोऽभिधीयते धातुप्रस्तावात् त्वक्शब्देन रसस्याभिधानं तात्स्थ्यात् १०
( २५८ ) माधवनिदान ।
( २५८ ) माधवनिदान । आर्तव सर्वथा बीजत्व नष्ट न होनेसे संतानके करनेवाले होते हैं और जीवसंक्रमण कालमें कदाचित् बीज दुष्ट होय तो विषके कीडेके न्याय करके सन्तान प्रगट होती है अर्थात् जैसे विष प्राणियोंके प्राणका नाशक है परन्तु उसमें भी विषका कीडा प्रगट होता है और वह उससे नहीं मरता है यह वाग्भटका मत है ॥ साध्यादिभेद । साध्यं त्वग्रक्तमांसस्थं वातश्लेष्माधिकं च यत् । मेदसि द्वन्द्वजं याप्यं वर्ज्यं मज्जास्थिसंसृतम् ॥ ३२ ॥ कृमिहृल्लासमन्दाग्निसंयुक्तं यत्त्रिदोषजम् । प्रभिन्नं प्रस्रुताङ्गं च रक्तनेत्रं हतस्वरम् ॥ पंचकर्मगुणातीतं कुष्ठं हंतीह कुष्ठिनम् ॥ ३३ ॥ रस रुधिर मांस इन धातुओंके पर्यंत गये जो कुष्ठ वे साध्य होते हैं तथा जिस कुष्ठमें वायु और कफ प्रधान होय वह भी साध्य है और मेदोधातुगत कुष्ठ तथा द्वंद्वजकुष्ठ याप्य जानना । मज्जा अस्थि इन दोनों धातुमें कुष्ठ पहुँच गया हो तथा जो शुक्रगत हो वह कुष्ठ असाध्य है तथा जिस कुष्ठमें कृमि, वमन, मन्दाग्नि इन करके युक्त होय तथा त्रिदोषज होय वह असाध्य है। जो कुष्ठ फूटकर बहने लगे तथा जिस कुष्ठसे रोगीके नेत्र लाल होयँ अथवा स्वर बैठ गया होय और वमन विरेचनादि पंचकर्मके गुण जिस पुरुषके नहीं होयँ ऐसा रोगी मर जाय ॥ कुष्ठमें प्रधानदोषके लक्षण । वातेन कुष्ठं कापालं पित्तेनौदुंबरं कफात् ॥ ३४ ॥ मंडलाख्यं विचर्ची च ऋक्षारव्यं वातपित्तजम् । चर्मैककुष्ठं किटिभं सिध्मालसविपादिकाः ॥ ३५ ॥ वातश्लेष्मोद्भवाः श्लेष्मपित्ताद्दद्रुशतारुषी । पुण्डरीकं सविस्फोटं पामा चर्मदलं तथा ॥ ३६ ॥ सर्वैः स्यात्काकणं पूर्वं त्रिकं दद्रूः सकाकणा । पुंडरीकर्षजिह्वे च महाकुष्ठानि सप्त तु ॥ ३७ ॥ बादीसे कापालकुष्ठ, पित्तसे औदुंबर, कफसे मण्डल और विचर्चिका, वातपित्तसे ऋक्षजिह्व, वातकफसे चर्मकुष्ठ, किटिभ, सिध्म, अलस और विपादिका, कफपित्तसे दद्रु, शतारु, पुंडरीक, विस्फोटक, पामा, चर्मदल, त्रिदोषसे काकणकुष्ठ होय है, पहिले तीन (कापाल, उदुंबर और मण्डल), दद्रु, काकण, पुंडरीक और ऋक्षजिह्व ये सात महाकुष्ठ जानने ॥
किलासनिदान ।
भाषाटीकासमेत । (२५९) किलासनिदान । कुष्ठैकसम्भवं श्वित्रं किलासं चारुणं भवेत् । निर्दिष्टमपरिस्त्रावि त्रिधातूद्भवसंश्रयम् ॥ ३८ ॥ कुष्ठ होनेके जो कारण (विरुद्धभोजन पापकमीदि) कहे हैं उन्हीं कारणोंसे श्वित्र (सफेद कोढ) और किलास (लाल कोढ) ये होते हैं इनमें स्त्राव नहीं होय तथा ये तीन धातुओंका आश्रय करके रहते हैं अर्थात् तीन दोष और रुधिर मांस तथा मेद इनका आश्रय करके रहते हैं ॥ वातादिभेदसे उनके लक्षण । वाताद्रूक्षारुणं पित्तात्ताम्रं कमलपत्रवत् । सदाहं रोमविध्वंसि कफाच्छ्वेतं घनं गुरु ॥ ३९ ॥ सकण्डूरं क्रमाद्रक्तमांसमेदस्सु चादिशेत् । वर्णेनैवेहगुभयं कृच्छ्रं तच्चोत्तरोत्तरम् ॥ ४० ॥ बादीसे रूक्ष और लाल होय, पित्तसे ताम्बेके वर्ण समान तथा कमलपत्रके समान लाल आकृति होय और उसमें दाह होय, उसके ऊपरके बाल गिरपडे, कफके योगसे वह कोढ सफेद, गाढा और भारी होय और उसमें खुजली चले, रुधिर, मांस और मेदमें क्रमसे लाल ताम्र श्वेतवर्णसे किलास जानना अर्थात् दोष रक्ताश्रित होनेसे लाल, मांसाश्रित होनेसे तामेके रंग और मेदाश्रित होनेसे सफेद किलास होय है और वर्णसेही दोषसे उत्पन्न तथा व्रणसे उत्पन्न हुआ किलास, श्वित्र उत्तरो- त्तर (रसगतसे मांसगत और मांसगतसे मेदोगत) कृच्छ्रसाध्य हैं ॥ श्वित्रके साध्यासाध्य लक्षण । अशुक्लरोम बहलमसंश्लिष्टमथो नवम् । अनग्निदग्धजं साध्यं श्वित्रं वर्ज्यमतोऽन्यथा ॥ ४१ ॥ जिस श्वित्र कोढके ऊपरके बाल काले हों तथा जो पतले होकर आपसमें मिले नहीं, तथा नवीन श्वित्र हो, अग्निदग्ध न हो, वह श्वित्रकोढ साध्य जानना, इससे विपरीत असाध्य है ॥ १ कुष्ठेन सह एकं समानं विरुद्धाशनपापकर्मादिसम्भवो निदानं यस्य तत् कुष्ठैकसम्भ- वम् । २ त्रिधातूद्भवसंश्रयमिति-त्रिधातवस्त्रयो दोषास्तथा रक्तमांसमेदांसि उद्भवोय संश्रयोऽधिष्ठानं यस्य तत्तथा ॥
( २६० ) माधवनिदान ।
( २६० ) माधवनिदान । किलासके असाध्य लक्षण । गुह्यपाणितलौष्ठेषु जातमप्यचिरन्तनम् । वर्जनीयं विशेषेण किलासं सिद्धिमिच्छता ॥ ४२ ॥ गुदास्थानमें, हाथोंमें, पैरोंके तलुओंमें, होठोंमें प्रगट भया किलास कुष्ठ थोडे दिनका होय तौ भी यश मिलनेकी इच्छावाला वैद्य छोड दे ॥ सांसर्गिक रोग । प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निःश्वासात्सहभोजनात् । सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥ ४३ ॥ कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च । औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम् ॥ ४४ ॥ मैथुनादि प्रसंगसे अथवा शरीरके स्पर्शसे, श्वासके लगनेसे, साथ बैठकर एक- पात्रमें भोजन करनेसे, एक साथ एक शय्या ( पलंग ) पर सोनेसे तथा एकसाथ मिलकर बैठनेसे, पास रहनेसे, धारण कियेहुए वस्त्रको धारण करनेसे, सूंघे हुए पुष्पको सूंघनेसे अथवा पहरीहुई मालाको धारण करनेसे, लगायेहुए चन्दनमेंसे चन्दन लगानेसे कोढ ज्वर धातुशोष ( क्षयी रोग ), नेत्ररोग ( आंख दुखना ) औपसर्गिक रोग कहिये शीतलादिक और भूतोपसर्गादिक ये सांक्रामिकरोग एक पुरुषसे उडकर दूसरे मनुष्यके हो जाते हैं, इसीसे पूर्वोक्त रोगियोंका प्रसंगा- दिक न करे ॥ ४४ ॥ म्रियते यदि कुष्ठेन पुनर्जातस्य तद्भवेत् । नातो निन्द्यतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्तितम् ॥ ४५ ॥ कुष्ठरोगी मरै तौ फिर उसके दूसरे जन्ममें यह कुष्ठरोग होय है, इस कुष्ठ- रोगके समान और दूसरा निंद्यरोग नहीं है। कुष्ठरोगकी निरुक्ति-“ कुत्सितं तिष्ठ- तीति ” । “ कुष्ठं भेषजरोगयोः ” इति हैमः ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां कुष्ठरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ शीतपित्तोदर्दकोठनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( २६१ ) अथ शीतपित्तोदर्दकोठनिदानम् । ⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘⁘ शीतपित्तके निदान और संप्राप्ति । शीतमारुतसंस्पर्शात्प्रदुष्टौ कफमारुतौ । पित्तेन सह संभूय बहिरन्तर्विसर्पतः ॥ १ ॥ शीतलपवनके लगनेसे कफ वायु दुष्ट होकर पित्तसे मिल भीतर रक्तादिकोंमें और बाहर त्वचा में विचरते हैं ॥ पूर्वरूप । पिपासारुचिहृल्लासमोहसादाङ्गगौरवम् । रक्तलोचनता तेषां पूर्वरूपस्य लक्षणम् ॥ २ ॥ प्यास, अरुचि, मुखमेंसे पानी गिरना, अंग टूटना और भारी होना, नेत्रमें लाली ये पूर्वरूप शीतपित्तके जानने ॥ उददर्दके लक्षण । वरटीदष्टसंस्थानः शोथः सजायते बहिः । सकण्डूस्तोदबहुलश्छर्दिज्वरविदाहवान् ॥ ३ ॥ उदर्दंमिति तं विद्याच्छीतपित्तमथापरे । वरटी (ततैया) के काटनेके समान त्वचाके ऊपर चकत्ता होजाय उसमें खुजली चले और सूई चुभानेकीसी पीडा होय, इसके संयोगसे वमन, ज्वर, सन्ताप और दाह होय, इस रोगको उदर्द कहते हैं, कोई इसको शीतपित्त कहते हैं, इसको लौकिकमें पित्ती कहते हैं, इसमें खुजली होय है, सो कफसे जानना, चोटनी बादीसे होय है और ओकारी सन्ताप और दाह ये पित्तसे होते हैं ऐसे जानना ॥ वाताधिकं शीतपित्तमुदर्दस्तु कफाधिकः ॥ ४ ॥ शीतपित्तमें वात प्रधान तथा उदर्द कफप्रधान जानना ॥ उदर्दका दूसरा धर्म । सोत्सङ्गैश्च सरागैश्च कण्डूमद्भिश्च मण्डलैः । शैशिरः कफजो व्याधिरुदर्दः परिकीर्तितः ॥ ५ ॥ सरदीसे कफका कोप होकर अंगके ऊपर लाल लाल चकत्ता उठें, उनमें खुजली बहुत चले और वे मण्डलके आकार गोल हों, बीचमें कुछ नीचे और आसपास ऊंचे होयँ, इस रोगको उदर्द कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २६२ ) माधवनिदान ।
( २६२ ) माधवनिदान । कोठके लक्षण । असम्यग्वमनोदीर्णपित्तश्लेष्मान्ननिग्रहैः । मण्डलानि सकण्डूनि रागवन्ति बहूनि च । उत्कोठः सानुबन्धश्च कोठ इत्यभिधीयते ॥ ६ ॥ वमनकारक औषध सेवन करनेसे, अच्छी रीतिसे वमन न होनेसे, पित्त और कफ कुपित होनेसे अथवा स्वतः वमनके वेग आये भयेको रोकनेसे, देहके ऊपर लाल और बहुत चकत्ता उठें, उनमें खुजली चले, इस रोगको उत्कोठ कहते हैं और जो क्षणभरमें उत्पन्न होकर नाश हो जाय उसको कोठ कहते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्धबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां शीतपित्तोदर्दकोठनिदानं समाप्तम् ॥ अथाम्लपित्तनिदानम् । निदानपूर्वक अम्लपित्तका स्वरूप । विरुद्धदुष्टाम्लविदाहिपित्तप्रकोपिपानान्नभुजो विदग्धम् । पित्तं स्वहेतूपचितं पुरा यत्तदम्लपित्तं प्रवदन्ति सन्तः ॥ १ ॥ विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ) और दुष्टान्न, खट्टा, दाहकारक, पित्त बढानेवाला ऐसा अन्न पानके सेवन करनेसे वर्षादिक ऋतुमें जलौषधिगत विदाहादि स्वकारणसे सञ्चित भया पित्त दुष्ट होय उसको अम्लपित्त कहते हैं ॥ अम्लपित्तके लक्षण । अविपाकक्लमोट्क्लेदतिक्ताम्लोद्गारगौरवैः । हृत्कण्ठदाहारुचिभिश्चाम्लपित्तं वदेद्भिषक् ॥ २ ॥ अन्नका न पचना, विना परिश्रम करे परिश्रमसा मालूम हो, वमन, कडुवी तथा खट्टी डकार आवे, देह भारी रहे, हृदय और कण्ठमें दाह होय, अरुचि होय ये लक्षण होनेसे अम्लपित्त वैद्य जाने ॥ अम्लपित्त दो प्रकारका-एक ऊर्ध्वगत तथा दूसरा अधोगत, उसमें प्रथम अधोगतके लक्षण । तृड्दाहमूर्च्छाभ्रममोहकारि प्रयात्यधो वा विविधप्रकारम् । हृल्लासकोठानलसादकर्णस्वेदांगपीतत्वकरं कदाचित् ॥ ३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २६३ ) अम्लपित्त अधोगत होनेसे प्यास, दाह, मोह, ( इन्द्रिय मोह ) मूर्च्छा, भ्रम, ( मनो ) मोह, सूखी रह, मन्दाग्नि, कोठ, कानमें पसीना, देहमें पीलापन ये लक्षण होकर गुदाके द्वारा काले लाल दुर्गन्धयुक्त अनेक वर्णके पित्त गिरें ॥ ऊर्ध्वगत अम्लपित्तके लक्षण । वान्तं हरित्पीतकनीलकृष्णमारक्तरक्ताभमतीव चाम्लम् । मांसोदकाभं त्वतिपिच्छलाच्छश्लेष्मानुयातं विविधं रसेन ॥ ४ ॥ भुक्ते विदग्धे त्वथवाप्यभुक्ते करोति तिक्ताम्लवमिं कदाचित् उद्गारमेवंविधमेव कण्ठे हृत्कुक्षिदाहं शिरसो रुजं च ॥ ५ ॥ ऊर्ध्वगत पित्तसे हरे, पीले, नीले, काले, थोडे लाल अथवा रक्तके सदृश अत्यन्त खट्टा, मांस धोयेहुए जलके समान, अत्यन्त रेसदार, स्वच्छ, कफमिश्रित, खारी, कसेला आदि संयुक्त ऐसे पित्त गिरे, कभी कभी भोजन करे अन्न विदग्धावस्थाको प्राप्त होकर अथवा भोजन करनेके पहिले कडुवी खट्टी ऐसे वमन होय तथा ऐसीही डकारें आवें, कण्ठ, कूख, हृदय इनमें दाह होय, माथा दूखे ॥ कफपित्तजन्य अम्लपित्तके लक्षण । करचरणदाहमौष्ण्यं महतीमरुचिं ज्वरं च कफपित्तम् । जनयति कण्डूमण्डलपिडिकाशतनिचितगात्ररोगचयम् ॥ ६ ॥ हाथ पैरोंमें दाह, गरमी, अन्नमें अरुचि, ज्वर, कण्डू ( खुजली ), रुधिरके बिगडनेसे देहमें मण्डल हो, सैकड़ों पिटिका, अविपाकादि अनेक उपद्रव ये लक्षण कफपित्तसे होते हैं ॥ साध्यासाध्य विचार । रोगोऽयमम्लपित्ताख्यो यत्नात्संसाध्यते नवः । चिरोत्थितो भवेद्याप्यः कृच्छ्रसाध्यः स कस्यचित् ॥ ७ ॥ यह अम्लपित्तरोग नया होय तो यत्न करनेसे साध्य होय और बहुत दिनका होय तो याप्य जानना और जो अपथ्यसेवन करनेवाले पुरुष हैं उनके यह अम्ल- पित्तरोग कृच्छ्रसाध्य होय है ॥ अम्लपित्तमें केवल वायुका और वातकफका संसर्ग होय सो कहते हैं- सानिलं सानिलकफं सकफं तच्च लक्षयेत् । दोषलिङ्गेन मतिमान्भिषङ्मोहकरं हि तत् ॥ ८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २६४ ) माधवनिदान ।
( २६४ ) माधवनिदान । वातयुक्त अम्लपित्त, वातकफयुक्त अम्लपित्त और कफयुक्त अम्लपित्त ऐसे तीन प्रकारका अम्लपित्त बुद्धिमान् वैद्य दोषोंके लक्षणोंसे जाने । कारण इसका यह है कि, ऊर्ध्वगत अम्लपित्तमें छर्दि (रद्द) रोगका भास होय है और अधोगत अम्लपित्तमें अतिसारकीसी चेष्टा मालूम होय, इसीसे वैद्यको मोह होय है इसीसे वैद्यको इस रोगकी सूक्ष्म रीतिसे परीक्षा करनी चाहिये ॥ वातयुक्त अम्लपित्तके लक्षण । कम्पप्रलापमूर्च्छाचिमिचिमिगात्रावसादशूलानि । तमसो दर्शनविभ्रमविमोहहर्षाश्च वातयुते ॥ ९ ॥ वातयुक्त अम्लपित्तमें कंप, प्रलाप, मूर्च्छा, चिमचिमा (चींटी काटनेसे प्रगट खुजलीके समान ), देह टूटना, पेट दूखना, नेत्रोंके आगे अन्धकार दीखें, भ्रांति होना, इन्द्रिय मनको मोह, रोमाञ्च हों ये लक्षण होते हैं ॥ कफयुक्त अम्लपित्तके लक्षण । कफनिष्ठीवनगौरवजडताऽरुचिशीतसादवमिलेपाः । दहनबलसादकण्डूर्निद्रा चिह्नं कफानुगते ॥ १० ॥ कफयुक्त अम्लपित्तमें कफके ढेले गिरें, शरीरका अत्यन्त भारीपना, इन्द्रियोंमें जडपना, अरुचि, शीत लगे, अंग टूटना, वमन, मुख कफसे लिपटा रहे, मन्दाग्नि, बलनाश, खुजली और निद्रा ये लक्षण होते हैं ॥ वातकफयुक्त अम्लपित्तके लक्षण । उभयमिदमेव चिह्नं मारुतकफसम्भवे भवत्यम्ले । वातकफयुक्त अम्लपित्तमें ऊपर कहे हुए दोनोंके लक्षण होते हैं ॥ कफपित्तके लक्षण । भ्रमो मूर्च्छाऽरुचिश्छर्दिरालस्यं च शिरोरुजः । प्रसेको मुखमाधुर्यं श्लेष्मपित्तस्य लक्षणम् ॥ ११ ॥ भ्रम, मूर्च्छा, अरुचि, वमन, आलस्य, मस्तकपीडा, मुखसे पानी बहना, मुखमें मिठास ये कफपित्तके लक्षण हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायाम् अम्लपित्तनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ विसर्पनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( २६६ ) अथ विसर्पनिदानम् । ━◇━ विसर्पकी निदानपूर्वक संख्यारूप सम्प्राप्ति और निरुक्ति । लवणाम्लकटूष्णादिसंसेवाद्दोषकोपतः । विसर्पः सप्तधा ज्ञेयः सर्वतः परिसर्पणात् ॥ १ ॥ खारी, खट्टा, कडुवा, गरम आदि पदार्थ सेवन करनेसे वातादि दोषोंका कोप होकर सात प्रकारका विसर्प रोग होय है, वह सर्वत्र फैलजाय, इसीसे इसको विसर्प कहते हैं सो चरकमें लिखा भी है ॥ पृथक् त्रयस्त्रिभिश्चैको विसर्पा द्वंद्वजास्त्रयः । वातिकः पैत्तिकश्चैव कफजः सान्निपातिकः ॥ चत्वार एते वीसर्पा वक्ष्यन्ते द्वंद्वजास्त्रयः ॥ २ ॥ आग्नेयो वातपित्ताभ्यां ग्रन्ध्याख्यः कफवातजः । यस्तु कर्दमको घोरः स पित्तकफसम्भवः ॥ ३ ॥ वातिक १, पैत्तिक १, श्लैष्मिक १, सान्निपातिक १, द्वन्द्वज ३ इस तरह सात प्रकारका विसर्परोग है । २ वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक, सान्निपातिक ये चार प्रकारके विसर्प हैं और तीन जो द्वन्द्वज उनको अब कहेंगे, वातपित्तसे आग्नेय, कफवातसे ग्रन्थ्याख्य, कफपित्तसे घोर कर्दमके नामवाला विसर्प होता है ॥ सर्वप्रकारके विसर्प रक्तादिक चार दूष्य और वातादि तीन दोष इनसे होते हैं सो कहते हैं- रक्तं लसीकात्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः । विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्त धातवः ॥ ४ ॥ रुधिर, मांसका जल, त्वचा, मांस ये दूष्य और वातादि तीन दोष ये सात धातु विसर्पके उत्पन्न होनेके कारण हैं ॥ वातविसर्पके लक्षण । तत्र वातात्परीसर्पो वातज्वरसमाकृतिः । शोफस्फुरणनिस्तोदभेदपामार्तिहर्षवान् ॥ ५ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ १ विविधं सर्पति यतो विसर्पस्तेन स स्मृतः । परिसर्पोऽथ वा नाम्ना सर्वतः परिसर्पणात् ॥ इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २६६ ) माधवनिदान ।
( २६६ ) माधवनिदान । बादीसे विसर्प जो होय उसके लक्षण वातज्वरके समान होते हैं तथा उसमें सूजन, फरकना, नोंचनेकीसी पीडा, तोडनेकीसी पीडा, दर्द और रोमांच खड़े हों, तथा वह विसर्प लम्बा होय है ॥ पित्तविसर्पके लक्षण । पित्ताद् द्रुतगतिः पित्तज्वरलिङ्गोऽतिलोहितः । पित्तके विसर्पकी गति शीघ्र होय अर्थात् वह जल्दी फैल जाय तथा पित्तज्वरके लक्षण इसमें मिलते हों तथा अत्यन्त लाल होय ॥ कफविसर्पके लक्षण । कफात्कण्डूयुतः स्निग्धः कफज्वरसमानरुक् ॥ ६ ॥ कफकी विसर्पमें खुजली बहुत होय तथा चिकनी होय और उसमें कफ- ज्वरकीसी पीडा होय ॥ सन्निपातविसर्पके लक्षण । सन्निपातसमुत्थश्च सर्वरूपसमन्वितः । सन्निपातजन्य विसर्पमें जो वातादिकोंके लक्षण कहे हैं सो सब होयँ ॥ अग्निविसर्पके लक्षण । वातपित्ताज्ज्वरच्छर्द्दिमूर्च्छातीसारतृड्भ्रमैः ॥ ७ ॥ अस्थिभेदाग्निसदनतमकारोचकैर्युतः । करोति सर्वमङ्गं च दीप्ताङ्गारावकीर्णवत् ॥ ८ ॥ यं यं देशं विसर्पश्च विसर्पति भवेच्च सः । शांतांगारासितो नीलो रक्तो वाऽऽशूपचीयते ॥ ९ ॥ अग्निदग्ध इव स्फोटैः शीघ्रगत्वाद द्रुतं च सः । मर्मानुसारी वीसर्पः स्याद्वातोऽतिबलस्ततः ॥ १० ॥ व्यथेताङ्गं हरेत्संज्ञां निद्रां च श्वासमीरयेत् । हिक्कां च स ततोऽवस्थामीदृशीं लभते नरः ॥ ११ ॥ क्वचिच्छर्म्मार्रतिग्रस्तो भूमिशय्यासनादिषु । चेष्टमानस्ततः क्लिष्टो मनोदेहसमुद्भवाम् ॥ दुर्बोधामश्नुते निद्रां सोऽग्निवीसर्प उच्यते ॥ १२ ॥ वातपित्तसे प्रगट विसर्प ज्वर, वमन, मूर्च्छा, अतिसार, प्यास, भौंर, हड- फूटन, मन्दाग्नि, अन्धकारदर्शन, अन्नद्वेष इन लक्षणों करके संयुक्त होय,
भाषाटीकासमेत । (२६७) इसके संयोगसे सर्व शरीर अङ्गारोंसे भरासा मालूम होय, जिस जिस ठिकाने वह विसर्प फैले उसी ठिकानेपर अग्निरहित अङ्गारके समान काला नीला लाल होकर शीघ्र सूजे, आगसे फूँकेके समान ऊपर फफोला होय और उस विसर्पकी शीघ्र गति होनेसे जल्दी हृदयमें जाकर मर्मानुसारी विसर्प होय और उससे वायु अत्यन्त बलवान् होय, अंगोंको व्यथा करे, संज्ञा और निद्रा इनका नाश होय, श्वास बढ़ावे, हिचकी उत्पन्न करे, ऐसी मनुष्यकी अवस्था होनेके कारण धरती, तेज, आसन इत्यादिकोंमें सुख नहीं होय, हलने चलनेसे क्लेश होय, मन तथा देहको क्लेश होनेसे उत्पन्न भई ऐसी दुर्बोध निद्रा (मरणरूपी निद्रा) को प्राप्त होय, इस रोगको अग्निविसर्प कहते हैं॥ ग्रन्थि विसर्पके लक्षण । कफेन रुद्धः पवनो भित्त्वा तं बहुधा कफम् ॥ १३ ॥ रक्तं वा वृद्धरक्तस्य त्वक्छिरास्नायुमांसगम् । दूषयित्वा च दीर्घाणुवृत्तस्थूलखरात्मनाम् ॥ १४ ॥ ग्रन्थीनां कुरुते मालां रक्तानां तीव्ररुग्ज्वराम् । श्वासकासातिसारास्यशोषहिक्कावमिभ्रमैः ॥ १५ ॥ मोहवैवर्ण्यमूर्च्छांगभंगाग्निसदनैर्युतम् । इत्ययं ग्रंथिवीसर्पः कफमारुतकोपजः ॥ १६ ॥ स्वहेतुसे कुपित भया कफ सो रुकी हुई पवन कफको भेदकर अथवा बढ़े हुए रुधिरको भेदकर त्वचा, नस, नाडी और मांस इनमें प्राप्त हो और इनको दुष्ट कर लम्बी, छोटी, गोल, मोटी, खरदरी, लाल गांठोंकी माला प्रगट करे. इन गांठोंमें पीडा अधिक होय, ज्वर होय. श्वास, खांसी, अतिसार, मुखमें पपडी पडे. हिचकी, वमन, भ्रमता, मोह, वर्णका पलटना, मूर्च्छा, अंगोंका टूटना, मन्दाग्नि ये लक्षण होते हैं, इस रोगको ग्रन्थिविसर्प कहते हैं, यह कफवायुके कोपसे उत्पन्न होता है, (इसको सुश्रुत अपची कहते हैं) ॥ कर्दमविसर्पके लक्षण । कफपित्ताज्ज्वरः स्तंभो निद्रा तंद्रा शिरोरुजा । अंगावसादविक्षेपप्रलापारोचकभ्रमाः ॥ १७ ॥ मूर्च्छाग्निहानिर्भेदोऽस्थ्नां पिपासेन्द्रियगौरवम् । आमोपवेशनं लेपः स्रोतसां स विसर्पति ॥ १८ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
( २६८ ) माधवनिदान ।
( २६८ ) माधवनिदान । प्रायेणामाशयं गृह्णन्नैकदेशं न चातिरुक् । पिडिकैरिव कीर्णोऽतिपीतलोहितपांडुरैः ॥ १९ ॥ स्निग्धोऽसितो मेचकाभो मलिनः शोफवान् गुरुः । गंभीरपाकः प्राज्योष्मा स्पृष्टः क्लिन्नोऽवदीर्यते ॥ २० ॥ पंकवच्छीर्णमांसश्च स्पृष्टस्नायुशिरागणः । शवगंधी च वीसर्पं कर्दमारव्यमुशंति तम् ॥ २१ ॥ कफपित्तसे ज्वर, अंगोंका जकडना, निद्रा, तन्द्रा, मस्तकशल, अङ्गग्लानि, हाथ- पैरोंका पटकना, बकवाद, अरुचि, भ्रम, मूर्च्छा, मन्दाग्नि, हडफूटन, प्यास, इंद्रियोंका जकडना, आमका गिरना, मुखादि स्रोतों (छिद्रों) में कफका लेप इत्यादि लक्षण होते हैं तथा वह विसर्प आमाशयमें उत्पन्न हो पीछे सर्वत्र फैले, उसमें पीडा थोडी होय, उसमें सर्वत्र पीली तांबेके रंगकी सफेद रंगकी पिडिका होयं तथा वह विसर्प चिकनी स्याहीके समान काली, मलिन, सूजनयुक्त, भारी, गम्भीरपाक कहिये भीतरसे पकी हो उसमें घोर दाह और वह दबानेसे तत्क्षण गीली होजाय तथा वह फटजाय तथा कीचके समान होकर उसका मांस गल जाय, उसमें सिरा नाडी (नस) ये दीखने लगें, उसमें मुर्देकीसी वास आवे, इस विसर्पको कर्दमविसर्प कहते हैं ॥ क्षतजविसर्पके लक्षण। बाह्यहेतोः क्षतात्क्रुद्धः सरक्तं पित्तमीरयन् । विसर्पं मारुतः कुर्यात्कुलित्थसदृशैश्चितम् ॥ २२ ॥ स्फोटैः शोथज्वररुजादाहाढ्यं श्यावशोणितम् ॥ २३ ॥ बाह्यकारण करके क्षत (घाव) होकर उसमें वायु कुपित होकर वह रुधिर, सहित पित्तको व्रणमें प्राप्त कर विसर्परोग उत्पन्न करे, उसमें कुलथीके समान श्याम- वर्णके फोडे होते हैं, सूजन हो, ज्वर होय, पीडा होय और दाह होय, उसका रुधिर काला निकले इस विसर्पको पित्तविसर्पके अन्तर्गत जाननेसे संख्यामें विरुद्ध नहीं पडे अन्यथा संख्या बढजाती है यह भोजका मत है ॥ उपद्रव । ज्वरातिसारवमथुस्तृण्मांसदरणं क्लमः । अरोचकाविपाकौ च विसर्पाणामुपद्रवाः ॥ २४ ॥ ज्वर, अतिसार, वमन, प्यास, मांसका गलना, अनायास श्रम, अरुचि, अन्न न पचना ये विसर्परोगके उपद्रव हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
न सिद्धिमेति । पित्तात्मकोऽननवपुश्च भवेदसाध्यः कृच्छ्राश्च
भाषाटीकासमेत । ( २६९ ) साध्यासाध्य लक्षण । सिद्ध्यन्ति वातकफपित्तकृता विसर्पाः सर्वात्मकः कफकृतश्च न सिद्धिमेति । पित्तात्मकोऽननवपुश्च भवेदसाध्यः कृच्छ्राश्च मर्मसु भवंति हि सर्व एव ॥ २५ ॥ वात पित्त कफ इनसे प्रगट जो विसर्प सो साध्य होय हैं, सन्निपातज और क्षतज विसर्प साध्य नहीं होय, पित्तसे प्रगट भई विसर्प जिसका काजलके समान अंग होय वह असाध्य और जो विसर्प मर्म ठिकानेपर होंय वे सब कष्टसाध्य होते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां विसर्परोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ विस्फोटकनिदानम् । विस्फोटके लक्षण । कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहिरूक्षक्षारैरजीर्णाध्यशनातपैश्च । तथर्तुदोषेण विपर्ययेण कुप्यंति दोषाः पवनादयस्तु ॥ १ ॥ त्वचमाश्रित्य ते रक्तमांसास्थीनि प्रर्दूष्य च । घोरान्कुर्वन्ति विस्फोटान्सर्वाञ्ज्वरपुरःसरान् ॥ २ ॥ कडुआ, खट्टा, तीखा ( मरिचादि ), गरम, दाहकारक, रूखा, खारा, अजीर्ण, भोजनके ऊपर भोजन और धूप, ऋतुदोष कहिये शीतोष्णका अतियोग अथवा ऋतुविपर्यय ( ऋतुका पलटना ) इन कारणोंसे वातादि दोष कुपित हो त्वचाका आश्रय कर रुधिर मांस और हड्डी इनको दूषित कर भयंकर विस्फोट ( फोडे ) उत्पन्न करें उनके होनेके पूर्व घोर ज्वर होय है ॥ विस्फोटकरूप । अग्निदग्घनिभाः स्फोटाः सज्वरा रक्तपित्तजाः । क्वचित्सर्वत्र वा देहे विस्फोटा इति ते स्मृताः ॥ ३ ॥ रक्तपित्तसे प्रगटहुए ऐसे अग्निकरके जरेके समान फोडे अंगमें किसी एक ठिकाने अथवा सब देहमें होते हैं उनके होनेसे ज्वर होय, उनको विस्फोट कहते हैं । इस रोगमें भी वातका अनुबन्ध होता है सो भोजने कहा है ॥ १ यदाह भोजः-“यदा रक्तं च पित्तं च वातेनानुगतं त्वचि । अग्निदग्धनिभान्स्फोटान् कुरुतः सर्वदेहगान् । सज्वरान्सपरीदाहान्विद्याद्विस्फोटकांस्तु तान् ॥ ” इति ।
( २७० ) माधवनिदान ।
( २७० ) माधवनिदान । वातविस्फोटकके लक्षण । शिरोरुक्छूलभूयिष्ठं ज्वरतृट्पर्वभेदनम् । सुकृष्णवर्णता चेति वातविस्फोटलक्षणम् ॥ ४ ॥ मस्तकमें पीडा, शूल, देहमें पीडा, ज्वर, प्यास, संधियोंमें पीडा, फोडोंका वर्ण काला होय, ये वातविस्फोटकके लक्षण हैं ॥ पित्तविस्फोटकके लक्षण । ज्वरदाहरुजास्रावपाकतृष्णाभिरन्वितम् । पीतलोहितवर्णं च पित्तविस्फोटलक्षणम् ॥ ५ ॥ ज्वर, दाह, पीडा, स्राव, फोडोंका पकना, प्यास, देह पीला हो अथवा लाल होय ये पित्तविस्फोटकके लक्षण हैं ॥ कफविस्फोटकके लक्षण । छर्द्यरोचकजाड्यानि कंडूकाठिन्यपांडुताः । अवेदनश्चिरात्पाकी स विस्फोटः कफात्मकः ॥ ६ ॥ वमन, अरुचि, जडता तथा फोडा खुजलीयुक्त हो, कठिन, पीले और उनमें पीडा होय नहीं और वे बहुत कालमें पकें, यह विस्फोट कफका जानना ॥ कफपित्तात्मकविस्फोटकके लक्षण । कण्डूर्दाहो ज्वरश्छर्दिरेतैस्तु कफपैत्तिकः । खुजली, दाह, ज्वर और वमन इन लक्षणोंसे कफपित्तजन्य विस्फोट जानना ॥ वातपित्तात्मकके लक्षण । वातपित्तकृतो यस्तु कुरुते तीव्रवेदनाम् ॥ ७ ॥ वातपित्तके विस्फोटकमें तीव्र पीडा होती है ॥ कफवातात्मकके लक्षण । कण्डूस्तैमित्यगुरुभिर्जानीयात्कफवातिकम् । खुजली, गीलापना, भारीपना इन लक्षणोंसे कफवातका विस्फोट जानना ॥ सन्निपातविस्फोटकके लक्षण । मध्ये निम्नोन्नतोऽन्ते च कठिनोऽल्पप्रपाकवान् ॥ ८ ॥ दाहरागतृषामोहेच्छर्दिमूर्च्छारुजो ज्वरः । प्रलापो वमथुस्तंद्रा सोऽसाध्यश्च त्रिदोषजः ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA